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उच्च प्राथमिक स्तर पर हिंदी भाषा सीखने की संप्राप्ति

इस भाग में प्राथमिक कक्षाओं में समझते हुए पढ़ना- लिखना सीख लेने के बाद उच्च प्राथमिक स्तर तक पहुँचकर अब शिक्षार्थी पढ़ते समय किसी रचना से भावनात्मक रूप से जुड़ भी सकें इस बारे में विस्तृत जानकारी दिया गया है।

परिचय

प्राथमिक कक्षाओं में समझते हुए पढ़ना- लिखना सीख लेने के बाद उच्च प्राथमिक स्तर तक पहुँचकर अब शिक्षार्थी पढ़ते समय किसी रचना से भावनात्मक रूप से जुड़ भी सकें और कोई नयी किताब या रचना सामने आने पर उसे  उठाकर पलटने और पढ़ने की उत्सुकता उनमें पैदा हो – मुख्य रूप से यह अपेक्षा रहती है। यह अपेक्षा भी रहती है कि उन्हें इस बात की जानकारी और समझ हो कि समाचार – पत्र के विभिन्न पन्नों पर क्या छपता है, समाचार – पत्र में छपी किसी खबर, लेख या कही गई किसी बात का निर्हितार्थ क्या है? इस स्तर तक आते – आते शिक्षार्थियों के पढ़ने- लिखने में अंतर होता है। हमारे पढ़ने का तरीका इस बात पर भी निर्भर करता है कि हमारे पढ़ने का उद्देश्य क्या है। एक विज्ञापन को पढना और एक सूचना लिखकर लगानी है तो इसके पाठक विद्यालय के बच्चे, शिक्षक और अन्य कर्मचारीगण हैं। लेकिन अगर यही सूचना समुदाय और अभिभावकों को देनी है तो इसके पाठकों में अभिभावक और समुदाय के व्यक्ति भी शामिल हो जायेंगे। दोनों स्थितियों में हमारे लिखने के तरीके और भाषा में बदलाव आना स्वाभाविक है। उच्च प्राथमिक स्तर पर विभिन्न स्थितियों के संदर्भ में अपने आप को लिखित रूप में अभिव्यक्त और अपेक्षित है और लेखन का उद्देश्य भी यही है। उच्च प्राथमिक स्तर पर यह अपेक्षा भी रहती है कि शिक्षार्थी विभिन्न रचनाओं को पढ़कर उसमें झलकने वाली सोच, पूर्वाग्रह और सरोकार आदि को पहचान पाएँ। कुल मिलाकर प्रयास यह होनी चाहिए कि इस चरण के पूरा होने तक शिक्षार्थी किसी भाषा, व्यक्ति, वस्तु, स्थान, रचना आदि का विश्लेषण करने, उसकी व्याख्या करने और उस व्याख्या को आत्मविश्वास व स्पष्टता के साथ अभिव्यक्त करने  के अभ्यस्त हो जाएँ। वे रचनात्मक और सृजनात्मक ढंग से भाषा के बरतना सीख जाएं। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए यहाँ पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाएं, सीखने – सिखाने की प्रक्रिया तथा सीखने संबंधी संप्राप्ति को दर्शाने वाले बिन्दु दिए गये हैं उनमें परस्पर जुड़ाव है और एक से अधिक भाषायी क्षमताओं की झलक उनमें मिलती है। किसी रचना को सुनकर अथवा पढ़कर उस पर गहन चर्चा करना, अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना, प्रश्न पूछना पढ़ने की क्षमता से भी जुड़ा है और सुनने – बोलने की क्षमता से भी। प्रतिक्रिया, प्रश्न और टिप्पणी को लिखकर भी अभिव्यक्त किया जा सकता है। इस तरह से भाषा की कक्षा में एक साथ सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना जुड़ा है। पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाओं को पूरा करने में सीखने में उपयुक्त प्रक्रियाओं की बड़ी भूमिका होती है। सीखने की उपयुक्त प्रक्रियाओं के बगैर सीखने संबंधी अपेक्षित संप्राप्ति नहीं की जा सकेगी।

पाठ्यचर्या  संबंधी अपेक्षाएं

पाठ्यचर्या  संबंधी अपेक्षाएं

पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाएंके  को पूरे देश  के बच्चों को ध्यान में रखकर (प्रथम भाषा के रूप में हिंदी पढ़ने वाले और द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी पढ़ने वाले दोनों) तैयार किया गया है।

  • किसी भी नई रचना/किताब को पढ़ने/समझने की जिज्ञासा व्यक्त करना।
  • समाचार पत्रों/पत्रिकाओं में दी गई खबरों/बातों को जानना – समझना।
  • विभिन्न सामाजिक – सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति अपने रूझानों को अभिव्यक्त करना।
  • पढ़ी – सूनी रचनाओं को जानना, समझना,व्याख्या करना, अभिव्यक्त करना।
  • अपने व दूसरों के अनुभवों को कहना सुनना – पढ़ना लिखना। (मौखिक – लिखित – सांकेतिक रूप में)
  • अपने स्तरानुकूल दृश्य – श्रव्य माध्यमों की सामग्री (जैसे – बाल साहित्य, पात्र – पत्रिकाएँ, टेलिविज़न, कम्प्यूटर – इन्टरनेट, नाटक, सिनेमा आदि) पर अपनी राय व्यक्त करना।
  • साहित्य की विभिन्न विधाओं (जैसे – कविता, कहानी, निबन्ध, एकांकी, संस्मरण, डायरी आदि) की समझ बनाना और उनका आनंद उठाना।
  • दैनिक जीवन में औपचारिक – अनौपचारिक अवसरों पर उपयोग की जा रही भाषा की समझ बनाना।
  • भाषा – साहित्य की विविध सृजनात्मक अभिव्यक्तियों को समझना और सराहना करना।
  • हिंदी भाषा में अभिव्यक्त बातों की तार्किक समझ बनाना।
  • पाठ विशेष को समझना और उससे जुड़े मुद्दों पर अपनी राय देना।
  • विभिन्न संदर्भों में प्रयुक्त भाषा की बारीकियों, भाषा की लय, तुक को समझना।
  • भाषा की नियमबद्ध प्रकृति को पहचानना और विश्लेषण करना।
  • भाषा के नये संदर्भों/परिस्थितियों में प्रयोग करना।
  • अन्य विषयों, जैसे – विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान आदि में प्रयुक्त भाषा की समुचित समझ बनाना व उसका प्रयोग करना।
  • हिंदी भाषा – साहित्य को समझते हुए सामाजिक परिवेश के प्रति जागरूक होना।
  • दैनिक जीवन में तार्किक एवं वैज्ञानिक समझ की ओर बढ़ना।
  • पढ़ी – लिखी – सुनी – देखी – समझी गई भाषा का सृजनशील प्रयोग।

 

कक्षा छ: (हिंदी)

 

सीखने – सिखाने की प्रक्रिया

सीखने की संप्राप्ति

सभी शिक्षार्थियों (भिन्न रूप में सक्षम बच्चों सहित) को व्यक्तिगत, सामूहिक रूप से कार्य करने के अवसर और प्रोत्साहन दिया जाए ताकि उन्हें –

  • अपनी भाषा में बातचीत तथा चर्चा करने के अवसर हों।
  • प्रयोग की जाने वाले भाषा की बारीकियों पर चर्चा के अवसर हों।
  • सक्रिय और जागरूक बनाने वाली रचनाएँ, अख़बार, पत्रिकाएँ, फिल्म और ऑडियो – वीडियो सामग्री को देखने, सुनने, पढ़ने, लिखने और चर्चा करने के अवसर उपलब्ध हों।
  • समूह में कार्य करने और एक – दूसरे कार्यों पर चर्चा करने, राय लेने – देने, प्रश्न करने की स्वतंत्रता हो।
  • हिंदी के साथ – साथ अपनी भाषा की सामग्री पढ़ने – लिखने की सुविधा (ब्रेल/संकेतिक रूप में भी) और उन पर बातचीत की आजादी हो।
  • अपनी परिवेश, समय और समाज से संबंधित रचनाओं को पढ़ने और उन पर चर्चा करने के अवसर हों।
  • अपनी भाषा गढ़ते हुए लिखने संबंधी गतिविधियाँ आयोजित हों, जैसे – शब्द खेल।
  • हिंदी भाषा में सन्दर्भ के अनुसार भाषा विश्लेषण (व्याकरण, वाक्य संरचना, विराम चिन्ह आदि) करने के अवसर हों।
  • कल्पनाशीलता और सृजनशीलता को विकसित करने वाली गतिविधियों, जैसे – अभिनय, रोल – प्ले, कविता, पाठ, सृजनात्मक लेखन, विभिन्न स्थितियों में संवाद आदि आयोजन हों और उनकी तैयारी से संबंधित स्क्रिप्ट लेखन और रिपोर्ट लेखन के अवसर हों।
  • साहित्य और साहित्यिक तत्वों की समझ बढ़ाने के अवसर हों।
  • शब्दकोश का प्रयाग करने के लिए प्रोत्साहन एवं सुलभ परिवेश हो।
  • सांस्कृतिक महत्त्व के अवसरों पर अवसरानुकूल लोक गीतों का संग्रह करने, उनकी गीतमय प्रस्तुति देने के अवसर हों।

बच्चे

  • विभिन्न प्रकार की ध्वनियों (जैसे – बारिश, हवा, रेल, बस, फेरीवाला आदि) को सुनने के अनुभव, किसी वस्तु के स्वाद आदि के अनुभव को अपने ढंग से मौखिक/संकेतिक भाषा में प्रस्तुत करते हैं।
  • सुनी देखी गई बातों, जैसे स्थानीय सामाजिक घटनाओं, कार्यक्रमों और गतिविधियों पर बेझिझक बात करते हैं और प्रश्न करते हैं।
  • देखी, सुनी रचनाओं/घटनाओं/मुद्दों पर बातचीत को ढंग से आगे बढ़ाते हैं, जैसे – किसी कहानी को आगे बढ़ाना।
  • रेडियो, टी.वी., अखबार, इन्टरनेट में देखी/सुनी गई खबरों को अपने शब्दों में कहते हैं।
  • विभिन्न अवसरों/संदर्भों में कही जा रही दूसरों की बातों को अपने ढंग से बताते हैं, जैसे – आँखों से न देख पाने वाले साथी का यात्रा – अनुभव।
  • अपने परिवेश में मौजूद लोककथाओं और लोकगीतों के बारे में जानते हुए चर्चा करते हैं।
  • अपने से भिन्न भाषा, खान – पान, रहन - सहन संबंधी विविधताओं पर बातचीत करते हैं।
  • सरसरी तौर पर किसी पाठ्यवस्तु को पढ़कर उसकी विषयवस्तु का अनुमान लगाते हैं।
  • किसी पाठ्यवस्तु  की बारीकी से जाँच करते हुए उसमें किसी विशेष बिन्दु को खोजते हैं, अनुमान लगाते हैं, निष्कर्ष निकालते हैं।
  • हिंदी भाषा में विभिन्न प्रकार की सामग्री (समाचार, पत्र पत्रिका, कहानी, जानकारीपरक सामग्री, इन्टरनेट अपर प्रकाशित होने वाली सामग्री आदि) को समझकर पढ़ते हैं और उसमें अपनी पसंद – नपसंद, राय टिप्पणी देते हैं।
  • भाषा की बारीकियों/व्यवस्था/ढंग पर ध्यान देते हुए उसकी सराहना करते हैं, जैसे – कविता में ली तुक, वर्ण आवृत्ति (छंद) तथा कहानी, निबन्ध में मुहावरे, लोकोक्ति आदि।
  • विभिन्न विधाओं में लिखी गई साहित्यिक सामग्री को उपयुक्त उतार – चढ़ाव और सही गति के साथ पढ़ते हैं।
  • हिंदी भाषा में विविध प्रकार की रचनाओं को पढ़ते हैं।
  • नये शब्दों के प्रति जिज्ञासा ब्यक्त करते हैं और उनके अर्थ समझने के लिए शब्दकोश का प्रयोग करते हैं।
  • विविध कलाओं, जैसे – हस्तकला, वास्तुकला, खेती बाड़ी, नृत्यकला आदी से जुड़ी सामग्री में प्रयुक्त भाषा के प्रति जिज्ञासा व्यक्त करते हुए उसकी सराहना करते हैं।
  • दूसरों के द्वारा अभिव्यक्त अनुभवों को जरूरत के अनुसार लिखना, जैसे – सार्वजनिक स्थानों (जैसे – चौराहों, नलों, बस अड्डे आदि। पर सुनी गई बातों को लिखना।
  • हिंदी भाषा में विभिन्न प्रकार की सामग्री (समाचार, पत्र – पत्रिका, कहानी जानकारी परक सामग्री, इंटरनेट पर प्रकाशित होने वाली समग्री आदि) को समझकर- पढ़ते हैं और उसमें अपनी पसंद नापसंद, टिप्पणी को लिखित या ब्रेल भाषा में व्यक्त करते हैं।
  • अपने अनुभवों को अपनी भाषा शैली में लिखते हैं।
  • विभिन्न विषयों, उद्देश्यों के लिए लिखते समय  उपयुक्त शब्दों, वक्या संरचनाओं, मुहावरों, लोकोक्तियों, विराम – चिन्हों एवं अन्य व्याकरणिक इकाइयों जैसे – काल, क्रिया विशेषण, शब्द युग्म आदि का प्रयोग करते हैं।
  • विभिन्न अवसरों/संदर्भों में कही जा रही दूसरों की बातों को अपने ढंग से लिखते हैं।
  • विभिन्न संदर्भों में विभिन्न उद्देश्यों के लिए लिखते समय शब्दों, वाक्य संरचनाओं, मुहावरे आदि का उचित प्रयोग करते हैं।

 

कक्षा  सात (हिंदी)

सीखने – सिखाने की प्रक्रिया

सीखने की संप्राप्ति

सभी शिक्षार्थियों (भिन्न रूप में सक्षम बच्चों सहित) कको व्यक्तिगत, सामूहिक रूप से कार्य करने के अवसर और प्रोत्साहन दिया जाए ताकि उन्हें –

  • अपनी भाषा में बातचीत तथा चर्चा करने के अवसर हों।
  • प्रयोग की जाने वाले भाषा की बारीकियों पर चर्चा के अवसर हों।
  • समूह में कार्य करने और एक – दुसरे के कार्यों पर चर्चा करने, राय लेने – देने प्रश्न करने की स्वतंत्रता हो।
  • हिंदी के साथ – साथ अपनी भाषा की सामग्री पढ़ने - लिखने की सुविधा (ब्रेल/संकेतिक रूप में भी) और उन पर बातचीत की आजादी हो।
  • अपने परिवेश, समय और समाज से संबंधित रचनाओं को पढ़ने और उन पर चर्चा करने के अवसर हों।
  • अपनी भाषा गढ़ते हुए लिखने संबंधी गतिविधियाँ हो, जैसे – शब्द खेल, अनौपचारिक पत्र, तुकबंदियां, पहेलियाँ, संस्मरण आदि।
  • सक्रिय और जागरूक बनाने वाली रचनाएँ, अख़बार, पत्रिकाएँ, फिल्म और ऑडियो – वीडियो सामग्री को देखने, सुनने, पढ़ने और लिखकर अभिव्यक्त करने की गतिविधियाँ हो।
  • कल्पनाशीलता और सृजनशीलता को विकसित करने वाली गतिविधियों, जैसे – अभिनय, रोल प्ले, कविता, पाठ सृजनात्मक लेखन, विभिन्न स्थितियों में संवाद आदि के आयोजन हों और उनकी तैयारी से संबंधित स्क्रिप्ट लेखन और रिपोर्ट लेखन के अवसर हो।
  • विद्यालय/विभाग/कक्षा की पत्रिका/भित्ति पत्रिका निकालने के लिए प्रोत्साहन हो।

 

बच्चे

  • विविध प्रकार की रचनाओं को पढ़कर समूह में चर्चा करते हैं।
  • किसी सामग्री को पढ़ते हुए लेखक द्वारा रचना के परिप्रेक्ष्य में कहे गये विचार को समझकर और अपने अनुभवों के साथ उसकी संगति, सहमति या असहमति के संदर्भ में अपने विचार अभिव्यक्त करते हैं।
  • किसी चित्र या दृश्य को देखने के अनुभव को अपने ढंग से मौखिक/संकेतिक भाषा में व्यक्त करते हैं।
  • पढ़ी गई सामग्री पर चिंतन करते हुए बेहतर समझ के लिए प्रश्न पूछते हैं/परिचर्चा करते हैं।
  • अपनी परिवेश में मौजूद लोककथाओं और लोकगीतों के बारे में चर्चा करते हैं और उनकी सराहना करते हैं।
  • विविध कलाओं, जैसे – हस्तकला, वस्तुकला, खेती – बाड़ी, नृत्यकला और इनमें प्रयोग होने वाली भाषा के बारे में जिज्ञासा व्यक्त करते हैं, उन्हें समझने का प्रयास करते हैं।
  • विभिन्न स्थानीय सामाजिक एवं प्राकृतिक मुद्दों/घटनाओं के प्रति अपनी तार्किक प्रतिक्रिया देते हैं, जैसे – बरसात के दिनों में हरा भरा होना? विषय पर चर्चा।
  • विभिन्न संवेदनशील मुद्दों/विषयों, जैसे – जाति धर्म, रंग, जेंडर, रीति – रिवाजों के बारे में मौखिक रूप से अपनी तार्किक समझ अभिव्यक्त करते हैं।
  • सरसरी तौर पर किसी पाठ्यवस्तु को पढ़कर उसकी उपयोगिता के बारे में बताते हैं।
  • किसी पाठ्यवस्तु की बारीकी से जाँच करते हुए उसमें किसी बिशेष बिन्दु को खोजते हैं।
  • पढ़ी गई सामग्री पर चिन्तन करते हुए बेहतर समझ के लिए प्रश्न पूछते हैं।
  • विभिन्न पठन सामग्रियों में प्रयुक्त शब्दों. मुहावरों, लोकोक्तियों को समझते हुए उनकी सराहना करते हैं।
  • कहानी, कविता आदि पढ़कर लेखन के विविध तरीकों और शैलियों को पहचानते हैं, जैसे – वर्णनात्मक, भावनात्मक प्रकृति चित्रण आदि।
  • किसी पाठ्यवस्तु को पढ़ने के दौरान समझने के लिए जरूरत पड़ने पर अपनी किसी सहपाठी या शिक्षक की मदद लेकर उपयुक्त संदर्भ सामग्री, जैसे – शब्दकोश, मानचित्र, इंटरनेट या अन्य पुस्तकों की मदद लेते हैं।
  • विविध कलाओं जैसे – हस्तकला, वास्तुकला खेती नृत्यकला आदि से जुड़ी सामग्री में प्रयुक्त भाषा के प्रति जिज्ञासा व्यक्त करते हुए उसकी सराहना करते हैं।
  • भाषा की बारीकियों/व्यवस्था तथा नये शब्दों का प्रयोग करते हैं, जैसे –किसी कविता में प्रयुक्त शब्द विशेष पदबंध का प्रयोग – आप बढ़ते हैं तो बढ़ते ही चले जाते हैं या जल – रेल  जैसे प्रयोग।
  • विभिन्न अवसरोंसंदर्भों में कही जा रही दूसरों की बातों को अपने ढंग से लिखते हैं जैसे – अपने गाँव की चौपल की बातचीत या अपने मोहल्ले के लिए तरह तरह के कार्य करने वालों की बातचीत।
  • हिंदी भाषा में विभिन्न प्रकार की सामग्री (समाचार - पत्र/पत्रिका, कहानी, जानकारी परक सामग्री, इंटरनेट प्रकाशित होने वाली सामग्री आदि) को समझकर पढ़ते हैं और उसमें अपनी पसंद – नपसंद के पक्ष में लिखित या ब्रेल भाषा में अपने तर्क रखते हैं।
  • अपने अनुभवों को अपनी भाषा शैली में लिखते हैं।
  • विभिन्न विषयों और उद्देश्यों के लिए लिखते समय उपयुक्त शब्दों, वाक्य संरचनाओं, मुहावरों लोकोक्तियों, विरामचिन्हों एवं अन्य व्याकरणीय इकाइयों, जैसे – काल, क्रिया विशेषण, शब्द – युग्म आदि का प्रयोग करते हैं।
  • विभिन्न संवेदनशील मुद्दों/विषयों, जैसे – जाति, धर्म, रंग, जेंडर, रीति रिवाजों के बारे लिखित रूप से तार्किक समझ अभिव्यक्त करते हैं।
  • भित्ति पत्रिका/पत्रिका आदि के लिए तरह – तरह की सामग्री जुटाते हैं, लिखते हैं और उनका संपादन करते हैं।

 

 

कक्षा  आठ (हिंदी)

सीखने – सिखाने की प्रक्रिया

सीखने की संप्राप्ति

सभी शिक्षार्थियों (भिन्न रूप में सक्षम बच्चों सहित) कको व्यक्तिगत, सामूहिक रूप से कार्य करने के अवसर और प्रोत्साहन दिया जाए ताकि उन्हें –

  • अपनी भाषा में बातचीत, चर्चा तथा विश्लेषण करने के अवसर हों।
  • जीवन से जोड़कर विषय को समझने के अवसर हों।
  • प्रयोग की जाने वाली भाषा की बारीकियों पर चर्चा के अवसर हों।
  • समूह में कार्य करने और एक दुसरे के कार्यों करने, राय लेने – देने, प्रश्न करने की स्वतंत्रता हो।
  • हिंदी के साथ साथ अपनी भाषा की सामग्री पढ़ने – लिखने (ब्रेल/सांकेतिक रूप में भी) और उन पर बातचीत की आजादी हो।
  • अपनी परिवेश, समय और समाज से संबंधित रचनाओं को पढ़ने और उन पर चर्चा करने के अवसर हों।
  • अपनी भाषा गढ़ते हुए लिखने संबंधी गतिविधियाँ हो, जैसे – शब्द खेल, कविता, गीत, चुटकले, पत्र आदि।
  • सक्रिय और जागरूक बनाने वाली रचनाएँ, अखबार, पत्रिकाएँ, फिल्म और अन्य ऑडियो - वीडियो सामग्री को देखने, सुनने, पढ़ने और लिखकर अभिव्यक्त करने की गतिविधियाँ हों।
  • कल्पनाशीलता और सृजनशीलता को विकसित करने वाली गतिविधियों, जैसे अभिनय, रोल प्ले, कविता, पथ सृजनात्मक लेखन, विभिन्न स्थितियों में संवाद आदि के आयोजन हों और उनकी तयारी से संबंधित स्क्रिप्ट लेखन और रिपोर्ट लेखन के अवसर हों।

बच्चे

  • विभिन्न विषयों पर आधारित विविध प्रकार की रचनाओं को पढ़कर चर्चा करते हैं, जैसे – पाठ्यपुस्तक में किसी पक्षी के बारे में पढ़कर पक्षियों पर लिखी गई सालिम अली की किताब पढ़कर चर्चा करते हैं।
  • हिंदी भाषा में विभिन्न प्रकार की सामग्री (समाचार, पत्र  - पत्रिका, कहानी, जानकारीपरक सामग्री, इंटरनेट, ब्लॉग पर छपने वाली सामग्री आदि) को समझकर पढ़ते हैं और उसमें अपनी पसंद – नपसंद, टिप्पणी राय, निष्कर्ष आदि को मौखिक/संकेतिक भाषा में अभिव्यक्त करते हैं।
  • पढ़ी गई सामग्री पर चिन्तन करते हुए समझ के लिए प्रश्न पूछते हैं।
  • अपने परिवेश में मौजूद लोककथाओं और लोक गीतों के बारे में बताते/सुनाते है।
  • पढ़कर अपरिचित परिस्थितियों  और घटनाओं की कल्पना करते हैं और उन पर अपने मन में बनने वाली छवियों और विचारों के बारे में मौखिक/सांकेतिक भाषा में बताते हैं।
  • विभिन्न संवेदनशील मुद्दों/विषयों, जैसे – जाति रंग, धर्म, जेंडर. रीति रिवाजों के बारे में अपने मित्रों, अध्यापकों या परिवार से प्रश्न करते हैं, जैसे – अपने मोहल्ले के लोगों से त्यौहार मनाने के तरीके पर बातचीत करना।
  • किसी रचना को पढ़कर उसके सामाजिक मूल्यों पर चर्चा करते हैं। उसके कारण जाने की कोशिश करते हैं, जैसे – अपने आस – पास रहने वाले परिवारों और उनके रहन – सहन पर सोचते हुए प्रश्न करते हैं – रामू काका की बेटी स्कूल क्यों नहीं जाती है?
  • विभिन्न प्रकार की सामग्री, जैसे कहानी, कविता, लेख, रिपोतार्ज, संस्मरण, निबंध, व्यंग्य आदि को पढ़ते हुए अथवा पाठ्यवस्तु  की बारीकी से जाँच करते हुए उसका अनुमान लगाते हैं, विश्लेषण करते हैं, विशेष बिन्दु को खोजते हैं।
  • पढ़ी गई सामग्री पर चिंतन करते हुए बेहतर समझ के लिए प्रश्न पूछते हैं।
  • विभिन्न पठन सामग्रियों में प्रयुक्त शब्दों. मुहावरों, लोकोक्तियों को समझते हुए उनकी सराहना करते हैं।
  • कहानी, कविता आदि पढ़कर लेखन की विविध तरीकों और शैलियों को पहचानते हैं, जैसे – वर्णनात्मक, विवरणात्मक, भावनात्मक, प्रकृति चित्रण आदि।
  • विभिन्न पठन सामग्रियों को पढ़ते हुए उनके शिल्प की सराहना करते हैं और अपने स्तरानुकूल मौखिक, लिखित, ब्रेल/संकेतिक रूप में उसके बारे  में अपने विचार व्यक्त करते हैं।
  • किसी पाठ्यवस्तु को पढ़ने के दौरान समझने के लिए जरूरत पड़ने पर अपने किसी सहपाठी या शिक्षक की मदद लेकर उपयुक्त सन्दर्भ सामग्री, जैसे – शब्दकोश, विश्वकोश, मानचित्र, इंटरनेट या अन्य पुस्तकों की मदद लेते हैं।
  • अपने पाठक और लिखने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए अपनी बात को प्रभावी तरीके से लिखते हैं।
  • पढ़कर अपरिचित परिस्थितियों और घटनाओं की कल्पना करते हैं और उन पर अपने मन में बनने वाली छवियों और विचारों के बारे में लिखित या ब्रेल भाषा में अभिव्यक्ति करते हैं।
  • भाषा की बारीकियों/व्यवस्था का लिखित प्रयोग करते हैं, जैसे – कविता के शब्दों को बदलकर अर्थ और लय को समझना।
  • विभिन्न अवसरों/संदर्भों में कही जा रही दूसरों की बातों को अपने ढंग से लिखते हैं, जैसे – स्कूल के किसी कार्यक्रम की रिपोर्ट बनाना या फिर अपने गाँव के मेले के दूकानदारों से बातचीत।
  • अपने अनुभवों को अपनी भाषा शैली में लिखते हैं। लेखन के विविध तरीकों और शैलियों का प्रयोग करते हैं, जैसे – विभिन्न तरीकों से (कहानी, कविता, निबन्ध आदि) कोई अनुभव लिखना।
  • दैनिक जीवन से अलग किसी घटना/स्थिति पर विभिन्न तरीके से सृजनात्मक ढंग से लिखते हैं,  जैसे – सोशल मिडिया अपर, नोटबुक पर या संपादक के नाम पत्र आदि।
  • विविध कलाओं, जैसे – हस्तकला, वास्तुकला, खेती – बाड़ी, नृत्यकला और इनमें प्रयोग होने वाली भाषा (रजिस्टर) का सृजनात्मक प्रयोग करते हैं, जैसे – कला के बीज बोना, मनमोहक मुद्राएं, रस की अनुभूति।
  • अपने पाठक और लिखने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए अपनी बात को प्रभावी तरीके से लिखते हैं।
  • अभिव्यक्ति की विविध शैलियों/रूपों को पहचानते हैं, स्वयं लिखते हैं, जैसे – कविता, कहानी, निबन्ध आदि।
  • पढ़कर अपरिचित परिस्थितियों और घटनाओं की कल्पना करते है और उन पर मन में बनने वाली छवियों और विचारों के बारे में लिखित/ब्रेल भाषा में अभिव्यक्त करते हैं।

 

 

स्त्रोत: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद

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