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स्थानीय वनौषधियाँ और हमारा स्वास्थ्य

इस भाग में प्राकृतिक चिकित्सा के अंतर्गत स्थानीय वनौषधियों और हमारे स्वास्थ्य लाभ में इनकी महत्ता को स्पष्ट किया गया है।

रोगों की पहचान,उपचार और सावधानियाँ

1.ल्यूकेरिया (सफ़ेद पानी आना/ श्वेत प्रदर) (Leucorrhoea)

पहचान:

  • कमर में दर्द
  • पेट
  • आरम्भ में श्वेत पानी बाद दही जैसा गाढा स्त्राव
  • बदबूदार व पीव जैसा स्त्राव
  • कभी- कभी योनी मार्ग से हरा, पीला रक्त मिश्रित स्त्राव
  • कभी कभी स्त्राव के साथ जलन
  • कमजोरी का अनुभव होना

उपचार:

  1. घृतकुमारी / घीकुंवर ( aloe-barbadenis) गुड़ या मिसरी के साथ खाली पेट लें ।

खुराक: 1 चम्मच 5-10 दिनों के लिए, यदि स्थिति में सुधार न हो तो इसे जारी रखें।एक सप्ताह या दस दिन के अन्तराल पर, यह उपचार 1-2 माह तक जारी रख सकते हैं आवश्यकतानुसार ।

  1. अड़हुल( hibicus rosasinensis- shoe flower ) का टॉनिक लें ( विधि देखें स्वास्थवर्धक टॉनिक)
  2. अशोक( saraca- indica- ashoka-tree) का 60 ग्राम छाल को 1 लीटर पानी में उबाल कर 250 मिलीलीटर तक कर लें।

खुराक: चार बार 1-2 चम्मच प्रतिदिन लें, 1-2 माह तक।

  1. सेमल (Bomabax-malabaricum- Silk cotton) की छाल- 200 ग्राम, पलाश (Butena fondosa – palas) का छाल- 200 ग्राम, शतावरी (Asparagus recemosus) की जड़ ( मूलकंद) -200 ग्राम, सभी को बराबर मात्र में लेकर कूट- पिसकर छान कर चूर्ण को कांच की शीशी में भरकर रख लें।इस चूर्ण को 1-2 चम्मच ठण्डे पानी या चावल के पानी, या मांड (ठण्डा) के साथ 15-20 दिन तक सुबह –शाम लें।
  2. शतावर (Asparagus Racemosus) की ताज़ी कंदमूल या सूखी जड़ो का चूर्ण 5-10 ग्राम स्वादानुसार जीरे के चूर्ण के साथ 1 कप ढूध में सुबह खाली पेट में पिलाने से कमजोरी औ तनाव से होने वाली श्वेत वाली प्रदर 2-3 सप्ताह में ठीक हो जाती है ।
  3. ब्राम्ही, बेंग साग (Centella asiatica) का चूर्ण दो छोटी चम्मच या उसका स्वरस 1-2 चाये की चम्मच दिन में दो बार मिसरी के साथ 15 -20 दिन तक दें।
  4. अरहर(Canjanus cajan) के पत्तों का स्वरस ( बिना पानी मिलाये ) एक चम्मच दिन में दो बार 12-15 दिन तक दें।अथवा अरहर का जूस, सेंधा नमक में मिलकर दिन में एक बार 30 दिनों तक दें।

नोट: धृतकुमारी के गुच्छे का प्रयोग करने से पूर्व इसके काँटों को साफ कर लें, ये ज़हरीला है ।

तेल, खटाई, मसाला, टमाटर, गर्मी पैदा करने वाला भोजन व कब्ज जनित खाध पदार्थों का सेवन न करें।

2. कष्टदायक मासिक स्त्राव (Dysmenrrhoea)

पहचान:

  • मासिक स्त्राव के पूर्व और बाद में दर्द
  • कमर, पेडू पर दर्द

उपचार

  1. अड़हुल फूल का टॉनिक ( विधि देखें-स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक )
  2. मालकांगनी या कुजुरी (Celastrus paniculata) के कोमल पत्तों को साग की तरह काटकर सरसों साग में पका लें। 1 चाय चम्मच की मात्रा दिन में दो बार 15-20 दिनों तक दें।
  3. 4 चम्मच पीसा हुआ दूब घास(Cynodon dactylon) एक गिलास पानी में, एक चम्मच अरवा चावल के आटे और मिसरी के साथ शर्बत जैसा घोलकर दिन में 1 बार 12-15 दिनों तक दें ।
  4. हडजोरा (Vitis quadranaularis) के तने का चूर्ण आधा चम्मच एक चम्मच मधु या गुड़ के साथ दिन में एक बार 12-15 दिनों तक दें।
  5. गर्म और ठंडे पानी की सेंक - तौलिए को गर्म पानी मे में डुबो कर कटिप्रदेश में सेंक दें फिर ठंडे पानी में डुबो कर पुनः लपेटें।यह प्रक्रिया गर्म-ठंडी पानी की अदल-बदल करनी होगी।
  6. त्रिफला के चूर्ण में हर्रा (Terminalia chebula), बहेड़ा (Terminalia belerica) और आंवला ( phyllanthus embilica) के फलों का चूर्ण बराबर मात्र में मिलाया जाता है। एक–चौथाई अकवन (Calotropis gigantea) चूर्ण मिला दें।इस चूर्ण को दिन में दो बार, एक-एक चुटकी थोडा मधु या पुराने गुड़ के साथ दें।

नोट: इलाज के दौरान मांस, मछली, अंडे, गर्म मसाला, लाल मिर्च, इमली, कच्चे आम की खटाई, चटनी, अचार से परहेज़ करें।इसका इलाज मासिक धर्म शुरू होने के कुछ दिन पूर्व प्रारम्भ करें ।

3. अर्श बबासीर (Piles, Hemorrhois)

पहचान:

  • गुदा नली के चर्म और श्लेष्म झिल्ली के ठीक नीचे नसों की वृधि*.
  • गुदा मार्ग मार्ग पर सूजन
  • मल के साथ रक्त का बाहर आना
  • इलाज की कमी से रक्त अल्पता का होना

उपचार:

  1. कटी* स्नान लें।20 मिनट के लिए सुशुम पानी में जिसमें नीम की पत्तिओं और हल्दी को उबाला गया हो।पानी में बैठने के पहले थोड़ी-सी नमक पानी में डाल लें ।
  2. घृतकुमारी(Aloe-barbadenis) के गुच्छेदार पत्ते को एक चामच की मात्र में गुड़ (पुराना) के साथ सुबह खाली पेट में लें।
  3. लाल चन्दन की लड़की और लाजवन्ति (विधि देखें)(Mimosa pudica) का पेस्ट प्रभावित हिस्से में लगाएँ।( उपर दिए गए उपयोग को कम से कम 7 दिन तक करें)
  4. बड़ी चकोड़ (Cassia fistula) के सात पत्ते, पांच गोलमिर्च के साथ शर्बत बनाकर शुबहा-शाम 1-15 तक दें।
  5. यदि बबासीर आरम्भिक दिनों में हो तो इमली की पत्तियों को चबाना काफी है और इसके रस को निगल जाएँ, सुबह खाली पेट, कुछ दिनों तक ।

नोट: बवासीर से पीड़ित व्यक्ति कब्जियत से बचने के लिए पानी जयादा मात्र में पीयें।चिकेन और अंडा बवासीर को गंभीर बना देता है ।

4. सूखा रोग

पहचान

  • पेट बहार की ओर निकल आता है
  • शारीर सूखने लगता है
  • बच्चा अकारण रोता है
  • कमर पतला होता जाता है
  • पतला दस्त आना
  • नितम्ब सुखना तथा चर्म में झुरियाँ पड़ जाती है
  • बेचैनी और चिडचिडापन

उपचार : ( अंडा चढ़ाना)

कम्बल के टुकडे पर देशी मुर्गी का ताज़ा अंडा फोड़कर रख दें। पीड़ित बालक को नंगा कर उसपर बिठा दें।गुदा में छिद्र से अंडा द्रव्य बड़े वेग से बालक के अन्दर खिंच जायेगा।जब तक बालक पूर्ण स्वस्थ न हो तब तक प्रतिदिन 1 अंडा इसी विधि से चढ़ाते रहें।लगभग 1 मास में सूखा रोग अच्छा हो जाता है।रोग मुक्त होने पर बालक के गुदा मार्ग से अंडा चढ़ाना स्वयं बंद हो जाता है।यह विधि रोग के उपचार के साथ –साथ उसके परीक्षण की विधि भी है ।

नोट : बालक को स्वच्छ वायु और सूर्य की धुप का सेवन करना चाहिए।ढूध, अंडा, मांस, फलों का रस पिलाने से सूखा रोग से बचा जा सकता है ।

6. दमा (Asthma)

पहचान:

  • समय-समय पर श्वास की घुटन
  • हाँफनी और बेचैनी
  • कभी कभी लगातार खाँसी
  • श्वास लेने पर छाती में बार-बार की आवाज़
  • तीव्र दौरा पडने पर रोगी बेहोश भी हो सकता है

उपचार :

  1. आडूसा(Adhatoda vasica) का पत्ता व डंठल 1 किलो, कंटकारी * या रेंगनी (Solanum xanthocarpum) 250 ग्राम के छोटे-छोटे टुकड़े करके एक भगोने में 8 गुने पानी के साथ धीमे आँच पर रख दें।जब एक-चौथाई मात्रा शेष रह जाए तब भगोने को आँच से उतार कर काढ़ा को छान कर रख दें। छानने के बाद यदि गुड़ मिलाना हो तो गुड़ मिलाकर पुनः गर्म करें जिसस गुड़ अच्छी तरह घुल जाए।अगर गुड़ के स्थान पर शहद मिलाएँ।( दी गयी मात्र में – गुड़ या शहद 300 ग्राम) अगर चाहे तो उसमें किशमिश, छुहारा डालकर इस्तेमाल करें।

खुराक : 1-2 चाय चम्मच सुबह-शाम लें।इस औषधि के सेवन के बाद कम से कम 1 घंटा कुछ न खाएँ।

  1. पूर्णमासी में खीर बनाकर दमा रोग में प्रयोग करने की बात भी की जाती है।कह जाता है धुल के एलर्जी ये में ये दवा लाभदायक है।अर्जुन (Terminalia) के तने की छाल लेकर उसका चूर्ण बना लें।

पूर्णिमा की शाम को 50-100 ग्राम गाय के ढूध से खीर बनाएँ, इसमें मेवा भी स्वादानुसार डाल सकते हैं।खीर को रात भर ऐसी जगह पर रखें जहाँ रात भर चाँदनी पड़ती हो।बिल्ली, कुते से बचाएँ।सुबह सूर्योदय के पूर्व उसमें 1 चम्मच अर्जुन का चूर्ण मिला कर पूरी खीर रख लें ।

नोट : 10 या 11 बजे दौरा पड़ सकता है लेकिन घबराएँ नहीं। यदि एक बार में रोग पूरी तरह अच्छा नहीं हुआ तो दूसरी पूर्णमासी को दुहराएँ।

सावधानी : तम्बाकू, शराब, तेल, खटाई से परहेज करें।कब्ज और अपच से बचें। दमा के मरीज को शांत और चिंता मुक्त रखने की कोशिश करनी चाहिए।रोजाना योगाभ्यास लाभदायक होगा।सोने के पूर्व कोशिश करें पेट खाली हो इस कारण रात्रि-भोजन हो सके तो जल्द करें ।

7 . तपेदिक (Tuberculosis) (फेफेड़े का)

पहचान :

(आरम्भिक दिनों में)

  • लगातार खाँसी
  • इल्का बुखार दोपहर में और रात्रि में बेचैनी
  • छाती में या उपरी हिस्से में दर्द
  • वजन में गिरावट
  • कमजोरी का बढ़ना

(बाद के दिनों में)

  • खांसी का दौरा
  • निस्तेज चेहरा
  • आवाज़ में कर्कशता

उपचार :

  1. अंडे और नींबू का टॉनिक ( देखें-स्वाथ्यवर्धक टॉनिक)
  2. कटहल का टॉनिक ( देखें- स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक)
  3. आडूसा के पत्ते व टहनिओं (1 किलो) को छोटे- छोटे टुकडे कर अच्छी तरह साफ कर 16 लीटर पानी में उबालें, जब पानी 1 लीटर रह जाये तो उसे उतार कर छान लें।इस छने हुए काढे में 1 किलो चीनी या गुड़ मिलाकर उसकी चाशनी बनायें, पुनः चाशनी में 125 ग्राम घी डालें।जब वह गाढ़ा हो जाये तो उसमें छोटी पीपल का 125 ग्राम चूर्ण मिलाकर किसी साफ शीशे के बोतल में रखें।इसे टी वी के अलावा खाँसी, सांस की तकलीफ में भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

खुराक: बच्चे – 1 चम्मच दिन में दो बार

वयस्क- 2 चम्मच दिन में 3 बार

इसका सेवन गर्म ढूध यार गुनगुने पानी से करना चाहिये

  1. एक अंडे (देशी मुर्गी) को 3/4 ढूध के गिलास में अच्छी तरह फेटें और 2 चम्मच दालचीनी (Cinnamon cassia) का काढ़ा मीलायें।(दालचीनी का काढ़ा बनाने लिए 250 ग्राम दालचीनी की छाल को 3 लीटर पानी में उबालें जब तक 1 लीटर न हो जाए, तब उसमें चुटकी भर नमक डाल कर बोतल में रख लें)
  2. 3 बूंदें मालकांगनी या कुजरी (Celastrus paniculata) तेल को देशी मुर्गी के अंडे की सफेदी में मिलाकर सुबह खाली पेट 48 दिनों तक लें।
  3. इसके साथ सकती वर्धन हेतु नींबू-अंडा टॉनिक या कटहल टॉनिक भी लें (देखें स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक)

यक्ष्मा( टी. वी.) में शक्ति के लिए:

  1. रात्रि में साफ़ सूखा महुआ (Maduka indica) फूल मुट्ठी भर लेकर 1 गिलास पानी में भिगो लें, सुबह उस पानी को दें फिर पुनः उसी महुए में पानी भर कर शाम में पीने को दें।प्रतिदिन रात्रि में महुआ फूल बदल दें।

खुराक: 1-1 गिलास सुबह – शाम 2 माह तक।

  1. ताजा महुआ फूल लेकर बोइयाम में भरें और 1 बड़ा चम्मच चीनी डाल कर 30 दिन धुप दिखाएँ ।

खुराक: 2 चाय चम्मच 2-3 बार 2 माह तक।

सूखा साफ़ महुआ का फूल बोइयाम में भर दें। उसमें आधा पानी और मुट्टी भर चीनी डाल दें और 1 महा धुप दिखाएँ।रस निचोड़कर छान लें, रस जितना पुराना होगा उतना ही फायदेमंद होगा ।

खुराक: 1 /2 कप सुबह-शाम, 1 वर्ष के बाद दिन में केवल एक बार ही दें ।

नोट: उपर दिए गये उपायों को शक्ति में बढोतरी के लिए देना आवश्यक है चूँकि इस बीमारी में व्यक्ति बहुत कमजोर हो जाता है ।

टी. वी. के रोगी को अधिक उर्जा प्रोटीन तथा विटामिनयुक्त भोजन की आवश्यकता होती है। रोगी के लिए सूखा सरला (कटई) साग, पेचकी साग छोटा चाकोड (cassia tora) देना लाभप्रद है।खपरा साग (Boerhavia diffusa) और गोलगोला साग देना चाहिए, इसमें लौह मात्र अधिक रहता है, यह रक्त को बढाता है।चराइगोडवा (Vitex peduncularis) के पत्तो या छालों का चाय भी रक्त में वृधि और साफ करता है।इसके अलावा मांस, मछली, अंडा, कबूतर और मुर्गे का मांस देना चाहिए ।

परहेज : सूअर, भेड़ी मांस, चिंगड़ी मछली, आम, इमली तथा इनसे बनी चटनी, लाल मिर्च अधिक घी, तेल, चर्बी, गरम मसाला न लें।शराब से पूर्णतया परहेज करना है अन्यथा दवा विष का रूप ले सकता है ।

8. रक्तचाप(Blood pressure)

निम्न रक्तचाप ( Low Blood Pressure)

पहचान :

  • कमजोरी लगना
  • चक्कर आना
  • आँखों के सामने अंधकार छा जाना
  • यदा-कदा गर्दन में दर्द इत्यादि

उपचार:

  1. चराइगोडवा (Vitex peduncularis) की पतों की चाय 1 कप दिने में दो ( सुबह-शाम) दें 10-12 दिनों तक।
  2. रात्रि में सोने से पूर्व एक अंडा और दूध लें
  3. पुननर्वा या खपरा साग (Boerhavia diffusa) का सूप दिन में दो बार लें 10-12 दिनों तक।

9 . उच्च रक्त चाप (High blood pressure)

पहचान :

  • सिर दर्द, सिर में भारीपन का अनुभव होना
  • ह्रदय धड़कना
  • थकावट
  • यदा-कदा कंधे की बांय ओर छाती में दर्द
  • सांस लेने के लिए प्रयास करना

उपचार :

  1. सहिजन/ मुनगा (Moringa oleifera) के पीले या पके पत्तो का रस गुड़ के साथ पाक बना कर रखें।सुबह खाली पेट में 1-1 चम्मच सात दिनों तक लें

अथवा

  1. सहिजन के पके पत्तो का स्वरस 1 चम्मच सुबह और 1 चम्मच शाम को दें जब तक रक्त चाप सामान्य न हो जाए।

अथवा

  1. सहिजन के पत्तों का सूप तैयार ( मुट्टी भर पत्ती) दिन में दो बार लें।
  2. छोटी करेली(Momordica charantia) को मसलकर 1 गिलास पानी में भिगोकर रखें, सुबह खाली पेट पानी को पीयें ।
  3. लहसुन के कुछ जवा (Clove) को मधु रस में 40 दिनों तक रखें।सुबह खाली पेट में 2 जवा खाएं ।
  4. 250 ग्राम लहसुन और 250 ग्राम अदरक को छोटे-छोटे टुकडे में काट लें।इसे 1 किलो पुराने गुड़ में पाक तैयार कर लें और शीशे के साफ़ बोइयाम में रखकर 21 दिनों तक रखें ।

खुराक: 1 चम्मच सुबह-शाम लें।इसके साथ करेला (Momordica charantia) या नीम ( Azadirachta indica) या ( Andrographis paniculata) का जूस लें।

नोट: दवाओं के प्रयोग के साथ मानसिक तथा शारीरिक क्रियाकलापों में नियंत्रण रखना भी आवश्यक है।चिंता और घबराहट से बचें, उच्च रक्त चाप में नमक की मात्रा कम करें।ज्यादा चर्बी वाले भोजन, मिठाई* ,स्टार्च या मांडी युक्त भोजन से बचें।नियमित व्यायाम करने से स्तिथि में सुधर किया जा सकता है ।

10 . पीलिया (Jaundice) :

पहचान :

  • आँखों का पीलापन व निस्तेज हो जाना
  • बुखार आना, उलटी आना
  • भोजन से महक आना जिससे उलटी हो सकती है
  • पेशाब में पीलापन
  • कभी-कभी नाभि के ऊपरी भाग, दहिनी ओर दर्द होना
  • कब्ज की शिकयात रहती है

उपचार

  1. भुई आंवला (Phyllanthus niruri) का टॉनिक (देखें–स्वास्थवर्धक टॉनिक)
  2. भुई आंवला (Phyllanthus niruri) के पंचांग को अच्छी तरह साफ कर उसमें मिसरी और स्वादानुसार जीरा मिलाकर पीस कर सुबह पिएं, 5-7 दिनों तक।
  3. ब्राम्ही(Centella asiatica) का पंचांग और मिसरी मिलाकर सुबह शाम लें 1 गिलास 5 – 7 दिनों तक।
  4. एरण्डी (Ricinus communis) के कोमल पत्तों का जूस मिसरी के साथ सुबह खाली पेट 1 कप लें 5-7 दिनों तक।
  5. करहैनी चावल का माड़ी (हंडिया) में 1 गिलास पानी डाल दें।1 घंटा बाद पानी को निकल दें, इसे रोगी को न दें।इसके बाद 1 गिलास पानी डालें।पुनः 1 घंटा के बाद इसे छानकर रोगी को पिलावें।दिन में 3 बार सुबह-दोपहर-शाम के खाने के आधा घंटा पहले रोगी को 5 –7 दिनों तक दें।साधारणतया 3 दिनों के अंतर पर बनाया हुआ 1 -1 किलो चावल का मांडी (हंडिया) 1 कोर्स के लिए काफी होता है
  6. मेहंदी का पत्ता और भुई आंवला बराबर मात्रा में लें और अनार फल के छिलके को दो गिलास पानी में उबालें जब तक ये 1 गिलास न हो जाए।

मात्रा : 1 गिलास दिन में एक बार, खाली पेट सुबह में लें 3 दिनों तक।

नोट : दवाएँ लेने के दौरान नमक से परहेज करें।चर्बी वाले भोज्य पदार्थ तेल कम से कम 2 माह तक सेवन न करें।गन्ने का रस, फलों का रस, ग्लूकोस, दही, मरीज़ खा सकता है।ताज़ी-हरी साग-सब्जी उबाल कर रोगी को दें।

11. मलेरिया( Maleria)

पहचान:

  • जाडा देकर बुखार होना
  • सिर-दर्द
  • ज्वर पसीना के साथ उतरता है
  • कमजोरी
  • अन्तराल देकर बुखार

उपचार:

  1. 1. मीठा घांस (Scoparia dulcis) का पंचाडग*,पाठा (Cissampelos pareira) की जड़ और चिरचिटी( Achyranthes aspera) की जड़ बराबर मात्रा में पीसकर पानी में घोलें।

खुराक : आधा-आधा कप दिन में 3 बार, 10-12 दिनों तक दें।

  1. 2. चिरईता (Andrographis paniculata) का पंचाडग*पानी के साथ पीसकर काढ़ा आधा कप दिन में 2 बार दें, 10-12 दिनों तक।
  2. 3. चराइगोडवा या सिमकारा (Vitex peduncularis) के पतों या छाल का काढ़ा 1 कप दिन में 2 बार 10 -12 दिनों तक दें।
  3. भुइनीम/ कालमेघ (Andrographis paniculata) 30-35 ग्राम 1 गिलास पानी में उबालकर 1 / 2 करें।

खुराक ; 1 कप दिन में 2 बार 1 माह तक दें।1 कप दिन में 1 बार, दुसरे माह में और 1 दिन अन्तराल पर 1 कप तीसरे सप्ताह में दें ।

  1. सिन्दुआर / निर्गुण्डी (Vitex negundo) 100 ग्राम, काली मिर्च 10 ग्राम, गुड़-100 ग्राम सभी को आधे लीटर पानी में उबालें जब तक कि वह एक चौथाई न हो जाए।खुराक : 1 कप दिन में दो बार ।
  2. नीम (Azadirachta indica) के पत्ते और छाल मलेरिया के लिए बहुत प्रभावी है ये स्वरस और काढ़ा दोनों रूप में ले सकतें है।

खुराक: स्वरस-1 चम्मच तथा काढ़ा–1 कप दिन में 3 बार, उसे 5 दिनों तक लें।

दीर्घकालीन मलेरिया (Choronic maleria)

  1. 1. एक चम्मच काली मिर्च को 2 गिलास पानी में डालकर उबालें जब तक की ये आधी न हो जाए।तैयार हनी के बाद 12 घंटे छोड़ दें (शाम में तैयार कर रात भर रहने दें) , सुबह इसे छानकर पीयें।दूसरी खुराक सुबह में तैयार करें और शाम में लें।केवल 2 खुराक ही लें।इस खुराक को लेने पर कभी-कभी रोगी थकान और कमजोरी का अनुभव करता है।लेकिन ये कुछ समय बाद सही हो जाता है।कमजोरी के लिए दूध ले सकते हैं।लेकिन अल्सर और पेप्टिक के रोगी इस काढ़ा को नहीं ले सकते हैं।

नोट: यदि रोग की चिकित्सा शीघ्र नहीं की गई तो रोगी रक्त की अल्पता, यकृत्–वृधि आदि रोगों का शिकार हो जाता है।मलेरिया रोग के कारण यदि प्लीहा की वृधि हो गई हो तो चिरचिटी( Achyranthes aspera) की जड़ पीसकर मटर के बराबर गोली पिप्पली (Piper longum) के फल के साथ दिन में 2 बार 7-10 दिनों तक दें।

रोकथाम हेतु चराइगोडवा का चाय की तरह साल लें तो उत्तम है।उच्च तथा निम्न रक्त चाप की रोकथाम के साथ कैंसर की भी दवा हो सकती है

12 . सनिपत ज्वर/ टाइफाइड (Typhoid)

पहचान:

  • ठण्ड और फ्लू से प्रारंभ
  • 3-4 दिन के बाद सिरदर्द, शिथिलता, बेचैनी, नींद न आना और बुखार
  • पेट के निचले भाग में दबाने से दर्द
  • कभी–कभी रोगी को उल्टी, डायरिया या कब्ब्ज़ की भी सिकायत होती है

उपचार :

  1. चनाको भुन कर चूर्ण तैयार करें, इसी बराबर मात्रा में बारली (ज्वार चूर्ण) और बाजरा का चूर्ण लें, सभी को मिला लें और 1 चम्मच लें मधु या गुड़ के साथ।

खुराक: 1 चम्मच दिन में 3 बार

  1. बबूल वृक्ष(Acacia arabica) के छाल (60 ग्राम) को 2 गिलास पानी में तब तक उबालें जब तक आधी ना हो जाए।

खुराक: 1 कप, 3 गोलमिर्च के पाउडर के साथ दिन में 3 बार भोजन से पहले, 3 दिन तक ।

  1. मीठा घांस(Scoparia dulcis) का पंचाडग, 9 गोलमिर्च, पीपल(Ficus Religiosa) के सात पत्ते, बांस(Bambusa spp) के पत्ते और मिसरी मिलाकर काढ़ा बनाएँ ।

खुराक: 2 चाय चम्मच सुबह शाम

  1. अमरुद (Psidium guyava) सात फूल मसलें और इसे 1 कप बकरी के दूध (बिना उबाले) में मिलाकर खाली पेट में तीन बार दें। (केवल 3 खुराक देनी है।)

शरीर पर मलें :

  1. पुराना डोरी( Bassia latifolia) का तेल लगाने के बाद शारीर पर डोरी और एरण्डी का तेल मिलाकर मलें।
  2. मधु रस और कागजी नींबू का रस मिलाकर खोपड़ी के नरम हिस्से पर लगाएं।
  3. गाय का घी और मधु रस मिलाकर नाभि में लगाएं।

नोट : टाइफाइड का सही इलाज नहीं होने से अधिक दिन होने पर व्रण हो जा सकता है। यह बढने पर छेद में बदल जा सकता है।तथा रोगी को खतरा बढ़ जाता है।खाने में गीला चावल, साबूदाना, पोरिज दें।आहार के लिए चिकित्सक से परामर्श आवश्यक है।चूँकि इस बुखार में जटिलता के आने की सम्भावना हमेशा बनी रहती है ।

13. मधुमेह (Diabetes)

पहचान

  • अधिक प्यास लगना/ मुहं सूखना
  • बार-बार पेशाब करना
  • पेशाब में चीनी आना
  • कमजोरी / थकावट
  • अधिक भूख
  • अधिक नींद लगना
  • अधिक पसीना आना
  • वजन में कमी दृष्टि में बाधा इत्यादि

उपचार:

( क ) बहुमूत्र (Excessive urination)

  1. इमली(Tamarindus indica) के बीजों को पानी में भिंगा कर उपर का छिलका निकल लें।पुनः उसे सूखा कर चूर्ण बना लें।

खुराक: 2-2 छोटी चाय की चम्मच लें ठन्डे दूध के साथ 10-15 दिन

  1. हर्रा (Terminalia chebula) के फल के उपरी छिलका का काढ़ा 8 गुणा पानी में तब तक तैयार करें जब तक की चौथाई न हो जाए।फिर छान कर पकाए जब तक गोली बनाने लायक न हो जाए।

खुराक: 2-2 गोली दिन में 3 बार 7 -10 दिनों तक दें।

  1. पोस्ता दाना 20 ग्राम पीसकर और पुराना गुड़ 20 ग्राम मिलाकर मटर के बराबर गोली बना लें।खुराक: 2-2 गोली दिन में 2 बार 7-10 दिनों तक दें।
  2. आधा गिलास सहिजन (Moringa Oleifera) के पत्ते का जूस में थोडा सा नमक मिलाकर 1 चम्मच दें थोड़ी देर के अन्तराल में नियमित रूप से।
  3. मेथी 30 ग्राम, गोल मिर्च 20 ग्राम, मिसरी 40 ग्राम 1 कप दूध के साथ दें ।

( ख) मधुमेह ( Diabetes ) के लिए

  1. सदाबहार (सफ़ेद फूल वाला) (Catharanthus roseus) के पौधे की जड़ से उपरी भाग को छोटे-छोटे टुकडे कर 6 गुणा पानी में उबाल कर एक चौथाई कर लें।उसमें 3 गोल-मिर्च पीसकर मिला दें।

खुराक: 2 चाय चम्मच दिन में 2 बार ( सुबह – शाम ) 30 दिनों तक दें।

  1. लाजवन्ती (Mimosapudica) का पंचांग लेकर छोटे टुकडे करें।लगभग मुट्टी भर लेकर 200 ग्राम चावल के साथ पकाएं।पकने पर माड पसा कर सुबह शाम 1 -1 गिलास गर्म पानी को दें।

खुराक: 1 गिलास दिन में 2 बार सुबह शाम पीने दें 20 – 25 दिनों तक।

  1. 1 चम्मच मीठा घांस(Scoparia dulcis) का पंचांग पीसकर मधु या मिसरी (आधा चम्मच) मिलाकर दें।

खुराक: सुबह शाम 30 दिनों तक दें।(रक्त शर्करा के लिए भी)

  1. हडजोरा/ गुरुच (Tinospora cordifolia) का लता का रस और पत्थरचूर(Bryophyllum Pinnatum) के पत्ते का रस बराबर मात्रा में मिलाएं।

खुराक: 2 चाय चम्मच, सुबह-शाम, 30 दिनों तक पानी के साथ दें।

  1. कठ जामुन (Enginia operculata) या जामुन (Enginia Jambolana) फल का बीज सुखाकर पीसकर चूर्ण आधा चम्मच और मधु या पुराना गुड़ आधा चम्मच मिलाकर दें।

खुराक: चम्मच (चाय) सुबह शाम दें 30 दिनों तक।

  1. सदाबहार (सफ़ेद फूल वाला) का फूल 5 -9 प्रतिदिन सुबह शाम खाएँ /अथवा/ पुननर्वा के 1-10 पत्ते सुबह प्रतिदिन लें।

नोट: मधुमेह में आहार अहम् भूमिका निभाता है।अगर रोगी बहुमूत्र से पीड़ित है तो उसका निदान आवश्यक है।कार्बोहाइड्रेट वाले अनाज चावल, गेहू, दाल कम मात्रा में लें। सांद्र मिठाईयां, आलू, सकरकंद न लें।चाय कॉफ़ी सूप बिना मीठा किए ले सकते हैं।मांस, मछली, और अंडा खाया जा सकता है।नियमित व्यायाम में ध्यान देना आवयश्क है ।

14. पथरी (Stone)

पहचान:

  • मध्य रात्रि में पीठ में अचानक दर्द शुरू होकर
  • नीचे की ओर बढ़ता है
  • कभी-कभी यह दर्द जांघों या अंडकोष या भग तक चली जाती है
  • कभी-कभी मूत्र के साथ रक्त का आना

उपचार:

  1. कुल्थी क्व्स्पबिवे * के दाने के वजन का बारह गुणा पानी में उबाल लें।जब पानी एक चौथाई हो जाये तो उतार लें।खाने में वही उबाला हुआ कुल्थी रोटी और दाल पका कर खाने को दें।खुराक : 1-1 कप सुबह शाम 18-20 दिनों तक दें।
  2. पत्थरचूर(Bryophyllum Pinnatum) पत्तो का रस निचोड़े कर 1/2 कप या 1 कप लें।उसमें 3 गोलमिर्च पीसकर मिला दें ।

खुराक : 1 या 1 / 2 कप दिन में दो बार 15- 20 दिनों तक दें

  1. मीठा घांस () का जूस दूध के साथ सूर्योदय के पहले दें।पानी अत्यधिक पीयें।
  2. सहिजन (Moringa Oleifera) का 60 ग्राम जड़ व छाल का काढ़ा तैयार करें उसमें चुटकी भर नमक और हिंग (Asafoetida) मीलायें।

खुराक : 1 कप दिन में एक बार ।

  1. सिंगा किस्म के मछली के सिर में छोटी–छोटी पत्थर पायी जाती है।उस पत्थर को पीसकर नींबू से स्वरस में लेने से गुर्दे की पथरी टूट कर निकल जाती है

खुराक: सुबह –शाम 5 दिनों तक लें ।

नोट: ओकजालेट पथरी होने पर रोगी को टमाटर, अदरक, इमली, मूली, प्याज, यूरिक, सलाद, गेहूँ, पेचकी, कंदमूल, आलू से परहेज करना होगा।यूरिक एसिड पथरी में रोगी को चाय कॉफ़ी, दाल, कलेजी, मांस, गुर्दा, अदि नहीं खानी चाहिए।अगर मिश्रित पथरी हो अथवा निश्चित नहीं हो की कौन से पथरी है तो उपर दिए गए दोनों प्रकार के खाद्य पदार्थो से परहेज़ करें।छोटानागपुर के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पथरी से बचने के लिए कुल्थी दाल और बत्तख का मांस खाने का प्रचालन है ।

15 कैंसर (Cancer)

पहचान:

  • त्वचा कैंसर में छोटे- छोटे घाव, मस्सा के आकार में परिवर्तन ।
  • गले के कैंसर में निगलने, श्वास लेने में कठिनाई।
  • जबड़े तथा तालू के कैंसर में लार में रक्त, गांठ, व्रण, या सफ़ेद दाग, मुहं से बदबू बातचीत करने में कठिनाई ।
  • फेफड़े का कैंसर में सीने में दर्द, कभी-कभी खांसी में अचानक वृधि, बलगम के साथ या बलगम रहित खांसी।
  • गर्भाशय कैंसर में मसिक स्त्राव चक्र के बीच रक्तस्त्राव , अत्यधिक स्त्राव और अनियमित स्त्राव , शारीर का सुस्त होना , कमर और घुटनों का दर्द ,चेहरे और गर्दन का सुजन योनी में गांठ ।
  • आंत के कैंसर में कब्ज , पतला दस्त , मल , त्याग , के बाद रक्त स्त्राव पेट में दर्द अदि।

उपचार:

  • 2-3 चम्मच घृतकुमारी (Aloe vera) के पत्ते लें, आधा किलो मधु का रस, चार चम्मच ब्रांडी या विस्की या महुआ से बना शराब लें।
  • घृतकुमारी के कांटे को अच्छी तरह साफ़ कर लें और छोटे छोटे टुकडे कर लें अब इसमें दी हुई मात्रा में मधु और शराब मिलाएं।आप चाहे तो इसे मिक्सी में पिसें और ठन्डे स्थान में रख दें।दवाई तैयार है।

खुराक: 1 चम्मच दिन में तीन बार खाली पेट में लें।(दवा भोजन लेने के 15 मिनट पहले लें) दवा 10 दिनों तक लगातार लें फिर 10 दिन छोड़ कर इसी अन्तराल में दवा लें ।

नोट : दवा लेने के बाद उलटी, पतला दस्त, चेहरे में दाना आना इत्यादी लक्षण दिखलाई पड़ सकते हैं लेकिन इससे घबराना नहीं है।रोटी, चावल, हरी-सब्जी, गन्ना, दाल, आलू, थोड़ी मात्रा में शराब (2 चम्मच पानी के साथ) लें सकते हैं।हरी सब्जी आधा पका और उबाला हुआ दें।पानी अधिक मात्रा में पिएँ।दुसरे अन्य पदार्थोँ के साथ फल न लें।कैंसर में त्वचा, गला, गर्भाशय, लीवर, आंत के कैंसर के अलावे उपयुक्त दवा अल्सर, गठिया जोड़ों का दर्द के लिए उपयोगी है ।

स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक

  1. अंडा नींबू का टॉनिक (Egg lemon tonic)

विधि: देशी मुर्गी के अंडे को अच्छी तरह पोछकर साफ़ कर लें।एक शीशे के बोयाम में कागजी नींबू का रस आधा डालें।उसमें अंडे को डुबो दें।अंडे डूब जाने के बाद नींबू कर रस एक इंच अंडे से उपर रहना चाहिए।अब इसे धुप में सात दिनों तक रखें। इसके बाद दालघोटनी को लेकर अंडे एवं नींबू का रस दोनों को अच्छी तरह मिला लें।साफ़ कपडे से छानकर उसे अलग कर लें।उसके बाद छाने हुए अंडे और नींबू के रस को पुराने गुड़ के पाक में मिलाना है।ध्यान रहे कि रस की मात्रा एवं गुड़ के पाक की मात्रा बराबर हो।फिर बोतल को अच्छी तरह 21 दिन धुप में रख दें।22 वें दिन में इस टॉनिक को इस्तेमाल कर सकते हैं ।

खुराक: दो चम्मच दिन में तीन बार।यह मुख्यतः दमा, टी वी., दिर्घग्कालीन सर्दी-खांसी के लिए उपयोगी है।

कटहल का टॉनिक (Jackfruit tonic)

पूर्ण रूप से तैयार पका कटहल लें (न पूरी तरह पका हुआ और ना कच्चा) इसके बाद कटहल के कोवे से बीज को हटा दें।इसके बाद एक साफ़ बोयाम में पहले पुराना गुड़ फिर उसके बाद कोवे के परत को रखते जाए।ध्यान रहना चाहिए की बोयाम के निचले एवं सबसे उपर गुड़ की परत हो।इसके बाद इसे धुप में 21 दिन रखें।22 वें दिन से तैयार हो जाता है ।

खुराक: 2-3 चम्मच दिन में तीन बार।यह टॉनिक टी बी के मरीज के लिए उपयोगी है।कम से कम छ: महीने तक इसे जरी रखें।

अड़हुल फूल का टॉनिक ( shoe-flower tonic)

अड़हुल फूल लेकर उसके बीच से पराग को हटा दें।केवल पंखुड़ी को पानी से अच्छी तरह धो लें।यह ध्यान में रहे की पानी का अंडा फूल में नहीं रहना चाहिए।इसके बाद पुराने गुड़ की एक परत बोयाम के निचले और सबसे उपर में गुड़ ही रहे।इसके बाद इसे धुप में 21 दिन तक रखें।टॉनिक तैयार है ।

खुराक: एक चम्मच दिन में दो बार ।

यह टॉनिक लुकोरिया, मसिक धर्म में अनियमितता और गर्भाशय सम्बन्धी रोगों में उपयोगी है।यदि यह टॉनिक आप लुकोरिया मरीज़ के लिए बना रहे हैं तको यह ध्यान रहे कि लाल अड़हुल इस्तेमाल कर सकते हैं ।

भुई आंवला का टॉनिक ( bhumi-amla tonic)
भुई आंवला के पूरे पंचाडग को अच्छी तरह धोकर उसे उबाल लें।इसके बाद उसका रस निचोड़ कर इसका काढ़ा तैयार करें।पुराने गुड़ का पाक तयार करने के बाद ये रस उसमें मिलकर टॉनिक तैयार करें।इसे धुप में 21 दिन रखना है।ये ध्यान रहे की गुड़ और भुई आंवला के रस की मात्रा बराबर हो ।
खुराक: 2 चम्मच दिन में तीन या दो बार ।
यह पीलिया के रोगी के लिए लाभप्रद है ।
आंवला का सत्व (Gooseberry aristam) 5 किलो आंवला लें ध्यान रहे उसमें कटा फटा न हो।3 किलो पुराने गुड़ लें।आंवला को धो लें और साफ़ कपडे से पोंछ लें जिससे पानी का अंश चला जाए।अब एक मिटटी का घड़ा लें जिसे कम से कम एक साल तक इस्तेमाल किया गया हो।अब गुड़ को और उसके बाद आंवले को अलग–अलग परत में रखते जाएं।घड़े के सबसे उपर गुड़ का परत हो।ध्यान रहे कि इसमें पानी का अंश नहीं जाये।स्वाद के लिए जीरा, सौफ, दालचीनी, लौंग सभी का चूर्ण मिला सकते हैं।इस घड़े को अच्छी तरह बंदकर दें जिससे हवा अन्दर न जा पाए। अब घड़े को सुके ज़मीन के अन्दर रख दें।अब 40 दिन के बाद घड़े को बाहर निकालें। फिर इसके जूस को बोयाम में रखकर 21 दिन तक धुप में रखें।अब इसे इस्तेमाल में ला सकते हैं ।

 

खुराक: 1 चम्मच दिन में दो बार।यह भूख बढ़ाने भोजन पचाने, * दूर करने तथा अनिद्रा के मरीज के लिए उपयोगी है ।

सहिजन का सिरप ( Drumstic syrup)

सहिजन / मुनंगा के पत्तों का जूस 400 मिलीलीटर लें।अब इसमें पुराना गुड़ 1 किलो मिलाएं।अब इन दोनों को धीमे आंच में उबालें ताकि काढ़ा गाढ़ा हो जाए। स्वाद के लिए जीरा सौंफ दालचीनी मिलकर रख सकते हैं ।

खुराक: 1 चम्मच दिन में दो बार भोजन के बाद 2-3 माह तक ।

यह गर्भवती महिलाओं के लिए उपयोगी है ।

औषधीय पेड़–पौधे,बोटानिकल नाम,जड़ी-बूटियों का विवरण

1 . नीम (Azadirachta indica):

एक चिपरिचित पेड़ है जो 20 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है इसकी एक टहनी में करीब 9-12 पत्ते पाए जाते है।इसके फूल सफ़ेद रंग के होते हैं और इसका पत्ता हरा होता है जो पक्क कर हल्का पीला–हरा होता है।अक्सर ये लोगो के घरों के आस-पास देखा जाता है।

2 . तुलसी ( ocimum sanctum):

तुलसी एक झाड़ीनुमा पौघा है।इसके फूल गुच्छेदार तथा बैंगनी रंग के होते हैं तथा इसके बीज घुठलीनुमा होते है।इसे लोग अपने आंगन में लगाते हैं ।

3 . ब्राम्ही/ बेंग साग ( hydrocotyle asiatica):

यह साग पानी की प्रचुरता में सालो भर हरी भरी रहने वाली छोटी लता है

जो अक्सर तालाब या खेत माय किनारे पायी जाती है।इसके पत्ते गुदे के आकार ( 1 /2 -2 इंच ) के होते हैं।यह हरे चटनी के रूप में आदिवासी समाज में प्रचलित है ।

4 . ब्राम्ही ( cetella asiatica):

यह अत्यंत उपयोगी एवं गुणकारी पौधा है ।यह लता के रूप में जमीन में फैलता है।इसके कोमल तने 1-3 फीट लम्बी और थोड़ी थोड़ी दूर पर गांठ होती है।इन गांठो से जडें निकलकर जमीन में चली जाती है।पत्ते छोटे , लम्ब , अंडाकार , चिकने ,मोटे हरे रंग के तथा छोटे–छोटे होते हैं सफ़ेद हल्के नीले गुलाबी रंग लिए फूल होते हैं।यह नमी वाले स्थान में पाए जाते हैं ।


5 .हल्दी ( curcuma longa):

हल्दी के खेतों में तथा बगान में भी लगया जाता है।इसके पत्ते हरे रंग के दीर्घाकार होते हैं।इसका जड़ उपयोग में लाया जाता है। कच्चे हल्दी के रूप में यह सौन्द्र्यवार्द्क है।सुखे हल्दी को लोग मसले के रूप में इस्तेमाल करे हैं।हल्दी रक्तशोधक और काफ नाशक है ।

6 . चिरायता / भुईनीम (Andrographis paniculata):

छोटानागपुर के जगलों में प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला 1-3 फीट तथा

उसकी अनेक शाखाएँ पतली –पतली होती है।इसकी पत्तियां नुकीली, भालाकर, 3-4 इंच लम्बी तथा एक से सवा इंच चौड़ी होती है।फूल छोटे हल्के गुलाबी और सफ़ेद रंग के होते हैं यह बरसात के दिनों में पनपता है और जाड़े में फल तथा फूल लगते हैं।यह स्वाद में कड़वा होता है ।

7 . अडूसा:

यह भारत के प्रायः सभी क्षेत्रो में पाया जाता है।अडूसा का पौधा यह सालों भर हरा भरा रहनेवाला झाड़ीनुमा पौधा है जो पुराना होने पर 8-10 फीट तक बढ़ सकता है।इसकी गहरे हरे रंग की पत्तियां 4-8 इंच लम्बी और 1-3 इंच चौड़ी है।शरद ऋतू के मौसम में इसके अग्र भागों के गुच्छों में हल्का गुलाबीपन लिए सफ़ेद रंग के फूल लगते हैं ।

8 . सदाबहार (Catharanthus roseus):

यह एक छोटा पौधा है जो विशेष देखभाल के बिना भी रहता है।सदाबहार का पौधा

चिकित्सा के क्षेत्र में इसका अपना महत्त्व है।इसकी कुछ टहनियां होती है और यह 50 सेंटी मीटर ऊंचाई तक बढता है।इसके फूल सफ़ेद या बैगनी मिश्रित गुलाबी होते हैं।यह अक्सर बगान, बलुआही क्षेत्रो, घेरों के रूप में भी लगया जाता है ।



9 . सहिजन / मुनगा(Moringa oleifera):

सहिजन एक लोकप्रिय पेड़ है।जिसकी ऊंचाई 10 मीटर या अधिक होतीसहिजन है ।

इसके छालों में लसलसा गोंद पाया जाता है।इसके पत्ते छोटे और गोल होते हैं तथा फूल सफेद होते हैं।इसके फूल पते और फल (जोकी) खाने में इस्तेमाल में लाये जाते हैं।इसके पत्ते (लौह) आयरन के प्रमुख स्रोत हैं जो गर्भवती माताओं के लिए लाभदायक है ।

 

 

10. हडजोरा

10.1-Tinospora cordifolia: हड्जोरा /अमृता एक लता है।इसके पत्ते गहरे हरे हाड़जोड़ा

रंग के तथा हृदयाकार होते हैं।मटर के दानो के आकार के इसके फल कच्चे में हरे

तथा पकने पर गहरे लाल रंग होते हैं।यह लता पेड़ों , चाहरदीवारी या घरों के छतों पर आसानी से फैलती है।इसके तने से पतली पतली जड़ें निकल कर लटकती है ।

10.2 Vitis quadrangularis: हडजोरा का यह प्रकार गहरे हरे रंग में पाया जाता है।ये गुठलीदार तथा थोड़ी थोड़ी दूर पर गांठे होती है।इसके पत्ते बहुत छोटे होते हैं।जोड़ों के दर्द तथा हड्डी के टूटने तथा मोच आने पर इसका इस्तेमाल किये जाने के कारण इसे हडजोरा के नाम से जाना जाता है ।

11. करीपत्ता (Maurraya koengii):

करीपत्ता का पेड़ दक्षिण भारत में प्रायः सभी घरों में पाया जाता है।इसका इस्तेमाल करी का पौधा

मुख्यता भोजन में सुगंध के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं।इसके पत्तों का सुगंध

बहुत तेज़ होता है।इसकी छाल गहरे धूसर रंग के होती है इसके पत्ते अंडाकार, चमकीले और हरे रंग के होते हैं।इसके फूल सफ़ेद होते हैं एवं गुच्छेदार होते हैं।इसके फल गहरे लाल होते हैं जो बाद में बैगनी मिश्रित कालापन लिए होता है ।

12. दूधिया घास (Euphorbia hirat):

यह साधरणतः खेतों, खलिहानों, मैदानों में घासों के साथ पाया जाता है।दुधिया धास

इसके फूल बहुत छोटे होते हैं जो पत्तों के बीच होते हैं।यह स्वाद में

कडुवा होता है। इसकी छोटी टहनियों जी तोड़ने पर ढूध निकलता है

जो लसलसा होता है ।

13. मीठा घास(Scoparia dulcis ):

यह बगान, खेतों के साथ पाया जाता है।मीठा धास इसके पत्ते छोटे होते हैं और फल छोटे-छोटे स्थानीय वनौषधियाँ और हमारा स्वास्थ्य

होते हैं जो राइ के दाने के बराबर देखने में लगते हैं।स्वाद में मीठा होने के कारण

मीठा घास के रूप में जाना जाता है ।

 

14. भुई आंवला (phyllanthus niruri):

यह एक अत्यंत उपयोगी पौधा है जो बरसात के मौसम में यहाँ-* जनमते हैं।स्थानीय वनौषधियाँ और हमारा स्वास्थ्यस्थानीय वनौषधियाँ और हमारा स्वास्थ्यस्थानीय वनौषधियाँ और हमारा स्वास्थ्यस्थानीय वनौषधियाँ और हमारा स्वास्थ्य

इस पौधे की ऊंचाई 1- 25 इंच ऊँचा तथा कई शाखाओं वाले होते हैं ।

पत्तियां आकार में आंवले की पत्तियों की सी होती है और निचली सतह पर

छोटे छोटे गोल फल पाए जाते हैं।यह जाड़े के आरंभ होते होते पक जाते हैं और फल तथा बीज पककर झड जाते हैं और पौधे समाप्त होते हैं ।

15. अड़हुल (Hisbiscus rosasinensis):

अड़हुल का फूल लोगो के घरों में लगाया जाता है।यह दो प्रकार का होता है – लाल और सफ़ेद जो दवा के काम में लाया जाता है।अड़हुल का पत्ता गहरा हरा होता है।

16. घृतकुमारी/ घेंक्वार (Aloe vera):

यह एक से ढाई फूट ऊँचा प्रसिध्द पौधा है।इसकी ढाई से चार इंच चौड़ी , नुकीली एवं कांटेदार किनारों वाली पत्तियां अत्यंत मोटी एवं गूदेदार होती है पत्तियों में हरे छिलकेके नीचे गाढ़ा, लसलसा रंगीन जेली के सामान रस भरा होता है जो दवा के रूप में उपयोग होता है ।

17. महुआ (madhuka indica):

महुआ का वृक्ष 40-50 फीट ऊँचा होता है।इसकी छाल कालापन लिए धूसर रंग की तथा अन्दर से लाल होती है।इसके पत्ते 5- 9 इंच चौड़े होते हैं।यह अंडाकार , आयताकार, शाखाओं के अग्र भाग पर समूह में होते हैं।महुआ के फूल सफ़ेद रसीले और मांसल होते हैं।इसमे मधुर गंध आती है।इसका पका फल मीठा तथा कच्चा में हरे रंग का तथा पकने पर पीला या नारंगी रंग का होता है ।

18. दूब घास ( cynodon dactylon):

दूब घास 10 -40 सेंटी मीटर ऊँचा होता है।इसके पत्ते 2- 10 सेंटी मीटर भुई आवंला

लम्बे होते है इसके फूल और फल सालों भर पायी जाती है।दूब घास दो प्रकार के होते हैं – हरा और सफ़ेद हरी दूब को नीली या काली दूब भी कहते है

 

19. आंवला (Phyllanthus emblica):

इसका वृक्ष 5-10 मीटर ऊँचा होता है ।आंवला स्वाद में कटु, तीखे, खट्टे, मधुर , आवंला

और कसैले होते हैं।अन्य फलों की अपेक्षा आंवले में विटामिन सी की मात्रा अधिक

होती है।उसके फूल पत्तीओं के नीचे गुच्छे के रूप में होती है।इनका रंग हल्का हरा तथा सुगन्धित होता है इसके छाल धूसर रंग के होते हैं।इसके छोटे पत्ते 10 – 13 सेंटी मीटर लम्बे टहनियों के सहारे लगा रहता है इसके फल फरवरी –मार्च में पाक कर तैयार हो जाते हैं जो हरापन लिए पिला रहता है ।

20. पीपल( Ficus religiosa):

पीपल विशाल वृक्ष है जिसकी अनेक शाखाएँ होती है।इनके पत्ते गहरे हरे रंग के हृदय आकार होती है।इनके जड़ , फल , छाल , जटा , दूध सभी उपयोग में लाये जाते हैं।हमारे भारत में पीपल का धार्मिक महत्त्व है ।

21. लाजवंती/ लजौली(Mimosa pudica):

लाजवंती नमी वाले स्थानों में जायदा पायी जाती है इसके छोटे पौधे में अनेक शाखाएं होती है।इनके पत्ते को छूने पर ये सिकुड़ कर आपस में सट जाती है।इस कारण इसी लजौली नाम से जाना जाता है इसके फूल गुलाबी रंग के होते हैं ।

22. करेला(Mamordica charantia):

यह साधारणतया व्यव्हार में लायी जाने वाली उपयोगी हरी सब्जी है जो लतेदार होती है।इसका रंग गहरा हरा तथा बीज सफ़ेद होता है।पकने पर फल का रंग पिला तथा बीज लाल होता है।यह स्वाद में कड़वा होता है ।

23. पिपली(Piper longum):

साधारणतया ये गरम मसले की सामग्री के रूप में जानी जाती है।पिपली की कोमल लताएँ 1-2 मीटर जमीन पर फैलती है ये गहरे हरे रंग के चिकने पत्ते 2-3 इंच लम्बे एवं 1-3 चौड़े हृदयाकार के होते हैं।इसके कच्चे फल पीले होते हैं तथा पकने पर गहरा हरा फिर काला हो जाता है।इसके फलों को ही पिपली कहते हैं ।

24. अमरुद (Psidium guayava):

अमरुद एक फलदार वृक्ष है।यह साधारणतया लोगों के घर के आंगन में पाया जाता है इसका फल कच्चा में हरा और पकने पर पिला हो जाता है।प्रकार – यह सफ़ेद और गुलाबी गर्भ वाले होते हैं।इसके फूल सफ़ेद रंग के होते हैं।यह मीठा कसैला , शीतल स्वादिस्ट फल है जो आसानी से उपलब्ध होता है ।

25. कंटकारी/ रेंगनी (Solanum Xanthocarpum):

यह परती जमीन में पाए जाने वाला कांटेदार हलकी हरी जड़ी है।इसके कांटेदार पौधे 5- 10 सेंटी मीटर लम्बी होती है।इसके फूल बैंगनी रंग के पाए जाते हैं।इसके फल के भीतर असंख्य बीज पाए जाते हैं ।

26. जामुन (Engenia jambolana):

जामुन एक उत्तम फल है।गर्मी के दिनों में जैसा आम का महत्व है वैसे ही इसका महत्व गर्मी के अंत मिएँ तथा बरसात में होता है।यह स्वाद में मीठा कुछ खट्टा कुछ कसैले होते हैं।जामुन कर रंग गहरा बैंगनी होता है ।

27. इमली (Tamarindus indica):

इमली एक बड़ा वृक्ष है जिसके पत्ते समूह में पाए जाते हैं जो आंवले के पत्ते की तरह छोटे होते हैं।इसका फल आरंभ में हरा पकने पर हल्का भूरा होता है यह स्वाद में खट्टा होता है

28. अर्जुन (Terminalia arjuna):

यह असंख्य शाखाओं वाला लम्बा वृक्ष है।इसके पत्ते एकदूसरे के विपरीत दिशा में होते हैं।इसके फूल समूह में पाए जाते हैं।तथा फल गुठलीदार होता है जिसमें पांच और से पंख की तरह घेरे होते हैं ।

29. बहेड़ा (Terminalia belerica):

बहेड़ा का पेड़ 15- 125 फीट ऊँचा पाया जाता है, इसका ताना गोल एवं आकार में लम्बा , 8 -35 फीट तक के घेरे वाला होता है।इसकी छाल तोड़ी कालिमा उक्त भूरी और खुरदुरी होती है।इसके फल , फूल , बीज , वृक्ष की छाल , पत्ते तथा लकड़ी सभी दवा के काम में आते हैं ।

30. हर्रे (Terminalia chebula):

यह एक बड़ा वृक्ष है।इसके फल कच्चे में हरे तथा पकने पर पीले धूमिल रंग के होते हैं।इसके फल शीत काल में लगते हैं जिसे जनवरी – अप्रैल में जमा किया जाता है।इसके छाल भूरे रंग के होते हैं।इसके फूल छोटे, पीताभ तथा फल 1-2 इंच लम्बे , अंडाकार होते हैं ।

31. मेथी (Trigonella foenum):

यह लोकप्रिय भाजिओं में से एक है।इनके गुणों के कारण इसका उपयोग प्रत्यक घर में होता है।इस पौधे की ऊंचाई 1- 1 ½ फीट होती है , बिना शाखाओं के।मेथी की भाजी तीखी, कडवी, और वायुनाशक है।छोटानागपुर में इसे सगों के साथ मिला कर खाने में इस्तेमाल किया जाता है।इसमें लौह तत्त्व की मात्रा अधिक होती है ।

32. सिन्दुआर/ निर्गुण्डी (Vitex negundo):

यह झड़ी दार पौधा जो कभी कभी छोटा पेड़ का रूप ले लेता है।इसके पत्ते 5 -10 सेंटीमीटर लम्बी तथा छाल धूसर रंग का होता है इसके फूल बहुत छोटे और नीलेपन लिए बैंगनी रंग के होते हैं जो गुच्छे दार होते हैं इसके फाल गुठलीदार होते हैं जो 6 मिलीमीटर डाया मीटर से कम होते हैं और ये पकने पर काले रंग के होते हैं ।

33. चरैयगोडवा (Vitex penduncularis):

इसका पेड़ 10 – 18 मीटर ऊँचा होता है इसके तीन पत्ते एक साथ पाए जाते हैं।जो देखने में चिड़िया के पर की तरह लगते हैं इसलिए इसे चरैयगोडवा कहते हैं।इसके फूल सफ़ेद है। पीलापन के लिए * जो अप्रैल –जून माह में मिलते हैं।इसके फल अगस्त- सितम्बर माह में पाए जाते हैं ।

34. बैर (ज़िज्य्फुस jujuba):

बैर का वृक्ष कांटेदार होता है।इसके कांटे छोटे छोटे होते हैं तथा इसकी पतियाँ गोलाकार तथा गहरे हरे रंग की होती है।इसके फल कच्चे में हरे रंग तथा पकने पर लाल होते हैं।यह स्वाद में खट्टा मीठा तथा कसैला होता है ।

35. बांस (Bambax malabaricum):

बांस साधारणतया घर के पिछवाड़े में पाया जाता है यह 30 -50 मीटर ऊँचा बढ़ता है इसके पत्ते लम्बे और नुकीले होते हैं बांस में थोड़ी थोड़ी दूर पर गांठे होती है

36. पुनर्नवा / खपरा साग (Boerhavia diffusa):

यह आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान की एक महत्वपूर्ण वनौषधि है।पुनर्नवा के ज़मीन पर फैलने वाले छोटी लताएँ जैसे पौधे बरसात में परती जमीन , कूड़े के ढेरों , सड़क के किनारे , जहाँ –तहां स्वयं उग जाते हैं।गर्मीयों में यह प्राय: सुख जाते हैं पर वर्षा में पुन: इसकी जड़ से नयी शाखाएँ निकलती है।पुनर्नवा का पौधा अनेक वर्षो तक जीवित रहता है।पुनर्नवा की लता नुमा हल्के लाल एवं काली शाखाएं 5- 7 फीट तक लम्बी जो जाती है पुनर्नवा की पत्तियां 1 – 1 ¼ इंच लम्बी ¾ - 1 इंच चौड़ी, मोटी ( मांसल) और लालिमा लिए हरे रंग की होती है।फूल छोटे छोटे हल्के गुलाबी रंग के होते हैं।पुनर्नवा के पत्ते और कोमल शाखाओं को हरे साग के रूप में खाया जाता है।इसे स्थानीय लोग खपरा साग के रूप से जानते हैं ।

37. सेमल (Bombax malabaricum):

सेमल के पेड़ बडे मोटे तथा वृक्ष में कांटे उगे होते हैं इसकी शाखाओं में 5- 7 के समूह में पत्ते होते हैं।जनवरी –फ़रवरी के दौरान इसमें फूल आते हैं।जिसकी पंकुधियाँ बड़ी तथा इनका रंग लाल होता है बैशाख में फल आते हैं जिनके सूखने पर रूई और बीज निकलते है ।

38. पलाश (Butea fondosa):

पलाश के पेड़ 5 फीट से लेकर 15-20 फीट या ज्यादा ऊँचे भी होते हैं।इसके एक ही डंठल में तीन पत्ते एक साथ होते हैं।बसंत ऋतू में इसमे केसरिया लाल राग के फूल लगते हैं तब पूरा वृक्ष दूर से लाल दिखाई देता है ।

39. पत्थरचूर (Coleus aromaticus):

यह 1 मीटर ऊंचाई तक बढ़ता है।इसके पत्ते अन्य पत्तों की अपेक्षा कुछ मोटे चिकने और ह्र्द्याकार होती है।इसके फूल सफ़ेद या हल्के बैंगनी रंग के पाए जाते हैं ।

40. सरसों (Sinapis glauca):

सरसों खेतों और बागानों में विस्तृत रूप से खेती किया जाने वाला पौधा है।इस पौधे की ऊंचाई 1.5 मीटर तक होती है।इसके पते के आकार नुकिलेदार होते हैं। तथा फूल पीले रंग में तथा बीज को तेल निकालने के लिए इस्तमाल में लाते हैं ।

41. चाकोड़ (Cassia obtusifolia):

चाकोड़ स्थानीय लोगो में चकंडा के नाम से प्रसिद्ध है।इसके पत्ते अंडाकार होते हैं। तथा फूल छोटे और पीले रंग के होते हैं।इसके फल (बीजचोल) लम्बे होते है।चाकोड़ 1 मीटर तक ऊँचा होता है।यह सड़क किनारे, परती जमीन में पाया जाता है।

42. मालकांगनी/ कुजरी (Celastrus paniculatus):

यह झाड़ीनुमा लातेय्दर* और छोटे टहनियों के साथ पाया जाता है जो व्यास में (डायमीटर) 23 सेंटी मीटर और तक ऊंचाई 18 मीटर होती है। इसके पत्ते दीर्घाकार , अंडाकार और द्न्तादेदार* होते हैं।इसके फूल हरापन लिए पिला होता है।जिसका व्यास 3.8 मिली मीटर होता है।इसके बीज पूर्णतया नारंगी लाल बीजचोल के साथ लगे होते हैं ।

43. दालचीनी (Cinnamonum cassia):

यह मधुर, कडवी सुघंधित होती है।इस वृक्ष की छाल उपयोगी होती है।इसे गर्म मसले के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।

44. शतावर (Asparagus racemosus):

यह बहुत खुबसूरत झाड़ीनुमा पौधा है।जिसे लोग सजाने के कम में भी लाते हैं।इसके पत्ते पतले , नुकिलेदार हरे-भरे होते हैं। इसके फूल देखने में बहुत छोटे – छोटे , सफ़ेद रंग के सुगन्धित होते हैं।इसके फल हरे रंग के होते है जो पकने पर काले रंग के हो जाते हैं।इसकी जड़ आयुर्वेद के क्षेत्र में उपयोगी है जो इस्तेमाल में लायी जाती है ।

45. अनार (punica granatum):

अनार झाड़ीनुमा पतली टहनियों वाला होता है। एक्स फूल लाल रंग का होता है।अनार स्वाद में मीठा , कसैलापन लिए हुए रहता है।इसके फल लाल और सेफ प्रकार के होते हैं।एक्से फूल फल तथा छिलका उपयोग में लाये जाते हैं ।

46. अशोक (Saraca indica):

यह सदाबहार वृक्ष है जो अत्यंत उपयोगी है।इसके पते सीधे लम्बे और गहरे रंग के होते हैं।इसे लोग शोभा बदने के लिए लगते है। इसके छाल धूसर रंग , स्पर्श करनी में कुर्दारी तथा अन्दर लाल रंग की होती है।यह स्वाद में कडवा , कसैला , पचने में हल्का रुखा और शीतल होता है ।

47. अरण्डी/ एरण्ड (Ricinus communis):

यह 7-10 फीट ऊँचा होता है।इसके पत्ते चौड़े तथा पांच भागों में बटें होते अरण्ड के पत्ते फूल बीज और तेल उपयोग में लाये जाते हैं।इसके बीजों का विषैला तत्त्व निकल कर उपयोग में लाये जाते हैं।यह दो प्रकार लाल और सफ़ेद होते हैं ।

48. कुल्थी/ कुरथी (Dolichos biflorus):

यह तीन पत्तीओं वाला पौधा होता है जिसमे सितम्बर- नवम्बर में फूल तथा अक्टूबर-दिसम्बर के बीच फल आते हैं।कुरथी कटु रस वाली , कसैली होती है।यह गर्म, मोतापनासक, और पथरी नासक है ।

49. डोरी (Bassia latifolia):

यह महुआ का फल है इसे तेल बनाने के काम में लाया जाता है इसकी व्याख्या आगे की गई है ।

50. चिरचिटी( Achyranthes aspera) :

एक मीटर या अधिक ऊँचा होता है।इसके पत्ते अंडाकार होते हैं इसके फूल 4-6 मिलीमीटर लम्बे , सफेद्पन लिए हुए हरे रंग या बैगनी रंग के होते हैं ।

51. बबूल (Acacia arabica):

बबूल का वृक्ष मध्यमाकार , कांटे दार होता है।इसके पत्ते गोलाकार और छोटे छोटे होते हैं।पत्तों में भी कांटे होते है इसके फूल छोटे गोलाकार और पीले रंग के होते हैं।इसकी फलियाँ लम्बी और कुछ मुड़ी हुई होती है।बबूल का गोंद चिक्तिसा की दृष्टी से उपयोगी है।

52. कटहल (Artocarpus integrifolia):

कटहल के पेड़ से सभी परिचित हैं। इसका फल बहुत बड़ा होता है।कभी-कभी इसका वजन 30 किलो से भी ज्यादा होता है।स्थानीय लोगो में सब्जी और फल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।इसके पेड़ की ऊंचाई 10 मीटर या उससे अधिक हो सकती है।यह एक छाया दर वृक्ष है। इसकी अनेक शाखाएँ फैली होती है ।

 

स्रोत:  स्थानीय वनौषधियाँ और हमारा स्वास्थ्य पुस्तिका, एम एन पुष्पा कुजूर द्वारा रचित एवं ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान द्वारा प्रकाशित|

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alam Jan 12, 2017 11:05 AM

१नबर मे वनउपज धौरा गोंद का व्यापर कैसे करना है मोबाइल नंबर ८९XXXXXXXX

XISS Nov 09, 2015 11:36 AM

तेजपाल सिंह जी अपने विचार हमारे साथ साझा करने के लिए धन्यवाद

tejpal singh Nov 05, 2015 11:08 AM

Mei ayurvedic jadi buti me bare jankari Lena pasand karata hu .eska estemal Bhi karata हु

अशोक राय Oct 06, 2015 03:28 AM

दास साल से डाईफाड है

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