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क्रमिक अधिगम पुस्तिकाएँ का कक्षाओं में उपयोग हेतु निर्देशक बिंदु

इस भाग में बच्चों में आरंभिक शिक्षा की तैयारी हेतु कुछ उपयोगी दिशा- निर्देश दिए गए है।

प्रस्तावना

बच्चों में आरंभिक साक्षरता के विकास में किताबों की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका होती है। प्राय: देखा गया है कि हमारी शासकीय प्राथमिक शालाओं में विशेषकर छोटे बच्चों को पढ़ने के लिए केवल पाठ्य पुस्तकें ही उपलब्ध होती हैं जबकि पढ़ना-लिखना सीखने के लिए सक्रिय अंतक्रियाओं के साथ-साथ पढ़ने-लिखने के सार्थक अवसरों का मिलना आवश्यक होता है। साक्षरता शब्द के मूल में भाषा के सभी अंगों – बोलना, सुनना, पढ़ना, लिखना और देखना के बीच के अंत:संबंधों को जानना निहित होता है।

अतः राज्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, छत्तीसगढ़ . द्वारा बच्चों में आरंभिक साक्षरता के विकास के लिए विशेष प्रयास किया जा रहा है। इसी तारतम्य में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, छत्तीसगढ़  द्वारा छ.ग. राज्य के बच्चों की आवश्यकता के अनुरुप हिन्दी भाषा शिक्षण के लिए सहायक सामग्री के रुप में कक्षा 1, 2, 3 के बच्चों के लिए क्रमिक अधिगम सामग्री का विकास किया गया है। यह सामग्री पूर्णतः बाल मनोविज्ञान एवं सीखने के सिद्धांतों पर आधारित है, जिसमें बच्चों को प्रत्येक सीखी हुई अवधारणा एवं सीखे हुए कौशल का उपयोग कर, पढ़ते हुए, मनोरंजक तरीके से आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं। इस प्रकार बच्चों के पठन-लेखन कौशल, धाराप्रवाहता, पढ़ने में रुचि, कल्पना शक्ति, एवं सृजनात्मकता का विकास करने तथा शालाओं में पठन सहयोगी वातावरण बनाने के लिए यह सामग्री अत्यंत उपयोगी है। अत: राज्य की समस्त प्राथमिक शालाओं में कक्षा 1, 2 व 3 हेतु 25-25-25 इस प्रकार कुल 75 पुस्तिकाओं के रुप में क्रमिक अधिगम सामग्री का विकास एवं वितरण राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, छत्तीसगढ़ द्वारा किया गया है।

उद्देश्य

  • बच्चों को औपचारिक पठन के पूर्व, प्रारंभिक कौशलों के विकास के अवसर देना।
  • बच्चों के लिए सरल शब्दों/वाक्यों में पठन योग्य सामग्री उपलब्ध कराना ताकि बच्चों
  • को समझ और मजे के साथ पढ़ने के अवसर मिल सके तथा उनकी पढ़ने की क्षमता का विकास हो सको ।
  • कक्षाओं में पठन समृद्ध वातावरण बनाना तथा बच्चों को पढ़ना सीखने एवं अभ्यास के अधिक अवसर देना ।
  • बच्चों में पुस्तकों के प्रति रुचि जागृत करना तथा उन्हें अभिव्यक्ति, कल्पनाशीलता, सृजनात्मकता एवं संवेदनशीलता के विकास के अवसर देना।
  • छोटे बच्चों को अपने परिवेश, व्यावहारिक ज्ञान / जानकारी व अनुभवों को जोड़ने के अवसर देना ।

क्रमिक अधिगम पुस्तिकाओं के विकास की पृष्ठभूमि

  • प्राथमिक शिक्षा से प्राय: यह अपेक्षा होती है कि सभी बच्चे अच्छी तरह पढ़ने व लिखने
  • लगें। यदि कोई बच्चा निर्धारित समय में अच्छी तरह पढ़ व लिख नहीं पाता तब उसके सीखने के अधिकार का उल्लंघन होता है।
  • यदि कोई बच्चा पढ़ना नहीं सीख पाता तब उसे विभिन्न विषयों को सीखने और अन्य कौशलों को प्राप्त करने में भी समस्या आती है जिससे वह निरंतर आगे की कक्षाओं में भी पिछड़ता चला जाता है।
  • छोटे बच्चे जब पढ़ना-लिखना नहीं जानते तब भी किताबों के साथ अंत:क्रिया करते हैं।
  • साक्षरता का आरंभ एक ऐसी प्रक्रिया है जो पढ़ना-लिखना सीखने तक जारी रहती है। प्रत्येक बच्चे के लिए समय व तरीका अलग-अलग हो सकता है।
  • परम्परागत अर्थों में साक्षर होने पर बच्चा वर्ण पहचान कर पढ़ने में समर्थ हो जाता है।
  • बच्चों में साक्षरता का विकास या पढ़ना-लिखना सीखना किताबों के साथ सतत् सक्रिय अंत:क्रिया और पढ़ने-लिखने के सार्थक अवसरों के माध्यम से होता है।

प्राथमिक कक्षाओं का वर्तमान परिदृश्य -

  • शिक्षक/ कक्षा मॉनिटर/किसी बच्चे द्वारा पाठ का वाक्य-दर-वाक्य अथवा कभी-कभी एक-एक कर सभी बच्चों द्वारा पठन कर बच्चों को पुनरावृति के लिए निर्देशित करने तथा रटने पर जोर दिया जाता है।
  • शिक्षक के द्वारा पाठ पर आधारित प्रश्न किए जाते हैं तथा बच्चों के द्वारा सामूहिक उत्तर दिए जाते हैं।
  • यांत्रिक एवं एक समान प्रविधि से पठन से पाठ के उद्देश्य से भटकाव होता है।
  • जानकारी आधारित अध्ययन-अध्यापन किया जाता है।
  • बच्चों को समझ कर पढ़ने के अवसर कम होने से उनमें स्पष्टता का अभाव होता है।
  • शिक्षक द्वारा मुख्य शब्दों को श्यामपट पर लिखना व कभी-कभी एक-एक कर सभी बच्चों द्वारा पठन करना।
  • पाठ के अंत में शिक्षक द्वारा अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर लिखाना ।
  • बच्चों द्वारा कॉपी में पाठ के अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर लिखना (अधिकतर ब्लेकबोर्ड पर देखकर या बोलकर )

पाठ को परम्परागत पठन को परिणाम —

  • बच्चों द्वारा कम पढ़ना या लिखना एवं रुचि न लेना
  • पठन में झिझकना (अच्छी तरह न पढ़ पाना ) या पढ़ने की कोशिश न करना
  • अन्य कौशलों को सीखने में पिछड़ना
  • अपनी कक्षा में पढ़ाए जा रहे पाठों को न समझ पाना
  • प्रायः अनुपस्थित रहना
  • शाला त्यागी हो जाना/अपनी शिक्षा पूरी न करना

प्रारंभिक साक्षरता के सन्दर्भ

भाषा क्या है ?

  • भाषा, विचारों और समझ की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है।
  • प्रारंभिक साक्षरता लिए बच्चे की मातृ भाषा में आरंभ करना एवं सिखाना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
  • भाषा सीखने के प्रमुख कौशल हैं -

1. सुनना - समझ के साथ सुनना

2. बोलना - अपने विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति

3. पढ़ना - धाराप्रवाह एवं समझ के साथ पढ़ना, पढ़ने में आनंद का अनुभव कर पाना तथा स्वतन्त्र पठन कर पाना

4. लिखना - अपने विचारों अथवा अन्य विषयों पर अर्थपूर्ण, त्रुटिरहित एवं स्पष्टता के साथ लिख पाना

पठन क्या है ?

  • पठन का लक्ष्य होता है - अर्थ को समझ पाना
  • धाराप्रवाहता एवं गहन समझ के साथ पठन ही वास्तविक पठन है।
  • पठन का सामान्य अर्थ – प्रारंभिक समझ - वणों, अक्षरों, शब्दों का ज्ञान
  • पठन का विस्तृत अर्थ – विषय की गहन समझ, विश्व का ज्ञान

समझ के साथ पठन क्या है ?

  • बच्चों में आकलनात्मक /व्यावहारिक समझ विकसित करना।

क्रमिक अधिगम सामग्री की आवश्यकता क्यों?

  • बच्चों के लिए सरल शब्दों/वाक्यों में पठन योग्य सामग्री उपलब्ध कराना बच्चों को औपचारिक पठन के पूर्व, प्रारंभिक कौशलों के विकास के अवसर देना।
  • यदि बच्चे शुरु से ही समझ और मजे के साथ पढ़ें तो वे बहुत जल्दी पढ़ना सीख कर सफल पाठक बन सकते हैं अत: उनकी पढ़ने की क्षमता का विकास करना ।
  • बच्चों को पढ़ना सीखने में मदद करना एवं अभ्यास के अधिक अवसर देना ।
  • बच्चों में पाठ्य पुस्तकों/अन्य पुस्तकों के प्रति रुचि जागृत करना तथा उनमें ज्यादा से ज्यादा पढ़ने की लालसा उत्पन्न करना।
  • बच्चों में कल्पनाशीलता, सृजनात्मकता एवं संवेदनशीलता के विकास के अवसर देना।
  • छोटे बच्चे शाला के परिवेश में अपनेपन का अनुभव कर सकें अतः उन्हें अपने परिवेश, व्यावहारिक ज्ञान/जानकारी व अनुभवों को जोड़ने के अवसर देना।
  • कक्षाओं में पठन समृद्ध एवं भयमुक्त वातावरण बनाना।
  • बच्चे को समझ के साथ सुनने, पढ़ने, लिखने व मौखिक अभिव्यक्ति के ज्यादा से ज्यादा अवसर देना ।
  • घर एवं शाला की अकादमिक भाषा को सीखने के अवसर देना । शब्दभंडार में वृद्धि करना। बच्चे के पूर्वज्ञान एवं स्थानीयता को कक्षा से जोड़ना।
  • समुदाय को शाला एवं कक्षा से जोड़ना जैसे - किताबें पढ़ कर बच्चों को सुनाना, किताबों के निर्माण में सहयोग देना।

क्रमिक अधिगम पुस्तिकाओं का स्वरुप

  • यह पुस्तिकाएँ कक्षा 1, 2, 3 के बच्चों के लिए हैं।
  • प्रत्येक कक्षा की पुस्तिकाओं को 1-25 क्रमांक दिए गए हैं जो सीखने के कठिनाई स्तर के आधार पर हैं अतः आरंभिक पुस्तिकाओं में अत्यधिक सरलता है।
  • प्रत्येक शाला के लिए एक सेट पुस्तिकाएँ अर्थात कुल 75 पुस्तिकाएँ हैं। जिनमें कक्षा 1 के लिए 25, कक्षा 2 के लिए 25 व कक्षा 3 के लिए 25 पुस्तिकाएँ हैं।
  • इन पुस्तिकाओं में बच्चों के दैनिक जीवन के अनुभवों, स्थानीय संदर्भों एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित कहानियों, कविताओं, पहेलियों, जानकारियों आदि का समावेश किया गया है।
  • आरंभिक पुस्तिकाओं में सरल शब्द/वाक्य हैं जबकि बाद की पुस्तिकाओं में क्रमशः कठिन शब्द/वाक्य हैं।
  • इनमें चित्रों पर विशेष ध्यान दिया गया है ताकि उनके आधार पर बच्चे कहानियों को
  • समझ सके, उनका मजा ले सके, नई कहानियाँ, चित्र आदि बना सकें।
  • भाषा अपने आप में एक संस्कार है अतः इनकी भाषा में मूल्यों एवं आवश्यकतानुसार
  • संवेदनशीलता का भी ध्यान रखा गया है।
  • ये पुस्तिकाएँ इस विचार के साथ विकसित की गई हैं कि शासकीय शालाओं में पढ़ने वाले बच्चों को भी कुछ अतिरिक्त सामग्री छूने/देखने/सुनने/बोलने/पढ़ने/लिखने तथा अभ्यास करने के लिए मिलें।
  • इनका विकास स्थानीय शिक्षकों, जो प्राथमिक शालाओं में अध्यापन करते हैं, के द्वारा किया गया है। इसी प्रकार शिक्षक, स्थानीय भाषा में भी बच्चों एवं समुदाय के सहयोग से चित्र वाली पुस्तिकें/पोस्टर/कामिक्स आदि बना सकते हैं ।
  • इसमें विषयवस्तु का चुनाव, स्थानीयता का समावेश, लेखन कार्य (कहानियाँ, कविताएँ,पहेलियाँ, अभ्यास, अन्य जानकारी इत्यादि), चित्रांकन, कम्प्यूटराइजेशन, ले-आउट, डिजाइनिंग आदि समस्त कार्य शिक्षकों के द्वारा स्वयं किए गए हैं।

कक्षा में शुरुआती स्तर पर किए जाने वाले कार्य -

  • सार्थक व सक्रिय वातावरण बनाना – समृद्ध लिखित माहौल बनाना
  • चिन्ह और ध्वनि के तालमेल का आधिकारिक अभ्यास कराना
  • लिखित व मौखिक शब्दों का तालमेल
  • वर्ण समूह पर आधारित शब्दों की पहचान
  • कक्षा 1 से 3 की इन पुस्तिकाओं को शिक्षकों द्वारा पढ़कर (संवाद करते हुए) सुनाना

क्रमिक अधिगम सामग्री का उपयोग कैसे करें

  • कक्षा अध्यापन के समय इनका उपयोग पाठ्य पुस्तकों के साथ-साथ तथा उनके अतिरिक्त सहायक सामग्री के रूप में किया जा सकता है।
  • इन्हें कक्षा में ही रस्सी बांधकर, उस पर लटका कर या खुली रैक आदि पर, बच्चों की पहुँच में रखें।
  • कक्षा 1 में शिक्षक साथी पाठ्य पुस्तक से पाठ पढ़ाते समय संबंधित वर्णों को पढ़ाने के लिए इन पुस्तिकाओं में दी गयी कहानियों का उपयोग कर सकते है।
  • कक्षा 1 में शिक्षक साथी पाठ्य पुस्तक से पाठ पढ़ाते समय संबंधित वणों को पढ़ाने के पश्चात उन वर्णों का अभ्यास करने के लिए इन पुस्तकों को दें ताकि इन्हें पढ़ लेने से बच्चों का आत्मविश्वास बढेगा।
  • ये पुस्तिकाएँ इस विचार के साथ विकसित की गई हैं कि शिक्षकों को इससे पाठ्यचर्या की अपेक्षाओं को पूरा करने में मदद मिलेगी।
  • ये पाठ्य पुस्तक नहीं हैं इन्हें पूरक सामग्री के रूप में देखा जाना चाहिए।
  • शिक्षक साथी इन्हें पढ़ने के लिए बच्चों को निरंतर प्रोत्साहित करें व उन से चर्चा करते रहें।
  • चूँकि ये पुस्तिकाएँ बच्चों के लिए हैं अतः फटने या खराब होने की चिंता से बचें व इन्हें बच्चों की पहुँच से दूर न करें।
  • इन पुस्तिकाओं को क्रम से पढ़ने के लिए बच्चों को बाध्य न करें एवं बच्चों को पढ़ने में पूरा सहयोग करें।
  • यह सुनिश्चित करें कि सभी बच्चों को (कक्षा 4 व 5 के भी) यह आसानी से उपलब्ध हो सकें तथा बच्चे खाली समय में भी इनका उपयोग कर सके।

 

स्त्रोत भारत सरकार का मानव संसाधन विकास मंत्रालय

 

3.07936507937

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