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भारत में शिक्षा के उद्देश्यों का महत्व

इस लेख में भारत में शिक्षा के उद्देश्यों के महत्व से सम्बंधित जानकारी दी गयी है।

परिचय

जब से मानव सभ्यता का सूर्य उदय हुआ है तभी से भारत अपनी शिक्षा तथा दर्शन के लिए प्रसिद्ध रहा है। यह सब भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों का ही चमत्कार है कि भारतीय संस्कृति ने संसार का सदैव पथ-प्रदर्शन किया और आज भी जीवित है। वर्तमान युग में भी महान दार्शनिक एवं शिक्षा शास्त्रियों इसी बात का प्रयास कर रहे हैं की शिक्षा भारत में प्रत्येक युग की शिक्षा के उद्देश्य अलग-अलग रहें हैं इसलिए वर्तमान भारत जैसे जनतंत्रीय देश के लिए उचित उद्देश्यों के निर्माण के सम्बन्ध में प्रकाश डालने से पूर्व हमें अतीत की ओर जाना होगा। निम्नलिखित पंक्तियों में हम प्राचीन, मध्य तथा वर्तमान तीनो युगों की भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों पर प्रकाश डाल रहे हैं –

(1) पवित्रता तथा जीवन की सद्भावना – प्राचीन भारत में प्रत्येक बालक के मस्तिष्क में पवित्रता तथा धार्मिक जीवन की भावनाओं को विकसित करना शिक्षा का प्रथम उद्देश्य था। शिक्षा आरम्भ होने से पूर्व प्रत्येक बालक के उपनयन संस्कार की पूर्ति करना शिक्षा प्राप्त करते समय अनके प्रकार के व्रत धारण करना, प्रात: तथा सायंकाल ईश्वर की महिमा के गुणगान करना तथा गुरु के कुल में रहते हुए धार्मिक त्योहारों का मानना आदि सभी बातें बालक के मस्तिष्क में पवित्रता तथा धार्मिक भावनाओं को विकसित करते उसे आध्यात्मिक दृष्टि से बलवान बनाती है। इस प्रकार साहित्यिक तथा व्यवसायिक सभी प्रकार की शिक्षा का प्रत्यक्ष उद्देश्य बालक को समाज का एक पवित्र तथा लाभप्रद सदस्य बनाना था।

(2) चरित्र निर्माण – भारत की प्राचीन शिक्षा का दूसरा उद्देश्य था – बालक के नैतिक चरित्र का निर्माण करना। उस युग में भारतीय दार्शनिकों का अटल विश्वास था कि केवल लिखना-पढना ही शिक्षा नहीं है वरन नैतिक भावनाओं को विकसित करके चरित्र का निर्माण करना परम आवश्यक है। मनुस्मृति में लिखा है कि ऐसा व्यक्ति जो सद्चरित्र हो चाहे उसे वेदों का ज्ञान भले ही कम हो, उस व्यक्ति से कहीं अच्छा है जो वेदों का पंडित होते हुए भी शुद्ध जीवन व्यतीत न करता हो। अत: प्रत्येक बालक के चरित्र का निर्माण करना उस युग में आचार्य का मुख्य कर्त्तव्य समझा जाता था। इस सम्बन्ध में प्रत्येक पुस्तक के पन्नों पर सूत्र रूप में चरित्र संबंधी आदेश लिखे रहते थे तथा समय –समय पर आचार्य के द्वारा नैतिकता के आदेश भी दिये जाते थे एवं बालकों के समक्ष राम, लक्ष्मण, सीता तथा हनुमान आदि महापुरुषों के उदहारण प्रस्तुत किये जाते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राचीन भारत की शिक्षा का वातावरण चरित्र-निर्माण में सहयोग प्रदान करता था।

(3) व्यक्तित्व का विकास- बालक के व्यक्तित्व को पूर्णरूपेण विकसित करना प्राचीन शिक्षा का तीसर उद्देश्य था। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बालक को आत्म-सम्मान की भावना को विकसित करना परम आवश्यक समझा जाता था। अत: प्रत्येक बालक में इस माहान गुण को विकसित करने के लिए आत्म-विश्वास, आत्म-निर्भरता, आत्म-नियंत्रण तथा विवेक एवं निर्णय आदि अनके गुणों एवं शक्तियों को पूर्णत: विकसित करने का अथक प्रयास किया जाता था।

(4) नागरिक एवं सामाजिक कर्तव्यों का विकास- भारत की प्राचीन शिक्षा का चौथा उद्देश्य था – नागरिक एवं सामाजिक कर्तव्यों का विकास करना। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए इस बात पर बल दिया जाता था कि मनुष्य समाजोपयोगी बने, स्वार्थी नहीं। अत: बालक को माता-पिता, पुत्र तथा पत्नी के अतिरिक्त देश अथवा समाज के प्रति भी अपने कर्तव्यों का पालन करना सिखाया जाता था। कहने का तात्पर्य यह है कि तत्कालीन शिक्षा ऐसे नागरिकों का निर्माण करती थी जो अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए समाज की उन्नति में भी यथाशक्ति योगदान दें सकें।

(5) सामाजिक कुशलता तथा सुख की उन्नति – सामाजिक कुशलता तथा सुख की उन्नति करना प्राचीन शिक्षा का पांचवां उद्देश्य था- इस उद्देश्य की प्राप्ति भावी पीढ़ी को ज्ञान की विभिन्न शाखाओं व्यवसायों तथा उधोगों में प्रशिक्षण देकर की जाती थी। तत्कालीन समाज में कार्य-विभाजन का सिधान्त प्रचलित था। इसी कारण ब्राह्मण तथा क्षत्रिय राजा भी हुए और लड़का भी एवं शुद्र दर्शानिक भी। परन्तु यह सब कुछ होते हुए भी सामान्य व्यक्ति के लिए यही उचित था कि वह अपने परिवार के व्यवसाय को ही अपनाये। इससे प्रत्येक व्यवसाय की कुशलता में वृद्धि हुई। परिणामस्वरूप सामाजिक कुशलता एवं सुख की निरन्तर उन्नति होती रही।

(6) संस्कृति का संरक्षण तथा विस्तार – राष्ट्रीय सम्पति तथा संस्कृति का संरक्षण एवं विस्तार भारत की प्राचीन शिक्षा का छठा महत्वपूर्ण उद्देश्य था। प्राचीन काल में हिन्दुओं ने अपने विचार तथा संस्कृति के प्रचार हेतु शिक्षा को उत्तम साधन माना। अत: प्रत्येक हिन्दू अपने बालकों को वही शिक्षा देता था, जो उसने स्वयं प्राप्त की थी। यह प्राचीन आचार्यों के घोर परिश्रम का ही तो फल है की हमारा वैदिक कालीन सम्पूर्ण साहित्य हमारे सामने आज भी ज्यों का त्यों सुरक्षति है। डॉ ए० ऐसी० अल्तेकर ने ठीक ही लिखा है – “ हमारे पूर्वजों ने प्राचीन युग के साहित्य की विभिन्न शाखाओं के ज्ञान को सुरक्षित ही नहीं रखा अपितु अपने यथाशक्ति योगदान द्वारा उसमें निरन्तर वृद्धि करके उसे मध्य युग तक भावी पीढ़ी को हस्तांतरित किया।”

प्राचीन युग की शिक्षा के उपर्युक्त उद्देश्यों पर प्रकाश डालने के पश्चात हम इस निष्कर्ष पर आते हैं की हमारी तत्कालीन शिक्षा-पद्धति ऐसी थी जसमें भारतीय जीवन तथा बालक के शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा अध्यात्मिक आदि सभी प्रकार के विकास का व्यापक दृष्टिकोण निहित था।

मध्य युग में भारतीय शिक्षा के उद्देश्य

भारत के मध्य युग की शिक्षा का अर्थ इस्लामी अथवा मुस्लिम शिक्षा से है। मुस्लिम शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित है –

(1) इस्लाम का प्रसार- इस्लामी शिक्षा का पहला उद्देश्य मुस्लमान धर्म का प्रसार करना था। अत: जगह-जगह मकतब और मदरसे खोले गये। प्रत्येक मस्जिद के साथ एक मकतब खोला जाता था जिसमें मुस्लिम बालकों को कुरान पढाया जाता था। साथ ही मदरसों में इस्लाम का इतिहास, दर्शन, तथा उच्च प्रकार की धर्म संबंधी शिक्षा प्रदान की जाती थी।

(2) मुसलमानों में शिक्षा का प्रसार – मुस्लिम शिक्षाशास्त्रियों का विश्वास था कि शिक्षा के ही द्वारा मुसलमानों को धार्मिक तथा अधार्मिक बातों का अन्तर समझाया जा सकता है। अत: मुसलमानों को शिक्षा प्रदान करना इस्लामी शिक्षा का दूसरा उद्देश्य था।

(3) इस्लामी राज्यों में वृद्धिकरण – इस्लामी शिक्षा का तीसरा इस्लामी राज्यों में वृद्धि करना था। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए मुसलमानों को लड़ने की कला सिखाई जाती थी जिससे वे इस्लामी राज्यों में वृद्धि कर सकें।

(4) नैतिकता का विकास – इस्लामी शिक्षा का चौथा उद्देश्य नैतिकता का विकास करना था। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लये मुस्लिम बालकों को नैतिक पुस्तकों का अध्ययन कराया जाता था।

(5) भौतिक सुखों को प्राप्त करना – इस्लामी शिक्षा का पांचवां उद्देश्य भौतिक सुखों को प्राप्त करना था। इसके लिए बालकों को उपाधियाँ तथा मौलवियों को ऊँचे-ऊँचे पड़ दिये जाते थे जिससे वे भौतिक सुखों का आनन्द ले सकें।

(6) शरियत का प्रसार – इस्लामी शिक्षा का छठा उदेहय शरियत के कानूनों को लागू करना था। अत: शिक्षा द्वारा इस्लाम के कानून, राजनीतिक सिधान्त तथा इस्लाम की सामाजिक परम्पराओं का प्रसार किया गया।

(7) चरित्र निर्माण – मोहम्मद साहब का विश्वास था कि केवल चरित्रवान व्यक्ति ही उन्नति कर सकता है। अत: इस्लामी शिक्षा का सातवाँ उद्देश्य मुस्लमान बालकों के चरित्र का निर्माण करना था।

वर्तमान भारत में शिक्षा के उचित उद्देश्यों का निर्माण

भारत हजारों वर्षों तक दासता की बेड़ियों में जकड़ा रहा। इसलिए न हमारी शिक्षा भारतीय संस्कृति पर ही आधारित रही और न ही हमारी शिक्षा का कोई राष्ट्रीय उद्देश्य रह सका। 15 अगस्त सन 1947 को हमारे यहाँ विदेशी नियंत्रण समाप्त हुआ। उसी दिन से भारत एक सर्वसत्ता लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। ध्यान देने की बात है कि जनतंत्र की बागडोर उन नागरिकों के हाथ में होती है जो आज के स्कूलों में पढ़ रहे हैं। दुसरे शब्दों में, जनतंत्र की आत्मा शिक्षा होती है। अत: हमारी जनतंत्रीय सरकार, शिक्षाशास्त्रियों, दार्शनिकों तथा समाज सुधारकों ने शिक्षा को भारतीय संस्कृति पर आधारित करने तथा नये जनतांत्रिक समाज को सफल बनाने के लिए, शिक्षा के उचित उद्देश्यों के निर्माण की आवश्यकता अनुभव की। अत: भारत सरकार ने – (1) विश्वविधालय शिक्षा आयोग (2) माध्यमिक शिक्षा आयोग तथा (3) कोठारी आयोग की नियुक्ति की। इन आयोगों ने समाज तथा व्यक्ति की आवश्यकताओं को दृष्टि में रखते हुए भारतीय शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्यों को निर्धारित किया है –

(अ) विश्वविद्यालय  आयोग के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य

विश्वविद्यालय आयोग ने भारतीय शिक्षा के अगलिखित उद्देश्य निर्धारित किये हैं –

(1) विवेक का विस्तार करना।

(2) नये ज्ञान के लिए इच्छा जागृत करना।

(3) जीवन का अर्थ समझने के लिए प्रयत्न करना।

(4) व्यवसायिक शिक्षा की व्यवस्था करना।

(ब) माध्यमिक आयोग के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य

माध्यमिक शिक्षा आयोग ने व्यक्ति तथा भारतीय समाज की आवश्यकताओं को दृष्टि में रखते हुए शिक्षा के निम्नलखित उद्देश्य निर्धारित किये हैं -

जनतांत्रिक नागरिकता का विकास- भारत एक धर्म निरपेक्ष गणराज्य है। इस देश के जनतंत्र को सफल बनाने के लिए प्रत्येक बालक को सच्चा, ईमानदार तथा कर्मठ नागिरक बनाना परम आवश्यक है। अत: शिक्षा का परम उद्देश्य बालक को जनतांत्रिक नागरिकता की शिक्षा देना है। इसके लिए बालकों को स्वतंत्र तथा स्पष्ट रूप से चिन्तन करने एवं निर्णय लेने को योग्यता का विकास परम आवश्यक है, जिससे वे नागरिक के रूप में देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक सभी प्रकार की समस्याओं पर स्वतंत्रतापूर्वक चिन्तन और मनन करके अपना निजी निर्माण लेते हुए स्पष्ट विचार व्यक्त कर सकें। इन सभी शक्तियों का विकास बौद्धिक विकास के द्वारा किया जा सकता है। बौद्धिक विकास की हो जाने से व्यक्ति इस योग्य बन जाता है कि वह सत्य और असत्य तथा वास्तविकता और प्रचार से अन्तर समझते हुए अंधविश्वासों तथा निरर्थक परम्पराओं का उचित विश्लेषण करके अपने जीवन में आने वाली विभिन्न समस्याओं के विषय में वैज्ञानिक दृष्टिकोण द्वारा अपना निजी निर्णय ले सके। चूँकि स्पष्ट चिन्तन का भाषण देने तथा लेखन की स्पष्टता से घनिष्ठ सम्बन्ध है इसलिए बालकों को शिक्षा के द्वारा इस योग्य बनाया जाये कि वे भाषणों तथा लेखों के द्वारा अपने विचारों से जनता को प्रभावित करके अपनी ओर आकर्षित कर सकें।

कुशल जीवन-यापन कला की दीक्षा – शिक्षा का दूसरा उद्देश्य बालक को समाज में रहने अथवा जीवन-यापन की कला में दीक्षित करना है। एकांत में रहकर न तो व्यक्ति जीवन-यापन की कर सकता है और न ही पूर्णत: विकसित हो सकता है। उसके स्वयं के विकास तथा समाज के कल्याण के लिए यह आवश्यक है कि वह सहअस्तित्व की आवश्यकता को समझते हुए व्यवहारिक अनुभवों द्वारा सहयोग के महत्व का मुल्यांकन करना सीखे। इस दृष्टि में चेतना तथा अनुशासन एवं देशभक्ति आदि अनेक सामाजिक गुणों का विकास किया जाना चाहिये जिससे प्रत्येक बालक इस विशाल देश के विभिन्न व्यक्तियों का आदर करते हुए एक-दुसरे के साथ घुलमिल कर रहना सीख जायें।

व्यवसायिक कुशलता की उन्नति – शिक्षा का तीसरा उद्देश्य बालकों में व्यवसायिक कुशलता की उन्नति करना है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लये व्यासायिक प्रशिक्षण की आवश्यकता है। अत: बालकों के मन में श्रम के प्रति आदर तथा रूचि उत्पन्न करना एवं हस्तकला के कार्य पर बल देना परम आवश्यक है। यही नहीं, पाठ्यक्रम में विभिन्न व्यवसायों को भी उचित स्थान मिलना चाहिये जिससे प्रत्येक बालक अपनी रूचि के अनुसार उस व्यवसायों को चुन सकें जिसे शिक्षा समाप्त करने के पश्चात अपनाना चाहता हो। इससे हमें जहाँ एक ओर विभिन्न व्यवसायों के लिए कुशल कारीगर प्राप्त हों सकेंगे वहाँ दूसरी ओर औधोगिक परगति के कारण देश की आर्थिक दशा में भी निरन्तर सुधार होता रहेगा। इस दृष्टि से स्कूलों में व्यवसायिक क्षमता की उन्नति की ओर ध्यान देते हुए बालकों को इस बात का ज्ञान करना परम आवश्यक है कि आत्म सन्तुष्टि तथा राष्ट्रीय समृद्धि कार्य-कुशलता द्वारा सम्भव है।

व्यक्तित्व का विकास – शिक्षा का चौथा उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास करना है। व्यक्ति के विकास का तात्पर्य बालक के बौद्धिक विकास, शारीरिक, सामाजिक तथा व्यवसायिक आदि सभी पक्षों एवं रचनात्मक शिक्तियों के विकास से है। इस उद्देश्य के अनुसार बालकों को क्रियात्मक तथा रचनात्मक कार्यों को करने के लिए प्रेरित करना चाहिये जिससे उनमें साहित्यिक, कलात्मक एवं सांस्कृतिक आदि नाना प्रकार की रुचियों का निर्माण हो जाये। इस विभिन्न रुचियों के विकास से उनकी आत्माभिव्यक्ति, सांस्कृतिक तथा सामाजिक सम्पति की वृद्धि, अवकाश काल के सदुपयोग की योग्यता तथा चहुंमुखी विकास में सहायता मिलेगी। अत: बालकों के व्यक्तित्व के विकास हेतु उन्हें रचनात्मक कार्यों में भाग लेने के अवसर मिलने चाहियें।

नेतृत्व के लिए शिक्षा – भारत को अब ऐसे नेताओं की आवश्यकता है जो देश को आदर्श नेतृत्व प्रदान कर सके। अत: नेतृत्व की शिक्षा प्रदान करना शिक्षा का पांचवा मुख्य उद्देश्य है। इस उद्देश्य के अनुसार हमें बालकों में अनुशासन, सहनशीलता, त्याग, सामाजिक भावनाओं की समझदारी तथा नागरिक एवं व्यावहारिक कुशलता आदि गुणों को विकसित करना चाहिये जिससे वे बड़े होकर राजनितिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में अपने-अपने उतरदायित्व को सफलतापूर्वक निभाते हुए सफल नेतृत्व कर सकें।

(स) कोठारी आयोग के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य

कोठारी कमीशन ने भारतीय शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किये हैं  -

(1) उत्पादन में वृद्धि करना – वर्त्तमान जनतंत्रीय भारत का प्रथम उद्देश्य है – उत्पादन में वृद्धि करना। भारत में जनसंख्या की वृद्धि के साथ-साथ उत्पादन नहीं बढ़ रहा है। हम देखते हैं कि हमारे देश खाद्य सामग्री, वस्त्र दवाइयां तथा कल-पुर्जे आदि आवश्यक वस्तुयों की अब भी बहुत कमी है। इन सबके लिए हमें दुसरे देशों का मुहं देखना पड़ता है। हमें चाहिये कि हम अपने यहाँ विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादन को गति-प्रदान करें। इस महान उद्देश्य को पूरा करने के लिए हमें कृषि तथा तकनीकी शिक्षा पर बल देने के साथ-साथ माध्यमिक शिक्षा को भी अधिक व्यवसायिक रूप प्रदान करना होगा। इस सम्बन्ध में आयोग ने कुछ कैसे सुझाव भी प्रस्तुत किये है जिनको कार्य रूप में परिणत करने से उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।

(2) सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का विकास – राष्ट्र के पुननिर्माण के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है। इस एकता के न होने से सभी नागरिक राष्ट्र हित की परवाह न करते हुए केवल अपने-अपने निजी हितों को पूरा करने में ही व्यस्त हो जाते हैं इससे राष्ट्र निर्बल तथा प्रभावहीन हो जाता है। परिणामस्वरूप उसे एक दिन रसातल में जाना ही पड़ता है। कहने का तात्पर्य यह है कि राष्ट्र के निर्माण हेतु सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है। इस एकता की भावना का विकास केवल शिक्षा के द्वारा ही सम्भव है। अत: शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का विकास होना चाहिये। आयोग ने एक शैक्षिक कार्यक्रम की रुपरेखा प्रस्तुत की है जिसके द्वारा इस उद्देश्य को सफलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है।

(3) जनतंत्र के सुद्रढ़ बनाना- जनतंत्र को सफल बनाने के लिए शिक्षा परम आवश्यक है। अत: जनतंत्र को सुद्रढ़ बनाना शिक्षा का तीसरा उद्देश्य है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से करनी चाहिये कि प्रत्येक व्यक्ति जनतंत्र के आदर्शों और मूल्यों को प्राप्त कर सके। आयोग ने शिक्षा के द्वारा जनतंत्र सुद्रढ़ बनाने तथा राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न करने के लिए कुछ ठोस सुझाव प्रस्तुत किये हैं जो उक्त दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है।

(4) देश का आधुनिकीकरण करना – शिक्षा का चौथा उद्देश्य है – देश का आधुनिकीकरण करना। प्राग्तिशील देशों में वैज्ञनिक तथा तकनीकी ज्ञान में विकास होने के कारण दिन-प्रतिदिन नये-नये अनुसंधान हो रहे हैं। इन अनुसंधानों के परिणामस्वरूप प्राचीन परम्पराओं, मान्यताओं तथा दृष्टिकोण में परिवर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों के कारण नव-समाज का निर्माण हो रहा है। खेद का विषय है कि भारतीय समाज में अभी तक वही परम्पराओं, मान्यताओं तथा दृष्टिकोण प्रचलित है जिन्हें प्राचीन युग में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता था। भारत अब स्वतंत्र है। यदि भारत को अब उन्नतिशील राष्ट्रों के साथ-साथ चलना है तो हमें भी वैज्ञानिक  तथा तकीनीकी ज्ञान का विकास करके औधोगिक क्षेत्र में उन्नति करते हुए अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं, मान्यताओं एवं दृष्टिकोण में समयानुकूल परिवर्तन करके देश का आधुनिकीकरण करना होगा। चूँकि ये सभी बातें शिक्षा के ही द्वारा सम्भव हैं, इसलिए हमें शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से करनी चाहिये की यह उद्देश्य सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाये।

(5) सामाजिक, नैतिक तथा अध्यात्मिक मूल्यों का विकास करना – शिक्षा का पाँचवां उद्देश्य है – सामाजिक, नैतिक तथा अध्यात्मिक मूल्यों को विकास करना। देश का आधुनिकीकरण करने के लिए कुशल व्यक्तियों का होना परम आवश्यक है। अत: हमको पाठ्यक्रम में विज्ञान तथा तकीनीकी विषयों को मुख्य स्थान देना होगा। इन विषयों से चारित्रिक विकास एवं मानवीय गुणों को क्षति पहुँचने की सम्भावना है। अत: आयोग ने सुझाव प्रस्तुत किया है कि पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक विषयों के साथ-साथ मानवीय विषयों को भी सम्मिलित किया जाये जिससे औधोगिक उन्नति के साथ-साथ मानवीय मूल्य भी विकसित होते रहें और प्रत्येक नागरिक सामाजिक, नैतिकता तथा अध्यात्मिक मूल्यों को प्राप्त कर सकें। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए भी आयोग ने अनेक सुझाव प्रस्तुत किये हैं।

स्त्रोत: पोर्टल विषय सामग्री टीम

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Sushma pandey Mar 25, 2018 08:49 PM

Achha lekh h..shikha ka arth sirf dgree tk simit rah gaya h. Vastvik aims to khatam ho gaya. Teacher apne aim ko bhul gy h ki wo rastra ke bhavisya ke nirmata h......

Mohd.sufiyan rasoolpur Mar 08, 2018 08:19 AM

Education is the most importent for the whole world.

Rajkumar Jan 13, 2018 11:44 AM

Extention teaching nature and objectives of extension teaching,,, (ke bare मै )

राजेंद्र देव। Nov 20, 2016 10:13 PM

हम सब बातें समजते है ,पर करते कुछ नही । सबसे पहले हमे शिक्षकोको ही शिक्षाके उद्धेश समजाना चाहिये।और उनको समाजके प्रति उनके पवित्र कर्तव्यका एहसास दिलाना चाहिये ।

अनुज Oct 25, 2016 07:46 AM

एजुकेशन इम्X्लीकेशX या शिक्षा का प्रयोग

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