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राज्य और शिक्षा

इस लेख में राज्य और शिक्षा से सम्बंधित विस्तृत जानकारी दी गयी है।

राज्य की उत्पति

प्लेटो, अरस्तु, हॉब्स तथा लॉक आदि दार्शनिकों का मत है कि आरम्भ कल में लोग प्राकृतिक अवस्था में रहा करते थे।अपने बर्बर जीवन से तंग आकर उन्होंने अपने निजी स्वार्थों त्याग कर सामाजिक समझौते के आभार पर संगठित समूहों तथा समाजों की रचना की तथा इन्हें कुछ अधिकारों सौपें। इन्हीं विभिन्न वर्गों के विभिन्न समाजों ने मिलकर एक व्यापक समाज अथवा समाज का एक सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित विशाल रूप है जिसकी उत्पति सामाजिक संगठनों के कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए हुई है।अब राज्य अपने राजनितिक प्रभाव को अन्य प्रकार की समस्याओं को सुलझाने में भी प्रयोग कर रहा है।

राज्य का अर्थ – उपर्युक्त पक्तिओं से स्पष्ट हो जाता है कि राज्य की उत्पति विभिन्न समूहों एवं समाजों से हुई है। इस दृष्टि से राज्य भी एक विशाल सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित समूह है।परन्तु अन्य समूहों तथा राज्य में अन्तर यह है कि राज्य के संगठन को प्रत्येक व्यक्ति स्वीकार करता है तथा उसके आदर्शों का पालन करता है।यही नहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से भी राज्य एक निश्चित भूखण्ड अथवा प्रदेश का स्वामी होता है, जिस पर एक निश्चित संख्या निवास करती है, जिसकी एक संगठित सरकार होती है तथा जो बाहरी प्रतिबंधनो से स्वतंत्र होता है।इस दृष्टि से राज्य के चार आवशयक तत्व होते हैं–(1) निश्चित भूखण्ड अथवा प्रदेश, (2) जनसंख्या,(3) सरकार तथा (4) राजनीतिक सत्ता

राज्य की परिभाषा

अग्रलिखित पक्तिओं में हम राज्य के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए कुछ परिभाषायें दे रहे हैं –

  1. आई० एल० कैंडिल- “ राज्य की परिभाषा एक सुसंगठित राजनीतिक समुदाय के रूप में दी जा सकती है, जिसके साथ एक सरकार होती है तथा जिसे लोगों द्वारा मान्यता प्राप्त होती है।“
  2. गार्नर- “ राज्य मनुष्यों के उस बहुसंख्यक समुदाय अथवा संगठन को कहते हैं जो स्थायी रूप से किसी निश्चित भू-भाग में रहता है, जो बहरी नियंत्रण से पूर्ण अथवा लगभग स्वतंत्र है तथा जिसकी संगठित सरकार है जिसकी आज्ञा का पालन अधिकांश जनता स्वाभाविक रूप से करती है।”

राज्य की विशेषतायें

राज्य की विशेषतायें निम्नलिखित पक्तिओं में दी जा रही है –

  1. राज्य एक सर्वशक्तिमान तथा सर्वश्रेष्ठ सामाजिक संस्था है जो अपने निर्माण कर्ताओं से उच्च एवं श्रेष्ट भौतिक अस्तित्व रखती है। यह संख्या केवल परामर्श ही नहीं देती अपितु किसी कार्य को करने के लिए अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रयोग भी करती है।
  2. प्रत्येक राज्य की आवश्यकताओं, आर्थिक, समस्यों, धार्मिक परिस्थितियाँ, प्रशाशनिक व्यवस्था, राजनीतिक विचारधारा, तथा संस्कृति अलग-अलग होती है। इन सबको प्रभावित करने के लिए राज्य विभिन्न साधनों का प्रयोग करता है।
  3. राज्य समय-समय पर कानून बनता है।इन कानूनों के द्वारा व्यक्तियों तथा सामाजिक संगठनों के व्यव्हार में परिवर्तन होता रहता है।
  4. राज्य वह साधन है जिसके द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में समानता स्थापित की जाती है।यह समानता इसलिए स्थापित की जाती है, क्योंकि राज्य द्वारा बनाये गए कानून सब पर सामान रूप से लागू होते हैं।
  5. व्यवस्थित तथा संगठित सरकार के रूप में राज्य बाहरी हमलों से सुरक्षा करता है तथा आतंरिक व्यवस्था नहीं होने देता।
  6. राज्य की प्रगति का मूल्यांकन उसके नागरिकों की प्रगति से किया जाता है।यदि नागरिकों की प्रगति होती रहती है तो वे राज्य के आदर्शों का पालन करते रहते हैं अन्यथा नहीं भले ही जान की बाजी भी लगानी पड़े।

राज्य और शिक्षा का सम्बन्ध

राज्य और शिक्षा के बीच गहरा सम्बन्ध होता है।इस सम्बन्ध के अनके कारण है। अग्रलिखित पंक्तिओं में हम इन प्रमुख कारणों पर प्रकाश डाल रहे हैं –

  1. शासन को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए – प्रत्येक राज्य को न्याय, कानून की व्यवस्था, औधोगिक प्रगति, व्यवसायिक विकास, स्वास्थ्य तथा मनोरंजन आदि सभी क्षेत्रों में विभिन्न योग्यताओं के कर्मचारियों की आवशयकता पड़ती है।इन विभिन्न क्षेत्रों में करने वाले योग्य कर्मचारियों का निर्माण केवल शिक्षा के द्वारा हो सकता है।वर्तमान युग में जो राज्य अपनी जनता को जितनी अधिक शैक्षिक सुविधायें दे रहा है, वह विभिन्न क्षेत्रों में उतना ही अधिक विकसित हो रहा है।
  2. संस्कृति तथा सभ्यता की रक्षा – प्रत्येक राज्य की अलग-अलग संस्कृति तथा सभ्यता होती है।इस संस्कृति एवं सभ्यता से राज्य की जनता को अगाध प्रेम होता है।इस प्रेम के वशीभूत होकर समस्त जनता एकता के सूत्र में बंधी रहती है।प्रत्येक राज्य इस एकता को बनाये रखने के लिए अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करना चाहता है, जो केवल शिक्षा के ही द्वारा सम्भव है।
  3. जनहित- प्रत्येक राज्य अपनी सरकार द्वारा जनता से कर वसूल करता है।इसको वह जनता के ही हित में खर्च करना चाहता है।जनता के हित का तात्पर्य है जनता के रहन-सहन तथा संस्कृति एवं सभ्यता को ऊँचे स्तर तक उठाना।इस कार्य को केवल शिक्षा के ही द्वारा पूरा किया जा सकता है।इसलिए प्रत्येक राज्य अपनी जनता को अधिक से अधिक जागरूक करने के लिए प्राप्त किये हुए कर की निश्चित धनराशी को शिक्षा की उचित व्यवस्था के करने में अवश्य व्यय करता है।
  4. योग्य नागरिकों का निर्माण – प्रत्येक राज्य की प्रगति ऐसे नागरिकों पर निर्भर करती है जो प्रतेक समस्या को स्वतंत्र रूप से चिन्तन करके आसानी से सुलझा सकें।ऐसे सुयोग्य, सचरित्र तथा सुनिश्चित नागरिकों का निर्माण केवल शिक्षा के ही द्वारा किया जा सकता है।इस दृष्टि से प्रत्येक राज्य शिक्षा की अच्छी से अच्छी व्यवस्था करना अपना परम कर्त्तव्य समझता है।
  5. अपनी स्वयं की प्रगति के लिए – प्रत्येक राज्य अन्य राज्यों से अधिक प्रगति करना चाहता है।परन्तु राज्य की प्रगति उसके नागरिकों पर निर्भर करती है।जिस राज्य के नागरिक जितने आधिक शिक्षित होंगे वह राज्य विभिन्न क्षत्रों में उतना ही अधिक प्रगतिशील होता चला जायेगा।इस दृष्टि से प्रत्येक राज्य अपने नागरिकों को अधिक से अधिक शिक्षित करने के लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा की व्यवस्था करता है।जैसे –जैसे नागरिक शिक्षित होते जाते हैं, वैसे-वैसे राज्य भी प्रगतिशील होता चला जाता है
  6. जनता में विचारधारा का प्रसार – प्रत्येक राज्य में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक विचारधारायें अलग-अलग होती है।राज्य इन विचारधाराओं को जनता तक पहुंचना चाहता है।केवल शिक्षा ही ऐसा साधन है जिसके द्वारा कोई भी राज्य अपने विचारों को अपनी जनता तक पहुंचा सकता है।अत: प्रत्येक राज्य का शिक्षा से घनिष्ट सम्बन्ध होता है।

शिक्षा में राज्य के हस्तक्षेप का क्रमिक विकास

समाज की उन्नति के लिए शिक्षा परमावश्यक है।इसीलिए प्रत्येक समाज में शिक्षा की व्यवस्था करना प्राचीन युग से ही एक महत्वपूर्ण कार्य समझा गया है।शिक्षा के कार्य को निम्नलिखित साधनों में से किसी एक अथवा सभी के द्वारा संचालित किया जा सकता है –

  1. स्वलाभ के लिए।
  2. दान तथा धार्मिक संस्थाओं द्वारा।
  3. राज्य द्वारा।

प्राचीन युग में मानव ने शिक्षा की व्यवस्था अपने लाभ के लिए अपनी इच्छा से की थी। उस समय राज्य की शिक्षा से कोई सम्बन्ध नहीं था। मध्य युग में शिक्षा व्यवस्था दान तथा धार्मिक संस्थाओं के द्वारा हुई। इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि प्रत्येक धार्मिक संस्था ने शिक्षा के क्षेत्र में राज्य के हस्तक्षेप का डटकर विरोध किया। परन्तु जैसे-जैसे मानव में विवेक बढ़ता गया, वैसे-वैसे वह शिक्षा में राज्य ने शिक्षा के कार्य में सत्रहवीं शताब्दी में हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया।शैने-शैने: उन्निसवीं शताब्दी तक शिक्षा पर पूर्ण नियंत्रण हो गया।

ध्यान देने की बात है की जहाँ एक ओर भारत में राज्य का शिक्षा से कोई सम्बन्ध नहीं था अथवा एथेन्स की सरकार ने भी हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई थी,वहीं दूसरी ओर स्पार्टा की शिक्षा पर राज्य का पूर्ण अधिकार था। मध्य युग में शिक्षा धार्मिक संस्थाओं के अधीन ही रही,परन्तु आगे चलकर जर्मनी के फिस्टे तथा हीगल आदि शिक्षा-शास्त्रीयों ने इस बात पर बल दिया कि शिक्षा पर राज्य का पूर्ण अधिकार होना चाहिये।इन विद्वानों की विचारधारा से प्रभावित होते हुए जर्मनी में शिक्षा केन्द्रीयकरण चरम सीमा तक पहुँच गया।इस प्रकार समय के साथ-साथ होने वाले परिवर्तनों तथा जनता की बढ़ती मांगों ने यह शिद्ध कर दिया कि जनसाधारण को शिक्षित करने का कार्य सिवाय राज्य के और कोई व्यक्तिगत, सार्वजनिक तथा धार्मिक संस्था नहीं कर सकती।इसलिए वर्तमान युग में अब राज्य से यह आशा की जाती है कि वह सुरक्षा, भोजन तथा निवास स्थान के साथ-साथ जनसाधारण की शिक्षा का भी उचित प्रबन्ध करे।

भारत में राज्य और शिक्षा के सम्बन्ध का इतिहास

  1. वैदिक काल- वैदिक काल में राज्य का शिक्षा से कोई सम्बन्ध नहीं था।उस युग में शिक्षा केवल महामुनियों तथा तपस्वियों के व्यक्तिगत प्रयासों द्वारा ही संचालित होती थी।उन मुनियों तथा तपस्वियों के गुरुकुल में रहते हुए ही बालकों को हर प्रकार की शिक्षा मिल जाती थी।उस समय गुरु तथा शिष्य के सम्बन्ध इतने स्नेहपूर्ण होते थे कि शिष्य अपने गुरु की हर प्रकार से सेवा करते थे तथा गुरु अपने शिष्यों के लिए प्रत्येक सुविधा को जुटाना अपना परम कर्त्तव्य समझते थे।चूँकि वैदिक काल में शिक्षा न तो आधुनिक शिक्षा की भांति इतनी महंगी ही थी और न ही इसको रोटी कमाने का साधन माना जाता था।इसलिए न तो गुरुकुलों को ही अपने अस्तित्व के लिए किसी आर्थिक अनुदान की आवशयकता थी और न ही राज्य का उन पर कोई नियंत्रण था।धयान देने की बात यह है कि यधपि वैदिक कालीन शिक्षा राज्य के नियंत्रण से पूर्णत: मुक्त थी, पर इसका यह अर्थ नहीं समझ लेना चाहिये की राज्य का उस युग की शिक्षा से कोई सम्बन्ध ही नहीं था।इस बात में दो मत नहीं हो सकते कि वैदिक कालीन शिक्षा व्यक्तिगत प्रयासों का फल होती थी पर राज्य भी उसके प्रसार में कुछ न कुछ योग अवश्य देता था।यही कारण है कि उस युग की शिक्षा भी ऐसे योग्य एवं कर्मठ नागरिकों का निर्माण करती थी जो आज की भांति राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में सफलतापूर्वक कार्य करते थे।
  2. ब्राह्मण काल- ब्राह्मण काल में भी शिक्षा वैदिक काल की भांति व्यक्तिगत प्रयासों के फल द्वारा ही संचालित होती रही।राजा का उस पर कोई नियंत्रण नहीं था।तक्षशिला ब्राह्मण काल की प्रसिद्ध शैक्षिक संस्था थी।उसमें विभिन्न राज्यों से छात्रवृतियां लेकर विद्यार्थी आते थे तथा विभिन्न क्षेत्रों में योग्यता प्राप्त करके अपने-अपने राज्यों को लौट जाते थे।विभिन्न राज्यों से आये हुए इन विद्धयार्थीयों द्वारा लाई गई छात्रवृतियां गुरु की जीविका होती थी।इस प्रकार ब्राह्मण काल में विशेष परिवर्तन यह हो गया कि शिक्षा वैदिक काल की भांति एक पावन कर्तव्य न हो कर गुरुओं का व्यवसाय बन गई।
  3. बौद्ध काल- वैदिक एवं ब्राह्मण कालीन व्यक्तिगत शिक्षा संस्थाएं बौद्ध काल में आज की भांति सार्वजनिक संस्थाएं बन गयी।इन संस्थानों में नालन्दा, बल्लभी, विक्रमशिला तथा नदिया आदि प्रसिद्ध संस्थाएं थी।इन सार्वजनिक संस्थाओं की व्यवस्था व्यक्तिगत न हो कर समितियों द्वारा होने लगी।ध्यान देने की बात है कि यधपि बौद्ध काल में शैक्षिक संस्थाओं का निर्माण में राज्य का उतरदायित्व तो अवश्य हो गया, परन्तु राजनीति की दुर्गन्ध ने शिक्षा के वातावरण को आज की भांति विषैला नहीं बनाया अपितु यह वैसा ही पवित्र बना रहा जैसा वैदिक काल तथा ब्राह्मण काल में था।बौद्ध काल की प्रत्येक शिक्षा संस्था अपने प्रशासन एवं आतंरिक मामलों को सुलझाने के लिए पूर्णरूपेण स्वतंत्र रही।इस प्रकार वैदिक काल के गुरुकुलों ने ब्राह्मण काल में परिवरों का रूप धारण किया तथा बौद्ध काल में धार्मिक संस्थाएं बन गयी।
  4. मुस्लिम काल – मुस्लिम शासक भारत में इस्लाम धर्म का प्रचार करना चाहते थे।अत: उन्होंने शिक्षा के माध्यम से अपने धर्म का प्रचार किया।इससे शैक्षिक संस्थाओं की पवित्रता, स्वायतता तथा स्वतंत्रता समाप्त हो गई एवं वे राजनीतिक के हाथों खिलौना बन गई।
  5. अंग्रेजी शासन काल – अंग्रेजों के समय में पहले तो ईस्ट-इंडिया कंपनी शिक्षा के प्रति उदासीन रही, परन्तु कुछ भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों के अनुरोध पर सन 1813 ई० के आज्ञा-पत्र के अनुसार कम्पनी सरकार ने शिक्षा के उतरदायित्व को स्वीकार कर लिया।22 वर्ष तक निरन्तर प्राच्य-पाश्चात्य शिक्षा का वाद-विवाद चलता रहा।लार्ड मैकाले ने भारत में अंग्रेजी शासन की जड़ों को जमाना चाहा।अत: उसने अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन करते हुए कहा – “ एक अच्छे योरोपीय पुस्तकालय की अलमारी भारत तथा अरब के सम्पूर्ण पुस्तकालय के बराबर है।” लार्ड विलियम बैंटिक भी अंग्रेजों का पहले से ही पक्षपाती था।अत: उसने 7 मार्च सन 1835 ई० के आज्ञा पत्र में लार्ड मैकाले की शिक्षा सम्बन्धी नीति को स्वीकृति प्रदान कर दी।इस नीति का स्पष्टीकरण हो जाने से शिक्षा का उद्देश्य साधन तथा माध्यम निश्चित कर दिया गया।सन 1854 ई० के वुड-डिस्पैच ने सरकार को शिक्षा की व्यवस्था के लिए शिक्षा विभाग तथा उसके अधिकारिओं की नियुक्ति करने का सुझाव प्रस्तुत किया।सन 1882 ई० में हन्टर आयोग ने सरकार को परामर्श दिया कि वह अपनी ओर से आदर्श स्कूल खोले तथा जनता को आर्थिक सहायता देकर अधिक से अधिक स्कूलों को खोलने के लिए प्रेरित करे।इस प्रकार जहाँ एक ओर सरकारी स्कूल, कॉलिज, विश्वविधालय तथा तकनीकी एवं चिकित्सा सम्बन्धी शिक्षा संस्थाएं सरकार की ओर से खुलने लगी वहाँ दूसरी ओर सरकार द्वारा दी गई आर्थिक सहायता के आधार पर जनता द्वारा भी अनके शैक्षिक संस्थाएं खुलने लगी।यही नहीं, इन सभी शैक्षिक संस्थाओं की देखभाल तथा निरीक्षण एवं सुव्यवस्था के लिए जिला कमिश्नरी तथा प्रांतीय स्तर पर शिक्षा के विभागों एवं कार्यालयों की स्थापना भी हो गई।
  6. आधुनिक काल – 15 अगस्त, सन 1947 को भारत अंग्रेजों के नियंत्रण से मुक्त हो गया।अब हम स्वतन्त्र नागरिक होने के नाते अपनी सरकार का निर्माण स्वयं ही करते हैं।चूँकि राज्य की प्रगति नागरिकों पर और नागरिकों की उन्नति शिक्षा पर निर्भर करती है, इसलिए शिक्षा को सुदृढ़ बनाने के लिए हमारा राज्य अब हर सम्भव प्रयास कर रहा है।

राज्य पर शिक्षा का प्रभाव

प्रत्येक राज्य की राजनीतिक व्यवस्था तथा रहन-सहन, संस्कृति तथा सभ्यता, व्यवसाय तथा उद्योग आवश्यकताओं तथा समस्यायें एक-दूसरे से अलग-अलग होती है। जिस राज्य में जैसी राजनीति व्यवस्था तथा रहन-सहन, संस्कृति तथा सभ्यता, व्यवसाय तथा उधोग एवं आवश्यकतायें तथा समस्यायें होती हैं, वहाँ की शिक्षा को किसी न किसी रूप में अवश्य प्रभावित करता है।निम्नलिखित पंक्तियों में हम राज्य द्वारा शिक्षा पर पड़ने वाले अनेक प्रभावों की चर्चा कर रहे हैं –

  1. राज्य तथा शिक्षा के उद्देश्य – शिक्षा के उद्देश्यों पर राज्य की आवश्यकताओं तथा समस्याओं का गहरा प्रभाव पड़ता है।जो राज्य आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए होते हैं उन्हें आर्थिक आवश्यकतायें और समस्यायें सदैव बादल की भांति घेरे रहती है।अत: उन राज्यों में सर्वप्रथम शिक्षा के व्यवसायिक उद्देश्य पर बल दिया जाता है।आवश्यकताओं तथा समस्याओं के अतिरिक्त राज्य की संस्कृति तथा सभ्यता भी शिक्षा के उदेश्यों को प्रभावित करती है।यही कारण है कि भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों पर सदैव आदर्शवाद की छाप लगी रहती है।यही नहीं, राजनीतिक व्यवस्था का भी शिक्षा के उद्देश्यों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।इसलिए जनतांत्रिक तथा एक्तान्त्रिक राज्यों की शिक्षा का उद्देश्यों में आकाश और पाताल का अन्तर होता है।
  2. राज्य और शिक्षा का पाठ्यक्रम – जिस प्रकार शिक्षा के उद्देश्यों पर राज्य की आवश्यकताओं तथा समस्याओं, संस्कृति तथा सभ्यता, राजनीतिक व्यवस्था तथा रहन-सहन एवं आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति का प्रभाव पड़ता है, उसी प्रकार शिक्षा का पाठ्यक्रम भी इन सबसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।यही कारण है कि जिस राज्य की जैसे आवश्यकतायें तथा समस्यायें होती है, उस राज्य के पाठ्यक्रम में उन्हीं विषयों को सम्मिलित किया जाता है जिसकी राज्य को आवश्यकता होती है।राज्य की संस्कृति एवं सभ्यता भी पाठ्यक्रम की आधारशिला होती है।साथ ही राज्य की आर्थिक, सामाजिक स्थिति एवं उधोगों और व्यवसायों का भी पाठ्यक्रम के उपर सीधा प्रभाव पड़ता है।इसलिए प्रत्येक राज्य शिक्षा के पाठ्यक्रम में उसी व्यवसाय को प्राथमिकता देता है जो उसका मूल व्यवसाय होता है।
  3. राज्य और शिक्षण पद्धति – प्रत्येक राज्य की शिक्षण पद्धति पर वहाँ की ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक परम्परा का गहरा प्रभाव पड़ता है।इसीलिए हमारे यहाँ की शिक्षण-पद्धति पाश्चात्य देशों की शिक्षण-पद्धतियों से भिन्न है।ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक परम्परा के साथ-साथ राज्य की राजनीतिक व्यवस्था भी शिक्षण-पद्धतियों को अवश्य प्रभावित करती है।यही कारण है कि बाल-केन्द्रित शिक्षा-पद्धति केवल जनतांत्रिक व्यवस्था वाले राज्यों में ही पाई जाती है, एकतंत्रवादी  व्यवस्था वाले राज्यों में नहीं।शिक्षण-पद्धति पर राज्य की आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियों का भी गहरा प्रभाव पड़ता है।इसीलिए आर्थिक दृष्टि से सुसम्पन्न राज्यों में मंहगी शिक्षण-पद्धतियां पाई जाती है तथा पिछड़े हुए राज्यों में सस्ती अर्थात केवल “पुस्तक”।
  4. राज्य और स्कूल – स्कूल राज्य का प्रतिबिम्ब होता है।इसीलिए प्रत्येक राज्य की वास्तविक स्थिति का पाता वहाँ के स्कूलों को देखकर आसानी से लगया जा सकता है।जो राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण होते हैं, वहाँ के स्कूलों की आर्थिक दशा भी संतोषजनक होती है।परिणामस्वरूप वहाँ के स्कूलों को आधुनिक रूप देने में कोई कठिनाई नहीं होती है।इसके विपरीत जिन राज्यों को आर्थिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, वहाँ के स्कूल निर्धन ही होते हैं।उनको आधुनिक रूप देना कोरी कल्पना है।
  5. राज्य और शिक्षा का प्रशासन – वर्त्तमान युग में शिक्षा भी राज्य के प्रशासन का एक महत्वपूर्ण अंग है।अत: जिस राज्य का राजनीतिक प्रशासन जैसा होता है, वहाँ की शिक्षा का प्रशासन भी वैसा ही होता है।यही कारण है की एकतान्त्रिक राज्यों में शिक्षा को केन्द्रित कर दिया जाता है तथा जनतांत्रिक राज्यों में विकेन्द्रित।दुसरे शब्दों में, एकतान्त्रिक राज्यों में शिक्षा का भार केवल एह ही व्यक्ति विशेष के हाथ में केन्द्रित हो जाता है तथा जनतांत्रिक राज्यों में शिक्षा के उतरदायित्व को राज्यों तथा स्थानीय संस्थाओं में विकेन्द्रित कर दिया जाता है।
  6. राज्य और अनुशासन – जिस राज्य में जैसी राजनीतिक व्यवस्था होती है, उसका प्रभाव वहां के स्कूलों के अनुशासन पर भी वैसा ही पड़ता है।जनतांत्रिक शासन-व्यवस्था में प्रत्येक बालक को उसकी रुचियों, रुझानों तथा योग्यताओं एवं क्षमताओं के अनुसार विकसित होने के अवसर प्रदान किये जाते हैं।परन्तु एकतान्त्रिक शासन-व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गला घोंटकर दमन की नीति पर बल दिया जाता है।इस प्रकार जनतांत्रिक राज्यों में बालक की स्वतंत्रता पर बल दिया जाता है तथा एकतान्त्रिक राज्यों में दमन पर।

राज्यों तथा शिक्षा के सम्बन्ध के विषय में दो मत

शिक्षा पर राज्य का अधिकार होना चाहिये अथवा नहीं इस विषय के सम्बन्ध में निम्नलिखित दो मत है –

  1. व्यक्तिवाद - लॉक, मिल तथा बेन्थम आदि व्यक्तिवादियों का अखण्ड विश्वास है कि राज्य का कार्य केवल नागरिकों की रक्षा करना है।उनका मत है कि राज्य को शिक्षा के क्षेत्र में किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप अथवा नियंत्रण नहीं करना चाहिये।इस मत को राज्य की लेजिजफेयर विचारधारा कहते हैं।इस विचारधारा का आशय यह है कि यधपि व्यक्ति ने कुछ निश्चित उद्देश्यों के लिए समाज के अनुशासन को अवश्य स्वीकार किया है , परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि उसने अपनी सम्पूर्ण स्वतंत्रता को समाज के अधीन कर दिया है।अब भी ऐसे अनेक कार्य हैं जिनको करने के लिए व्यक्ति पूर्णरूपेण समर्थक शिक्षा पर राज्य के हस्तक्षेप अथवा नियंत्रण की घोर निंदा करते हैं।उनके अनुसार यदि राज्य ने शिक्षा पर किसी प्रकार का कोई भी नियंत्रण किया तो इसके अनके कुपरिणाम हो सकते हैं।

शिक्षा पर राज्य का नियंत्रण तथा उसके दोष

शिक्षा पर राज्य द्वारा नियंत्रण की निम्नलिखित हानियाँ हो सकती है –

  1. शिक्षा में राजनीति का प्रवेश हो जायेगा।इससे शिक्षा की योजनाओं के निर्माण में केवल शासक वर्ग का हाथ होगा।
  2. शिक्षा जनहित का साधन न होकर केवल राजा के स्वार्थ तथा संकुचित आदर्शों को प्रसारित करने का साधन बन जायेगी।इससे बालक का सर्वांगीण विकास कुण्ठित हो जायेगा।स्पार्टा राज्य की शिक्षा इस सम्बन्ध में ज्वलंत उदाहरण है।स्पार्टा में शिक्षा पर नियंत्रण हो जाने से केवल शारीरिक विकास पर ही बल दिया जाता था, सर्वांगीण पर नहीं।
  3. शासक वर्ग ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति करेगा जिनको राज्य के प्रति अपार भक्ति एवं श्रद्धा हो तथा जो बालकों को राज्य की नीति के अनुसार एक से सांचे में डाल सके।
  4. शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य और महत्व ही समाप्त हो जायेगा।
  5. शिक्षा का सच्चा लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकेगा।
  6. बालकों को उनकी रुचियों, क्षमताओं तथा योग्यताओं के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने के अवसर नहीं मिलेंगे।इससे अमनोवैज्ञानिक प्रवृति एवं दमन को प्रोत्साहन मिलेगा।
  7. परिवार अपने मूल अधिकार से वंचित हो जायेगा।
  8. स्वतंत्रता तथा समानता के अधिकार समाप्त हो जायेंगे।जनतंत्र में ये दोनों अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त होते हैं। राज्य के द्वारा शिक्षा पर नियंत्रण करने से ये दोनों अधिकारों छीन जायेंगे।यह जनतंत्र की भावना के विरुद्ध है।
  9. ऐसी नियंत्रण शिक्षा से केवल नौकर ही तैयार हो सकते हैं, स्वतंत्र मनोवृति वाले सुयोग्य एवं सचरित्र नागरिक नहीं।ज्ञान को मानव कल्याण की अपेक्षा केवल राज्य हित के लिए ही प्रयोग किया जायेगा।इससे वैज्ञानिक प्रगति रुक जायेगी तथा बालकों में अनेक नकारात्मक मूल्यों का विकास हो जायेगा।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि व्यतिवादियों के अनुसार राज्य के क्षेत्र में राज्य का नियंत्रण व्यक्ति के विकास को कुण्ठित कर देगा। अत: राज्य का शिक्षा पर किसी प्रकार का कोई भी नियंत्रण नहीं होना चाहिये।व्यक्तिवादी विचारक जे० ऐसी० मिल ने शिक्षा के क्षेत्र में लेज़िजफेयर की विचारधारा पर बल देते हुए बताया कि व्यक्ति शुद्ध एवं पवित्र है।उसकी स्वतंत्रता पर राज्य का हस्तक्षेप न आवशयक है और न वांछनीय।मिल के ही शब्दों में - “व्यक्ति को अपने विकास के लिए स्वतंत्रता का पूर्ण अधिकार है।अपने शारीर एवं मस्तिष्क के लिए व्यक्ति सर्वोतम शक्तियुक्त है “।

समष्टिवाद- व्यक्तिवादी विचारधारा के विपरीत समष्टिवादी विचारधारा है।मैथ्यू आर्नोल्ड, कालार्यल एवं रस्किन आदि इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक हैं।इन विचारों का मत है कि राज्य का कार्य केवल नागरिकों की आतंरिक एवं बाह्य रक्षा करना ही नहीं है अपितु व्यक्ति और समाज के हित को दृष्टि में रखते हुए एक सभ्य राज्य के अनके कार्य है।इन कार्यों में से जहाँ एक ओर नागरिकों की रक्षा करना पर राष्ट्र नीति का संचालन करना क्र लगाना, धनवानों तथा निर्धनों के बीच सम्पति के वितरण की व्यवस्था करना देश की सम्पत्ति को बढ़ाना, अपराधियों को दण्ड देना, नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना, संस्कृति का उत्थान करना तथा आवास-प्रवास की व्यवस्था करना आदि राज्य के मुख्य कार्य हैं वहाँ दूसरी ओर शिक्षा की व्यवस्था करना भी राज्य का महत्वपूर्ण कार्य है।चूँकि राज्य की उन्नति सुयोग्य, सुशिक्षित तथा सचरित्र नागरिकों पर निर्भर करती है, इसलिए मैथ्यू आर्नोल्ड जैसे प्रसिद्ध समष्टिवादियों ने तो उच्च शिक्षा की व्यवस्था केवल राज्य को ही सौंपी होती है।इसी प्रकार कार्यालय तथा रस्किन ने भी लेज़िजफेयर की विचारधारा का बलपूर्वक खण्डन करते हुए बताया कि राज्य को शिक्षा पर नियंत्रण रखने का पूर्ण अधिकार है।अत: समष्टिवादियों का अखण्ड विश्वास है की राज्य को अन्य कार्यों के साथ-साथ शिक्षा की भी व्यवस्था करनी चाहिये।उनका मत है कि यदि शिक्षा पर राज्य का नियंत्रण हो जायेगा तो इससे अनेकों लाभ होंगे।

शिक्षा पर राज्य का नियंत्रण तथा उसके लाभ

शिक्षा पर राज्य द्वारा नियंत्रण के निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं –

  1. शिक्षा पर नियंत्रण हो जाने से राज्य के सभी बालकों के लिए एक निश्चित स्तर तक सार्वभौमिक, अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था हो जायेगी।
  2. निश्चित स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने से बालकों में सामाजिक चेतना जागृत होगी जिससे वे सुयोग्य, सुशिक्षित तथा सचरित्र नागरिक बन सकेंगे।
  3. राज्य द्वारा प्रदान की गई शिक्षा अन्य साधनों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती है।
  4. प्रत्येक बालक की शिक्षा एकरूप हो जायेगी।व्यक्तिगत शिक्षा में समानता की अवहेलना होती है तथा इसका अध्यापन भी निम्नकोटि का होता है।
  5. राष्ट्रीय शिक्षा की योजना पूरी हो जायेगी।

उपर्युक्त पंक्तिओं से स्पष्ट हो जाता है समष्टिवादियों के अनुसार शिक्षा पर राज्य का पूर्ण नियंत्रण होने से अनके लाभ हो सकते हैं।इसलिए रूस के प्रसिद्ध विचारक पिन्कविच ने लिखा है “ सार्वजनिक शिक्षा, जिसका उद्देश्य भावी नागरिकों को सुधारना एक शक्तिशाली यंत्र है, जिसे राज्य अन्य साधनों को नहीं दे सकता।”

मध्य मार्ग – व्यक्तिवादी तथा समष्टिवादी दोनों विचारधारायें अपने-अपने उग्र सिधान्तों का प्रतिपादन करती है।आधुनिक शिक्षा शास्त्री न तो व्यक्तिवादियों की भांति पूर्ण लेज़िजफेयर की विचारधारा को ही अच्छा समझते हैं और नी ही समष्टिवादियों की भांति शिक्षा पर राज्य के पूर्ण नियंत्रण को स्वीकार करते हैं।वे शिक्षा में लेज़िजफेयर की विचारधारा तथा पूर्ण नियंत्रण के मध्य मार्ग को अपनाना चाहते हैं।उनका मत है कि शिक्षा का कार्य इतना महत्वपूर्ण है कि इसकी संचालन में शिक्षा सभी साधनों का सहयोग परमावश्यक है।राज्य की शिक्षा का एक महत्वपूर्ण साधन अवश्य है, परन्तु एकमात्र साधन नहीं।इस दृष्टि से राज्य को न तो अपने नागरिकों की शिक्षा से विमुख ही होना चाहिये और न ही उस पर पूर्ण नियंत्रण कर लेना चाहिये अपितु परिवार, समुदाय तथा धर्म आदि सभी साधनों के साथ मिल-जुल कर कार्य करना चाहिये।इस प्रकार जहाँ एक ओर परिवार, समुदाय तथा धर्म आदि संस्थाएं बालक की शिक्षा में स्वतंत्रता पूर्वक अपना योगदान दें, वहाँ दूसरी ओर राज्य की भी अपनी समीति हस्तक्षेप की नीति के द्वारा शिक्षा के निम्नतम स्तरों को निर्धारित करके समय-समय पर उचित मार्गदर्शन एवं निरिक्षण करना चाहिये।रेमान्ट ने राज्य के शिक्षा सम्बन्धी कार्यों का वर्णन करते हुए बड़े सुन्दर ढंग से लिखा है – “ राज्य का कार्य व्यक्ति अथवा परिवार का स्थान ले लेना अथवा उनका शोषण करना नहीं है, अपितु उनकी रक्षा करना है।शिक्षा के क्षेत्र में परिवार तथा धर्म संस्था के अधिकारों की रक्षा करना राज्य का कर्त्तव्य है।इसे प्रकार माता-पिता की योग्यता, शक्तिहीनता अथवा अन्य किसी कारणवश जो शिक्षा के कमियाँ आ जाती है उनको ठीक करना तथा तर्क एवं विश्वासों के अनुकूल समस्त सामाजिक बाधाओं को दूर करके उनकी नैतिकता एवं धार्मिक शिक्षा की संरक्षा करना भी राज्य का ही काम है।ये देखना तथा इस बात की मांग करना की प्रत्येक व्यक्ति अपने नागरिक व राष्ट्रीय कर्तव्यों को भली-भांति समझने तथा बौद्धिक व नैतिक संस्कृति के मिश्रित स्तर को प्राप्त करे, राज्य का कर्त्तव्य है।“

शिक्षा में राज्य द्वारा नियंत्रण की सीमा

उपर्युक्त विवरण से हो जाता है कि शिक्षा के क्षेत्र में राज्य का हस्तक्षेप अथवा नियंत्रण परमावश्यक है।अब यह देखन है कि शिक्षा का समस्त भार केन्द्रीय शासन पर होना चाहिये अथवा राज्य सरकारों एवं स्थानीय स्वशासन पर।यह बात राज्य के रूप पर निर्भर करती है।मुख्यतः राज्य के निम्नलिखित दो रूप होते हैं –

  1. एकतंत्रात्मक राज्य
  2. जनतंत्रात्मक राज्य

एकतंत्रात्मक राज्य – एकतंत्रात्मक राज्य के समर्थकों का विश्वास है कि राज्य एक सर्शक्तिमान तथा सर्वश्रेष्ठ सत्ता है, जो अपने निर्माण कर्ताओं से उच्च एवं श्रेष्ट भौतिक अस्तित्व रखती है।अत: उनके अनुसार राज्य को प्रत्येक व्यक्ति पर नियंत्रण रखने का पूर्ण अधिकार है।उसका मत है कि चूँकि राज्य का अस्तित्व सुयोग्य, सुशिक्षित तथा सचरित्र नागरिकों पर निर्भर करता है, इसलिए समस्त शिक्षा अथवा संस्थाओं पर राज्य का पूर्ण नियंत्रण होना चाहिये।इस दृष्टि से

एकतंत्रात्मक राज्य में शिक्षा का लक्ष्य जनहित की अपेक्षा राज्य के हित को दृष्टि में रखते हुए निर्धारित किया जाता है तथा सम्पूर्ण शिक्षा को केन्द्रित कर दिया जाता है।इससे शिक्षा में एकरूपता तथा जड़ता आ जाती है।परिणामस्वरूप व्यक्ति का विकास कुण्ठित हो जाता है।स्पार्टा राज्य में शिक्षा की ऐसी व्यवस्था थी।ऐसी शिक्षा को न जनतांत्रिक ही कहा जा सकता है और न मनोवैज्ञानिक।संक्षेप में, एकतंत्रात्मक राज्य शिक्षा के समाजीकरण पर बल देता है।ऐसे राज्य में शिक्षा केवल राज्य की नीति एवं आदर्शों को प्रसारित करने का एक साधन मात्र बन जाती है।

जनतांत्रिक राज्य- जनतांत्रिक राज्य की अपनी निजी शक्तियाँ सीमित होती है।ऐसा राज्य अपनी शक्ति की अपने निर्माणकर्ता के विकेन्द्रित कर देता है जिससे व्यक्ति तथा समाज दोनों की अधिक से अधिक उन्नति होती रहे।इस दृष्टि से जनतांत्रिक शासन-व्यवस्था के अन्तर्गत शिक्षा के समस्त कार्यों को नागरिकों के हित के लिए नागरिकों पर ही छोड़ दिया जाता है।राज्य तो केवल शिक्षा के विकास हेतु अधिक से अधिक सुविधायें देता है।इस प्रकार जनतांत्रिक राज्य में शिक्षा की व्यवस्था स्वतंत्रता, समानता तथा भ्रातृत्व एवं आपसी समझौते का सिद्धांतों पर आधारित होती है तथा प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के यथाशक्ति शिक्षा प्राप्त करने के लिए अधिक से अधिक विकास की और अग्रसर होते रहते हैं।संक्षेप में साधन हैं, स्वयं साध्य नहीं।भारत भी एक जनतात्रिक राज्य है।यहाँ भी शिक्षा को विकेन्द्रित कर दिया गया है।कोठारी कमीशन केक अनुसार भारत की शिक्षा राज्य सरकारों का उतरदायित्व है, परन्तु राष्ट्र का विषय भी है।ऐसी दशा में शिक्षा को केन्द्र तथा राज्य सरकारों की साझेदारी समझना चाहिये।

शिक्षा संस्था के रूप में राज्य के कार्य

एकतंत्र में शिक्षा केवल राज्य हित पर बल देती है।इससे सम्पूर्ण शिक्षा केवल राज्य के हाथ का खिलौना बन जाती है।इसके विपरीत जनतंत्र में जनहित पर बल दिया जाता है।इससे व्यक्ति तथा राज्य दोनों का अधिक से अधिक विकास होता है।चूँकि वर्तमान युग जनतंत्र का युग है, इसलिए जनहित के लिए शिक्षा को केन्द्रित न करके विकेन्द्रित करना ही उचित समझा जाता है।निम्नलिखित पंक्तियों में हम जनतांत्रिक व्यवस्था में राज्य के शिक्षा सम्बन्धी प्रमुख कार्यों पर प्रकाश डाल रहे हैं –

  1. राष्ट्रीय शिक्षा की योजना का निर्माण – जनतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा राज्य की आत्मा होती है।प्रत्येक राज्य उच्च-कोटि के शिक्षाशास्त्रियों, दार्शनिकों एवं शिक्षा-मंत्रियों के परामर्श से अपनी तथा अपने निर्माणकर्ताओं की आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए सर्वप्रथम राष्ट्रीय शिक्षा की योजना तैयार करता है।यह योजना राज्य की संस्कृति का प्रतिक होती है।इसमे सांस्कृतिक, सामाजिक तथा दार्शनिक तत्वों की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है।राष्ट्रीय शिक्षा की योजना के तैयार हो जाने पर उसे इस प्रकार से संचालित किया जाता है कि जाती-पाती, रंग-रूप, लिंग एवं आर्थिक स्थिति से उपर उठकर प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा ग्रहण करने के समान अवसर प्राप्त हो जायें।
  2. नागरिकता का प्रशिक्षण – राज्य की प्रगति सुयोग्य, सचरित्र, एवं सुशिक्षित नागरिकों पर निर्भर करती है।अत: प्रत्येक राज्य का मुख्य कार्य अपनी जनता को नागरिकता के प्रशिक्षण की व्यवस्था करना है।नागरिकता का यह प्रशिक्षण अग्रलिखित चार प्रकार का होता है –
  • राजनैतिक प्रशिक्षण – प्रत्येक राज्य की अपनी निजी राजनीतिक विचारधारा होती है।इस विचारधारा का ज्ञान होना प्रत्येक नागरिक के लिए परमावश्यक है।यही कारण है कि आधुनिक युग में प्रत्येक राज्य नि:शुल्क फिल्म शो, सेना का प्रदर्शन तथा रेडियो प्रसारण की सहायता से अपनी जनता को राजनीतिक प्रशिक्षण के अधिक से अधिक अवसर प्रदान करता है।
  • सामाजिक प्रशिक्षण – राज्य के मानसिक स्तर का मुल्यांकन केवल उसके विचारों से ही नहीं किया जाता अपितु उसकी जनता के सामाजिक स्तरों एं सामाजिक परम्पराओं से किया जाता है।इस दृष्टि से प्रत्येक राज्य अपनी जनता के विकास हेतु न्यूनतम सामाजिक स्तर को निश्चित करता है तथा बालक एवं बालिकाओं के सामने इस प्रकार के सामाजिक वातावरण को प्रस्तुत करता है जिसमें रहते हुए उन्हें सामाजिक सम्पर्क तथा समाज सेवा अधिक से अधिक अवसर मिलते रहे।
  • सांस्कृतिक प्रशिक्षण – अपनी सांस्कृतिक  सम्पत्ति को सुरक्षति रखना प्रत्येक राज्य का प्रमुख कार्य है।इस दृष्टि से प्रत्येक राज्य चित्रशालाओं, संग्रहालयों, प्रदर्शनियों, मनोरंजन हालों तथा क्लबों एवं सांस्कृतिक समुदायों आदि को स्थापित करता है तथा सामुदायिक केन्द्रों, सांस्कृतिक मण्डलों एवं सांस्कृतिक भ्रमणों को आर्थिक सहायता देकर प्रोत्साहित करता है।वर्तमान युग में लगभग सभी जनतांत्रिक राज्य अपनी-अपनी जनता में सांस्कृतिक जागरूकता विकसित करने के लिए अधिक से अधिक प्रयास कर रहें हैं।
  • आर्थिक प्रशिक्षण – राज्य की प्रगति नागरिकों के वैज्ञानिक एवं आर्थिक प्रशिक्षण पर निर्भर करती है।इस दृष्टि से प्रत्येक राज्य विज्ञानं तथा उधोगों से सम्बन्ध में प्रशिक्षण देने की यथाशक्ति व्यवस्था करता है।

३. स्कूलों की व्यवस्था – चूँकि नागरिकता का प्रशिक्षण आधुनिक युग की मांग है, इसलिए अपनी तथा अपने नागरिकों की आवश्यताओं को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक राज्य प्राईमरी, माध्यमिक आदि विभिन्न प्रकार के स्कूलों की स्थापना करता है।वह इन स्कूलों का निर्माण या तो स्वयं ही करता है अथवा स्थानीय संगठनों को अनेक प्रकार के स्कूल खोलने के लिए प्रोत्साहित करता है।

४. प्रौढ़ शिक्षा – जनतन्त्र की सफलता शिक्षा के उपर निर्भर करती है।अत: प्रत्येक राज्य जहाँ एक ओर बालक तथा बालिकाओं को शिक्षित करने के लिए विभिन्न प्रकार के स्कूलों को स्थापित करता है, वहाँ दूसरी ओर अशिक्षित प्रौढ़ नागरिकों को शिक्षित करने के लिए भी प्रौढ़ शिक्षा का भी उचित प्रबन्ध करता है।हमारे राज्य में यधपि इस ओर प्रयास तो अवश्य किये जा रहे हैं, परन्तु वे जनशंख्या को देखते हुए बहुत कम है।आशा है की भविष्य में राज्य इस कार्य को भी सफलतापूर्वक पूरा करेगा।

५.स्कूलों के लिए धन की व्यवस्था – विभिन्न स्तरों तक के स्कूलों को खोलने के लिए धन की आवश्यकता होती है।राज्य अपनी ओर से यथाशक्ति धन की व्यवस्था करता है।सरकारी स्कूलों के व्यय का भार तो राज्य अपने उपर उठाता है, वही संघठनो द्वारा खोले गये स्कूलों के अधिकतम भार को भी स्वयं उठाने का प्रयास करता है।इसलिए इन स्कूलों को भवन निर्माण, फर्नीचर, तथा अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अधिक से अधिक आर्थिक अनुदान दिया जाता है।

६.सार्वभौमिक अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा- जनतंत्र की सफलता ऐसे नागरिकों पर निर्भर करती है जो अपने कर्तव्यों तथा अधिकारों को भली प्रकार से समझ सके।परन्तु कर्त्तव्यों तथा अधिकारों का ज्ञान उसी समय हो सकता है जब नागरिकों के बौद्धिक एवं मानसिक विकास की उचित व्यवस्था हो।अत: प्रत्येक राज्य अपने यहां निश्चित स्तर तक की सार्वभौमिक अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा का प्रबन्ध करता है।इंग्लैंड तथा अमरीका आदि राज्यों को इस सम्बन्ध में उदहारण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।वहाँ पर माध्यमिक स्तर तक सार्वभौमिक, अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा को प्राथमिकता दी जाति है।भारत ने भी इस महान कार्य को सैद्धांतिक रूप में तो अवश्य स्वीकार कर लिया है, परन्तु इस सम्बन्ध में अभी विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई है।राज्य को इस ओर सतर्क होने की आवश्यकता है।

७.अभिभावकों को प्रोत्साहन- स्कूलों के खोलने से राज्य के सारे बालक शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकेंगे।इस महान कार्य को पूरा करने के लिए अभिभावकों को प्रेरित करना परम आवश्यक है। भारत जैसे विशाल राज्य में अधिकांश अभिभावक अशिक्षित है।वे शिक्षा के मूल्य तथा महत्व को नहीं समझते।उनका विचार है की शिक्षा प्राप्त करने में समय की बर्बादी होती है।अत: क्यों न बालक को किसी काम पर ही लगा दिया जाये जिसमें वे अपना पेट भर सकें।ऐसी स्थिति में सरकार को चाहिये कि वह अभिभावकों को प्रचार के द्वारा शिक्षा के मूल्य एवं महत्व को समझावें जिससे वे अपने बालकों को शिक्षा देने के लिए प्रेरित हो जायें।

८.कुशल शिक्षकों को व्यवस्था – विभिन्न प्रकार के स्कूलों को खोलना, निश्चित स्तर तक सार्वभौमिक, अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था करना आदि सभी बातें अच्छी भी हैं और आवश्यक भी।परन्तु इनसे भी आवश्यक बात है कुशल शिक्षकों का होना।यदि शिक्षक कुशल तथा योग्य है तो सब कुछ ठीक है, अन्यथा सब व्यर्थ है।इस दृष्टि से राज्य का सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि वह विभिन्न प्रकार के स्कूलों के लिए ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति करे जो ज्ञान, कुशलता तथा सहानुभूति से पूर्ण हो एवं जो शिक्षा के उद्देश्य को प्राप्त करने में सहयोग प्रदान कर सकें।ऐसे शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता है।अत: राज्य को अधिक से अधिक प्रशिक्षण महाविधालयों की व्यवस्था करनी चाहिये जिससे विभिन्न स्तरों के लिए योग्य शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जा सके।

९.सैनिक शिक्षा की व्यवस्था – वर्तमान संघर्षपूर्ण युग में प्रत्येक नागरिक से यह आशा की जाती है कि वह शत्रु राज्य द्वारा किये गए आक्रमण में अपने राज्य की रक्षा कर सके।इस दृष्टि से प्रत्येक नागरिक को सैनिक शिक्षा प्राप्त करना परमावश्यक है।इसलिए प्रय्तेक राज्य अपने स्कूलों तथा कॉलेजों में प्रत्येक बालक अपने राज्य को संकट से बचा सके।भारतीय स्कूलों तथा कॉलेजों सैनिक शिक्षा का उचित प्रबन्ध है।आशा की जाति है कि सैनिक शिक्षा को प्राप्त करके हमारे बालक चीन तथा पाकिस्तान जैसे शत्रु राज्यों के आक्रमणों से अपने राज्य की बहादुरी के साथ रक्षा कर सकेंगे।यह हमारी सैनिक शक्ति का ही तो चमत्कार है की 16 दिसम्बर सन 1971 ई० को 4 बज कर 31 मिनट पर पाकिस्तानी कमांडर ले० जे० नियाजी ने भारतीय सेनाओं के ले०ज० जगजीत अरोड़ा के सामने विधिवत आत्मसमर्पण के समझौते पर हस्ताक्षर करके बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए भारतीय सेनाओं के योग की गौरव-गाथा का इतिहास लिख दिया। इस समझौते के परिणामस्वरूप पाकिस्तान का पूर्वी भाग औपचारिक रूप से अलग हो गया और स्वतंत्र बांग्लादेश के रूप में एक नये राष्ट्र का उदय हो गया।

१०.उत्तम पुस्तकों की व्यवस्था – उत्तम शिक्षा उत्तम पुस्तकों पर निर्भर करती है।प्राय: देखा जाता है कि अधिकांश प्रकाशक पुस्तकों के प्रकाशन में बालकों के हित को न देखकर अपने लाभ को विशेष महत्व देते हैं।इससे शिक्षा का स्तर गिर जाता है।राज्य इस सम्बन्ध में भी सतर्क रहता है जिससे उत्तम पुस्तकों का प्रकाशन हो सके।भारत को भी इस ओर विशेष ध्यान देना चाहिये।

११. छात्रवृति की व्यवस्था – बहुत से ऐसे भी साधनहीन अपितु प्रतिभासंपन्न बालक होते हैं जो आर्थिक कठिनाई के कारण ऊँची अथवा उपयुक्त शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते हैं इस दृष्टि से राज्य विभिन्न स्तरों के प्रतिभासंपन्न बालकों को छात्रवृतियां देता है तथा प्रसंसनीय परीक्षा फल एवं उन्नति के लिए विशिष्ट पुरस्कारों की घोषणा करता है।इस आर्थिक सहायता को प्राप्त करके साधनहीन बालकों को शिक्षा प्राप्त करने के लये प्रेरणा मिलती है।

१२. स्कूल पद्धति का सामान्य नियंत्रण एवं निर्देशन – प्रत्येक राज्य अपनी तथा अपने निर्माणकर्ताओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, माध्यम तथा शिक्षण-पद्धतियों को स्वयं ही निर्धारित करता है तथा स्कूल पद्धति पर सामान्य नियंत्रण रखते हुए समय-समय पर निर्देशन भी देता है।ध्यान देने की बात है कि जनतांत्रिक व्यवस्था में जनहित की भावना को सर्वोपरि स्थान दिया जाता है।इसलिए राज्य इन स्कूलों पर नियंत्रण उस सीमा तक ही रखता है जहाँ तक जनभावना की अवहेलना न होती हो।इस दृष्टि से राज्य इन स्कूलों के संगठन एवं कार्य-विधि पर नियंत्रण रखने के लिए समय-समय पर निरिक्षण का प्रबन्ध करता है तथा आवश्यक आदेश भी देता है, जिसस प्रगतिशील स्कूल प्रगति करते रहें तथा व्यवस्थाहीन स्कूलों के विरुद्ध कार्यवाही की जा सके।

१३.समितियों तथा परिषदों का निर्माण – शिक्षा के उद्देश्यों का निर्माण करने, पाठ्यक्रम की रचना करने तथा परीक्षा लेने एवं शिक्षा से सम्बंधित अन्य कार्यों को करने के लिए राज्य विभिन्न स्तरों पर राज्य कर्मचारीयों तथा जनता के प्रतिनिधियों के सहयोग से विभिन्न परिषदों एवं समितियों का निर्माण करता है।हमारे राज्य में ऐसी अनके परिषद् एवं समितियाँ है जो शिक्षा के संचालन में सक्रिय रूप से भाग ले रही है।

१४.आयोगों की नियुक्ति – शिक्षा के विभिन्न स्तरों में आये हुए दोषों का पाता लगाने तथा उनमें सुधार हेतु परामर्श देने के लिए राज्य का यह प्रमुख कार्य है कि वह समय-समय पर प्रसिद्ध शिक्षा-शास्त्रीयों की आध्यक्ष्ता में भिन्न आयोगों की नियुक्ति करे।भारतीय सरकार ने माध्यमिक शिक्षा आयोग तथा कोठारी आयोग , इसी दृष्टि से नियुक्त किये थे।आशा है की भविष्य में भी ऐसे ही आयोगों के परामर्श द्वारा शिक्षा की विभिन्न समस्याओं की सुलझाया जायेगा।

१५.शैक्षिक अनुशंधान को प्रोत्साहन – वर्त्तमान युग अनुशंधान का युग है।शिक्षा के क्षेत्र में भी अनके अनुशंधान हो रहे हैं।सयुंक्त राज्य अमेरिका तथा अन्य विदेशी राज्यों में तो इतने शैक्षिक अनुसंधान हुए हैं कि शिक्षा की काय पलट गई है।इन अनुशंधानों के फलस्वरूप पुराने विचार समाप्त होते जा रहे हैं    तथा नये आदर्शों एवं विधियों का निर्माण होता जा रहा है।इसीलिए अन्धुनिक युग में प्रत्येक राज्य अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुसार नये-नये आदर्शों तथा विधियों के निर्माण हेतु शैक्षिक अनुसंधानों पर बल दे रहा है।भारत बी इस ओर सतर्क है।

विभिन्न साधनों के बीच समन्वय

शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक साधनों पर प्रकाश डालने के पश्चात हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि उक्त सभी साधनों का एक ही उद्देश्य है – बालक का विकास।स्मरण रहे कि यदि शिक्षा के उक्त सभी साधन अपना-अपना कार्य अलग-अलग करते रहेंगे तो इनमें से कोई भी साधन अपने कार्य को कुशलता एवं सफलतापूर्वक नहीं कर सकेगा।अच्छे परिणामों के लये सभी साधनों में आपसी सहयोग एवं समन्वय की आवश्यकता है।वास्तिविकता यह है कि इन सभी साधनों में समन्वय स्थापित करने के लिए स्कूल से अच्छा और कोई साधन नहीं है।पर इसका यह अर्थ नहीं है कि शिक्षा के दुसरे साधन इस सम्बन्ध में कुछ भी न करें।शिक्षा के दुसरे साधनों- जैसे परिवार, समुदाय, धर्म तथा राज्य सभी को इस महान कार्य में यथाशक्ति सहयोग प्रदान करना चाहिये।निम्नलिखित पंक्तियों में हम उन उपयोगों पर प्रकाश डाल रहे हैं जिनके द्वारा स्कूल शिक्षा के विभिन्न साधनों के बीच समन्वय स्थापति कर सकता है।

  1. स्कूल तथा परिवार का सहयोग- स्कूल तथा परिवार दोनों ही बालक की शिक्षा के महत्वपूर्ण साधन है।दोनों के उतरदायित्वों में विभाजन की रेखा खींचना कठिन है।पर हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जहाँ एक ओर स्कूल के प्रांगन में बालक को समस्त क्षेत्रों में विकसित होने के अवसर प्राप्त होते हैं।वहाँ दूसरी ओर परिवार भी बालक के नैतिक अनुशासन तथा चारित्रिक प्रशिक्षण से विमुख नहीं हो सकता।वास्तव में, शिक्षा की प्रक्रिया उसी समय सुचारू रूप से संचालित हो सकती है जब स्कूल तथा परिवार दोनों एक दुसरे के उद्देश्यों को भली प्रकार समझें तथा एक दुसरे को हर प्रकार से पूर्ण सहयोग तथा सहायता प्रदान करें।स्कूल तथा परिवार में परस्पर सहयोग स्थापित करने के लिए अग्रलिखित सुझाव दिया जा रहे हैं –
  2. अभिभावक दिवस- स्कूल में प्रत्येक वर्ष अभिभावक दिवस मानना चाहिये।इस दिन स्कूल को बालकों व अभिभावकों को आमंत्रित कर के उनके मनोरजन के लिए बालकों द्वारा किये गये कार्यों की प्रदर्शनी तथा अन्य सहगामी क्रियाओं एवं सांस्कृतिक कार्यों की व्यवस्था करनी चाहिये।अभिभावकों को इस दिन अवश्य आना चाहिये।प्रधानाचार्य को अभिभावकों के सामने स्कूल की आगामी योजनाओं तथा कठिनाईयों को सामने रखना चाहिये।इन कठिनाईयों तथा समस्याओं के समाधान हेतु स्कूल –अधिकारी को अभिभावक से परामर्श लेना चाहिये।अभिभावक को भी इन समस्याओं के सुलझाने में पूर्ण सहयोग प्रदान करना चाहिये।यही नहीं, अभिभावकों शिक्षकों से मिलकर अपने अपने बालकों की व्यक्तिगत समस्यों के विषय में भी जानकारी प्राप्त करनी चाहिये।
  3. भेंटकर्ता शिक्षक – प्रत्येक स्कूल में कुछ ऐसे शिक्षक होने चाहिये जो समय समय पर अभिभावकों के घर पर जा सके तथा अभिभावकों के सामने उनके बालक के विषय में पूरी सुचना दे सकें।उन शिक्षकों को परिवार की समस्याओं की विषय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहिये तथा अभिभावकों को उनके बालकों के विकास हेतु उचित परामर्श देना चाहिये।
  4. अभिभावक-शिक्षक समिति- स्कूल में अभिभावक शिक्षक समिति भी स्थापित होनी चाहिये इस समिति के द्वारा परिवार तथा स्कूल में सहयोग स्थापित होने की आशा है।इस समिति की बैठकों में समय-समय पर बालकों की आवश्यकताओं, परिवार तथा स्कूल की कठिनाईयों, अन्य शिक्षा सम्बन्धी विषयों में विचार-विमर्श होना चाहिये।यही नहीं शिक्षकों को अपने नविन विचारों तथा योजनाओं को भी अभिभावक के सामने रखना चाहिये तथा इनको कार्य रूप में परितनीत करने के लिए उनसे आर्थिक सहायता की अपील करनी चाहिये।
  5. प्रगति पत्र – स्कूल को अभिभावक के पास बालकों कार्य का प्रगति-पत्र प्रत्येक मास के अन्त में अवश्य भेजना चाहिये।इस पत्र में बालक के व्यक्तिगत संबंधी प्रत्येक पक्ष के विकास का स्पष्ट वर्णन होना चाहिये जिससे अभिभावकों को बालकों के विषय में पूरी जानकारी प्राप्त हो सके।
  6. अभिभावकों की इच्छा का आदर- स्कूल को अभिभावकों की इच्छाओं का स्वागत करना चाहिये।शिक्षकों को बालकों के सम्बन्ध में अभिभावकों की आवश्यक मांगों को अवश्य पूरा करना चाहिये।यदि अभिभावकों की मांग उचित न हो तो शिक्षकों को दृष्टिकोण बदलने का प्रयास करना चाहिये।

स्कूल तथा समुदाय में सहयोग

स्कूल की सफलता के लिए समुदाय का सहयोग भी परम आवश्यक है।ध्यान देने की बात है कि बालक की शिक्षा का उतरदायित्व केवल शिक्षक के उपर ही नहीं है अपितु समुदाय की उपर भी है।इस दृष्टि से स्कूल में ऐसे कार्यक्रम आयोजित किये जाने चाहिये जिनमें समुदाय के लोग स्वतंत्रतापूर्वक भाग ले सकें।इससे स्कूल और समुदाय के बीच की खाई पट जायेगी।इस कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए – (1) स्कूल के समुदाय के आदर्शों, विश्वासों तथा परम्पराओं को अपने यहाँ प्रतिष्ठित करना चाहिये, (2) स्कूल सायंकाल में प्रौढ़ों के कार्यक्रम आयोजित करे जिससे स्कूल के विभिन्न कार्यक्रमों में रूचि ले सकें।(3) स्कूल दारा आयोजित सामाजिक समारोहों में अभिभावकों को भी अमन्तित्रित किया जाना चाहिये, (4) स्कूल की प्रबन्ध समिति में प्रौढ़ व्यक्तियों को स्थान मिलना चाहिये , (5) अभिभावकों तथा अन्य प्रौढ़ व्यक्तियों को स्कूल के कार्यक्रम में ही वहाँ के कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, तथा (6) स्कूल को समुदाय की क्रियाओं में सहयोग प्रदान करना चाहिये।इसके लिएय स्कूल ब्लाक विभिन्न सामाजिक तथा धार्मिक समारोहों एवं अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लें।उत्क सुझावों को कार्यरूप में परिणित करने से स्कूल और समुदाय के बीच का तनाव भी समाप्त हो जयेगा तथा दोनों साधन उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हो जायेंगे।

स्कूल और राज्य में सहयोग

स्कूल और राज्य में सहयोग स्थापित करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा रहें हैं –

  1. स्कूल को चाहिये कि वह राज्य का संरक्षण एवं नियंत्रण स्वीकार कर ले।
  2. स्कूल को चाहिये कि वह राज्य द्वारा निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करे।
  3. राज्य को भी चाहिये कि वह स्कूल की सभी प्रकार से व्यवस्था करे।
  4. राज्य को यह भी चाहिये कि वह समुदाय की आवश्यकताओं तथा शिक्षा सिधान्तों को दृष्टि में रखते हुए स्कूलों को पुनर्गठन करे, सब स्कलों के साथ एक सा व्यवहार करे तथा उन सबको स्थानीय संघर्षों से मुक्त करने का प्रयास करे।

स्कूल तथा अन्य निष्क्रिय साधनों में सहयोग

स्कूल तथा अन्य निष्क्रिय साधनों, उदाहरण के लिए चलचित्र, रेडियो तथा प्रेस आदि में भी सहयोग की आवश्यकता है।स्कूल को चाहिये कि वह बालकों के सर्वांगीण विकास हेतु उक्त सभी निष्क्रिय साधनों का उचित समय पर अधिक से अधिक सहयोग प्राप्त करें।

स्त्रोत: पोर्टल विषय सामग्री टीम

2.89887640449

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