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रोग प्रतिरक्षण क्या है?

इस भाग में विभिन्न खतरनाक रोगों है से बचाव के लिए समय समय पर लगाए जाने वाले टीकों के बारे में जानकारी दी गई है|

परिचय

Vaccinationअनेक बार इसे “वैक्सीनेशन” भी कहा जाता हैं, हालाँकि ये दोनों शब्द तकनीकी रूप से भिन्न हैं| यह प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम कुछ विशेष रासायनिक पदार्थों को अपने शरीर में लेकर, कुछ विशेष बीमारियों के विरूद्ध अपनी रक्षा करते हैं| इन विशेष बीमारियों के विरूद्ध अपनी रक्षा करते हैं| इन विशेष रासायनिक पदार्थों रोगों से बचाव के टीके कहा जाता है| ये वैक्सीन्स कुछ विशिष्ट रोगों के विरूद्ध विशिष्ट सुरक्षा प्रदान करती हैं| उदहारण के तौर पर, पोलियो वैक्सीन्स पोलियो नामक रोग के विरूद्ध: मीजल्स वैक्सीन (खसरे का टीका) घातक रोग खसरे के विरूद्ध सुरक्षा प्रदान करती है, इत्यादि| ओरल पोलियो वैक्सीन ओरल टाइफाइड वैक्सीन ( जो मुख से दी जाती हैं) को छोड़कर अन्य वैक्सीन इंजेक्शन के द्वारा शरीर में पहुंचाई जाती हैं|

रोग प्रतिरक्षण (इम्यूनाइजेशन) :

हमारे चारों पर के वातावरण में – अथार्त साँस में ली  जाने वाली हवा, खाए जाने वाले भोजन, पिए जाने वाले पानी में- बीमारियाँ उत्पन्न करने वाले अनेक कीटाणु  होते हैं| इन कीटाणुओं के द्वारा होने वाली बीमारियों को “संक्रामक रोग” कहते हैं| हमारे शरीर का रोगों से रक्षा करने वाला प्राकृतिक तंत्र (“इम्यून तंत्र”) इन कीटाणुओं का विरोध करता है और उनसे लड़ता है तथा इस प्रकार अनेक घातक संक्रामक रोगों से हमारी रक्षा करता है| तदापि, कभी – कभी ऐसा होता है कि किसी विशेष संक्रामक रोग के कीटाणु अत्यधिक शक्तिशाली होते हैं या इम्यून तंत्र कमजोर है| ऐसी स्थिति में उस रोग के कीटाणु शरीर में बीमारी उत्पन्न करने में सफल हो जाते हैं और हम बीमार पड़ जाते हैं| अगर उसका कोई उपचार उपलब्ध नहीं है या उपचार अपर्याप्त है अथवा देर से शुरू होता तो संक्रामक रोग से गंभीर कमजोरी या अपंगता और कभी-कभी मृत्यु भी हो जाती है|

रोग प्रतिरक्षण की प्रक्रिया के द्वारा हम कुछ विशेष बीमारियों के विरूद्ध शरीर की रोगों से लड़ने की शक्ति (“इम्यूनिटी”) में वृद्धि करते हैं| ऐसा शरीर में – इंजेक्शन या मुख के द्वारा – कुछ वैक्सीन्स का प्रवेश कराके किया जाता है|

वैक्सीन्स (टीके)

वैक्सीन्स विशेष प्रकार के द्रव होते हैं जिन्हें विशेष प्रयोगशालाओं में, विशेष प्रक्रियाओं के द्वारा तैयार किया जाता है| इन वैक्सीन्स का निर्माण अत्यंत जटिल प्रक्रियाओं के द्वारा होता है तदापि, सरल शब्दों में कहें तो वैक्सीन्स में या तो रोग उत्पन्न करने वाले – बेहद कमजोर किए हुए- कीटाणु या उनके कोई अंश होते हैं| इसी आधार पर उन्हें क्रमश: “सजीव वैक्सीन” या “मृत वैक्सीन” कहते हैं|

शरीर में प्रवेश करने पर ये सजीव (परन्तु अत्यंत कमजोर) या मृत कीटाणु या उनके अंश संक्रामक  रोग उत्पन्न नहीं कर सकते हैं| तदापि हमारा प्राकृतिक रक्षा तंत्र (इम्यून तंत्र) इन्हें पहचान लेता है और तुरंत सक्रिय हो जाता है| यह इस प्रकार प्रतिक्रिया करता है मानो जैसे कि वास्तविक, शक्तिशाली कीटाणुओं ने आक्रमण कर दिया हो| जल्दी ही, इम्यून तंत्र भारी मात्रा में सुरक्षात्मक “हथियारों”(जिन्हें “एंटीबाडी” कहते हैं) का उत्पादन कर लेता है जो उस विशेष रोग के विरूद्ध सुरक्षा प्रदान करते हैं| ये एंटीबाडीज शरीर में संग्रहित होते हैं| भविष्य में जब शरीर उस रोग के वास्तविक कीटाणुओं के संपर्क में आता है तो हमारा शरीर, इम्यूनैजेशन के कारण पहले से ही मौजूद एंटीबाडीज की सहायता से, उन पर आसानी से काबू पा लेता है और इस प्रकार हम उस संक्रामक रोग से बचे रहते हैं|

कभी-कभार, तदापि, बीमारी के कीटाणुओं का आक्रमण इतनी जल्दी व गंभीर होता है कि शरीर को हमारी रक्षा के लिए एंटीबाडीज तैयार करने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है| ऐसी स्थिति में हमें “इम्यूनोग्लोबूलिन्स” के रूप में “पूर्व निर्मित एंटीबाडीज” देनी पड़ती हैं| इम्यूनोग्लोबूलिन्स को एंटी – सीरम भी कहते हैं (उदाहरण के तौर पर एंटी टिटनेस सीरम=ए. टी. एस.) अत: रोग प्रतिरक्षण में वैक्सीनेशन तथा एंटी सीरम या इम्यूनोग्लोबूलिन्स देने की दोनों प्रकियाएं सम्मिलित होती हैं|

एक बात बिल्कुल स्पष्ट है: विभिन्न रोगों से बचाव की वैक्सीन्स (टीके) भी अलग-अलग होती हैं| चिकित्सा विज्ञान ने काफी प्रगति कर ली है और अब हमारे पास ऐसी अनेक वैक्सीन्स उपलब्ध हैं जिसमें 2 या 2 से अधिक रोगों के विरूद्ध वैक्सीन्स होती हैं| उदाहरण के तौर पर, काली खाँसी तथा टिटनेस- के विरूद्ध एक संयूक्त वैक्सीन है, जिसे “ट्रिपल वैक्सीन” या “डी.टी.पी. वैक्सीन” कहते हैं| उसी प्रकार एक अन्य वैक्सीन “एम्.एम. आर.  वैक्सीन” 3 रोगों – खसरा (मीजल्स), मम्प्स तथा रूबैला के विरूद्ध सुरक्षा प्रदान करती है|

बीमारियों के विरूद्ध वैक्सीन्स उपलब्ध (टीके)

यह सत्य नहीं है कि सभी संक्रामक रोगों के विरूद्ध वैक्सीन्स उपलब्ध हैं| वास्तविकता यह है कि केवल कुछ मुट्ठी भर रोगों के विरूद्ध ही ये टीके उपलब्ध हैं| तालिका न. 1 एम् इन रोगों तथा इनके विरूद्ध उपलब्ध टीकों के नाम दिए गए हैं| आजकल मलेरिया, कुष्ट रोग तथा एच.वाई.वी./ एड्स जैसे रोगों के विरूद्ध वैक्सीन विकसित करने के लिए चिकित्सकीय अनुसंधान जोर-शोर से जारी है|

टीकों द्वारा रोकी जा सकने वाली बीमारियों का संक्षिप्त विवरण :

तपेदिक (टी.बी., क्षय रोग)

तपेदिक भारत में काफी व्यापक है| प्रतिवर्ष भारत में 5 लाख व्यक्ति तपेदिक के कारण मर जाते हैं| एक छोटे से जीवाणु – मायकोबैक्टीरीयम ट्यूबरकुलोसिस – द्वारा होने वाला यह रोग शरीर के किसी भी अंग को प्रभावित कर सकता है| तदापि फेफड़ों का तपेदिक इस रोग का सर्वाधिक होने वाला रूप है और वह हवा के माध्यम से फैलता है| तपेदिक की खतरनाक किस्मों में “ मिलियरी तपेदिक” डिस्सेमिनेटीड़ तपेदिक” तथा तपेदिक मेनिन्जइटीस (दिमागी तपेदिक) शामिल हैं|

पोलियो (लकवा या पोलियोमाइलीटिस)

यह पोलियो विषाणु (वायरस) से होने वाला रोग है जो 3 प्रकार का होता है| मुख्यत: यह दूषित जल व भोजन के माध्यम से फैलता है| और अधिकांशत: 6 महीने से 5 वर्ष की आयु के बच्चों को प्रभावित करता है| हालाँकि इससे रोगी की मृत्यु भी हो सकती है, मुख्यत: इससे पैरों की गंभीर अपंगता होती है| सौभाग्य से भारत में पोलियो के रोगियों की संख्या काफी तेजी से कम हो रही है| ऐसा सामान्य तथा पल्स पोलियो अभियान के अंतर्गत दी जाने वाली पोलियो अभियान के अंतर्गत दी जाने वाली पोलियो वैक्सीन (ओ.पी.वी.) के बृहद प्रयोग के कारण संभव हो पाया है| आशा है की शीघ्र ही भारत से पोलियो रोग का उन्मूलन हो जाएगा|

डिप्थीरिया (गल घोटूं)

यह एक सूक्ष्म जीवाणु के द्वारा होने वाला रोग है जो मुख्यत: छोटे बच्चों को होता है| यह बीमारी साधारण खाँसी- जुकाम की तरह बुखार, खाँसी व निगलने में कठिनाई जैसे लक्षणों के साथ शुरू होती हैं और तेजी से बढ़ती है| अगर समय पर इसका उपचार नहीं किया जाता है तो यह जानलेवा भी हो सकता है|

काली खाँसी (परटूसिस या व्हूपिंग कफ)

यह भी सूक्ष्म जीवाणु से होती है तथा मुख्यत: 6 महीने से लेकर 5 वर्ष की आयु के बच्चों को प्रभावित करती है| यह मुख्यत: वह तथा मुख व नाक के स्रावों के माध्यम से फैलती है| इसके मुख्य लक्षण हैं- हल्का बुखार तथा परेशान करने वाली खाँसी जो बढ़ती चली जाती है| इसका एंटीबायोटिक्स के द्वारा आसानी से उपचार किया जा सकता है|

खसरा (मीजल्स शीतला माता)

एक विषाणु (वायरस) से होने वाला यह रोग भी मुख्यत: 6 महीने से 5 वर्ष की आयु के बच्चों को होता है तथा एक रोगी से अन्य व्यक्तियों को हवा तथा मुख व नाक स्रावों के माध्यम से फैलता है| खसरे के रोगी के संपर्क में आने के 10 दिनों के बाद, बच्चे को बुखार, खाँसी, जुकाम, नाक का बहना व आँखों से पानी बहना जैसे लक्षण शुरू हो जाते हैं| ये लक्षण 3-4 दिनों तक रहते हैं और उसके बाद पूरे शरीर पर लाल- गुलाबी दाने (“रैश”) निकल आते हैं जिसकी शूरूआत चेहरे से होती हैं|

खसरे से वैसे तो रोगी की मृत्यु नहीं होती है परंतु इस रोग में दस्त रोग, ब्रोंको निमोनिया तथा गंभीर कुपोषण जैसी जटिलताएँ सामान्यत: होती हैं और ये ही खसरे से होने वाली अनेक मौतों लिए जिम्मेवारी हैं|

टिटनेस (धनुषबाण)

यह एक जीवाणु से होने वाला रोग है जो जख्मों, कटे हुए भाग या चोट वाले स्थान से शरीर में प्रवेश करता है| यह एक घातक रोग है तथा इसका उपचार करना अत्यंत कठिन होता है| अगर प्रसव के दौरान और गर्भनाल को काटने के लिए साफ औजार तथा सफाई का ध्यान नहीं रखा गया है तो नवजात शिशु को यह रोग हो सकता है| एक बार यह रोग हो जाए तो रोगी का शरीर अकड़ और धनुष की तरह टेढ़ा जो जाता है| रोगी को मिरगी के दौर पड़ने लगते हैं तथा अधिकांशत: रोगी की मृत्यु हो जाती है|

रोग और उसमें दिए जाने वाले टीकों की सम्पूर्ण जानकारी

तालिका न. 1

रोग

वैक्सीन का नाम

कैसे दी जाती है?

तपेदिक (टी.बी., क्षय रोग)

बी.सी.जी. (बेसिलस कामेट ग्वेरिन)

इंजेक्शन के द्वारा

पोलियो (लकवा)

ओ. पी. वी. (ओरल पोलियो वैक्सीन, पोलियो ड्राप्स)

मुख से : बूंदे

डिप्थीरिया (“ गला घोंटू”) + काली खाँसी (“परटूसिस,” व्हूपिंग कफ)+

टिटनेस (धनुषबाण)

डी.पी.टी. वैक्सीन (ट्रिपल वैक्सीन) (डिप्थीरिया, परटूसीस, टिटनेस वैक्सीन)

 

तथा डी.टी.वैक्सीन (डिप्थीरिया, टिटनेस वैक्सीन)

 

 

 

इंजेक्शन के द्वारा

मीजल्स (“खसरा”)

मीजल्स वैक्सीन

इंजेक्शन के द्वारा

टिटनेस

टिटनेस टॉक्साइड (टी.टी.) वैक्सीन

इंजेक्शन के द्वारा

जांडिस (“पीलिया”, हिपेटाइटिस)

 

हिपेटाइटिस ‘बी’ वैक्सीन

हिपेटाइटिस ‘ए’ वैक्सीन

इंजेक्शन के द्वारा

रेबीज (हाइड्रोफिबिया) एक रोग जो कुत्तों बिल्लियों तथा बंदरों के काटने से होता है

एंटी रेबीज वैक्सीन

(ए.आर.वी.)

इंजेक्शन के द्वारा

टाइफाइड (“ मोती झीरा”, मियादी बुखार”)

एंटी – टाइफाइड वैक्सीन

इंजेक्शन के द्वारा

ओरल - टाइफाइड वैक्सीन

मुख से

मीजल्स (“खसरा”) मम्प्स (“कनफेड़”) रूबैला

मीजल्स, मम्प्स, रूबैला (वैक्सीन

(एम्. एम्.आर. वैक्सीन)

इंजेक्शन के द्वारा

चिकन पॉक्स (“छोटी माता”)

चिकन पॉक्स वैक्सीन

इंजेक्शन के द्वारा

येल्लो फीवर

येल्लो फीवर वैक्सीन

इंजेक्शन के द्वारा

मेनिन्जइटीस (“दिमागी बुखार” ब्रेन फीवर”)

मेनिन्जइटीस वैक्सीन

इंजेक्शन के द्वारा

हैजा (“ कोलरा”)

कोलरा /हैजा वैक्सीन

इंजेक्शन के द्वारा

इन वैक्सीन  के अलावा, प्लेग, जेपनीज एन्केफेलाइटिस आदि के विरूद्ध भी वैक्सीन्स उपलब्ध हैं| तदापि इनका प्रयोग कुछ विशेष परिस्थितियों में केवल चिकित्सा की सलाह के अनुसार ही किया जाता है|

 

स्रोत: वालेंटरी हेल्थ एसोशिएशन ऑफ इंडिया/ जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची

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लकी Gurjar Nov 24, 2016 05:48 PM

आपके द्वारा दिया गया सभी उत्तर सही एवं सरल है हमको यह सब पढ़कर बहुत अभ्यास हुआ है हम आपका धन्यवाद करते हैं

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