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प्राथमिक स्तर पर हिंदी भाषा सीखने की संप्राप्ति

इस भाग में बच्चे घर – परिवार एवं परिवेश से जिन अनुभवों को लेकर विद्यालय आते हैं, उन्हीं भाषा को किस तरह से समृद्ध किया जाए उसकी विस्तृत जानकारी दी गई है।

परिचय

बच्चे अपने साथ बहुत कुछ लेकर विद्यालय आते हैं – अपनी भाषा, अपने अनुभव और दुनिया को देखने का अपना नजरिया आदि। बच्चे घर – परिवार एवं परिवेश से जिन अनुभवों को लेकर विद्यालय आते हैं, वे बहुत समृद्ध होते हैं। उनकी इस भाषायी पूँजी का इस्तेमाल भाषा सीखने –  सिखाने के लिए किया जाना चाहिए। पहली बार विद्यालय में आने वाला बच्चा आने शब्दों के अर्थ और उनके प्रभाव से परिचित होता है। लिपिबद्ध (चिन्ह और उनसे जुड़ी ध्वनियाँ बच्चों के लिए अमूर्त होती हैं, इसलिए पढ़ने का प्रारंभ अर्थपूर्ण सामग्री से ही होना चाहिए और किसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए। यह उद्देश्य कहानी सुनकर – पढ़कर आनंद लेना भी हो सकता है। धीरे – धीरे बच्चों में भाषा की लिपि से परिचित होने के बाद अपने परिवेश में उपलब्ध लिखित भाषा को पढ़ने – समझने की जिज्ञासा उत्पन्न होने लगती है। भाषा सीखने – सिखाने की इस प्रक्रिया के मूल में बच्चों के बारे में यह अवधारणा है कि बच्चे दुनिया के बारे में अपनी समझ और ज्ञान का निर्माण स्वयं करते हैं। यह निर्माण किसी के सिखाए जाने या जोर जबरदस्ती से नहीं बल्कि बच्चों के स्वयं के अनुभवों और आवश्यकताओं से होता है। इसलिए बच्चों को ऐसा वातावरण मिलना जरूरी है जहाँ वे बिना रोक - टोक के अपनी उत्सुकता के अनुसार अपने परिवेश की खोज – बीन कर सकें।  यह अवधारणा बच्चों की भाषायी क्षमताओं पर भी लागू होती है। विद्यालय में आने पर बच्चे प्राय: स्वयं को बेझिझक अभिव्यक्त करने में असर्मथ पाते हैं, क्योंकि जिस भाषा में वे सहज रूप से अपनी राय, अनुभव, भावनाएं आदि व्यक्त करना चाहते हैं, वह विद्यालय में प्राय: स्वीकृत नहीं होती। भाषा – शिक्षण को बहुभाषी संदर्भ में रखकर देखने की आवश्यकता है। कक्षा में बच्चे अलग – अलग भाषायी – सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आते हैं। कक्षा में इनकी भाषाओँ का स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि बच्चों की भाषा को नकारने का अर्थ है – उनकी अस्मिता को नकारना। प्राथमिक स्तर पर भाषा सीखने – सिखाने को संबंध में यह एक जरूरी बात है कि बच्चे विभिन्न प्रकार के परिचित और अपरिचित सन्दर्भों के अनुसार भाषा का सही प्रयोग कर सकें। वे सहज, कल्पनाशील, प्रभावशाली और व्यवस्थित ढंग से किस्म का सही प्रयोग कर सकें। वे भाषा को प्रभावी बनाने के लिए सही शब्दों का प्रयोग कर सकें। यह जरूरी हैं कि पढ़ना, सुनना, लिखना, बोलना- इन चारों प्रक्रियाओं में बच्चे अपने पूर्वज्ञान की सहायता से अर्थ की रचना कर पायें और कही गई बात के निहितार्थ को भी पकड़ पायें। भाषा – संप्राप्ति संबंधी आगे की चर्चा में पढ़ने को लेकर जिस बात पर बल दिया गया है उसके अनुसार ‘पढ़ना’ मात्र किताबी कौशल न होकर एक तहजीब और तरकीब है। पढ़ना, पढ़कर समझने और उस प्रतिक्रिया करने की एक प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में, हम यह कह सकते हैं कि मुद्रित अथवा लिखित सामग्री से कुछ संदर्भों व अनुमान के आधार पर अर्थ पकड़ने की कोशिश पढ़ना है। ऐसी स्थिति में हम अनेक बार किसी पाठ्य – वस्तु को पढ़ने के दौरान, किसी बिन्दु पर जरूरत महसूस होने पर उसी को आगे के संदर्भ में समझने के लिए लौटकर फिर पढ़ते हैं। पढ़ने का यह दोहराव अर्थ की खोज का प्रमाण बन जाता है। पढ़ने के दौरान अर्थ निर्माण के लिए इस बात की भी समझ होनी चाहिए कि अर्थ केवल शब्दों और प्रयुक्त वाक्यों में ही निहित नहीं है, बल्कि वह पाठ की समग्रता में भी मौजूद होता है और कई बार उसमें जो साफ तौर पर नहीं कहा गया होता है, उसे भी समझ पाने की जरूरत होती है। यह समझना भी जरूरी है कि पठन सामग्री की अपनी एक अनूठी संरचना होती है और उस संरचना की समझ रखना परिचित अर्थ निर्माण में सहायक होता है।

लिखना एक सार्थक गतिविधि तभी बन पायेगी जब बच्चों को अपनी भाषा, अपनी कल्पना, अपनी दृष्टि से लिखने की आजादी मिलें। बच्चों को ऐसे अवसर मिलें कि वे अपनी भाषा और शैली विकसित कर सकें न कि ब्लैकबोर्ड, किताबों या फिर शिक्षक के लिखे हुए की नकल करते रहें। पढ़ना – लिखना सीखने का एकमात्र उद्देश्य यह नहीं है कि बच्चे अपनी पाठ्यपुस्तक को पढ़ना सीख जाएँ और अपनी पाठ्यपुस्तक में आये विभिन्न पाठों के अंतर में दिए गये प्रश्नों के उत्तर लिख सकें  बल्कि इसका उद्देश्य यह है कि वे अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में पढ़ने – लिखने का इस्तेमाल कर सकें। वे विभिन्न उद्देश्यों के लिए समझ के साथ पढ़ और लिख सकें। पढ़ना – लिखना सीखने की प्रक्रिया में यह बात भी शामिल हो जाए कि विभिन्न उद्देश्यों के लिए पढ़ने और लिखने के तरीकों में अंतर होता है। हमारे पढ़ने का तरीका इस बात पर भी निर्भर करता है कि हमारे पढ़ने का उद्देश्य क्या है। एक विज्ञापन को पढ़ना और एक सूचना को पढ़ने के तरीके में फर्क होता है। लेखन के संदर्भ में भी यह बात महत्वपूर्ण है कि हमारा पाठक  कौन है यानी हम किसके लिए लिख रहे हैं। अगर हमें विद्यालय में खेल - कूद समारोह की सूचना लिखकर लगानी है तो इसके पाठक विद्यालय के बच्चे, शिक्षक और अन्य कर्मचारीगण हैं। लेकिन अगर यही सूचना समुदाय और अभिभावकों को देनी है तो इसके पाठकों में अभिभावक और समुदाय के व्यक्ति भी शामिल हो जाएँगे। दोनों स्थितियों में हमारे लिखने के तरीके और भाषा में बदलाव आना स्वाभाविक है। इसी तरह से तरह – तरह की सामग्री को पढ़ने का उद्देश्य पढने के तरीके को निर्धारित करता है। अगर स्कूल के नोटिस बोर्ड पर विद्यालय – वार्षिकोत्सव की सूचना पढना चाहते हैं तो इसमें आपका ध्यान किन्हीं खास बिन्दुओं की ओर जाएगा, जैसे – समारोह कौन - सी तारीख को है, समारोह कहाँ आयोजित किया जाएगा, समय क्या आदि, आदि। यदि कोई कहानी पढ़ते हैं तो उसके पात्रों और घटनाक्रम के बारे में गहराई से सोचते हैं कि यद ऐसा हुआ तो क्यों हुआ, कहानी में ऐसा क्या है, जो अगर नहीं होता तो कहानी का रूख क्या होता आदि, हमारे पढ़ने – लिखने के अनेक आयाम हैं, अनेक पड़ाव हैं और हर पड़ाव अपने आप में महत्वपूर्ण है – इन्हें कक्षा में समुचित स्थान मिलना चाहिए।

प्राथमिक स्तर पर भी बच्चों से यह अपेक्षा रहती है। कि वे किन या लिखी गई बात पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकें और प्रश्न पूछ सकें। बच्चों की भाषा इस बात का प्रमाण है कि वे अपनी भाषा का व्याकरण अच्छी तरह जानते हैं। पर व्याकरण की सचेत समझ बनाने के लिए यह आवश्यक है कि बच्चों को उसके विभिन्न पहलुओं की पहचान विविध पाठों के सन्दर्भ में और आस – पास के परिवेश से जोड़कर कराई जाए। भाषा के अलग – अलग तरह के प्रयोगों की ओर उनका ध्यान दिलाया जाए ताकि वे भाषा की बारीकियों को पकड़ सकें और अपनी भाषा में उनका उचित रूप से प्रयोग कर सकें। भाषा सीखने – सीखाने की प्रक्रिया और माहौल के संदर्भ में यह बात ध्यान में रखना जरूरी है कि एक स्तर पर की जाने वाली प्रक्रियाओं को अगले स्तर की कक्षाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। कक्षावार या स्तरानुसार रोचक और विविधतापूर्ण बाल साहित्य का इस संदर्भ में विशेष महत्व है। भाषा संबंधी सभी क्षमताओं, जैसे - सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना एक दूसरे से जुड़ी हुई होती हैं और एक दूसरे के विकास में सहायक होती हैं। अत: इन्हें अलग – अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। यहाँ यह समझना भी जरूरी होगा कि हिंदी भाषा संबंधी जो भाषा - संप्राप्ति के बिन्दु दिए गये हैं उनमें परस्पर जुड़ाव है और एक से अधिक भाषायी क्षमताओं की झलक उनमें मिलती है। किसी रचना को सुनकर अथवा पढ़कर उस गहन चर्चा करना. अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना, प्रश्न पूछना पढ़ने की क्षमता से भी जुड़ा है और सुनने – बोलने की क्षमता से भी। प्रतिक्रिया, प्रश्न और टिप्पणी की लिखकर भी अभिव्यक्ति किया जा सकता है। इस तरह से भाषा की कक्षा में एक साथ सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना जुड़ा है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए जहाँ पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाएं, सीखने – सिखाने की प्रक्रिया तथा सीखने संबंधी संप्राप्ति को दर्शाने वाले बिन्दु दिए गये है। पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाओं को पूरा करने में सीखने संबंधी प्रक्रियाओं की बड़ी भूमिका होगी। सीखने की उपयुक्त प्रक्रियाओं के बिना सीखने संबंधी अपेक्षित संप्राप्ति नहीं की जा सकेगी।

पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाएं

पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाएं

पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाओं को पूरे देश के बच्चों को ध्यान में रखकर (प्रथम भाषा के रूप में हिंदी पढ़ने वाले द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी पढ़ने वाले, दोनों) तैयार किया गया है।

कक्षा एक से पांच तक

  • दूसरों की बातों को रुचि के साथ और ध्यान से सुनना
  • अपने अनुभव – संसार और कल्पना संसार को बेझिझक और सहज ढंग से अभिव्यक्त करना
  • अलग - अलग संदर्भों में अपनी बात कहने की कोशिश करना (बोलकर/ इशारों से/साइन लैंग्वेज द्वारा/चित्र बनाकर)
  • स्तरानुसार कहानी, कविता आदि को सुनने में रुचि लेना और उन्हें मजे से सुनना और सुनाना
  • देखी, सुनी और पढ़ी गई बातों को अपनी भाषा में कहना, उसके बारे में विचार करना और अपनी प्रतिक्रिया/टिप्पणी (मौखिक और लिखित रूप से
    ) व्यक्त करना
  • सूनी और पढ़ी कहानियों और कविताओं को समझकर उन्हें अपने अनुभवों से जोड़ पाना तथा उन्हें अपने शब्दों में कहना और लिखना
  • स्तरानुसार कहानी, कविता या अनुभव के स्तर पर किसी स्थिति का निष्कर्ष या उपाय निकालना
  • लिपि – चिन्हों को देखकर और उनकी ध्वनियों को सुनकर और समझकर उनमें सहसंबंध बनाते हुए लिखने का प्रयास करना
  • चित्र और संदर्भ के आधार पर अनुमान लगाते हुए पढ़ना
  • पढ़ने की प्रक्रिया को दैनिक जीवन की (स्कूल और बाहर की) जरूरतों से जोड़ना, जैसे – कक्षा और स्कूल में अपना नाम पाठ्यपुस्तक का नाम और अपनी मनपसंद पाठ्यसामग्री पढ़ना
  • सुनी और पढ़ी गई बातों को समझकर अपने शब्दों में कहना और लिखना
  • चित्रों को स्वयं की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना
  • पुस्तकालय और विभिन्न स्रोतों (रीडिंग कौर्नर, पोस्टर तरह – तरह की चीजों के रैपर, बाल पत्रिकाएँ, साइन लैंग्वेज, ब्रेल लिपि आदि) से अपनी पसंद की किताबें/ सामग्री ढूंढकर पढ़ना
  • अलग – अलग विषयों पर और अलग – अलग उदेश्यों के लिए लिखना
  • अपनी कल्पना से कहानी, कविता आदि लिखना
  • मुख्य – सामग्री के माध्यम से सन्दर्भ के अनुसार नए शब्दों का अर्थ जानना
  • मनपसन्द विषय का चुनाव करके लिखना
  • विभिन्न विराम – चिन्हों का समझ के साथ प्रयोग करना।
  • संदर्भ और लिखने के उद्देश्य के अनुसार उपयुक्त भाषा (शब्दों, वाक्यों आदि) का चयन और प्रयोग करना
  • नये शब्दों को चित्र – शब्दकोश/शब्दकोश में देखना
  • भाषा की लय और तुक की समझ होना तथा उसका प्रयोग करना
  • घर और विद्यालय की भाषा के बीच संबंध बनाना

कक्षा एक (हिंदी)

सीखने – सिखाने की प्रक्रिया

सीखने की संप्राप्ति

सभी शिक्षार्थियों (भिन्न रूप से सक्षम बच्चों सहित) को व्यक्तिगत, सामूहिक रूप से कार्य करने के अवसर और प्रोत्साहन दिया जाए ताकि उन्हें –

  • अपनी भाषा में अपनी बात कहने, बातचीत करने की भरपूर आजादी और अवसर हों। अपनी बात कहने (भाषिक और संकेतिक माध्यम से) के लिए अवसर एवं प्रोत्साहन हो)
  • बच्चों द्वारा अपनी भाषा की कही गई बातों को हिंदी भाषा और अन्य भाषाओं ( जो भाषाएँ कक्षा में मौजूद हैं या जिन भाषाओँ के बच्चे कक्षा में हैं) में दोहराने के अवसर उपलब्ध हों इससे भाषाओँ को कक्षा में समुचित स्थान मिल सकेगा और उनका शब्द – भंडार, अभिव्यक्तियों का भी विकास करने के अवसर मिल सकेंगे।
  • कहानी, कविता आदि को बोलकर सुनाने के अवसर हों और उस पर बातचीत करने के अवसर हों।
  • हिंदी में सूनी गई बात, कविता, खेल – गीत, कहानी आदि को अपने तरीके और अपनी भाषा में कहने – सुनाने के अवसर उपलब्ध हों।
  • प्रश्न पूछने एवं अपनी बात जोड़ने के अवसर उपलब्ध हों।
  • कक्षा अथवा विद्यालय (पढ़ने का कोना/पुस्तकालय) में स्तरानुसार विभिन्न प्रकार की एवं विभिन्न भाषाओँ (बच्चों की अपनी भाषा/यें, हिंदी आदि) में रोचक सामग्री, जैसे – बाल साहित्य, बाल पत्रिकाएँ, पोस्टर, ऑडियो – वीडियो सामग्री उपलब्ध हो। सामग्री ब्रेल में भी उपलब्ध हो, कमजोर दृष्टि वाले बच्चों को दयां में रखते हुए कुछ सामग्री बड़े अक्षरों में भी छपी हुई हो।
  • तरह – तरह की कहानियों, कविताओं को चित्रों के आधार पर अनुमान लगाकर पढ़ने के अवसर उपबल्ध हों।
  • विभिन्न उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए पढ़ने के विभिन्न आयामों को  कक्षा में उचित स्थान देने के अवसर उपलब्ध हों, जैसे – किसी कहानी में किसी जानकारी को खोजना, कहानी में घटी विभिन्न घटनाओं के क्रम को तय करना, उसे अनोभ्व संसार से जोड़ कर देख पाना आदि।
  • सुनी, देखी, बातों को अपने तरीके से कागज पर उतारने के अवसर हों।
  • बच्चे अक्षरों की आकृति बनाना शुरू करते हैं भले ही उनके द्वारा बनाये गये अक्षरों में सुघड़ता न हो – इसे कक्षा में स्वीकार किया जाये।
  • बच्चों द्वारा वर्तनी गढ़ने की प्रवृत्ति को भाषा सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा समझ जाये।

बच्चे  -

  • विविध उद्देश्यों के लिए अपनी भाषा अथवा/और स्कूल की भाषा का इस्तेमाल करते हुए बातचीत करते हैं, जैसे – कविता, कहानी सुनाना, जानकारी के लिए प्रश्न पूछना, निजी अनुभवों को साझा करना।
  • सुनी सामग्री (कहानी, कविता आदि) के बारे में बातचीत करते हैं, अपनी राय देते हैं, प्रश्न पूछते हैं।
  • भाषा में निहित ध्वनियों और शब्दों के साथ खेलने का आनंद लेते हैं, जैसे – इन्ना, बिन्ना, तिन्ना।
  • प्रिंट (लिखा या छपा हुआ) और गैर प्रिंट सामग्री (जैसे – चित्र या अन्य ग्राफिक्स) में अंतर करते हैं।
  • चित्र के सूक्ष्म और प्रत्यक्ष पहलुओं पर बारीक़ अवलोकन करते हैं।
  • चित्र में या क्रमवार सजाए चित्रों में घट रही अलग – अलग घटनाओं, गतिविधियों और पात्रों को एक सन्दर्भ या कहानी के सूत्र में देखकर समझते हैं और सराहना करते हैं।
  • पढ़ी कहानी, कविताओं आदि में लिपि चिन्हों/शब्दों/वाक्यों आदि को देखकर और उनकी ध्वनियों को सुनकर, समझकर उनकी पहचान करते हैं।
  • संदर्भ की मदद से आस – आस मौजूद प्रिंट के अर्थ और उद्देश्य का अनुमान लगाते हैं, जैसे – टॉफी के कवर पर लिखे नाम को टॉफी, लालीपॉप या चॉकलेट बताना।
  • प्रिंट (लिखा या छपा हुआ) में मौजूद अक्षर, शब्द और वाक्य की इकाइयों को पहचानते हैं, जैसे – मेरा नाम विमला है। बताओ, यहाँ कहाँ लिखा हुआ है? इसमें नाम कहाँ लिखा हुआ है?/नाम में म पर अंगुली रखो।
  • परिचित/अपरिचित लिखित सामग्री (जैसे – मिड डे मील का चार्ट, अपना नाम, कक्षा का नाम, मनपसन्द किताब शीर्षक आदि) में रुचि दिखाते हैं, बातचीत करते हैं और अर्थ की खोज में विविध प्रकार की युक्तियों का इस्तेमाल करते हैं – जैसे – केवल चित्रों या चित्रों और प्रिंट की मदद से अनुमान लगाना, अक्षर – ध्वनि संबंध का इस्तेमाल करना, शब्दों को पहचानना, पूर्व अनुभवों और जानकारी का इस्तेमाल करते हुए अनुमान लगाना।
  • हिंदी के वर्णमाला के अक्षरों की आकृति और ध्वनि को पहचानते हैं।
  • स्कूल के बाहर और स्कूल के भीतर (पुस्तक/पुस्तकालय से) अपनी पसंद की किताबों को स्वयं चुनते हैं और पढ़ने की कोशिश करते हैं।
  • लिखना सीखने की प्रक्रिया के दौरान अपने विकासात्मक स्तर के अनुसार चित्रों, आड़ी – तिरछी रेखाओं (किरम –काटे) अक्षर – आकृतियों, स्व –वर्तनी और स्व – नियंत्रित लेखन के माध्यम से सूनी हुई और अपने मन की बातों को अपने तरीके से लिखने का प्रयास करते हैं।
  • स्वयं बनाये गये चित्रों के नाम लिखते हैं, जैसे – हाथ के बने पंखे का चित्र बनाकर उसके नीचे बीजना (ब्रजभाषा, जो कि बच्चे की घर की भाषा हो सकती है) लिखना।

कक्षा दो (हिंदी)

सीखने – सिखाने की प्रक्रिया

सीखने की संप्राप्ति

सभी शिक्षार्थियों (भिन्न रूप से सक्षम बच्चों सहित) को व्यक्तिगत, सामूहिक रूप से कार्य करने के अवसर और प्रोत्साहन दिया जाए ताकि उन्हें –

  • अपनी भाषा में अपनी बात कहने, बातचीत करने की भरपूर आजादी और अवसर हों।
  • हिंदी में सुनी गई बात, कविता, कहानी आदि को अपने तरीके और अपनी भाषा में कहने – सुनाने/प्रश्न पूछने एवं अपनी बात जोड़ने के अवसर उपलब्ध हों।
  • बच्चों द्वारा अपनी भाषा में कही गई बातों को हिंदी भाषा और अन्य भाषाओँ (जो भाषाएँ कक्षा में मौजूद हैं या जिन भाषाओँ के बच्चे कक्षा में हैं) में दोहराने के अवसर उपलब्ध हों। इससे भाषाओँ को कक्षा में समुचित स्थान मिल सकेगा और उनका शब्द भंडार, अभिव्यक्तियों का भी विकास करने के अवसर मिल सकेंगे।
  • पढ़ने का कोना में स्तरानुसार विभिन्न पराक्र की और विभिन्न भाषाओँ (बच्चों की अपनी भाषा/एँ, हिंदी आदि) में रोचक सामग्री, जिसे – बाल साहित्य, बाल पत्रिकाएँ, पोस्टर, ऑडियो – वीडियो सामग्री उपलब्ध हो।
  • चित्रों के आधार पर अनुमान लगाकर तरह – तरह की कहानियां, कविताओं को पढ़ने के अवसर उपलब्ध हों।
  • विभिन्न उदेश्यों को ध्यान में रखते हुए पढ़ने के विभिन्न आयामों को कक्षा में उचित स्थान देने के अवसर उपलब्ध हों, जैसे – किसी कहानी में किसी जानकारी को खोजना, कहानी में घटी विभिन्न घटनाओं की क्रम को तय करना, किसी घटना के होने के लिए तर्क दे पाना, पात्र के संबंध में अपनी पसंद या नापसंद के बारे में बता पाना आदि।
  • कहानी, कविता आदि को बोलकर, पढ़कर सुनाने के अवसर हों और उस पर बातचीत करने के अवसर हों।
  • सुनी, देखी पढ़ी बातों को अपने तरीके से कागज पर उतारने के अवसर हों। ये चित्र भी हो सकते हैं, शब्द भी और वाक्य भी।
  • बच्चे अक्षरों की आकृति को बनाने में अपेक्षाकृत सुघड़ता का प्रदर्शन करते हैं। इसे कक्षा में प्रोत्साहित किया जाए।
  • बच्चों द्वारा अपनी वर्तनी गढ़ने की प्रवृत्ति को भाषा सिखने की प्रक्रिया का हिस्सा समझा जाये।
  • संदर्भ और उद्देश्य के अनुसार उपयुक्त शब्दों और वाक्यों का चयन करने, उनकी संरचना करने के अवसर उपलब्ध हों।

बच्चे

  • विविध उद्देश्यों के लिए अपनी भाषा अथवा/और स्कूल की भाषा के इस्तेमाल करते हुए बातचीत करते हैं, जैसे – जानकारी पाने के लिए प्रश्न पूछना, निजी अनुभवों को साझा करना, अपना तर्क देना आदि।
  • कही जा रही बात, कहानी, कविता आदि को ध्यान से सुनकर अपनी भाषा में बताते/सुनाते हैं।
  • देखी, सुनी बातों, कहानी, कविता आदि के बारे में बातचीत करते हैं और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।
  • अपनी निजी जिन्दगी और परिवेश पर आधारित अनुभवों को सुनायी जा रही सामग्री, जैसे – कविता, कहानी, पोस्टर, विज्ञापन आदि से जोड़ते हुए बातचीत में शामिल करते हैं।
  • भाषा में निहित शब्दों और ध्वनियों के साथ खेल का मजा लेते हुए ले और तुक वाले शब्द बनाते हैं, जैसे – एक था पहाड़, उसका भाई था दहाड़, दोनों गये खेलने............।
  • अपनी कल्पना से कहानी, कविता आदि कहते सुनाते हैं/आगे बढ़ाते हैं।
  • अपने स्तर और पसंद के अनुसार कहानी, कविता, चित्र, पोस्टर आदि को आनंद के साथ पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं/प्रश्न पूछते हैं।
  • चित्र में या क्रमवार सजाये चित्रों में घट रही अलग – अलग घटनाओं, गतिविधियों और पात्रों को एक सन्दर्भ या कहानी के सूत्र में देखकर समझते हैं और सराहना करते हैं।
  • परिचित/अपरिचित लिखित सामग्री में रुचि दिखाते हैं और अर्थ की खोज में विविध प्रकार की युक्तियों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे – चित्रों और प्रिंट की मदद से अनुमान लगाना, अक्षर- ध्वनि संबंध का इस्तेमाल करना, शब्दों को पहचानना, पूर्व अनुभवों और जानकारी का इस्तेमाल करते हुए अनुमान लगाना।
  • प्रिंट (लिखा या छपा हुआ) में मौजूद  अक्षर, शब्द और वाक्य की इकाइयों की अवधारणा को समझते हैं, जैसे – मेरा नाम विमला है। बताओ इस वाक्य में कितने शब्द हैं? नाम शब्द में कितने अक्षर हैं या नाम शब्द में कौन – कौन से अक्षर हैं?
  • हिंदी के वर्णमाला के अक्षरों की आकृति और ध्वनि को पहचानते हैं।
  • स्कूल के बाहर और स्कूल के भीतर (पुस्तक कोना/पुस्तकालय से) अपनी पसंद की किताबों को स्वयं चुनकर पढ़ने का प्रयास करते हैं।
  • स्वेच्छा से या शिक्षक द्वारा तय गतिविधि के अंतर्गत चित्रों, आड़ी – तिरछी रेखाओं (किरम – कांटे), अक्षर आकृतियों से आगे बढ़ते हुए स्व- वर्तनी का उपयोग और स्व – नियंत्रित लेखन करते हैं।
  • सुनी हुई और अपने मन की बातों को अपने तरीके से और तरह – तरह से चित्रों/शब्दों/वाक्यों द्वारा (लिखित रूप से) अभिव्यक्त करते हैं।
  • अपनी निजी जिन्दगी और परिवेश पर आधारित अनुभवों को अपने लेखन में शामिल करते हैं।
  • अपनी कल्पना से कहानी, कविता आदि बढ़ाते हैं।

कक्षा तीन (हिंदी)

सीखने – सिखाने की प्रक्रिया

सीखने की संप्राप्ति

सभी शिक्षार्थियों (भिन्न रूप से सक्षम बच्चों सहित) को व्यक्तिगत, सामूहिक रूप से कार्य करने के अवसर और प्रोत्साहन दिया जाए ताकि उन्हें –

  • अपनी भाषा में अपनी बात कहने, बातचीत करने की भरभूर आजादी और अवसर हों।
  • हिंदी सुनी गई बात, कविता, कहानी आदि को अपने तरीके और अपनी भाषा में कहने – सुनाने/प्रश्न पूछने एवं अपनी बात जोड़ने, प्रतिक्रिया देने के अवसर उपलब्ध हों।
  • बच्चों द्वारा अपनी भाषा के कही गई बातों को हिंदी भाषा और अन्य भाषाओं (जो भाषाएँ कक्षा में मौजूद हैं या जिन भाषाओँ के बच्चे कक्षा में हैं) में दोहराने के अवसर उपलब्ध हों। इससे भाषाओँ को कक्षा में समुचित स्थान मिल सकेगा और उनके शब्द भंडार, अभिव्यक्तियों का भी विकास करने का अवसर मिल सकेंगे।
  • पढ़ने का कोना/पुस्तकालय में स्तरानुसार विभिन्न प्रकार की रोचक सामग्री,जैसे – बाल साहित्य, बाल पत्रिकाएं, पोस्टर, ऑडियो – वीडियो सामग्री उपलब्ध हो।
  • तरह – तरह की कहानियों, कविताओं, पोस्टर आदि को चित्रों और संदर्भ के आधार पर समझने – समझाने के अवसर उपलब्ध हों।
  • विभिन्न उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए पढ़ने के विभिन्न आयामों को कक्षा में उचित स्थान देने के  अवसर उपलब्ध हों जैसे – किसी कहानी में किसी जानकारी को खोजना, किसी जानकारी को निकाल पाना, किसी घटना या पात्र के संबंध में तर्क, अपनी राय दे पाना आदि।
  • सुनी, देखी बातों को अपने तरीके से, अपनी भाषा में लिखने के अवसर हों।
  • अपनी भाषा गढ़ने (नए शब्द/वाक्य/अभिव्यक्तियाँ बनाने) और उनका इस्तेमाल करने के अवसर हों।
  • सन्दर्भ और उद्देश्य के अनुसार उपयुक्त शब्दों और वाक्यों का चयन करने, उनकी संरचना करने के अवसर उपलब्ध हों।
  • अपना परिवार, विद्यालय, मोहल्ला, खेल का मैदान, गाँव की चौपाल जैसे विषयों पर अथवा स्वयं विषय का चुनाव कर अनुभवों को लिखकर एक दूसरे से बाँटने के अवसर हों।
  • एक दूसरे की लिखी हुई रचनाओं को सुनने, पढ़ने और उन पर अपनी राय देने, उनमें अपनी बात को जोड़ने, बढ़ाने और अलग अलग ढंग से लिखने के अवसर दें।
  • कही जा रही बात, कहानी, कविता आदि को ध्यान से समझते हुए सुनते और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।
  • कहानी, कविता आदि को उपयुक्त उतार चढ़ाव, गति प्रवाह और सही पुट के साथ सुनाते हैं।
  • सूनी हुई रचनाओं की विषय – वस्तू घटनाओं, पात्रों, शीर्षक आदि के बारे में बातचीत करते हैं, प्रश्न पूछते हैं, अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, राय बताते हैं/ अपने तरीके से (कहानी, कविता आदि) अपनी भाषा में व्यक्त करते हैं।
  • आस – पास होने वाली गतिविधियों/घटनाओं और विभिन्न स्थितियों में हुए  अपने अनुभवों के बारे में बताते, बातचीत करते और प्रश्न पूछते हैं।
  • कहानी, कविता अथवा अन्य सामग्री को समझते हुए उसमें अपनी कहानी/बात जोड़ते हैं।
  • तरह – तरह की रचनाओं/सामग्री (अख़बार, बाल पत्रिका, होर्डिंग्स आदि) को समझकर पढ़ने के बाद उस पर आधारित प्रश्न पूछते हैं अपनी राय देते हैं, शिक्षक एवं अपनी सहपाठियों के साथ चर्चा करते हैं, पूछे गये प्रश्नों के उत्तर (मौखिक,लिखित रूप से) देते हैं।
  • अलग – अलग तरह की रचनाओं/सामग्री (अख़बार, बाल पत्रिका, होर्डिंग्स आदि) को समझ कर पढ़ने के बाद उस पर आधारित प्रश्न  पूछते हैं/अपनी राय देतेंहैं/शिक्षक एवं अपने सहपाठियों के साथ चर्चा करते हैं, पूछे गये प्रश्नों के उत्तर मौखिक, संकेतिक) देते हैं।
  • अलग – अलग तरह की रचनाओं में आये नए शब्दों को संदर्भ में समझकर उनका अर्थ सुनिश्चित करते हैं।
  • तरह - तरह कहानियों, कविताओं/रचनाओं की भाषा की बारीकियों (जैसे – शब्दों की पुनरावृत्ति, संज्ञा, सर्वनाम, विभिन्न विराम – चिन्हों का प्रयोग आदि) की पहचान और प्रयोग करते हैं।
  • अगल – अलग तक की रचनाओं/सामग्री (अख़बार, बाल पत्रिका, होर्डिंग्स आदि) को समझ कर पढ़ने के बाद इस पर आधारित प्रश्न पूछते हैं/अपनों राय देते हैं/शिक्षक एवं अपने सहपाठियों के साथ चर्चा करते हैं।
  • स्वेच्छा से ये शिक्षक द्वारा तय गतिविधि के अंतर्गत वर्तनी के प्रति सचेत होते हुए स्व – नियंत्रित लेखन करते हैं।
  • विभिन्न उद्देश्यों के लिए लिखते हुए अपने लेखन में शब्दों के चुनाव, वाक्य संरचना और लेखन के स्वरुप (जैसे – दोस्त को पत्र लिखना, पत्रिका के संपादक को पत्र लिखना) को लेकर निर्णय लेते हुए लिखते हैं।
  • विभिन्न उद्देश्यों के लिए लिखते हुए  अपने लेखन में विराम – चिन्हों, जैसे – पूर्ण विराम, अल्प विराम, प्रश्नवाचक चिन्ह का सचेत इस्तेमाल करते हों।
  • अलग – अलग तरह की रचनाओं/सामग्री (अख़बार, बाल पत्रिका, होर्डिंग्स आदि) को समझकर पढने के बाद उस पर अपनी प्रतिक्रिया लिखते हैं, पूछे गये प्रश्नों के उत्तर (लिखित/ब्रेल लिपि आदि में) देते हैं।

 

कक्षा चार (हिंदी)

सीखने – सिखाने की प्रक्रिया

सीखने की संप्राप्ति

सभी शिक्षार्थियों (भिन्न रूप से सक्षम बच्चों सहित) को व्यक्तिगत, सामूहिक रूप से कार्य करने के अवसर और प्रोत्साहन दिया जाए ताकि उन्हें –

  • विभिन्न विषयों, स्थितियों, घटनाओं, अनुभवों, कहानियों, कविताओं आदि को अपने तरीके और अपनी भाषा में कहने – सुनाने/प्रश्न पूछने एवं अपनी बात जोड़ने के अवसर उपलब्ध हों।
  • पढ़ने का कोना/पुस्तकालय में स्तरानुसार विभिन्न प्रकार की रोचक सामग्री, जैसे – बाल साहित्य, बाल पात्रिकाएँ, पोस्टर, ऑडियो – वीडियो सामग्री, अखबार आदि उपलब्ध हों।
  • तरह – तरह की कहानियों, कविताओं, पोस्टर आदि को पढ़कर समझने – समझाने, उस पर अपनी प्रतिक्रिया देने, बातचीत करने, प्रश्न करने के अवसर उपलब्ध हों।
  • विभिन्न उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए पढ़ने के विभिन्न आयामों को कक्षा में उचित स्थान देने के अवसर उपलब्ध हों, जैसे – किसी घटना या पात्र के संबंध में अपनी प्रतिक्रिया, राय, तर्क देना विश्लेषण करना, आदि।
  • कहानी, कविता आदि को बोलकर पढ़ने सुनने और सुनी, देखी, पढ़ी बातों को अपने तरीके से अपनी भाषा में कहने और लिखने (भाषिक और संकेतिक माध्यम से) के अवसर एवं प्रोत्साहन उपलब्ध हों।
  • जरूरत और संदर्भ के अनुसार अपनी भाषा गढ़ने (नए शब्द/वाक्य/अभिव्यक्तियाँ बनाने) और उनका इस्तेमाल करने के अवसर उपलब्ध हों।
  • एक – दूसरे की लिखी हुई रचनाओं को सुनने, पढ़ने और उस पर अपनी राय देने, उसमें अपनी बात को जोड़ने, बढ़ाने और अलग – अलग ढंग से लिखने के अवसर हों।
  • अपनी बात को अपने ढंग से/सृजनात्मक तरीके से अभिव्यक्त (मौखिक, लिखित, संकेतिक रूप से) करने की आजादी हो।
  • आस – पास होने वाली गतिविधियों/घटनाओं (जैसे – मेरे घर की छत से सूरज क्यों नहीं दिखता? सामने वाले पेड़ पर बैठने वाली चिड़िया कहाँ चली गई?) को लेकर प्रश्न करने, सहपाठियों से बातचीत या चर्चा करने के अवसर उपलब्ध हों।
  • कक्षा में अपने साथियों की भाषाओँ पर गौर करने के अवसर हों, जैसे – आम रोटी, तोता आदि शब्दों को अपनी – अपनी भाषा में कहे जाने के अवसर उपलब्ध हों।
  • विषय – वस्तु के संदर्भ में भाषा की बारीकियों और उसकी नियमबद्ध प्रकृति को समझने और उनका प्रयोग करने के अवसर हों।
  • अन्य विषयों, व्यवसायों, कलाओं आदि (जैसे – गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, नृत्यकला, चिकित्सा आदि) में प्रयुक्त होने वाली शब्दावली को समझने और उसका संदर्भ एवं स्थिति के अनुसार इस्तेमाल करने के अवसर हों।
  • पाठ्यपुस्तक और उससे इतर सामग्री में आये प्राकृतिक सामाजिक एवं अन्य संवेदनशील बिन्दुओं को समझने और उन  पर चर्चा करने के अवसर उपलब्ध हों।

बच्चे

  • दूसरों द्वारा कही जा रही बात को ध्यान से सुनकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते और प्रश्न पूछते हैं।
  • सुनी रचनाओं की विषय – वस्तु, घटनाओं, चित्रों, पात्रों, शीर्षक आदि के बारे में बातचीत करते हैं/प्रश्न पूछते हैं, अपनी राय देते हैं, अपनी बाते के लिए तर्क देते हैं।
  • कहानी, कविता अथवा अन्य समग्री को अपनी तरह से अपनी भाषा में कहते हुए उसमें अपनी कहानी/ बात जोड़ते हैं।
  • भाषा की बारीकियों पर ध्यान देते हुए अपनी भाषा गढ़ते और उसका इस्तेमाल करते हैं।
  • विविध प्रकार की सामग्री (जैसे – समाचार पत्र के मुख्य शीर्षक, बाल पत्रिका आदि) में आये प्राकृतिक, सामाजिक एवं अन्य संवेदनशील बिन्दुओं को समझते और उन पर चर्चा करते हैं।
  • पढ़ी हुई सामग्री और निजी अनुभवों को जोड़ते हुए उनसे उभरी संवेदनशील और विचारों की (मौखिक/लिखित) अभिव्यक्ति करते हैं।
  • अपनी पाठ्यपुस्तक से इतर सामग्री (बाल साहित्य/समाचार पत्र के मुख्य शीर्षक, बाल पत्रिकाम होर्डिंग्स आदि) को समझकर पढ़ते हैं।
  • अलग –अलग तरह की रचनाओं में आये नये शब्दों को संदर्भ में समझकर उनका अर्थ ग्रहण करते हैं।
  • पढ़ने के प्रति उत्सुक रहते है और पुस्तक कोना/पुस्तकालय से अपनी पसंद की किताबों को स्वयं चुनकर पढ़ते हैं।
  • पढ़ी रचनाओं की विषय – वस्तु, घटनाओं, चित्रों, पात्रों, शीर्षक आदि के बारे में बातचीत करते हैं/प्रश्न पूछते हैं, अपनी राय देते हैं, अपनी बात के लिए तर्क देते हैं।
  • स्तरानुसार अन्य विषयों, व्यवसायों, कलाओं आदि ) जैसे – गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, नृत्यकला, चिकित्सा आदि) में प्रयुक्त होने वाले शब्दावली की सराहना करते हैं।
  • भाषा की बारीकियों, जैसे – शब्दों की पुनरावृत्ति, सर्वनाम, विशेषण, जेंडर, वचन आदि के प्रति सचेत रहते हुए लिखते हैं।
  • किसी विषय पर लिखते हूए शब्दों के बारीक अंतर को समझते हुए सराहते हैं और शब्दों का उपयुक्त प्रयोग करते  हुए लिखते हैं।
  • विभिन्न स्थितियों और उद्देश्यों (बुलेटिन बोर्ड पर लगाई जाने वाली सूचना, सामान की सूची, कविता, कहानी, चिट्ठी आदी) के अनुसार लिखते हैं।
  • स्वेच्छा से या शिक्षक द्वारा तय गतिविधि के अंतर्गत लेखन की प्रक्रिया की बेहतर समझ के साथ अपने लेखन को जांचते हैं और लेखन के उद्देश्य और पाठक के अनुसार लेखन में बदलाव करते हैं।
  • अलग – अलग तरह की रचनाओं में आये नए शब्दों को सन्दर्भ में समझकर उनका लेखन में इस्तेमाल करते हैं।
  • विभिन्न उद्देश्यों के लिए लिखते हुए अपने लेखन में विराम – चिन्हों, जैसे – पूर्ण विराम, अल्प विराम, प्रश्नवाचक चिन्ह का सचेत इस्तेमाल करते हैं।
  • अपनी कल्पना से कहानी, कविता, वर्णन आदि लिखते हुए भाषा सृजनात्मक प्रयोग करते हैं।

कक्षा पांच  हिंदी)

सीखने – सिखाने की प्रक्रिया

सीखने की संप्राप्ति

सभी शिक्षार्थियों (भिन्न रूप से सक्षम बच्चों सहित) को व्यक्तिगत, सामूहिक रूप से कार्य करने के अवसर और प्रोत्साहन दिया जाए ताकि उन्हें –

  • विभिन्न विषयों, स्थितियों, घटनाओं, अनुभवों,कहानियों, कविताओं आदि को अपने तरीके और अपनी भाषा में (मौखिक/लिखित/सांकेतिक रूप से) कहने सुनाने/प्रश्न पूछने, टिप्पणी करने, अपनी राय देने की आजादी हो।
  • पुस्तकालय/कक्षा में अलग – अलग तरह की कहानियां, कविताएँ अथवा / बालसाहित्य, स्तरानुसार सामग्री, साइनबोर्ड, होर्डिंग अख़बारों की कतरनें उनके आस – पास के अप्रिवेश में उपलब्ध हों और उन पर चर्चा करने के मौके हों।
  • तरह – तरह की कहानी, कविताओं, पोस्टर आदि के संदर्भ के अनुसार पढ़कर समझने – समझाने के अवसर उपलब्ध हों।
  • जरूरत और सन्दर्भ के अनुसार अपनी भाषा गढ़ने (नए शब्द/वाक्य/ अभिव्यक्तियाँ बनाने) और उनका इस्तेमाल करने के अवसर हों।
  • एक – दूसरे की लिखी हुई रचनाओं को सुनने, पढ़ने और उस पर अपनी आय देने, उसमें अपनी बात को जोड़ने, बढ़ाने और अलग – लग ढंग से लिखने को अवसर हों
  • आस – पास होने वाले गतिविधियों/घटने वाली घटनाओं को लेकर प्रश्न करने, बच्चों से बातचीत या चर्चा करने, टिप्पणी करने, राय देने के अवसर उपलब्ध हों।
  • विषय – वस्तु के संदर्भ में भाषा की बारीकियों और उसकी नियमबद्ध प्रकृति को समझने और उनका प्रयोग करने के अवसर हों।
  • नये शब्दों को चित्र शब्दकोश/शब्दकोश में देखने के अवसर उपलब्ध हों।
  • अन्य विषयों, व्यवसायों, कालाओं आदि (जैसे – गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, नित्य कला, चिकित्सा आदि) में प्रयुक्त होने वाली शबदावली को समझने और उसका संदर्भ एवं स्थितियों के अनुसार उसका इस्तेमाल करने के अवसर हों।
  • पाठ्यपुस्तक उससे इतर सामग्री में आये प्राकृतिक, सामाजिक एवं अन्य संवेदनशील मुद्दों को समझने और उनपर चर्चा करने के अवसर उपलब्ध हों।

बच्चे  -

  • सुनी अथवा पढ़ी रचनाओं (हास्य,  साहसिक, सामजिक आदि विषयों पर आधारित कहानी, कविता आदि) की विषय – वस्तु, घटनाओं, चित्रों, पात्रों, शीर्षक आदि के बारे में बातचीत करते हैं/प्रश्न पूछते हैं/अपनी स्वंतत्र टिप्पणी देते हैं/अपनी बात के लिए तर्क देते हैं/निष्कर्ष निकलते हैं।
  • अपने आस – पास घटने वाली विभिन्न घटनाओं की बारीकियों पर ध्यान देते हुए उनपर मौखिक रूप से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं/प्रश्न पूछते हैं।
  • भाषा की बारीकियों पर ध्यान देते हुए अपनी (मौखिक) भाषा गढ़ते हैं।
  • विविध प्रकार की सामग्री (अख़बार, बाल साहित्य, पोस्टर आदि) में आये संवेदनशील बिन्दुओं पर ( मौखिक/लिखित) अभिव्यक्ति करते हैं, जैसे ईदगाह कहानी पढ़ने के बाद बच्चा कहता है – मैं बजी अपनी दादी की खाना बनाने में मदद करता हूँ।
  • विभिन्न स्थितियों और उद्देश्यों (बुलेटिन पर लगाई जाने वाली सूचना, कार्यक्रम की रिपोर्ट, जानकारी आदि प्राप्त करने के लिए) के लिए पढ़ते और लिखते हैं।
  • अपनी पाठ्यपुस्तक से इतर सामग्री (अख़बार, बाल पत्रिका, होर्डिंग्स आदि) को समझते हुए पढ़ते और उसके बारे में बताते हैं।
  • सुनी अथवा पढ़ी रचनाओं ( हास्य, साहसिक, सामाजिक आदि विषयों पर आधारित कहानी, कविता आदि) की विषय – वस्तु घटनाओं, चित्रों और पात्रों शीर्षक आदि के बारे में बातचीत करते हैं/प्रश्न पूछते हैं/अपनी स्वतंत्र टिप्पणी देते हैं/अपनी  बात के लिए तर्क देते हैं/निष्कर्ष निकालते हैं।
  • अपरिचित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से खोजते हैं।
  • स्वेच्छा से या शिक्षक द्वारा तय गतिविधि के अंतर्गत लेखन की प्रक्रिया की बेहतर समझ के साथ अपनी लेखन को जांचते हैं और लेखन के उद्देश्य और पाठक के अनुसार लेखन में बदलाव करते हैं, जैसे – किसी घटना की जानकरी के बारे में बताने के लिए स्कूल की भित्ति पत्रिका के लिए लिखना और किसी दोस्त को पत्र लिखना।
  • भाषा की बारीकियों पर ध्यान देते हुए अपनी भाषा गढ़ते हैं और उसे अपने लेखन/ब्रेल में शामिल करते हैं।
  • भाषा की व्याकरणिक इकाइयों (जैसे – कारक चिन्ह, क्रिया, काल, विलोम आदि) की पहचान करते हैं और उनके प्रति सचेत रहते हुए लिखते हैं।
  • विभिन्न उद्देश्यों के लिए लिखते हुए अपने लेखन में विराम चिन्हों जैसे पूर्ण विराम, अल्प विराम, प्रश्न वाचक चिन्ह, उद्धरण चिन्ह का सचेत इस्तेमाल करते हैं।
  • स्तरानुसार अन्य विषयों, व्यवसायों, कलाओं आदि (जैसे – गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, नृत्यकला, चिकित्सा आदि) में प्रयुक्त होने वाली शब्दावली को समझते है और संदर्भ और स्थिति के अनुसार उनका लेखन में इस्तेमाल करते हैं।
  • अपने आस – पास घटने वाली विभिन्न घटनाओं की बारीकियों पर ध्यान देते हुए उन पर लिखित रूप से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।
  • उद्देश्य और संदर्भ के अनुसार शब्दों, वाक्यों, विराम – चिन्हों का उचित प्रयोग करते हुए लिखते हैं।
  • पाठ्यपुस्तक और उससे इतर सामग्री में आये संवेदनशील बिन्दुओं पर लिखित/ब्रेल लिपि में अभिव्यक्ति करते हैं।
  • अपनी कल्पना से कहानी, कविता, पात्र आदि लिखते हैं। कविता, कहानी को आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं।

 

 

स्त्रोत: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद

2.87234042553

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