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कैंसर व कैंसर के प्रकार

इस पृष्ठ पर कैंसर व उनके प्रकार की जानकारी दी गयी है|

भूमिका

आम के पेड़ पर परजीवी पौधा-कैंसर ऐसा ही कुछ होता है।कैंसर शब्द अंग्रेज़ी के शब्द क्रेब से बना है; जिसका अर्थ कुछ जो कि बहुत पीड़ादायक, हस्ताक्षेप करने वाला और ज़िद्दी हो। ख़ून और कुछ एक अंगों के कैंसर के अलावा सभी तरह के कैंसर दूसरे अंगों में फैलते हैं।

कैंसर अधिकतर बड़ी उम्र के लोगों को ही होता है, परन्तु कई बार यह बच्चों को भी हो जाता है। भारत में प्रति एक लाख लोगों में से 100 लोग कैंसर का शिकार हैं। कैंसर से त्वचा, पेशियॉं, हड्डियॉं, जोड़, पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, खून, रक्तपरिसंचरण तंत्र, लसिका तंत्र, हारमोन ग्रंथियॉं और तंत्रिका तंत्र और जनन अंग ऐसा कोई भी अंग प्रभावित होते हैं। कैंसर एक जगह से शुरू होता है और फिर दूर दूर तक पहुँच जाता है। यह लिवर, फेफड़ों और अन्य अंगों तक खून और लसिका के माध्यम से पहुँच जाता है। कुछ अंगों से यह ज़्यादा आसानी से दूसरे अंगों तक पहुँचता है और कुछ से कम आसानी से। भारत में कैंसर के मामलों में से आधे से ज़्यादा मुँह, गले, गर्भाशय ग्रीवा के होते हैं। गर्भाशय ग्रीवा और गर्भाशय के कैंसर महिलाओं को होने वाले कैंसर में से सबसे आम है। सौभाग्य से अंदरूनी अंगों की तुलना में इन में से कैंसर को ठीक कर पाना ज़्यादा आसान है।

कैंसर की शुरूआत काफी धीमी होती है। कभी कभी जगह और कैंसर की स्थिति के हिसाब से ऐसे लक्षण भी प्रकट होते हैं जिनसे पहले से चेतावनी मिल जाती है। इसलिए कुछ कैंसर दूसरों के मुकाबले ज़्यादा आसानी से जल्दी पहचान लिए जाते हैं। कौन सा अंग प्रभावित है इसके हिसाब से विशेष लक्षण और संकेत होते हैं। उदाहरण के लिए स्वरयंत्र के कैंसर से आवाज़ भारी हो जाती है और ग्रासनली के कैंसर से निगलने में दिक्कत होती है। हमें आदत होनी चाहिए कि हम शुरूआती लक्षणों को ही समझ पाएं। अगर जल्दी से इलाज हो जाए तो कई एक तरह के कैंसर पूरी तरह से ठीक हो सकते हैं। अगर इन पर ध्यान न दिया जाए तो किसी भी तरह के कैंसर से कुछ महीनों या सालों में ही मौत हो जाती है।

ऐसा डर फैल रहा है कि कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है। कुछ हद तक ऐसा इसलिए है कि पिछले कुछ दशकों पहले के मुकाबले आज ज़्यादा लोग लम्बी उम्र तक जीते हैं। बड़ी उम्र में वे इस बीमारी के शिकार हो जाते हैं। इसके अलावा कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी कैंसर करने वाले कारकों से अधिक सामना होने के कारण भी हो रही है। आजकल चिकित्सीय जॉंच द्वारा जल्दी निदान संभव है और चिकित्सीय जॉंच करवाने की प्रवृति भी बढ़ गई है।

कैंसर क्या है?

आँख में कैंसर जिसमें कैंसर का उतक और खून की धमनियॉं स्पष्ट रूप से देख सकते है।

कोशिकाएं एक निश्चित सीमा में विभाजित हो कर नई कोशिकाएं बनाती हैं। सामान्य रूप से यह विभाजन किसी जगह पर ऊतकों के आकार और कोशिकाओं की संख्या के अनुसार होता है। उदाहरण के लिए त्वचा की कोशिकाएं हर समय बनती रहती हैं पर इतनी भी तेज़ी से नहीं कि कुछ दिनों में त्वचा मोटी ही हो जाए। त्वचा की कोशिकाओं का नष्ट होने और नई कोशिकाओं के बनने के बीच संतुलन रहता है। इस तरह से कोशिकाओं और ऊतकों के प्रकार और इनकी संख्या में वृद्धि एक सीमा में ही होती है। और सामान्यत: ऐसा भी नहीं होता कि त्वचा की कोई कोशिका खून के माध्यम से कहीं और पहुँच कर फंस जाए और वहॉं जाकर विभाजित होने लगे।

कैंसर की कोशिकाएं ये सारे नियम तोड़ देती हैं। कोशिकाओं और ऊतकों की वृद्धि अनियमित हो जाती है। कैंसर की कोशिकाएं बड़ी हो जाती हैं और पास के ऊतकों और अंगों में भी घुस जाती हैं, खून या लसिका में चली जाती हैं और जहॉं भी वे घुस जाती हैं वहीं ऊतकों के साथ अटक जाती हैं। ऐसा क्यों होता है? कुछ कोशिकाएं इस तरह से व्यवहार क्यों करती हैं?

कोशिकाओं की अनुवांशिकी में परिवर्तन

जिस समय कोशिकाएं विभाजित होने से उनकी संख्या में वृद्धि होती है उस समय कोशिकाओं की जीन में कुछ असामान्य परिवर्तन हो जाते हैं। ऐसे बदलाव कभी कभी ही होते हैं। परन्तु इनके होने की संभावना काफी होती है क्योंकि हमारे शरीर में हर समय लाखों करोड़ों कोशिकाएं विभाजित होती रहती हैं। इस तरह से जीन में बदलाव आने से कोशिकाएं असामान्य रूप से व्यवहार करने लगती हैं। इस तरह की कोशिकाएं दूसरी कोशिकाओं की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से बढ़ती हैं और किसी एक जगह पर असामान्य ऊतकों का भंडार बना लेती हैं। खून की आपूर्ति न होने के कारण इनमें से कुछ कोशिकाएं तो मर जाती हैं। रगड़ वगैरह से इनमें से कुछ में से रक्त स्त्राव और अल्सर हो सकता है। परन्तु इस तरह बनी बाकी की कोशिकाएं बढ़ती रहती हैं। इनसे गांठ, रसौली या अल्सर/छाला बन जाता है।

इस अवस्था को जिसमें कैंसर के ऊतक आसपास के ऊतकों में अतिक्रमण कर रहे होते हैं, लोकल इनवेज़न (आक्रमण) अवस्था कहते हैं। इसके बाद ये कोशिकाएं खून या लसिका के माध्यम से दूसरी जगहों तक पहुँच सकती हैं। जब कैंसर की कोशिकाएं लसिका की नलिकाओं में घुसती हैं तो सबसे पहले उनके रास्ते में लसिका ग्रंथियॉं रोक लगाती हैं। यहॉं कैंसर की कोशिकाएं बढ़ कर रसौली बना लेती हैं जो सख्त मगर दर्द रहित होता है। ग्रथियों से कैंसर की ये कोशिकाएं देर सबेर लसिका तंत्र में घुस जाती हैं। इस अवस्था में कैंसर कोशिकाएं संचरण में तैरती हुई फेफड़ों, लिवर या किसी भी और नलिकाओं के जाल तक पहुँच जाती हैं और वहीं बढ़ती रहती हैं। अलग अलग तरह के कैंसर का फैलने का मार्ग भी अलग अलग होता है। उदाहरण के लिए स्तन कैंसर के मुकाबले पुरस्थ का कैंसर ज़्यादा तेज़ी से एक जगह से दूसरी जगह पर फैलता है।

कैंसर के कारण

चिकित्सीय विज्ञान में कैंसर एक बहुत अधिक अच्छी तरह से अध्ययन की गई बीमारियों में से एक है। परन्तु फिर भी हमें इस बारे में अभी बहुत कुछ जानना बाकी है कि सामान्य कोशिकाओं और ऊतकों में कैंसर क्यों शुरू हो जाता है। इस बारे में सिर्फ यही जानकारी है कि कोशिका के अनुवंशिक हिस्से में बदलाव आने से ऐसा होता है। परन्तु अनुवंशिक बदलाव क्यों होता है यह आजतक पता नहीं चल पाया है।

रसायन और विकिरण

कुछ रसायन, खासकर टार के यौगिक, पेंट में इस्तेमाल होने वाले यौगिकों, ऐस्बेस्टस के रेशों, पैट्रो रसायनों के जलने से निकलने वाले रसायनों और तम्बाकू में पाए जाने वाले निकोटिन आदि को कैंसर का खतरा बढ़ाने वाले रसायन माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो लोग इन रसायनों के संपर्क में आते हैं उनमें कैंसर होने की संभावना उन लोगों से ज़्यादा होती है जो इनके संपर्क में नहीं आते। इसलिए धूम्रपान करने वाले लोगों में श्वसन तंत्र के कैंसर होने का खतरा उन लोगों के मुकाबले ज़्यादा है जो धूम्रपान नहीं करते। ऐस्बेस्टस की फैक्टरी में काम करने वाले लोगों को औरों के मुकाबले फेफड़ों के कैंसर का खतरा ज़्यादा होता है।

परमाणु विभाजन से निकलने वाली विकिरणें और चिकित्सा में निदान के लिए इस्तेमाल होने वाली एक्स रे विकिरणें रेडियोधर्मी किरणों के उदाहरण हैं। आपने शायद सुना ही होगा कि प्रसिद्ध शोधकर्ता मेरी क्यूरी को लंबे समय तक रेडियम (एक रेडियोधर्मी पदार्थ है) के साथ काम करते रहने के कारण त्वचा का कैंसर हो गया था। विकिरणों से उनके संपर्क में आने वाली कोशिकाओं में अनुवंशिक बदलाव आ जाते हैं इससे कैंसर हो सकता है। कैंसर की घटनाएं और इसका फैलने की दर परमाणु संयंत्रों और रेडियोधर्मी फालतू पदार्थ के फेंकने की जगहों के पास काफी ज़्यादा होती है। हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बंमों से हज़ारों लोग मारे गए थे और बचे हुए बहुत से लोगों को कैंसर हो गया था।

चिरकारी क्षोभ

गर्भाशय ग्रीवा का नीचे से दिखनेवाला रूप सामान्य, दुसरे में खरबुरा अगर किसी जगह पर लगातार किसी चीज़ से रगड़ आदि लगे या किसी शोथ हो तो इससे कैंसर की संभावना बढ़ जाती है। गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर इसके लगातार क्षोभ ग्रस्त होने से जुड़ा है। मुँह का कैंसर तंबाकू, चूना या पान मसाला चबाने की आदत से जुड़ा है।

आहार

बहुत अधिक मिर्च खाने की आदत से पेट का कैंसर हो सकता है क्योंकि इससे अमाशय की अंदरूनी परत शोथ ग्रस्त हो जाती है। इसी तरह से शराब पीना लिवर के कैंसर से जुड़ा है। इसी तरह से खान पान की खराब आदतों के कारण बड़ी आंत का कैंसर हो सकता है।

वायरस से होने वाला संक्रमण

कुछ वायरसों से कैंसर हो जाता है। उदाहरण के लिए अफ्रीका में पाया जाने वाला बर्किट लिंफोमा। वायरसों से भी कोशिकाओं में अनुवंशिक बदलाव आ जाते हैं जिनसे कैंसर हो सकता है। कई तरह के कैंसर का संबंध वायरस से होने वाले संक्रमणों से जुड़ा होने से संबंधित अध्ययन हो रहे हैं। लोग कभी कभी यह दलील देते हैं कि बहुत से धूम्रपान करने वाले लोगों को कैंसर नहीं होता परन्तु धूम्रपान न करने वालों को हो जाता है। परन्तु इस दलील से फेफड़ों के कैंसर का धूम्रपान से संबंध को नकारा नहीं जा सकता। यह भी साबित हो चुका है कि कैंसर करने वाले कारकों से जितना ज़्यादा संपर्क हो कैंसर होने की संभावना उतनी ही ज़्यादा होती है।

गर्भाशय का कैंसर

भारत में गर्भाशय मुख का कैंसर बहुत महत्त्वपूर्ण है। बिमारी का पता शीघ्र  लगाना जरूरी है। अत: लक्षणों पर निर्भर नही रह सकते। अब उत्तम परीक्षण उपलब्ध है। (गर्भाशय का लम्बा सा मुख योनीमार्ग में खुलता है। अपने हाथों की उँगलियों से महिला उसे स्पर्श कर सकते है।) इस कर्करोग का पता शीघ्र लग सकता है। तथा समय रहते उपचारोंसे वह ठीक भी हो सकता है। भारत में यह कर्करोग लैंगिक संसर्ग के कारण होता दिखाई देता है। 35 से 45 की उम्र में यह रोग अधिक नजर आता है। अब इसके लिये एक प्रतिबंधक टीका भी उपलब्ध है।

जानकारी

इस कर्करोग में ह्युमन पेपिलोमा वायरस  95% बातों में जिम्मेदार होता है।

अधिक व जल्दी जापों के कारण इस विषाणुसंसर्ग का धोखा बढ जाता है

लिंग सांसगिक बिमारियों के लगने से कर्करोग का धोखा बढ जाता है।

पुरुष साथीदार के लिंग की त्वचा के निचे चिकटा हो तो इस चिकटे में विषाणू होते है। सुन्ता करने से ये विषाणू व त्वचा खत्म हो जाते है। अत: मुस्लिम स्त्रियों को इस कर्करोग का धोखा कम होता है।

सूचक लक्षण

  • रक्तस्त्राव इसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लक्षण है।
  • माहवारी के अलावा बीच में या लैंगिक संबंधो के पश्चात रक्तस्त्राव, ये सूचक है।
  • रजोनिवृत्ती उपरान्त योनीमार्ग में रक्तस्त्राव होना या लाल-पिला दुर्गंधीयुक्त स्त्राव होना, यह एक लक्षण है।
  • मूलत: ये कैंसर दर्दरहित होता है लेकिन उसमें पीब हो तो दुखता है।
  • पॅप टेस्ट याने गर्भाशय मुख की पेशी के नमूने का सूक्ष्मदर्शी से परीक्षण करना। इस परीक्षण में पेशी में कैंसरके सूचक बदलाव दिखते है। यह परीक्षण सस्ता और 80% तक सही होता है। परीक्षण शिबीरोमें यह बडे पैमाने पर किया जा सकता है। इस परिक्षणोपरान्त उपचार करने के लिये काफी समय भी मिलता है। पॅप परीक्षणसे कैंसरसूचक बदलाव चार पायदानों में पहचाने जा सकते है।

    रजोनिवृत्ती के बाद पॅप परीक्षण कुछ कम विश्वसनीय होता है। लेकिन स्त्री-हारमोन देकर उसे अधिक विश्वसनीय बना सकते है एँसिटोव्हाईट टेस्ट पॅप परीक्षण का एक अच्छा विकल्प है। इसमें गर्भाशयमुख पर 5% ऍसिटिक आम्ल लगाकर बदलाव को परखते है। इस परीक्षण में कैंसर सूचक भाग सफेद सा दिखता है। ऐसाही एक परीक्षण है शिलर का आयोडिन परीक्षण। इसमें रोग रहित भाग नीला-सा दिखाई देता है। इन में से किसी भी परीक्षण में कैंसर आशंका होने पर उतना हिस्सा निकालकर सूक्ष्मदर्शी परीक्षण हेतू भेजा जाता है।

    योनी मार्ग के सामान्य स्पेक्युलम परीक्षण में भी गर्भाशयमुख पर गांठ या खुरदरा मोड दिख सकता है। ह्युमन पॅपिलोमा वायरस  हेतु ट्यूमर मार्कर और डी.एन.ए.जैसे प्रगत परीक्षण उपलब्ध है। गर्भाशयमुखके कैंसर का फैलाव जानने के लिये आपके डॉक्टर सिटी-स्कॅन, एम.आर.आय और पी.ई.टी. परीक्षण की सलाह दे सकते है। खेद की बात है की पूर्वनिदान सरल होते हुए भी अनेक स्त्रियोंको ऐसे परिक्षणों का लाभ नही मिल पाता है। परिणामस्वरूप उपचार के लिये कुछ महिलाएँ काफी देर से आती है।

    इलाज

    कैंसर सूचक बदलाव होने पर परिस्थितीनुसार योग्य उपचार करना जरुरी है।

    • रोग सीमित होने पर प्रभावित हिस्सा नष्ट करने हेतु कॉटरी या क्रायोसर्जरी या लेझर तकनीक उपलब्ध है। कॉटरिं याने जलाना, जबकी क्रायोसर्जरी अतिशीत तंत्र. लेझर से पेशी उबलती है और बाष्पीभूत होकर ङ्गूट जाती है।
    • गर्भाशयमुख शल्यक्रिया  से निकाला जा सकता है । इसके लिये विविध तकनीक उपलब्ध है।
    • रोग के बढ़ जाने पर पूर्ण गर्भाशय निकालना पडता है।

    प्रतिबंध

    • सही उम्र में शादी, सीमित परिवार, सुरक्षित लैंगिक व्यवहार व स्वच्छता से कैंसर की संभावना कम हो जाती है।
    • प्रगत देशों में पॅप टेस्ट से इस रोग का प्रमाण काफी कम हो गया है। यह परीक्षण सभी स्त्री-रोग तज्ज्ञ कर सकते है।
    • ऍसिटिक आम्ल या शिलर परीक्षण स्वास्थ्य सेवक भी कर सकते है।
    • ह्युमन पॅपिलोमा का टीका भी अब उपलब्ध है। इसके कारण कैंसर और विषाणू-मशक रोग टाले जा सकते है। यह टीका किशोरी अवस्थामें ही देना चाहिये। इसके तीन डोस होते है। वे कुल छ: महिने की कालावधी में दिये जाते है।

    स्तनों का कैंसर

    स्तनोंका कैंसर महिलाओं के लिये महत्त्वपूर्ण तथा संवेदनशील विषय है। भारत में यह अधिक पाया जाता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि हम उसे शीघ्र पहचानकर निकाल सकते है।यह कैंसर महिलाओंको 35-55 की उम्र में होने की संभावना अधिक होती है। इसके कुछ कारण इस प्रकार है -- स्थूलता अर्थात मोटापा, स्तनभार अधिक होना, खाने में तेल या वसा का प्रमाण अधिक होना, गर्भनिरोधक गोलियों का दीर्घ उपयोग, संतान न होना आदि। कुछ अनुवंशिक कारण भी प्रभावशाली है।

    जो महिलाएँ स्तनपान कम करवाती है उन्हे यह रोग होने की संभावना ज्यादा  होती है।

    रोगनिदान

    दर्दहीन छोटी गांठ या गोलेसे कैंसर की शुरुवात होती है। बादमें स्तन दर्द और चिचुकपर थोडा रक्तमिश्रित स्त्राव हो सकता है। वह चिचुक थोडा खींचा सा या संकुचित हो सकता है। बगलमें गांठोका होना कैंसर बढनेकी निशानी है।

    अपने स्तनों की हर माह में एकबार अपने हाथों से जॉंच करना अच्छा होता है। इसके लिये घडी के कांटेनुसार क्रमश; स्तन टटोले । इसमें एकाध गांठ या गोला होने पर विशेष ध्यान दे। लेकिन हर गाठ या गोला कैंसर नहीं होता इसका भी ध्यान रखे। आप अपनी स्तन परीक्षा माहवारी के चार-पॉंच दिनों बाद करे, या फिर महिने की निश्चित तारीख को परीक्षा करे। आशंका हो तब डॉक्टर से से मिले।

    रोग निश्चिती के लिये गांठ के नमूने का सूक्ष्मदर्शक द्वारा परखना पडता है। सुई से यह नमुना लेते है।

    मेमोग्राफी नामक एक्स रे चित्र से स्तन की छोटी गांठे भी देख सकते है। यह परीक्षण उम्र के चालीसवे साल के बाद अधिक विश्वसनीय होता है। एम.आर.आय. परीक्षण अधिक अच्छा किन्तु महंगा है।

    निस्तेज होना या वजन घटना कैंसर के बढने की निशानी हो सकते है।

    स्तन कैंसर के इलाज

    स्तन कैंसरका प्रकार तथा फैलाव पर उपचार निर्भर होते है। आपके डॉक्टर इस बारे में योग्य सलाह देंगे। अब इसके बारे में हम थोडी जानकारी लेंगे। कैंसर की छोटी गांठे निकाली जा सकती है। ऐसे में उर्वरित स्तन निकालने की आवश्यकता नही है। स्तन कैंसर उचित समय निकाला जाए तो जिंदगी में दुबारा होने का खतरा कम हो जाता है।

    लेकिन गांठ बडी होने पर स्तन और बगल की गांठे निकालनी पडती है। इस शल्यक्रिया  के बाद कैंसरविरोधी इलाज किये जाते है। सामान्यत: इसे छ: किस्तों में करते है। इसके अलावा संप्रेरक और अँटिबॉडी उपचार भी करने पडते है। इससे दुबारा कैंसर होने का खतरा कम हो जाता है। कैंसरके शरीर में फैलाव ना हो इसलिये रसायनोपचार जरूरी है।

    रोकथाम

    जल्दी निदान यही रोकथाम का मुख्य तरीका है।

    रजोनिवृत्ती के बाद हर साल मेमोग्राफी परीक्षण करना अच्छा है। मेमोग्राफी परीक्षण में भी 10-15% मामलों में निदान गलत हो सकता है। स्तनभार अधिक होनेपर गलती की संभावना बढ जाती है। इसिलिये 35 साल की उम्रतक मेमोग्राफी परीक्षण अधिक विश्वसनीय नही। इसके अलावा क्ष-किरण स्वयं ही कुछ मायनेमें कैंसरजनक हो सकते है। अत: मेमोग्राफी परीक्षण आवश्यकता होनेपर ही किया जाए।

    कैंसर की पहचान

    कैंसर याने अर्बूद जल्दी पहचानने के लिये कुछ जानकारी लेंगे। यह जानकारी अपने मित्र परिवारमें भी फैलायें। जल्दी रोगनिदान होने से इलाज ज्यादा  अच्छे हो सकते है।

    कैंसर आमतौर पर वयस्कों में होता है। लेकिन कुछ कैंसर कम उम्र में भी जैसे की खून का कैंसर हो सकते है।

    • बिना किसी कारण के अरुची और वजन घटना कैंसर सूचक हो सकता है।
    • निस्तेजता, अरक्तता और कमजोरी यह भी कैंसरके लक्षण हो सकते है।
    • बदन मे कहीं भी सख्त गिल्टी कैंसर सूचक हो सकती है।
    • खॉंसी थूँक में खून का होना टी.बी. या कैंसर का संकेत हो सकता है।
    • जॉंघ, बगल या गर्दन में वेदना रहित सख्त गिल्टीयॉं हो तब ये कैंसरजनित हो सकता है।
    • भारत में मुँह, स्तन, गर्भाश्य ग्रीवा, जठर-अमाशय और फेफडोंके कैंसर ज्यादा  पाये जाते है। ये सारे कैंसर हम जल्दी पहचान सकते है। लेकिन यकृत या प्रॉस्टेटजनित कैंसर भीतर होनेसे समझनेमें देरी लगती है।

    मुख और गले के कैंसर के लक्षण

  • तम्बाकू और गुटखा खानेवालोंको मुख का कैंसर हमेशा संभव है। ऐसी व्यक्ति को सावधानी बरतना चाहिये।
  • मुँह में गाल, जबडा या मसुडोंसे जुडा हुआ चिरकालिक छाला, गिल्टी या चकता संभवत: कैंसर सूचक मानना चाहिये।
  • गाल और जीभ के कैंसर के कारण बोलने में कठिनाई और बदलाव होते है।
  • कैंसर के चकते ङ्गिके या लाल होते है। कभी कभी इसमें दर्द भी होता है।
  • खाना निगलते समय गले में दिनोदिन अटकाव महसूस होना कैंसर सूचक मानना चाहिये।
  • स्वरयंत्र से संबंधित कैंसर के कारण
  • आवाज खराशित होता है। लेकिन यह लक्षण दो हफ्ते से ज्यादा  हो तभी सोचे।
  • वक्ष के कैंसर से जुडे लक्षण

  • अपने स्तनमें हाथ को कोई गांठ या गिल्टी लगती है? इसलिये प्रतिमास एक बार आपके हाथ से दोनो वक्ष-स्तन ठीक से टटेले। लेकिन ऐसी हर कोई गांठ - गिल्टी कैंसर नहीं होती। इसलिये डरे नहीं, लेकिन डॉक्टरसे अवश्य मिले।
  • इसी तरह दोनो बगलमें गिल्टी के लिये नियमित रूप से जांच करे।
  • चालीस वर्ष उम्र के बाद मॅमोग्राफी टेस्ट कराना उपयोगी है।
  • पाचन स्थान वाले कैंसर के लक्षण

  • अन्न नलिकामें खाना अटकना कैंसर सूचक समझे।
  • बिना भोजन के ही पेट भरे रहने की भावना लंबे अर्से हो तब जठर के कैंसर के बारे में सोचना चाहिये।
  • मलविसर्जन की आदते बदलना, मलावरोध या टट्टी में खून गिरना संदेह जनक है।
    • पीलीया के साथ सफेद टट्टी होती है तो जिगर का कैंसर या पित्तमार्ग में कोई अटकाव संभव है।
    • उदर में सख्त गोला या गांठ हाथ लगे तब कैंसर के लिये अवश्य टेस्ट करें।

    प्रजनन और मूत्र अंग से जुडे कैंसर के लक्षण

  • वयस्क पुरुषों में शिश्न मुंड पर गांठ या चिरकाली छाला हो तब सावधानी बरतनी चाहिये।
  • पेशाब के समय अंदरुनी अटकाव अनुभव हो तब कैंसर की आशंका रखनी चाहिये।
  • अंडकोश की सख्त सूजन भी कर्करोगजनक हो सकती है।
  • महिलाओंमें माहवारी के अलावा रक्तस्त्राव गर्भाशय कैंसरसे जुडा हो सकता है।
  • गर्भाशय ग्रीवा को उंगली लगानेपर कोई गांठ या खरदुरापन लगनेपर उचित टेस्ट कर लेना चाहिये।
  • महिलाओं में गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के शीघ्र निदान के लिये नियमित रूपसे पॅप टेस्ट करना उचित होगा।
  • महिलाओं को उदर में गांठ या अन्य गोला हाथ लगता हो तो डिंबग्रंथी का कैंसर या और कोई वजह हो सकती है।
  • खून के कैंसर के लक्षण

  • खून के कैंसर के कारण बदनमें जगह जगह पर रक्तस्त्राव होता है, जैसे की मसुडोंसे, त्वचा के निचे, खॉंसी या उल्टी में खून हो। ऐसे मरीज को काफी थकान और निस्तेजता होती है, गर्दन तथा जांघ और बगलमें गिल्टीयॉं आती है।
  • समय बुखार और खॉंसी चलती है। इसका कारण प्रतिरोध या रोगक्षमता घटनेसे होनेवाले संक्रमण है।
  • सुझाव

    धूम्रपान यह एक घातक कैंसरजनक आदत है। इससे खुद का और परिवार का भी बडा नुकसान होता है।

  • कैंसर जितना जल्दी पहचाने उतना इलाज ज्यादा  आसान होता है। इसलिये वयस्कोंमे कैंसर के लक्षण हमेशा ध्यानमें होने चाहिये।
  • कोई आशंका हो तो डॉक्टरसे मिले।
  • डॉक्टरी सलाह के अनुसार उचित समय कैंसर के लिये अपनी टेस्ट करा ले।
  • कैंसर का इलाज खर्चिला होता है। हो सके तो मेडिकल इन्शुरन्स पहलेसे होना फायदेमंद है।
  • पुरुषों ने स्नान के समय शिश्नमुंड हर रोज साबुन पानीसे साफ करना जरुरी है। अन्यथा यहॉं जमनेवाली सफेद परत कैंसरजनक विषाणूओं को बढावा देती है। सुन्नत करने से यह समस्या सदा के लिये हल होती है। इसी से औरत का गर्भाशय ग्रीवाका कैंसर भी टल सकता है। मुस्लिम समुदाय में सुन्नत के कारण स्त्री-पुरुष प्रजनन संस्थान के कैंसर काफी कम हुआ करते है।
  • कैंसर का निदान

    कैंसर का निदान शुरूआती अवस्था (कैंसर के पहले की अवस्था) या स्थानीय अवस्था में ही हो जाना चाहिए। इस अवस्था में आपरेशन, दवाओं और विकिरणों से आसानी से इलाज हो सकता है। (इस तरह से विकिरणें न केवल कैंसर का कारण हैं बल्कि इसका इलाज भी हैं!)दुर्भाग्य से ज्यादातर कैंसर शुरूआत में पकड़ में नहीं आता। इसका एक कारण समाज में कैंसर के बारे में जानकारी का अभाव भी है। बीमारी का निदान होने में देरी का एक और कारण स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव भी है। असरकारी ढंग से नियमित रूप से कैंसर की संभावना पर नज़र रखना इसका एकमात्र उपाय हो सकता है।

    नियमित रूप से सभी लोगों में कैंसर की छान बीन के लिए रखना ज़रूरी है

    आमतौर पर होने वाले कैंसर के संबंध में लोगों में नीचे दिए गए लक्षणों पर नियमित रूप से नज़र रखना ज़रूरी है।

  • कहीं बहुत तेज़ी से वजन तो नहीं घट रहा, खासकर बड़ी उम्र के लोगों में।
  • बहुत तेज़ी से होने वाला अनीमिया।
  • बिना किसी कारण के भूख लगना बंद हो जाना।
  • शरीर के किसी भी भाग में कोई गांठ या रसौली बन जाना।
  • चिरकारी ठीक न होने वाला अलसर।
  • स्तन में गांठ या चिरकारी अलसर।
  • रजोनिवृति के बाद रक्त स्त्राव।
  • लंबे समय तक आवाज़ फटी रहना और किसी भी तरह के इलाज से इसका ठीक न होना।
  • लार में खून आना।
  • छाती में अकसर खाना अटक जाना।
  • लंबे समय तक पेट में भरा भरा लगते रहना, अपच या खाने के बाद अकसर उल्टी आना (अमाशय का कैंसर)।
  • मुँह या जीभ पर दर्द रहित धब्बा जो लंबे समय तक बना रहे या फिर ठीक न होने वाला अलसर।
  • पाखाने या पेशाब में खून आना (मलाशय या मूत्राशय का कैंसर)।
  • बिना किसी कारण से मलत्याग की आदतों में बदलाव आ जाना और कई दिनों और हफ्तों तक ऐसा ही चलता रहना (आहार नली का कैंसर)।
  • मसूड़ों या शरीर के किसी भी बाहर खुलने वाले भाग जैसे नथुनों, फेफड़ों, मलाशय, मूत्राशय, योनि आदि में से खून आना (खून का कैंसर)।
  • लंबे समय तक चलने वाला पीलिया जिसमें बुखार नहीं हो और पाखाने का रंग सफेद सा हो जाए (अग्न्याशय का कैंसर)।
  • बगलों, वंक्षण या गले की लसिका ग्रंथियों में कोई सख्त सी वृद्धि (कैंसर की बाद की अवस्थाओं में दिखती है)।
  • इनमें से कोई भी लक्षण, खासकर बड़ी उम्र के लोगों में, कैंसर के सूचक होते हैं। कुछ कैंसर जैसे खून का कैंसर, लसिका तंत्र का कैंसर या हड्डियों का कैंसर बचपन में ज़्यादा होते हैं।
  • ध्यान रहे कि ये सारे लक्षण केवल सूचना भर देते हैं और इनसे यह पक्का नहीं होता कि किसी व्यक्ति को असल में कैंसर है। कैंसर का निदान केवल विशेषज्ञ ही कर सकते हैं। ध्यान रखें कि ऐसे कोई भी लक्षण दिखने पर व्यक्ति को डराएं नहीं पर यह ज़रूर पक्का कर लें कि वह किसी विशेषज्ञ के पास चला जाए। देरी होने से नुकसान बढ़ जाता है।

    कैंसर की पहचान के बारे में लोगों को जानकारी दें।

    कैंसर का जल्दी निदान आम लोगों को कैंसर के संबंध में जानकारी देने से ही संभव है। इसके लिए विशेष निदान कैंपों से भी फायदा होता है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के रूप में आपको कैंसर के मामलों पर नज़र रखनी चाहिए। कैंसर की आम जगहों जैसे गर्भाशय और मुँह की जांच करते रहें। मुँह में होने वाले कैंसर जल्दी पकड़ में आ जाते हैं। परन्तु गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की जांच के लिए खास कोशिशों की ज़रूरत होती है। इसके लिए 'पेप स्मीअर' या शिलर आयोडिन टेस्ट तकनीक का इस्तेमाल होता है। इसमें गर्भाशय ग्रीवा या गर्भाशय से कोशिकाएं निकाली जाती हैं और उन्हें सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है। कैंसर से पहले की कोशिकाओं का भी इस तकनीक से पता चल जाता है।

    व्यवसाय से जुड़े कैंसर

    तम्बाकू कैंसरजनक है।

    कुछ व्यवसायों से भी कैंसर हो सकता है। ऐसा कैंसर करने वाले कारकों से संपर्क के कारण होता है। व्यवसाय से जुड़े कैंसर हैं ।

  • परमाणु संयंत्रों में विकिरणों से संपर्क होना।
  • ऐस्बेस्टस की फैक्टरी में काम कर रहे मजदूरों को उसके रेशों के कारण फेफड़ों का कैंसर होना।
  • विलायकों की फैक्टिरियों में काम कर रहे मजदूरों को बहुत अधिक खतरा रहता है। (लिवर या मलाशय का कैंसर)।
  • कैंसर का इलाज

    अगर कैंसर का निदान शुरूआत में हो जाए तो इसे खास फैलने से पहले ही पूरी तरह से खतम किया जा सकता है। कुछ तरह के कैंसरों में आपरेशन से कैंसर वाली वृद्धि को निकालना होता है तो कुछ और में प्रति कैंसर दवाओं और / या विकिरणों की ज़रूरत होती है। परन्तु कैंसर अकसर फिर फिर लौट कर आ जाता है इसलिए कभी भी यह नहीं माना जा सकता कि कोई व्यक्ति पूरी तरह से ठीक हो गया है। व्यक्ति इलाज के बाद कितने समय जीवित रहा यही कैंसर के इलाज की सफलता का एकमात्र पैमाना है।

    सिर्फ आराम पहुँचाने वाला उपचार

    कई तरह के कैंसरों में जब तक बीमारी का निदान होता है तब तक इसका इलाज संभव ही नहीं रह गया होता। फिर भी निराश नहीं होना चाहिए। परिवार, डॉक्टर और स्वास्थ्य कार्यकर्ता बहुत कुछ कर सकते हैं। चाहे बीमारी के ठीक होने की कोई संभावना न हो तो भी दर्द कम करने और आराम पहुँचाने के तरीके आखिर तक जारी रखे जाने चाहिए। इस अवस्था में बीमार व्यक्ति को दर्द, संक्रमण, रक्त स्त्राव और बहुत अधिक कमज़ोरी और असहायता होती है। इस अवस्था में मोरफ़ीन एक अच्छी दर्द निवारक दवा है। ठीक से खाना खिलाना उपचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। व्यक्ति की अपनी मानसिक मजबूती और परिवार के सहारे से बहुत फर्क पड़ जाता है। व्यक्ति को अपने जिए हुए सालों के बारे में सोचना चाहिए न कि मौत के बारे में जो कि टाली ही नहीं जा सकती।

    कैंसर से जुड़ी जगह और अंग

    खास लक्षण

    जीभ और मुँह

    ठीक न होने वाला अलसर या धब्बा या रसौली बाद में जबड़े के नीचे या गर्दन की लसिका ग्रंथियों का सख्त हो जाना गला

    स्वर यंत्र

    आवाज़ का फट जाना, गर्दन में लसिका ग्रंथियों का सख्त हो जाना, खास तरह के शीशे से जांच करना ज़रूरी

    श्वसनी

    खाना निगलने में मुश्किल होना, गले में वृद्धि होना और गर्दन में लसिका ग्रंथियों का सख्त हो जाना

    फेफड़े

    चिरकारी खॉंसी व बलगम में खून आना। छाती की एक्स रे फिल्म में व्याधि विकास दिख जाता है

    ग्रासनली

    खाना निगलने में मुश्किल होना और ऐसा लगना कि खाना छाती में अटक गया है

    अमाशय

    भूख न लगना, घंटों घंटों तक पेट भरा भरा सा लगता रहना, कभी कभी उल्टी आना, पेट के ऊपरी हिस्से में गांठ या रसौली महसूस हो सकती है, उल्टी में खून आ सकता है

    आंतें और मलाशय

    मल में खून आना, मलत्याग की आदतों में बदलाव होना

    स्तन

    स्तन में सख्त सी गांठ होना, त्वचा में ठीक न होने वाला अल्सर या वृद्धि, बगलों में लसिका ग्रंथियों में सूजन

    गर्भाशय

    रक्तस्त्राव जो कि माहवारी से या गर्भावस्था से जुड़ा हुआ न हो, गर्भाशय ग्रीवा पर कोई असामान्य वृद्धि महसूस होना, पेट के निचले हिस्से में कोई वृद्धि महसूस होना

    खून

    रक्तस्त्राव की प्रवृति, लिवर या तिल्ली का बढ़ जाना, बार बार संक्रमण होना

    डिंबवाही ग्रंथियॉं

    पेट के निचले हिस्से में गांठ होना

    वृषण

    वृषण या वृषण कोश में सूजन

    शिश्न

    शिश्न की त्वचा पर मस्से जैसी या अनियमित वृद्धि और बीच बीच में खून निकलना

    मूत्राशय

    बीच बीच में पेशाबद्वारा खून निकलना

    पुरस्थ ग्रंथी

    पेशाब करने में परेशानी, थोड़ी थोड़ी पेशाब निकलते रहना, पेशाब में पीप, पुरस्थ और मलाशय में सख्त वृद्धि होना

    लिवर/ जिगर

    बढ़ा हुआ लिवर, पीलिया या सफेद मल

    हड्डियॉं

    हड्डियों से जुड़ी हुई सख्त वृद्धि, जल्दी जल्दी बढ़ती जाती है पर दर्द रहित होती है

    लसिका ग्रंथियॉं

    कई जगहों में लसिका ग्रंथियों में सूजन, रबर जैसी हो जाना, बुखार और वजन घटना

    क्या है फेफड़ों का कैंसर


    क्या है फेफड़ों का कैंसर: इसके तथ्य, प्रकार और कारण, देखिए इस विडियो में

    स्रोत: भारत स्वास्थ्य

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    pradeep Aug 13, 2017 11:26 AM

    मेरे हाथो में फुंसिया हो रही है और उसमे पानी आ रहा है इसका क्या लक्षण hai

    pradeep Feb 06, 2017 10:09 AM

    गर्दन में गांठ ह दर्द भी होता ह क्या तकलीफ होनी चाहिए

    kishori Minz May 18, 2016 09:00 AM

    sir ji apne बहुत aच्छी जानकरी दी है लेकिन यदिकिसी को इसके बारे में पता चलता है तो इसके इलाज कहाँ कहाँ अच्छा होता है यदि रांची में इसका इलाज कहाँ अच्छा होता है इसके बारे में जानकारी दी जाए तो बहुत ही अच्छा होता |

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