सामग्री पर पहुँचे | Skip to navigation

शेयर
Views
  • अवस्था संपादित करने के स्वीकृत

शिक्षा जगत के उद्देश्य

इस लेख में शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों से सम्बंधित जानकारी दी गयी है।

परिचय

विभिन्न दार्शनिकों, समाज-सुधारकों तथा शिक्षाशास्त्रियों ने व्यक्ति तथा समाज की आवशयकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों क निर्धारित किया है। आधुनिक भारत में शिक्षा के उद्देश्यों की चर्चा कनरे से पूर्व इन सभी उद्देश्यों का अध्ययन करना परम आवशयक है।

उद्देश्य का अर्थ

शिक्षा में ज्ञानार्जन उद्देश्य का प्रतिपादन सुकरात, अरस्तु, दान्ते, कमेनियस तथा बेकन आदि आदर्शवादी संप्रदाय के विद्वानों ने किया है। इस उद्देश्य के अनुसार ज्ञान के बल से ही व्यक्ति का विकास होता है तथा वह अपने जीवन में सुख अरु शान्ति का अनुभव करता है। इस दृष्टि से ज्ञानार्जन का उद्देश्य शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस उद्देश्य को समझने के लिए इसके संकुचित तथा व्यापक दोनों अर्थों को समझाना परम आवश्यक है। सामान्यत: इस उद्देश्य के अग्रलिखित को पहलु है –

ज्ञानार्जन उद्देश्य – संकुचित अर्थ में इस उद्देश्य को विद्या के लिए विद्या के नाम से सम्बोधित किया जाता है। यह उद्देश्य कोई नया उद्देश्य नहीं है। प्राचीन काल से ही विद्वानों ने इस उद्देश्य पर बल दिया है। साधारण व्यक्तियों ने भी इस उद्देश्य क लेकर विद्या ग्रहण की है। अत: शिक्षकों का कर्त्तव्य है कि वे बालकों को विभिन्न विषयों का अधिक से अधिक ज्ञान दें। इस उद्देश्य के समर्थकों के अनुसार विद्या वह ज्ञान है जिसको केवल विद्वान ही जानते हैं। दैनिक जीवन में होने वाले अनुभवों को ये लोग ज्ञान नहीं मानते। 75% माता-पिता तथा शिक्षक मस्तिष्क की कलाबाजी में पूर्ण विश्वास रखते हैं। अत: वे बालकों को पुस्ताकिय ज्ञान प्राप्त करने के लिए बाध्य करते रहते हैं।

मानसिक विकास- व्यापक अर्थ में ज्ञान का अर्थ मानसिक विकास से होता है। अत: ज्ञान का तात्पर्य विभिन्न विषयों को रट लेने से ही नहीं है ; अपितु मस्तिष्क को शक्ति प्रदान करते हुए अनुशासन में रखना है। ऐसा ज्ञान उचित और अनुचित का बोध करता है तथा कार्य कनरे की क्षमता का विकास करता है। वास्तव में सच्चा ज्ञान व्यक्ति के जीवन को सफल और सुखी बनाने में पूर्ण सहयोग प्रदान करता है। परन्तु ऐसा उसी समय सम्भव हो सकता है जब

ज्ञान को बालक अपने अनुभव के आधार पर स्वयं ही खोज कर निकाले। इससे वह अपने भावी जीवन में आने वाली कठिनाईयों का बहादुरी के साथ सामना कर सकेगा तथा प्रत्येक समस्या को अपने पूर्व अनुभव के आधार पर सुलझाने में सफल हो सकेगा। यही कारण है कि कुछ शिक्षा-शास्त्रियों ने “विद्या के लिए विद्या“ के स्थान पर “मानसिक विकास” को महत्वपूर्ण स्थान दिया है।

उद्देश्य के पक्ष में तर्क

(1) प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य सुख और शान्ति प्राप्त करना है। बिना शिक्षा के सुख और शान्ति प्राप्त करना कोरी कल्पना है।

(2) ज्ञान के बल से व्यक्ति की उन्नति एवं विकास होता है।

(3) जब व्यक्ति को विभिन्न संस्थाओं, सांसारिक वस्तुओं, प्राकृतिक नियमों एवं आत्मा का पूर्ण ज्ञान हो जाता है, तो उस समय वह न केवल सांसारिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ही सफल होता है अपितु परलोक में भी आनन्द और सुख का अनुभव करता है।

(4) जिस प्रकार भोजन करने से मनुष्य का शारीरि बलवान बन जाता है, उसी प्रकार से ज्ञान द्वारा व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को अनुशासन में रखना सीख जाता है तथा उन्हें संगठित करने में भी सफल जो जाता है। ज्ञान में वृधि होने पर व्यक्ति में एक शक्ति पैदा हो जाती है, जिसकी सहायता से वह स्वयं को भी परिस्थिति के अनुसार बना लेता है और अपने वातावरण पर भी विजय प्राप्त करने का गौरव प्राप्त करता है।

(5) व्यवसायिक उद्देश्य में भी सफलता उसी समय प्राप्त हो सकेगी, जब किसी अमुक व्यवसाय का पूर्ण ज्ञान होगा।

(6) ज्ञान की सहायता से ही नैतिक तथा चारित्रिक निर्माण के उद्देश्य को पूरा किया जा सकता है।

(7) मानसिक विकास हो जाने पर व्यक्ति इस योग्य हो जाता है कि वह आचार-विचार, कल्पना एवं स्मरण शक्तियों का उचित प्रयोग कर सके। इससे उसको भी लाभ होता है और समाज का भी कल्याण होता है।

उद्देश्य के विपक्ष में तर्क

कुछ विद्वानों ने ज्ञानार्जन उद्देश्य के विरोध में भी निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये हैं –

(1)केवल ज्ञानार्जन से ही व्यक्ति का सर्वांगीण विकास नहीं हो जाता। उसका शारीरिक विकास भी होना आवश्यक है। इसका कारण यह है कि स्वस्थ मन केवल स्वस्थ शारीर में रहता है।

(2) पुस्तकीय ज्ञान केवल परीक्षा में पास करने के लिए तो ठीक होता है, परन्तु भावी जीवन में आने वाली जटिल समस्याओं को आसानी से सुलझाने में असफल हो जाता है। परीक्षा में पास हो कर केवल धुरंधर विद्वान बनना और समाज की अवहेलना करना व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन देना है।

(3) थोडे ज्ञान को लक्ष्य मान लेने से विधियाँ, पुस्तकें तथा परीक्षायें आदि सभी पर बुरा प्रभाव पड़ता है। प्राय: बालकों को विभिन्न विषयों की पुस्तकों को रटाकर परीक्षा में पास करना मुख्य कर्त्तव्य समझ लिया जाता है। यही कारण है की एडम्स महोदय ने स्कूलों को ज्ञान की दुकानें और शिक्षकों को ज्ञान के व्यापारी बताया है।

(4) मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह उद्देश्य बड़ा संकुचित है। इस उद्देश्य से बालक का विकास कुण्ठित हो जाता है। इसका कारण यह है कि ज्ञान देते समय बालकों को रुचियों तथा क्षमताओं की पूर्ण अवहेलना की जाती है। भोले-भाले बालकों को पुस्तकीय ज्ञान को रटने के लिए बाध्य किया जाता है चाहे वे इसे समझें या न समझें। इस प्रकार का ज्ञान स्थायी नहीं होता, अपितु बालक के स्वाभाविक विकास में बाधक सिद्ध होता है। सच्चा ज्ञान तो बालक के विकास में साधक होना चाहिये।

(5) ज्ञान को साधन मानना तो श्रेयस्कर है, परन्तु उसे साध्य मान लेने भारी भूल है। जिस ज्ञान से मानव का कल्याण ही न हो, वह व्यर्थ है।

(6) यदि ज्ञान प्राप्त करने को ही शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य मान लिया जाये तो शिक्षक का कार्य बालकों को परीक्षाओं में उत्तीर्ण कराके केवल डिग्री प्रदान करना ही रह जाता है। यह अच्छा आदर्श नहीं है।

(7) ज्ञान के द्वारा शान्ति और अशान्ति दोनों को उत्पन्न किया जा सकता है। परन्तु अनुभव की बात है कि महत्वकांक्षी लोग ज्ञान को अपनी शक्ति के प्रदर्शन हेतु दूसरों को निचा दिखने में लगा देते हैं। यह विज्ञान की उचतम ज्ञान ही तो है जिसके कारण तीसरे महायुद्ध के बादल आकाश में मंडराते रहते हैं।

(8) ज्ञानार्जन उद्देश्य बालक के अध्ययन पर बल न देकर केवल विषय-वस्तु के अध्ययन पर ही बल देता है। इस उद्देश्य से बालक का गौण तथा शिक्षक का मुख्य स्थान होता है।

(9) ली का मत है –“ज्ञान समझदारी के बिना मुर्खता है, व्यवस्था के बिना व्यर्थ है, दया के बिना दीवानापन है तथा धर्म के बिना मृत्यु है।”

(10) ज्ञानार्जन को शिक्षा का उद्देश्य मान कर माता-पिता तथा शिक्षक बालकों के मस्तिष्क में ज्ञान को जबरन ठूंसने का प्रयत्न करते हैं। इस ठुंसे हुए ज्ञान से बालकों को कोई भी लाभ नहीं होता। वे तोते की तरह रटकर ज्ञान का भण्डार तो बन जाते हैं, परन्तु अनुभवी नहीं बन पाते। वे अपने व्यावहारिक जीवन से हाथ धो बैठते हैं तथा अपने भावी जीवन में पग-पग पर हताश होते रहते हैं।

सांस्कृतिक विकास का उद्देश्य

उद्देश्य का अर्थ

कुछ विद्वानों का मत है कि शिक्षा का उद्देश्य संस्कृति का विकास एवं उन्नति होना चाहिये। वस्तुस्थिति यह है कि संस्कृति शब्द का अर्थ प्रत्येक देश तथा काल में अलग-अलग लगाया गया है। कुछ देशों में केवल अमुक भाषा में निपुणता को ही संस्कृति माना गया है तो कुछ ने केवल ज्ञान प्राप्त करने को ही संस्कृति का रूप स्वीकार किया है – उदहारण के लिए, एक समय ऐसा था जब इंग्लैंड में फ्रेंच तथा लैटिन भाषाओँ का ज्ञान ही संस्कृति समझा जाता था। इसी प्रकार प्राचीन भारत में संस्कृत का ज्ञान प्राप्त करना तथा मध्य भारत में उर्दू और फारसी का शब्द का प्रयोग करना एवं अंग्रेजों के शासन काल में आंग्ला भाषा का प्रयोग करना एक सुसंस्कृत व्यक्ति का विशेष गुण माना जाता था। आचार-विचार और रहन-सहन के आधार पर भी संस्कृति का मानदण्ड स्थिर किया जाता है। कुछ देशों में सिग्रेट, शराब एवं जुआ आदि को संस्कृति के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है तो कुछ में संगीत, कला तथा साहित्य में रूचि रखना एवं चरित्रवान बनना एक सुसंस्कृत व्यक्ति के विशेष लक्षण हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि यदि किसी अमुक देश तथा काल में किसी अमुक बात को गुण समझा जाता है तो उसी बात को दुसरे देश में उसी अथवा विशिष्ट काल में घृणित दृष्टि से देखा जाता है। कुछ भी हो, संकुचित अर्थ में संस्कृति का तात्पर्य है – विशेष आदतें, रहने-सहने तथा बोलने-चालने के ढंग एवं आचार-विचार। इन सब बातों की शिक्षा प्राप्त करके ही व्यक्ति का आदर होता है। इसलिए शिशु सदनों को खोला जाता है। इसका विपरीत व्यापक अर्थ में संस्कृति का अभिप्राय सर्वोच्च विचारों की जानकारी प्राप्त करके उन्हें दैनिक जीवन में प्रयोग करना है। विद्वानों का मत है कि संस्कृति बालक की दानवीय प्रवृतियों का शुद्धिकरण करके उसकी आत्मा को निखारती है। इससे उसका चरित्र महान तथा प्रशंसनीय बन जाता है। इस प्रकार संस्कृति का अर्थ उस सम्पूर्ण सामाजिक सम्पत्ति से है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती रहती है।

संस्कृति के विभिन्न रूप – संस्कृति के विभिन्न रूप हैं वे हैं – (1) व्यक्तिगत संस्कृति , (2) जातीय संस्कृति, (3) राष्ट्रीय संस्कृति तथा (4) विश्व संस्कृति। वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति का एक निजी गुण अथवा परिष्कार होता है। हम देखते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के विचार तथा व्यवहार करने के ढंग भी अलग-अलग होते हैं। कुछ लोग होंठ दबा कर बात करते हैं तो कुछ अपने हाथों तथा उँगलियों को ऊँचा-निचा करके किसी विचार को दूसरों के समक्ष रखने का प्रयास करते हैं। यह संस्कृति का व्यक्तिगत रूप है। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न लोगों की संस्कृति में पाये जाने वाले एक से तत्वों को मिलाकर जातीय संस्कृति, राष्ट्रीय संस्कृति तथा विश्व संस्कृति का जन्म होता है। मोटे तौर पर संस्कृति का अर्थ प्रत्येक देश तथा काल के अनुसार बदलता रहता है।

अच्छी संस्कृति की कसौटी – संस्कृति का कोई भी रूप हो अथवा वह किसी भी व्यक्ति, देश तथा काल की हो। उसे उसी समय अच्छा माना जा सकता है जब उसमें निम्नलिखित दो गुण पाये जाते हों –

उपयोगिता- कोई भी संस्कृति उसी समय अच्छी कही जा सकती है जब वह दूसरों के लिए उपयोगी हो। दुसरे शब्दों में, यदि उससे व्यक्ति को लाभ तथा समाज कल्याण होता है तो वह अच्छी है , अन्यथा नहीं। प्राय: देखा जाता है की कुछ लोग केवल अपनी संस्कृति का राग अलापते हैं तथा दूसरों की संस्कृति की अनके त्रुटियाँ निकलते हैं। यह उनकी भूल है। वास्तविकता यह है की प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संस्कृति में भी कमियाँ दिखाई देंगी तथा दूसरों की संस्कृति में अच्छाइयां भी। ऐसी दशा में उसी व्यक्ति को सुसंस्कृत व्यक्ति कहा जा सकता है जो केवल अपनी ही संस्कृति को अच्छा समझता है अपितु दूसरी संस्कृतियों की विशेषताओं की भी समझ कर अपनाने का प्रयास करता है। यदि उपयोगिता और समाज कल्याण को अच्छी संस्कृति की कसौटी मान लिया जाये तो सिग्रेट, शराब, जुआ तथा तितर-बटेर एवं पतंग उड़ाने से शास्त्रीय संगीत, कला एवं काव्य आदि व्यक्ति समाज दोनों के लिए उपयोगी है।

प्रगतिशील – संस्कृति का दूसरा विशेष गुण यह भी है कि वह स्थायी नहीं अपितु प्रगतिशील होती है। दुसरे शब्दों में, संस्कृति सदैव बदलती है तथा विकसित होती है। आधुनिक यातायात के साधनों तथा वैज्ञानिक अविष्कारों द्वारा एक संस्कृति दूसरी संस्कृति से प्रभावित होती है तथा विकसित होती है यही कारण है कि आधुनिक भारत की वर्तमान संकृति अब वह संस्कृति नहीं रही जो प्राचीन युग में संसार का पथ प्रदर्शन करती थी। अब तो तम्र्पात्रों में जल पीने तथा कुशा के आसन पर बैठकर मन्त्रों का जाप करने अथवा भोजन करने के स्थान पर चीनी के प्यालों तथा प्लेटों में लंच एवं डिनर खाये जाते हैं। इस प्रकार अब विभिन्न देशों को संस्कृतियों ने अलग-अलग न रहकर एक विश्व संस्कृति को जन्म दे दिया है।

सांस्कृतिक उद्देश्य के पक्ष में तर्क

(1) संस्कृति से मनुष्य का सर्वांगीण विकास होता है।

(2) जन्म के समय मानव-शिशु की प्रवृतियाँ पाशविक होती है। संस्कृति ही उसे पशु से मानव बनती है।

(3) ज्ञान केवल मष्तिष्क को ही शक्ति तथा सूचना देता है। संस्कृति मस्तिष्क के साथ-साथ ह्रदय को भी सुशिक्षित करीत है।

(4) संस्कृति का ज्ञान प्राप्त करके मानव को सामाजिक वातावरण में समायोजन स्थापित करने में आसानी होती है।

(5) सुसंस्कृत व्यक्ति जीवन के उच्च आदर्शों के प्रति अपनी व्यक्तिगत रुचियों को त्याग देता है।

(6) संस्कृति में आदिकाल से लेकर अब तक सभी अनुभव सम्मिलित होते हैं। इनका उपयोग तथा सुरक्षा शिक्षा के द्वारा सम्भव हैं।

(7) गाँधी जी ने भी शिक्षा के सांस्कृतिक उद्देश्य पर बल देते हुए कहा है – “ संस्कृति मानव जीवन की नींव है तथा प्रारम्भिक वस्तु है। आपके व्यक्तिगत व्यवहार की छोटी से छोटी बातों में इसे प्रकट होना चाहिये। “

सांस्कृतिक उद्देश्य के विपक्ष में तर्क

(1) सांस्कृतिक उद्देश्य व्यक्ति को सुसंस्कृत तो बन सकता है, परन्तु उसकी रोटी की समस्या का समाधान नहीं कर सकता है।

(2) संस्कृति पर अधिक बल देने से अपने और पराए का भाव बहुत ही जल्दी पैदा हो जाता है। इससे किसी अमुक संस्कृति के मानने वाले व्यक्ति के विचार केवल उसकी अपनी ही संस्कृति तक सीमित रह जाते हैं, जो ठीक नहीं है।

(3) सांस्कृतिक उद्देश्य से भेद-भाव तथा वर्गभेद पैदा होने का भय है।

(4) वर्तमान संस्कृति में सिग्रेट पीना, ताश तथा जुआ खेलना एवं नाचना आदि कुछ ऐसे हानिकारक तत्व है जिनकी शिक्षा देने से व्यक्ति तथा समाज दोनों को हानि होगी।

(5) संकुचित विचारधारा वाले व्यक्तियों के हाथ में यह उद्देश्य अत्यन्त भयंकर शिद्ध हो सकता है।

(6) संस्कृति के रंग में रंगे हुए लोग वर्त्तमान के अपेक्षा अतीत का राग अलापते हैं। इससे न नतो व्यति का ही विकास होता है और न समाज ही प्रगति के पथ पर बढ़ता है।

(7) संस्कृति एक बहुअर्थी शब्द है। यह कहना कठिन है कि बालक को संस्कृति के कौन-कौन से तत्वों की शिक्षा दी जाये। अत: शिक्षा का सांस्कृतिक उद्देश्य एकांगी हैं।

चरित्र विकास का उद्देश्य

 

उद्देश्य का पक्ष में तर्क

शिक्षाशास्त्रियों के एक वर्ग ने ज्ञान तथा संस्कृति के उद्देश्यों पर बल दिया है तो दुसरे ने इस बात का समर्थन किया है शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालक के चरित्र का विकास होना चाहिये। जिन विद्वानों ने शिक्षा में बालक के चरित्र पर बल दिया है उनमें से जर्मनी के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री हरबार्ट का नाम विशेष उलेखनीय है। चरित्र का अर्थ है –“ आन्तरिक द्रढ़ता और एकता “। चरित्रवान व्यक्ति अपने जीवन में जो भी कार्य करता है वह उसके आदर्शों तथा सिधान्तों के अनुसार होता है। ये आदर्श तथा सिधान्त नैतिक भी हो सकते हैं तथा अनैतिक भी। हरबार्ट का तात्पर्य नैतिक चरित्र से हैं। उसके अनुसार व्यक्ति तथा समाज दोक्दो का वास्तविक तथा स्थायी कल्याण उच्चकोटि के नैतिक चरित्र से ही सम्भव हैं। अत: उसने एक स्थान पर लिखा भी है कि – “ शिक्षा के समस्त कार्यों को एक ही शब्द में प्रकट किया जा सकता है और यह शब्द है नैतिकता।“

हरबार्ट के अनुसार मानव का आचरण उसकी जन्मजात शक्तियों पर आधारित होने के कारण समाज में अव्यवस्था उत्पन्न करता है। अत: शिक्षा का उद्देश्य यह होना चाहिये कि वह मानव की प्रवितियों का परिमार्जन करे जिससे उसके आचरण नैतिक बन जाये। हरबार्ट का विचार है कि बालक जन्म से ही सदाचारी नहीं होता। उस समय उसकी प्रवृतियां मानवीय होती है जिनके वशीभूत होकर वह अनैतिक आचरण की करता रहता है। बालक का नैतिक विकास करने के लिए उसकी इन दानवीय प्रवृतियों का परिमार्जन करना परम आवश्यक है। शिक्षा ही एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा उसके मन में पुण्य के प्रति प्रेम और पाप के प्रति घ्रणा उत्पन्न करके उसके अन्दर सदेछायें उत्पन्न की जा सकती है तथा उसके अन्दर प्रेम, सहानभूति, दया, सद्भावना तथा न्याय-प्रियता आदि सामाजिक एवं नैतिक गुणों को विकसित करके उसको चात्रित्रवान बनाया जा सकता है।

चरित्र के निर्माण हेतु हरबार्ट ने बालकों में बहुमुखी रुचियों को उत्पन्न करने तथा उअके शोषित करने पर विशेष बल दिया है। उसका विचार है कि “ शिक्षण का महान और अन्तिम उद्देश्य सद्गुणों के विकास की धारणा में निहित है। परन्तु शिक्षण द्वारा अन्तिम उद्देश्य के प्राप्त करने से प्रथम ही बालकों में बहुमुखी रुचियों के विकास पर बल देना चाहिये। “ हरबार्ट के इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि बालक के चरित्र के विकास में उसकी रुचियों को देखकर हम कह सकते हैं कि उसका चरित्र कैसा है ध्यान देने की बात है कि बालक के विचारों तथा उसके आचरणों में गहरा सम्बन्ध होता है। सामान्यत: बालक के आचरणों का निर्माण उसकी रुचियों के अनुसार होता है और रुचियों का निर्माण उसके विचारों के अनुरूप। यदि बालक के विचार शुद्ध होंगे तो उसके आचरण भी शुद्ध होंगे। अत: हरबार्ट ने बालक की रुचियों और विचारों को पवित्र बनाकर उसका नैतिक विकास करने के लिए शिक्षा को एक महत्वपूर्ण साधन माना है। उसका विचार है कि शिक्षा का कार्य यह है कि वह बालकों के सम्मुख उच्च विचारों तथा आदर्शों को प्रस्तुत करे जिससे उनके ज्ञान की वृधि हो। हरबार्ट के अनुसार ज्ञान सदाचार की कुंजी है। ज्ञान प्राप्त करने से बालक की चिन्तन, मनन तथा विवेक आदि शक्तियों का विकास होता है। इन शक्तियों के विकसित होने से वह अच्छे और बुरे आचरणों में अन्तर समझने लगता है। इसके विपरीत यदि बालक के ज्ञान में वृधि नहीं की जायेगी तो उसका मानसिक विकास कुण्ठित हो जायेगा और वह मुर्ख बन जायेगा। फलस्वरूप वह ऐसे घ्रणित तथा आवांछनीय कार्यों को भी कर बैठेगा जिनसे समाज में अवयवस्था उत्पन्न होने का भय है जिससे वह समाजोपयोगी तथा शुद्ध आचरण करने लगता है।

हरबार्ट ने शिक्षा पाठ्यक्रम के विषय में भी चर्चा करते हुए बताया है कि पाठ्यक्रम के अन्तर्गत केवल उन विषयों को ही प्रमुख स्थान मिलना चाहिये, जो नैतिक तथा धार्मिक विचारों से भरे हुए हों। इस दृष्टि से उसने इतिहास तथा साहित्य की शिक्षा पर विशेष बल दिया है। उसका विश्वास है कि इन विषयों के अध्ययन से बालकों में सत्य, साहस तथा सहानभूति आदि नैतिक गुणों तथा उच्च आदर्शों का विकास किया जा सकता है। अत: शिक्षकों को चाहिये कि वे बालकों की रूचि इतिहास तथा साहित्य के अध्ययन करने में बढ़ावें जिससे वे सदाचारी तथा सचरित्र व्यक्ति बन सकें।

उद्देश्य का विपक्ष में तर्क

(1) सुद्रढ़ तथा सुन्दर चरित्र वाले मनुष्य का सभी आदर करते हैं।

(2) प्राचीन भारत तथा ग्रीक के आदर्शवादी विद्वानों ने भी बालक के सत्यं, शिवं, सुन्दरम् जैसे उच्चतम मूल्यों को विकसति करने के लिए चरित्र-निर्माण उद्देश्य पर बल दिया है।

(3) आज के वैज्ञानिक युग में प्रत्येक व्यक्ति स्वार्थी हो गया है। किसी को किसी के प्रति प्रेम तथा सहानभूति नहीं रही है। यदि मानव को विनाश की दशा से बचाना है तो उसके नैतिक चरित्र का विकास करना परम आवशयक है।

(4) सचरित्र व्यक्ति अपने चरित्र के बल से अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में केवल सफल ही नहीं होता अपितु अपने लक्ष्य को भी प्राप्त कर लेता है।

(5) दृढ इच्छा शक्ति का आधार है – सुद्रढ़ चरित्र। अत: चरित्र निर्माण उद्देश्य शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

(6) स्पेन्सर के अनुसार- “ मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता और सबसे बड़ा रक्षक-चरित्र है, शिक्षा नहीं।”

(7) मानव जीवन में चरित्र का अपना विशेष महत्त्व है। चरित्रवान व्यक्ति का आचरण सुन्दर होता है। यही आचरण व्यक्ति और पशु अन्तर बतलाता है। चरित्रवान व्यक्ति का आचरण सदैव ऐसा होता है जिससे उसको तथा समाज को निरन्तर लाभ होता रहता है।

(8) डीवी ने भी शिक्षा के चरित्र निर्माण उद्देश्य का गुणगान करते हुए लिखा है – “ स्कूली शिक्षा तथा अनुशासन का सर्वभूत उद्देश्य चरित्र निर्माण है। “

(9) 1932 ई० में जब महात्मा गाँधी से पूछा गया कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात भारतीय शिक्षा का क्या उद्देश्य होगा ? उन्होंने बिना संकोच के तुरन्त उत्तर दिया –“चरित्र का निर्माण करना – मैं कुछ आदर्शों की पूर्ति के लिए साहस, शक्ति, सद्गुण तथा अपने आप को भूल जाने की योग्यता को विकसित करने का यत्न करूँगा। “

(10) प्लेटो और अरस्तु के अनुसार सच्ची शिक्षा वही मानी जायेगी जिसके प्राप्त करने से बालकों को किसी शिक्षा वस्तु के प्रति शुभ आचरण करना आ जाये। प्लेटो ने नैतिक गुणों के अन्तर्गत सत्य, उच्च विचार, स्वतंत्रता, साहस तथा न्याय का समर्थन किया है।

(11) रेमान्ट ने भी चरित्र-निर्माण के उद्देश्य का समर्थन करे हुए लिखा है – “ शिक्षक का अन्तिम ध्येय न तो स्वस्थ शारीर का निर्माण करना है और न ज्ञान की पूर्णता और भावनाओं को शुद्ध करना है वरन चारित्रिक बल एवं शुद्धता की अभिवृधि करना है।”

(12) जिस देश के नागरिक बड़ों का आदर नहीं करते, जो सत्य नहीं कहते, जो न्याय को न्याय नहीं समझते तथा जो चोरबाजारी और घूंस लेने से धन कमाने में अपना अपमान  नहीं समझते, उस देश का पतन होना निश्चित है। यदि किसी देश को उन्नति के शिखर पर चढ़ना है तो उसके नागरिकों को चरित्रवान बनना परम आवश्यक है।

(13) किसी देश की उन्नति उसकी बाहरी टीम-टाम से नहीं आंकी जाती अपितु उसके नागरिकों से देखी जाती है। यदि किसी देश के नागरिक चरित्रवान हैं तो उस देश की उन्नतिशील करना ही होगा। ऐसी दशा में शिक्षा का यह उद्देश्य होना चाहिये कि वह नागरिकों के चरित्र का निर्माण करे।

(14) चरित्र निर्माण उद्देश्य के द्वारा केवल व्यक्ति का विकास ही सम्भव नहीं है अपितु राष्ट्र का कल्याण भी निश्चित है। अपने देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि देश तथा समाज का उत्थान केवल व्यक्ति के चारित्रिक अध्ययन पर ही निर्भर करता है।

उद्देश्य का विपक्ष में तर्क

(1) इस उद्देश्य का सबसे बड़ा दोष यह है कि निश्चित नहीं किया जा सकता है कि आखिर चरित्र का अर्थ क्या है। इसका मुख्य कारण यह है कि नीति शास्त्र को दृष्टि में रखते हुए अच्छे बुरे, शुद्ध अथवा अशुद्ध तथा उचित अथवा अनुचित आदि के सम्बन्धों में अनके विवादग्रस्त कठिनाइयां सामने आ जाती है।

(2) प्राय: देखा गया है कि जो लोग अपने चरित्रवान समझते हैं वे दूसरों को घ्रणा की दृष्टि से देखने के आदि हो जाते हैं।

(3) नैतिक अथवा चरित्रवान व्यक्तियों को प्राय: यथार्थ परिस्थितियों कज्ञान नहीं होता। ऐसे लोगों को मूर्खों की संज्ञा दी जा सकती है।

(4) चरित्र निर्माण का उद्देश्य इस बात पर बल देता है कि बालक की मूल-प्रवृतियों का दमन किया जाये। इससे बालक में नाना प्रकार के मानसिक रोग उत्पन्न होने की सम्भावना है।

(5) चरित्र निर्माण का उद्देश्य केवल इस बात पर बल देता है कि बालक के आचरण नैतिक बन जायें। इससे उसमें अन्य गुणों को विकसित करने का प्रयत्न नहीं किया जाता।

(6) जिस व्यक्ति को धन के अभाव में पेट भरा कर रोटी भी खाने को न मिले, उससे नैतिक चरित्र की आशा करना कोरी भूल है। यह माना कि चारित्र के लिए रोटी ही सब कुछ नहीं है, फिर भी भूखा व्यक्ति तो चरित्र के विषय में सोच भी नहीं सकता है।

(7) चरित्रवान होते हुए भी व्यक्ति एक सफल जीवन व्यतीत नहीं कर सकता यदि उसमें सामाजिक भावनायें विकसित नहीं हुई हों। दूसरों से व्यवहार करने के लिए उसे व्यवहारिक गुणों तथा कुशलताओं को सीखना भी आवशयक है।

(8) यदि चरित्र निर्माण के उद्देश्य को स्वीकार भी कर लिए जाये तो प्रश्न यह उठता है कि बालकों में नैतिक गुणों को विकसित कनरे के लिए कौन-कौन से विषयों का अध्ययन कराया जाये। इसके विषय में मत भेद है। कुछ विद्वान् एक विषय को महत्त्व देते हैं तो कुछ दूसरे को। कुछ व्यक्ति चरित्र को सुधारने के लिए नियमित धर्म उपदेश तथा सदुपदेश पर बल देते हैं तो कुछ के अनुसार कोरे धर्म उद्देश्य से ही बालकों के नैतिक जीवन को सुधारना तथा उनके चरित्र का निर्माण करना असम्भव है।

(9) यदि यह भी मां लिया जाये कि धर्म उपदेशों तथा सद-उपदेशों के द्वारा ही बालकों के नैतिक चरित्र का निर्माण किया जा सकता है तो फिर यह निश्चित करना कठिन हैं कि धर्म-उपदेशों तथा साद-उपदेशों के द्वारा ही बालकों के नैतिक चरित्र का निर्माण किया जा सकता है तो फिर यह निश्चित करना कठिन है कि धर्म-उपदेश किस ढंग से तथा किस घन्टे में दिया जायें।

(10) हरबार्ट ने बालकों के नैतिक चरित्र हेतु इतिहास तथा साहित्य के अध्ययन पर बल दिया है। उसका यह विचार भी पूर्ण सत्य नहीं है। इसका कारण यह है कि जहाँ इतिहास के उदाहरणों को बालकों के सामने प्रस्तुत करके यह बताया जा सकता है कि अच्छे काम का अच्छा और बुरे काम का बुरा परिणाम होता है वहाँ इतिहास में ऐसे भी उदाहरण हैं जहाँ बुरे काम करने पर भी लोग फले और फुले हैं। ऐसी दशा में केवल इतिहास के शिक्षण से ही बालकों के नैतिक चरित्र को सुधारने की आशा करना बहुत बड़ी भूल हैं।

(11) नैतिक चरित्र के निर्माण को ही शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य इसलिए भी नहीं माना जा सकता क्योंकि इस उद्देश्य के साथ-साथ जीविकोपार्जन, शारीरिक तथा मानसिक विकास आदि उद्देश्य भी कुछ कम महत्वपूर्ण उद्देश्य नहीं हैं।

जीविकोपार्जन का उद्देश्य अथवा व्यवसायिक उद्देश्य

उद्देश्य का अर्थ

कुछ विद्वानों का मत है कि शिक्षा को केवल ज्ञान और संस्कृति से ही अलंकृत करना उचित नहीं है। उनका मत है कि शिक्षा का उद्देश्य व्यवसायिक होना चाहिये। वर्तमान युग में मनुष्य के समक्ष जीविका की समस्या एक प्रमुख समस्या है। खाने के लिए रोटी, पहनने के लिए कपड़ा तथा रहने के लिए मकान किसको नहीं चाहिये ? ऐसी शिक्षा व्यर्थ है, यदि पढ़-लिखकर भी व्यक्ति अपनी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं न करके दूसरों पर भार बना रहे। अत: आधुनिक शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य व्यवसायिक अथवा जीविकोपार्जन होना चाहिये। इसी उद्देश्य को सामने रखकर अधिकांश माता-पिता अपने बालकों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूलों में भेजते हैं जिससे वे शिक्षा प्राप्त करके नौकरी में आ जायें अथवा किसी व्यवसाय को अपनाकर अपना तथा आगे चलकर अपने बालकों का पेट-पालन कर सकें। शिक्षक भी बालकों को शिक्षा प्रदान करते समय इसी बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि अमुक बालक अमुक प्रकार की शिक्षा प्रदान करके अमुक नौकरी या अमुक व्यवसाय में चला जाये। माता-पिता तथा शिक्षक के अतिरिक्त सरकार की ओर से ही आधुनिक युग में व्यवसायिक मार्ग-प्रदर्शन पर बल दिया जाता है। हम देखते हैं की भिन्न-भिन्न स्थानों पर मनोवैज्ञानिक केन्द्र खोले जा रहे हैं जहाँ पर बालकों की रुचियों, अभिरुचियों, योग्यताओं तथा अव्शय्क्ताओं की परख करके उन्हें अनके नौकरियों तथा व्यवसायों के लिए उचित मार्ग-प्रदर्शन किया जाता है, क्योंकि इस उद्देश्य के अनुसार शिक्षा व्यक्ति को रोटी, कपड़ा तथा मकान आदि के उपलब्ध कराने में सहायता प्रदान करती है, इसलिए इस उद्देश्य को डाल-रोटी का उद्देश्य, ब्लू जैकिट उद्देश्य तथा व्हाईट कालर उद्देश्य आदि-आदि नामों से भी पुकारा जाता है।

उद्देश्य के पक्ष में तर्क

(1) वह शिक्षा किस काम की है जिसको प्राप्त करके व्यक्ति अपनी प्राथमिकता आवश्यकताओं को भी पूरा न कर सके। यथार्थवादी सिधान्त एवं उपयोगी प्रवृतियों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा का उद्देश्य जीविकोपार्जन अथवा व्यवसायिक होना चाहिये। जिससे व्यक्ति किसी उचित व्यवसाय के लिए तैयार हो जाये।

(2) मनुष्य की आर्थिक उन्नति पर ही उसकी अन्य प्रकार की उन्नति भी निर्भर करती है। अत: जीविकोपार्जन का उद्देश्य शिक्षा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

(3) जिस व्यक्ति की आर्थिक दशा अच्छी होती है उसका समाज में भी सम्मान होता है और वह सुख तथा शान्ति का जीवन भी व्यतीत करता है।

(4) अमेरिका में इसी उद्देश्य को स्वीकार किया गया है। वहाँ के स्कूलों में व्यवसायिक निर्देशन का पूर्ण प्रबन्ध किया जाता है। यही नहीं, वहाँ पर बालकों की रुचियों तथा क्षमताओं की जानने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मनोवैज्ञानिक परीक्षाओं का निर्माण किया जाता है जिनके आधार पर प्रत्येक विधार्थी अपने-अपने पाठ-विषयों का चयन अपने आगामी जीवन में चुनने वाले व्यवसाय के अनुसार करता है।

(5) जीविकोपार्जन अथवा व्यवसायिक उद्देश्य से व्यक्ति तथा राष्ट्र दोनों की उन्नति होती है। जिस राष्ट्र में इस उद्देश्य को प्रमुख स्थान दिया जाता है वहाँ पर औधोगिक तथा व्यवसायिक उन्नति होती है। फलस्वरूप वहाँ की जनता धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाती है। वहाँ का प्रत्येक व्यक्ति अपनी उन्नति के साथ-साथ राष्ट्र की भी यथाशक्ति सेवा करता है। इससे व्यक्ति तथा राष्ट्र दोनों की उन्नति के शिखर पर चढ़ते रहते हैं। ध्यान देने की बात है कि जिस राष्ट्र की जनता को व्यवसायिक शिक्षा नहीं दी जाती है, वहाँ बेरोजगारी, भुखमरी, और बीमारी आदि भयंकर रूप धारण कर लेती है। इससे व्यक्ति तथा राष्ट्र दोनों रसातल की ओर बढ़ते रहते हैं। ऐसी दशा में में व्यक्ति तथा राष्ट्र दोनों की उन्नति के लिए व्यवसायिक उद्देश्य को महत्वपूर्ण स्थान देना परम आवशयक है।

(6) जिस राष्ट्र में अधिक से अधिक इंजीनियर, डॉक्टर, तथा कुशल व्यवसायी होते हैं उसको समृद्धिशाली राष्ट्र कहते हैं। परन्तु यह उसी समय हो सकता है जब शिक्षा में व्यवसायिक उद्देश्य अपनाये जाये।

(7) शिक्षा के अन्य उद्देश्य भले ही रहें परन्तु इसका एक प्रमुख सिधान्त आर्थिक समस्याओं को सुलझाने की शक्ति प्रदान करना अवश्य होना चाहिये। महात्मा गाँधी ने इसी सिधान्त को दृष्टि में रखकर बेसिक शिक्षा का अविष्कार किया था जिससे शिक्षा आत्मनिर्भर बन जाये और शिक्षा समाप्त करने के समय बालक इस योग्य बन जाये कि वह अपने भावी जीवन की आर्थिक कठिनाईयों का सफलतापूर्वक सामना कर सके। गाँधी जी ने एक स्थान पर लिखा है – “ सच्ची शिक्षा को बालक और बालिकाओं के लिए बेकारी के विरुद्ध एक प्रकार का सीमा होना चाहिये।”

उद्देश्य के विपक्ष में तर्क

(1) व्यवसायिक उद्देश्य मानव की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति तो करता है, परन्तु उसकी मानसिक तथा अध्यात्मिक शक्तियों की अवहेलना करता है। शारीरिक विकास के साथ-साथ मनुष्य का मानसिक विकास भी आवश्यक है। जो व्यक्ति अपने व्यवसाय में अतिरिक्त जीवन की अन्य किसी बात में रूचि नहीं रखता है उसे मानसिक तथा नैतिक दृष्टि से हीनतर ही समझा जायेगा।

(2) व्यवसाय की सफलता से मानव की आर्थिक दशा तो बहुत अच्छी हो सकती है, परन्तु उसको वास्तविक सुख मिलना कोई जरुरी शर्त नहीं है। सच्चा सुख और शान्ति तो केवल आत्मा की शान्ति से ही मिलते हैं।

(3) व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त करके व्यक्ति कृत्रिम वातावरण में आ जाता है। उसका जीवन नीरस बन जाता है।

(4) रेमान्ट के अनुसार लोकतंत्रवादी समाज में यह तय करना अत्यंत कठिन है कि अमुक व्यक्ति अपने भावी जीवन में अमुक व्यवसाय को अपनायेगा। ऐसी दशा में केवल जीविकोपार्जन को ही सब कुछ समझकर शिक्षा प्रदान करता है ठीक नहीं है। इस उद्देश्य में जहाँ राष्ट्र की उन्नति होती है, वहाँ अहित भी होती है। इसका कारण यह है कि उद्देश्य व्यक्तियों में प्रतिद्वंदिता, स्पर्धा तथा द्वेष की भावनाओं को उत्पन्न करता है। इससे मानवीय गुणों का अन्त हो जाता है।

(5) अच्छी शिक्षा व्यक्ति को उसके अवकाश का सदुपयोग करना भी  सिखाती है। यदि अपने व्यवसाय में फुर्सत पा जाने के पश्चात व्यक्ति असंगत क्रियाओं में संलग्न हो जाता है तको उसकी शिक्षा एकांगी ही कहीं जाएगी। व्यवसायिक उद्देश्य का यह सबसे बड़ा दोष है कि यह व्यक्ति को उसके अवकाश काल का सदुपयोग करना नहीं सीखता।

(6) धन कमाने के चक्कर में पड़कर व्यक्ति संगीत, कला तथा साहित्य से भी कोई लाभ नहीं उठा पाता। इससे उसका जीवन तो नीरस हो ही जाता है,साथ ही इन सबका विकास भी नहीं हो पाता।

(7) शिक्षा जगत के महान दार्शनिक प्लेटो ने इस उद्देश्य का खण्डन करते हुए लिखा है – “ वह शिक्षा अनुदार है जिसका उद्देश्य बुद्धि और न्याय की ओर ध्यान न देकर केवल धन या शारीरिक बल की प्राप्ति है। “

(8) व्यवसायिक उद्देश्य मनुष्य को रोटी कमाने के योग्य तो अवशक बना सकता है, परन्तु केवल रोटी कमाने से ही मनुष्य, मनुष्य नहीं बन जाता। यह हो सकता है कि व्यक्ति एक बहुत बड़ा डॉक्टर अथवा इंजीनियर बन जाने का यह अर्थ नहीं है कि वह एक बहुत बड़ा मनुष्य भी बन गया हो। मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए ऐसे चारित्रिक, बुद्धिक तथा आध्यात्मिक विकास हो सके।

(9) यदि जीविकोपार्जन अथवा व्यवसायिक उद्देश्य को ही शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य मान लिया जाये तो शिक्षा स्वयं साध्य न रहकर साधन बन जाती है। इससे शिक्षा महत्वहीन हो जाती है।

समविकास का उद्देश्य

उद्देश्य का अर्थ

शिक्षा के समविकास के उद्देश्य का अर्थ यह है कि प्रत्येक बालक की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, कलात्मक तथा नैतिक आदि सभी शक्तियों का समान रूप से विकास होना चाहिये। यह उद्देश्य मनोवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन करने से पता चलता है कि प्रत्येक बालक कुछ जन्म-जात शक्तियों को लेकर जन्म लेता है। उसके व्यक्तितिव को सन्तुलित रूप से विकसति करने के लिए इन सभी शक्तियों का समान रूप से विकसित होना परम आवश्यक है। यदि शिक्षा के द्वारा बालक की इन शक्तियों का विकास समान रूप से न किया गया अर्थात उसकी किसी प्रवृति अथवा शक्ति का कम तथा किसी का अधिक विकास कर दिया गया तो उसके व्यक्तित्व का सन्तुलन बिगड़ जायेगा। उसके व्यक्तित्व को सन्तुलित एवं प्रभावशाली बनाने के लिए उसकी शारीरिक, मानसिक तथा सौन्दर्यात्मक शक्ति अथवा शक्तियों का ही विकास करना उचित नहीं है अपितु उसकी समस्त शक्तियों का समविकास करना परम आवश्यक है। इस उद्देश्य के समर्थकों में रूसो तथा पेस्टालॉजी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। रूसो ने समविकास के रूप पर प्रकाश डालते हुए लिखा है – “ हमारे अंगों एवं शक्तिओं का स्वाभाविक विकास प्रकृति की शिक्षा की रचना करता है।“

समविकास के उद्देश्य को सामने रखकर शिक्षा को परिभाषित करते हुए पेस्टालॉजी ने भी लिखा है – “शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक सामंजस्यपूर्ण तथा प्रगतिशील विकास है “|

उद्देश्य के पक्ष में तर्क

(1) समविकास का उद्देश्य मनोवैज्ञानिक है।

(2) इस उद्देश्य से एकांगीपन दूर हो जाता है।

(3) प्रत्येक बालक की कुछ जन्मजात शक्तियाँ होती है। इन सबका समविकास होना आवशयक है। इस उद्देश्य के द्वारा बालक की सभी शक्तियों को समान रूप से विकसति करके व्यक्तित्त्व का सन्तुलित विकास किया जा सकता है।

(4)  यदि बालक की सभी शक्तियों का विकास समान रूप से न करके केवल कुछ ही शक्तियों को दूसरी शक्तियों की अपेक्षा अधिक अधिक विकसित कर दिया गया तो उसके व्यक्तित्व का सन्तुलन बिगड़ जायेगा। उसके व्यक्तित्व को प्रभावशील बनाने के लिए उसकी समस्त शक्तियों का समविकास करना परम आवशयक है। इसलिए गांधी जी ने भी लिखा है – “ शारीर बुद्धि एवं आत्मा का उचित सामंजस्यपूर्ण मानव की रचना करते हैं और यही तीनों शिक्षा को मितव्ययता का निर्माण करते हैं।”

(5) इस उद्देश्य के अनुसार पाठ्यक्रम का रूप भी अधिक व्यापक हो जाता है जिससे बालकों के ज्ञान में अधिक वृधि होनी सम्भव है।

(6) इस उद्देश्य के अनुसार शिक्षा में उन विषयों को भी सम्मिलित करने की आवश्यकता है जिनको व्यर्थ समझकर छोड़ दिया जाता है।

(7) समविकास का उद्देश्य बालक को विभिन्न परिस्थितियों का सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता प्रदान करता है।

(8) समस्त शक्तियों का समविकास होने पर मनुष्य किसी प्रकार शारीरिक अथवा मानसिक रोगों का शिकार नहीं बनता।

(9) इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त करके मनुष्य में समाज सेवा की भावना जागृत हो जाती है। अत: समविकास का उद्देश्य प्रत्येक दृष्टि से व्यापक तथा पूर्णता की ओर है।

(10) पेन्टर ने ठीक लिखा है – “ शिक्षा का उद्देश्य पूर्ण मानव का विकास है।“

(11) माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार भी – “वह शिक्षा शिक्षा कहलाने के योग्य नहीं है, जो मनुष्य में अपने साथी मनुष्यों के साथ सुन्दरता, सामंजस्य एवं कुशलता से रहने के आवशयक गुणों का विकास नहीं करती है।”

उद्देश्य के विपक्ष में तर्क

(1) समविकास के उद्देश्य का अर्थ स्पष्ट तथा निश्चित नहीं है।

(2) यदि इस उद्देश्य का अर्थ बाहरी बातों के समविकास से लगाया जाए तो बालक क सभी बातों का केवल थोडा-थोडा ही ज्ञान हो सकेगा। इससे वह किसी विषय का पूर्ण पंडित नहीं बन सकेगा।

(3) यदि इस उद्देश्य का अर्थ आन्तरिक शक्तियों के समविकास से लगाया जाये तो यह कठिन ही नहीं, असम्भव भी है।

(4) सभी मनुष्यों की जन्मजात शक्तियों का समविकास करना असम्भव है। इसका एकमात्र कारण व्यक्तिगत विभिन्नता है। प्रत्येक व्यक्ति की रुचियाँ, अभिरुचियाँ, क्षमतायें तथा योग्यतायें अलग-अलग होती है। परिणामस्वरूप उसका विकास प्रत्येक दशा में बराबर-बराबर न होकर एक ही दशा में होता है और वह उसी दशा में सफलता प्राप्त कर सकता है।

(5) समविकास का उद्देश्य व्यवहारिक भी नहीं है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान का भण्डार हो नैतिक आदर्शों से परिपूर्ण हो तथा शारीरिक दृष्टि से बलिष्ट हो, सम्भव नहीं है।

(6) आज तक ऐसा कोई मापदण्ड निश्चित नहीं किया जा सकता है जिससे यह पता चल जाये कि बालकों का समविकास हुआ है अथवा नहीं।

(7) व्यक्तिगत विभिन्नता को सामने रखते हुए बालकों की समस्त शक्तियों को एक ही अनुपात में विकसति करना अमनौवैज्ञानिक है।

(8) रेमान्ट के अनुसार – “इस योजना की कमजोरी यह थी कि इसने व्यक्तिकता की अवहेलना की तथा सर्वोच्च प्रकार के विकास का विरोध किया।”

(9) वर्तमान युग में विशेषीकारण की ओर ध्यान दिया जाता है। अत: समविकास के उद्देश्यों को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

नागरिकता का उद्देश्य

उद्देश्य का अर्थ

समाजवादीयों का मत है की जनतंत्र में बालक को सच्चा, इमानदार तथा कर्मठ नागरिक बनाना परम आवश्यक है। अत: उन्होंने नागरिकता के उद्देश्य पर बल दिया है। नागरिकता के लिए अनके बौद्धिक, नैतिक तथा सामाजिक गुणों की आवशयकता होती है। इस दृष्टि से इस उद्देश्य के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से की जानी चाहिये की प्रत्येक बालक में ये सभी गुण उसकी रुचियों, योग्यताओं तथा क्षमताओं के अनुसार विकसति हो जायें। सच्चा नागरिक बनाने के लिए बालक में जहाँ एक ओर अनके गुणों करना भी परम आवशयक है। इसके लिए उसे ऐसे अवसरों की आवशयकता है जिनके आधार पर अपने कर्तव्यों तथा अधिकारों का पालन करते हुए राज्य की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनितिक समस्याओं के विषय में स्पष्ट तथा स्वतंत्र रूप से चिन्तन कर सके एवं उन्हें सफलतापूर्वक सुलझाते हुए अपने भार को स्वयं वहन कर सकें। संक्षेप में, नागरिकता के उद्देश्य के अनुसार बालक की शिक्षा ऐसी होनी चाहिये जिसे प्राप्त करके वह अपने स्वतंत्र व्यक्ति को विकसित करते हुए अपनी योग्यताओं तथा क्षमताओं के अनुसार स्वतंत्र नागरिक के रूप में राष्ट्र की तन मन और धन से सेवा कर सके। ध्यान देने की बात है कि आज के लोकतंत्रीय राष्ट्रों में नागरिकता की शिक्षा पर ही विशेष बल दिया जाता है। अत: एच० एच० हार्न ने नागरिकता के अर्थ तथा उसके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए ठीक ही लिखा है – “ नागरिकता राज्य में मानव का स्थान है। चूँकि राज्य समाज की संस्थाओं में से एक संस्था है और चूँकि मानव को अपने साथियों के साथ सदैव संगठित सम्बन्धों के साथ रहना है इसलिए नागरिकता को शिक्षा के आदर्श के क्षेत्र से बाहर नहीं किया जा सकता “|

उद्देश्य के पक्ष में तर्क

(1) जनतंत्र जीवन-यापन का एक ढंग है। प्रत्येक व्यक्ति को इस ढंग से परिचित करना परम आवश्यक है।

(2) जनतांत्रिक जीवन के कुछ आदर्श एवं मूल्य होते हैं। बालक में इन आदर्शों तथा मूल्यों को विकसित करना केवल नागरिकता की शिक्षा के द्वारा सही सम्भव है।

(3) प्रत्येक नागरिक को राजनितिक तथा सामाजिक प्रकिर्याओं का ज्ञान होना चाहिये। इसके लिए नागरिकता की शिक्षा परम आवशयक है।

(4) जनतंत्र नागरिक जीवन के लिए एक विशेष प्रकार के चरित्र की आवशयकता होती है। ऐसे चरित्र का विकास नागरिकता की ही शिक्षा के द्वारा किया जा सकता है।

(5) नागरिकता की शिक्षा बालक में सामान्य राष्ट्रीय स्वाभाव का विकास करती है।

(6) जनतंत्र की सफलता के लिए नागरिकता की शिक्षा परम आवशयक है। यदि नागरिक अच्छे हैं तो जनतंत्र अपने आदर्शों, मूल्यों तथा लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेगा, अन्यथा नहीं। इस दृष्टि से नकारिकता का उद्देश्य एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। प्लेटो ने लिखा है – “केवल नागरिकता की ही शिक्षा ऐसी शिक्षा है, जो अपना नाम चरिरार्थ करती है। इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार की शिक्षा जिसका उद्देश्य धन, शारीरिक बल अथवा वृधि तथा न्याय से अलग दक्षता को प्राप्त करना है, तुच्छ तथा अनुदार है एवं किसी भी प्रकार से ‘शिक्षा’ कहलाने के योग्य नहीं है।

पूर्ण जीवन का उद्देश्य

उद्देश्य का अर्थ

उन्नीसवीं शताब्दी के जिन शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा का उद्देश्य “जीवन को पूर्णता प्रदान करने” पर बल दिया, उनमें प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री हरबार्ट स्पेंसर का नाम विशेष उल्लेखनीय है। स्पेंसर का विचार था कि व्यक्ति का विकास किसी अमुक क्षेत्र में न होकर सर्वांगीण होना चाहिये। अत: उसने इस बात पर बल दिया है कि शिक्षा के द्वारा व्यक्ति के जीवन में विभिन्न अंशों का विकास इस प्रकार से होना चाहिये कि वह अपने भावी जीवन की समस्त समस्यों को आसानी से सुलझा सके। स्पेंसर ने स्वयं लिखा है – “ शिक्षा को चाहिये कि वह हमें बताये की शारीर के प्रति कैसा व्यवहार करें, मन के प्रति कैसा व्यवहार करें, किस प्रकार अपनी योजनाओं का प्रबन्ध करें, किस प्रकार परिवार का पालन-पोषण करें, किस प्रकार एक नागरिक के रूप में व्यवहार करें, किस प्रकार सुख के उन प्रसाधनों का प्रयोग करें जो प्रकृति ने प्रदान किये हैं। किस प्रकार समस्त शक्तियों को अपने तथा दूसरों के अधिक हित के लिए प्रयोग करें। “

उपर्युक्त बातों को दृष्टि में रखते हुए स्पेंसर ने शिक्षा के उद्देश्य का वर्णन करते हुए लिखा है – “ शिक्षा का अर्थ हमें पूर्ण जीवन के लिए तैयार करना है और किसी भी शिक्षा-पद्धति की विवेकपूर्ण आलोचना करने का केवल एक ही मार्ग है – यह देखना कि इस उद्देश्य में वह वहाँ तक साफत होती है। “

उद्देश्य के पक्ष में तर्क

(1) पूर्ण जीवन का उद्देश्य अन्य उद्देश्यों की भांति एकांगी तथा संकुचित नहीं है। यह उद्देश्य सर्वांगीण तथा व्यापक है।

(2) इस उद्देश्य के अनुसार व्यक्तित्व के सभी पहलुयों का विकास हो जाता है। पूर्ण जीवन का उद्देश्य व्यक्ति को उसके जीवन की प्रत्येक परिस्थितियों के लिए तैयार कर देना है। स्पेंसर ने लिखा है – “ जिस प्रकार एक घोड़ा कभी गाड़ी खींचने के लिए तो कभी रेस में दौड़ने के लिए अपनी शक्ति, स्वाभाव मांग एवं गति के अनुसार प्रयोग करता है, इसी प्रकार मानव शक्तियों को सामाजिक दशाओं के अनुकूल पूर्ण रूप से सुधारा जाना चाहिये।”

(3) शेरवुड एडीरसन के अनुसार – “व्यक्ति को जीवन की विभिन्न समस्याओं के लिए तैयार करना शिक्षा का पूर्ण उद्देश्य है अथवा होना चाहिये।”

(4) यह उद्देश्य समाज को प्रगति के सभी आधारों-वैज्ञानिकता, उपयोगिता, सामाजिकता तथा सहकारिता पर बल देता है। इसलिए इस उद्देश्य के अनुसार शिक्षा प्राप्त करके व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास होना निश्चित है।

(5) पूर्ण  जीवन का उद्देश्य जीवन की सभी प्राथमिक आवशयकताओं को पूरा करने पर बल देता है। इस आशय की पुष्टि करते हुए ग्रेवज का मत है – “हरबर्ट स्पेंसर ने विद्वानों और जीवन की नवीन योजना की सिफारिश की है, जिसमें व्यक्ति सम्बन्धित मूल्यों के अनुसार सब प्रकार के लाभों को प्राप्त कर सकेगा।”

उद्देश्य के विपक्ष में तर्क

(1) स्पेन्सर ने समूर्ण जीवन की प्रप्ति के लिए पठ्यक्रम में धर्म के लिए कोई स्थान नहीं दिया है। उसने केवल विज्ञानं के विषयों को ही सब कुछ समझा है। यदि स्पेन्सर के उद्देश्य अनुसार बालकों को शिक्षित किया जाये, तो उनका आध्यात्मिक तथा नैतिक विकास कुण्ठित हो जायेगा। परिणामस्वरूप वे स्वार्थी बन जायेंगे। उन्हें दूसरों के दुःख और सुख की कोई चिन्ता नहीं होगी। ऐसी दशा में क्या सम्पूर्ण जीवन से व्यक्ति के अध्यात्मिक मूल्यों को प्रथक किया जा सकता है  ? जब तक व्यक्ति में अध्यात्मिक तथा नैतिक गुणों का विकास नहीं होगा, तब तक सम्पूर्ण जीवन एक भ्रम है।

(2) स्पेन्सर ने अपना ध्यान केवल भौतिक संसार की उन्नति पर ही केन्द्रित किया है। उसने यह नहीं सोचा कि इससे भी आगे कोई और संसार है। वास्तविकता यह है कि दूसरे संसार की तैयारी भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी इस संसार की है। टाइक ने ठीक लिखा है –“जीवन का मूल्य इस संसार की आशाओं तथा आनन्दों से नहीं, अपितु उस तैयारी से आंकिये, जो वह दुसरे संसार के लिए करता है।”

(3) स्पेन्सर ने जीवन की समस्त क्रियाओं को विभाजित करते समय अवकाशकाल के समय की क्रियाओं को पांचवा स्थान दिया है। दुसरे शब्दों में, उसने पाठ्यक्रम में विज्ञान की अपेक्षा संगीत, कला, तथा साहित्य को गौण स्थान दिया है| स्पेन्सर का यह विचार भी सर्वमान्य नहीं हो सकता। आज के वैज्ञानिक युग में अवकाशकाल बढ़ता चला जा रहा है। यदि अवकाशकाल की क्रियाओं को महत्त्व नहीं दिया जायेगा, तो व्यक्ति अपने अवकाशकाल का सदुपयोग नहीं कर सकेगा। सदैव उपयोगी होता है और न ही संगीत, कला तथा साहित्य को ही अनुपयोगी समझ लेना चाहिये। जितनी आवश्यकता व्यक्ति के शारीर को स्वस्थ रखने की है उतनी ही आवशयकता उसके मन को मन को भी स्वास्थ्य रखने की है। ध्यान देने की बात है कि विज्ञान को भी कला के स्पर्श से अधिक आकर्षक तथा उपयोगी बनाया जा सकता है। ऐसी दशा में जहाँ पाठ्क्रम में विज्ञान के विषयों को महत्त्व दिया जाना चाहिये वहां संगीत, कला तथा साहित्य, आदि विषयों की भी अवहेलना नहीं की जा सकती है।

(4) स्पेन्सर ने प्रत्येक बालक के लिए एक ही पाठ्यक्रम निश्चित किया है, अत: इस उद्देश्य के अनुसार बालकों को रुचियों का कोई भी ध्यान नहीं रखा जा सकता। यह अमनोवैज्ञानिक है।

(5) स्पेन्सर ने पाठ्यक्रम का जो क्रम निश्चित किया है, वह भी अमनोवैज्ञानिक है। इसकी अनुसार प्रत्येक बालक को आरम्भ से ही शारीर-विज्ञान तथा पदार्थ विज्ञान जैसे कठिन विषयों का अध्ययन करना आवश्यक है। प्रत्येक बालक से यह आशा नहीं की जा सकती है कि वह इन विषयों का अध्ययन अपनी रूचि के विपरीत कर ही लेगा।

(6) पूर्ण जीवन का उद्देश्य बालक को इस प्रकार से शिक्षित करने पर बल देता है कि वह एक प्रौढ़ व्यक्ति की भांति कार्य कर सके। इससे बाल्यावस्था का मूल्य ही नष्ट हो जाता है। इसमें संदेह नहीं है कि बाल्यावस्था एक प्रकार से भविष्य की तैयारी है, परन्तु इसका अपना स्वयं का भी अनोखा मूल्य है।

(7) रूसो के अनुसार –“ वह जंगली शिक्षा किस काम की है, जो कि भविष्य के लिए वर्तमान को बलिदान करती है। “

(8) सम्पूर्ण जीवन का अर्थ विवाद का विषय है। विभिन्न व्यक्तियों ने सम्पूर्ण जीवन के अलग-अलग अर्थ लगाये हैं। इस मतभेद के कारण समूर्ण जीवन का उद्देश्य अनिश्चित है। इसलिए इस उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

शारीरक विकास का उद्देश्य

कुछ शिक्षाशास्त्रियों ने इस बात पर बल दिया है कि व्यक्ति के शारीर का विकास होना परम आवश्यक है। अत: उन्होंने शिक्षा में शारीरिक विकास के उद्देश्य को शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य माना है।

उद्देश्य का अर्थ

शारीरिक विकास के उद्देश्य का अर्थ यह है कि बालक की शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिये, जिसको प्राप्त करके उसका शारीर स्वास्थ्य, सुद्रढ़, सुन्दर एवं बलवान बन जाये। प्राचीन तथा मध्यकालीन इतिहास इस बात की पुष्टि करता है कि अनके देशों में शिक्षा की इसी उद्देश्य को मान्यता प्रदान की गई है। हम देखते हैं कि ग्रीस के प्राचीन राज्य स्पार्टा में शारीरिक उद्देश्य को ही वहाँ की शिक्षा का मुख्य उद्देश्य माना गया था। यही कारण है कि वहाँ के निवासी अपने बल और पौरष के लिए प्रसिद्ध रहे तथा उन वीर योद्धाओं की कहानियाँ आज भी बड़े चाव से पढ़ी जाती है। प्लेटो जैसे प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री ने भी अपनी शिक्षा योजना में शारीरिक विकास को महत्वपूर्ण स्थान दिया। यही नहीं, रूसो जैसे महान दार्शनिक ने भी बालक के शारीरिक विकास पर बल दिया और बताया कि बालक को स्फूर्तिमान तथा क्रियाशील बनाने के लिए उसकी शारीरिक-शक्ति को पूर्णरूपेण विकिसत करना परम आवश्यक है। इसलिए उसने बालक की शिक्षा में प्रारम्भ से ही खेलकूद तथा व्यायाम के उचित प्रबन्ध पर विशेष बल दिया। शारीरिक विकास की आवश्यकता पर बल देते हुए रेवेल ने भी लिखा है – “ स्वास्थ्य के बिना जीवन, जीवन नहीं है। यह केवल स्फुर्तिहीनता तथा वेदना की दशा है, मृत्यु का प्रतिरूप है।”

उद्देश्य के पक्ष में तर्क

(1) शारीरिक विकास होने से व्यक्ति स्फूर्तिमान तथा क्रियाशील रहता है। अतएव प्रत्येक मानव को स्वस्थ होना चाहिये। यदि मानव स्वस्थ नहीं होगा, तो वह अपने जीवन के किसी कार्य को मन लगाकर नहीं कर सकेगा।

(2) जिस समाज अथवा राष्ट्र के व्यक्ति बलवान होते हैं, वह राष्ट्र अत्यन्त बलशाली होता है।

(3) इस सत्य से कोई भी व्यक्ति विमुख नहीं हो सकता कि ‘स्वस्थ शारीर में ही स्वास्थ्य मस्तिष्क का वास होता है। अस्वस्थ शारीर मानसिक रोगों का घर होता है।’ इसलिए बेन्सन आदि विद्वानों ने ठीक ही लिखा है –“मनुष्य के कोषों के कार्य में अव्यवस्था होना सामाजिक जीवन से दूर होने के लिए उत्तरदायी होता है।”

(4) शारीरक विकास से व्यक्ति में उत्साह की वृधि होती है तथा उसके चारित्रिक गुणों का विकास होता है, जिससे वह अपने जीवन का सच्चा आनन्द लेता है।

(5) शारीरिक विकास का उद्देश्य व्यक्ति और राष्ट्र दोनों के लिए परम आवश्यक है। जिस राष्ट्र के व्यक्ति शक्तिहीन होते है, वह राष्ट्र भी शक्तिहीन होता है। इसके विपरीत जिस राष्ट्र के व्यक्ति जितने शक्तिशाली होते हैं, वह राष्ट्र उतने ही शक्तिशाली कहलाता है। इसलिए स्पार्टा आदि राज्यों में शारीरिक विकास के उद्देश्य को सामने रखकर वहाँ के व्यक्तियों को शिक्षित किया जाता था।

(6) डॉ जानसन के अनुसार – “ स्वास्थ्य को बनाये रखना नैतिक और धार्मिक कर्त्तव्य है क्योंकि स्वास्थ्य की सब सामाजिक गुणों का आधार है। “

(7) डबल्यू० हाल के अनुसार- “अपने स्वस्थ्य का धयान रखिये। उसकी अवहेलना करने का आपको कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि ऐसा करके आप अपने तथा दूसरों के लिए भार बन जाते हैं।”

(8) अरस्तु के अनुसार –“स्वस्थ शारीर में स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है।”

उद्देश्य के विपक्ष में तर्क

(1) बालक की समस्त शक्तियों का विकास होना आवश्यक है। उसकी अन्य शक्तियों के विकास को रोककर शारीर को ही विकसति करना उचित नहीं है।

(2) शारीरक विकास मानसिक विकास की अवहेलना करता है। व्यक्ति के लिए जितना आवश्यक शारीरिक विकास है, उतना ही आवशयक मानसिक विकास भी है।

(3) शिक्षा के उद्देश्य का जीवन के लक्ष्य से गहरा सम्बन्ध होता है। यदि शिक्षा का उद्देश्य शारीरिक विकास ही है, तो जीवन का उद्देश्य अत्यंत संकीर्ण हो जाता है। केवल बल और पौरष को प्राप्त करने से तो जीवन का लक्ष्य कहीं ऊँचा है।

(4) दिन-रात शारीर को बलशाली बनाने से व्यक्ति स्वार्थी तथा अभिमानी भी बन सकता है।

(5) जब व्यक्ति की शक्ति आवश्यकता से अधिक बढ़ जायेगी तो अपनी शक्ति के नशे में वह दूसरों का अहित भी कर सकता है।

(6) आज के मनोवैज्ञानिक युग में मनोविज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि स्वस्थ मस्तिष्क में स्वस्थ शारीर का निवास होता है|

(7) शारीरिक विकास पर अधिक बल देने से मानव धर्मोंपासन भी नहीं कर सकता है।

(8) शारीरिक उद्देश्य मानव की पाशविक प्रवृतियों को विकसित करता है। इससे मानवीय गुणों का अन्त हो जायेगा तथा वह झगड़ालू एवं चरित्रहीन बन जायेगा। यदि चरित्र ही नहीं रहा तो फिर जीवन बेकार है।

(9) शिक्षा के द्वारा बालक का सर्वांगीण विकास होना चाहिये। परन्तु शारीरिक उद्देश्य केवल शारीर को ही विकसित करता है। अत: यह उद्देश्य एकांगी है।

अवकाश-उपयोग का उद्देश्य

अवकाश-उपयोग के उद्देश्य का अर्थ

अवकाश का अर्थ है फुरसत का समय अथवा ऐसा समय जिसमें व्यक्ति जीविकोपार्जन सम्बन्धी कार्य न करता हो। रंगनाथन के अनुसार- “अवकाश का तात्पर्य ऐसे समय से है जिसमें व्यक्ति अपनी शारीरिक, आर्थिक, स्वास्थ्य सम्बन्धी तथा अध्यात्मिक शक्तियों के वशीभूत होकर किसी कार्य को न करे। “

वर्तमान युग में विज्ञान ने ऐसी-ऐसी आश्चर्यजनक मशीनों का अविष्कार कर दिया है जिनके प्रयोग से आज का मानव कम से कम समय में अधिक से अधिक कार्य कर लेता है। फलस्वरूप अब सभी लोगों को पर्याप्त मात्रा में अवकाश मिलने लगा है। ऐसी दशा में अवकाश काल के सदुपयोग करने की समस्या एक महत्वपूर्ण समस्या बन गई है। यही कारण कि कुछ शिक्षाशास्त्रीयों ने अवकाश के समय का सदुपयोग करना ही शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य माना है। उसका कहना है कि शिक्षा हमको केवल जीविकोपार्जन के लिए तैयार नहीं करती अपितु अपने खाली अथवा फुरसत के समय का सदुपयोग करना भी सिखाती है। इस उद्देश्य के उग्र समर्थकों का तो यहाँ तक विश्वास है कि शिक्षा की वास्तविक उपयोगिता जीविकोपार्जन में न होकर अवकाश काल में है।

उद्देश्य के पक्ष में तर्क

(1) अवकाश काल के लिए शिक्षा बालकों का संवेगात्मक तथा कलात्मक विकास करती है।

(2) शिक्षा का यह उद्देश्य बालकों को रचनात्मक कार्यों के लिए तैयार करता है।

(3) यह उद्देश्य इस बात की ओर संकेत करता है कि बालकों को संगीत तथा कला एवं नृत्य की शिक्षा देना परम आवश्यक है।

शिक्षा जीविकोपार्जन का उद्देश्य तो व्यक्ति को केवल पेट भरने की शिक्षा देता है, उसके अवकाश का सदुपयोग करना नहीं सिखाता। व्यक्ति का लिए अपने फुरसत के समय का ठीक-ठाक प्रयोग करना भी अत्यन्त आवशयक है। यह उद्देश्य इस बात की पूर्ति करता है।

(5) इस प्रकार की शिक्षा से हम अपने अवकाश को समय का उचित प्रयोग कर सकते हैं। इससे हमें व्यर्थ की बातें सोचने का अवसर ही प्राप्त नहीं होता।

उद्देश्य के विपक्ष में तर्क

(1) सच्ची शिक्षा का उद्देश्य को उसके जीवन के सभी कार्यों को करने के योग्य बनाना है न की उसे केवल अवकाश का सदुपयोग करना ही सीखना है।

(2) इस उद्देश्य के द्वारा यह बात निश्चित नहीं की जा सकती कि अवकाश का सदुपयोग किस ढंग से किया जाये।

(3) इस उद्देश्य के अनुसार अवकाश की शिक्षा केवल उन्ही लोगों के लिए आवशयक समझी जाती है जिनके पास या तो पर्याप्त अवकाश है या जिनका अधिकांश समय किसी व्यवसाय में खर्च नहीं होता है। ऐसी दशा में उन मजदूरों के लिए तो शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं की जायेगी, जो निरन्तर परिश्रम करने में जुटें रहते हैं।

(4) वर्तमान युग में मानव की आवश्यकताओं पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति धन कमाने के चक्कर में इतना व्यस्त रहता है कि अवकाश के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकता है।

(5) ऐसा भी हो सकता है कि, इस उद्देश्य के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात भी बालक अपने अवकाश का सदुपयोग न कर सके।

(6) यह भी हो सकता है की परिवार अथवा समाज का वातावरण बालकों के सामने ऐसी बाधायें उपस्थिति कर दे कि वे अपने अवकाश का उचित प्रयोग न कर सकें।

(7) अवकाश के सदुपयोग की शिक्षा केवल उच्च वर्ग के उन धनी लोगों तक ही सीमित रह जाती है जिनके पास कुछ अधिक कार्य करने को नहीं होता। यह बात जनतंत्रीय सिधान्तों के विपरीत है क्योंकि जनतांत्रिक युग में शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है।

अनुकूलन का उद्देश्य

उद्देश्य का अर्थ

कुछ विद्वानों का मत है कि शिक्षा का उद्देश्य बालक में ऐसी क्षमता उत्पन्न करना है जिससे वह अपने आप को अपनी परिस्थितियों अथवा वातावरण के अनुकूल बना ले। जिन विद्वानों ने इस उद्देश्य का समर्थन किया है उनमें प्रनिशास्त्रियों का प्रमुख स्थान है। इन विद्वानों का मत है कि संसार के प्रत्येक प्राणी को जीवित रहने के लिए अपनी परिस्थितियों अथवा प्राकृतिक एवं सामाजिक वातावरण से सदैव संघर्ष करना पड़ता है। जो प्राणी इस संघर्ष में सफल हो जाता है वही जीवित रहता है। इसके विपरीत जो प्राणी वातावरण के अनुकूल नहीं कर पाता वह नष्ट हो जाता है। अत: उनकी दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य बालक को इस प्रकार की शिक्षा देना है जिससे वह अपने भावी जीवन में विभिन्न प्रकार के वातावरण से अनुकूलन कर सके।

उद्देश्य के पक्ष में तर्क

(1) संसार में प्रत्येक व्यक्ति में इतनी क्षमता उत्पन्न करना परम आवश्यक है कि वह प्राकृतिक वातावरण से अनुकूल कर सके।

(2) यह एक प्राकृतिक नियम है की जो व्यक्ति प्रकृति वातावरण के अनुकूल कर लेता है वही व्यक्ति जीवित रहता है, अन्यथा नष्ट हो जाता है। ऐसी दशा में बालकों को अनुकूलन करने योग्य बनाना परम आवशयक है।

(3) बालक को किसी समाज का अच्छा तथा उपयोगी सदस्य बनाने के लिए यह आवशयक है कि उसे समाज से अनुकूल करना सिखाया जाये। यदि बालक अपने सामाजिक वातावरण से अनुकूलन करने में असमर्थ हो जायेगा तो वह उसका अच्छा तथा उपयोगी सदस्य नहीं बन सकेगा। ऐसी दशा में उसे उस समाज के अनुकूलन करना सिखाना परम आवश्यक है, जिसमें उसे रहना है।

(4) सामाजिक वातावरण में कोई भी व्यक्ति उसी समय शिक्षा प्राप्त कर सकेगा, जब वह अपने अपको इसके अनुकूल बना लेगा।

(5) सामाजिक क्षेत्र में प्रगति करने तथा जीवन को सफल बनाने की एकमात्र कुंजी है –सामाजिक वातावरण से अनुकूलन करना। जो व्यक्ति सामाजिक वातावरण से अनुकूलन नहीं कर सकता है, वह अपने जीवन में सफल नहीं हो पाता।

उद्देश्य के विपक्ष में तर्क

(1) केवल परिस्थितियों से अनुकूलन करना है ही मानव के जीवन का उद्देश्य नहीं है।

(2) मानव के जीवन का लक्ष्य तो कुछ और ही है। इस उद्देश्य से वह लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता।

(3) इस उद्देश्य के अनुसार मानव और पशु में कोई अन्तर नहीं है दोनों को वातावरण से संघर्ष करना पड़ता है। जो वातावरण से अनुकूलन कर लेता है वह जीवित रहता है, अन्यथा नष्ट हो जाता है। मानव निरा पशु नहीं है। वह बुद्धि सम्पन्न है। ऐसी दशा में पशुओं के लिए प्राकृतिक वातावरण से अनुकूलन करना आवशयक है, मनुष्य के लिए नहीं।

(4) मानव एक बौद्धिक तथा अध्यात्मिक प्राणी है। वह वातावरण से अनुकूलन ही नहीं करता अपितु अपने ज्ञान तथा विवेक की शक्ति से उसको नियंत्रित भी करता है। इतना ही नहीं उसमें आवश्यकतानुसार सुधार भी करता है। किसी ने ठीक ही कहा है – “लोग वे हैं जो जमाने को बदल देते हैं।”

(5) यदि ध्यानपूर्वक देखा जाये तो पता चलेगा की- प्राकृति का नियम योग्यतम को बनाने रखना ही नहीं है, वरन अयोग्यों को भी शक्तिशाली बनाना है। ऐसी दशा में अनुकूलन का उद्देश्य बहुत ही सीमित तथा संकुचित है।

आत्मभिव्यक्ति का उद्देश्य

(अ) व्यक्तिवादी विचारकों ने आत्मभिव्यक्ति अथवा आत्म-प्रकाशन का समर्थन किया है। आत्म-प्रकाशन का अर्थ है मूल प्रवृतियों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने के अवसर प्रदान करना। अत: इस उद्देश्य के अनुसार बालक की मूल प्रवृतियों को इस प्रकार से विकसित किया जाना चाहिये कि वह उनको स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सके। यह बात उसी समय सम्भव हो सकती है जब समाज में ऐसी स्वतंत्रता, रीती-रिवाज तथा परिस्थितियों हो जिनकी सहयता से बालक अपनी काम, जिज्ञासा तथा आत्म गौरव आदि जन्मजात प्रवृतियों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सके।

उद्देश्य के पक्ष में तर्क

(1) बालक की मूल-प्रवृतियां जन्मजात होती है। अत: उसे अधिकार है कि वह उन्हें स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सके।

(2) मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी मूल-प्रवृतियों का स्वतंत्र विकास आवशयक है।

(3) मूल-प्रवृतियों के दमन करने से बालक में अनके मानसिक रोग उत्पन्न जो जाते हैं। अत: इनका दमन करना हानिकारक है।

(4) यदि बालक की मूल-प्रवृतियों को अनुचित आदर्शों द्वारा दबाया जायेगा तो उसमें अपराध की भावना उत्पन्न हो जायेगी। परिणामस्वरूप वह स्नायुविक क्षति से ग्रसित हो जायेगा।

(5) मूल-प्रवृतियों को व्यक्त करने से बालक को आनन्द प्राप्त होता है। अत: उसे इनके व्यक्त करने के अवसर अवश्य मिलने चाहियें।

(6) मूल-प्रवृतियों का दमन करने से बालक के अचेतन मन में भावना-ग्रंथियाँ बन जाती है। परिणामस्वरूप उसका व्यक्तित्व विकृत हो जाता है।

उद्देश्य के विपक्ष में तर्क

(1) सोरोकिन के आंकड़ों से पता चलता है कि जिन देशों में काम-प्रवृति की स्वतंत्रता प्रदान कर दी गई है, वहाँ के अस्पतालों में मानसिक रोगियों की संख्या 45% अधिक है।

(2) सच्ची स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रित स्वतंत्रता है न कि निरंकुश स्वतंत्रता। बार्कर ने ठीक ही लिखा है –“ सुन्दरता कुरूपता का अभाव नहीं है। इसी प्रकार स्वतंत्रता नियंत्रणों का अभाव नहीं है।”

(3) यह उद्देश्य समाज विरोधी है। रेमान्ट ने लिखा है –“स्वतंत्र आत्म-प्रदर्शन अथवा आत्म-प्रकाशन का एक औषधि के रूप में प्रयोग अन्त में अपने स्वयं के उद्देश्य का ही विनाशक है। “

(4) पिनकार्ड के अनुसार- “सच्ची स्वतंत्रता अपने स्वयं के अधिकारों को प्रयोग करना है न कि दूसरों के अधिकारों को नष्ट करना।”

(5) बालक की मूल-प्रवृतियों की प्रवृति पाशविक होती है। यदि बालक की इन मूल-प्रवृतियों को स्वतंत्रता पूर्वक व्यक्त करने के अवसर दियें जायेंगे तो वह मानव न बन कर कोरा पशु ही बना रहेगा। अत: यह उद्देश्य एकांगी है।

आत्मानुभूति का उद्देश्य

उद्देश्य का अर्थ

आत्मानुभूति अथवा आत्मबोध का अर्थ है –प्राकृति, मानव तथा परम-पिता परमेश्वर को समझाना। अत: कुछ विद्वानों का मत है कि शिक्षा का उद्देश्य बालक का आत्मिक विकास करना है जिससे वह समाज के माध्यम से अपने सर्वोच्च गुण की अनुभूति कर सके। इस दृष्टि से आत्मानुभूति तथा आत्माभिव्यक्ति के उद्देश्यों में आकाश-पाताल का अन्तर है। आत्माभिव्यक्ति में आत्मा का अर्थ पाशविक प्रवृतियों वाली आत्मा से होता है, परन्तु रास के शब्दों में – “आत्मानुभूति में आत्मा का अर्थ वर्तमान असंतोषजनक एवं अनुशासनहीन आत्मा नहीं, अपितु भविष्य की पूर्णत: परिवर्धित आत्मा है। “

उद्देश्य के पक्ष में तर्क

(1) प्राचीन भारत की शिक्षा में आत्मानुभूति के उद्देश्य को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था। उस समय बालक को ऐसे विषय पढ़ायें जाते थे जिनके द्वारा उसे आत्मानुभूति हो सके।

(2) आत्मानुभूति से मानव को सुख और शान्ति प्राप्त होती है। इस दृष्टि से यह उच्च और महान उद्देश्य है।

(3) इस उद्देश्य से बालक की मूल-प्रवृतियों का शोधन तथा मर्गान्तिकरण करके मानवीय गुणों को विकसित किया जा सकता है।

(4) यह उद्देश्य बालक की पाशविक प्रवृतियों में परिवर्तन करता है।

(5) यह उद्देश्य व्यक्ति को सामाजिक आत्मा का एक अंग मानता है। अत: यह उद्देश्य समाज विरोधी भी नहीं है। इसके द्वारा बालक तथा समाज दोनों का विकास सम्भव है।

(6) आत्मानुभूति के उद्देश्य से बालक का चारित्रिक विकास होता है।

(7) यह उद्देश्य बालक में सर्वोतम गुणों को विकसति करके पूर्णता की ओर अग्रसर होने में सहयोग प्रदान करता है।

शिक्षा के सभी उद्देश्यों का एक सम्मिलित उद्देश्य


शिक्षा तथा दर्शन में घनिष्ठ सम्बन्ध है। दर्शन जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करता है। शिक्षा उस लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है। दुसरे शब्दों में, व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य यदि साध्य है तो शिक्षा उस लक्ष्य को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन है। शिक्षा के इतिहास पर विहंगम दृष्टिपात करने से पता चलता है कि भिन्न-भिन्न स्थानों पर तथा भिन्न-भिन्न समयों में प्राचीन काल से लेकर अब तक भिन्न-भिन्न दर्शन तथा विचारधारायें प्रचलित रही है। इन विभिन्न दर्शनों तथा विचारधाराओं से बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शिक्षा क्या विभिन्न उद्देश्यों का निर्माण किया है। जैसी आवश्यकता तथा परिस्थिति हुई उसी के अनुसार शिक्षा का संगठन हो गया। शिक्षा के उद्देश्य का यह परिवर्तन स्वाभाविक ही है। यदि शिक्षा के उद्देश्य परिवर्थानशील न हों तो शिक्षा का विकास रुक जायेगा। यही कारण है कि शिक्षा सदैव बदलते रहें हैं और भविष्य में भी बदलते रहेंगे। ध्यान देने की बात है कि यदि शिक्षा के उद्देश्य में परिवर्तन का यह क्रम निरन्तर चलता रहेगा तो शिक्षा का एक सर्वमान्य एवं सर्वव्यापक उद्देश्य निश्चित नहीं किया जा सकेगा। कुछ शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि वर्तमान युग में शिक्षा के सभी उद्देश्यों का एक उद्देश्य में समावेश हो जाना परम आवश्यक है। ठीक भी है। हम शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों की उक्त पंक्तियों में विस्तृत रूप से व्याख्या कर चुके हैं। यथा प्रत्येक उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में अनेक तर्क पस्तुत कर चुके हैं। इन सभी उद्देश्यों के अध्ययन करने से हम इस निष्कर्ष पर आये कि शिक्षा के प्रत्येक उद्देश्य में जहाँ एक ओर कुछ गुण हैं, वहाँ दूसरी ओर कुछ दोष भी अवश्य हैं। कोई भी उद्देश्य में जहाँ एक है जिसका अनुकरण करके वांछित फल प्राप्त किया जा सके। शिक्षा का शारीरिक उद्देश्य व्यक्ति का केवल शारीरिक विकास ही करता है तथा मानसिक उद्देश्य केवल मानसिक विकास तक ही सीमित रह जाता है। इसी प्रकार नैकित चरित्र का उद्देश्य व्यक्ति के केवल नैतिक विकास पर ही बल देता है तो शिक्षा का व्यवसायिक उद्देश्य व्यक्ति को केवल जीविका कमाने के लिए ही तैयार करना चाहता है। इस प्रकार शिक्षा का प्रत्येक उद्देश्य व्यक्ति के केवल एक ही अंग को विकसित करने पर बल देता है। इस दृष्टि से यदि हम शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों में से किसी एक उद्देश्य का अनुसरण करके शिक्षा का कार्यक्रम बना लें तो इसमें व्यक्ति का विकास केवल एक ही दिशा में हो सकेगा। ऐसी दशा में यदि व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना हो तो हमें एक ऐसा सर्वमान्य उद्देश्य निश्चित करना होगा जिसके अन्दर शिक्षा के सभी उद्देश्य आ जायें। शिक्षा के सभी उद्देश्यों का केवल एक ही उद्देश्य में समावेश हो जाने से ही व्यक्ति तथा समाज दोनों को लाभ होगा।

यदि हम ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि शिक्षा का तात्पर्य यह है कि वह मानव को उसके शारीर, मस्तिष्क तथा आत्मा का सदुपयोग करना सिखाये तथा उसे जीवन के लिए इसे प्रकार से तैयार करे कि वह प्रकृति द्वारा किये जाने वाले साधनों का उचित उपयोग करके अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए किसी पर भार न बने तथा सच्चे नागरिक के रूप में अपने और दूसरों के अधिकतम लाभ के लिए अपनी समस्त शक्तियों का उचित ढंग से प्रयोग कर सके। यही नहीं, आधुनिक युग में शिक्षा का यह भी कार्य है कि वह मानव को जातीयता, प्रान्तीयता तथा राष्ट्रीयता आदि भावनाओं पर आधारित वर्ग भेदों से ऊँचा उठाकर उसमें अपने राष्ट्र तथा अपनी संस्कृति के प्रति प्रेम की भावनाओं को विकसति करने के अतिरिक्त उसमें अपने राष्ट्रों तथा अन्य संस्कृतियों के प्रति सद्भावनायें विकसित करे जिससे वह विश्व नागरिक के रूप में विश्व के सभी समाजों में एक साथ समझदारी के साथ रह सके तथा सामान्य हित के लिए अन्य व्यक्तियों तथा राष्ट्रों के गुणों का सदुपयोग कर सके। ऐसी दशा में शिक्षा सर्वमान्य उद्देश्य उसी उद्देश्य को कहा जा सकता है जिसके अनुसरण करने से व्यक्ति का शारीरक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक विकास इस प्रकार से हो जाये कि वह किसी व्यवसाय  को अपना कर अपनी जीविका कम सके तथा यह समझ सके की समस्त ज्ञान परम पिता परमेश्वर की दी हुई धरोहर है तथा उसका प्रयोग एक कर्मठ नागरिक के रूप में दूसरों की सेवा के लिए किया जाना चाहिये। शिक्षा के प्रूव कथित उद्देश्यों में से कोई भी उद्देश्य ऐसा नहीं है जिसका अनुसरण करके व्यक्ति का उक्त सभी दशाओं में विकास किया जा सके। परन्तु शिक्षा के समस्त उद्देश्यों का एक सम्मिलित रूप अथवा सर्वमान्य उद्देश्य का अनुसरण करने से व्यक्ति तथा समाज दोनों का हित हो सकेगा। इस आदर्श उद्देश्य के अनुसार शिक्षा प्रदान करके व्यक्ति के सर्वांगीण विकास होने की पूरी-पूरी सम्भावना है। जब व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक सभी प्रकार का विकास हो जायेगा तो वह हर प्रकार के भेद-भावों से उपर उठकर सच्चे नागरिक के रूप में समाज की सेवा कनरे में निरन्तर जुटा रहेगा। दुसरे शब्दों में, इस सम्मिलित उद्देश्य में सम्मिलित रूप के द्वारा व्यक्ति तथा समाज दोनों का कल्याण एवं प्रगति होती रहेगी। चूँकि शिक्षा के इस आदर्श उद्देश्य को स्वीकार कर लेने से व्यक्ति की समस्त व्यक्तिगत तथा सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा होने की आशा है, इसलिए संसार के लगभग सभी शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के इसी उद्देश्य को एक मत होकर स्वीकार किया है। अन्त में यह कहना उचित की होगा कि शिक्षा के इस आदर्श उद्देश्य के अनुसार शिक्षा का कार्यक्रम बनाने से व्यक्ति तथा समाज दोनों का विकास तथा हित निश्चित है। अत: ये उद्देश्य सभी देशों तथा सभी कालों के लिए उपयुक्त है।

स्त्रोत: पोर्टल विषय सामग्री टीम

3.03157894737

अपना सुझाव दें

(यदि दी गई विषय सामग्री पर आपके पास कोई सुझाव/टिप्पणी है तो कृपया उसे यहां लिखें ।)

Enter the word
नेवीगेशन
संबंधित भाषाएँ
Back to top

T612019/10/14 15:55:35.357551 GMT+0530

T622019/10/14 15:55:35.377306 GMT+0530

T632019/10/14 15:55:35.378059 GMT+0530

T642019/10/14 15:55:35.378388 GMT+0530

T12019/10/14 15:55:35.303673 GMT+0530

T22019/10/14 15:55:35.303851 GMT+0530

T32019/10/14 15:55:35.303988 GMT+0530

T42019/10/14 15:55:35.304135 GMT+0530

T52019/10/14 15:55:35.304235 GMT+0530

T62019/10/14 15:55:35.304305 GMT+0530

T72019/10/14 15:55:35.305011 GMT+0530

T82019/10/14 15:55:35.305221 GMT+0530

T92019/10/14 15:55:35.305420 GMT+0530

T102019/10/14 15:55:35.305657 GMT+0530

T112019/10/14 15:55:35.305703 GMT+0530

T122019/10/14 15:55:35.305793 GMT+0530