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सर्वोत्तम उपचार क्या है

इस भाग में सर्वोत्तम उपचार के बारे में जानकारी दी गई है।

कोई उपचार हानिकारक है या लाभप्रद है?

हालांकि रोशन जी को पूरा विश्वास था कि दवाईयों से ललिता की समस्या का समाधान हो जायेगा, फिर भी किसी उपचार को अपनाने से पहले वह और अह्दिक जानकारी चाहती थी। उदहारणतया उसे यह मालूम था कि जब उसकी माँ या दादी बीमार होती थी तो घरेलु उपचारों से उन्हें काफी लाभ होता था। फिर उसकी द्वारा आजमाये गए घरेलू उपचारों से उसे कोई लाभ क्यों नहीं हुआ ? इस बारे में रोशन जी का स्पष्टीकरण यह था :

हर समुदाय ने सामान्य समस्याओं का उपचार करने के लिए कुछ घरेलू नुस्खे विकसित किये हुए हैं। घरेलू उपचारों तथा आधुनिक उपचारों-दोनों से लाभ हो सकता है यदि उनका सही तरीके से तथा ध्यानपूर्वक प्रयोग किया जाए । लेकिन याद रखने योग्य बात यह है कि दोनों अर्थात घरेलू उपचारों व आधुनिक उपचारों, से लाभ हो सकता है या वे हानिरहित हो सकते हिं या फिर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।

ललिता के मामले में तीन प्रकार के उपचारों को आजमाया गया था :

जिशयुक्त पानी काफी फायेदेमंद होती आर ललिता को मूत्र तंत्र का संक्रमण होता। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस चाय के सेवन से रोगी को अधिक मात्रा में पेशाब आता है और इसके साथ ही संक्रमण करने वाले कीटाणु भी शरीर से बाहर (फलश) हो जाते हैं। लेकिन ललिता को इस चाये से कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि उसे संक्रमण मूत्र तंत्र में नहीं था ।

  • पेट पर जड़ी-बूटी की पट्टी बांधना एक हानिरहित उपचार है। इससे किसी बीमारी में और हानि नहीं होगी क्योंकि दवाइयां शरीर के बाहर ही रहती हैं लेकिन इससे कोई फायदा भी नहीं होगा।
  • पेड़-पौधे से प्राप्त औषधियों को योनि के अन्दर रखना खतरनाक हो सकता है तथा ऐसी औषधियों से योनि में जलन तथा खतरनाक किस्म के संक्रमण हो सकते हैं।

रोशन जी ने ललिता को बताया कि वह किसी उपचार तथा उसकी प्रभावशीलता के बरे में ऐसे विभिन्न लोगों से बात करके पता कर सकती है जिन्होंने उस उपचार को आजमाया हो। कुछ ऐसे प्रश्न पूछिए :

अपने यह उपचार क्यों आजमाया ?

अपने कब इसका प्रयोग किया ?

अब आप इसका प्रयोग करती है तो क्या होता है ? इस से कितनी बार समस्या में फायदा होता है ?

क्या इस उपचार से कभी गड़बड़ भी होती है।

जो उत्तर विभिन्न लोग उनके द्वारा अजमाए हुए उपचारों के बारे में दें, उन्हें ध्यान से सुने। इसके बाद जब आप स्वयं उस उपचार को आजमाएँ तो इस बात पर ध्यान दें कि उससे आपके लक्षणों में क्या फर्क पड़ता है ? क्या आपको उस उपचार से लाभ हो रहा है ? इस बात का ध्यान करें कि एक ही समय पर कोई उपचार न आजमाएँ।

यह निर्णय करने के लिए कोई उपचार लाभप्रद, हानिकारक या हानिरहित होगा, सबसे पहले इस उपचार के बारे में हर संभव जानकारी प्राप्त करें। यदि फिर भी आपको यह विश्वास नहीं है कि कोई उपचार हानिरहित है या हानिकारक है, तो इन बातों पर गौर करें –

अगर किसी बीमारी के लिए जितने अधिक उपचार के तरीके होंगे, इस बात की संभावना उतनी ही कम है उनमें से कोई भी कारगर होगी।

आम तौर पर वीभत्स्य या घृणित उपचार के तरीकों से कोई लाभ नहीं होता है –अकसर वे हानिकारक होते हैं।

उन उपचार के तरीकों में, जिनमें मनुष्य या जानवरों के मल का प्रयोग होता है , शायद ही कभी लाभ होता है और प्राय: इनसे भयंकर संक्रमण हो जाते हैं। इन्हें कदापि प्रयोग न करें ।

उपचार का कोई तरीका जिनता उस बीमारी से मिलता-जुलता दीखता है, इस बात की उतनी ही अधिक सम्भावना है कि उसके “फायदे” केवल उसमें विश्वास के कारण है। उदाहरण एक लाल पौधे से शायद ही कमी खून का बहना रूक पाये।

ऐसे तरीके, जिनके कारण बीमार व्यक्ति को भोजन, व्यायाम या आराम से वंचित रहना पड़े, आम तौर पर रोगी को कमजोर बनाते हैं, शक्तिशाली नहीं।

उपचार के ऐसे तरीके, जो रोगी को उसकी समस्याओं के लिए आरोपी ठहराते हैं, आत तौर पर उनकी पीड़ा व दर्द को और बढ़ाते हैं।

जब ललिता को विश्वास हो गया कि उसकी स्वास्थ्य समस्या के लिए आधुनिक औषधियां ही सर्वोतम उपचार है तो रोशन जी ने डाक्सीसाइकलिन तथा को-ट्राईमोक्साजोल नामक गोलियां दीं और ललिता को उन गोलियों का एक सप्ताह तक सेवन करने के बाद फिर से वापस आने को कहा । उसने यह भी स्पष्ट किया कि जब ललिता का पति फैक्ट्री से काम करके, वापस घर आएगा तो उसे भी ये गोलियां खानी होंगी और उन दोनों को सुरक्षित यौन सम्बन्ध अपनाने होंगे।

जब तक एक सप्ताह तक उन गोलियों का सेवन करने के बाद ललिता फिर से रोशन जी के पास गई तो उसने उसे बताया की एक सप्ताह तक गोलियों खाने के बाद भी लक्षणों में कोई अन्तर नहीं आया है। उसने यह भी बताया कि उसक योनि स्त्राव और भी बद्तर होता जा रहा है तथा उसका रंग भी पीला होता जा रहा है। यह सुनकर रोशन जी ने ममता नामक अधिक प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मचारी से सहायता मांगी।

ममता इस बात से सहमत थी कि ललिता को एस टी डी रोग था । लेकिन चूँकि दवाईयों से उसे कोई लाभ नहीं हुआ था, इसलिए उसने निष्कर्ष निकाला की लोलिता का गोनोरिया रोग ऐसे कीटाणुयों से हुआ था, जिन्होंने को-ट्राईमोक्साजोल के विरुद्ध प्रतिरोध उत्पन्न कर लिया था । ममता ने यह भी स्पष्ट किया कि बाहर के गावों व शहरों से फैक्टरी में आने वाले ट्रक ड्राइवरों द्वारा गोनोरिया की कुछ प्रतिरोधी किस्में लाई गई हैं जब वे स्थानीय महिलाओं से यौन सम्पर्क करते हैं तो वे भी इससे संक्रमित हो जाती हैं । ममता ने यह सलाह दी कि ललिता शहर जा कर अपना विस्तृत उपचार कराये तथा गोनोरिया, सिफलिस (एक अन्य एस टी डी) तथा कैंसर के लिए जाँच कराये। यदि आवश्यकता हुई तो उसे और प्रभावी दवाईयां खानी पड़ेंगी ।

खतरे और लाभ

यह सोचने के लिए कि अब वह क्या करे, ललिता वापस घर गई । अगर परिक्षण तथा दवाइयों के लिए शहर जाना पड़ा तो उसे अपने परिवार की लगभग सारी बचत पूंजी खर्च करनी होगी । चूँकि शहर आने-जाने व उपचार कराने में उसे दो दिन लग जाएँगे (शहर तक बस में व पैदल चलने पर लगभग 6 घंटे लगते हैं ) और उसका पति अभी भी घर से दूर था तो उसे अपनी अनुपस्थिति में बच्चों की देखभाल के लिए किसी को कहना पड़ेगा ।

ललिता को भय था कि वापस आने पर उसका पति यह जानकार गुस्सा करेगा कि उसने डॉक्टर के पास उपचार के लिए इतना पैसा खर्च कर दिया है । साथ में उसे यह भी चिन्ता थी कि यदि वह नहीं गई तो उसका हालत और बिगड़ जाएगी । ममता ने यह बताया था कि यदि उसने उपचार नहीं कराया तो गर्भधारण करने की स्थिति में, उसके होने वाले बच्चे को भी यह रोग हो सकता है । समय गुजरने के साथ, वह और बच्चे पैदा करने में असमर्थ हो जाएगी ; उसके पेडू के निचले भाग में तेज दर्द रहने लगेगा तथा उसके मूत्र तंत्र व मसिक धर्म में समस्यायें उत्पन्न हो जाएँगी । उसके पति को भी कुछ जटिल स्वास्थ्य सम्सयाएं हो सकती हैं ।

ललिता की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे । वह फिर ममता से मिलने गई । जब ललिता ने अपने भय व आशंकाओं के बारे में ममता से चर्चा की तो ममता ने उसे अपनी समस्या के बारे में इस प्रकार सोचने का सुझाव दिया :

उपचार के हर तरीके के लाभ और खतरे होते हैं । खतरे का अर्थ इस बात की सम्भावना कि कोई हानि हो सकती है  ।लाभ का अर्थ है किसी अच्छी चीज का होना । सबसे अच्छा चयन वही है जिससे अधिकतम लाभ तथा न्यूनतम हानि हो ।

शायद बाजार में वजन करने वाले तराजुओं के बारे में सोचने से कुछ सहयता मिले । जिस तरह के पलड़े में अधिक वजन होता है वह दुसरे पलड़े के मुकाबले नीचा हो जाता है । यदि खतरों के मुकाबले फायदे अधिक है तो वही कार्य करने योग्य है । यदि फायदों के मुकाबले खतरे अधिक है तो वैसा कार्य करने योग्य नहीं है ।

ललिता, यदि तुम शहर जाओगी तो ये खतरे हैं ;

जब तुम्हारे पति को पता चलेगा तो वह गुस्सा होगा ।

आय की सारी जमा पूंजी समाप्त हो जायगी और शायद इस वर्ष तुम अपने बच्चों के लिए नहीं कपड़े न खरीद पाओ ।

अगर तुम शहर जाओगी तो ये फायेदे हैं ;

तुम अच्छा महसूस करोगी और अपने परिवार की बेहतर देखभाल कर पाओगी ।

तुम और बच्चे पैदा कर पाओगी ।

अगर तुम गर्भवती हो गई तो तुम्हारे नवजात शिशु को यह संक्रमण नहीं मिलेगा ।

ललिता ने यह निर्णय किया कि उपचार कराने के लाभ, खतरों से कहीं अधिक है ।

यदि केवल मैं अच्छी महसूस करती हूँ तो उपचार कराने का कोई फायदा नहीं है । लेकिन अगर यह सत्य है कि मैं और अधिक बीमार हो जाउंगी तथा और बच्चे पैदा नहीं कर सकुंगी तो मुझे अवश्य ही शहर जाना चाहिये ।

इस प्रकार ललिता उपचार के लिए शहर गई जहाँ डॉक्टरों ने इसकी पुष्टि की उसे गोनोरिया और शायद क्लेमाइडीया रोग था लेकिन किसी अन्य एस टी डी और कोई बीमारी के लक्षण नहीं थे । उन्होंने बताया कि जो दवाईयां ललिता ने तक तक ली थी, वे अब इस देश में इस रोग के विरुद्ध प्रभावी नहीं थी । उन्होंने ललिता तथा उसके पति के लिए एक नई दवा दी ।

जब ललिता ने दवा ले ली और वह अच्छा महसूस करने लगी तो उसके दिल में विचार आया कि उसकी स्वास्थ्य समस्या ठीक हो गई है । परन्तु वह जानती थी कि यह सत्य नहीं है । जब उसका पति फैक्टरी से वापिस आएगा और अगर दवाईयां नहीं खाई और कंडोम का प्रयोग नहीं किया तो वह फिर से संक्रमित हो जाएगी ।

उसने इस समस्या के बारे में सुजया तथा अन्य उन औरतों से चर्चा की जिनके पति फैक्टरी में काम के लिए जाते हैं और उन सबने ममता से सलाह लेने का फैसला किया ।

3.04672897196

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