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दैहिक बीमारी

इस भाग में यकृत रोग, गुर्दा (किडनी) रोग एवं मस्तिष्क रोग के बारे में जानकारी उपलब्ध है

यकृत रोग

हीपैटिक एंसिलोपैथी

हीपैटिक एंसिलोपैथी (पोर्टल-प्रणालीगत एंसिलोपैथी, लीवर एंसिलोपैथी, लीवर कोमा) मस्तिष्क के कार्य में आनेवाली गिरावट है जो इसलिए होती है कि सामान्यत: यकृत द्वारा रक्त से निकाले जाने वाले विषैले पदार्थ रक्त में जमा होने लगते हैं तथा मस्तिष्क तक पहुँच जाते हैं।

  • हीपैटिक एंसिलोपैथी शराब के सेवन, किसी ड्रग या लम्बे समय से यकृत की बीमारी से ग्रस्त लोगों में किसी अन्य तनाव की वज़ह से हो सकता है।
  • लोग भ्रमित हो सकते हैं, उन्हें दिशाभ्रम हो सकता है, उनींदेपन के साथ व्यक्तित्व, व्यवहार एवं मूड में बदलाव हो सकता है।
  • डॉक्टर शारीरिक परीक्षण, इलेक्ट्रोएंसिफेलोग्राफी एवं रक्त परीक्षण के नतीज़ों के आधार पर निदान करते हैं।
  • रोग शुरू होने के कारण दूर करने एवं आहार में प्रोटीन कम करने से लक्षणों को समाप्त करने में मदद मिल सकती है |

आँत से रक्तधारा में शोषित पदार्थ यकृत से गुज़रते हैं जहाँ विषाक्त पदार्थ सामान्यत: निकाले जाते हैं। इनमें से कई विषैले पदार्थ प्रोटीन पाचन के सामान्य विखंडन के उत्पाद होते हैं। हीपैटिक एंसिलोपैथी में विषाक्त पदार्थ नहीं निकलते क्योंकि यकृत की कार्यप्रणाली बिगड़ जाती है। यकृत के रोग के परिणामस्वरूप, उसका कारण चाहे जो हो, विषाक्त पदार्थ शिरापरक प्रणाली एवं सामान्य (व्यवस्थागत, या पूरे शरीर में) शिरापरक प्रणाली के बीच बनें जोड़ों से यकृत को बायपास कर सकते हैं एवं इसका परिणाम एक जैसा होता है: विषाक्त पदार्थ मस्तिष्क तक पहुँच सकते हैं एवं उसकी कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। मस्तिष्क के लिए कौन से पदार्थ विषाक्त हैं, यह एकदम सही तरह से बताना मुश्किल है, लेकिन अमोनिया, रक्त में प्रोटीन ब्रेकडाउन के उत्पाद की भूमिका निभाते प्रतीत होते हैं।

लम्बे समय से यकृत विकार से ग्रस्त व्यक्तियों में एंसिलोपैथी आम बात है, तीव्र संक्रमण तथा अल्कोहल के सेवन से यकृत का नुकसान बढ़ता है। या अत्यधिक प्रोटीन लेने से एंसिलोपैथी शुरू हो सकती है, जो रक्त में प्रोटीन ब्रेकडाउन के उत्पादों के स्तरों को बढ़ा देता है। पाचन तंत्र में रक्तस्राव, जैसे अन्न नली (ईसोफैगल वेरिसेस) में फैली, मुड़ी नसों से रक्तस्राव, ही प्रोटीन ब्रेकडाउन उत्पादों के जमाव को बढ़ा सकता है, जो मस्तिष्क पर सीधा असर कर सकता है। निर्जलन, इलेक्ट्रोलाइट का असंतुलन एवं कुछ खास दवाएं- विशेषकर कुछ नींद की दवाएं, दर्दनाशक एवं मूत्रवर्धक दवाएं- भी एंसिलोपैथी कर सकती हैं। जब ऐसे कारक खत्म कर दिए जाते हैं तो एंसिलोपैथी गायब हो सकती है। आहार में प्रोटीन कम करके समस्या हल की जा सकती है।

लक्षण एवं निदान

इसमें मस्तिष्क की गतिविधि घटने लगती है, विशेषतः सतर्कता में कमी तथा भ्रम। एकदम शुरुआती दौर में, तार्किक सोच, व्यक्तित्व एवं व्यवहार में सूक्ष्म परिवर्तन दिखाई देते हैं। व्यक्ति का स्वभाव बदल सकता है तथा निर्णय प्रभावित हो सकते हैं। नींद का सामान्य रूटीन गड़बड़ा सकता है। एंसिलोपैथी के किसी भी दौर में व्यक्ति की सांस में बासी मीठी गन्ध हो सकती है। जैसे-जैसे विकार बढ़ता है, जब व्यक्ति भुजा फैलाता है तो व्यक्ति हाथ स्थिर नहीं रख सकता है एवं नतीजतन हाथ फड़फड़ाते हैं (एस्टेरिक्सिस)। साथ ही, आमतौर पर व्यक्ति उनींदा एवं भ्रमित हो सकता है एवं चलना-फिरना तथा बोलना सुस्ती भरा हो सकता है। भटकाव आम बात है। असामान्य स्थिति में, एंसिलोपैथी से ग्रस्त व्यक्ति गुस्सैल तथा उत्तेजित हो सकता है। दौरा पड़ना भी सामान्य बात है। अंततः व्यक्ति अचेतन हो सकता है तथा कौमा में जा सकता है।

इलेक्ट्रोएंसिफेलोग्राम (ईईजी) (मस्तिष्क, मेरुदंड एवं स्नायु विकार का निदान: इलेक्ट्रोएंसिफेलोग्राफी) से एंसिलोपैथी के जल्द निदान में मदद मिल सकती है। यहाँ तक कि मामूली मामलों में भी, ईईजी मस्तिष्क की तरंगें असामान्य रूप से धीमी होना दर्शाता है। रक्त परीक्षण सामान्यतः रक्त में असामान्य रूप से बढ़े अमोनिया के स्तर को दर्शाता है, लेकिन इस स्तर को मापना

एंसिलोपैथी के हमेशा निदान के लिए विश्वसनीय तरीका नहीं है।

उपचार

एक चिकित्सक एंसिलोपैथी के कारक ढूंढ़ता है तथा उन्हें समाप्त करने का प्रयास करता है, जैसे कि संक्रमण या कोई दवा। एक चिकित्सक आंतों से विषैले पदार्थ हटाने का भी प्रयास करता है, आमतौर पर व्यक्ति के आहार पर नियंत्रण द्वारा। आहार से प्रोटीन कम किया या हटाया जाता है तथा मुँह से लिए गए या नसों द्वारा दिए गए कार्बोहाइड्रेट कैलोरी के मुख्य स्रोत होते हैं। बाद में, एंसिलोपैथी की स्थिति बिगाड़े बिना प्रोटीन की उचित मात्रा देने के लिए चिकित्सक बजाय पशु प्रोटीन के, वनस्पति प्रोटीन की मात्रा में वृद्धि (जैसे सोया प्रोटीन के रूप में) कर सकते हैं। सब्जी के रूप में लिए गए आहार में फाइबर की अधिक मात्रा से आँतों में भोजन की गति बढ़ जाती है व आँत में अम्लता को बदल सकती है एवं फलस्वरूप अमोनिया के अवशोषण को कम करने में मदद कर सकती है। मुँह द्वारा ली गई कृत्रिम शर्करा (लैक्टुलोज़) भी समान रूप से लाभकारी प्रभाव वाला होता है, यह आँत में अम्लता को कम करती है, एक रेचक के रूप में कार्य कर अन्न के गुज़रने की गति को बढ़ा सकती है। सफाई के लिए एनिमा भी दिया जा सकता है। कभी-कभी, ऐसे व्यक्ति जिसे लैक्टुलोज़ बर्दाश्त करने में कठिनाई हों, उसे मुँह से एक एंटीबायोटिक दिया जाता है।

उपचार द्वारा हीपैटिक एंसिलोपैथी अक्सर उलटने योग्य होती है। वास्तव में, पूर्ण रूप से ठीक होना संभव है, खासकर अगर एंसिलोपैथी एक प्रतिवर्ती कारण से हुई हो। लेकिन यकृत की दीर्घकालीन विकार के मामलों में, भविष्य में एंसिलोपैथी की पुनरावृत्ति सम्भव है। यकृत में गम्भीर सूजन क बाद कौमा में गए मरीजों में से 80% तक के मामलों में, गहन उपचार के बावज़ूद यह विकार जानलेवा होता है।

स्रोत:MERCK

हेपेटाइटिस ए

परिभाषाः
हेपेटाइटिस ए जिगर की सूजन (जिससे चिड़चिड़ापन होता है) है जो हेपेटाइटिस ए वायरस के कारण होती है।

वैकल्पिक नामः वाइरल हेपेटाइटिस

कारणः
हेपेटाइटिस ए, दूषित भोजन, जल इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति के संपर्क में आने के कारण फैलती है। लक्षण प्रकट होने से पहले और बीमारी के प्रथम सप्ताह में अंडे तैयार होने के 15 से 45 दिन के दौरान ग्रस्त व्यक्ति के मल से हेपेटाइटिस ए वायरस फैलता है। रक्त एवं शरीर के अन्य द्रव्य भी संक्रामक हो सकते हैं।
संक्रमण समाप्त होने के बाद शरीर में वाइरस नहीं रहता है और न ही वाहक ही रहता है। (कोई व्यक्ति या पशु, जो बीमारी को एक से दूसरे में फैलाते हैं पर स्वयं बीमार नहीं पड़ते)। हेपेटाइटिस ए के लक्षण फ्लू जैसे ही होते हैं, किंतु त्वचा तथा आंखे पीली (पीलिया) हो जाती हैं क्योंकि जिगर रक्त से बिलीरूबिन को छान नहीं पाता है। अन्य सामान्य हेपेटाइटिस वायरस, हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी है, किंतु हेपेटाइटिस ए सबसे कम गंभीर है और इन बीमारियों में सबसे मामूली है। अन्य दोनों बीमारियां लंबी बीमारियों में परिवर्तित हो सकती है। किंतु हेपेटाइटिस ए नहीं।

लक्षणः

  • पीलिया
  • थकावट
  • भूख न लगना
  • मिचली
  • हल्का ज्वर
  • पीला या स्लेटी रंग का मल
  • पीले रंग का पेशाब
  • सारे शरीर में खुजली

रोकथाम
अशुद्ध भोजन व पानी से दूर रहें, शौच आदि से निवृत्त होकर हाथ अच्छी तरह से धोएं, तथा प्रभावित व्यक्ति के रक्त, फेसिस या शरीर के द्रव्यों के संपर्क में आने पर अच्छी तरह से अपने आपको साफ करके वायरस को बढ़ने या फैलने से रोका जा सकता है।

दैनिक देखभाल सुविधाएं और लोगो के घनिष्ट संपर्क में आने वाले अन्य संस्थानों के कारण हेपेटाइटिस ए के फैलने की संभावना अधिक हो जाती है। कपड़े बदलने से पहले और बाद में हाथ अच्छी तरह से धोने, भोजन परोसने से पहले और शौचालय के बाद हाथ साफ करने से इसके फैलने को रोका जा सकता है।
हेपेटाइटिस ए से ग्रस्त लोगों के संपर्क में रहने वाले लोगों को इम्यून ग्लोब्युलिन देना चाहिए। हेपेटाइटिस ए संक्रमण के रोकने के लिए टीके उपलब्ध है। टीके की प्रथम खुराक लेने के चार सप्ताह बाद टीका असर करना शुरू कर देता है। लंबे समय तक सुरक्षा के लिए 6 से 12 माह का बूस्टर आवश्यक है।

वे व्यक्ति जिन्हें टीका लगाना आवश्यक हैः

  • हेपेटाइटिस ए से बहुत अधिक प्रभावित क्षेत्रों या देशों की यात्रा करते हों (पहला टीका लगाने के बाद 4 सप्ताह में अधिक प्रभावित क्षेत्रों की यात्रा करने वालों को एक और टीका (इम्यून सिरमग्लोब्यूलिन) उसी समय दे दिया जाना चाहिए जब टीका दिया जा रहा हो लेकिन यह टीका उस स्थान पर नहीं दिया जाना चाहिए जहां पहला टीका दिया गया हो)
  • गुदा संभोग करते हों
  • आई वी (नसों में) दवा के उपयोगकर्ता
  • जो गंभीर रूप से हेपेटाइटिस बी या सी से संक्रमित हों

हेपटाइटिस बी

परिभाषाः

हेपटाइटिस ए जिगर की सूजन (जिससे चिड़चिड़ापन होता है) है जो हेपटाइटिस ए वाइरस के कारण होती है।

वैकल्पिक नामः

वाइरल हेपटाइटिस

कारणः

हेपटाइटिस ए दूषित भोजन या जल द्वारा या फिर इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति के संपर्क में आने के कारण फैलती है। लक्षण प्रकट होने से पहले और बीमारी के प्रथम सप्ताह में अंडे तैयार होने के 15 से 45 दिन के दौरान ग्रस्त व्यक्ति के मल से हेपटाइटिस ए वाइरस फैलता है। रक्त एवं शरीर के अन्य द्रव्य भी संक्रामक हो सकते हैं।

संक्रमण समाप्त होने के बाद शरीर में वाइरस नहीं रहता है और न ही वाहक ही रहता है। (कोई व्यक्ति या पशु, जो बीमारी को एक से दूसरे में फैलाते हैं पर स्वयं बीमार नहीं पड़ते)। हेपटाइटिस ए के लक्षण फ्लू जैसे ही होते हैं, किंतु त्वचा तथा आंखे पीली (पीलिया) हो जाती हैं क्योंकि जिगर रक्त से बिलीरूबिन को छान नहीं पाता है। अन्य सामान्य हेपटाइटिस वायरस हेपटाइटिस बी और हेपटाइटिस सी है, किंतु हेपटाइटिस ए सबसे कम गंभीर है और इन बीमारियों में सबसे मामूली है। अन्य दोनों बीमारियां लंबी बीमारियों में परिवर्तित हो सकती है। किंतु हेपटाइटिस ए नहीं।

लक्षणः

  • पीलिया
  • थकावट
  • भूख न लगना
  • मिचली
  • हल्का ज्वर
  • पीला या स्लेटी रंग का मल
  • पीले रंग का पेशाब
  • सारे शरीर में खुजली

रोकथाम

अशुद्ध भोजन व पानी से दूर रहें, शौच आदि से निवृत्त होकर हाथ अच्छी तरह से धोएं, तथा प्रभावित व्यक्ति के रक्त, फेसिस या शरीर के द्रव्यों के संपर्क में आने पर अच्छी तरह से आपने आप को साफ करके वायरस को बढ़ने या फैलने से रोका जा सकता है।

दैनिक देखभाल सुविधाएं और लोगो के घनिष्ट संपर्क में आने वाले अन्य संस्थानों के कारण हेपटाइटिस ए के तेजी से फैलने की संभावना अधिक हो जाती है। कपड़े बदलने से पहले और बाद में हाथ अच्छी तरह से धोने, भोजन परोसने से पहले और शौचालय के उपयोग के बाद हाथ साफ करने से संस्थानों द्वारा संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है।

हेपटाइटिस ए से ग्रस्त लोगों के घनिष्ट संपर्क में रहने वाले लोगों को इम्यून ग्लोब्युलिन देना चाहिए। हेपटाइटिस ए संक्रमण के रोकने के लिए टीके उपलब्ध हैं। टीके की प्रथम खुराक लेने के चार सप्ताह बाद टीका असर करना शुरु कर देता है। लंबे समय तक सुरक्षा के लिए 6 से 12 माह का बूस्टर आवश्यक है।

वे व्यक्ति जिन्हें टीका लगाना आवश्यक हैः

  • हेपटाइटिस ए से बहुत अधिक प्रभावित क्षेत्रों या देशों की यात्रा करते हों (पहला टीका लगाने के बाद 4 सप्ताह में अधिक प्रभावित क्षेत्रों की यात्रा करने वालों को एक और टीका (इम्यून सिरमग्लोब्यूलिन) उसी समय दे दिया जाना चाहिए जब टीका दिया जा रहा हो लेकिन यह टीका उस स्थान पर नहीं दिया जाना चाहिए जहां पहला टीका दिया गया हो)
  • गुदा संभोग करते हों
  • आई वी (नसों में) दवा के उपयोगकर्ता
  • जो गंभीर रूप से हेपटाइटिस बी या सी से संक्रमित हों

वृक्कीय खराबी

परिभाषाः
इलेक्ट्रोलाइटस को संरक्षित करने, मूत्र को जमा करने, मैल को उत्सर्जित करने की वृक्क की क्षमता धीरे-धीरे निरंतर रूप से कम होती है जिसे वृक्कीय खराबी कहा जाता है।

वैकल्पिक नामः
गुर्दे की खराबी-दीर्घकालिक, वृक्कीय खराबी-दीर्घकालिक, दीर्घकालिक वृक्कीय अक्षमता, सी आर एफ, दीर्घकालिक गुर्दे की खराबी।

कारणः तेजी से होने वाले वृक्कीय रोग जिसमें गुर्दे एकाएक खराब हो जाते है, लेकिन वह फिर से कार्य करने लगते हैं जबकि दीर्घकालिक वृक्कीय रोग धीरे-धीरे गंभीर रूप धारण करने लगते हैं। ऐसा अक्सर किसी भी अन्य रोग के परिणामस्वरूप हो सकते हैं, जिसमें गुर्दे धीरे धीरे कार्य करना बंद कर देते है। गुर्दे के, मामूली से लेकर गंभीर रोग हो सकते हैं। दीर्घकालिक वृक्कीय रोग सामान्यतः कई वर्षों में पनपता है क्योंकि गुर्दे की आंतरिक संरचना धीरे धीरे क्षतिग्रस्त होती जाती है। रोग की आरंभिक स्थिति में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। जब तक गुर्दे का 1/10 वां भाग भी सामान्य रूप से कार्य करता रहता है तब तक कोई लक्षण दिखाई नहीं देता।
मधुमेह और उच्च रक्तचाप इन दो कारणों से सामान्यतः दीर्घकालिक वृक्कीय रोग होता है। दीर्घकालिक वृक्कीय रोग की वजह से शरीर में व्यर्थ पदार्थ और द्रव जमा होने लगता है जिससे एझोटेमिया और यूरेमिया होता है। रक्त में व्यर्थ पदार्थ नाइट्रोजन के जमा होने से एझोटेमिया होता है। इसमें ऐसा आवश्यक नहीं कि लक्षण दिखाई दें। वृक्कीय रोग की वजह से स्वास्थ्य पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव ही यूरेमिया है। दीर्घकालिक वृक्कीय रोग से अधिकांश शारीरिक तंत्र प्रभावित होता है। द्रव के जमा होने और यूरेमिया से कई जटिलताएं उत्पन्न होती हैं।
लक्षणः
आरंभिक लक्षण निम्नलिखित हो सकते हैं-

  • बिना किसी वजह के वजन कम होना
  • जी मिचलाना, उल्टियां
  • स्वास्थ्य ठीक न लगना
  • थकान
  • सिरदर्द
  • अक्सर हिचकियां आना
  • स्थान विशेष पर खुजली आना

बाद में दिखाई देने वाले लक्षण निम्नलिखित हो सकते हैं-

  • बहुत ज्यादा या बहुत कम पेशाब आना
  • रात में पेशाब करना पड़े
  • आसानी से खरोंच लगना और खून निकलना
  • खून की उल्टियां होना या मल में से खून निकलना
  • सुस्ती आना, उनींदापन, नींद में चलना, निष्चेष्ट
  • असमंजसता सन्निपात
  • कोमा
  • मांसपेशियों में जकड़न या ऐंठन मरोड़
  • जकड़न
  • यूरेमिक फ्रोस्ट-त्वचा पर सफेद चमकदार धब्बे पड़ना
  • हाथ, पैर या अन्य भागों में संवेदना में कमी

इसके कुछ और लक्षण भी हो सकते हैं, जैसेः

  • रात में अधिक पेशाब आना
  • अधिक प्यास लगना
  • असामान्य रूप से काली या उजली त्वचा
  • पीलापन
  • नाखून असामान्य होना
  • सांस में दुर्गंध
  • उच्च रक्तचाप
  • भूख में कमी
  • उग्र होना

चिकित्सक से कब मिलें-

  • यदि दो हफ्तों से ज्यादा अवधि से मिचली आ रही हो या उल्टी हो रही हो
  • कम पेशाब आ रहा हो या दीर्घकालिक वृक्क रोग के अन्य लक्षण दिखाई दे रहे हों

निवारण/रोकथाम -
इस रोग के इलाज से इस बीमारी की रोकथाम की जा सकती है या इसे बढ़ने से रोका जा सकता है। रोगी को ब्लड शुगर और रक्तचाप पर नियंत्रण रखना चाहिए और धूम्रपान से बचना चाहिए।

अमीबिक जिगर मवाद भरा फोड़ा

परिभाषा
अमीबाजन्य जिगर फोड़ा जिगर में पीब जमा होने को कहते हैं जो आंत्र परजीवी एटामोइबा हिस्टोलिटिका के कारण होता है।

वैकल्पिक नामः हेपटिक अमीबियासिस का अतिरिक्त नाम - आंत्र अमीबियासिस; फोड़ा-अमीबाजन्य जिगर

कारणः
अमीबाजन्य जिगर फोड़ा एटामोइबा हिस्टोलिटिका के कारण होता है। यह वही जीवाणु है जिसके कारण अमीबियासिस अर्थात आंत्र संक्रमण होता है। इसके जीवाणु खून से जिगर तक पहुंचता है। गंदे-संदूषित खाने की चीजें या पानी, मनुष्य के मल मूत्र को खाद के रूप में प्रयोग में लाने और व्यक्ति से व्यक्ति के संपर्क में आने से यह फैलता है। अमीबिक जिगर फोड़ा होने के निम्नलिखित कारण है:

  • पोषक तत्वों की कमी
  • बुढ़ापा
  • गर्भधारण
  • उत्तेजक दवाओं का उपयोग
  • कैंसर
  • संक्रमण रोधक शक्ति की कमी
  • शराब की लत
  • हाल में की गई ट्रॉपिकल क्षेत्रों की यात्रा
  • समलैंगिकता, विशेषकर पुरुषों में

लक्षणः
इसके मरीजों में आंत्र संक्रमण के लक्षण हो भी सकते है और नहीं भी। सामान्यतः दिखाई देने वाले लक्षण निम्नलिखित हैं:

  • सामान्य बेचैनी, तकलीफ या घबराहट महसूस करना
  • पसीना आना
  • कंपकपी
  • भूख न लगना
  • वजन कम होना
  • दस्त
  • पीलिया
  • जोड़ों में दर्द

मधुमेह

मधुमेह होने पर शरीर में भोजन को ऊर्जा में परिवर्तित करने की सामान्य प्रक्रिया तथा होने वाले अन्य परिवर्तनों का विवरण नीचे दिया जा रहा है-
भोजन का ग्लूकोज में परिवर्तित होनाः हम जो भोजन करते हैं वह पेट में जाकर एक प्रकार के ईंधन में बदलता है जिसे ग्लूकोज कहते हैं। यह एक प्रकार की शर्करा होती है। ग्लूकोज रक्त धारा में मिलता है और शरीर की लाखों कोशिकाओं में पहुंचता है।
ग्लूकोज कोशिकाओं में मिलता हैः अग्नाशय(पेनक्रियाज) वह अंग है जो रसायन उत्पन्न करता है और इस रसायन को इनसुलिन कहते हैं। इनसुलिन भी रक्तधारा में मिलता है और कोशिकाओं तक जाता है। ग्लूकोज से मिलकर ही यह कोशिकाओं तक जा सकता है।
कोशिकाएं ग्लूकोज को ऊर्जा में बदलती हैः शरीर को ऊर्जा देने के लिए कोशिकाएं ग्लूकोज को उपापचित (जलाती) करती है।
मधुमेह होने पर होने वाले परिवर्तन इस प्रकार हैं: मधुमेह होने पर शरीर को भोजन से ऊर्जा प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
भोजन ग्लूकोज में बदलता हैः पेट फिर भी भोजन को ग्लूकोज में बदलता रहता है। ग्लूकोज रक्त धारा में जाता है। किन्तु अधिकांश ग्लूकोज कोशिकाओं में नही जा पाते जिसके कारण इस प्रकार हैं:
1. इनसुलिन की मात्रा कम हो सकती है।
2.  इनसुलिन की मात्रा अपर्याप्त हो सकती है किन्तु इससे रिसेप्टरों को खोला नहीं जा सकता है।
3.  पूरे ग्लूकोज को ग्रहण कर सकने के लिए रिसेप्टरों की संख्या कम हो सकती है।
कोशिकाएं ऊर्जा पैदा नहीं कर सकती हैः
अधिकांश ग्लूकोज रक्तधारा में ही बना रहता है। यही हायपर ग्लाईसीमिआ (उच्च रक्त ग्लूकोज या उच्च रक्त शर्करा) कहलाती है। कोशिकाओं में पर्याप्त ग्लूकोज न होने के कारण कोशिकाएं उतनी ऊर्जा नहीं बना पाती जिससे शरीर सुचारू रूप से चल सके।

मधुमेह के लक्षणः

मधुमेह के मरीजों को तरह-तरह के अनुभव होते हैं। कुछेक इस प्रकार हैं:

  • बार-बार पेशाब आते रहना (रात के समय भी)
  • त्वचा में खुजली
  • धुंधला दिखना
  • थकान और कमजोरी महसूस करना
  • पैरों में सुन्न या टनटनाहट होना
  • प्यास अधिक लगना
  • कटान/घाव भरने में समय लगना
  • हमेशा भूख महसूस करना
  • वजन कम होना
  • त्वचा में संक्रमण होना

गुर्दा (किडनी) रोग

पथरी

परिभाषा

पथरी छोटे छोटे दानों का ढेर होता है। गुर्दें में एक समय में एक या अधिक पथरी हो सकती है।

वैकल्पिक नामः

वृक्कीय कैल्कली, नेफरोलिथियासिस, पथरी,-गुर्दा

कारण

किसी पदार्थ के कारण जब मूत्र सान्द्र (गाढ़ा) हो जाता है तो पथरी निर्मित होने लगती है। इस पदार्थ में छोटे छोटे दाने बनते हैं जो बाद में पथरी में तब्दील हो जाते है। इसके लक्षण जब तक दिखाई नहीं देते तब तक ये मूत्रमार्ग में बढ़ने लगते है और दर्द होने लगता है। इसमें काफी तेज दर्द होता है जो बाजू से शुरु होकर उरू मूल तक बढ़ता है।

पथरी के प्रकार

  • सबसे आम पथरी कैल्शियम पथरी है। पुरुषों में, महिलाओं की तुलना में दो से तीन गुणा ज्यादा होती है। सामान्यतः 20 से 30 आयु वर्ग के पुरुष इससे प्रभावित होते है। कैल्शियम अन्य पदार्थों जैसे आक्सलेट(सबसे सामान्य पदार्थ) फास्फेट या कार्बोनेट से मिलकर पथरी का निर्माण करते है। आक्सलेट कुछ खाद्य पदार्थों में विद्यमान रहता है।
  • पुरुषों में यूरिक एसिड पथरी भी सामान्यतः पाई जाती है। किस्टिनूरिया वाले व्यक्तियों में किस्टाइन पथरी निर्मित होती है। महिला और पुरुष दोनों में यह वंशानुगत हो सकता है।
  • मूत्रमार्ग में होने वाले संक्रमण की वजह से स्ट्रवाइट पथरी होती है जो आमतौर पर महिलाओं में पायी जाती है। स्ट्रवाइट पथरी बढ़कर गुर्दे, मूत्रवाहिनी या मूत्राशय को अवरुद्ध कर सकती है।

लक्षणः

  • बाजू अथवा पीठ दर्द
  • एक या दोनों ओर
  • बढ़ते जाना
  • तेज
  • पेट में दर्द (उदर शूल) मरोड़ जैसे)
  • फैल सकता है या बाजू, श्रोणि, उरू मूल, गुप्तांगो तक बढ़ सकता है
  • जी मिचलाना, मतली या उल्टी होना
  • बार बार और एकदम से पेशाब आना
  • पेशाब में खून आना
  • पेट दर्द
  • पेशाब करते समय दर्द होना
  • रात में अधिक पेशाब आना
  • रुक रुक कर पेशाब आना
  • अंडकोशों में दर्द
  • उरू मूल में दर्द
  • बुखार
  • ठंड लगना
  • पेशाब का रंग असामान्य होना

चिकित्सक से कब मिले?

जब आपको लगने लगे कि आप में गुर्दे की पथरी के लक्षण दिखाई दे रहे हों तो डाक्टर को दिखाएं। यदि गुर्दे की पथरी के लक्षण दोबारा दिखाई देने लगे, पेशाब करने में दर्द हो रहा हो, पेशाब कम हो रहा हो या अन्य नए लक्षण दिखाई देते हों तो भी डाक्टर को दिखाएं।

रोकथामः

यदि पथरी का इतिहास रहा हो तो अधिक मात्रा में द्रव्य ले ताकि मूत्र पतला हो सके(सामान्यतः 6 से 8 गिलास पानी प्रतिदित पीएं)। पथरी के प्रकार के आधार पर दवाइयां लें या अन्य उपाय करें ताकि इसे दोबारा होने से रोका जा सके।

दीर्घ कालीन वृक्कीय खराबी

परिभाषाः

इलेक्ट्रोलाइटस को संरक्षित करने, मूत्र को जमा करने, मैल को उत्सर्जित करने की वृक्क की क्षमता धीरे धीरे निरंतर रूप से कम होती है जिसे वृक्कीय खराबी कहा जाता है।

वैकल्पिक नामः

गुर्दे की खराबी-दीर्घकालिक, वृक्कीय खराबी-दीर्घकालिक, दीर्घकालिक वृक्कीय अक्षमता, सी आर एफ, दीर्घकालिक गुर्दे की खराबी।

कारणः

तेजी से होने वाले वृक्कीय रोग जिसमें गुर्दे एकाएक खराब हो जाते है, लेकिन वह फिर से कार्य करने लगते हैं जबकि दीर्घकालिक वृक्कीय रोग धीरे-धीरे गंभीर रूप धारण करने लगते हैं। ऐसा अक्सर किसी भी अन्य रोग के परिणामस्वरूप हो सकते हैं, जिसमें गुर्दे धीरे धीरे कार्य करना बंद कर देते है। गुर्दे के, मामूली से लेकर गंभीर रोग हो सकते हैं। दीर्घकालिक वृक्कीय रोग सामान्यतः कई वर्षों में पनपता है क्योंकि गुर्दे की आंतरिक संरचना धीरे धीरे क्षतिग्रस्त होती जाती है। रोग की आरंभिक स्थिति में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। जब तक गुर्दे का 1/10 वां भाग भी सामान्य रूप से कार्य करता रहता है तब तक कोई लक्षण दिखाई नहीं देता।

मधुमेह और उच्च रक्तचाप इन दो कारणों से सामान्यतः दीर्घकालिक वृक्कीय रोग होता है। दीर्घकालिक वृक्कीय रोग की वजह से शरीर में व्यर्थ पदार्थ और द्रव जमा होने लगता है जिससे एझोटेमिया और यूरेमिया होता है। रक्त में व्यर्थ पदार्थ नाइट्रोजन के जमा होने से एझोटेमिया होता है। इसमें ऐसा आवश्यक नहीं कि लक्षण दिखाई दें। वृक्कीय रोग की वजह से स्वास्थ्य पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव ही यूरेमिया है। दीर्घकालिक वृक्कीय रेग से अधिकांश शारीरिक तंत्र प्रभावित होता है। द्रव के जमा होने और यूरेमिया से कई जटिलताएं उत्पन्न होती हैं।

लक्षणः

आरंभिक लक्षण निम्नलिखित हो सकते हैं-

  • बिना किसी वजह के वजन कम होना
  • जी मिचलाना, उल्टियां
  • स्वास्थ्य ठीक न लगना
  • थकान
  • सिरदर्द
  • अक्सर हिचकियां आना
  • स्थान विशेष पर खुजली आना

बाद में दिखाई देने वाले लक्षण निम्नलिखित हो सकते हैं-

  • बहुत ज्यादा या बहुत कम पेशाब आना
  • रात में पेशाब करना पड़े
  • आसानी से खरोंच लगना और खून निकलना
  • खून की उल्टियां होना या मल में से खून निकलना
  • सुस्ती आना, उनींदीपन, नींद में चलना, निष्चेष्ट
  • असमंजसता सन्निपात
  • कोमा
  • मांसपेशियों में जकड़न या ऐंठन मरोड़
  • जकड़न
  • यूरेमिक फ्रोस्ट-त्वचा पर सफेद चमकदार धब्बे पड़ना
  • हाथ, पैर या अन्य भागों में संवेदना में कमी

इस के कुछ और लक्षण भी हो सकते हैं, जैसेः

  • रात में अधिक पेशाब आना
  • अधिक प्यास लगना
  • असामान्य रूप से काली या उजली त्वचा
  • पीलापन
  • नाखून असामान्य होना
  • सांस में दुर्गंध
  • उच्च रक्तचाप
  • भूख में कमी
  • उग्र होना

चिकित्सक से कब मिलें-

  • यदि दो हफ्तों से ज्यादा अवधि से मिचली आ रही हो या उल्टी हो रही हो
  • कम पेशाब आ रही हो या दीर्घकालिक वृक्क रोग के अन्य लक्षण दिखाई दे रहे हों

निवारण/रोकथाम-

इस रोग के इलाज से इस बीमारी की रोकथाम की जा सकती है या इसे बढ़ने से रोका सकता है। रोगी को ब्लड शुगर और रक्तचाप पर नियंत्रण रखना चाहिए और धूम्रपान से बचना चाहिए।

मस्तिष्क रोग

अल्झाइमर्स रोग

अल्झाइमर्स रोग दिमागी असामान्यता है। इसका नाम अलोइस अल्झाइमर पर रखा गया है, जिन्होंने सबसे पहले इसका विवरण दिया।

लक्षण

  • यह बढ़नेवाला और खतरनाक दिमागी रोग है।
  • अल्झाइमर से दिमाग की कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं, जिसके कारण याददाश्त, सोचने की शक्ति और अन्य व्यवहार बदलने लगते हैं। इसका असर सामाजिक जीवन पर पड़ता है।
  • समय बीतने के साथ यह बीमारी बढ़ती है और खतरनाक हो जाती है।
  • यह याददाश्त खोने (डीमेंसिया) का सबसे सामान्य रूप है। अन्य बौद्धिक गतिविधियां भी कम होने लगती हैं, जिससे प्रतिदिन के जीवन पर असर पड़ता है।

अल्झीमर्स के 10 चेतावनी संकेत

अल्झाइमर्स और दिमाग

हम जैसे-जैसे बूढ़े होते हैं, हमारी सोचने और याद करने की क्षमता भी कमजोर होती है। लेकिन इसका गंभीर होना और हमारे दिमाग के काम करने की क्षमता में गंभीर बदलाव उम्र बढ़ने का सामान्य लक्षण नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि हमारे दिमाग की कोशिकाएं मर रही हैं।
दिमाग में एक सौ अरब कोशिकाएं (न्यूरान) होती हैं। हरेक कोशिका बहुत सारी अन्य कोशिकाओं से संवाद कर एक नेटवर्क बनाती हैं। इस नेटवर्क का काम विशेष होता है। कुछ सोचती हैं, सीखती हैं और याद रखती हैं। अन्य कोशिकाएं हमें देखने, सुनने, सूंघने आदि में मदद करती हैं। इसके अलावा अन्य कोशिकाएं हमारी मांसपेशियों को चलने का निर्देश देती हैं।
अपना काम करने के लिए दिमाग की कोशिकाएं लघु उद्योग की तरह काम करती हैं। वे सप्लाई लेती हैं, ऊर्जा पैदा करती हैं, अंगों का निर्माण करती हैं और बेकार चीजों को बाहर निकालती हैं। कोशिकाएं सूचनाओं को जमा करती हैं और फिर उनका प्रसंस्करण भी करती हैं। शरीर को चलते रहने के लिए समन्वय के साथ बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन और ईंधन की जरूरत होती है।
अल्झाइमर्स रोग में कोशिकाओं की उद्योग का हिस्सा काम करना बंद कर देता है, जिससे दूसरे कामों पर भी असर पड़ता है। जैसे-जैसे नुकसान बढ़ता है, कोशिकाओं में काम करने की ताकत कम होती जाती है और अंततः वे मर जाती हैं।

पटिया/फलक (प्लेक) और लट (टैंगल) की भूमिका

स्नायु कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने और मारने के लिए दो संदिग्ध तत्वों पटिया/ फलक (प्लेक) और लट (टैंगल) की पहचान हुई है।
प्लेक स्नायु तंत्र के बीच में बनते हैं और टैंगल मरती हुई कोशिकाओं में रेशे के रूप में पाये जाते हैं। हालांकि अधिकांश लोगों में उम्र बढ़ने के साथ प्लेक और टैंगल पैदा होने लगते हैं, अल्झाइमर्स के रोगी में इनकी संख्या बहुत अधिक होती है। प्लेक और टैंगल उन क्षेत्रों में अधिक बनते हैं, जहां से सीखने या याद रखने की क्षमता पैदा होती है और बाद में यह दूसरे क्षेत्रों में फैलता है।

शुरुआती दौर और जल्दी आगमन

अल्झाइमर्स के  शुरुआती दौर में याददाश्त, सोचने और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी आती है। जल्दी आगमन का मतलब 65 साल से कम उम्र में अल्झाइमर्स से ग्रसित होना है।

इलाज

इसका अभी कोई इलाज नहीं है। लेकिन लक्षणों का इलाज और उचित देखभाल, मदद आदि से अल्झाइमर्स के रोगियों का जीवन बेहतर बनाया जा सकता है।

आघात

अधिकतर आघात मस्तिष्क को रक्त पहुंचाने वाली धमनी में रुकावट आने की वज़ह से होते हैं। यह मस्तिष्क के उस भाग को क्षति पहुंचा सकता है तथा आप ऐसे कार्य पर नियंत्रण खो सकते हैं जो मस्तिष्क के उस भाग द्वारा नियंत्रित होता है। उदाहरण के लिए, आप हाथ या पैर का उपयोग खो सकते हैं या बोलने की क्षमता। क्षति अस्थायी या स्थायी व आंशिक या पूर्ण हो सकती है। डॉक्टरों ने ज्ञात किया है कि लक्षण आरम्भ होने के तुंरत बाद यदि आप उपचार शुरू कर दें तो आपके मस्तिष्क को रक्त पहुंचाने की बेहतर संभावना हो सकती है एवं क्षति की संभावना कम।

आघात की पहचान

यदि आपको निम्नलिखित में से कोई भी लक्षण हो रहे हों तो तुंरत आपात सहायता प्राप्त करें। आपको जितनी जल्दी मदद मिलेगी, अधिक या स्थायी क्षति को रोकने के लिए डॉक्टर्स उतना अधिक प्रयास कर सकते हैं-

  • अचानक कमजोरी या शरीर के एक हिस्से जैसे- चेहरा, हाथ या पैर का सुन्न होना
  • दृष्टि अचानक धुंधली होना या खो जाना, विशेषतौर पर एक आँख में
  • बोलने की शक्ति खोना, बोलने या दूसरे जो बोल रहे हों उसे समझने में परेशानी
  • बगैर किसी ज्ञात कारण के अचानक तीव्र सिरदर्द
  • अकारण चक्कर आना, चलने में लडखडाना या गिर जाना, विशेष रूप से जब साथ में कोई और लक्षण भी हों

आघात की चेतावनी का एक और चिन्ह है ट्रान्ज़िएन्ट इस्केमिक अटैक (Transient ischemic attack)। यह एक "छोटा आघात" है जो उपरोक्त लक्षण पैदा कर सकता है एवं कुछ ही मिनट तक रह सकता है लेकिन उसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए। जिन लोगों को ट्रान्ज़िएन्ट इस्केमिक अटैक होता है, उन्हें भविष्य में आघात की अधिक संभावना होती है। यदि आप सोचते हैं कि आपको ट्रान्ज़िएन्ट इस्केमिक अटैक है तो तुंरत डॉक्टर से संपर्क करें।

आघात के खतरे के कारक

  • एथेरोस्क्लेरोसिस (धमनियों का कडापन)
  • अनियंत्रित मधुमेह
  • उच्च रक्तचाप
  • कॉलेस्ट्रोल का उच्च स्तर
  • धूम्रपान
  • पहले ट्रान्ज़िएन्ट इस्केमिक अटैक (TIA) हो चुका हो
  • हृदयरोग
  • कारोटिड धमनी का रोग (वह धमनी जो आपके मस्तिष्क तक रक्त पहुंचाती है)

आघात रोकने की विधि

आघात से सम्बंधित अपने खतरों एवं उन्हें कैसे कम किया जा सकता है, इस बारे में अपने चिकित्सक से बात करें। नीचे कुछ सुझाव दिये गये हैं जिसका पालन कर आप इस बीमारी से अपना बचाव कर सकते हैं-

  • यदि आपका रक्तचाप अधिक हो, तो उसे नियंत्रित करने के लिए डॉक्टर से सलाह लें,
  • कॉलेस्ट्रोल एवं रक्तचाप कम करने के लिए उच्च वसा एवं कोलेस्ट्रोल युक्त भोजन से बचें, एवं कम सोडियम (नमक) खाएं,
  • यदि आपको मधुमेह है तो रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रण में रखें,
  • सीमित मात्रा में शराब लें,
  • धूम्रपान बंद करें। यदि आप धूम्रपान नहीं कर रहे हों तो उसे शुरू न करें

आघात के खतरे को बढाने वाली समस्याओं को पहचानने के लिए नियमित जांच महत्वपूर्ण है। अपने डॉक्टर से विचार विमर्श करें कि क्या कम डोज़ में एस्पिरिन लेने से आपको आघात का ख़तरा कम  करने में मदद मिलेगी। रक्त में थक्के जमने से अंततः धमनियों में रुकावट हो जाती है;  एस्पिरिन इसे कम करने में मदद कर सकती है।

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cohte ka pesab band h Jan 08, 2017 09:04 AM

cohte ko pesab ka band h is k upay

हिमेश Dec 16, 2016 12:29 PM

मैं हमेशा इनएक्टिव महसूस करता हु कभी बहार जाता हु तो ऐसा लगता है के मुझे कोई देख रहा है कभी काम करने में घबराहट महसूस होती है

हिमेश Dec 16, 2016 12:28 PM

मैं हमेशा इनएक्टिव महसूस करता हु कभी बहार जाता हु तो ऐसा लगता है के मुझे कोई देख रहा है कभी काम करने में घबराहट महसूस होती है

विकास Feb 01, 2016 04:52 PM

सर मुझे लेटरीन बहूत चीकनी लगती है और पैशाब बहूत ज्यादा और रुक रुककर लगता है और मै साल भर पहले गुदा संभोग करता था और मेरे पैरो के तलवो मै भी दर्द रहता है आंखे भी भारी रहती है कर् पया मेरी सहायता करें।

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