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अंतर्राष्ट्रीय सदभावना के लिए शिक्षा

इस लेख में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना के लिए शिक्षा के बारे में अधिक जानकरी दी गयी है।

अंतर्राष्ट्रीय सदभावना का अर्थ

अंतर्राष्ट्रीय सदभावना का अर्थ है-विश्व-नागरिकता। यह भावना इस बात पर बल देती है कि संसार के प्रत्येक मानव में भाई-चारे के सम्बन्ध हों तथा वसुधा एक कुटुम्ब के सामान प्रतीत हो। इस दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय सदभावना, विश्व मैत्री तथा विश्व-बन्धुत्त्व की भावना पर आधारित होते हुए मानव के कल्याण पर बल देती है। दूसरे शब्दों में, अंतर्राष्ट्रीय सदभावना विश्व के समस्त राष्ट्रों तथा उनके नागरिकों के प्रति प्रेम, सहानभूति तथा सहयोग की ओर संकेत करती है।

अंतर्राष्ट्रीय सदभावना की परिभाषा

अंतर्राष्ट्रीय सदभावना के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए हम निम्नलिखित परिभाषायें दे रहे हैं –

(1) डॉक्टर वाल्टर एच० सी० लेव्स- अंतर्राष्ट्रीय सदभावना इस ओर ध्यान दिये बिना कि व्यक्ति किस राष्ट्रीयता या संस्कृति के हैं, एक-दूसरे के प्रति सब जगह उनके व्यवहार का आलोचनात्मक और निष्पक्ष रूप से निरिक्षण करने और आंकने की योग्यता है। ऐसा करने के लिए व्यक्ति को इस योग्य होना चाहिये कि वह सब राष्ट्रीयताओं, संस्कृतियों तथा प्रजातियों को इस भूमंडल पर रहने वाले लोगों की समान रूप से महत्वपूर्ण विभिन्नताओं के रूप में निरिक्षण कर सके।

(2) ओलिवर गोल्डस्मिथ- अंतर्राष्ट्रीयता एक भावना है, जो व्यक्ति को यह बताती है कि वह अपने राज्य का ही सदस्य नहीं है वरन विश्व का नागरिक भी है।

अंतर्राष्ट्रीय सदभावना की आवश्यकता

गत सौ वर्षों के इतिहास पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि संसार के अनके महत्वाकांक्षी राष्ट्रों ने अपने नागरिकों में राष्ट्रीयता की भावना को विकसति करने के लिए शिक्षा की व्यवस्था अपने-अपने निजी ढंगों से की है। इन राष्ट्रों में बालकों को आरम्भ से ही इस बात की शिक्षा दी जाती थी कि- हमारा देश अच्छा अथवा बुरा। अथवा हमारा देश अन्य देशों में श्रेष्टतम है।- इस प्रकार ही शिक्षा प्राप्त करके बालकों में संकुचित राष्ट्रीयता की भावना विकसित हो गई जिसके परिणामस्वरुप विश्व में दो महायुद्ध हुए और आज भी तीसरे महायुद्ध के बदल आकाश में मंडरा रहे हैं। चूँकि युक्त दोनों महायुद्धों के कारण मानव के मानवीय तथा राजनितिक अधिकारों का हनन ही नहीं हुआ अपितु उसे विभिन्न अत्याचारों को भी सहना पड़ा, इसलिए अब संसार के सभी कर्णाधार इस बात का अनुभव करने लगे है कि संकुचती राष्ट्रीयता की अपेक्षा अंतर्राष्ट्रीय सदभावना का विकास किया जाये जिससे संसार में समस्त नागरिकों में परस्पर दोष, घ्रणा ईर्ष्या तथा लम्पटता के स्थान पर प्रेम सहानुभूति , उदारता तथा सदभावना विकसित हो जायें और संसार में सुख शान्ति तथा स्वतंत्रता एवं समानता बनी रहे। रोमा रोला ने इस तथ्य की पुष्टि करते हुए लिखा है –  भयंकर विनाशकारी परिणाम वाले दो विश्व-युद्धों ने कम से कम यह सिद्ध कर दिया है की क्षुद्र और आक्रमणकारी राष्ट्रीयता के संकीर्ण बंधनों को तोड़ डालना चाहिये तथा प्रेम, दया एवं सहानभूति पर आधारित मानव सम्बन्धों का विकास करने के लिए मानव जाति के स्वतंत्रता संघ का निर्माण किया जाना चाहिये।

अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसित करने के पक्ष में तर्क

अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसित करने के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा रहे हैं –

(1) यधपि संसार में समस्त राष्ट्रों में भिन्न-भिन्न रंग-रूप तथा जाति एवं धर्म के लोग रहते हैं, परन्तु उन सबकी मानवीय आत्मा एक है। अन्तर केवल इतना ही है कि हम जर्मनी में रहने वाले को जर्मन कहते हैं तथा रूस में रहने वाले को रुसी। ऐसे ही अमरीका में रहने वाले को अमरीकन कहते हैं तथा जापान में रहने वाले को जापानी। वास्तविकता यह है कि सम्पूर्ण मानव जाति एक ही है तथा विश्व भी एक ही ईकाई है। एक एकता का आभास कराने के लये अंतर्राष्ट्रीय सदभावना का विकास परम आवश्यक है।

(2) आधुनिक युग में विश्व के सभी राष्ट्र एक-दूसरे के इतने निकट का गये हैं कि एक राष्ट्र में होने वाली घटना अन्य राष्ट्रों को भी प्रभावित किये बिना नहीं रह सकती। ऐसी स्थिति में यदि विश्व के सभी राष्ट्रों को एक-दूसरे का निरन्तर भय बना रहेगा तो प्रत्येक राष्ट्र अपनी रक्षा के लिए अथवा युद्ध की तैयारी के लिए अपनी अधिक से अधिक शक्ति को विनाशकारी शास्त्रों के निर्माण में लगता रहेगा। इससे विज्ञान का दुरूपयोग होता रहेगा, मानव का कल्याण नहीं। अत: अच्छा यही है कि मानव में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना का विकास किया जाये जिसके प्रत्येक राष्ट्र आपनी शक्ति का प्रयोग मानव कल्याण के लये कर सके।

(3) आधुनिक युग में रेडिओ, टेलीविजन, बेतार का तार तथा यातायात के अन्य नये-नये और तेज साधनों ने उन सभी पहाड़ों तथा अथाह गहरे सागरों के बंधनों को तोड़ दिया है जिनके बल पर कोई राष्ट्र अपनी प्राकृतिक सीमाओं के घिरे होने के कारण अपने आप को सुरक्षित समझते हुए संसार में अलग रह सकता था। आज मानव ने वैज्ञानिक अविष्कारों के द्वारा समय तथा स्थान पर पूरी विजय प्राप्त कर ली है। अत: हिमालय जैसे ऊँचे पहाड़ों तथा प्रशांत महासागर जैसे गहरे समुद्रों को आसानी से पार किए जा सकता है। वायुयान के द्वारा सहसत्रों मील की यात्रा केवल घण्टों में ही पूरी की जा सकती है तथा टेलीफ़ोन के द्वारा सैकड़ों मील दुरी की आवाजें क्षणों में ही सुनी जा सकती है। दूसरे शब्दों में, संसार के सभी राष्ट्र एक-दूसरे के इतने निकट आ गये है, कि विश्व अब अपेक्षाकृत छोटा हो गया है। के०जि०सैयदन ने ठीक ही लिखा है –  एक युद्ध यूरोप से आरम्भ होता है तथा बंगाल में तीन लाख व्यक्ति अकाल में मरते हैं, लाखों लोग बेघरबार हो जाते हैं, अपने साधारण कार्यों से पृथक हो जाते हैं तथा उन सब सुखों से वंचित हो जाते हैं जो जीवन को सुखी, रोचक तथा अर्थपूर्ण बनाते हैं।

(4) आधुनिक युग में संसार का कोई राष्ट्र आत्मनिर्भर होने का दावा नहीं कर सकता। दूसरे शब्दों में, संसार के सभी राष्ट्र आज आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से एक दूसरे पर निर्भर हैएक राष्ट्र के उधोग धंधे की सफलता दूसरे राष्ट्र में पैदा किये हुए कच्चे माल की खपत पर निर्भर करती है। उदहारण के लिए अमरीका जैसे समृधिशाली राष्ट्र को भी पटसन की खपत के लिए दूसरे राष्ट्रों पर निर्भर रहना पड़ता है। राजनीतिक दृष्टि से भी आज आत्मनिर्भरता युग समाप्त हो चूका है। आधुनिक युग में संसार के छोटे-छोटे सभी राष्ट्रों का कल्याण इसी बात में है कि वे किसी न किसी राजनीतिक गुट के सदस्य बन जायें जिससे वे सामूहिक शक्ति का अनुभव करते हुए अपना अस्तित्व बनाये रख सकें। आर्थिक तथा राजनीतिक निर्भरता की भांति संस्कृति के दृष्टिकोण से भी समस्त संसार एक ही धागे में बन्ध गया है। परिणामस्वरूप अब कोई भी राष्ट्र इस बात का दावा नहीं कर सकता है कि उसकी संस्कृति शुद्ध है। बदलती हुई परिस्थितियों के साथ-साथ संस्कृति भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। रेडिओ, टेलीविजन तथा समाचार पत्रों के द्वारा एक राष्ट्र की संस्कृति दूसरे राष्ट्र की संस्कृति को प्रभावित करती है, इसीलिए मिलजुल कर रहने, कंधे से कन्धा मिलाकर चलने तथा एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र की सहायता एवं सहयोग देने से ही सबका कल्याण है। ऐसी स्थिति में अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विकास करना केवल आवश्यक ही नहीं है अपितु अनिवार्य भी है।

(5) संसार के सभी राष्ट्र छोटे अथवा बड़े, उन्नतिशील अथवा पिछड़े हुए सभी इस विश्वव्यापी परिवार के सदस्य है। जिस प्रकार एक परिवार के छोटे तथा बड़े सभी सदस्य प्रेम के साथ जीवन-यापन करते हैं उसी प्रकार विश्व रुपी पड़े परिवार के सभी राष्ट्रों को किसी न किसी प्रकार से छेड़ते रहते हैं। अच्छा तो यह है जिस प्रकार बड़ा भाई छोटे भाई की सहायता करता है उसी प्रकार प्रगतिशील तथा शक्तिशाली राष्ट्र भी छोटे तथा पिछड़े हुए राष्ट्रों को उन्नतिशील बनायें। इससे उनमें परस्पर प्रेम तथा मित्रता की भावना विकसति होती जिसके परिणामस्वरूप संसार में युद्ध की अपेक्षा चारों ओर सुख और शान्ति का साम्राज्य स्थापित हो जायेगा।

(6) प्रत्येक मनुष्य में प्रेम, दया सहानभूति तथा मित्रता आदि मानवीय गुण पाये जाते हैं। इन मानवीय गुणों को किसी राष्ट्र को भौगोलिक सीमा तक नही बाँधा जा सकता। हो सकता है कि राष्ट्र के नागरिकों की विचारधारा दूसरे राष्ट्रों के नागरिकों को विचारधाराओं से भिन्न हो, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि विचारों के भिन्न होने से ही दूसरों को घ्रणा की दृष्टि से देखते हुए मानवीय गुणों की अवहेलना की जाये।

(7) जनतंत्र के आदर्श के अनुसार जनता की इच्छा को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। इस महान कार्य में सफल होने के लिए जनता की शिक्षा परम आवश्यक है जिससे प्रत्येक नागरिक अपना स्वतंत्र मत प्रकट करने से पूर्व प्रत्येक समस्या पर स्वतंत्रतापूर्वक विचार कर सके। इस दृष्टि से भी अंतर्राष्ट्रीय सदभावना का विकास होना परम आवश्यक है।

(8) भारत में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना का विकसित होना और भी आवश्यक है। इसका कारण यह है कि दीर्घकालीन संघर्ष के पश्चात हम हाल की में दासता की बेड़ियों से मुक्त हुए हैं। अब हमें अपना भाग्य का निर्माण स्वयं ही करना है। हमें अन्य राष्ट्रों से भी सम्बन्ध स्थापित करने हैं जिसमें हम अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सक्रिय रूप से भाग ले सकें। पंडित जवाहरलाल नेहरु ने ठीक ही लिखा है – पृथकता का अर्थ है – पिछड़े रहना और पतन। संसार बदल गया है और पुरानी रुकावटें समाप्त होती जा रही है। जीवन अधिक से अधिक अंतर्राष्ट्रीय होता जा रहा है। हमें इस भावी अंतर्राष्ट्रीयता में अपना योगदान देना है।

एकमात्र प्रभावशाली साधन ‘शिक्षा

संसार के सभी दार्शनिक, शिक्षाशास्त्रियों, राजनीतिज्ञों तथा वैज्ञानिकों एवं समाज सुधारकों ने एकमत होकर इस बात को स्वीकार किया है कि बालकों में अंतर्राष्ट्रीय संघ अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसित करने के का प्रयास कर रहे है वहां दूसरी ओर इससे भी आवश्यक यह है कि प्रत्येक राष्ट्र के नागरिक अन्य राष्ट्रों के नागरिकों की कठिनाईयों का अनुभव करें तथा उनकी प्रशंसनीय बातों का आदर करें। इस प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसित करने के लिए केवल शिक्षा ही एक महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली साधन है। इसका कारण यह है कि स्कूल का एक विशेष वातावरण होता है। अत: स्कूल सर्वोतम सांस्कृतिक तत्वों का प्रतिनिधित्व करता है और निष्पक्षता तथा सत्य के क्षेत्रों में समाज के साधारण स्तर से बहुत ऊँचा होता है। यूनेस्को द्वारा प्रकाशित ‘ टूवर्ड्स वर्ल्ड अंडरस्टेंडिंग’ नमक पत्रिका में ही इसी आशय की पुष्टि करते हुए लिखा गया है – स्कूल आस-पास की संस्कृति में निहित सर्वोतम तत्वों को व्यक्त कर सकते हैं और साधारणत: करते भी है। वे सत्य ईमानदारी और निष्पक्षता में समाज के सामान्य स्तर से ऊँचे होने चाहिये और साधारणत: हाते भी हैं। वे लोगों के मानदंडों और मूल्यों को काफी ऊँचा उठाने का प्रयास करते हैं।

चूँकि अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसित करने के लिए सभी राष्ट्रों के दार्शनिक एवं शिक्षाशास्त्रियों ने केवल शिक्षा को ही एक महत्वपूर्ण साधना माना है, इसलिए सभी ने शिक्षा का एक उदेश्य अंतर्राष्ट्रीय सदभावना का विकास करना भी निर्धारित किया है। इस उदेश्य को प्राप्त करने के लिए अनके प्रश्न पूछे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए शिक्षा के कौन-कौन से सिधान्त होने चाहिये ? इस उदेश्य को प्राप्त करने के लिए पाठ्यक्रम का क्या स्वरुप होना चाहिये ? पाठ्यक्रम को प्रस्तुत करने के लिए किस शिक्षण-विधि को अपनाया जाये ? तथा शिक्षक का क्या कार्य होना चाहिये ? एवं बालकों में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसित करने के लिए किस प्रकार की पुस्तकें होनी चाहिये ? इन सभी प्रश्नों के उत्तर हम अधोलिखित पंक्तियों में दे रहे हैं –

अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसित करने के सिधान्त

(1) नवयुवकों में स्वतंत्र रूप से विचार कनरे की शक्ति का विकास करना - अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसति करने का प्रथम सिधान्त यह है कि बालकों में स्वतंत्र रूप से सोचने विचार करने की शक्ति का विकास किया जाये तथा उनमें प्रत्येक समस्या को वैज्ञानिक ढंग से सुलझाने की आदत डाली जाये। आधुनिक युग में प्रत्येक राष्ट्र अपनी आँखों पर स्वार्थ का चश्मा चढ़ाकर इस बात का ढोल पिटता है कि वह जो कुछ कर रहा है, ठीक है तथा अन्य राष्ट्रों ने वांछनीय मार्ग अपना रखा है। इस स्वार्थपूर्ण प्रचार से राष्ट्र के नागरिक अपने कर्णधारों की आज्ञाओं की आँख मींचकर पालन करने लगते हैं। जब बालकों में स्वतंत्र विचार करने की शक्ति का विकास हो जायेगा तो वे इस बात का आसानी से निर्णय कर सकेंगे कि कौन-कौन से बातें सत्य है तथा कौन-कौन सी झूठ। इस प्रकार वे पक्षतापूर्ण विचारों से प्रभावित न होकर अपने राष्ट्र के गुणों तथा दोषों का निष्पक्ष रूप से मुल्यांकन कर सकेंगे, व्यर्थ की बातों में न फंस कर सारगर्भित बातों की ही महत्त्व प्रदान करेंगे तथा प्रत्येक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समस्या को मत्रिपूर्ण ढंग से सूझ-बुझ, बुद्धिमता तथा प्रेम और शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास करेंगे।

(2) नवयुवकों को उनके ज्ञान के प्रयोग का प्रशिक्षण देना – अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा का दूसरा सिधान्त राष्ट्र के नवयुवकों को उनके ज्ञान का उचित प्रयोग करने का प्रशिक्षण देना है जिससे वे अर्जित कए हुए ज्ञान को अपने वास्तविक जीवन में उचित रूप से प्रयोग कर सकें। उनकी समझ में यह भी आ जाये कि जो सिद्धांत एक राष्ट्र के कार्यों अर्थात एक विशष्ट सामायोजन में मानव सबंधों के लिए किस प्रकार से समान रूपेण सिद्ध होते है। देखेने में यह आता है कि राष्ट्रीयता से प्रभावित होकर एक राष्ट्र केवल अपने ही व्यक्तियों के साथ मानवता का व्यवहार करता है। वह अपने नागरिकों को दया का पात्र समझता है तथा अन्य राष्ट्रों के व्यक्तियों को प्रति उसे कोई दया अथवा किसी प्रकार की सहानभूति नहीं होती। मनुष्य की इस संकीर्ण भावन पर प्रकाश डालते हुए के० जी० सैयदेन ने लिखा है –  जो व्यक्ति अपने देश के किसी बच्चे को भोजन को रोककर उसे कष्ट पहुँचाने का स्वप्न मं भी विचार नहीं कर सकता वही व्यक्ति एक शत्रु राष्ट्र की भोजन सामग्री को बेखटके रोक देता है। उस समय वह यह भूल जाता है कि उस कार्य से उस राष्ट्र को कितने बच्चे भूख से तद्पेंगे। इस प्रकार की संकीर्णता को दूर करने के लिए बालकों को भावात्मक शिक्षा की आवश्यकता है जिससे उनमें द्या, सौहाद्र, न्यायप्रियता तथा स्नेह आदि गुणों का विकास हो जाये और वे जाति, धर्म तथा राष्ट्र के भेद-भाव से ऊँचे उठकर मानवता का अदार कर सकें।

(3) राष्ट्र प्रेम का उचित अर्थ – अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था में राष्ट्र-प्रेम का अर्थ संकीर्ण राष्ट्रीयता न होकर व्यापक रूप में लिया जाना चाहिये। इसका कारण यह है कि संकीर्णता की भावना मानव में सन्देह, द्वेष तथा ईर्ष्या आदि भावनाओं को जन्म देती है। ऐसी संकुचित भावनाओं से प्रेरित होकर राष्ट्र के नागरिक केवल अपने ही राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों से हर हालत में ऊँचा समझने लगते हैं। उन्हें अपने राष्ट्र की तुच्छ वस्तु भी सर्वोतम लगने लगती है तथा वे अन्य राष्ट्रों की निष्पतियों को भी हेय समझने लगते हैं। राष्ट्र प्रेम की यह संकीर्ण भावना मानवता तथा विश्व-बंधुत्व की भावनाओं का विरोध करती है। आधुनिक युग में विश्व एक इकाई है तथा संसार के सभी राष्ट्र इसके नागरिक है। अत: राष्ट्र प्रेम का अर्थ अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम रखने के साथ-साथ विश्व प्रेम भी होना चाहिये।

(4) निर्भरता का सिधान्त – मानव जाति एक संगठन वर्ग है। इस वर्ग का प्रतेक सदस्य एक-दूसरे पर किसी न किसी वस्तु के लिए निर्भर रहता है। किसी भी राष्ट्र को स्वयं ही अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। उसे खाद्य पदार्थ, वस्त्र तथा अन्य वस्तुओं के लिए दूसरे राष्ट्रों की सहयता लेनी पड़ती है। वस्तुओं के इस परस्पर आदान-प्रदान से ही सभी राष्ट्रों का कार्य चलता रहता है। इस सत्य पर बल देते हुए हमें बालकों में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसित करना चाहिये। अत: शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार करनी चाहिये कि बालकों को समझ में यह बात पूरी तरह आ जाये कि हम एक-दूसरे पर निर्भर हैं तथा बिना एक –दूसरे की सहायता के हम आर्थिक, राजनीतिक  एवं सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नति नहीं कर सकते। यही एक ऐसा मंत्र है जिसके द्वारा मानवता का कल्याण हो सकता है।

(5) व्यतिगत या सामाजिक जीवन में भय को दूर करना – आधुनिक युग में व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में भय का साम्राज्य है। एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र से सदैव भय बना रहता है। कुछ नहीं कहा जा सकता कि एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर कब टूट पड़े। इस भय के कारण ही विभिन्न राष्ट्रों के लोग एक-दूसरे के निकट आने तथा एक-दूसरे को समझने का प्रयास ही नहीं करते। देखा यह जाता है कि प्रत्येक राष्ट्र शक्तिशाली बनने के लिए भयंकर से भयंकर विनाशकारी शास्त्रों का निर्माण करता है, सेना का संगठन करता है तथा किसी राजनीतिक गुट का सदस्य बनने में ही अपना कल्याण समजता है। इस प्रकार प्रत्येक राष्ट्र युद्ध के द्वार पर खड़ा है। यदि विभिन्न राष्ट्रों के मन से भय को निकाल दिया जाये तो उसमें एक-दूसरे के प्रति स्नेह की भावना जागृत हो सकती है। ऐसी दशा में शिक्षा की व्यस्था इस प्रकार से की जानी चाहिये कि बालकों का उचित रूप से संवेगात्मक विकास हो जाये और उनके मन में आकारण भय दूर हो जाये तथा समस्यों को साहस के साथ सुलझाने की शक्ति उत्पन्न होकर उनमे मनुष्य के प्रति विश्वास विकसित हो जाये। वे यह समझने लगें कि हम सब एक विश्व समाज के सदस्य हैं तथा हम सबसे अधिकार और कर्त्तव्य बराबर-बराबर है। इस प्रकार के शिक्षा के द्वारा भयभीत राष्ट्रों के मन से भय को दूर करके उनमें पस्पर प्रेम, विश्वास एवं सदभावना का विकास किया जा सकता है। ध्यान देने की बात है कि युद्ध की जीत से प्रेम की जीत कहीं अच्छी होती है तथा सत्य की सदैव विजय होती है।

(6) वैक्तिकता तथा सामाजिक चेतना – अंतर्राष्ट्रीय जीवन को स्वस्थ बनाने के लिए सामाजिक चेतना को विकसित करना परम आवश्यक है। इसलिए शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से की जानी चाहिये कि बालकों के ह्रदय में सामाजिक कल्याण, सामाजिक आभार एवं उतरदायित्व की भावना उत्पन्न हो जाये, वे अपने समूह तथा अन्य देशों के साथ सहयोग स्थापति कर सकें तथा सफल सामाजिक जीवन व्यतीत कर सकें। स्मरण रहे कि इस सुझाव का यह अर्थ कदापि नहीं है कि शिक्षा व्यक्तित्व के विकास में बाधक सिद्ध हो। इस प्रकार की शिक्षा ‘जिओ और जीने दो’ के सिधान्त पर निर्धारित होनी चाहिये। इसलिए प्रत्येक बालक की  व्यक्तिगत शक्तियों के विकास तथा समाज के कल्याण को दृष्टि में रखते हुए शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से की जानी चाहिये कि व्यक्ति तथा समाज दोनों ही उन्नति को ओर बढ़ते रहें तथा अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शान्ति बनी रहे।

(7) सामूहिक उतरदायित्व का सिधान्त – के० जी० सैयदेन का मत है कि अंतर्राष्ट्रीय की शिक्षा सामूहिक उतरदायित्व के सिधान्त पर अवलम्बित होनी चाहिये। इस सिधान्त के अनुसार प्रत्येक बालक को आरम्भ से ही इस बात की शिक्षा देनी चाहिये कि समस्त संसार एक है। यह बंट नहीं सकता। हम सब इसके नागरिक है। इसकी भलाई या बुराई का उतरदायित्व हम सभी पर समान रूप से है। इस प्रकार की शिक्षा बालकों को विश्व नागरिकता के लिए तैयार करेगी तथा उनका ध्यान सम्पूर्ण मानव जाती के हितों के लिए आकर्षित होगा। यही नहीं, वे यह भी समझ जायेंगे कि विश्व के सरे नागरिक उनके मित्र हैं तथा उन्हें उनके साथ सदभावनापूर्वक रहना चाहिये। श्री सैयदेन ने इस सिधान्त की पुष्टि में एक बालक का उदहारण देते हुए बड़े सुन्दर ढंग से समझाया है। एक बालक की पीठ पर उसका छोटा भाई लदा हुआ था। वह बालक पहाड़ के उपर चढ़ रहा था और थकने के कारण हापं भी रहा था। एक यात्री उस बालक से पूछा – ‘ क्यों बालक, क्या ये बोझ तुम्हें भारी नहीं लग रहा है। बालक ने उतर दिया- श्रीमान, यह कोई बोझ नहीं मेरा भाई है। शिक्षा द्वारा बालकों के हृदय में इस प्रकार के भ्रातत्व की भावना को विकसित करना चाहिये जिससे वे यह समझ जायें कि हम सबको कठिनाई के समय में एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिये।

(8) कार्य रूप में परिणित करने के सिधान्त – उपर्युक्त सभी सिधान्तों की सफलता केवल उसी समय सम्भव है जब इनको कार्य रूप में परिणित किया जाये। नवयुवकों के ह्रदय में केवल अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को जागृत करना ही सब कुछ में परिणति करने के लिए बालकों को उपर्युक्त अवसर प्रदान किये जायें जिससे उनको अंतर्राष्ट्रीय आदर्शों की प्राप्ति सरलतापूर्वक हो जाये। इस सम्बन्ध में बालकों की रचनात्मक क्रियाओं पर विशेष बल दिया जाना चाहिये|

पाठ्यक्रम

उपर्युक्त सिधान्तों को दृष्टि में रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय सदभावना के विकास हेतु प्रचलित पाठ्यक्रम में निम्नलिखित परिवर्तन करने चाहियें –

  1. पाठ्यक्रम में संसार के सभी राष्ट्रों में रहने वाले लोगों के धर्मों, आदर्शों, आचार-विचारों, रीती-रिवाजों, उधोग धंधों तथा रहन-सहन आदि तथ्यों को सम्मिलित किया जाना चाहिये।
  2. पाठ्यक्रम में उन सभी कार्यों एवं प्रयासों को सम्मिलित किया जाना चाहिये जो मानव जाति के कल्याण हेतु किये गए हैं।
  3. पाठ्यक्रम में संसार के विभिन्न राष्ट्रों के साहित्य, संगीत तथा कला कृतियों एवं चित्रकला आदि को उपयुक्त स्थान मिलना चाहिये।

शिक्षण-विधियां

पाठ्यक्रम को सरल बनाने में शिक्षक का गहरा हाथ होता है। वह प्रत्येक विषय में आवश्यक तथ्यों की खोज करके उन्हें बालकों के सम्मुख इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि सभी बालक प्रत्येक सत्य को पूरी तरह से समझ जायें। इस दृष्टि से बालकों में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसति करने के लिए शिक्षक को प्रत्येक विषय पढ़ाते समय प्रचलित शिक्षण-पद्धतियों में परिवर्तन करके एक विशिष्ट दृष्टिकोण अपनाना चाहिये। विज्ञान, साहित्य, भूगोल, इतिहास तथा अन्य विषयों के अग्रलिखित उदाहरणों से इस बात को आसानी से समझाया जा सकता है –

(1) विज्ञान- विज्ञान को पढ़ाते समय इसके सामाजिक पक्ष पर बल देते हुए बालकों को यह बताया जाना चाहिये कि आधुनिक युग में संसार के एक कोने में होने वाली घटना का अन्य राष्ट्रों पर के प्रभाव पड़ सकता है। बालकों को यह भी बताया जाना चाहिये की खाद्य समस्या को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कैसे सुलझाया जा सकता है तथा विज्ञान के अविष्कारों द्वारा भूख और गरीबों को दूर करके जीवन को किस प्रकार सम्मपन्न बनाया जा सकता है।

(2) साहित्य – सच्चे साहित्य का सम्बन्ध किसी विशेष व्यक्ति से नहीं होता। उसमें उस मानव प्रकृति का आभ्यास मिलाता है जो किसी व्यक्ति तथा राष्ट्र के संकुचित बंधन से मुखत हो। इस प्रकार के साहित्य में मानव जाति के जीवन को झलक दिखाई देती है। ऐसे साहित्य के द्वारा ही बालकों में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना विकसित की जा सकती है।

(3) भूगोल- भूगोल को यदि व्यापक दृष्टिकोण से पढाया जाये तो बालकों को भावी जीवन में उतरदायित्वों को निभाने के लिए सर्लातापूर्वक तैयार किया जा सकता है। इस दृष्टि से प्राथमिक कक्षाओं में मानवीय भूगोल को पढ़ना चाहिये तथा बालकों को यह बताया जाना चाहिये कि अन्य राष्ट्रों में लोग किस प्रकार से रहते हैं, उसके क्या रीती-रिवाज़ है, उनकी वहाँ क्या कठिनाईयां है तथा वे किन धंधों को अपनाकर आपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। भूगोल पढ़ाते समय बालकों को यह भी बताया जाना चाहिये कि विभिन्न राष्ट्रों के लोगों पर वहाँ की जलवायु तथा भौगोलिक स्थिति का क्या प्रभाव पड़ता है। भूगोल का अध्ययन करने से बालकों को एक राष्ट्र का अन्य राष्ट्रों से सम्बन्ध, उसका व्यापार, वाणिज्य तथा भोजन सामग्री का ज्ञान हो जायेगा। इससे उनको इस बात की भी जानकारी हो जायेगी कि उनके दैनिक जीवन में प्रयोग किये जाने वाली वस्तुओं के बनाने में किस-किस राष्ट्र के तथा कितने लोगों ने सहयोग प्रदान किया है। इस प्रकार भूगोल के द्वारा बालकों में अन्य व्यक्तियों तथा राष्ट्रों के प्रति मैत्री भावना के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को सरलतापूर्वक विकसित किया जा सकता है।

(4) इतिहास – इतिहास पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण विषय है। इसकी सहायता से बालकों में सोचने विचारने के ढंगों में क्रन्तिकारी परिवर्तन किया जा सकता है। अभी तक इतिहास के द्वरा केवल संकुचित राष्ट्रीय भावना को ही विकसित किया गया है। बालकों में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसित करने के लिए यह आवश्यक है कि इतिहास के अन्तर्गत अन्य राष्ट्रों की संस्कृतियों तथा सभ्यताओं का विवेचन किया जाये तथा राजाओं के संकीर्ण संघर्षों एवं वंशावली के स्थान पर मानवता से सम्बंधित विषय को सम्मिलित किया जाये। ऐसी दशा में इतिहास के पाठ्यक्रम में विश्व इतिहास को प्रमुख स्थान मिलना चाहिये। विश्व इतिहास के अध्ययन से अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को समझाना तथा एक दूसरे के निकट आना सम्भव हो सकता है। अत: इस विषय के द्वारा बालकों को विभिन्न राष्ट्रों के सामाजिक व नैतिक उत्थान का ज्ञान करते हुए जिन महान नेताओं ने वर्तमान सांस्कृति तथा सभ्यता के विकास में सहयोग दिया है, उनकी जीवनियों तथा उनकी शिक्षा के सम्बन्ध में उपर्युक्त ज्ञान करना चाहिये। इतिहास के द्वारा बालकों को यह भी बताया जाना चाहिये कि – वर्तमान अन्वेषण तथा अनुसंधान, कला व उधोग की उन्नति तथा विज्ञान व साहित्य की वृधि यह सब समस्त मानव जाति की सम्पती है।

इसी प्रकार से गणित, नागरिकशास्त्र, अर्थशास्त्र, कला तथा दर्शन आदि विषयों की शिक्षा व्यवस्था भी सामाजिक तथा अंतर्राष्ट्रीय पक्षों पर बल देते हुए इस ढंग से की जा सकती है कि बालकों में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना का विकास हो जाये।

शिक्षक

बालकों में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसित करने के लिए शिक्षक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ध्यान देने की बात है कि पाठ्यक्रम का सफल अथवा असफल होना शिक्षक के व्यक्तित्व, आदर्श, विश्वास , श्राद्धा, कार्यनिष्ठा, द्रढ़ता, पटुता तथा निजी उत्साह एवं विशाल दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। यदि शिक्षक में उक्त सभी गुण हैं जो वह बालकों को उस आदर्श को अपनाने के लिए अवश्य प्रेरित कर सकता है जिसे वह उत्तम समझता है तथा जिस पर वह शिक्षण करते समय विशेष बल दे रहा है। इस दृष्टि से बालकों में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना का विकास केवल वही शिक्षक कर सकता है जो उक्त सभी गुणों से परिपूर्ण होते हुए स्वयं भी इस भावना से ओत-प्रोत हो।

विशाल हृदय तथा व्यापक दृष्टिकोण वाला शिक्षक बालकों में मष्तिष्क में इस बात को आसानी से अंकित कर सकता है कि वर्ण, जाति तथा धर्म आदि मानव को मानव से पृथक नहीं कर सकते अपितु ये तो केवल उसकी निजी भावनायें ही है जो उसको एक-दूसरे से अलग कर सकती है। वह बालकों के हृदय में इस भावना को भी भर सकता है कि संसार एक-इकाई है तथा उसका राष्ट्र इस इकाई का एक भाग है। ऐसी स्थिति में यदि कोई राष्ट्र प्रगतिशील राष्ट्रों के साथ-साथ उन्नति नहीं कर रहा है तो वह समस्त संसार के लिए भयंकर समस्या बन सकता है। इस दृष्टि से पगतिशील राष्ट्र में जन्म लेने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि वहाँ के निवासी दूसरे पीड़ित तथा पिछड़े हुए राष्ट्रों को घ्रणा की दृष्टि से देखें। मानव का कल्याण तो इसी में है की संसार के सभी निवासी आपस में प्रेम तथा सहयोग के साथ भाई-भाई की तरह रहें। यही नहीं, शिक्षक बालकों को यह बात भी आसानी से बता सकता है कि संस्कृति किसी अमुक व्यक्ति अथवा समूह की निजी सम्पति नहीं है अपितु विभिन्न जातियों या राष्ट्रों के सामूहिक प्रयासों का फल है। अंतर्राष्ट्रीय सदभावना के ओत-प्रोत शिक्षक केवल पाठ-विषयों के प्रस्तुत करने तक ही सीमित नहीं रह सकता अपितु वह अपने विभिन्न कार्यों जैसे अंतर्राष्ट्रीय परिषद् की स्थापना, त्योहारों, जयन्तियों, अंतर्राष्ट्रीय मेलों, सप्ताहों, नाटकों तथा उत्सवों एवं अंतर्राष्ट्रीय बातों पर वाद-विवाद आदि पाठ्यान्तर क्रियाओं के द्वारा भी अपने चर्म लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता रहेगा।

स्कूल

यूँ तो बालकों में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना के विकास के लिए रेडिओ, टेलीविजन, तथा प्रेस आदि भी महत्वपूर्ण साधन है, परन्तु इस भावना को विकसित करने के लिए स्कूल का विशेष महत्व है। अत: स्कूल की व्यवस्था सहयोग के आधार पर होनी चाहिये तथा बालकों को वियाक्तिगत कार्य के स्थान पर सामूहिक कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। इससे उनमें समूह के प्रति सदभावना, अनुशासन, सहयोग, दया तथा सहनशीलता  आदि गुणों का विकास होगा। साथ ही स्कूलों को ऐसी योजनायें भी लागू करनी चाहिये जिससे बालकों में विभिन्न धार्मिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक समूहों के प्रति सदभावना तथा स्वस्थ दृष्टिकोण विकसित हो जाये। इस प्रकार स्कूल का समस्त वातावरण इस प्रकार का होना चाहिये कि बालकों के अन्दर परिवर्तन में विश्वास, आग्रह तथा अनुरोध एवं बंधुत्व की भावनायें विकसित हो जायें।

बालकों में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना विकसित करने के लिए स्कूल की पाठ्य-पुस्तकें इस प्रकार की होनी चाहिये जिनके पढ़ने से उनको अन्य राष्ट्रों के निवासियों के रहन-सहन ,खान-पान, वेश-भूषा तथा जीवन सम्बन्धी अन्य सभी बातों का ज्ञान हो जाये। उक्त सभी बातों के साथ-साथ स्कूल में अन्य राष्ट्रों के महान व्यक्तियों एवं विचारकों के व्याख्यान कराये जाने चाहिये। बालकों तथा शिक्षकों को अन्य राष्ट्रों में भेजा जाना चाहिये। संसार के वैज्ञानिकों समाज सुधारकों तथा डॉक्टर की स्मृति में छुटियाँ मनाई जानी चाहिये। प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री, शिक्षकों तथा छात्रों को विभिन्न राष्ट्रों में शैक्षिक भ्रमण के लिए भेजा जाना चाहिये। संयुक्त राष्ट्र संघ (u.n.o) की प्रत्येक क्रिया में पूर्ण श्रधा के साथ इस महत्वपूर्ण राजनीतिक अंतर्राष्ट्रीय संघ के उदेश्यों का बालकों को ज्ञान कराया जाना चाहिये तथा उनको उस लाभप्रद कार्य से भी अवगत कराना चाहिये जो इस संस्था की विभिन्न समितियां कर रही है। साथ ही संसार के सभी स्कूलों में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना विकसित करने के लिए विश्व शान्ति दिवस तथा संयुक्त राष्ट्र संघ दिवस आदि धूम धाम से मनाये जाने चाहिये।

अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण के प्रसार में यूनेस्को के कार्य

यूनेस्को की स्थापना- पिछले दो मह्युधों के पश्चात यह विचार किया गया कि जब तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के भावना को विकसित नहीं किया जायेगा तब तक विश्व में शान्ति स्थापित करना असंभव है। इस उदेश्य की पूर्ति के लिए एक ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की स्थापना की गई। इस संघर्ष में अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को विकसित करने के लिए एक विशेष विभाग खोला गया जिसे यूनेस्को की संज्ञा दी जाती है। वस्तुस्थिति यह है कि इस विभाग के निर्माण का श्रेय लगभग तीन दर्जन से अधिक राष्ट्रों के ऊन वैज्ञानिकों, कलाकारों विचारकों तथा शिक्षाशास्त्रियों को है जिन्होंने यह अनुभव किया कि अंतर्राष्ट्रीय सदभावना को केवल राजनीतिक तथा आर्थिक संधियों तथा योजनाओं के आधार पर ही विकसित नहीं किया जा सकता। इन लोगों का विचार था कि युद्धों को रोकना तथा शान्ति की स्थपाना करना एक मनोवैज्ञानिक समस्या है न कि राजनीतिक। अतएव उन सभी राजनीतिक तथा धार्मिक संगठनो के लिए शैक्षिक,रसांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों का होना परम आवश्यक है जिनका निर्माण राजनीतिक तथा धार्मिक सुरक्षा के लिए किया गया है। अत: इन सभी महापुरुषों का यह आखण्ड विश्वास हो गया कि यदि सामाजिक जीवन से प्रतिस्पर्धा के समाप्त करके सहयोग पर अधिक बल दिया जाये तो संसार के सभी राष्ट्रों की कला, साहित्य विज्ञान तथा संस्कृति अधिक से अधिक विकसित होती रहेगी।

यूनेस्को की भूमिका

यूनेस्को की भूमिका में लिखा है –  चूँकि युद्ध मनुष्यों के मस्तिष्कों में आरम्भ होते है इसलिए शान्ति की रक्षा के साधन भी मनुष्य के मस्तिष्क से ही निर्मित किये जाने चाहिये। न्याय तथा शान्ति बनाये रखने के लिए मानवता की शिक्षा तथा संस्कृति का व्यापक प्रसार मानव की महत्ता के लिए आवश्यक है। यह एक ऐसा पवित्र कर्त्तव्य है जो प्रत्येक राष्ट्र को आपसी सहयोग की भावना के आधार पर पूरा करना चाहिये। केवल सरकारों के राजनीतिक तथा आर्थिक समझौते तथा बंधनों द्वारा स्थापित की हुई शान्ति को ऐसी शान्ति नहीं कहा जा सकता है जिसे संसार के सभी लोग एकमत होकर स्वीकार कर लें इस दृष्टि से यदि शान्ति को कभी असफल नहीं होना है तो उसे मानव जाति की बौद्धिक तथा नैतिक अखंडता पर आधारित होना चाहिये।

यूनेस्को की उपर्युक्त भूमिका से स्पष्ट हो जाता है कि यदि विश्व में स्थायी शान्ति स्थापित करनी है तो संसार के विभिन्न राष्ट्रों में शिक्षा विज्ञानं तथा संस्कृति के क्षेत्रों में आपसी विभिन्नता तथा विरोध को मिटाकर विश्व-संस्कृति को विकसित करना परम आवश्यक है। यह महान कार्य केवल उसी समय पूरा हो सकता है जब विभिन्न राज्यों के शिक्षाशास्त्री, दार्शनिक, साहित्यकार, तथा कवि आदि समय-समय पर एक दूसरे से मिलकर अपनी समस्याओं को परस्पर विचार-विमर्श द्वारा सुलझाने के लिए एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझ कर विभिन्न संस्कृतियों की अच्छी अच्छी बातों को ग्रहण करते हुए एक-दूसरे के निकट आते रहें।

यूनेस्को का उधेस्य – यूनेस्को का पूरा नाम ‘ संयुक्त राष्ट्रीय शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संस्था ‘ है इस संस्था का उदेश्य शिक्षा के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय सदभावना विकसित करके विश्व शान्ति स्थापित करना है। इस महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभाग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के द्वारा लोगों के मस्तिष्क को मनोवैज्ञानिक तथा बौद्धिक रूप से प्रशिक्षित करके उनमें ऐसे गुण को विकसित करना चाहता है जिनके आदार पर वे स्वयं ही युद्ध से घ्रणा करते हुए अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व का आदर करने लगें।

यूनेस्को के कार्य

अपने उदेश्यों को प्राप्त करने के लिए यूनेस्को निम्नलिखित कार्य कर रहा है –

(1) यूनेस्को इस बात का प्रयास कर रहा है की विभिन्न राष्ट्रों के बीच फैला हुआ भय सन्देह तथा अविश्वास दूर हो जाये जिससे उनके आपसी सम्बन्ध अच्छे बन सकें।

(2) यह संघ इस बात के लिए विशेष प्रयास कर रहा है कि संसार के सभी पिछड़े हुए देशों से निरक्षरता समाप्त हो जाये।

(3) यह संस्था प्रत्येक राष्ट्र के साहित्य, विज्ञान, संस्कृति तथा कला को अन्य राष्ट्रों के निकट पहुँचाने का प्रयास करता है जिससे संसार के प्रत्येक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्रों के बौद्धिक विकास का ज्ञान हो जाये।

(4) यूनेस्को शोधकर्ताओं को आर्थिक सहायता देता है जिससे अधिक से अधिक शोध कार्य हो सके।

(5) यह संस्था शिक्षकों, विचारकों तथा वैज्ञानिकों को इस बात के अवसर प्रदान करती है कि वे परस्पर विचार-विमर्श कर सकें जिससे रचनात्मक कलाओं का सृजन होता रहे।

(6) यह विभाग पिछड़े हुए राष्ट्रों के स्कूलों को आर्थिक सहायता देता है।

(7) यूनेस्को विभिन्न राष्ट्रों की पाठ्य-पुस्तकों में शोधन तथा पाठ्यक्रमों में निर्माण हेतु परामर्श देता है एवं महत्वपूर्ण साहित्यिक ग्रंथों का अनुवाद भी करता है।

(8) यह विभाग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य की प्रदर्शनीयों का आयोजन करता है जिससे अंतर्राष्ट्रीय सदभावना विकसित हो जाये|

(9) यूनेस्को एक राष्ट्र के शिक्षकों तथा बालकों को दूसरे राष्ट्रों में भ्रमण करने के लिए भी प्रोत्साहित करता है जिससे संसार के समस्त राष्ट्र अधिक से अधिक निकट का जायें।

(10) यूनेस्को रेडिओ, टेलीविजन तथा अन्य साधनों के द्वारा जनता जनार्दन में अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास करता है।

यूनेस्को के उपर्युक्त कार्यों को सफल बनाने के लिए संसार के सभी राष्ट्रों का सहयोग आवश्यक है। अत: संसार के प्रत्येक राष्ट्र को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनकर इस विभाग की प्रत्येक क्रिया में ह्रदय में रूचि लेनी चाहिये।

स्त्रोत: पोर्टल विषय सामग्री टीम
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