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योग

इस पृष्ठ में योग और उनके विभिन्न प्रकार बताये गए है।

परिचय

योग एक भारतीय परम्परा है। इसे किसी से सीखना चाहिए। इसमें शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के अनुशासन की ज़रूरत होती है। यहाँ हम योग के केवल शारीरिक पहलुओं पर ही बात करेंगे।

शुद्धिक्रियाएँ

इनमें शरीर के कुछ अंगों की सफाई की जाती है। नाक, फेफड़ों, पेट, खाने की नली, आँतों और मलद्धार में अगर कोई गन्दगी हो तो इससे ये अंग ठीक से काम नहीं करते और इससे बीमारियॉं भी हो जाती हैं। शुद्धिक्रियाओं से शरीर साफ हो जाता है। साथ ही इनसे शरीर योग के और फायदों के लिए तैयार भी हो जाता है। कुछ तरीके काफी आसानी से सीखे जा सकते हैं। जैसे जल नेती जिसमें नाक के रास्ते को गुनगुने पानी से साफ किया जाता है।

वमन क्रिया

योगमार्ग में शरीर के शुद्धी के लिये अनेक उपाय बतलाये गये है। इसमें एक वमन क्रिया है। ये सबसे आसान है और कोई भी सीख सकता है। इसके लिये सुबह उठकर नमक का पानी पीना होता है, लेकिन नमक का पानी गुनगुना हो । इसके लिये २-३ लीटर पानी तयार रखे। इसमे उतना ही नमक डाले की चखकर आसुओं जैसे लगे, ज्यादा ना हो या कम ना हो। कम या ज्यादा नमकीन होने से तकलीफ होगी। अब एक गिलास से यह पानी पीते रहिए। 1-2 लीटर तक पानी पी सकते है। यह पानी सिर्फ जठर में जाता है। चौथा, पॉंचवा या छठा ग्लास होने पर बिलकुल फुला सा लगता है और उल्टी करने का मन होता है ।

अब खड़े रहकर आगे झुककर या बैठकर आगे झुककर आप उल्टी कर सकते है। खड़े अवस्था में उल्टी करना ज्यादा अच्छा होता है। दो उंगलियों सें गले में स्पर्श करके आप उल्टी का प्रयोग कर सकते है। मुंह खुला रखे इसलिये पानी मुँह से बाहर आयेगा। चार पांच बार ऐसा कर सकते है। इससे पूरा पानी बाहर आ जायेगा। इसके साथ पेट में जो अशुद्धी है, या कुछ अपचय पदार्थ बचे है, या ज्यादा एसिड है वगैरे बाहर आ जायेगा। और आपका पेट यानि जठर बिलकुल शुद्ध हो जायेगा।

इसके कारण पेट में शुद्धी होती है, पाचन तंत्र अच्छा होता है और दिनभर शांती और तरोताजा लगता है। यह हप्ते में एक बार या महीने में एक-दो बार कर सकते है। हर दिन ये करने की जरुरत नही है।

आसन

किसी निश्चित समय के लिए किसी निश्चित स्थिति में रहना आसन कहलाता है। आसन में फैलाने वाली आइसोमैट्रिक आइसोटोनिक कसरतें सभी होती हैं और इससे शरीर में खून का बहाव और पेशियों के तालमेल और सहने की क्षमता में बढ़ोतरी होती है।

जलनेती

योगासन और योग क्रिया में शुद्धि क्रिया का बहुत महत्त्व है। जलनेती शुद्धिकरण का एक आसान तरीका है। यह मुख्यत: नाक और सायनस के सारे द्वार शुद्ध करने के लिये उपयुक्त होता है। इसके लिये गुनगुना पानी चाहिये, इसमें नमक इतना ही चाहिये की आसुओं जैसा लगे। अगर पानी ज्यादा ठंडा हो तो इसे दर्द होगा और ज्यादा गर्म हो तो भी दर्द होगा। पानी गुनगुना चाहिये की जिससे दर्द ना हो। अनुभव से आप ये समझ जायेंगे।

इसके लिये एक खास बर्तन मिलता है। ये बर्तन अगर आपके पास ना हो तो प्लास्टिक का मग का भी इस्तेमाल कर सकते है। अब इसके लिये बैठे या खडे रहे, आगे झुककर खडे रहिए। आप को अनुभव होगा की साँस चलते समय आप ध्याने दे तब आप को महसूस होगा की एक नथनी ज्यादा चलती है और दुसरी बंद है। जो नथनी खुली है, उसमें धीरे धीरे पानी अंदर डालना है।

अब मुँह खुला रखकर मुँह से ही साँस लेना छोडना चाहिये। मग या बर्तन का जो नोक होता है इससे आप नथुने में रखे और नाक में धीरे से पानी छोडे। इससे पानी नाक में आ जाता है। अब पानी दुसरी नथनी से बाहर आते दिखाएगा। इसका मतलब पानी एक नथनी से अंदर जाकर हमारा जो गले का अंतराल है वहॉं से गुजर के दुसरे तरफ से बाहर आ रहा है। इसके साथ नाक में जो गंदगी है वो सब निकलकर सायनस और युस्ट्रेशन ट्यूब के खिडकी को साफ सुथरा करता है।

यह जलनेती हमने एक तरफ से ले ली है और दुसरी तरफ से छोडी है। अब इसके विपरित प्रयोग करना है। अब दुसरी तरफ से पानी लेना है एक तरफ से छोडना है। दायें बाएं, बाएं दायें ऐसा आप 2-3 बार कर सकते है। इस प्रयोग के बाद ऐसा भी कर सकते है की, नथुनों से पानी लेकर आप मुँह से पानी निकाल सकते है या पानी पी सकते है। नेती के बाद खड़े हो जाएँ और झुक जाएँ, और हल्के से छींके। इससे नाक की गुफा और शिरानाल से पानी निकल जाएगा। अब 2-3 मिनट वज्रासन में सिर जमीनपर लगाकर बैठे रहिए। बाद में पीठ के बल लेटें और एक बूँद घी या गरी का तेल दोनों नथुनों में डालें।

जलनेती का बहुत अच्छा उपयोग होता है। जिनको श्वसन मार्ग की बीमारियाँ होती है जैसे की क्रोनिक सायनोसायटीस, हमेशा जुकाम होना आदि के लिये इसका बहुत उपयोग होता है। मेरे अनुभव में ये है की मेरा हरदम जुकाम होना जलनेती के कुछ अभ्यास के बाद बिलकुल रुक गया है। । इस प्रक्रिया से वायुविवर शोथ और नाक की गुफा के बैक्टीरिया से होने वाली छूत से बचाव हो जाता है। जिनको हमेशा सरदर्द होता है, उनको भी इसका अच्छा उपयोग है। आपको अनुभव होगा की इससे सरदर्द की तकलीफ हमेशा के लिये चली जायेगी। लेकिन जब आदमी खुद बीमार है, सायनोसायटीस है या जुकाम है उस समय ये नही करना चाहिये।

इसका अभ्यास करना चाहिये और करते रहना चाहिये ता की इसको ज्यादा रोकथाम की भूमिका है। उसी दिन की बीमारी ठीक करने के लिये इसका प्रयोग ना करे। ये एक बेहद उपयुक्त तरीका है और आपको दिनभर तरोताजा रखने में इसका उपयोग हो सकता है।

मुद्राएँ

मुद्राएँ चेहरे की कसरतें होती हैं। जैसे सिंह मुद्रा है, चेहरे के पेशियों स्वस्थ बनता है।

बंध

ये पेशियों को कसने वाली कसरतें होती हैं। इससे पेशियों को तानने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए मूल बॅंध से श्रोणी की पेशियाँ तन जाती हैं। वैसे ही जालंधर बंध से गले की पेशियाँ तन जाता है।

अन्दरूनी अंगों के लिये

अन्दर के अंगों की कसरतें भी योग द्वारा की जा सकती हैं। इससे खून के संचरण में सुधार होता है अन्दरूनी अंग विशेष कार्यान्वित किए जाते हैं। उदि्दयन और भस्त्रिका आँतों और फेफड़ों की कसरत के लिए अच्छे हैं। और वज्रआसन श्रेणी के अंगों के लिए। एक अच्छे शिक्षक से योग सीख पाना ज़्यादा मुश्किल नहीं होता है। ज़्यादातर भारतीय भाषाओं में योग पर अच्छी किताबें भी उपलब्ध हैं। अब योग देश विदेश में काफी लोकप्रिय हो चुका है।

स्त्रोत: भारत स्वास्थ्य

 

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