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बाल स्वास्थ्य समस्याएं

बाल स्वास्थ्य का अर्थ गर्भधारण से जन्म और उसके बाद पांच साल की उम्र तक देखभाल है। पांच साल की उम्र के बाद बच्चों के स्वास्थ्य पर स्कूल स्वास्थ्य प्रोग्रामर टीम नजर रखती है। मातृ शिशु स्वास्थ्य के स्वास्थ्य कार्यकर्ता स्कूल स्वास्थ्य टीम के सदस्य हो भी सकते हैं और नहीं भी हो सकते हैं।

बाल स्वास्थ्य

बच्चों में निम्नलिखित समस्याएँ सामान्य रूप से पायी जाती हैं:

नवजात शिशुओं में पीलिया

नवजात शिशुओं में पीलिया की परिभाषा: पित्त के रोगन (बिलिरुबिन) द्वारा नवजात शिशु की चमड़ी तथा आंख के सफेद हिस्से (स्क्लेरी) पर पीले रंग के धब्बे। नवजात शिशुओं में एक हद तक पीलिया सामान्य बात है। यह लाल रक्त कोशिकाओं (जो रक्त में बिलिरुबिन छोड़ती हैं) के टूटने एवं नवजात के यकृत की अपरिपक्वता (जो बिलिरुबिन का प्रभावी तरीके से अपचय कर मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर फेंकने के लिए तैयार करने में असमर्थ होता है) के कारण होता है। नवजात शिशुओं में सामान्य पीलिया जन्म के दूसरे तथा पाँचवें दिन में उभरता है तथा समय के साथ समाप्त हो जाता है। नवजात शिशुओं में पीलिया निओनेटल हाइपरबिलिरुबिनेमिआ या नवजात का फिज़िओलॉजिक पीलिया भी कहा जाता है।

नवजात शिशु में पीलिया या निओनेटल जॉंन्डिस सामान्यतः हानि रहित होता है तथा आमतौर पर जन्म के दूसरे दिन के आसपास देखा जाता है। यह सामान्य प्रसूति में 8 दिनों तक जारी रह सकता है या समय पूर्व जन्म में लगभग 14 दिनों तक।

यह इसलिए होता है कि नवजात शिशु की यकृत बिलिरुबिन नामक रोगन को बाहर निकालने के लिए आवश्यक गति से कार्य नहीं कर पाता। बिलिरुबिन एक पीला रोगन है, जो लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने से बनता है तथा गुर्दों एवं यकृत द्वारा साफ किया जाता है। चूंकि यकृत तुलनात्मक रूप से अपरिपक्व होता है, वह इस रोगन से छुटकारा प्राप्त करने में असमर्थ होता है, जो इकट्ठा हो जाता है। फलस्वरूप यह त्वचा को पीला कर देता है। इसलिए यदि आप जन्म के दो दिनों बाद पीली त्वचा देखें तो घबराएं नहीं।

लक्षण

  • पीली त्वचा
  • पीला श्वेतपटल एवं नाखून
  • शिशु सामान्य से अधिक समय तक सोता है।

उपचार

  • यदि पीलिया हल्का हो तो यह 10 दिनों में अपने आप ठीक हो जाता है। लेकिन, इसकी गम्भीरता को कम करने के लिए उसका उपचार करना आवश्यक है |
  • अधिक बार बच्चे को स्तनपान कराएं |
  • सूर्य की सीधी रोशनी में रखें। यदि हो सके तो बच्चे का पलंग या झूला खिड़की पर पतला पर्दा डालकर उसके पास रखें |
  • उन्हें बिलि प्रकाश (एक प्रकाश उपचार युक्ति) में रखें यानि बिलिरुबिन को विभाजित करने के लिए उन्हें उच्च स्तर के रंगीन प्रकाश में रखें। सामान्यतः इस उद्देश्य के लिए नीले प्रकाश का उपयोग किया जाता है। बिलिरुबिन को विभाजित करने में हरा प्रकाश अधिक प्रभावी होता है। लेकिन सामान्यतः इसका उपयोग नहीं किया जाता क्योंकि शिशु बीमार दिखने लगता है |
  • गम्भीर अवस्थाओं में रक्त दिया जाता है |
  • हरे रोगन से मुक्ति के लिए यकृत को उत्तेजित करने हेतु विशिष्ट दवाओं का उपयोग करें।

ध्यान दें: यदि पीलिया 2 हफ्तों बाद भी जारी रहता है; तो नवजात शिशु का मेटाबॉलिक स्क्रीन गेलेक्टोसेमिया तथा कंजेनिटल हाइपोथाइरॉइडिज़्म के लिए जांच की जानी चाहिए। नवजात शिशु के वज़न के रुझान के साथ पारिवारिक इतिहास भी देखा जाना चाहिए। मल के रंग का आकलन भी किया जाना चाहिए।

कुछ रोचक तथ्य

  • एक सर्वेक्षण के मुताबिक पीलिया नवजात लड़कियों की तुलना में नवजात लड़कों को अधिक होता है। लेकिन यह बिलिरुबिन के उत्पादन की दर से सम्बद्ध नहीं है, जो कि नवजात लड़कियों के समान ही होता है |
  • हाल ही में फ्रांसीसी शोधकर्ताओं ने कहा है कि सूर्य की तेज़ रोशनी में रखने से त्वचा पर तिल हो जाएंगे। चिकित्सकीय शब्दावली में इन तिलों को मेलेनोसाइटिक नेवि कहा जाता है। अत: शोधकर्ता पालकों को सलाह देते हैं कि तेज़ रोशनी के उपचार के समय पर्याप्त सुरक्षा दें |
  • कुछ वर्ष पहले जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय ने सिद्ध किया था कि बिलिरुबिन रोगन, जो त्वचा को पीला कर देता है, एक शक्तिशाली ऑक्सिडेंट है। यह बच्चों की कोशिकाओं को नुकसान से बचाता है। इसलिए पीलिया कोशिकाओं के नुकसान के विरुद्ध एक रोध की तरह कार्य कर सकता है। लेकिन पीलिया के लिए उचित देखभाल की जानी चाहिए |
  • जन्म के बाद कुछ दिनों में बच्चे को पानी पिलाना नवजात में पीलिया की तीव्रता को बढ़ा देता है। इसलिए पानी देने के बजाय बच्चे को अधिक स्तनपान कराएं।

स्रोत : वन इंडिया

कम वजन

स्वस्थ और पुष्ट माताओं के गर्भ से पैदा होनेवाले शिशु का सामान्य वजन 3.5 किलोग्राम होता है। लेकिन भारतीय शिशुओं का औसत वजन 2.7 से 2.9 किलोग्राम तक होता है। शिशु के जन्म के एक घंटे के भीतर उसका वजन लेना बहुत जरूरी है। इससे शिशु के विकास और उसके जीवित रहने की संभावना की जानकारी मिलती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिशु के कम वजन को 2.5 किलोग्राम से कम तय किया गया है। शिशु का जन्म गर्भ के पूरे समय या समय से पहले हो सकता है। कम वजन के शिशुओं के दो प्रकार होते हैं-

  • समय से पहले जन्मा शिशु - वैसे शिशु, जो समय से पहले, जैसे गर्भधारण के 37वें सप्ताह में ही पैदा हो जाते हैं। समुचित देखभाल से जन्म से दो-तीन साल के भीतर उनका आंतरिक विकास, जैसे वजन, लंबाई या अन्य विकास, सामान्य हो सकता है।
  • असामान्य बच्चे (एसएफडी) - ऐसे शिशु समय पर या समय से पहले पैदा हो सकते हैं। उनका वजन सामान्य से बहुत कम होता है। यह भ्रूणावस्था में हुई गड़बड़ी के कारण होता है।

जन्म के समय कम वजन : समस्या की रोकथाम के उपाय

जन्मकालिक कम वजन के शिशुओं की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय किये गये हैं :

  • अच्छी प्रसवोत्तर  देखभाल
  • सभी गर्भवती महिलाओं का निबंधन और खतरे में पड़ी महिलाओं की पहचान
  • खान-पान में सुधार, संतुलित भोजन लेने के लिए प्रोत्साहित करना, पूरक पोषण की व्यवस्था, लोहे की फोलिक एसिड गोलियों का वितरण
  • मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों की पहचान और चिकित्सा
  • स्व-औषधि को हतोत्साहित करना
  • छोटे परिवार के लिए परिवार नियोजन के उपाय अपनाने को प्रोत्साहन, शिशुओं के जन्म में समुचित अंतर और गर्भधारण के लिए समय की पहचान को प्रोत्साहन।

कुपोषण

कुपोषण, कम या असंतुलित भोजन के कारण होता है। प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण सबसे गंभीर कुपोषण समस्या है।

  • पांच-छह महीने तक मांगने पर केवल स्तनपान
  • पांच-छह महीने तक स्तनपान के बाद पोषण से भरपूर खाद्य सामग्री, जैसे गाय का दूध, फल, गीला चावल, अन्य अनाज और दालों से पूरक
  • पूर्ण भोजन, जिसमें अनाज, दालें, सब्जियां, दूध और दूध के उत्पाद की व्यवस्था
  • बालिका शिशु के लिए समुचित और संपूर्ण आहार सुनिश्चित करना
  • गर्भधारण से पहले समुचित और पोषणयुक्त आहार
  • पोषण में किसी प्रकार की कमी की पहचान और उसका उचित उपचार

संक्रामक बीमारियां

बच्चों में कई प्रकार की संक्रामक बीमारियां आम हैं और इसके कारण उनकी मृत्यु दर काफी बढ़ जाती है। इनमें डायरिया, सांस लेने संबंधी गंभीर गड़बड़ी (एआरआइ), खसरा, पेट्रूसिस, डिप्थेरिया, पोलियो, टेटनस और यक्ष्मा।

दुर्घटनाएं और विषपान

घरों, सड़कों, स्कूलों आदि में व्याप्त खतरों के कारण बच्चों में दुर्घटनाएं और विषपान की घटनाएं काफी आम हैं। इनके कारण बच्चे जल जाते हैं, डूब जाते हैं, जहर खा लेते हैं, गिर जाते हैं, बिजली का झटका खाते हैं या सड़क दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं।

बाल स्वास्थ्य

बाल स्वास्थ्य का अर्थ गर्भधारण से जन्म और उसके बाद पांच साल की उम्र तक देखभाल है।  पांच साल की उम्र के बाद बच्चों के स्वास्थ्य पर स्कूल स्वास्थ्य प्रोग्रामर टीम नजर रखती है। मातृ शिशु स्वास्थ्य के स्वास्थ्य कार्यकर्ता स्कूल स्वास्थ्य टीम के सदस्य हो भी सकते हैं और नहीं भी हो सकते हैं।

बच्चे का स्वास्थ्य वास्तव में बालिका शिशु के जन्म के साथ शुरू होता है, जो बच्चों की भावी मां है। इसमें  भ्रूणावस्था में ही बालिका शिशु के स्वास्थ्य के प्रति सौतेला रवैया और प्रसव पूर्व बरती जानेवाली सावधानियों के दौरान नजर आता है। स्वास्थ्य देखभाल में जन्म से 28 दिन तक की अवधि शामिल की गयी है। शिशुओं की देखभाल एक से 12 महीने तक की जाती है। अबोध बच्चों में एक से दो साल तक के बच्चे आते हैं, जबकि स्कूल पूर्व में दो साल से अधिक के बच्चे शामिल किये गये हैं। बाल स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • सभी बच्चों को समुचित देखभाल और पोषण मिले |
  • उनके विकास और वृद्धि पर सतत निगरानी रखी जाये और किसी प्रकार की कमी आने पर तत्काल उसका इलाज किया जाये |
  • बीमारी का तत्काल पता लगाया जाये और हालत बिगड़ने से बचाने के लिए उसकी तत्काल चिकित्सा की जाये |
  • प्रशिक्षित व्यक्ति उनकी देखभाल करें |
  • मां और परिवार के अन्य लोगों को उनके बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल करने तथा उसे सुधारने के बारे में शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाये |

वृद्धि और विकास की निगरानी
बच्चों की वृद्धि और विकास पर सतत निगरानी रखना जरूरी है। यह बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति का संकेत करता है। इससे सामान्य वृद्धि व विकास में किसी प्रकार की रुकावट का तत्काल पता चलता है और उस पर परिवार या स्वास्थ्य केंद्र स्तर पर समय रहते ध्यान दिया जा सकता है।

बच्चे की वृद्धि
बच्चे की वृद्धि का मतलब उसके शारीरिक विकास से है, जिसे शरीर के वजन, लंबाई, सिर, बांह और छाती के व्यास से नापा जाता है। इन नापों की संदर्भ नाप से तुलना की जाती है और पता लगाया जा सकता है कि बच्चे की वृद्धि सामान्य है या नहीं (इसमें ऊपर या नीचे दो का अंतर स्वीकार्य है)।

सामान्यतौर पर स्वस्थ और सुपोषित शिशु अपने जीवन के पहले साल के दौरान सबसे तेज गति से बढ़ता है।

वजन
लगभग सभी शिशुओं का वजन जन्म के तीन-चार दिन के दौरान कम होता है। फिर वे सात से 10 दिन के दौरान वजन दोबारा हासिल करने लगते हैं। पहले तीन महीने के दौरान उनका वजन 25 से 30 ग्राम प्रतिदिन की दर से बढ़ता है और बाद में इसमें कमी आ जाती है। सामान्यतौर पर शिशु पांच महीने में अपना वजन दोगुना और एक साल में तिगुना कर लेते हैं। जन्म के समय कम वजन वाले शिशु इसके अपवाद हैं।
जन्म के समय कम वजन वाले शिशु पहले ही अपना वजन दोगुना और एक साल में चार गुना कर लेते हैं। एक साल के बाद यह गति उतनी तेज नहीं रहती है। अनेक शिशुओं का वजन चक्र पहले पांच से छह महीने में काफी अच्छा रहता है, जब उनका वजन जन्म के समय के मुकाबले दोगुना हो जाता है। लेकिन इसके बाद वजन वृद्धि का चक्र नीचे गिरने लगता है या अनियमित हो जाता है। यह इसलिए होता है, क्योंकि स्तनपान ही शिशु के लिए पर्याप्त नहीं होता। स्तनपान की कमी को पहले बताये गये खाद्य सामग्री से पूरा किया जाना चाहिए।
बच्चों का वजन उनकी लंबाई पर भी निर्भर करता है। यह जांचना बहुत आवश्यक है कि बच्चे का वजन सामान्य है या नहीं। बच्चे का वजन उसकी लंबाई के अनुरूप कम या अधिक हो सकता है। लंबाई के कारण वजन कम होना कुपोषण का संकेत करता है।

लंबाई
बच्चे की लंबाई उसकी वृद्धि का एक और पैमाना है। नवजात शिशु की लंबाई 50 सेंटीमीटर होती है। पहले साल इसमें 25 सेंटीमीटर की वृद्धि होती है। दूसरे साल 12 सेंटीमीटर और तीसरे, चौथे तथा पांचवें साल इसमें क्रमशः नौ, सात और छह सेंटीमीटर की वृद्धि होती है।

सिर और छाती का व्यास
जन्म के समय सिर का व्यास करीब 34 सेंटीमीटर होता है। छह से नौ महीने के बाद छाती का व्यास बढ़ जाता है और यह सिर के व्यास से अधिक हो जाता है। यदि बच्चा कुपोषित है, तो छाती का व्यास तीन-चार साल तक सिर के व्यास को पार नहीं करता है।

मध्य बांह का व्यास
बांह के ऊपरी हिस्से के बीच को उस समय नापा जाता है, जब वह शरीर के दोनों तरफ झूल रहा होता है। फीते को मांसपेशियों को दबाये बिना उसके चारों तरफ लपेटा जाता है और फिर उसका नाप लिया जाता है। जन्म से लेकर एक साल तक इसमें तेजी से वृद्धि होती है। यह वृद्धि 11 से 12 सेंटीमीटर तक की होती है। अच्छी तरह से पोषित बच्चों की बांह का व्यास पांच साल तक 16 से 17 सेंटीमीटर पर स्थिर रहता है। इस अवधि में जन्म के समय की चर्बी के स्थान पर मांसपेशियां बनती हैं। सामान्य से 80 प्रतिशत कम, यानी करीब 12.8 सेंटीमीटर का नाप भयंकर कुपोषण का संकेत करता है।

स्तनपान

मां का दूध केवल पोषण ही नहीं, जीवन की धारा है। इससे मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है

स्तनपान के लाभ

मां का दूध केवल पोषण ही नहीं, जीवन की धारा है। इससे मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

  • आपको अपने शिशु को पहले छह महीने तक केवल स्तनपान पर ही निर्भर रखना चाहिए। यह आपके शिशु के जीवन के लिए जरूरी है, क्योंकि मां का दूध सुपाच्य होता है और इससे पेट की गड़बड़ियों की आशंका नहीं होती। मां का दूध शिशु की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक होता है।
  • स्तनपान से दमा और कान की बीमारी पर नियंत्रण कायम होता है, क्योंकि मां का दूध शिशु की नाक और गले में प्रतिरोधी त्वचा बना देता है।
  • कुछ शिशु को गाय के दूध से एलर्जी हो सकती है। इसके विपरीत मां का दूध शत-प्रतिशत सुरक्षित है।
  • शोध से प्रमाणित हुआ है कि स्तनपान करनेवाले बच्चे बाद में मोटे नहीं होते। यह शायद इस वजह से होता है कि उन्हें शुरू से ही जरूरत से अधिक खाने की आदत नहीं पड़ती।
  • स्तनपान से जीवन के बाद के चरणों में रक्त कैंसर, मधुमेह और उच्च रक्तचाप का खतरा कम हो जाता है।
  • स्तनपान से शिशु की बौद्धिक क्षमता भी बढ़ती है। इसका कारण यह है कि स्तनपान करानेवाली मां और उसके शिशु के बीच भावनात्मक रिश्ता बहुत मजबूत होता है। इसके अलावा मां के दूध में कई प्रकार के प्राकृतिक रसायन भी मौजूद होते हैं।
  • नयी माताओं द्वारा स्तनपान कराने से उन्हें गर्भावस्था के बाद होनेवाली शिकायतों से मुक्ति मिल जाती है। इससे तनाव कम होता है और प्रसव के बाद होनेवाले रक्तस्राव पर नियंत्रण पाया जा सकता  है।
  • स्तनपान करानेवाली माताओं को स्तन या गर्भाशय के कैंसर का खतरा न्यूनतम होता है। स्तनपान एक प्राकृतिक गर्भनिरोधक है।
  • स्तनपान सुविधाजनक, मुफ्त (शिशु को बाहर का दूध पिलाने के लिए दुग्ध मिश्रण, बोतल और अन्य खर्चीले सामान की जरू रत होती है) और सबसे बढ़ कर माँ तथा शिशु के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत करने का सुलभ साधन है। मां के साथ शारीरिक रू प से जुड़े होने का एहसास शिशुओं को आरामदायक माहौल देता है।

शिशु को स्तनपान कराना कब शुरू करें

शिशु जन्म को फौरन बाद स्तनपान शुरू  कर देना चाहिए। जन्म के तत्काल बाद नग्न शिशु को (उसके शरीर को कोमलता से सुखाने के बाद) उसकी मां की गोद में देना चाहिए। मां उसे अपने स्तन के पास ले जाये, ताकि त्वचा से संपर्क हो सके। इससे दूध का बहाव ठीक होता है और शिशु को गर्मी मिलती है। इससे मां और शिशु के बीच भावनात्मक संबंध विकसित होता है।

स्तनपान जल्दी क्यों

इसके चार प्रारंभिक कारण हैं -

  • शिशु पहले 30 से 60 मिनट के दौरान सर्वाधिक सक्रिय रहता है।
  • उस समय उसके चूसने की शक्ति सबसे अधिक रहती है।
  • जल्दी शुरू करने से स्तनपान की सफलता की संभावना बढ़ जाती है। स्तन से निकलनेवाला पीले रंग का द्रव, जिसे कोलोस्ट्रम कहते हैं, शिशु को संक्रमण से बचाने और उसकी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने का सबसे अच्छा उपाय है। यह एक टीका है।
  • स्तनपान तत्काल शुरू करने से स्तनों में सूजन या प्रसवोत्तर रक्तस्राव की शिकायत नहीं होती।

शल्यचिकित्सा से शिशु जन्म देनेवाली माताएं भी करा सकती स्तनपान

यह शल्य क्रिया सफल स्तनपान की आपकी क्षमता पर असर नहीं डालती है।

  • शल्य क्रिया के चार घंटे बाद या एनीस्थीसिया के प्रभाव से बाहर आने के बाद आप स्तनपान करा सकती हैं।
  • स्तनपान कराने के लिए आप अपने शरीर को एक करवट में झुका सकती हैं या फिर अपने शिशु को अपने पेट पर लिटा कर स्तनपान करा सकती हैं।
  • सीजेरियन विधि से शिशु को जन्म देनेवाली माताएं पहले कुछ दिन तक बाहरी मदद से अपने शिशु को सफलतापूर्वक स्तनपान करा सकती हैं।

शिशु को स्तनपान कब तक

साधारणतया कम से कम छह महीने तक शिशु को स्तनपान कराना चाहिए और उसके बाद दो साल या उसके बाद तक भी स्तनपान कराया जा सकता है।

शिशु को दूध पिलाने के बाद स्तन से दूध टपकता है। क्या करना चाहिए ?

  • यह एक अस्थायी समस्या है और सामान्य बात है।
  • यदि आप दूध टपकता हुआ देखें, तो अपनी बाँह से अपने स्तनों के किनारे दबायें। इससे टपकने की गति कम होगी।

माता के बीमार होनेपर भी शिशु को स्तनपान कराना जरूरी

हां। आमतौर पर साधारण बीमारियों से स्तनपान करनेवाले शिशु को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। यहां तक कि टायफायड, मलेरिया, यक्ष्मा, पीलिया और कुष्ठ रोग में भी स्तनपान पर रोक लगाने की सलाह नहीं दी जाती है।

सुन्नत

लड़के के लिंग के ऊपर एक त्वचा होती है जिसे खलड़ी (फोरस्किन) कहते हैं। सुन्नत में इस त्वचा को शल्य चिकित्सा से निकाल दिया जाता हो जिससे लिंग का सिरा खुला रहता है।

  • यह अच्छा होता है कि जन्म के 2 से 3 सप्ताह के भीतर सुन्नत करा लिया जाए क्योंकि जैसे जैसे बच्चा बढ़ता जाता है, जटिलताएं भी बढ़ती जाती हैं। सामान्यतः पहले 10 दिन के भीतर (अक्सर पहले 48 घंटों के भीतर) बच्चों का सुन्नत करा लिया जाता है।
  • समय से पहले पैदा हुआ बच्चा या ऐसे बच्चे जिनमें अन्य कोई जटिलताएं पायी जाती है, उनका सुन्नत तब तक नहीं किया जाता जब तक कि उनकी अस्पताल से छुट्टी नहीं हो जाती।
  • ऐसे बच्चे जिनके लिंग में असामान्यता हो और जिसे शल्य चिकित्सा से ठीक कराया जाना हो, उनका सुन्नत नहीं किया जाता क्योंकि खलड़ी (फोरस्किन) के उपयोग की आवश्यकता लिंग को ठीक करते समय पड़ सकती है।

सुन्नत लिंग की देख-भाल

  • जब भी आप ऐसे बच्चों को नहला रहे हों, गर्म पानी और साबुन से इसे अच्छी तरह धोएं।
  • बहुत ही धीरे-धीरे इसे धोएं क्योंकि सुन्नत के बाद बच्चे को थोड़ी तकलीफ हो सकती है।
  • कटे भाग पर यदि कोई पट्टी लगी हो तो आवश्यकता पड़ने पर उसे निकालकर नयी पट्टी बांध दें।
  • घाव को सूखने में 7 से 10 दिन लग सकता है। तब तक लिंग का आगे वाला हिस्सा कच्चा या पीले रंग का होगा। डॉक्टर से परामर्श करें जब-
  • खून बंद न हो रहा हो
  • लिंग के आगे वाला भाग लाल हो और 3 दिन के बाद स्थिति खराब हो रही हो
  • बुखार हो
  • संक्रमण हो जैसे कि पीव लिया हुआ फफोला
  • सुन्नत के 6 से 8 घंटे के भीतर सामान्यतः पेशाब न कर रहा हो

मधुमेह

मधुमेह एक ऐसी बीमारी है जिसमें रक्त शर्करा (ग्लूकोज़) की मात्रा अत्यधिक हो जाती है क्योंकि शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन तैयार नहीं कर पाता।

इंसुलिन अग्न्याशय(पैनक्रियाज) से निकलने वाला हार्मोन है। इंसुलिन रक्त में शर्करा (ग्लूकोज़) की मात्रा को नियंत्रित करता है

मधुमेह के प्रकारः
मधुमेह वाले एक बच्चे में शर्करा का स्तर काफी अधिक होता है क्योंकि अग्न्याशय(पैनक्रियाज) या तो बहुत ही कम इंसुलिन तैयार करता है या फिर बिल्कुल नहीं (टाइप-1 मधुमेह जिसे आरंभ में बच्चों का आरंभिक मधुमेह कहा जाता था) या फिर उसका शरीर तैयार इंसुलीन के प्रति असंवेदशील होता है (टाइप-2 मधुमेह)
टाइप 1 मधुमेह बचपन में किसी भी समय हो सकता है, यहां तक कि शैशव अवस्था में भी लेकिन सामान्यतः यह 6 से 13 वर्ष की आयु के भीतर होता है। टाइप 2 मधुमेह किशोर बच्चों में होता है लेकिन यह अधिकतर अधिक वजन वाले या मोटापा लिए हुए बच्चों में अधिक पाया जाता है।

टाइप 2 का मधुमेह किन बच्चों में अधिक पाया जाता है?
ऐसे बच्चों या वयस्क बच्चों में कुछ भी खाने से पहले रक्त शर्करा की जांच हर दो वर्ष में एक बार 10 वर्ष की आयु से की जानी चाहिए जिनमें निम्नलिखित लक्षण पाए जाते हों:

  • अधिक वजन वाले बच्चे (एक समान आयु, लिंग और ऊंचाई वाले बच्चे के वजन से 85% वजन अधिक हो या ऊंचाई के अनुपात में आदर्श वजन से 120% वजन अधिक हो)।
  • उसके किसी निकटतम संबंधी को टाइप 2 मधुमेह हो।
  • उसका रक्त चाप (ब्लड प्रेशर) अधिक हो, रक्त लिपिड (वसा) (फैट) का स्तर अधिक हो |

किशोरावस्था और मधुमेहः
किशोरावस्था के बच्चों में रक्त शर्करा स्तर को नियंत्रित करने में विशेष समस्या आती है क्योंकिः

  • यौवनारंभ के समय में हार्मोनी परिवर्तन होता है
  • किशोरावस्था की जीवन शैली- समकक्ष आयु वालों का दबाव, बढ़ती हुई गतिविधियां,
  • अनियमित जीवन-शैली व अपने शारीरिक छवि के बारे में चिंता या खान-पान में अनियमितता
  • शराब व सिगरेट का प्रयोग

लक्षणः
टाइप 1 के मधुमेह के लक्षण शीघ्र दिखने लगते हैं। सामान्यतः 2 से 3 सप्ताह या उससे भी कम समय में लक्षण उभर कर आते हैं और यह लक्षण काफी स्पष्ट होते हैं। उच्च रक्त शर्करा के स्तर के कारण बच्चा बार-बार पेशाब के लिए जाता है। इस प्रकार शरीर से तरल पदार्थ के निकल जाने से प्यास बढ़ने लगती है और वह अधिक पानी पीने लगता है। किसी-किसी बच्चे के शरीर में पानी की कमी हो जाती है तथा वह कमजोरी महसूस करने लगता है या वह आलसी हो जाता है या फिर उसके पल्स बहुत तेजी से चलने लगते हैं। कभी कभी तो उसे साफ साफ दिखाई भी नहीं देता।
टाइप 2 मधुमेह वाले बच्चों में यह लक्षण टाइप 1 की तुलना में कुछ कम होते हैं और यह धीरे-धीरे विकसित होता है। इसके लक्षण दिखने में कई सप्ताह या कभी-कभी महीने लग जाते हैं। मां-बाप को यह दिखने लगता है कि बच्चे को प्यास अधिक लगने लगती है और वह बार-बार पेशाब के लिए जा रहा है या थकावट जैसी हल्के लक्षण दिखने लगते हैं। टाइप 2 मधुमेह के कुछ विशेष बच्चों में किटो एसिडोसिस या शरीर में पानी की मात्रा में भारी कमी के लक्षण दिखाई नहीं पड़ते हैं।

दमा

दमा फेफड़े की सूजन की एक आवर्ती स्थिति होती है जिसमें कुछ विशेष उत्तेजक कारक (उत्तेजक कारक) वायुमार्गों में सूजन पैदा कर उन्हें अस्थायी तौर पर संकीर्ण कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप साँस लेने में कठिनाई होती है |

  1. दमा के उत्तेजक कारक में धूम्रपान, इत्र, पराग, मिट्टी, धूल के कण, और विषाणू संक्रमण शामिल हैं |
  2. घरघराहट, खांसी, सांस की तकलीफ, सीने में जकड़न, और सांस लेने में कठिनाई दमा के लक्षण हैं |
  3. इसका निदान बच्चे को बार-बार होने वाली घरघराहट पर आधारित है और परिवार के दमा के इतिहास पर |
  4. दमा से ग्रस्त सर्वाधिक बच्चे विकार को विकसित करते है।
  5. इसके उत्तेजक कारक से बचकर दमा से बचा जा सकता है |
  6. उपचार में ब्रॉंकॉर्डिलेटर्स तथा साँस द्वारा लिए जाने वाले कॉर्टिकॉस्टेरॉइड्स शामिल है |

यद्यपि दमा किसी भी उम्र में विकसित हो सकता है, सबसे अधिक यह बच्चों में विकसित होता है, विशेष रूप से जीवन के पहले 5 साल में | कुछ बच्चों को वयस्क आयु तक दमा जारी रहता है | अन्य बच्चों में दमा ठीक हो जाता है | दमा हाल के दशकों में अधिक आम हो गया है, शहरी बच्चों में से कुछ आबादियों के बीच इसकी दर 25% से 40% तक अधिक होती है | दमा बच्चों के अस्पताल में भर्ती किए जाने का प्रमुख कारण है और प्राथमिक विद्यालय से बच्चों की अनुपस्थिति के लम्बे समय से चले आ रहे कारणों में से एक है | दमा से ग्रस्त अधिकांश बच्चे बचपन की सामान्य गतिविधियों में भाग लेने में सक्षम होते हैं, सिवाय इसका दौरा उठने के समय को छोड़कर | बच्चों की एक छोटी संख्या को मध्यम या गंभीर दमा होता है और उन्हें खेल और सामान्य गतिविधियों में संलग्न करने के लिए दैनिक निवारक दवाएं लेने की जरूरत होती है | अज्ञात कारणों से, दमा से ग्रस्त बच्चे कुछ विशेष कारकों (उत्तेजक कारक) पर प्रतिक्रिया देते हैं, जैसी कि बगैर दमा के बच्चे नहीं देते हैं | संभावित रूप से कई उत्तेजक कारक हैं, और अधिकांश बच्चे सिर्फ कुछ पर ही प्रतिक्रिय करते हैं |कुछ बच्चों में, दौरा उठने के विशेष उत्तेजक कारक की पहचान नहीं हो पाती है |

इन सभी उत्तेजक कारक का नतीज़ा एक समान प्रतिक्रिया में होता है | वायुमार्ग में कुछ कोशिकाएं रासायनिक पदार्थ उत्सर्जित करती है | ये पदार्थ वायुमार्ग में सूजन पैदा कर देते हैं और वायुमार्ग की दीवारों में मांसपेशियों की कोशिकाओं को संकुचन के लिए उत्तेजित करते हैं | इन रासायनिक पदार्थों द्वारा दोहराई जाने वाली उत्तेजना के कारण वायुमार्ग में बलगम उत्पादन बढ़ता है, वायुमार्ग अस्तर की कोशिकाओं का कटाव होता है, और वायुमार्ग की दीवारों में मांसपेशियों की कोशिकाओं के आकार में वृद्धि हो जाती है | इन प्रतिक्रियाओं में से प्रत्येक वायुमार्ग को अचानक कम करने में योगदान देता है (दमा का दौरा), अधिकांश बच्चों में दमा के दौरों के बीच वायुमार्ग सामान्य अवस्था में लौट आते हैं |

दमा के आम कारक

उत्तेजक कारक

उदाहरण

प्रत्यूर्जातोत्पादक पदार्थ

धूली कण या घर घून , मिट्टी, बाहरी पराग, पशुओं की रूसी, तिलचट्टे का मल और पंख

व्यायाम

ठंडी हवा का सामना

संक्रमण

श्वसन विषाणू और आम सर्दी

प्रकोपक पदार्थ

तम्बाकू का धूवा,इत्र,लकडी का धुआ,सु गंधी मोमबत्ती,बाहरी वायु प्रदूषण,मजबूत गंध,  और परेशान करने वाला धुआ।

अन्य

चिंता,क्रोध,उत्साह जैसे भावनाए,एस्पिरिन और  गैस्ट्रोइसोफ्याजियल प्रतिवाह

क्या आपको मालूम था? धूल के एक दाग में धूल के 40,000 कण हो सकते हैं, जो दमा के प्रमुख उत्तेजक कारक होते हैं?

जोखिम कारक

चिकीत्सक पूरी तरह से नहीं समझ पाते हैं की कुछ बच्चों मे दमा क्यों विकसित होता है, लेकिन जोखिम के कई कारकों की पहचान की गई है :-

  • एक बच्चा जिसके माता या पिता को दमा हो, उसे दमा होने का 25% जोखिम होता है. यदि माता-पिता दोनों को दमा हो, तो जोखिम 50% बढ़ जाता है |
  • जिन बच्चों की माताओं ने गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान किया हो उन्हें दमा विकसित होने की अधिक संभावना होती है |
  • दमा माता से सम्बन्धित अन्य कारकों से भी जोडा गया है, जैसे कि युवा मातृ आयु, अनुचित मातृ पोषण और स्तनपान की कमी |
  • समय से पूर्व जन्म और जन्म के समय कम वजन भी जोखिम कारक हैं |
  • शहरी वातावरण में रह रहे बच्चों में दमा विकसित होने की अधिक सम्भावना होती है, विशेष रूप से अगर वे निम्न सामाजिक-आर्थिक समूहों के हों | हालांकि यह पूरी तरह से समझा नहीं गया है, यह माना जाता है कि गरीबी, उत्तेजक कारक का सामना होने की अधिक सम्भावना, तथा स्वास्थ्य देखभाल सुविधा की कमी इन समूहों में दमा होने में अधिक योगदान देते हैं |
  • जो बच्चे एलर्जी के कारकों, जैसे कि धूल के कण या तिलचट्टे के मल का अधिक सान्द्रता में, कम आयु में सामना करते हैं, उन्हें दमा विकसित होने की अधिक संभावना होती है |
  • जिन बच्चों को कम उम्र में ब्रॉंकाइटिस होता है, वे विषाणू संक्रमण के साथ अक्सर घरघराहट कर सकते हैं , हो सकता है कि पहले ऐसी घरघराहट को दमा समझा जाए, लेकिन किशोरावस्था के दौरान ऐसे बच्चों को अन्यों की तुलना में दमा होने की अधिक संभावना नहीं होती है |

लक्षण

  • दमा के दौरे में वायुमार्ग संकीर्ण हो जाते हैं और बच्चे को साँस लेने में कठिनाई होती है, सीने में जकड़न और खाँसी होती है, और विशेष रूप से ऐसा घरघराहट के साथ होता है |
  • जब बच्चा सांस बाहर छोडता है तो घरघराहट एक अनिमेष ध्वनि के रूप में सुनाई देती है |
  • दमा के सभी दौरों में घरघराहट नहीं होती है, तथापि, हल्के दमा में, विशेष रूप से बहुत छोटे बच्चों में, इसके कारण केवल खाँसी ही हो सकती है | हल्के दमा के साथ कुछ बड़े बच्चों को केवल व्यायाम करते समय या ठंडी हवा के संपर्क में आने पर खाँसी हो सकती है | इसके अलावा, अत्यंत गंभीर दमा के साथ बच्चों को घरघराहट नहीं हो सकती है क्योंकि वायुप्रवाह बहुत कम हो जाता है जिससे ध्वनि नहीं हो पाती. एक गंभीर दौरे के समय, साँस लेने में मुश्किल स्पष्ट दिखाई देती है |
  • घरघराहट आमतौर पर तेज़ हो जाती है, बच्चा अधिक तेज़ी से और अधिक प्रयास के साथ साँस लेता है, और जब बच्चा अन्दर सांस लेता है तो पसलियों बाहर निकल आती हैं.
  • बहुत गंभीर दौरा पडने पर, बच्चा साँस लेने के लिए हाँफता है और सीधा बैठ कर आगे की ओर झुकता है. त्वचा पसीनायुक्त तथा पीली या नीले रंग की हो जाती है.
  • लगातार गंभीर दौरे पडने पर कभी-कभी बच्चों का विकास धीमा हो जाता है, लेकिन आमतौर पर वयस्कता तक उनका विकास अन्य बच्चों के बराबर हो जाता है |

निदान

  • एक चिकित्सक को उन बच्चों में दमे का सन्देह होता है जिनको बार-बार घरघराहट हुई हो, खासकर तब जबकि परिवार के सदस्यों को दमा या एलर्जी होना ज्ञात हो |
  • चिकीत्सक आमतौर पर क्ष-किरण करवाते हैं, और वे कभी-कभी कारणों का निर्धारण करने के लिए एलर्जी परीक्षण कराते हैं |
  • अक्सर घरघराहट होने वाले बच्चों का अन्य विकारों के लिए परीक्षण किया जा सकता है, जैसे कि सिस्टिक फाइब्रोसिस या गैस्ट्रोइसोफैजिअल रिफ्लक्स |
  • कभी-कभी बड़े बच्चों का पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (PFT) किया जाता है, हालांकि अधिकांश बच्चों में, पल्मोनरी फंक्शन दौरों के बीच सामान्य होता है |
  • बड़े बच्चों या किशोरों, जिनको दमा होना ज्ञात हो, वायुमार्ग में अवरोध को मापने के लिए अक्सर एक पीक फ्लो मीटर (एक छोटा सा उपकरण है जो यह रिकॉर्ड कर सकता है कि व्यक्ति कितनी तेजी से सांस बाहर छोड सकता है) का उपयोग किया जाता है | एक दौरे या दौरों के बीच बच्चे की स्थिति का आकलन करने के लिए चिकीत्सक व माता-पिता इस माप का उपयोग कर सकते हैं | जिन बच्चों को दमा होना ज्ञात हो, उनमें दौरा पडने के दौरान तब तक क्ष-किरण नहीं किया जाता जब तक कि चिकीत्सक को निमोनिया या एक संकुचित फेफड़ों जैसे किसी और विकार का सन्देह न हो |

निवारण

  • ग्रस्त है उनमे यह अवस्था विकसित होती है। जिन्हे अधिक गंभीर बीमारी है उन वयस्कों मे दमा की संभावना अधिक होती है | दृढ़ता और पतन के लिए अन्य जोखिम वाले कारकों महिला लिंग, धूम्रपान, एक छोटी उम्र में दमा विकसित होना, और घर के धूल के कण के लिए संवेदनशीलता शामिल हैं |
  • भड़क अप अक्सर से बचने जो भी एक विशेष बच्चे के हमलों से चलाता है द्वारा रोका जा सकता है | एलर्जी से ग्रस्त बच्चों के माता पिता को यह सलाह दि जाती है की पंख तकियों, कालीनों, पर्दे, असबाबवाला फर्नीचर, खिलौने भरवां, और बच्चे के कमरे से अन्य संभावित धूल के कण को बच्चे के कमरे से हटा दिये जाए।
  • धूम्रपान का धुआ अक्सर दमा से ग्रस्त बच्चों में लक्षणों को बिगड़ता है, इसलिए यह महत्वपूर्ण है उन क्षेत्रों में जहाँ बच्चे समय बिताते है में धूम्रपान को समाप्त किया जाए ।
  • यदि एक विशेष प्रत्यूर्जातोत्पादक पदार्थ टाला नहीं जा सकता तो चिकीत्सक के पास एलर्जी शॉट्स का उपयोग करके बच्चे को असंवेदनशील बनाने की कोशिश की, दमा के लिए एलर्जी शॉट्स के लाभ नहीं जाना जाता है
  • क्योंकि व्यायाम तो एक बच्चे के विकास के लिए महत्वपूर्ण है, चिकीत्सक आमतौर पर बच्चों के शारीरिक गतिविधियों, व्यायाम, और खेल की भागीदारी बनाए रखने के लिए और व्यायाम अगर जरूरत से ठीक पहले एक दमा दवा का उपयोग प्रोत्साहित करते हैं.

चिकीत्सा

गंभीर दौरे की निम्नलिखीत चिकीत्सा
वायुमार्ग खोलना (bronchodilation)
सूजन रोकना

  • अनेक प्रकार की श्वास मार्ग द्वारा ली जाने वाली दवाइया श्वासमार्ग खोलती है। वयस्क बच्चों और किशोरों को आमतौर पर दवाइ की खुराक श्वसन यंत्र का उपयोग कर ले सकते हैं | 8 साल से छोटे बच्चे अक्सर स्पेसर या संलग्न चैम्बर जोत के साथ एक श्वसन यंत्र का उपयोग करना आसान समझते है |
  • शिशुओं और युवा बच्चे कभी कभी एक श्वसन यंत्र और स्पेसर का उपयोग कर सकते है यदि एक शिशु के आकार का मुखौटा संलग्न कर सकता है | जो इनहेलर का उपयोग नहीं कर पाते वे घर पर एक एक छिटकानेवाला, एक छोटा सा उपकरण है, जो संपीड़ित हवा का उपयोग करके दवा के एक धुंध बनाता से जुड़े मुखौटा के माध्यम से साँस दवा प्राप्त कर सकते हैं | इनहेलर और nebulizers समान रूप से भी मुँह से लिया जा सकता है दवा देने में प्रभावी रहे हैं, हालांकि इस मार्ग साँस लेना कम से अधिक प्रभावी है और आमतौर पर केवल शिशुओं में प्रयोग किया जाता है जो एक छिटकानेवाला नहीं है, मध्यम तेज हमलों के साथ बच्चे को मुंह से corticosteroids दिया हो सकता है |
  • बच्चे मे गंभीर दौरा आने पर उसे अस्पताल मे ब्रोंकोडायलेटर दवाइया नेबुलाइजर या श्वसन यंत्र द्वारा कम से कम 20 मिनट तक दिये जाते है। कभी कभी चिकीत्सक बच्चो मे गंभीर दौरा आने पर यदी श्वास द्वारा दी गई दवाईया प्रभावी नही है तो इंजेक्शन एपिनेफ्रीन का उपयोग करते है। में बहुत गंभीर हमलों के साथ अगर साँस दवाओं प्रभावी नहीं हैं. चिकीत्सक आमतौर पर गंभीर दौरा आने पर बच्चों को शिरा द्वारा corticosteroids देते है।
  • जिन बच्चो मे हल्का दौरा आता है या कभी कभी आता है वे आमतौर पर औषधी दौरा आने पर ही लेते है।जिन बच्चो मे हमेशा और गंभीर दौरे आते है उन्हे दौरा न आने पर भी औषधी लेनी पडती है। विभिन्न औषधी आवृत्ति और हमलों की गंभीरता के आधार पर ली जाती है।जिन बच्चो मे हमेशा दौरे नही आते और जो बहुत गंभीर नही होते उन्हे आमतौर पर कम मात्रा मे श्वास द्वारा corticosteroid प्रतिदीन लेना पडता है ताकी दौरो से बचा जा सके।यह दवाइया वायुमार्ग को उत्तेजित करने वाले रासायनिक पदार्थों के अवरोध से सूजन को कम करते है।
  • औषधी मात्रा को बढ़ाया या कम किया जाता है ताकी बच्चे के दमा के लक्षणों पर इष्टतम नियंत्रण पाया जा सके और गंभीर दौरे से बचा जा सके है यदी औषधी से गंभीर दौरे रोके नही जाते तो बच्चों को मुंह से corticosteroids लेने की जरूरत होती है. जो बच्चे व्यायाम के समय दौरे का अनुभव करते है वे आमतौर पर bronchodilator की एक खुराक व्यायाम से पहले लेते है।
  • दमा यह दीर्घकालिक स्थिति है जिसमे अनेक प्रकार की चिकीत्सा होती है चिकीत्सक माता पिता और बच्चों के साथ काम करते है ताकि  उन्हे सारी स्थिति अच्छी तरह से समझा सके।.
  • माता पिता और चिकीत्सक ने स्कूल के शिक्षकों और दूसरों को बच्चे की हालत और दवाओं के बारे सूचित करना चाहिए. कुछ बच्चों को स्कूल में जरुरत पडने पर इनहेलर का उपयोग करने की अनुमति दी जा सकती और दूसरों को स्कूल चिकित्सक की देखरेख के द्वारा किया जाना चाहिए |

तीव्र लिम्फोसाईटिक ल्यूकेमिया

ल्युकेमिआ एक प्राणघातक रोग है जिसमें सामान्य तौर पर लिम्फोसाइट्स के रूप में विकसित होने वाली कोशिकाएं कैंसरजन्य हो जाती हैं और अस्थि मज्जा में सामान्य कोशिकाओं को तेजी से विस्थापित करती है |

तीव्र लिम्फोसाइटिक ल्युकेमिआ क्या है?

  • ल्युकेमिआ एक प्राणघातक रोग है जिसमें सामान्य तौर पर लिम्फोसाइट्स के रूप में विकसित होने वाली कोशिकाएं कैंसरजन्य हो जाती हैं और अस्थि मज्जा में सामान्य कोशिकाओं को तेजी से विस्थापित करती हैं |
  • तीव्र लिम्फोसाइटिक ल्युकेमिआ (ए.एल.एल) सभी उम्र के लोगों में होता है, लेकिन बच्चों में आम होता है, 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों में होने वाले सभी प्रकार के कैंसरों में इसकी संख्या 25% होती है |
  • यह अक्सर 2 से 5 साल के बीच की आयु के बच्चों को प्रभावित करता है. यह 45 से अधिक आयु के वयस्कों में कुछ अधिक आम है |
  • इस मामले में बहुत अपरिपक्व ल्युकेमिआ कोशिकाएं अस्थि मज्जा में संचित होकर, सामान्य रक्त कोशिकाएं उत्पन्न करने वाली कोशिकाओं को नष्ट व विस्थापित कर देती हैं. ल्युकेमिआ कोशिकाएं रक्तधारा के माध्यम से यकृत, प्लीहा, लिम्फ नोड्स, मस्तिष्क तथा अंडकोषों में भी पहुंचती हैं जहां ये विकसित तथा विभाजित होना जारी रख सकती हैं | ये मस्तिष्क तथा मेरुदंड को ढकने वाले ऊतक की परतों में जलन पैदा कर सकते हैं, जिससे सूजन (मैनिंजाइटिस) हो सकता है, और रक्ताल्पता, यकृत और वृक्क की विफलता है, तथा अन्य अंगों को नुकसान कर सकती हैं |

लक्षण और निदान

  • प्रारंभिक लक्षण अस्थि मज्जा द्वारा पर्याप्त रक्त कोशिकाओं के उत्पादन की असमर्थता का परिणाम होते है |
  • बुखार और अत्यधिक पसीना, जो संक्रमण दर्शा सकते हैं, सफेद रक्त कोशिकाओं की अत्यंत कमी के परिणामस्वरूप होते हैं, कमजोरी, थकान, और पीलापन, जो एनीमिया का संकेत होते हैं, लाल रक्त कोशिकाओं की अत्यंत कम संख्या के परिणामस्वरूप होते है |
  • आसानी से चोट लगकर खून बहना, कभी-कभी नाक से खून आने या मसूड़ों से खून बहने के रूप में, प्लेटलेट्स की अत्यंत निम्न संख्या का परिणाम होता है. मस्तिष्क में ल्युकेमिआ कोशिकाएं सिर दर्द, उल्टी और चिड़चिड़ापन कर सकती हैं, और अस्थि मज्जा में ल्युकेमिआ कोशिकाएं हड्डी और जोड़ों का दर्द उत्पन्न कर सकती हैं. पेट भरा होने का एहसास और कभी-कभी दर्द हो सकता है जब ल्युकेमिआ कोशिकाएं यकृत और प्लीहा का आकार बढा देती हैं |
  • पूर्ण रक्त गणना जैसे रक्त परीक्षण, इस रोग का पहला प्रमाण प्रदान कर सकते हैं |
  • सफेद रक्त कोशिकाओं की कुल संख्या कम हो सकती है, सामान्य रह सकती है या अधिक हो सकती है, लेकिन लाल रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स की संख्या लगभग हमेशा कम होती है |
  • इसके अलावा, सूक्ष्मदर्शी यंत्र से रक्त के नमूने जांचने पर बहुत अपरिपक्व सफेद रक्त कोशिकाएं दिखाई देती हैं |
  • निदान की पुष्टि करने के लिए और अन्य प्रकार के ल्युकेमिआ से भेद करने के लिए अस्थि मज्जा बायोप्सी लगभग हमेशा की जाती है |
  • इसका उपचार उपलब्ध होने से पहले, इस रोग से पीडित अधिकांश लोगों की, निदान के 4 महीने के भीतर मृत्यु हो जाती थी. अब, इस रोग से पीडित, लगभग 80% बच्चे तथा 30 से 40% वयस्क व्यक्ति ठीक हो जाते हैं |
  • ज्यादातर लोगों के लिए कीमोथेरेपी का पहला कोर्स बीमारी को नियंत्रण में ले आता है (पूर्ण मुक्ति) |
  • 3 से 7 वर्ष की उम्र के बच्चों में रोग का निदान सबसे अच्छे तरीके से हो सकता है. 2 वर्ष से छोटे बच्चे और अधिक उम्र के वयस्कों के स्वस्थ होने की संख्या सबसे कम होती है. सफेद रक्त कोशिका की गिनती और ल्युकेमिआ कोशिकाओं में गुणसूत्र की विशिष्ट असामान्यताएं भी परिणाम को प्रभावित करती हैं |

चिकीत्सा

  • कीमोथेरेपी अत्यंत प्रभावी होती है और चरणों में की जाती है. प्रारंभिक उपचार (प्रेरण कीमोथेरेपी) का लक्ष्य होता है ल्युकेमिआ कोशिकाओं को सामान्य कोशिकाओं को नष्ट कर उनसे मुक्ति पाना ताकि एक बार फिर अस्थि मज्जा में सामान्य कोशिकाएं विकसित हो सकें |
  • कितनी जल्दी अस्थि मज्जा सामान्य हो जाता है, इस आधार पर लोगों को कुछ दिनों या हफ्तों के लिए अस्पताल में रहने की आवश्यकता हो सकती है | एनीमिया के इलाज और खून का बहाव रोकने के लिए रक्त और प्लेटलेट देना आवश्यक हो सकता है, तथा जीवाणु संक्रमण के उपचार प्रतिजैविकों की जरूरत हो सकती है. जब ल्युकेमिआ कोशिकाओं को नष्ट किया जा रहा हो तब यूरिक एसिड जैसे निकलने वाले हानिकारक पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने के लिए अंतःशिरा तरल पदार्थ और दवाओं का इस्तेमाल भी किया जा सकता है.
  • कई दवाओं के संयोजन का इस्तेमाल किया जाता है, और खुराक कई दिनों या हफ्तों के लिए दोहरायी जाती है. मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी (मेनिंजेस) के कवर ऊतक की परतों में ल्युकेमिआ कोशिकाओं के उपचार के लिए कैंसररोधी दवाएं सीधे मस्तिष्कमेरु द्रव में सीधे इंजेक्शन द्वारी दी जाती हैं.
  • यह कीमोथेरेपी विकिरण थेरेपी के संयोजन में मस्तिष्क को दी जा सकती है. यहां तक कि जब क्षीण प्रमाण हो कि ल्युकेमिआ मस्तिष्क तक फैल गया हो, तो मेनिंजेस में फैलाव की प्रबल सम्भावना के चलते निवारक उपाय के रूप में एक समान प्रकार का उपचार किया जाता है.
  • अतिरिक्त कीमोथेरेपी दवाएं, या शुरुआती चरण के दौरान इस्तेमाल की गई दवाएं कई सप्ताह की अवधि में कुछ बार इस्तेमाल की जा सकता है.
  • आगे का उपचार (अनुरक्षण कीमोथेरपी), जिसमें कम दवाएं शामिल होती हैं, कभी-कभी कम मात्रा में, 2 से 3 साल तक जारी रह सकती हैं |
  • कुछ लोगों के लिए जो उनकी कोशिकाओं में पाए जाने वाले विशेष गुणसूत्र परिवर्तनों की वजह से पुनरावृत्ति पतन के उच्च जोखिम में हों, उनके लिए पहली मुक्ति के दौरान स्टेम सेल प्रत्यारोपण की अक्सर सिफारिश की जाती है |
  • अक्सर रक्त, अस्थि मज्जा, मस्तिष्क या अंडकोष में ल्युकेमिआ कोशिकाएं पुनः प्रकट होती दिखाई दे सकती हैं (पुनरावृत्ति कही जाने वाली स्थिति). अस्थि मज्जा में फिर से प्रकट होना विशेष रूप से गंभीर स्थिति है |
  • कीमोथेरेपी फिर से दी जाती है, और यद्यपि अधिकांश लोगों को इलाज का असर होता है, बीमारी के वापस लौटने की प्रबल प्रवृत्ति होती है, खासकर से 2 वर्ष से छोटे बच्चों और वयस्कों में. जब ल्युकेमिआ कोशिकाएं मस्तिष्क में पुनः प्रकट होती हैं, तो कीमोथेरेपी दवाएं मस्तिष्कमेरु द्रव में हफ्ते में 1 या 2 बार इंजेक्शन द्वारा दी जाती हैं |
  • जब ल्युकेमिआ कोशिकाएं अंडकोषों में पुनः प्रकट होती हैं, तो कीमोथेरेपी के साथ विकिरण चिकित्सा दी जाती है |
  • जिन लोगों में पुनरावृत्ति हुई हो, उन्हें कीमोथेरेपी दवाओं की उच्च खुराक के साथ एलोजेनिक स्टेम सेल प्रत्यारोपण स्वस्थ होने की श्रेष्ठ सम्भावना प्रदान करता है |
  • लेकिन प्रत्यारोपण तभी किया जा सकता है जबकि किसी ऐसे व्यक्ति से स्टेम कोशिकाएं प्राप्त हो सकें जिसके ऊतक प्रकार संगत (एच.एल.ए-मिलान के) हों |
  • दाता आमतौर पर सहोदर होता है, लेकिन मिलान वाले, असंबंधित दाताओं की कोशिकाएं (या कभी-कभी परिवार के सदस्यों या असंबंधित दाताओं की आंशिक रूप से मेल खाने वाली कोशिकाएं, साथ ही नाल की स्टेम कोशिकाएं) से कोशिकाओं मिलान से कोशिकाओं) कभी-कभी इस्तेमाल की जाती है |
  • स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण 65 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों में कम ही किया जाता है क्योंकि उनमें इसके सफल होने की सम्भावना बहुत कम होती है और दुष्प्रभाव अधिक घातक हो सकते हैं |
  • पुनरावृत्ति के बाद जो लोग स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण से गुजरने में असमर्थ होते हैं, उनके लिए अतिरिक्त उपचार अक्सर अप्रभावी और सहन करने योग्य नहीं होता है, जिससे अक्सर लोग अधिक बीमार महसूस करते हैं | लेकिन, रोग में कमी हो सकती है | जिन लोगों पर इलाज का असर नहीं हो रहा हो, उनके लिए जीवन के अंत जीवन की देखभाल पर विचार किया जाना चाहिए |

क्रॉनिक माइलोसाइटिक ल्युकेमिआ

क्रॉनिक माइलोसाइटिक ल्युकेमिआ-सीएमएल (CML) किसी भी आयु या लिंग के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है, लेकिन 10 साल से कम उम्र के बच्चों में यह असामान्य है | यह बीमारी सबसे अधिक 40 और 60 वर्ष के बीच की उम्र के व्यक्तियों में विकसित होती है | आमतौर पर इसका कारण दो विशेष गुणसूत्रों का फिलाडेल्फिया गुणसूत्र के रूप में पुनर्व्यवस्थापित होना कहा जाता है | फिलाडेल्फिया गुणसूत्र एक असामान्य एंजाइम (टायरोसिन किनेस) उत्पादित करता है, जो सफेद रक्त कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि के पैटर्न के लिए जिम्मेदार है |

सीएमएल में अधिकांश ल्युकेमिआ कोशिकाएं अस्थि मज्जा में उत्पादित होती हैं, लेकिन कुछ प्लीहा और यकृत में उत्पादित होती हैं | तीव्र ल्युकेमिआओं के विपरीत, जिसमें अपरिपक्व सफेद रक्त कोशिकाएं बडी संख्या में मौजूद रहती हैं, सीएमएल की जीर्ण अवस्था का विशेष गुण होता है सामान्य प्रतीत होने वाली सफेद रक्त कोशिकाओं और कभी-कभी प्लेटलेटों में उल्लेखनीय वृद्धि. रोग के दौरान, अधिक से अधिक ल्युकेमिआ कोशिकाएं अस्थि मज्जा को भरती हैं तथा अन्य कोशिकाएं रक्तधारा में प्रवेश कर जाती हैं |

लक्षण

अंततः ल्युकेमिआ कोशिकाओं में अन्य अधिक परिवर्तन होते हैं तथा रोग त्वरित चरण की ओर अग्रसर होता है और उसके बाद निश्चित रूप से विस्फोटक स्थिति की ओर. प्लीहा की भारी वृद्धि के साथ ही बुखार तथा वज़न में गिरावट विस्फोटक संकट में आम बात है | इसकी जीर्ण अवस्था में, शुरुआत में CML के कोई लक्षण नहीं दिखाई दे सकते हैं, लेकिन कुछ लोगों जल्दी थकावट या कमज़ोरी होना, भूख कम होना, वजन कम होना, ज्वर या रात को पसीना आने की शिकायत हो सकती है और पेट भरा होने की अनुभूति हो सकती है - जो आमतौर पर एक बढ़े हुए प्लीहा के कारण होती है | जैसे-जैसे रोग विस्फोटक स्थिति की ओर अग्रसर होता है, लोगों अधिक बीमार होते जाते हैं क्योंकि लाल रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स की संख्या कम हो जाती है, जिससे शरीर पीला पडता है, त्वचा पर खराशें आ जाती हैं और खून बहने लगता है |

निदान

  • एक सरल रक्त परीक्षण के परिणामों के आधार पर संदिग्ध रूप से सीएमएल का निदान हो सकता है | परीक्षण असामान्य रूप से अधिक संख्या में सफेद रक्त कोशिकाएं दर्शा सकता है. खुर्दबीन द्वारा जांचे गए रक्त के नमूनों में, सामान्य रूप से अस्थि मज्जा में पायी जाने वाली, कम परिपक्व सफेद रक्त कोशिकाएं, दिखाई देती हैं |
  • जो परीक्षण गुणसूत्र (साइटोजीनेटिक्स या आणविक आनुवंशिकी) का विश्लेषण करते हैं, फिलाडेल्फिया गुणसूत्र की पुष्टि करने तथा रोग का उपचार करने के लिए उनकी आवश्यकता होती है. द्वारा निदान की पुष्टि की आवश्यकता होती है |

चिकित्सा

  • हालांकि अधिकांश उपचार रोग का इलाज नहीं करते हैं, वे इसकी प्रगति धीमी करते हैं | नई दवाएं फिलाडेल्फिया गुणसूत्र द्वारा उत्पादित असामान्य एंजाइम को बाधित करती हैं. अन्य उपचारों की तुलना में ये दवाएं अधिक प्रभावी होती हैं तथा केवल मामूली दुष्प्रभाव उत्पन्न करती हैं |
  • निदान के पश्चात 5 वर्षों में 90% से अधिक मामलों में जीवन रक्षा होती है |
  • कीमोथेरेपी दवाओं की उच्च मात्रा के साथ स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण के सम्भवतः सीएमएल का इलाज हो सकता है | तथापि, केवल कुछ लोगों में प्रत्यारोपण हो सकता है | स्टेम कोशिकाएं एक ऐसे दाता की होनी चाहिए जिसके ऊतक का प्रकार संगत हो, आमतौर पर एक सहोदर से |
  • प्रत्यारोपण अधिकांश मामलों में रोग के प्रारंभिक अवस्था के दौरान प्रभावी होता है और काफी कम प्रभावी होता है यदि सीएमएल तेजी से बढ रहा हो या विस्फोटक संकट उत्पन्न हो गया हो |
  • विस्फोटक संकट में लोग इलाज के बिना कुछ ही महीने जीवित रहते हैं. कभी-कभी उपचार, कीमोथेरेपी दवाएं जीवन को 12 माह या अधिक तक बढा सकते हैं |
  • उन लोगों के लिए पुराने कीमोथेरपी इलाज भी हैं जिनमें रोग पुनः उत्पन्न हो जाए जिनमें फिलाडेल्फिया गुणसूत्र के बगैर सीएमएल हो | कोई भी दवाएं जीवित रहने की अवधि को बढा नहीं सकती लेकिन वे लक्षण (किनेस, जो कि सीएमएल में सफेद रक्त कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि के पैटर्न के लिए जिम्मेदार होता है) कम करने में मदद कर सकती हैं|
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मन मोहन शर्मा Nov 16, 2017 03:13 PM

दिन का है, वह रोता बहुत है रोते हुए पेट को एकड़ लेता है शरीर को एकड़ लेता है तथा सांस भी चढ़ाता है लगभग रोता ही है शाम को अधिक रोता है रात को सोने के बाद ज्यादा तंग नहीं करता है नाक भी रुक जाती है I कृपया मार्ग दर्शन करें I

प्रशान्त कुमार झा Oct 20, 2017 03:00 PM

नवजात शिशु को लगने वाली सुईयों की सम्पुर्ण जानकारी देने का कष्ट करें।

किशोर कुमार Sep 13, 2017 12:44 AM

मेरा 15 दिन की बेटी है उसे पैखाना करने मे दिक्कत आती है बहुत जोर लगाती है रोती है ।कृपया ईस समस्या का समाधान बतावे ।मे किशोर कुमार कटिहार से।नमस्ते

श्रीकांत VAIRAGADE Sep 05, 2017 03:24 PM

मेरा लड़का ४.५ साल का है वो २४ घंटे में लगभग ६-७ लीटर पानी पिता है ,दिन भर टॉयलेट जाता है नींद में भी ३-४ बार टॉयलेट जाता है शुगर टेस्ट भी करवा लिया सभी रिपोर्ट नार्मल है,३ डॉक्टर्स को भी दिखाया उनका कहना है की लड़का अपनी आदत बना लिया है उसकी आदत सुधारो, लेकिन जब मै अपने लड़को को पानी नहीं पिने देता तो वो रोता गुस्सा करता है चिड़चिड़ाता है

yug kumar Aug 14, 2017 12:19 PM

मेरे ladke ke bal bahut dhire dhire bad rhe h aur kam bhi h kya kiya jaye

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