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मधुमेह की प्राकृतिक चिकित्सा

मधुमेह चिकित्सा से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

आज मधुमेह के लिए अनेक तरह के उपचार उपलब्ध हैं । तरह- तरह की दवाओं एवं अन्य तरीकों का इस्तेमाल मधुमेह की चिकित्सा के लिए किया जा रहा है । रोज इस दिशा में नवीन अनूसंधान हो रहे हैं । लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा के दृष्टिकोण से मधुमेह की पूर्णरूप से चिकित्सा करने के लिए यह आवश्यक है की हम पूरे शरीर को एक इकाई मानकर उसकी सर्वंगीण चिकित्सा पर अपना ध्यान केन्द्रित करें । ऐसा देखा गया है की मधुमेह के अधिकांश रोगियों में अग्नाशय के साथ-साथ यकृत भी प्रभावित रहता है । की बार गुर्दों की समस्या भी इसके साथ जुड़ी हुई रहती है । इसलिए मधुमेह की चिकित्सा करते समय हमें पाचन संस्थान को मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए ताकि कब्ज एवं पेट संबंधी अन्य विकार ठीक किए जा सकें । शरीर में स्थित ये सभी अंग-प्रत्यंग अग्नाशय को भली-भांति कार्य करने में सहायता पहुँचाते हैं । कहने का आशय यह है कि पूरा शरीर संतुलन की अवस्था में कार्य करना चाहिए ।

मधुमेह से ग्रस्त रोगियों के लिए भोजन के कई प्रारूप बनाए गए हैं जिनके पालन का परामर्श चिकित्सकों द्वारा दिया जाता है । लेकिन इसके साथ ही रहन-सहन के स्वास्थ्यप्रद तरीकों को भी पर्याप्त प्रमुखता दिया जाना नितांत आवश्यक है । मात्र स्टार्च एवं शर्करा युक्त पदार्थों को भोजन में से कम करना ही पर्याप्त नहीं है । हमें पूरे शरीर के संतुलित पोषण पर ध्यान देना चाहिए । ऐसे बहूत कम ही लोग देखने में आते हैं जो केवल मधुमेह से ग्रस्त होते हैं तथा अन्य रोग नहीं होते ।

चिकित्सा के लक्ष्य

मधुमेह की चिकित्सा का पहला लक्ष्य रक्त में शर्करा के स्तर को यथासम्भव समान्या या उसके आस-पास बनाए रखना है । दूसरा लक्ष्य मधुमेह की जटिलताओं को कम करना या उनसे यथासंभव बचना है । इस दुसरे लक्ष्य की प्राप्ति पहले लक्ष्य की प्राप्ति पर ही निर्भर करती है ।

अच्छा उपचार क्या है ?

मधुमेह पर नियंत्रण रखना ही इसका सबसे अच्छा उपचार है । प्राकृतिक उपचार, नियंत्रित आहार तथा संतुलित व्यायाम का अनुशासित ढंग से पालन करते हुए हम न केवल इस रोग को नियंत्रित अवस्था में रख सकते हैं बल्कि इसकी जटिलताओं से भी स्वंय को काफी हद तक बचा सकते हैं । मधुमेह का उपचार वस्तुतः तीन प्रकार से किया जा सकता है ।

- केवल आहार पर नियंत्रण एवं प्राकृतिक उपचार द्वारा

- आहार नियंत्रण एवं रक्त में शर्करा का स्तर घटाने वाली औषधियों के प्रयोग द्वारा

- आहार नियंत्रण तथा इन्सुलिन द्वारा

मधुमेह नियंत्रण का सर्वोत्तम तरीका है –

  • संतुलित एवं नियंत्रित भोजन,
  • नियमित व्यायाम एवं योगाभ्यास,
  • नियमित प्राकृतिक स्वास्थ्यप्रद दिनचर्या तथा
  • यदि आवश्यक हो तो दवाएँ ।

प्राय: नियंत्रित भोजन, व्यायाम, नियमित ववं तनाव रहित दिनचर्या इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं ।

प्राकृतिक चिकित्सा की भूमिका

प्राकृतिक चिकित्सा स्वस्थ जीवन जीने की कला एवं स्वस्थ रहने का विज्ञान है । प्राकृतिक चिकित्सा का उद्देश्य है रोगी को पुन: प्रकृति के नजदीक लाकर उसे स्वास्थ के प्रति जागरूक आत्मनिर्भर बनाता ।

प्राकृतिक उपचारों के समुचित परिपालन, पूर्णत: प्राकृतिक खाद्यों या यथासम्भव  प्राकृतिक खाद्यों के नियमित सेवन तथा व्यवस्थित अनूशासित एवं तनाव मुक्त रहन-सहन के पालन से रोग को दूर करके रोगी को पुन: प्राकृति के सान्निध्य में लाने का प्रयास किया जाता है ।

जहाँ तक मधुमेह का प्रश्न है प्राय: विशेषज्ञ इसे कोई रोग नहीं मानते । यह पाचनतंत्र के एक भाग की कमजोरी के कारण होता है और इस कमजोरी को सुधारा जा सकता है । इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा मधुमेह के रोगी का उपचार करते समय उसके सामान्य स्वास्थ्य को सुधारने पर विशेष ध्यान देते हैं । रोगी के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर उसके पाचनतंत्र को शक्तिशाली बनाने का प्रयास किया जाता है । इन सब कामों में विभिन्न प्राकृतिक उपचार बेहतर ढंग से मदद करते हैं । इसके साथ ही रोगी को मानसिक स्थिति में सकरात्मक सुधार लाकर शारीरिक श्रम एवं व्यायाम करने के लिए प्रेरित किया जाता है ।

प्राकृतिक चिकित्सा के दृष्टिकोण से मधुमेह के कारण

प्राकृतिक चिकित्सा का मानना है कि सभी रोग प्राकृति के नियमों के उल्लंघन का परिणाम हैं । मधुमेह भी इनमें से एक है । प्राकृतिक चिकित्सा के आचार्य डॉ. हेनरी लिंडलार ने इसे प्रकार से व्यक्त किया है ----

विशिष्ट प्राकृतिक उपचार

प्राकृतिक उपचारों को साधारणत: दो वर्गों में विभाजित किया जाता कहलाते हैं । इनमें पेट पर गरम ठंडा सेंक, पेट पर मिट्टी की पट्टी, आश्याकतानूसार एनिमा का प्रयोग तथा कटिस्नान आदि हैं। इसके अतिरिक्त कुछ विशिष्ट उपचार होते हैं जो रोग की विशेष स्थिति को देखकर किए जाते हैं। जैसे मिट्टी का लेप तथा किसी विशेष स्थान की लपेट आदि ।

मधुमेह रोग में कटिस्नान, पेट की लपेट, अग्नाशय के स्थान पर मीट्टी की पट्टी तथा वहाँ के रक्त संचारण को उन्नत बनाने के लिए बाईब्रेटर के प्रयोग आदि को विशिष्ट उपचारों की श्रेणी में रखा जा सकता है। कटिस्नान प्रात:एवं सांय दस- दस मिनट का तथा सप्ताह में एक – दो बार गरम-ठंडा कटिस्नान लेना चाहिए। यदि कब्ज हो तो शरीर के बराबर तापक्रम के जल से रात में पेट की ठंडी-गरम लपेट देनी चाहिए नित्य प्रात: काल मौसम एवं शारीरिक शक्ति के अनुसार 15 मिनट से आधा घंटे तक नंगे बदन धुप ठंडे जल से स्नान करना चाहिए । इसके अतिरिक्त योगासनों का अभ्यास तथा प्रात:कालीन भ्रमण आदि भी विशिष्ट उपचारों की श्रेणी में आते हैं । दिन में कई बार 100 बार तक गहरी साँस लेने का अभ्यास उपयुर्क्त होगा । यह आवश्यक है की चिकित्सा की सलाह के अनुसार या उनकी देख- रेख में इन सब उपचारों का प्रयोग किया जाए ।

रोगी की दैनिक उपचार तालिका

प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सा डॉ.खुशी राम शर्मा “दिलकश” ने अपने पुस्तक “रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा” में मधुमेह के रोगी की दैनिक उपचार तालिका निम्न प्रकार से दी है –

  • प्रात: काल शौच जाने के बाद यदि पेट साफ न हूआ हो तो ताजे पानी का एनिमा लेना चाहिए । पेट पर मिट्टी की पट्टी 20 मिनट तक लेने के पश्चात् 5 से 10 मिनट तक का कटिस्नान लेकर तेजी से टहलना चाहिए । शाम को पुन: कटिस्नान लें । थोड़े दिनों के बाद प्रात: मेहन स्नान और शाम को कटिस्नान लेना जारी रखें । मेहन स्नान ठंडे जल से लें और कटिस्नान गर्मियों में ताजे जल से तथा सर्दियों में हल्के गूनगूने जल से लें । गर्म –ठंडा स्नान सप्ताह में एक दो बार लें ।
  • मालिश और सैर विशेष रूप से लाभप्रद रहते हैं। मालिश लगभग 1 घंटे की होनी चाहिए । तत्पश्चात हल्के गर्म पानी से नहाना चाहिए। प्रात: 2-3 मील की सैर की जा सकती है । स्नान करते समय रीढ़ पर 5 मिनट तक ठंडा पानी डालें। स्नान उपरांत पूरे शरीर की सूखी मालिश करके शरीर का जल सूखा दें । पेट पर गरम–ठंडा सेंक सप्ताह में एक – दो बार तथा रात को सोते समय पेडू पर गीली लपेट लेनी चाहिए। नारंगी रंग की बोतल का सूर्यतप्त जल भाग मिलाकर 50 मि. ली. मात्रा में सुबह, शाम भोजन के बाद लें ।
  • रक्त में बढ़ी हुई शर्करा को कम करने के लिये सारे शरीर की गीली लपेट या सूर्य स्नान जिससे पसीना निकल तथा गर्म तब स्नान या बिजली का सूखा स्नान रामबाण है । यदि रोगी अधिक दुबला हो गया हो तो गीली चादर की लपेट नहीं देनी चाहिए ।
  • रात को सोने से पहले सम्पूर्ण शरीर का स्पंज देने के बाद रोगी को हल्के गर्म पानी का टब स्नान देने से नींद अच्छी आ जाएगी और बेचैनी भी दूर होगी। सम्पूर्ण शरीर का स्नान 92 डिग्री फारेनहाइट का लगभग 20 से 30 मिनट का अधिक लाभ पहुँचाता है।
  • जहाँ व्यायाम और सैर जरूरी है वहाँ रोगी के लिए शारीरिक और मानसिक विश्राम भी अत्यंत आवश्यक है। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना भी ऐसे रोगियों के लिए आनिवार्य है।

अंतिम बार संशोधित : 2/21/2020



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