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वृद्ध लोगों में मधुमेह या डायबिटीज

परिचय

डायबिटीज मेलिट्स रक्त में ग्लूकोज की अधिक मात्रा (हाइपरग्लाइसेमिया) और अधिक पेशाब में शर्करा जाने (ग्लाइकोसूरिया) से सम्बन्धित एक रोग है | यह इन्सुलिन नामक हार्मोन की कमी के कारण होता है |

हमारे शरीर की ऊर्जा जिस मुख्य ईंधन से आती है, वह शुगर या शर्करा जो की रक्त द्वारा एक सरल रूप से वहन की जाती है | इसे ग्लूकोज कहा जाता है | यह शरीर की सभी कोशिकाओं, अधिक महत्वपूर्ण मांसपेशी – कोशिकाओं और मस्तिष्क तक पहुंचाई जाती है | ग्लूकोज का एक सहायक हार्मोन होगा है जिसे इन्सुलिन कहा जाता है | यह अग्नाशय या पेन्क्रियाज द्वारा पैदा किया जाता है | यह ग्लूकोज को कोशिकाओं में प्रवेश करने में सहायता देता है और इस तरह हमारे रक्त में उसकी मात्रा कम करता है ग्लूकोज कोशिकाओं को  प्रदान करता है |

डीएम में निम्न कारणों से रक्त का ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश नहीं कर पाता :

  1. इन्सुलिन का अपर्याप्त मात्रा में बनना|
  2. शरीर की कोशिकाओं (लक्षित अंगों की, जैसे मस्तिष्क, मांसपेशियां इत्यादि ) का इन्सुलिन के प्रति असंवेदनशील यानी इन्सुलिन प्रतिरोधी होना |

 

डायबिटीज के प्रकार

डायबिटीज मेलिट्स मुख्यत: दो प्रकार का होता है, लेकिन दोनों में बहुत भिन्नता होती है :

पहली प्रकार को इन्सुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मिलेट्स (पक्कड) भी कहा जाता है और यह आम तौर पर युवाओं में पाया जाता है | उन्हें नियमित रूप से इन्सुलिन लेनी पड़ती है अन्यथा कोमा में जाने या मृत्यु का खतरा होता है |

दूसरी प्रकार को नॉन – इन्सुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मिलेंट्स (छ्पक्क्ड) भी कहा जाता है | इसे ‘मेच्योरिटी ऑनसैट डीएम्’ का नाम भी दिया जाता है | यह आम तौर पर प्रौढ़ व वृद्ध लोगों में पाया जाता है, और उसे आहार, व्यायाम तथा मूँह के जरिए ली जाने वाली डायबिटीज प्रतिरोधी दवाओं से नियंत्रित किया जा सकता है |

65 या उससे अधिक आयु के 10 प्रतिशत लोग इससे प्रभावित हैं | उम्र बढ़ने के साथ ग्लूकोज को वहन करने की क्षमता कम होने लगती है और अनेकों प्रौढ़ व वृद्ध लोगों को उम्र बढ़ने के साथ डायबिटीज की शिकायत हो जाती है | अत: यह उम्र से जुडा रोग हैं और इसमें निम्न बातों से खतरा होता है :

क) मोटापा : अधिक वजन होना

ख) ऐसी जीवन शैली जिसमें शारीरिक सक्रियता कम हो

ग) दीर्घकालिक बीमारी

घ) स्टीरौइड जैसी दवाएँ

डीएम् के लक्षण

रोगी में डीएम् के आम लक्षण प्रकट हो  भी सकते हैं और नहीं भी | ये आम लक्षण हैं : बहुत मात्रा में पेशाब जाना, बहुत अधिक प्यास लगना खुजली होना | रोगी में स्नायु- संबद्धता (न्यूरोपैथी) जैसी जटिलताएँ विकसित हो सकती हैं या दीर्घकालिक त्वचा- संक्रमण हो सकता है|

उन महिलाओं को डायबिटीज होने की आशंका होती है जिन्होंने अधिक वजन वाले बच्चों को जन्म दिया हो, किसी अज्ञात कारण से जिनका भ्रूण गिर गया हो या जिनमें हैद्रोमिनिओस (शिशु – थैली में बहुत अधिक मात्रा में तरल होना) या प्री – एक्लैम्सिया (गर्भावस्था के दौरान दौरे/ झूरझूरियाँ आना ) जैसी जटिलताएँ पैदा हो गई हों)

अनेकों रोगियों में रूटीन जाँच के दौरान ही डायबिटीज का पता लग जाता है आम तौर पर अधिक वजन वाले लोगों में डायबीटीज मेलिट्स टाइप-2 पाया जाता है | शरीर में चर्बी के वितरण का अपना तरीका होता है | यह ऊपर के हिस्से के पेट, सीने, गर्दन और चेहरे जैसे अंगों पर अधिक होती है | लेकिन, सामान्य वजन वाले कुछ लोगों को भी डायबीटीज मेलिट्स टाइप-2 में आम तौर पर परिवार में इस रोग का इतिहास मिलता है |

निदान

एक रात के उपवास के बाद, सीरम या प्लाज्मा ग्लूकोज के आकलन के लिए नस से खून लिया जाता है | व्यक्ति को डायबीटीज मेलिट्स होता है, अगर

1. उपवास के बाद प्लाज्मा ग्लूकोज 140 एमजी या अधिक / डीएल हो;

2. भोजन के दो घंटे के बाद (पोस्ट प्रैन्दियल) प्लाज्मा ग्लूकोज 200 एमजी. या अधिक/ डीएल हो; और

3. 300 मी.ली. पानी में 75 ग्राम ग्लूकोज लेने के दो घंटे बाद की गई जाँच में उपरोक्त नतीजे आएं |

डायबीटीज होने की पुष्टि के बाद, इस रोग का कारण पता करने और इसके प्रबंधन के आधार जाने के लिए पूरी चिकित्सीय जाँच की जाती है | डायबीटीज मेलिट्स टाइप-2 में आम तौर पर इन्सुलिन के इंजेक्शनों की जरूरत नहीं होती और इसे मुंह से ली जाने वाली दवाओं (रक्त शर्करा को कम करने वाली हैपोग्लैसेमिक दवाएँ) के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है | उपचार शुरू करने के बाद, जल्द ही रोगी पहले के मुकाबले स्वस्थ महसूस करने लगता है | जटिलताओं से बचने के लिए, जहाँ तक संभव हो रक्त शर्करा के स्तर को नीचे रखना बहुत जरूरी है | डायबीटीज मेलिट्स टाइप -2 में ऐसा करना मुश्किल नहीं होता |

उपचार के लिए निम्न कदम उठाए जाने चाहिए :

क. उचित आहार के बार में राय लें |

ख. नियमित व्यायाम करें |

ग. हैपोग्लैसेमिक दवाएँ खाएँ |

घ. रोग संबंधी जटिलताओं को नियंत्रित करें |

च. रोगी को अपने रोग के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए |

डॉक्टर के परामर्श से निर्धारित दवाएँ नियमित खानी चाहिए | इन्हें बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने पर रक्त में ग्लूकोज फिर से बढ़ना शुरू हो जाएगा | डायबीटीज के अच्छी तरह नियंत्रित हो जाने के बाद भी डॉक्टर से नियमित रूप से परामर्श करना चाहिए और कोई समस्या होने ओर उससे चर्चा करने चाहिए |

अतीत में वृद्ध लोगों के डायबीटीज का उपचार आक्रामक रूप से नहीं किया जाता था, लेकिन अब यह अहसास किया जाने लगा है की जटिलताओं को रोकने के लिए इस तरह का उपचार जरूरी है | टाइप – 2 डीएम का शूरूआती उपचार बिना दवाओं के किया जाता है | इसमें उपयुक्त आहार व व्यायाम की सलाह दी जाती है और रोगी को उसके रोग के बारे में शिक्षित किया जाता है | खासकर व्यायाम पर जोर दिया जाता है, क्योंकी इससे इन्सुलिन के प्रति प्रतिरोध में कमी आती है, लिपिड संबंधी असामान्यताओं में सुधार आता है | इसके अलावा, यह उच्च रक्तचाप के रोगियों व अधिक वजन वाले लोगों के लिए लाभकारी होता है |

आहार

स्वस्थ भोजन का अर्थ है ऐसा संतुलित आहार लेना जिससे रक्त शर्करा नियंत्रण में रहे तथा शरीर का वजन ठीक बना रहे | भूखे रहने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकी रोगी भोजन का आनंद लेते हुए भी धीरे-धीरे (एक सप्ताह में एक पौंड) वजन को कम कर सकता है | भोजन में कैलोरी और चर्बी की मात्रा घटानी चाहिए और रेशेदार आहार की मात्रा बढ़ानी चाहिए | 10-20 प्रतिशत कैलोरी प्रोटीन के जरिए मिलनी चाहिए, 30 प्रतिशत से कम चर्बी से और 8 प्रतिशत से कम संतृप्त चर्बी से | एक दिन में 30 ग्राम से ज्यादा कोलेस्ट्रोल भोजन में नहीं होना चाहिए | आहार में 25-30 ग्राम रेशेदार भोजन जरूर शामिल किया जाना चाहिए | शेष कॉमप्लेक्स कार्बोहाइड्रेट और हल्की मात्रा में विटामिन सी, ई, बी-कैरोटीन और खनिज लिए जा सकते हैं | कृत्रिम मीठे की भूमिका आहार के विभिन्न पहलूओं के बारे में जानना जरूरी है |

आहार संबंधी आदतों में सुधार लाने, रेशेदार भोजन फलों और सब्जियों को खानी चाहिए | मक्खन तथा तली हुई चीजों से परहेज करना चाहिए और इनकी बजाय भुना या पका हूआ भोजन खाना चाहिए | अधिक चर्बीदार दूध और दूध की बनी चीजों से बचना चाहिए | कृत्रिम मीठे की जगह चीनी ली जा सकती है | 10-20 प्रतिशत प्रोटीन मछलियों, अंडों के सफ़ेद भाग, चिकन, बीन्स और चने या छोटी मटर से प्राप्त हो सकते हैं | बीन्स में चर्बी कम और रेशा अधिक होता है | धूम्रपान छोड़ देना चाहिए और शराब कम मात्रा में डॉक्टर के परामर्श से लेनी चाहिए |

व्यायाम

दिल और फेफड़ों को स्वस्थ बनाए रखने व अतिरिक्त कैलोरियों को खर्च करें के लिए व्यायाम बहुत जरूरी है | नियमित रूप से तेज- तेज घूमना एक अच्छा व्यायाम है | सप्ताह में पांच-छह बार प्रतिदिन करीब आधा घंटा ऐसा करना चाहिए | व्यायाम से रक्तसंचार बेहतर होता है और शरीर की कोशिकाएं ज्यादा ग्लूकोज सोखती हैं जिससे शरीर में ग्लूकोज की मात्रा कम हो जाती है | इससे इन्सुलिन- प्रतिरोधी रोगी में इन्सुलिन- अभिग्राह्कों (रिसेप्टर्स) की संख्या बढ़ती है यानी कोशिकाओं में शर्करा जाने की इन्सुलिन द्वारा की जाने वाली क्रिया में सहायता मिलती है |

रोगी व उसके परिवार को रोग के बारे में शिक्षित करना

कृत्रिम मीठे के बारे में आवश्यक सूचनाएं हासिल करें | इस रोग की प्रकृति तथा बिना दवा के इसकी चिकित्सा की पद्धतियों के बारे में जानें | रोगी को रक्त शर्करा बहुत कम होने (हैपोग्लैसेमिया) पर प्रकट होने वाले लक्षणों: जैसे नब्ज की धड़कन का तेज होना (टैकिकार्डिय), अतिस्पंदन या दिल का तेजी से धड़कना (पैल्पिटेशन), पसीना आना, कम्पन होना, उबकाई आना भूख इत्यादि और आपात स्थिति में किए जाने वाले उपायों की बारे में जानना चाहिए |

मुंह से ली जाने वाली दवाएँ

टाइप – 2 डीएम में जब आहार और व्यायाम के जरिए रक्त शर्करा कम नहीं हो पाती तो इसके लिए उसे मुंह से ली जाने वाली दवाएँ (हैपोग्लैसेमिया दवाएँ) देने की जरूरत पड़ती है | आजकल ऐसी कई दवाएँ उपलब्ध हैं और इनमें से किसी भी दवा को टाइप -2 डीएम् को नियंत्रित करने के लिए अकेले या मिला कर प्रयोग किया जा सकता है |

दीर्घकालिक जटिलताएँ

डायबिटिज एक ऐसा रोग है जिसमें शरीर के कई तंत्र प्रभावित होते हैं और जटिलताएँ पैदा हो सकती हैं | यह आँखों त्वचा, गुर्दों, रक्तवाहिका, पैरों तथा दांतों पर असर डाल सकता है | रक्त शर्करा स्तरों को सामान्य रखने पर इनसे बचा जा सकता है | इसके लिए नियमित व्यायाम, संतुलित आहार तथा दवाएँ लेनी चाहिए |

मैक्रो वैस्क्यूलर रोग

बड़ी रक्त वाहिकाओं के प्रभावित होने की स्थिति को मैक्रो वैस्क्यूलर रोग कहा जाता है | इसके कारण हृदय व वैस्क्यूलर तंत्र में रक्त की आपूर्ति में कमी आ सकती है | डायबीटीज में 75 प्रतिशित रोगियों की मृत्यु इसी कारण होती है | महिलाओं को इसका खतरा 2 से 4 गुणा ज्यादा होता है |

स्ट्रोक

मस्तिष्क व वैस्क्यूलर तंत्र के अधिक प्रभावित होने की स्थिति को स्ट्रोक कहा जाता है | डायबिटीज के रोगियों में इसके कारण 2 सर 8 गुणा अधिक मौतें होती हैं | पेरिकल वैसल रोग से पैरों में कोथ गैंग्रीन हो सकता है और पैर काटना पड़ जाता है

ऑंखें

15 या उससे अधिक वर्षो तक डायबिटीज से पीड़ित रहने वाले 50 प्रतिशत रोगियों की आँखें प्रभावित हो जाती हैं | अतीत के मुकाबले अब इन मामलों की संख्या में कमी आई है | अतीत में आँखों पर पड़े प्रभाव को ठीक कर पाना संभव नहीं था | इससे रोगी अंधे भी हो जाते थे | आँखों में जल्दी ही मोतियाबिंद, ग्लोकोमा, रेटिनोपैथी व अन्य समस्याएँ पैदा हो जाती थी | अब रोगी के उपयुक्त शिक्षण तथा डीएम के उपचार के द्वारा आँखों की समस्याओं से बचा जा सकता है | नियमित रूप से आँखों की जाँच करानी चाहिए और आँखों में होने वाली समस्या पर अपने चिकित्सक से चर्चा करनी चाहिए |

डीएम के ऐसे मामलों में जिनमें रोग का निदान न हूआ हो, उपचार की शूरूआत में कुछ सप्ताहों के लिए दृष्टि धुंधला सकती है, लेकिन उसके बाद जल्दी ही वह सामान्य हो जाती है | चश्मा बदलने की जरूरत नहीं होती | दरअसल, ऐसा आँखों में मौजूद एक जाली जैसे तरल में शर्करा का स्तर कम हो जाने से होता है | इसे आंख ख़राब हो जाने की संज्ञा नहीं देनी चाहिए | शर्करा स्तर के कम हो कर सामान्य स्तर पर आने पर यह समस्या दूर हो जाती है |

निम्न स्थितियों में डॉक्टर से परामर्श करें :

  1. देखने या पढ़ने में कठिनाई
  2. बार- बार चश्मे का बदले जाना
  3. आँखों के सामने रोशनी की कौंधें
  4. किसी एक आंख से कुछ समय के लिए दिखना बंद हो जाना
  5. आँखों के आगे चीजों का तैरते दिखना
  6. दृष्टि के दायरे में दोष आना
  7. अचानक दृष्टि चले जाना

गुर्दे संबंधी जटिलताएँ

अनियंत्रित डीएम के कारण रक्तवाहिकाओं के सख्त होने की प्रक्रिया में तेजी आ सकती है | इस स्थिति को एथिरोस्किलेराइसिस कहा जाता है | इस प्रक्रिया में किसी भी अंग को रक्त की आपूर्ति करने वाली धमनियां प्रभावित हो सकती है हृदय की धमनियों के प्रभावित होने की स्थिति में सीने में दर्द या छाती में अकड़न महसूस हो सकती है जिसे एंजाइना कहा जाता है |  दिल का तेज दौरा भी पड़ सकता है जिसे मायोकार्डियल इन्फ्रेक्सन कहते हैं | व्यायाम करने की क्षमता कम हो जाती है, तेज-तेज घूमने, पहाड़ी या सीढ़ियों पर चढ़ने में कठिनाई आने लगती है | साधारण से व्यायाम से भी साँस फूल जाता है | अगर, इनमें से कोई भी स्थिति विकसित हो, तो अपने डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए |

नीचे के अंगों की धमनियों प्रभावित होने पर, चलते वक्त पिंडलियों में दर्द महसूस हो सकता है, लेकिन आराम करने से वह ठीक हो जाता है | रोजाना के कामकाज करने पर थकान महसूस हो सकती है | धूम्रपान न करें तथा बचाव के लिए अपने रक्त शर्करा स्तर को सामान्य स्तर तक नियंत्रित रखें | निर्धारित भोजन लें रक्तचाप को नियंत्रित रखें |

स्नायु

पंजों में अजीब सी सनसनी या सुन्नपन महसूस हो सकता है | पैरों को तलुवों में झूनझूनाह्ट, जलन या पिन या सूइयां चुभने जैसा अहसास हो सकता है | कभी - कभार हाथों में भी ऐसा मसूस हो लस्त है | बाजुओं और टांगों की कुछ मांसपेशियों में कमजोरी महसूस हो सकती है | रोगी के हाथ – पैर तरह या कुछ हद तक सुन्न हो सकते हैं |

पैर

डायबिटीज के रोगियों में पैरों की समस्याएँ होना बहुत आम बात है | उन्हें इन समस्याओं और इनकी देखभाल के में जानना चाहिए | यह उन प्रौढ़ व वृद्ध रोगियों के लिए बहुत जरूरी है जिनके पैरों में संवेदना कम हो गया है | इन लोगों को पता ही नहीं चलता की उन्हें जूतों से छाले हो गए हैं | उनका ध्यान घावों की तरफ नहीं जा पाता और घाव बहुत देर व कठिनाई से ठीक होते है अपने पैरों की रोजाना जाँच करनी चाहिए की कहीं उन पर ललाई, फटे आ घाव तो नहीं हैं | अपने पैरों को रोजाना पानी और अंगूलियों के बीच की जगह पर खास ध्यान दें | अपने पैरों को अच्छी तरह से सूखाएँ | आरामदेह जुटे पहनें | ध्यान रखें कि जूते आपके पैरों को चोट न पहुंचाएं |

नए जूते पहनते वक्त निम्न बातों का ध्यान रखें :

  • नए जूतों में पैर धीरे- धीरे डालें |
  • पैरों की अंगूलियों के नाखून सीधे कटे हुए होने चाहिए |
  • पैरों की जरा सी भी चोट या परेशानी में डॉक्टर की सलाह अवश्य लें |
  • चोटों या खरोचों पर तेज एंटीसेप्टिक कभी न लगाएं |
  • नाखूनों या पैर की त्वचा के बेरंग होने को लापरवाही से न लें |
  • त्वचा व झिल्ली की दीर्घकालिक पयोजेनिक संक्रमणों के लिए डॉक्टर की सलाह लें |

आहार व पोषण

हम जो कुछ भी खाते हैं, उसके लिए ‘भोजन’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं | इस तरह,चीनी, अंडे, गाजर, रोटी, दूध, मक्खन सभी भोजन हैं | अधिकांश लोगों को कार्बोहाइड्रेट, चर्बी, प्रोटीन, खनिजों और विटामिनों के बारे में मालूम है | ये सभी ऐसे पोषक तत्व हैं जो हमारे शरीर में विभिन्न काम करते हैं | लेकिन पौष्टिक तत्वों और उनके लाभों के बारे में कोई नहीं सोचता | इन चीजों के बारे में जानकारी, हमें सही किस्म का और सही मात्रा में भोजन चुनने में सहायक होगी | इससे हम जीवन भर और विशेषकर वृद्धावस्था में तंदुरूस्त और चुस्त बने रहेंगे |

वृद्धावस्था कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक ऐसी शारीरिक प्रक्रिया है जिससे बचा नहीं जा सकता | अगर थोड़ी सी सावधानी बरती जाए, तो हम उम्र बढ़ने के कारण होने वाली असमर्थताओं से बच सकते हैं | उम्र बढ़ने के साथ, कुछ दीर्घकालिक बिमारियों मनुष्यों को प्रभावित करती है | इनमें से कई, जैसे मोटापा, उच्च रक्तचाप और डायबीटीज आहार से संबंधित हैं, अत: उन्हें आहार में बदलाव ला कर नियंत्रित किया जा सकता है | बल्कि, इस तरह उनसे बचा भी जा सकता है

वृद्धावस्था में आहार संबंधी आवश्यकताएं

  • ऊर्जा भोजन – कम हुई गतिविधियों तथा शरीर के चयापचयी तंत्र के कमजोर हो जाने के कारण, प्रौढ़ व वृद्ध लोगों की आहार आवश्यकताएं बहुत भिन्न होती हैं | इसलिए, बूढ़े होते जाने के साथ कम ऊर्जा और नतीजतन कम मात्रा में भोजन की जरूरत होती है | अत: चपाती, चावल, चीनी भी और तेल जैसे ऊर्जादायी भोजन की मात्रा कम कर देनी चाहिए |
  • विटामिन तथा खनिज – उम्र बढ़ने के साथ विटामिन तथा खनिजों की जरूरत बढ़ती जाती है | विटामिन ई तथा सी जैसे कुछ विटामिन वृद्ध होने की प्रक्रिया की रोकथाम करते हैं और हमें कैंसर, हृदय रोग तथा मोतियाबिंद से बचाते हैं | काफी मात्रा में फलों और सब्जियों के सेवन से हमें ये पौष्टिक तत्व मिल सकते हैं |
  • दांतों का स्वास्थ्य – दांतों के गिरने तथा दांतों संबंधी अन्य समस्याओं के कारण वृद्ध लोगो की चबाने की क्षमता कम हो जाती है | कभी – कभी तो चबाना बहुत कठिन हो जाता है | अत: तरलों, पका कर मुलायम किए या कुचले भोजन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए | पर संभव है की इस तरह के भोजन से पर्याप्त पौष्टिक तत्व न मिलें और संपुरीकों की जरूरत पड़े |
  • अन्य आम समस्याएँ – वृद्धावस्था में भोजन को पचाना तथा कब्ज आम शिकायतें होती हैं |
  • वृद्ध होते जाने के साथ खाने का आनंद  कम होता जाता है, क्योंकी हमारी स्वाद- कलिकाओं की संवेदनशीलता कम हो जाती है | इसलिए, विभिन्न तरह के खाद्य पदार्थों को भोजन में शामिल कर उसे अधिक आकर्षक और रूचिकर बनाया जा सलता है |

 

स्वस्थ भोजन के लिए कुछ सुझाव

  • सब्जी, दलिया, खिचड़ी इत्यादी मुलायम व अच्छे से चीजें ज्यादा आसानी से खाई जा सकती | कच्ची सब्जियाँ और फल कुचल या उबाल कर खाए जा सकते हैं |
  • जिन लोगों को अपच की शिकायत है, उन्हें तले, चर्बीदार, मसाले और अधिक मीठे भोजन से बचना चाहिए | बहुत अधिक खाने से भी परेशानी हो सकती है | अत: दिन में 3-4 बार थोड़ा – थोड़ा खाना चाहिए | दो खानों के बीच में थोड़े हल्के – फुल्के, लेकिन पौष्टिक अल्पाहार लेने से एसिडिटी और अम्लाशूल की समस्या कम हो सकती है |
  • साबुत दालों व अन्नों, सब्जियों व फलों जैसे रेशेदार चीजों को अपने भोजन का अंग बनाने से कब्ज दूर करने में मदद मिलेगी | दिन में कम से 6-10 गिलास पानी जरूर पीना चाहिए |
  • अंडे, लाल मांस तथा पशूओं की चर्बी ( जैसे घी ) से परहेज करना चाहिए, क्योंकि इनमें चर्बी और कोलेस्ट्रोल की मात्रा अधिक होती है | अधिक चर्बी वाले भोजन से डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, कोरोनरी धमनी रोग इत्यादि हो सकते हैं आहार में हल्के मांस, जैसे मछली व चिकन को शामिल करें |
  • हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए, वृद्धावस्था में कैल्सियम की अतिरिक्त मात्रा की जरूरत होती है | दूध और दूध की बनी दही व पनीर जैसी चीजों और हरी पत्तेदार सब्जियों में कैल्सियम पर्याप्त मात्रा में होता है |
  • परिवार/ मित्रों के साथ भोजन करने में शोजन का आनंद बढ़ता है | कोशिश करनी चाहिए की खाना बच्चों, पोते- नातियों, मित्रों व पड़ोसियों के साथ खाया जाए |

स्त्रोत: हेल्पेज इंडिया/ वोलंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया

अंतिम बार संशोधित : 2/21/2020



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