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टीबी (यक्ष्मा, तपेदिक, क्षयरोग)

इस भाग में टीबी रोग के बारे में जानकारी उपलब्ध कराई गयी है, साथ ही केंद्र और राज्य सरकार द्वारा दी गयी सुविधाओं की भी जानकारी उपलब्ध है।

तपेदिक

तपेदिक या ट्यूबरोक्युलोसिस (टी.बी) मायकोबेक्टिरियम ट्यूबरोक्युलोसिस नामक जीवाणु के कारण होता है।

फैलाव

तपेदिक का फैलाव इस रोग से ग्रस्‍त व्‍यक्ति द्वारा लिये जानेवाले श्‍वास-प्रश्‍वास (सांस के दौरान छोड़ी गई हवा) के द्वारा होता है। केवल एक रोगी पूरे वर्ष के दौरान 10 से भी अधिक लोगों को संक्रमित कर सकता है।

लक्षण

टी.बी. के साधारण लक्षण हैं:

 

  • तीन सप्‍ताह या अधिक समय से खांसी, कभी-कभी थूक में खून आना
  • ज्‍वर, विशेषत:रात के समय
  • वजन कम होना
  • भूख में कमी आना

टी.बी. एवं एच.आई.आइ.वी

ह्यूमन इम्‍युनो डेफिशियन्‍सी सिन्ड्रोम वायरस (एच.आइ.वी- HIV) वह वायरस है जिसके कारण एड्स (AIDS) होता है। वयस्‍क लोगों में टी.बी. का खतरा बन सकनेवाला सबसे अधिक शक्तिशाली घटक है। टी.बी.या तपेदिक, HIV ग्रस्त लोगों में शीघ्रता से विकसित होनेवाले रोगों में से एक है। एक एच.आइ.वी ग्रस्‍त व्‍यक्ति को टी.बी. बेसिलीस से संक्रमित होने के बाद तपेदिक होने का खतरा छह गुना अधिक हो जाता है। तथापि एच.आइ.वी ग्रस्‍त लोगों में भी टी.बी का उपचार किया जा सकता है। डॉटस् (DOTS)  के साथ किया गया उपचार एच.आइ.वी (HIV) ग्रस्त लोगों में मृत्‍यु दर एवं रोगग्रस्‍तता को कम करता है।

बच्‍चों में तपेदिक
बच्‍चों के लिये टी.बी.(तपेदिक) एक बहुत बड़ा खतरा है।
बच्‍चों के कुछ समूह अन्‍य लोगों की तुलना में तपेदिक के दायरे में होते हैं। इनमें शामिल हैं:

  • उस घर में बच्‍चों का रहना जिस घर में किसी वयस्‍क को सक्रिय तपेदिक है।
  • उस घर में बच्‍चों का रहना जिस घर में किसी वयस्‍क को तपेदिक लगने का बहुत बडा खतरा है।
  • बच्‍चों का एच.आइ.वी (HIV) से संक्रमित होना  या किसी अन्‍य इम्‍युनो स्‍वीकृति स्थिति में होना।
  • बच्‍चों का एक ऐसे देश में जन्‍म लेना जहाँ तपेदिक की उच्‍च संक्रमण है।
  • बच्‍चों का ऐसे समुदाय से होना जिन्‍हें डॉक्टरी सेवाएं कम मात्रा में उपलब्ध होती है।

टीकाकरण

टी.बी. का टीका- बीसीजी (BCG), बच्‍चों में तपेदिक के प्रसार को कुछ सीमा तक कम करता है।

 

उपचार
डायरेक्‍टली ऑबज़र्व्ड ट्रीटमेन्‍ट, शॉर्ट-कोर्स (DOTS) टी.बी. के उपचार के लिये अनुसरित की गई नीती है। तपेदिक के उपचार के लिये कम से कम छह महीने के उपचार की आवश्‍यकता होती है।

एक्स्ट्रा-पल्‍मनरी ट्यूबरोक्‍लोसिस
एक्स्ट्रा-पल्‍मनरी ट्यूबरोक्‍लोसिस (EPTB) का संबंध फेफड़ों के बाह्य रोग से है।

लक्षण
एक्स्ट्रा पल्‍मनरी टी.बी. की पहचान, शरीर के किसी विशेष स्‍थान पर हुये संक्रमण (लिंफ नोड) की सूजन से, सक्रियता में कमी आने से (रीढ की हड्डी) या बहुत अधिक सिर दर्द एवं नाड़ी तंत्र की अकार्यक्षमता (टी.बी. मेनिनजायटिस्) के द्वारा की जा सकती है।
एक्स्ट्रा पल्‍मनरी टी.बी. में खॉंसी नहीं होती क्‍योंकि यह फेफडों के बाहर का रोग है।

रोग का विकास

  • प्राथमिक संक्रमण रक्‍त के द्वारा या जीवाणुओं के लिम्‍फेटिक (शरीर के अंदर का पंछा) फैलाव के कारण होता है जो शरीर में फेफड़ा के बाहर किसी भी भाग में स्‍थान बना लेते हैं। जब किसी व्‍यक्ति को पर्याप्‍त मात्रा में भूख लगती है (उसके पाचन-तंत्र का ठीक तरह से क्रियाशील होना) तो इसका मतलब होता है कि ये जीवाणु नष्‍ट हो गये हैं। यदि व्‍यक्ति के पाचन-तंत्र में कोई समस्‍या है तो कुछ जीवाणु, रोग होने से पहले शरीर के किसी स्‍थान विशेष में महीनों या वर्षों तक निष्‍क्रिय अवस्‍था में पड़े रहते हैं।
  • जीवाणु खाँसी के द्वारा फेफड़ों से निकाले या निगले जा सकते हैं। इस प्रकार इस मार्ग से वे ग्रीवा (गर्दन) की लिम्‍फ नोड में या गेस्‍ट्रोइंटस्‍टाइनल (GI) तंत्र में प्रवेश कर जाते हैं।
  • मवेशियों के एम.बोविस संक्रमित दूध के द्वारा, मानवों में यह रोग आ सकता है।

संक्रमित होने वाले अंग

  • लिम्‍फ (ग्‍लैंन्‍ड्स) ग्रंथियाँ एवं विशेषत: गर्दन के आसपास के एबसेसेस
  • अस्थियाँ एवं जोड़। इस प्रकार के आधे मामलों में रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है।
  • जीयू (GU) तंत्र– महिलाओं में प्राय: गर्भाशय संबंधी रोग बहुत सामान्‍य हैं जबकि पुरुषों में प्रभावित होनेवाला अंग एपिडिडायमिस (शुक्राणु विकास नलिका) है। दोनों ही लिंग समान रूप से गुर्दा, गर्भाशय या मूत्राशय संबंधी रोगों से प्रभावित होते हैं।
  • उदर (पेट) – इसके कारण पेट या पेरिटोनियम प्रभावित हो सकता है।
  • मेनिनजाइटिस– यदि समय रहते उपचार न किया गया तो यह प्राणघातक सिद्ध हो सकता है।
  • पेरिकार्डियम– इसके कारण हृदय में की मांसपेशियों में सिकुड़न हो सकती है।
  • त्‍वचा– विशेषत: जो अनेक रूप ले सकती है ।

क्षय रोग पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्षयरोग का क्या कारण है?

क्षय रोग आनुवांशिक नहीं है। यह एक संक्रामक रोग है। कोई भी व्यक्ति क्षयरोग की चपेट में आ सकता है। जब सक्रिय क्षयरोग से पीड़ित कोई रोगी खुले तरीके से खाँसता या छींकता है, तो क्षयरोग पैदा करने वाले जीवाणु बाहर एरोसोल में प्रवेश कर जाते हैं। यह एरोसोल किसी भी ऐसे व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है जो इसमें साँस लेता है।

इस रोग के क्या लक्षण हैं?

तीन सप्ताह से अधिक अवधि तक निरंतर खाँसी होना, खाँसी के साथ कफ का आना, बुखार, वजन में कमी या भूख में कमी इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। यदि इनमें से कोई भी लक्षण तीन सप्ताह से अधिक अवधि तक बना रहे, तो पीड़ित व्यक्ति को नजदीकी डॉट्स टीबी केंद्र (DOTS TB Center) अथवा स्वास्थ केन्द्र जाना चाहिए और अपने कफ की जाँच करवानी चाहिए।

क्षय रोग के निदान हेतु कौन-कौन सी जाँच की जाती है और वे कहाँ उपलब्ध हैं?

क्षय रोग के निदान हेतु यह जरूरी है कि जीवाणु का पता लगाने के लिए लगातार तीन दिन तक कफ की जाँच करवाई जाए। दिल्ली में डॉट्स केन्द्रों को विभिन्न स्थानों पर स्थापित किया गया है जहाँ पर क्षय रोगों की जाँच सुविधा नि:शुल्क रूप से उपलब्ध है।

जाँच के लिए, कफ को ठीक से खाँसने के बाद दिया जाना चाहिए। यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि कफ की जगह जाँच के लिए थूक न दिया जाए। यदि जाँच के लिए थूक चला जाए तो रोग का निदान नहीं हो सकेगा।

क्षय रोग का क्या इलाज है?

यदि क्षयरोग निरोधी दवा पूर्ण अवधि तक लिया जाए तो यह रोग पूरी तरह ठीक हो जाता है। क्षयरोगी को कम से कम छ: महीने तक दवा लगातार लेनी चाहिए। कभी-कभी दवा को एक साल तक भी लेना पड़ सकता है। यह आवश्यक है कि केवल डॉक्टर की सलाह पर ही दवा लेना बंद किया जाए। वे रोगी, जो पूरी इलाज नहीं करवाते अथवा दवा अनियमित लेते हैं, उनके लिए रोग लाइलाज हो सकता है और यह जानलेवा भी हो सकता है।

क्या क्षयरोग साध्य है?

जी हाँ, यदि पर्याप्त अवधि तक नियमित रूप से और लगातार उपचार लिया जाए तो यह रोग पूर्णत: साध्य है।

क्षयरोग से हम कैसे बचाव कर सकते हैं?

क्षयरोग तब फैलता है जब रोगी बिना मुंह ढके खाँसता या छींकता है अथवा जहाँ-तहाँ थूकता है। इसलिए, खाँसने अथवा छींकने के दौरान रोगी को अपना मुँह निश्चित रूप से ढक लेना चाहिए।

उसे इधर-उधर नहीं थूकना चाहिए और थूकने के लिए हमेशा थूकदान का इस्तेमाल करनी चाहिए। घर में भी रोगी को ढक्कनयुक्त डिब्बे का प्रयोग करना चाहिए। निस्तारण से पहले कफ को उबाल देनी चाहिए।

जब किसी व्यक्ति में क्षयरोग के लक्षण दिखे तो यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि रोग से भयभीत न हुआ जाए और न ही उसे छुपाया जाए। यह आवश्यक है कि प्रभावित व्यक्ति अपना परीक्षण करवाए और उसके लिए पर्याप्त समय दें।

क्षयरोग के मरीज को किस प्रकार का भोजन दिया जाए?

अपनी रुचि के अनुसार क्षयरोगी किसी प्रकार का भोजन ले सकते हैं। उनके लिए किसी विशेष प्रकार के भोजन की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे भोजन से जरूर बचना चाहिए जो व्यक्ति विशेष के लिए कोई समस्या पैदा करे।

क्षयरोगी को किन चीजों से परहेज करनी चाहिए?

क्षयरोगी को बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, तमाकू, शराब अथवा किसी भी नशीली वस्तु से परहेज करनी चाहिए।

क्षयरोग में क्या करें, क्या न करें।

करने योग्य:

  • यदि तीन अथवा अधिक सप्ताह से खाँसी हो रही हो तो कफ की दो बार जाँच करवाएँ। ये जाँच सरकारी कफ सूक्ष्मदर्शिकी केन्द्रों पर नि:शुल्क की जाती है।
  • सभी दवाओं को नियमित रूप से, बताई गई पूरी अवधि तक लें।
  • ध्यान रखें कि क्षयरोग पूर्णत: साध्य है।
  • खाँसते या छींकते समय रूमाल का प्रयोग करें।
  • घरेलू जीवाणुनाशी युक्त थूकदान में थूकें।

नहीं करने योग्य:

  • यदि तीन सप्ताह या अधिक अवधि से खाँसी हो रही हो तो डॉक्टरी देखभाल को नजरअंदाज नहीं करें।
  • क्षयरोग के निदान हेतु केवल एक्स-रे पर भरोसा न करें।
  • जब तक आपके डॉक्टर न कहें तब तक दवा बंद न करें।
  • क्षयरोगियों के साथ भेद-भाव न बरतें।
  • जहाँ-तहाँ न थूकें।

डॉट्स क्या है?

क्षयरोग की चिकित्सा हेतु डॉट्स (डाइरेक्टली ऑब्जर्व्ड शॉर्ट कोर्स), अर्थात् सीधे तौर पर लिए जाने वाला छोटी अवधि का इलाज है। यह क्षयरोग की पहचान एवं चिकित्सा हेतु विश्वभर में प्राथमिक स्वास्थ केन्द्रों द्वारा अपनायी जाने वाली एक समग्र रणनीति का नाम है। इसके अंतर्गत 5 बातें आती हैं:

  • राष्ट्रीय क्षयरोग नियंत्रण कार्यक्रम के प्रति राजनैतिक प्रतिबद्धता।
  • फुफ्फुसीय क्षयरोग के लक्षण वाले रोगियों की, विशेषकर जिन व्यक्तियों की खाँसी तीन सप्ताह या उससे अधिक पुरानी हो, उन रोगियों की परिचर्या में लगे व्यक्तियों में संक्रमण की पहचान करने हेतु सूक्ष्मदर्शिकीय सेवाएँ उपलब्ध कराना।
  • क्षयरोगनाशी दवाओं की नियमित एवं निर्बाध आपूर्ति। क्षयरोगियों की निर्बाध चिकित्सा के लिए डॉट्स रणनीति के अंतर्गत सभी स्वास्थ्य केन्द्रों पर क्षयरोगनाशी दवाओं की विश्व्सनीय एवं उच्चगुणवत्तायुक्त आपूर्ति एक महत्त्वपूर्ण कारक है।
  • कम से कम आरंभिक गहन चिकित्सा वाले चरण में इलाज का प्रत्यक्ष प्रेक्षण। डॉट्स नीति के एक अंग के रूप में स्वास्थ्यकर्मी अपने रोगियों को दवा के प्रबल सम्मिश्रण वाली खुराक देते हुए उन्हें परामर्श देंग़े और प्रेक्षण करेंगे।
  • निदान के अंतर्गत प्रत्येक रोगी के इलाज के मूल्यांकन तथा कार्यक्रम पर्यवेक्षण हेतु निरीक्षण एवं उत्तरदायित्व की व्यवस्था।

डॉट्स के क्या लाभ हैं?

  • डॉट्स द्वारा चिकित्सकीय सफलता का स्तर 95% तक होता है।
  • डॉट्स, रोग में त्वरित एवं सुनिश्चित लाभ की गारंटी देता है।
  • डॉट्स ने पूर भारत में 17 लाख रोगियों का जीवन बदला है।
  • डॉट्स गरीबी उन्मूलन की भी एक रणनीति है। जीवन की सुरक्षा, रोग की अवधि को कम करने तथा नये संक्रमण को रोकने का अर्थ है रोजगार के कम वर्षों की हानि।
  • डॉट्स, एचआईवी संक्रमित क्षयरोगियों के जीवन काल को बढ़ाता है।
  • डॉट्स, चिकित्सकीय असफलता तथा अनेक दवाओं के लिए क्षयरोग के प्रतिरोधी हो जाने को रोकने हेतु रोगियों की उचित देखभाल तथा दवाओं की निर्बाध आपूर्ति को सुनिश्चित करता है।
  • डॉट्स, स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच बढ़ाता है। डॉट्स की रणनीति पेरिफेरल स्वास्थ सेवाओं के विकास को प्रोत्साहित करने में महत्त्वपूर्ण रूप से सफल रही है।
  • डॉट्स सभी स्वास्थ केंद्रों पर नि:शुल्क उपलब्ध हैं।

दवाओं के लिए प्रतिरोधी क्षयरोग क्या है?

हाल के वर्षों में ‘दवाओं के लिए प्रतिरोधी क्षयरोग’, जिसपर सामान्य क्षयरोग में दी जाने वाली एंटीबायोटिक का असर नहीं होता, के उत्पन्न होने से क्षयरोग एक बड़ी समस्या बन गया है। दवाओं के लिए प्रतिरोधकता का कारण है रोगियों द्वारा अनियमित और अधूरा इलाज करवाना। एमडीआर(MDR) क्षयरोग को दवाओं का नियमित और पूर्ण अवधि तक सेवन द्वारा रोका जा सकता है। इस तरह के क्षयरोग के लिए अत्यंत मँहगी दवाएँ होती हैं, जो इसके बावजूद असरदार नहीं भी हो सकती हैं, और इलाज की अवधि दो वर्षों से भी अधिक खिंच सकती है।

क्षयरोग तथा एचआईवी किस प्रकार संबंधित हैं?

  • क्षयरोग से कोई भी व्यक्ति संक्रमित हो सकता है किंतु एचआईवी-पीड़ित व्यक्ति के क्षयरोग से संक्रमित होने का खतरा बहुत अधिक होता है।
  • यहाँ तक कि यदि आपको केवल क्षयरोग का संक्रमण हो, जीवाणु आपके शरीर में रह सकता है और यह आपके लिए खतरनाक हो सकता है। एचआईवी के कारण आपके प्रतिरोधी तंत्र के कमजोर पड़ जाने से जीवाणु अपनी संख्या बढ़ाकर बहुगुणित हो सकते हैं और तब यह बढ़कर क्षयरोग बन जाता है।

यक्ष्मा नियंत्रण कार्यक्रम की उपलब्धियां

राज्य सरकार ने जारी की पुनरीक्षित राष्ट्रीय यक्ष्मा नियंत्रण कार्यक्रम की उपलब्धियां

स्वस्थ झारखण्ड सुखी झारखण्ड के नारे के साथ झारखण्ड सरकार ने विश्व यक्ष्मा दिवस 24 मार्च को मनाया। देश में 3 मिलियन लोगों तक अपनी पहुँच बनाने और उन्हें ढूँढ़ कर उनका इलाज कराने के लिए यह कार्यक्रम प्रयासरत है।

विश्व में हर साल 90 लाख लोग टीबी से ग्रसित होते हैं। 30 लाख लोगों को आवश्यक सेवाएँ नहीं मिलती।

निर्गत आदेश

भारत सरकार तथा झारखण्ड सरकार द्वारा निर्गत आदेशानुसार:

  • लोकहित में टीबी रोग के निदान हेतु SerodiagnosticTest Kits के विनिर्माण, बिक्री, संवितरण, प्रयोग एवं आयत वर्जित किया गया है।
  • सभी स्वास्थ्य प्रदाता यथा सरकारी/ गैर सरकारी लोक उपक्रम के अस्पताल/ Individiual Practitioner के Clinical establishment द्वारा प्रत्येक चिन्हित टीबी रोगी को जिला यक्ष्मा पदाधिकारी कार्यालय में अधिसूचित किया जाना है।

झारखंण्ड के संदर्भ में

झारखण्ड सरकार द्वारा दी गयी सुविधाएँ एवं उपलब्धियाँ

सुविधाएँ

उपलब्धियाँ

डॉट्स प्रणाली के अंतर्गत टीबी रोगियों के मुफ्त निदान एवं उपचार हेतु झारखण्ड राज्य में 72 यक्ष्मा इकाई, 300 बलगम जांच केंद्र एवं 19 हज़ार से अधिक डॉट्स प्रदाता कार्यरत |

राज्य के सभी जिलों में TB रोगियों के मुफ्त निदान एवं उपचार की व्यवस्था|

Drug Resistant TB रोगियों के त्वरित एवं मुफ्त जांच हेतु इटकी आरोग्यशाला में राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त अत्याधुनिक प्रयोगशाला कार्यरत|

डॉट्स पद्यति के अंतर्गत अ तक

  • लगभग 12 लाख संभावित यक्ष्मा रोगियों की मुफ्त बलगम जांच
  • 357536 यक्ष्मा रोगियों का मुफ्त उपचार
  • 378 Drug Resistant TB रोगियों का मुफ्त उपचार

राज्य के सभी जिलों में Drug Resistant TB रोगियों में मुफ्त उपचार की व्यवस्था|

विगत 7 वर्षों से नया धनात्मक बलगम रोगी खोज दर एवं सफलता दर राष्ट्रीय मानक के अनुरूप|

Drug Resistant TB रोगियों के उपचार प्रारंभ हेतु इटकी आरोग्यशाला एवं PMCH धनबाद में DR-TB Centre स्थापित, दुमका एवं जमशेदपुर में स्थापना अंतिम चरण में|

यक्ष्मा नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत CBCI, IMA, CARE, CHAI, EHA एवं अन्य गैर सरकारी संस्थानों की भागीदारी|

TB-HIV रोगियों के लिए विशेष सेवा

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Narendra Rathod Apr 06, 2018 05:28 PM

T.B. treatment can Ayurveda because the case. Of problem as एँलरजी of all aliphatic medicine so I Want Ayurveda treatment in TB

Sanjay dhakar Mar 23, 2018 12:23 PM

Sir me 11month se tb ka treatment le rha hu me ab thik hu lekin me thik se fresh hone nhi jata koi upay bataye

Saurabh Mar 07, 2018 01:02 PM

Thanks सर For nice इनXार्Xेशन Techpadho.in

Anonymous Mar 01, 2018 12:21 AM

Kya ek bar ilaj k bad Dobara tb hone ki sambhavna hoti hai

हराधान महतो Feb 24, 2018 01:26 PM

मेरा सवाल है कि यदि किसी tb मरीज का वजन 50 साल के उम्र में 25 kg है तो उसका क्या उपचार है

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