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स्वदेश दर्शन - थीम आधारित परिपथों के एकीकृत विकास हेतु योजना दिशा-निर्देश

इस पृष्ठ में केंद्रीय सरकार द्वारा शुरू किये गए स्वदेश दर्शन - थीम आधारित परिपथों के एकीकृत विकास हेतु योजना के आवश्यक दिशा-निर्देश विस्तृत रूप से दिखाए गए है।

औचित्य

भारत की समृद्ध सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और प्राकृतिक विरासत में पर्यटन के विकास और रोजगार सृजन के लिए विशाल क्षमता है। इस क्षमता को विधिवत स्वीकार करते हुए संघ सरकार ने 2014-15 के बजट भाषण में विशेष थीमों के आसपास पर्यटक परिपथों के सृजन का निर्णय लिया है। इसमें घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों पर्यटकों, जिनकी ऐसे स्थलों की यात्रा की विशेष रूचि हो, को आकर्षित करने के लिए विशेष थीम पर पर्यटक परिपथों को विकसित करने की व्यापक आवश्यकता और संभावना है। यह पर्यटकों की विशिष्ट श्रेणियों यथा राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, राज्य और अंतर्राष्ट्रीय के लिए मनोहारी अनुभव प्रदान कर केवल एकीकृत दृष्टिकोण के माध्यम से प्राप्त किया जा सकते हैं। विभिन्न प्रकार के थीम जो क्षेत्र के लिए अनुपम और विशेष हैं, में धर्म, संस्कृति, विरासत आदि शामिल हो सकते हैं। अतः थीम आधारित पर्यटक परिपथों को इस प्रकार विकसित किया जाना चाहिए, जो समुदाय और निश पर्यटन दोनों की मांगों को समग्र रूप से पूरा करता है।

पर्यटक गंतव्यों का विकास इन परिपथों की क्षमताओं को बढ़ाने और दोहन करने एवं अपेक्षित निजी क्षेत्र के निवेश को लाने के उद्देश्य से किया जाना चाहिए। अतः अपेक्षित अवसंरचना का विकास करने की तत्काल आवश्यकता है, ताकि यह परिपथ एक समृद्ध पर्यटक अनुभव प्रदान कर सकें।

संकल्पना विवरण

  • आर्थिक विकास और रोज़गार सृजन के एक प्रमुख इंजन के रूप में पर्यटन को स्थापित करना।
  • तेजी से बढ़ते वैश्विक यात्रा व्यापार और एक गंतव्य के रूप में भारत की विशाल अप्रयुक्त क्षमता का लाभ लेने के लिए एक वैश्विक ब्रांड के रूप में भारत को बढ़ावा देना।
  • एक विश्वस्तरीय पर्यटक गंतव्य के रूप में भारत को विकसित करना ओर अद्वितीय उत्पादों की व्यापक रेंज की पूरी क्षमता का प्रदर्शन करना।
  • अनेक प्रकार के थीमेटिक परिपथों में विश्वस्तरीय अवसंरचना के विकास द्वारा सतत रूप से पर्यटकों के आकर्षण को बढ़ाकर पूर्ण पर्यटन अनुभव प्रदान करना।
  • ब्रांड और प्रतियोगी क्षमता की पुष्टि करते हुए गुणवत्ता और दक्षता सुनिश्चित करते हुए गहराई से अवसंरचना के विकास पर ध्यान देने के साथ पर्यटन के क्षेत्र में व्यावसायिकता और आधुनिकता का विकास करना।
  • थीम आधारित परिपथों के विकास के द्वारा पर्यटन विकास हेतु राष्ट्रीय और राज्य संसाधनों का निवेश का मोबिलाइजेशन हेतु संवर्धन करना ताकि देश भर के प्रत्येक क्षेत्र की उपलब्ध अवसंरचना, राष्ट्रीय संस्कृति और विशेषता के मुख्य बिन्दुओं के संबंध में राष्ट्रीय क्षमता और लाभों का पूर्ण उपयोग किया जा सके।
  • पारिस्थितिकीय और सांस्कृतिक संरक्षण के साथ ईको–पर्यटन जैसे थीम आधारित परिपथों को विकसित करना।
  • एक ‘उत्तरदायी पर्यटन' पहल के विकास के माध्यम से एक सतत और समावेशी तरीके से गरीबोन्मुख दृष्टिकोण के साथ स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से रोज़गार का सृजन करना।

मिशन स्टेटमेंट

  • पर्यटकों के अनुभव को समृद्ध करने और रोज़गार के अवसरो को बढ़ाने के लिए सभी स्टेकहोल्डरों की आवश्यकताओं और सरोकारों पर फोकस करने के लिए प्रयासों में तालमेल कायम करने के द्वारा एकीकृत तरीके से उच्च पर्यटक मूल्य, प्रतिस्पर्धा एवं सततता के सिद्धांतो पर थीम आधारित पर्यटक परिपथों का विकास करना।

मिशन के उद्देश्य

क. योजनाबद्ध और प्राथमिकता के आधार पर पर्यटक क्षमता वाले परिपथों को विकसित करना।

ख. पहचाने गए थीम आधारित परिपथों में अवसंरचना का एकीकृत विकास।

ग. देश के सांस्कृतिक और पारंपरिक मूल्यों को बढ़ावा देना।

घ. विभिन्न प्रकार के थीम वाले परिपथों के साथ पूर्ण पर्यटन का अनुभव प्रदान करना।

ङ. परिपथ गंतव्य में विश्व स्तरीय अवसंरचना के विकास द्वारा सतत रूप से पर्यटकों के लिए आकर्षण बढ़ाना।

च. समुदाय आधारित विकास और गरीबोन्मुख पर्यटन संकल्पना का पालन करना।

छ. आय के स्रोतों में वृद्धि, जीवन स्तर के मानकों में सुधार और क्षेत्र के समग्र विकास के संदर्भ में स्थानीय समुदायों में उनके लिए पर्यटन के महत्व के बारे में जागरूकता उत्पन्न करना।

ज. पहचाने गए क्षेत्रों में आजीविका पैदा करने के लिए स्थानीय कला, संस्कृति, हस्तशिल्प, व्यंजन आदि को बढ़ावा देना।

झ. पर्यटन क्षमता का रोजगार सृजन और आर्थिक विकास में इसके प्रत्यक्ष और गुणक प्रभावों के लिए दोहन एवं सार्वजनिक पूंजी और विशेषज्ञता का लाभ उठाना।

मिशन कार्यनीति

क. स्टेक होल्डरों के परामर्श से विश्वस्तरीय पर्यटन उत्पादों के रूप में प्रदर्शित किए जाने वाले क्षमतावान थीम आधारित परिपथों की पहचान करना;

ख. थीम आधारित परिपथों के विकास को गंतव्यों की सततता और वहनीय क्षमता के अनुरूप सुनिश्चित करना;

ग. पहचाने गए परिपथों में अवसंरचनात्मक अंतरों के वर्गीकरण के लिए फ्रेमवर्क बनाना जो इन परिपथों की क्षमता को दिखाने में प्रमुख बाधा रही है।

घ. राज्य और केन्द्र सरकार की योजनाओं के साथ-साथ निजी क्षेत्र के निवेशों के पूर्ण तालमेल को सुनिश्चित करते हुए विशिष्ट समय-सीमा में इन परिपथों के एकीकृत रूप से विकास की योजना बनाना;

ङ. उन परियोजनाओं की पहचान करना और प्राथमिकता देना, जिन्हें तत्काल डेडीकेटेड सार्वजनिक वित्तपोषण के माध्यम से हाथ में लिया जाना है और केन्द्रीय सार्वजनिक सेक्टर उपक्रमों और कॉरपोरेट सेक्टर की स्वैच्छिक वित्तपोषण (कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेवारी) पहलों से अतिरिक्त संसाधनों का व्यवहार्य सीमा तक लाभ लेना;

च. पहचाने गए क्षेत्रों में आजीविका पैदा करने के लिए स्थानीय कला, संस्कृति, हस्तशिल्प, व्यंजन आदि को बढ़ावा देना,

छ. पहचाने गए परिपथों में पर्यटकों के लिए आवश्यक सभी सुविधाएं सुनिश्चित करने के लिए समग्र क्षेत्र विकास की संकल्पना का पालन करना;

ज. पहचानी गई परियोजनाओं के विकास की प्रक्रिया को केन्द्रीय रूप से समन्वित करना।

12 वीं पंचवर्षीय योजना और उसके बाद एक केन्द्रीय क्षेत्र की योजना के रूप में इस योजना को कार्यान्वित करने का प्रस्ताव है।

योजना के सामान्य प्रावधान

परिभाषाएं:-

  • पर्यटक परिपथ को ऐसे मार्ग के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिस पर कम-से-कम तीन प्रमुख पर्यटक गंतव्य इस प्रकार स्थित हों कि उनमें से कोई उसी शहर, गांव या नगर में न हो। इसके साथ ही यह सुनिश्चित हो कि वे काफी लम्बी दूरी पर अलग-अलग न हों। इनके लिए प्रवेश तथा निकास स्थान अच्छी तरह से बताए गए हों। प्रवेश द्वार से आने वाले पर्यटक परिपथ पर पहचान किए गए सभी स्थानों की यात्रा करने के लिए प्रोत्साहित हों।
  • थीम आधारित पर्यटक परिपथ को धर्म, संस्कृति, नृजातीयता, विशिष्टता आदि जैसे विशेष थीम के आस पास एक पर्यटक परिपथ के रूप में परिभाषित किया गया है। थीम आधारित पर्यटक परिपथ एक राज्य तक सीमित रह सकता है अथवा एक राज्य/संघ राज्य क्षेत्र से अधिक में क्षेत्रीय परिपथ हो सकता है।

राष्ट्रीय संचालन समिति (एन एस सी) :

मिशन के उद्देश्यों और योजना के विजन के संचालन के लिए निम्नलिखित संरचना के साथ एक राष्ट्रीय संचालन समिति का गठन किया जाएगाः

1

प्रभारी मंत्री,पर्यटन मंत्रालय

अध्यक्ष

2

सचिव, पर्यटन मंत्रालय

उपाध्यक्ष

3

अपर सचिव, पर्यटन मंत्रालय

सदस्य

4

वित्तीय सलाहकार,पर्यटन मंत्रालय

सदस्य

5

सचिव अथवा उनका प्रतिनिधि* – संस्कृति मंत्रालय

सदस्य

6

महानिदेशक, ए.एस.आई

सदस्य

7

सचिव अथवा उनका प्रतिनिधि*  - शहरी विकास मंत्रालय

सदस्य

8

सचिव अथवा उनका प्रतिनिधि* – आवास और शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय (एचयूपीए)

सदस्य

9

सचिव अथवा उनका प्रतिनिधि*  - नागर विमानन मंत्रालय

सदस्य

10

सचिव अथवा उनका प्रतिनिधि*  - कौशल विकास मंत्रालय

सदस्य

11

सचिव अथवा उनका प्रतिनिधि*  - सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (आर टी एंड एच)

सदस्य

12

सचिव अथवा उनका प्रतिनिधि*  - पोत परिवहन मंत्रालय

सदस्य

13

सचिव अथवा उनका प्रतिनिधि*  - विद्युत् मंत्रालय

सदस्य

14

सचिव अथवा उनका प्रतिनिधि* - वन एवं पर्यावरण मंत्रालय

सदस्य

15

सचिव अथवा उनका प्रतिनिधि* - जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय

सदस्य

16

सचिव अथवा उनका प्रतिनिधि* - ग्रामीण विकास मंत्रालय

सदस्य

17

कार्यकारी निदेशक (पर्यटन एवं कैटरिंग), रेल मंत्रालय

सदस्य

18

संयुक्त सचिव/अपर महानिदेशक, पर्यटन मंत्रालय

सदस्य सचिव

*संयुक्त सचिव के रैंक से कम न हो

आवश्यकता पड़ने पर एनी मंत्रालयों को भी मामला दर मामला आधार पर आमंत्रित सदस्यों के रूप में प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है।

 

एन एस सी के मुख्य उत्तरदायित्व :

  • योजना के लिए विज़न प्रतिपादित करना और रोड मैप तैयार करना और विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए एक मंच प्रदान करना।
  • योजना के सभी प्रचालनों की देख रेख करना, संचालन, समीक्षा और निगरानी करना और योजना से संबंधित विशिष्ट मुद्दों पर मार्गदर्शन प्रदान करना।
  • कार्यान्वयन साधनों में मध्यकालिक सुधार की सिफारिश करना।
  • प्रस्तावित/जारी परियोजनाओं की आवधिक रूप से देखरेख तथा समीक्षा करना।

मिशन निदेशालयः

नोडल अधिकारी के रूप में एनएससी के सदस्य सचिव की अध्यक्षता में एक मिशन निदेशालय होगा। मिशन निदेशालय की संरचना निम्नानुसार होंगीः

1. संयुक्त सचिव/अपर महानिदेशक (सदस्य सचिव, एनएससी) – अध्यक्ष

2. निदेशक/उप सचिव, वित्त/वित्तीय नियंत्रक               - सदस्य

3. संबंधित राज्य के पर्यटन सचिव                       – सदस्य

4. अन्य संबंधित मंत्रालयों के प्रतिनिधि                   - सदस्य

5. निदेशक/उप महानिदेशक, पर्यटन मंत्रालय               – संयोजक

मिशन निदेशालय के मुख्य उत्तरदायित्वः

  • राज्य/संघ राज्य क्षेत्र सरकारों और अन्य स्टेक होल्डरों के परामर्श से परियोजनाओं की पहचान;
  • परियोजना प्रबंधन कंसल्टेंट की नियुक्ति;
  • आवश्यकता पड़ने पर डीपीआर के मूल्यांकन के लिए स्वतंत्र विशिष्ट एजेंसियों की आउटसोर्सिंग; परियोजना के विभिन्न घटकों के कार्यान्वयन के लिए कार्यान्वयन एजेंसियों की पहचान;
  • समयबद्ध तरीके से योजना के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों और अन्य स्टेक होल्डरों, कार्यान्वयन एजेंसियों आदि के साथ प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करना;
  • केंद्रीय स्वीकृति और निगरानी समिति से पहचानी गई परियोजनाओं के लिए अनुमोदन प्राप्त करना और उक्त समिति को नियमित अंतरालों पर कार्यान्वयन की प्रगति के बारे में रिपोर्टिंग करना।
  • परियोजनाओं की स्वीकृति देना और पहचानी गई एजेंसियों को राशि जारी करना।
  • पहचाने गए परिपथों और गंतव्यों से संबंधित विभिन्न कार्य करने के लिए राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों और अन्य कार्यान्वयन एजेंसियों का उनमें आवश्यकता पड़ने पर परियोजना प्रबंधन इकाइयों (पीएमयू) के माध्यम से। क्षमता विकास।

कार्यक्रम प्रबंधन कंसलटेंट (पीएमसी):

पीएमसी मिशन निदेशालय द्वारा नियुक्त एक राष्ट्रीय स्तर का कंसल्टेंट होगा।

पीएमसी के मुख्य उत्तरदायित्वः

  • पहचाने गए परिपथों के लिए विस्तृत संदर्शी योजना (डीपीपी) तैयार करना, अवसंरचनात्मक सुविधाओं और संबंधित कौशलों में अंतर की पहचान करना। पीएमसी कौशल अंतरालों को दूर करने के लिए उपयुक्त एजेंसियों का सुझाव दे सकता है। संदर्शी योजना में निधियों के स्रोत सहित अपेक्षित निधियों का मूल्यांकन भी शामिल होगा। निवेश और प्रचालन के लिए व्यवसाय मॉडल का विकास किया जाना चाहिए। संदर्शी योजना का श्रस्ट केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य/संघ राज्य क्षेत्र सरकारों व अन्य एजेंसियों की विभिन्न योजनाओं के बीच तालमेल पर होना चाहिए।
  • परिपथों में परियोजनाओं की पहचान।
  • विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) की तैयारी – संबंधित राज्य सरकार/संघ राज्य क्षेत्र प्रशासन, स्थानीय निकायों, अन्य स्टेक होल्डरों से परामर्श के बाद प्रत्येक परिपथ के लिए व्यापक डीपीआर तैयार किया जाना चाहिए। सार्वजनिक निधिकरण द्वारा वित्तपोषित किए जाने वाले घटकों के लिए डीपीआर केंद्रीय/राज्य पीडब्ल्यूडी द्वारा निर्धारित दर अनुसूची के आधार पर तैयार किए जाने चाहिए। अन्य बातों के साथ-साथ डीपीआर में निम्नलिखित शामिल होने चाहिए –

(क) अभिज्ञात पर्यटक परिपथ के एकीकृत विकास के उद्देश्य से अलग-अलग परियोजनाओं की सूची,

(ख) परियोजना का ढांचा (पूंजी ढांचा, कार्यान्वयन फ्रेमवर्क)

(ग) घटक निजी क्षेत्र या संयुक्त क्षेत्र निवेश के लिए है और संभावित वित्तीय लिंकेज

(घ) विभिन्न सरकारी स्कीमों/निजी क्षेत्र से निधियों के स्रोतों की पहचान

  • राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों/अन्य स्टेक होल्डरों के साथ संपर्क
  • परियोजनाओं की मॉनीटरिंग के लिए मिशन निदेशालय को आवधिक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करना
  • पीपीपी परियोजनाओं और अन्य परियोजनाओं के वित्तीय समापन के लिए सहायता।

केन्द्रीय स्वीकृति और निगरानी समिति (सीएसएमसी) :

एक केंद्रीय स्वीकृति और निगरानी समिति होगी जो मिशन निदेशालय द्वारा प्रस्तुत परियोजनाओं की स्वीकृति और कार्यान्वन की प्रगति की नियमित निगरानी के लिए उत्तरदायी होगी। सीएसएमसी की संरचना निम्नानुसार होगी –

1. सचिव, पर्यटन मंत्रालय – अध्यक्ष

2. वित्तीय सलाहकार, पर्यटन मंत्रालय – सदस्य

3. अपर सचिव, पर्यटन मंत्रालय – सदस्य

4. संयुक्त सचिव / अपर महानिदेशक, पर्यटन मंत्रालय – सदस्य

(सदस्य सचिव, एनएससी)

आवश्यकता पड़ने पर समिति एनी मंत्रालय के प्रतिनिधियों को आमंत्रित कर सकती है।

थीम संबंधी पर्यटक परिपथों की पहचान और उनमें परियोजनाओं की स्वीकृति

चयन संबंधी मानदंड और प्रक्रियाः

  • पर्यटक परिपथों/गंतव्यों की पहचान पर्यटन मंत्रालय द्वारा स्टेक होल्डरों और राज्यों के परामर्श से पहले । से प्रमुखता प्राप्त पर्यटन थीम के आधार पर की जाएगी, जिसमें मौजूदा पर्यटक ट्रैफिक, सम्पर्कता, स्थलों के साथ जुड़े महत्व और क्षमता, समग्र पर्यटक अनुभव आदि जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाएगा। थीम में धर्म, संस्कृति, विरासत, प्रकृति, लेजर या और कोई अन्य विषय शामिल होंगे।
  • केंद्रीय स्वीकृति और निगरानी समिति (सीएसएमसी)/मिशन निदेशालय थीम संबंधी पर्यटक परिपथों/गंतव्यों की सूची अध्यक्ष राष्ट्रीय संचालन समिति के पास समेकित अवसंरचना विकास के अनुमोदन के लिए सिफारिश के साथ भेजेगी।
  • प्रत्येक पर्यटक परिपथ के लिए विस्तृत संदर्शी योजना (डीपीपी) और प्रत्येक अलग-अलग परियोजना के लिए डीपीआर पैरा 7.4.1 में यथानिर्धारित ब्यौरा देते हुए पीएमसी द्वारा तैयार किया जाएगा।
  • डीपीआर का मूल्यांकन मिशन निदेशालय अथवा इस उद्देश्य के लिए निदेशालय द्वारा आउटसोर्स की गई किसी स्वतंत्र विशिष्ट अभिकरण द्वारा किया जाएगा।
  • मूल्यांकन के पश्चात मिशन निदेशालय द्वारा अनुशंसित परियोजनाएं अनुमोदन के लिए केंद्रीय स्वीकृति और निगरानी समिति के समक्ष रखी जाएंगी।

योजना के तहत स्वीकार्य परियोजना घटक:

योजना के तहत केंद्रीय वित्तीय सहायता के लिए पात्र घटकों की विस्तृत सूची नीचे दी गई है -

अवसंरचना विकासः

  • यात्री टर्मिनलों (सड़क, रेल, जल परिवहन) का विकास/उन्न्यन;
  • पर्यटक परिवहन के पर्यावरण अनुकूल मोड के लिए उपकरणों की खरीद;
  • पर्यटक स्थलों/गंतव्यों तक जाने वाली सड़क संपर्कता में सुधार;
  • स्ट्रीट लाइटिंग के लिए स्वच्छ उर्जा स्रोतों का उपयोग;
  • स्लम उन्नयन;
  • एटीएम/ मुद्रा विनिमय काउंटर के साथ पर्यटन सूचना/ व्याख्या केंद्र;
  • सूचनापरक/दिशा संबंधी साइनेज;
  • आपातकालीन वाहन खराब होने, मरम्मत और ईंधन भरने के लिए मार्गस्थ सुविधाएं,
  • कारवां वाहनों को खड़ा करने के लिए अवसंरचना का प्रावधान;
  • समागम केंद्र/गोल्फ कोर्स/एक्वामरीन पार्क/मनोरंजन पार्क/थीम पार्क;
  • सामान्य सुधार जैसे कि जमीन का भराव, लैंडस्केपिंग (वृक्ष, झाड़ियां सहित) फव्वारे, बाड़ लगाना, प्रकाश व्यवस्था, फुटपाथ/वाकवे/पाथवे/ड्राइव वे, बैठने की सुविधाएं/शेल्टर, पेयजल स्थान, कचरे के डिब्बे, स्टार्म वाटर ड्रेनेज, सीवरेज/ निकासी के लिए उपचार सुविधाएं वाह्य अवसंरचना जैसे जल आपूर्ति, सीवरेज, ड्रेनेज, बिजली और सड़क;

 

  • स्मारकों/विरासत ढांचों का पुनरूद्धार, संरक्षण, प्रदीप्तिकरण;
  • पर्यटक अवसंरचना के लिए ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोत;
  • पर्यावरण संबंधी देखभाल और स्वच्छ प्रौद्योगिकी तक पहुंच;
  • टू व्हीलर्स, कार, बस, कारवां के लिए पार्किंग सुविधाएं; • शौचालय, क्लॉक रूम सुविधाएं और वेटिंग रूम;
  • पर्यटन गतिविधियों जैसे कि साउंड एंड लाइट शो, वाटर स्पोट्र्स, एडवेंचर स्पोट्र्स आदि के लिए उपकरण;
  • शिल्पहाट/बाजार/स्मारिका की दुकानें / कैफेटेरिया का निर्माण
  • ओपन एअर थिएटर/एम्फीथिएटर का निर्माण;
  • नेचर ट्रेल्स, वॉच टावर, रेन शेल्टर्स, लॉग हट का निर्माण;
  • प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र (भारतीय चिकित्सा प्रणाली सहित)
  • पहचान किए गए परिपथों में पर्यटक के लिए अपेक्षित हेलीपैड, हेलीपोर्ट, हवाई पट्टी, रोपवे;
  • नदियों, झीलों, नदी धाराओं, रिवर फ्रंट जैसे प्राकृतिक जल निकायों का तटीय विकास और कायाकल्प;
  • टेलीफोन बूथों, मोबाइल सेवाओं और इंटरनेट कनेक्टिविटी के माध्यम से संचार में सुधार;
  • पर्यटन से सीधे तौर पर जुडी कोई अन्य गतिविधि और जो पहचान किए गए परिपथ के विकास के लिए आवश्यक है;

जहां कहीं अपेक्षित हो योजना के तहत परियोजना घटकों पर संबंधित प्रशासनिक मंत्रालयों से परामर्श लिया जाएगा।

 

क्षमता विकास, कौशल विकास और ज्ञान प्रबंधन:

  • विस्तृत संदर्शी योजना (डीपीपी) में पीएमसी द्वारा पहचाने गए कौशल अंतर को दूर करने के लिए विशेष पाठ्यक्रम।
  • 'हुनर से रोज़गार तक' (एचएसआरटी) और 'अर्न व्हाइल यू लर्न कार्यक्रमों के तहत अल्पावधि कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम।
  • यात्रा और आतिथ्य शिक्षा और प्रशिक्षण का आधार व्यापक बनाना और व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदाताओं (वीटीपी) की नियुक्ति।
  • कला और शिल्प में स्थानीय क्षमता और विशेषज्ञता के दोहन पर जोर ।
  • भावी उपयोग के लिए पर्यटन में ज्ञान आधार का प्रलेखन और परिरक्षण।

ऑनलाइन उपस्थिति

जीआईएस आधारित वेबसाइट विकास और मोबाइल अनुप्रयोग, जिसमें निम्नलिखित की व्यवस्था है:

  • अवस्थिति आधारित सेवाएं और अवस्थिति आधारित विषय-वस्तु
  • ई-कॉमर्स अनुप्रयोगों के माध्यम से बुकिंग सुविधाएं
  • मौजूदा सेवा प्रदाताओं के अनुप्रयोगों के साथ लिंकेज
  • पर्यटकों और ऑपरेटरों के लिए सपोर्ट डैश बोर्ड
  • विभाग के लिए निर्णय सपोर्ट रिपोर्टिंग

परियोजना प्रबंधन प्रणालीः

  • ऑनलाइन यूसी प्रस्तुति के माध्यम से प्रगति की जानकारी लेना
  • ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली के माध्यम से प्रोक्योरमेंट का पता लगाना
  • उपलब्धियों की पूर्णता का पता लगाना
  • मद संबंधी वृद्धि और अंतर का पता लगाना

अनुमति आधारित ज्ञान पोर्टलः

  • प्रैक्टिशनर्स और शिक्षाविदों के बीच सहयोग का वातावरण बनाना
  • विषय वस्तु परिरक्षण के लिए एक बैक एंड डिजिटल लाइब्रेरी बनाना
  • संबंधित शोध पेपर्स को भविष्य में संदर्भ के लिए उपयुक्त संस्थानों को भेजना
  • डाटा विश्लेषण एवं रिपोर्टिंग

योजना आवंटन का 10 प्रतिशत तक आईईसी घटक के लिए अलग रखा जाएगा।

योजना के तहत अस्वीकार्य परियोजना घटक:

इस स्कीम के तहत सहायता निम्नलिखित घटकों के लिए स्वीकार्य नहीं होगी :-

i. विकास के लिए भूमि अधिग्रहण

ii. पुनर्वास और पुनस्र्थापना पैकेज, सृजित परिसंपत्ति का प्रचालन, अनुरक्षण और प्रबंधन

iii. निजी संगठनों की स्वामित्व वाली परिसंपत्तियों/संरचनाओं में सुधार/निवेश

कार्यान्वयन एजेंसी (आईए)

इस योजना के तहत पहचानी गई परियोजनाएं पहचानी गई एजेंसियों के माध्यम से कार्यान्वित की जाएंगी।

परियोजनाओं के लिए निधिकरण पैटर्न

  • सार्वजनिक निधिकरण के लिए शुरू की गई परियोजना घटकों के लिए योजना 100 प्रतिशत केंद्रीय रूप से निधिकृत होगी। केंद्रीय और राज्य सरकारों की अन्य योजनाओं के साथ अभिसारिता हासिल करने तथा साथ ही केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों और निगमित क्षेत्र के निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) की पहलों के लिए उपलब्ध निधि के साथ इसका संयुक्त रूप से उपयोग करने का प्रयास किया जाएगा। परियोजनाओं की और अधिक सततता के लिए उपयुक्त सार्वजनिक निजी भागीदारी शुरू करने का प्रयास किया जाएगा। सरकार के संबंधित दिशानिर्देशों/अनुदेशों के अनुसार मिशन के तहत व्यवहार्यता अंतर वित्त पोषण (वीजीएफ) प्रदान किया जा सकता है।
  • यह परिकल्पित है कि अलग-अलग परियोजना का निधिकरण राज्य दर राज्य भिन्न होगा और इसे अन्य सरकारी योजनाओं की अभिसारिता के अनुसार पीएमसी द्वारा तैयार डीपीआर के आधार पर अंतिम रूप दिया जाएगा।
  • राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करते हुए योजना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता इंगित करते हुए भारत सरकार को एक अंडरटेकिंग प्रस्तुत करेगी कि पहचानी गई और विकसित परियोजनाओं का प्रचालन और अनुरक्षण राज्य का उत्तरदायित्व होना चाहिए। जहाँ कहीं व्यवहार्य हो, इस उद्देश्य के लिए एक स्पेशल पर्पज वेहिकल (एसपीवी) सृजित किया जाए। अंडरटेकिंग में वास्तविक और वित्तीय अर्थों में उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों को दर्शाते हुए हासिल की जाने वाली विशिष्ट उपलब्धियों का ब्यौरा होगा। राज्य सरकार का भूमि, पुनस्र्थापना पैकेज, ओ एंड एम के प्रति अंशदान डीपीआर में निर्धारित किया जाना चाहिए।

निधियों का वितरण

  • निधियों को कार्यान्वयन एजेंसी को निर्मुक्त किया जाएगा। योजना में निधि स्वीकृति करने की शक्ति जीएफआर के अनुरूप और वित्त मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी निर्देशों के अनुसार होगी। सभी प्रस्ताव पर्यटन मंत्रालय के आईएफडी के माध्यम से रूट किए जाएंगे।
  • राज्य सरकारों/संघ राज्य क्षेत्र प्रशासन को निधियां निम्नानुसार निर्मुक्त की जाएंगी

प्रथम किस्त – परियोजना के अनुमोदन/स्वीकृति पर परियोजना लागत का 20 प्रतिशत दूसरी किस्त - प्रथम किस्त के लिए उपयोग प्रमाण पत्र की प्राप्ति के पश्चात परियोजना लागत का 60 प्रतिशत

तीसरी किस्त - कार्य पूरा होने और उपयोग प्रमाण पत्र की प्राप्ति होने पर परियोजना लागत का शेष 20 प्रतिशत

हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए इन क्षेत्रों में कठिनाइयों को देखते हुए मिशन निदेशालय द्वारा भिन्न निधिकरण पैटर्न और परियोजना अवधि निर्धारित की जा सकती है।

  • इस योजना के तहत केंद्रीय एजेंसियों को स्वीकृत वित्तीय सहायता निम्नानुसार निर्मुक्त की जाएगी।

प्रथम किस्त - अनुमोदन/स्वीकृति पर स्वीकृति राशि का 50 प्रतिशत।

दूसरी किस्त - प्रथम किस्त के उपयोग के पश्चात स्वीकृत राशि का 30 प्रतिशत

तीसरी किस्त - प्रथम और द्वितीय किस्त के उपयोग के पश्चात स्वीकृत राशि का शेष 20 प्रतिशत

कोडल औपचारिकताएं

कार्यान्वयन एजेंसी निर्माण सामग्री/उपकरण की खरीद के लिए ठेके देते समय सभी कोडल औपचारिकताओं का अनुसरण करेगी और अपने सभी लेनदेनों में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी। सभी निविदाओं के लिए ई-टैंडरिंग/ई-प्रोक्योरमेंट का अनिवार्यतः पालन किया जाएगा।

कार्यान्वयन एजेंसियों द्वारा पालन की जाने वाली मुख्य बातें

  • परियोजना के लिए उपयोग में लाई जाने वाली भूमि सभी अतिक्रमणों से मुक्त होनी चाहिए।
  • परियोजनाओं के लिए सभी निविदाओं का आमंत्रण और उन्हें अंतिम रूप देने का कार्य परियोजनाओं की स्वीकृति की तारीख से तीन महीने के भीतर पूरा कर लेना चाहिए।
  • परियोजनाओं के विभिन्न चरणों का कार्य संबंधित संस्वीकृति पत्रों में निर्धारित अवधि के भीतर पूरा किया जाएगा।

सृजित परिसंपत्तियों का प्रबंधन

परियोजनाओं के रखरखाव और प्रचालन की अनंतिम लागत डीपीआर तैयार करने के समय पीएमसी द्वारा निर्धारित की जाएगी और प्रचालन और रखरखाव में निजी क्षेत्र/ गैर सरकारी संगठनों/टूर ऑपरेटरों की सहभागिता से नवीन राजस्व सृजक विकल्पों के माध्यम से सतत प्रचालन और रखरखाव मॉडलों के लिए विकल्प तैयार करने पर बल दिया जाएगा। इससे ओ एंड एम सेवाओं के लिए राज्य सरकार की तरफ से बजटीय प्रतिबद्धताओं को कम करने में सहायता मिलेगी। राष्ट्रीय स्तर के कंसलटेंट, आवश्यकता पड़ने पर, सतत ओ एंड एम मॉडलों को सफलतापूर्वक स्थापित करने में राज्य सरकारों की सहायता के लिए ट्रांजेक्शन सलाहकार सेवाएं प्रदान करेंगे।

परिणाम सम्बन्धी पैरामीटर

मिशन मोड पर थीम आधारित पर्यटक परिपथों के एकीकृत अवसंरचना विकास का परिणाम निम्नलिखित संदर्भ में मापा जाएगा:

  • पहचाने गए परिपथों में पर्यटक ट्रैफिक में वृद्धि;
  • पहचाने गए सेक्टरों में रोजगार सृजन;
  • मूल्य-वर्द्धित सेवाओं के साथ पर्यटन में वृद्धि के लिए जागरूकता में वृद्धि ओर कौशल और क्षमता का विकास;
  • राजस्व सृजन में वृद्धि;
  • पहचाने गए परिपथों में निजी क्षेत्र का निवेश।

पर्यटन मंत्रालय द्वारा नियुक्त स्वतंत्र एजेंसी द्वारा सर्वेक्षण/अध्ययन के माध्यम से परिणामों का नियमित रूप से मूल्यांकन किया जाएगा और उन्हें मापा जाएगा।

अनएक्सप्लोर्ड पैराडाइजः उत्तर-पूर्व भारत परिपथ

देश का उत्तर-पूर्व क्षेत्र, जो कि आमतौर पर एनई के नाम से जाना जाता है, में आठ राज्य अरूणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम शामिल हैं। इस क्षेत्र में चीन, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और म्यांमार के साथ भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं लगी हुई हैं।

मनोहर और आकर्षक प्राकृतिक सौन्दर्य, विशाल नदी एवं पर्वत, शान्त प्राकृतिक वातावरण में सथित चमकीले रंगों में रंगे बौद्ध मठ, अदवितीय वनस्पति और जीव-जन्तु, दुर्लभ आर्किड, देशी खेल, अद्वितीय जनजातीय संस्कृति, लोक नृत्य और संगीत, बारीक बुनाई वाले जनजातीय शालें और अन्य हस्तशिल्प वाला उत्तर-पूर्व क्षेत्र आगन्तुकों के मन एवं मस्तिष्क के लिए अनोखा आनन्द है। यह क्षेत्र इको-पर्यटन, धार्मिक पर्यटन और रोमांचकारी पर्यटन के विकास हेतु बहुमूल्य संसाधन प्रदान करता है। क्षेत्र के प्रत्येक राज्य की अपनी अद्वितीय संस्कृति और हस्तशिल्प है। पर्यटन आकर्षण पूरे क्षेत्र में फैले हुए हैं और आमतौर पर यह पर्यावरणीय तौर पर अत्यधिक नाजुक सुदूरवर्ती क्षेत्रों में विद्यमान है।

इस क्षेत्र की विशाल पर्यटन क्षमता का उपयोग करने के उद्देश्य से आवास, भोजन, खरीदारी और मनोरंजन आदि के लिए समुचित सुख-सुविधाओं की आवश्यकता है ताकि पर्यटक अधिक सहजता का अनुभव करें और उनकी यात्रा यादगार बनें।

इस क्षेत्र में पर्यटक परिपथ के एकीकृत विकास से न केवल अवसंरचना और कौशल अन्तर कम होगा बल्कि यह स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी द्वारा क्षेत्र के समग्र सामाजिक - आर्थिक विकास और रोजगार सृजन में भी योगदान करेगा।

बौद्ध परिपथ

भारत बौद्ध पर्यटकों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थ गंतव्य है। यद्यपि भगवान बुद्ध लुम्बिनी (अब नेपाल में) पैदा हुए थे,फिर भी भारत वह भूमि है जहां वह बड़े हुए, उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, उपदेश दिए और महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। इस प्रकार भारत में बौद्ध धर्म की वृद्धि और विकास हुआ और यहां से यह विश्व के दूसरे भागों में फैला।

वह पर्यटक, जो बौद्ध स्थल जाते हैं, उनकी इच्छा भारत के पर्यटक आकर्षणों के अन्य स्थलों को देखने की भी होती है। अतः और अधिक पर्यटकों को आकर्षित करने और उनको लम्बे समय तक रोक के रखने के लिए समुचित सम्पर्कता के साथ विश्वस्तरीय पर्यटक अवसंरचना का विकास आवश्यक है। यद्यपि, इन क्षेत्रों में पर्यटन अवसंरचना के विकास हेतु कई परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं फिर भी अवसंरचना, संपर्कता, कौशल विकास, प्रशिक्षण, स्थानीय लोगों की भागीदारी आदि में अंतराल को पूरा करने के लिए बहुत कार्य किया जाना शेष है।

पर्यटन मंत्रालय ने संबंधित राज्य सरकारों और स्टेकहोल्डरों के साथ परामर्श से विश्वस्तरीय गंतव्यों के रूप में विकास हेतु कुछेक बौद्ध परिपथों की पहचान की है। परिपथों की पहचान करते समय विभिन्न पहलुओं जैसे पर्यटक प्रोफाइल, वहनीय क्षमता, मौसम संबंधी पहलू आदि पर विचार किया गया है।

बुद्ध के जीवन के 7 स्थल :

भगवान बुद्ध का जन्म स्थल - लुम्बिनी (नेपाल)

1. कपिलवस्तु, उत्तर प्रदेश, भारत।

2. बोधगया, बिहार, भारत - ज्ञान प्राप्त किया।

3. सारनाथ, उत्तर प्रदेश, भारत - पहला उपदेश दिया।

4. राजगीर, बिहार, भारत - अपने उपदेश दिए।

5. श्रावस्ती, उत्तर प्रदेश, भारत।

6. वैशाली, बिहार, भारत - अंतिम उपदेश दिया ।

7. कुशीनगर, उत्तर प्रदेश, भारत - यहां भगवान बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।

हिमालयन परिपथ

भारतीय हिमालय क्षेत्र राष्ट्र की संपूर्ण उत्तरी सीमा की सामरिक स्थिति पर है। हिमालय पर्वत श्रृंखला का लगभग 73 प्रतिशत भारत में पड़ता है। विश्व की तीन प्रमुख नदियों – सिंधु, गंगा और ब्रहमपुत्र - का उद्गम हिमालय से हुआ है।

प्राकृतिक विश्व विरासत स्थलों में से एक अर्थात ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क कनजर्वेशन एरिया (जी एच एन पी सी ए) इस क्षेत्र में थित है जो कि मानसून से प्रभावित वनों और हिमालय फ्रंट रेंज के अल्पाइन मीडोज के संरक्षण के लिए है। यह हिमालय जैव विविधता हाटस्पाट का भाग है और इसमें पच्चीस प्रकार के वनों के साथ-साथ जीवजन्तुओं की किस्मों का विशाल संग्रह शामिल है, जिसमें से अनेक विलुप्त हो रहे हैं। इससे इस स्थान का जैव विविधता संरक्षण हेतु अत्यधिक महत्व है।

भारतीय हिमालय क्षेत्र में शामिल होने वाले राज्य जैसे जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर-पूर्व क्षेत्र में असंख्य सुन्दर पर्यटक स्थल हैं। कुछ स्थल रोमांचकारी पर्यटन के लिए सुविख्यात हैं। भारत अपनी समृद्ध प्राकृतिक परिसम्पत्तियों का निश पर्यटन उत्पादों में एक उत्पाद के रूप में संवर्धन करता है ताकि भारतीय पर्यटन के मौसम संबंधी पहलू से उबरा जा सके।

हिमालय परिपथ का उद्देश्य विभिन्न राज्यों में फैले हिमालय में अवस्थित प्रमुख पर्यटक गंतव्यों में पर्यटक अवसंरचना का विकास करना है। परिपथों का विकास करते हुए क्षेत्र की अवसंरचना और कौशल अन्तर, क्षेत्र की वहनीय क्षमता और इसकी इको-व्यवस्था के संरक्षण पर उचित ध्यान दिया जाएगा।

तटीय परिपथ

भारत द्वारा संवर्धित निश पर्यटन उत्पादों में से एक तटीय पर्यटन का विकास भी है, जिससे भारतीय पर्यटन के मौसम संबंधी पहलू को दूर करने में मदद मिलती है। भारतीय तट रेखा (लगभग 7,517 कि. मी.) पश्चम में अरब सागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में हिन्द महासागर से घिरी है। भारत सुन्दर और विशाल तटरेखा से सम्पन्न है जिसमें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप समूह के तट भी शामिल हैं।

भारत अपने सुन्दर समुद्र तटों के लिए विख्यात है और यह 'सूर्य, सागर और समुद्री लहरों के देश के रूप में जाना जाता है। भारत की लंबी तटरेखा में विश्व स्तर के कई समुद्र तट सथित हैं जोकि विभिन्न राज्यों जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पचिम बंगाल आदि में फैले हैं। तटीय पर्यटन का विकास देशी प्राकृतिक वनस्पति एवं जीवजन्तुओं के संरक्षण के उद्देश्य में सहायक होगा। तटीय पर्यटन के संवर्धन का स्थानीय लोगों के समग्र सामाजिक - आर्थिक विकास और रोजगार के सृजन पर भी फोकस रहेगा।

तटीय पर्यटन भूमि एवं समुद्री पर्यावरण के छोर पर अद्वितीय संसाधनोंय सूर्य, जल, झील, अद्वितीय प्राकृतिक दृश्यों, समृद्ध जैव विविधता, समुद्री भोजन आदि के मेल पर आधारित है। इन संसाधनों के आधार पर कई तटीय गंतव्यों जैसे भली प्रकार से व्यवस्थित तटों, वाटर स्पोटर्स, वोट–ट्रीप, क्रूज, बर्ड वाचिंग टूर आदि जैसे विभिन्न पर्यटन उत्पादों का विकास किया गया है।

भारत में क्रूज पर्यटन के विकास की विशाल संभावना है। तटीय परिपथों के विकास के परिणामस्वरूप बैक वाटर, सदाबहार और क्रूज पर्यटन का विकास होगा और इसके कारण विदेशी और घरेलू पर्यटकों दोनों का आगमन बढेगा जिससे अर्थव्यवस्था में आय और रोज़गार में वृद्धि होगी।

कृष्ण परिपथ

भारत तीर्थ स्थलों की भूमि है। व्यवहारतः सभी धर्मो - हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म और सूफी धर्म के देश के विभिन्न भागों में छोटे और बड़े तीर्थ स्थल हैं। पर्यटन ऐतिहासिक तौर पर धर्म से जुड़ा है। धर्म और अध्यात्म यात्रा हेतु सामान्य अभिप्रेरक हैं जहां अनेक पर्यटक गंतव्य पवित्र लोगों, स्थानों और घटनाओं के साथ उनके संबंध के कारण प्रमुख विकसित हुए हैं।

धार्मिक पर्यटन उत्पाद देश में सभी जगह और विभिन्न दिशाओं में फैले हैं जिससे पर्यटकों को न केवल इन तीर्थ स्थलों को देखने, महसूस करने एवं उनका अनुभव लेने का अवसर मिलता है बल्कि वह इस प्रक्रिया में देश के विभिन्न भागों की संस्कृति से भी परिचित हो जाते हैं। अतः इस अर्थ में पर्यटन राष्ट्रीय एकता का संवर्धन करने का माध्यम है।

कृष्ण परिपथ के विकास का मूल उद्देश्य भगवान कृष्ण की किवंदंती से संबद्ध विभिन्न राज्यों के स्थानों का विकास करना है। धार्मिक पर्यटन उत्पाद का विकास करते समय उस स्थान गंतव्य में सामुदायिक भागीदारी का निर्माण करना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, न केवल धार्मिक स्थलों पर आधुनिक तीर्थों की आवश्यकता के साथ-साथ यह भी समझना ज़रूरी है कि एक आगन्तुक किस तरह परस्पर संवाद करता है और नए अनुभव पाना चाहता है।

चुनौतियों में, जिनको पूरा करने की आवश्यकता है अन्य बातों के साथ-साथ अवसंरचना की कमी जैसे बजट होटल, सड़क, अंतिम दूरी तक सम्पर्कता, सीवरेज, स्वच्छता एवं साफ-सफाई, ठोस कचरा प्रबंधन, दलाल और लपका संस्कृति और सौहाद्रपूर्ण अनुभव हेतु इन पर्यटकों द्वारा अपनाए जाने वाले धार्मिक शिष्टाचार की संहिता का विकास करना शामिल है।

कृष्ण परिपथ का विकास विभिन्न स्थानों में अवसंरचनागत कमियों को दूर करने, सम्पर्कता सुधार, कौशल विकास एवं प्रशिक्षण और पर्यटकों की संरक्षा एवं सुरक्षा पर फोकस करेगा।

ग्रामीण परिपथ

यह सही ही कहा गया है कि भारत इसके गांवों में बसता है और भारत के दिल और आत्मा में झांकने के लिए इसके गांवों का अनुभव लेना होगा । भारत के गांव प्राकृतिक सुन्दरता, आकर्षण और सरल जीवन शैली से परिपूर्ण है और यह यात्रियों को अद्वितीय अनुभव प्रदान करते हैं । ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संबल प्रदान करने के लिए पर्यटन एक प्रभावशाली कारक के रूप में भी काम कर सकता है । उत्तरदायी पर्यटन फ्रेमवर्क के तहत सुदृढ़ जन-सार्वजनिक–निजी भागीदारी को तैयार करने से पर्यटक, उद्यमी और समुदाय हेतु सफल स्थिति बन सकती है। और यह ग्रामीण क्षेत्रों हेतु विकास के वैकल्पिक इंजन के रूप में भी उभर सकती है ।

ग्रामीण पर्यटन परिपथ को तैयार करने का उद्देश्य देश की यात्रा करने वाले यात्रियों को अद्वितीय अनुभव प्रदान करना और साथ ही साथ देश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में अवस्थित कम ज्ञात गंतव्यों का विकास करना है।

वन्यजीव परिपथ

भारतीय उपमहाद्वीप की विशिष्टता उसके प्रत्येक पहलू में समाहित विविधता में वास करती है। भारत में भौगोलिक एवं जलवायु संबंधी विविधता विद्यमान है जो कि विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं का आश्रय स्थल है। भारत में वन्यजीव की अतुल्य रेंज प्रकृति की सौगात है जो कि भारत को वन्यजीव पर्यटन के लिए एक आदर्श स्थान बनाती है।

भारत में कई वन्यजीव अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान हैं जोकि वन्यजीव का इसके प्राकृतिक रूप में संक्षरण करने में सहायता करते हैं।

जब कि अनियंत्रित पर्यटन इन क्षेत्रों का नुकसान कर सकता है। वहीं नियंत्रित एवं सार्थक अप्रोच इनके संरक्षण में मदद कर सकती है जहां पर्यटक गैर-कानूनी गतिविधियों को नियंत्रित करें। पारिस्थिति की अनुकूल फ्रेमवर्क में वहनीय क्षमता का सावधानीपूर्वक पता लगाने के बाद इन क्षेत्रों में नियंत्रित पहुंच प्रदान करने की पहलकारी, उत्तरदायी अप्रोच से देश के निर्धनतम भागों की आय में वृद्धि हो सकती है और इससे वन्य जीवन और वनस्पति जीवन का संरक्षण करने के उद्देश्य में मदद मिल सकती है।

वन्यजीव परिपथ का विकास करते समय उद्यानों में उपलब्ध पर्यटक सुविधाओं की गुणवत्ता में सुधार, संपर्कता में सुधार करने, स्थानीय जनसंख्या के कौशल विकास और पर्यटकों की सुरक्षा एवं संरक्षा करने पर जोर दिया गया है।

जनजातीय परिपथ

सुखद उत्तरपूर्व से अद्भूत ओडिशा तक, आकर्षक छत्तीसगढ़ राज्य से झारखंड तक भारत की जनजातीय जनसंख्या ने अभी भी अपने प्रागैतिहासिक अनुष्ठानों, रिवाजों और संस्कृति को आज की आधुनिक दुनिया में भी संरक्षित करके रखा है। भारत के जनजातीय लोगों की जनसंख्या अकेले देश की कुल जनसंख्या के लगभग आठ प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करती है । भारत की जनजातियां अपनी सदियों पुरानी परंपराओं, संस्कृति, उत्सवों, शिल्प, कला, अनुष्ठानों आदि के लिए जानी जाती हैं।

इस परिपथ के तहत उद्देश्य सांस्कृतिक संवेदनशीलता, वहनीय क्षमता और प्राकृतिक परिवेश और स्थानीय संस्कृति के संरक्षण पर उचित फोकस देते हुए अत्यधिक जिम्मेवार तरीके से इन जनजातीय क्षेत्रों का विकास और संवर्धन करना है।

रामायण परिपथ

रामायण केवल एक महाकाव्य ही नहीं है बलकि यह एक जीवंत गाथा है जिसे देश के कोने कोने में सुना और समझा जाता है। रामायण परिपथ के विकास का उद्देश्य पूरे देश में भगवान राम की किवदंतियों से संबंधित स्थानों का विकास करना और उन्हें जोड़ना और, इसके अवसंरचना अंतरों को पाटना, पर्यटक सुविधाओं में सुधार, सांस्कृतिक और विरासत मूल्यों का संवर्धन, स्थानीय कला और शिल्प का विकास और समग्र पर्यटक अनुभव प्रदान करना है।

आध्यात्मिक परिपथ

आध्यात्मिक यात्रा भक्ति, जीवन शैली और ऐसी यात्रा के मिलन से शुरू होती है जिसमें अध्यात्म के सार को पाने की भावना समाहित होती है। आध्यात्मिकता और उद्देश्य की खोज प्रति वर्ष पूरे विश्व के 300 से 330 मिलियन लोगों को आवागमन हेतु प्रेरित करती है। भारत अनादिकाल से एक ऐसा गंतव्य रहा है। जिसने ज्ञान की खोज में दूर-दूर से इच्छुक व्यक्तियों को आकर्षित किया है और उनका स्वागत किया है। भारत में पर्यटन परंपरागत रूप से आध्यात्मिक रुचि के स्थानों पर आने वाले पर्यटकों के कारण फला फूला है। चार महान धर्मों हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म की जन्मभूमि होने के कारण भारत अनेक आध्यात्मिक यात्रियों को आकर्षित करता है।

भारत के विभिन्न स्थानों की यात्रा करने वाले अंतरराष्ट्रीय और घरेलू पर्यटकों के लिए आध्यात्मिकता मुख्य आकर्षणों में से एक है। हालांकि, कुछ को छोड़कर देश के लगभग सभी आध्यात्मिक गंतव्य चिरपरिचित कमजोरी को प्रदर्शित करते हैं जिसमें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की मांगों को पूरा करने वाली नीतियों और मानकीकृत लक्षित अवसंरचना का अभाव भी शामिल है। पर्यटकों हेतु शांत और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करने हेतु तीर्थ केंद्रों पर अवसंरचना का उन्नयन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। निरोगता और सांस्कृतिक पर्यटन सहित आध्यात्मिक पर्यटन एक सिनर्जी सृजित कर सकता है जोकि एक दूसरे हेतु दीर्घावधि विकास के लिए उत्प्रेरक हो सकते हैं। चूंकि अधिकांश आध्यात्मिक यात्री कम आय समूह से होते हैं इसलिए इस परिपथ का विकास करते समय गरीबोन्मुख पर्यटन संकल्पना को अपनाने पर विशेष फोकस दिया जाएगा।

मरूस्थल परिपथ

भारत अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। देश की सबसे महत्वपूर्ण भौतिक विशेषताओं में से एक इसके विशाल मरूस्थल हैं। मरूस्थल का अभिप्राय केवल इसके रेत के टीले और राजस्थान में उच्च तापमान वाला भारत का विशाल थार मरूस्थल ही नहीं अपितु कच्छ की मरूभूमि और लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के शुष्क और ठंडे पर्वतों की घाटी से भी है।

मरूस्थल परिपथ चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में उत्तरदायी और सतत रूप में पर्यटक सुविधाओं के विकास, साहसिक गतिविधियों, जनजातीय/स्थानीय अनुभव पर फोकस करेगा।

विरासत स्थल

भारत जिसे प्रायः जीवंत संग्रहालय के रूप में जाना जाता है, एक समृद्ध इतिहास और जीवंत विरासत और संस्कृति से परिपूर्ण है। भारत में 3685 राष्ट्रीय स्मारक और प्राचीन स्थल हैं जिसमें 32 सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थल यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में अंकित हैं। इसके अतिरिक्त ऐसे 46 और स्थल अनंतिम सूची में हैं। कुछ संग्रहालय कालांतर से देश की संस्कृति और विरासत के विकास के सबूत के स्पष्ट उदाहरण हैं जो देश की संस्कृति के समृद्ध खजाने हैं।

पर्यटन हमें विरासत में प्राप्त अमूल्य कुलागत संपत्तियों को नया जीवन देने का सबसे प्रभावी साधन हैं। हमारी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिसंपत्तियों को पर्यटन उत्पादों के रूप में पुनः स्थापित करने और उनका अनुकूलन करने के लिए एक मजबूत जन - सार्वजनिक - निजी – सहभागिता न केवल हमारी निर्मित विरासत को अपितु हमारी अमूर्त परिसंपत्तियों जैसे लोक कला, नृत्य रूपों, थियेटर आदि को भी संरक्षित करने का मार्ग प्रशस्त करेगी। साथ ही हमारे विरासत स्थलों और स्मारकों के आस-पास निर्वचन सुविधाओं, स्मृति चिन्हों की दुकानें, भोजनालयों और अन्य सुविधाओं के साथ अनुभव के सृजन से न केवल समग्र यात्री अनुभव में वृद्धि होगी अपितु इससे प्राप्त राजस्व इन स्थलों और स्मारकों के रख-रखाव के लिए संसाधनों को भी बढ़ाएंगें।

ईको परिपथ

ईको पर्यटन जिसे पारिस्थितिकीय पर्यटन के रूप में भी जाना जाता है नाजुक, प्राचीन और सामान्यतः संरक्षित क्षेत्रों की उत्तरदायी यात्रा है जो प्रायः छोटे पैमाने पर होती है ताकि इन क्षेत्रों पर कम प्रभाव पड़े। इसका उद्देश्य यात्री को शिक्षित करना, पारिस्थितिकी संरक्षण के लिए फंड उपलब्ध करना, स्थानीय समुदायों के आर्थिक विकास और राजनीतिक सशक्तिकरण को सीधे/प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाना तथा विविध संस्कृतियों और मानव अधिकारों के लिए सम्मान बढ़ाना/अर्जित करना है। ईको पर्यटन को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है कि भावी पीढ़ियां नकारात्मक मानव हस्तक्षेप द्वारा अपेक्षाकृत अछूते वातावरण के पहलुओं को अनुभव कर सकें।

अतः पर्यावरण और सांस्कृतिक कारकों का मूल्यांकन करने के अतिरिक्त पुनः चक्रण (रीसाइकलिंग), ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण को बढ़ावा देना और स्थानीय समुदायों के लिए आर्थिक अवसरों का सृजन, पारिस्थिति की पर्यटन का अभिन्न भाग है।

अपनी भौगोलिक विविधता के कारण भारत में काफी स्थल हैं जो ईको पर्यटन के लिए उपयुक्त हैं तथा जो हिमालय, पूर्वोत्तर राज्यों, पचिमी घाटों, झारखंड, अंडमान और निकोबार द्वीपों और लक्षद्वीप तक फैले हुए हैं।

ईको–पर्यटन परिपथ के विकास द्वारा लक्ष्य लोगों को आनंद लेने, अद्वितीय वातावरण के प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के बारे में जानने के लिए सक्षम बनाना और उन स्थलों की अखंडता को संरक्षित करना तथा स्थानीय समुदायों में आर्थिक विकास के अवसरों को बढ़ावा देने का है।

स्त्रोत: पर्यटन मंत्रालय, भारत सरकार

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