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राष्‍ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीपीसीएफ)

इस पृष्ठ में राष्‍ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीपीसीएफ) की जानकारी दी गयी है I

भूमिका

फ्लोरोसिस की समस्‍या से निपटने के लिए, जो मुख्‍यत पेयजल के जरिए अधिक मात्रा में फ्लोराइड लेने से होती है, राष्‍ट्रीयफ्लोरोसिस रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीपीसीएफ) को 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान वर्ष 2008-09 में शुरू किया गया था। 11वीं योजना के दौरान इस कार्यक्रम के अंतर्गत पेयजल में फ्लोरिसिस की उच्‍च मात्रा वाले 100 जिलों को चरणबद्ध ढंग से शामिल किया गया था और अन्य  95 जिलों को 12वीं योजना अवधि के दौरान कवर किया जाएगा। इसकी कार्यनीतियां हैं-

  1. समुदाय और स्‍कूली बच्‍चों में फ्लोरोसिस की निगरानी करना;
  2. प्रशिक्षण और जनशक्‍ति सहायता के रूप में क्षमता निर्माण करना;
  3. पानी और पेशाब में फ्लोराइड की मात्रा के स्‍तर की निगरानी करने के लिए ऑयन मीटर सहित प्रयोगशाला सहायता और उपकरण के रूप में नैदानिक सुविधा प्रदान करना;
  4. स्‍वास्‍थ्‍य शिक्षा;
  5. उपचारी शल्‍य-चिकित्‍सा और पुनर्वास उपलब्‍ध कराकर फ्लोरोसिस के मामलों का प्रबंधन करना।

लाभार्थी और पात्रता मानदंड

कार्यक्रम के अंतर्गत अभी तक शामिल जिलों में पेयजल में फ्लोराइड की उच्‍च मात्रा वाले क्षेत्रों में रहने वाले सभी लोग।

योजना का वित्‍त-पोषण पैटर्न

  1. केन्‍द्र कुल बजट के 75% का वहन करेगा और राज्‍य सरकार जिला स्‍तर तक के कार्यकलापों के लिए बजट के 25% का अंशदान देगी।
  2. पूर्वोत्‍तर राज्‍यों के मामले में यह क्रमश 90% और 10% होगा।

लाभ के प्रकार

  • फ्लोरोसिस और इसके प्रभाव के बारे में जागरूकता;
  • इसकी रोकथाम के उपाय;
  • नैदानिक सुविधाएं;
  • फ्लोरोसिस मामलों का प्रबंधन और पुनर्वास।

योजना की वैधता

12वीं पंचवर्षीय योजना (2013-17) के लिए अनुमोदित राष्‍ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीपीसीएफ)

राष्ट्रीय फ्लोरोसिस निवारण एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीपीसीएफ)- दिशानिर्देश

फ्लोरोसिस, एक जन स्वास्थ्य समस्या है। यह लंबे समय तक पेयजल / खाद्य ठत्पादों / औद्योगिक प्रदूषकों के माध्यम से फ्लोराइड के अत्यधिक सेवन की वजह से होता है। दंत फ्लोरोसिस, स्केलेटल फ्लोरोसिस और नॉन-स्केलेटल फ्लोरोसिस जैसे गंभीर स्वास्थ्य विकार इसके कारण होते हैं।

दांत चॉक के जैसे सफेद हो सकते हैं या उस पर सफेद, पीले, भूरे या काले धब्बे हो सकते हैं या उसकी ऊपरी परत पर धारियां बन सकती हैं। दांतों के रंग का फीका पड़ना मसूढ़ों से दूर और दुतरफा समान होता है। स्केलेटल फ्लोरोसिस हड्डियों और शरीर के प्रमुख जोड़ों जैसे गर्दन, रीढ़ की हड्डी, कंधे, कूल्हे और घुटनों के जोड़ों को प्रभावित करता है। इसकी वजह से इन जोड़ों में बहुत तेज दर्ज होता है, इनमें कठोरता या जकडन होने लगती है। गंभीर रूप में यह विकलांगता की वजह बन जाता है। नॉन-स्केलेटल फ्लोरोसिस गैस्ट्रो-इंटेस्टाइनल शिकायतों आदि के तौर पर फ्लोरोसिस के आरंभिक लक्षणों के तौर पर सामने आता है और यह अन्य रोगों को छुपा देता है जिससे गलत इलाज की संभावना बढ़ जाती है।

व्याप्तता पहले 19 राज्यों के 230 जिलों में फ्लोराइड की व्याप्तता की रिपोर्ट की गई थी। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 19 राज्यों की 14,132 बस्तियां (1.4.2014 तक) ऐसी हैं जहां अभी भी सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति की जानी है। पेयजल में फ्लोराइड के उच्च  स्तर से इन बस्तियों की 11.7 मिलियन (117 लाख) आबादी खतरे में है।

कार्यक्रम का कवरेज 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत 2008-09 में शुरू किया गया राष्ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम और नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीपीसीएफ) एक नई स्वास्थ्य पहल है और इसमें चरणबद्ध तरीके से विस्तार किया जा रहा है। 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत 17 राज्यों के 1OO जिलों को कवर किया जा चुका है, इसके अलावा, 2013-15 के दौरान (19 से अधिक राज्य) 11 और जिलों को इसमें शामिल किया गया है। 12वीं योजना के बाकी बची अवधि के दौरान अतिरिक्त  84 नए जिलों को भी इसमें शामिल किया जाना है ।

लक्ष्य और उद्देश्य

एनपीपीसीएफ का उद्देश्य  देश में फ्लोरोसिस की रोकथाम और नियंत्रण करना है। राष्ट्रीय फलोरोसिस रोकथाम और नियंत्रण कार्यक्रम का उद्देशय इस प्रकार है-

    • परियोजना को शुरू करने के लिए पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के फ्लोरोसिस बेसलाइन सर्वेक्षण आंकडों का उपयोग करना, एकत्र करना और उनका आकलन करना।
    • चुनिंदा इलाकों में फ्लोरोसिस का व्यापक प्रबंधन करना।
    • फ्लोरोसिस मामलों की रोकथाम, निदान और प्रबंधन के लिए क्षमता निर्माण।

कार्यनीति

एनपीपीसीएफ की निम्नलिखित कार्यनीति है

• समुदाय में फ्लोरोसिस की निगरानी करना

• प्रशिक्षण और जनशक्ति सहायता के रूप में क्षमता निर्माण (मानव संसाधन)

• चिकित्सा अस्पतालों में नैदानिक सुविधाओं की स्थापना

• उपचार  शल्य चिकित्सा, पुनर्वास सहित फ्लोरोसिस के मामलों का प्रबंधन

• फ्लोरोसिस मामलों की रोकथाम और नियंत्रण हेतु स्वास्थ्य शिक्षा।

गतिविधियां

  • गांव / प्रखंड (ब्लॉक) / समूह-वार फ्लोरोसिस का सामुदायिक निदान।
  • गांव / प्रखंड (ब्लॉक)/ समूह-वार रोकथाम, स्वास्थ्य संवर्धन, नैदानिक सुविधाएं, पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा और चिकित्सा पुनर्वास के दृष्टिकोण से सुविधा तैयार करना।
  • कमियों को पाटने के लिए शारीरिक एवं वितीय समर्थन सेवा प्रदान करने वाली सुविधाओं और संगठनों का अंतर विक्षेषण, उपरोक्त  सूचीबद्ध कार्यनीति के अनुसार।

क) व्यक्तिगत मामलों का निदान और उसका प्रबंधन  प्रदान करना।

ख) सामुदायिक निदान के आधार पर सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप।

  • आईईसी द्वारा व्यवहार में परिवर्तन।
  • प्रशिक्षण

राज्यों को प्रदान की जाने वाली सहायता

  • स्थानिक जिलों में निम्नलिखित को प्रदान कर जनशक्ति  को सुदृढ़ करना -
  • परामर्शदाता
  • प्रयोगशाला तकनीशियन
  • क्षेत्रीय निरीक्षक (3), छह माह के लिए
  • लॉन मीटर सहित प्रयोगशाला के लिए उपकरणों  की खरीद
  • विभिन्न स्तरो पर प्रशिक्षण
  • स्वास्थ्य शिक्षता एवं प्रचार

- पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा और पुनर्वास सहित उपचार

होती है। स्वास्थ्य में सुधार और फ्लोरोसिस के निवारण के लिए इन स्रोतों से फ्लोराइड लेने से बचना चाहिए। ऐसा केवल जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से किया जा सकता है।

क्षमता निर्माण

फ्लोरोसिस के मामलों में शीघ्र पहचान, प्रबंध और पुनर्वास के लिए विभिन्न स्तरों पर स्वास्थ्य डिलीवरी प्रणाली ।

  • प्रशिक्षण- स्वास्थ्य देखरेख सुविधाओं के विभिन्न स्तरों पर स्वास्थ्य वृतियों / कार्मिकों के भिन्न-भिन्न वर्गों जैसे स्वास्थ्य कार्यकर्ता, आशा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, नीति-निर्माताओं, पीआरआई, वीएचएससी एवं शिक्षकों के लिए जिला स्तर पर विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण, समर्थन और संवेदनशीलता कार्यक्रम चलाया जाएगा।

राज्य  नोडल अधिकारी, जिला नोडल अधिकारियों, जिला परामर्शदाताओं के लिए किसी स्थानिक राज्य के मुख्यालय / राष्ट्रीय विशेषज्ञों से मान्यता प्राप्त  रेफरेंस प्रयोगशाला में प्रशिक्षकों के लिए प्रशिक्षण चलाया जाएगा।

  • जन शक्ति सहायता

कार्यक्रम के अंतर्गत कार्यकलापों को कार्यान्वित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर और जिला स्तर पर जनशक्ति  सहायता, केन्द्रीय स्तर पर एक राष्ट्रीय परामर्शी और एक डीईओ तथा जिला स्तर पर एक जिला परामशीं, एक प्रयोगशाला तकनीशियन, और तीन क्षेत्र अन्वेषक (छ महीनों के लिए) अनुबंध आधार पर उपलब्ध  कराए जाएंगे।

  • स्कूली बच्चों सहित समुदाय में फ्लोरोसिस की निगरानी

सर्वेक्षण 6-11 आयु वर्ग के बच्चों में दंत्य फ्लोरोसिस, समुदाय स्तर पर स्केलेटल और नॉन स्केलेटल फ्लोरोसिस सहित फ्लोरोसिस के मामलों के निर्धारण और निदान के लिए निगरानी दिशानिर्देशों के अनुसार जिला संविदा स्टाफ द्वारा जिला स्वास्थ्य कर्मचारियों के सहयोग से संचालित किया जाएगा।

बेसलाइन डेटा उपलब्ध हो जाने के बाद हस्तक्षेप कार्यकलापों के तीन माह के पश्चात्  पुनः सर्वेक्षण किया जाएगा।

  • जिला / चिकित्सीय अस्पतालों में नैदानिक सुविधाओं की स्थापना

फ्लोरोसिस के मामलों की शीध्र पहचान और पुष्टि के लिए जिला अस्पतालों / चिकित्सा कॉलेजों में प्रयोगशाला नैदानिक सुविधाओं को मजबूत करने का प्रस्ताव है।

उपचार, सर्जरी, पुनर्वास सहित फ्लोरोसिस के मामलों का प्रबंधन


शीघ्र पहचान

पता लगाए गए मामलों की पुष्टि (1) शारीरिक परीक्षण अर्थात दांत संबंधी परिवर्तनों, जोड़ों में दर्द और कठोरता, स्केलेटल विकृति (2) प्रयोगशाला जांच अर्थात मूत्र की जांच और जहां संभव हो फ्लोराइड स्तर के लिए पेयजल विश्लेषण (3) रेडियोलोजिकल विश्लेषण अर्थात प्रबाहु का एक्सरे, अत्यधिक प्रभावित भाग के एक्स-रे से ही जाएगी।

  • तुरंत हस्तक्षेप तुरंत हस्तक्षेप की योजना निम्नलिखित तरीके से तैयार की जाएगी।
  • स्वास्थ्य शिक्षा प्रबंध का महत्वपूर्ण पहलू है। फ्लोरोसिस रोग, पेयजल (सुरक्षित/ असुरक्षित), आहार सुधार और आहार परामर्श के बारे में अंतर-वैयक्तिक बातचीत, समूह चर्चा, मीडिया, पोस्टर वाल पेटिंग आदि के माध्यम से जागरूकता पैदा करना।

फ्लोरोसिस होने का मुख्य कारण पेयजल / खाद्य उत्पाद / औद्योगिक संदूषकों के माध्यम से फ्लोरोइड का अधिक मात्रा में लंबे समय तक ग्रहण करना (इनटेक) है। कई चिकित्सा वृतियों द्वारा भी फ्लोरोसिस को फ्लोरोसिस के रूप में निदान नहीं किया जाता है क्योंकि स्वास्थ्य की दृष्टि से इस समस्या के बारे में अधिक जागरूकता नहीं है। समुदाय में रोग का पता लगाने के लिए चिकित्सीय और अर्द्धचिकित्सीय स्वास्थ्य कर्मियों में जागरूकता और कौशल पैदा किए जाने की आवश्यकता है।

  • सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता, जल संचयन (वर्षा जल), लोक स्वास्थ्य इंजीनियरी विभाग के सहयोग से अन्य उपाय
  • ग्राम स्तर से जिला स्तर को रेफरल के लिए प्रभावी संपर्क जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और कार्मियों (एडब्ल्यूडब्ल्यू आशा पीआरआई आदि), पीएचसी/सीएचसी स्तर के चिकित्सा अधिकारियों, स्वास्थ्य कार्मिकों, स्कूली शिक्षकों और जिला स्तरीय अधिकारियों की सहायता से विकसित किया जाएगा।
  • चिकित्सीय प्रबंध

इन प्रयासों का लक्ष्य फ्लोरोसिस से होने वाली विकलांगता को कम करना और रोगियों के जीवन को बेहतर बव्नाळ्ना है। चिकित्सीय उपचार में विटामिळन सी और डी, केल्सियम और एन्टी ऑक्सीडेन्ट की पूरक खुराक देना तथा कुपोषण का उपचार  आते हैं। विरूपण के उपचार  में फिजियोथिरेपी, सुधारात्मक  प्लास्टर, आर्थोंसेस (उपयुक्त  उपकरण) शामिल हैं।

कुछ स्केलेटल फ्लोरोसिस के मामलों में रोगियों के पुनर्वासन के लिए सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है।

> विरूपता के उपचार  और सर्जरी के चिन्हित किए गए सभी रोगियों को जिला अस्पताल भेजा जाएगा।

> जिन्हें सर्जरी की आवश्यकता है उन्हें जिला अस्पताल में उपयुक्त  उपचार  दिया जाएगा।

> जटिल मामले जिनका जिला अस्पताल में समुचित उपचार  नहीं किया जा सकता है उन्हें विशेषज उपचार  के लिए आगे चिकित्सीय कॉलेज को भेजा जाएगा।

प्रत्याशित परिणाम

जिलों में राष्ट्रीय फ्लोरोसिस निवारण और नियंत्रण कार्यक्रम के प्रत्याशित परिणाम होंगे -

क) कार्यक्रम जिलों में प्रबंधित और पुनर्वास किए गए फ्लोरोसिस के मामलों की संख्या।

ख) जल में फ्लोराइड की मात्रा और मूत्र परीक्षण प्रयोगशाला की क्षमता विकसित की जाएगी।

ग) सरकारी तंत्र में मूत्र और जल में फ्लोराइड को मापने के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्य क्षेत्र जनशक्ति ।

घ) कार्यक्रम जिलों में समुदाय और सभी संबंधितों के लिए सूचना आधार में सुधार

कार्यक्रम ढांचा और चरण तैयार करना

कार्यक्रम का कार्यान्वयन 11वीं पंचवर्षीय योजना के ठोरान 17 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में 1OO स्थानिक जिलों में आरंभ किया गया। 2OO8-09 में देश के छ जोनों में से 6 जिलों को पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय से प्राप्त  जानकारी के आधार पर चयन किया गया था। इन कार्यकलापों के प्रयोगशाला स्थापना / सुदृढीकरण द्वारा क्षमता निर्माण, चिकित्सीय और प्रयोगशाला जनशक्ति का प्रशिक्ष, शीघ्र पहचान और तीव्र प्रबंध और सूचनापरक शिक्षण संप्रेषणों के

माध्यम से जागरूकता पैदा करते हैं।

2008-09 में लिए गए जिले – क) दक्षिणी क्षेत्र –वेल्लोर (आन्ध्र प्रदेश) और धर्मपुरी (तमिलनाडु), (ख) पधिमी क्षेत्र - जामनगर (गुजराज), (ग) ठत्तरी क्षेत्र - नागौर (राजस्थान), (घ) पूर्वी क्षेत्र - नागढ (उडीसा), (ड) मध्य क्षेत्र - उज्जैन (मध्य प्रदेश)

वर्ष-वार जोड़े गए जिले निम्नानुसार हैं

2OO8-2OO9

6

2OO9-2O1O

14

2O1O-2O11

4O

2O11-2O12

31

2O12-2O13

9

2O14-2O15

6

 

कार्यकलाप

एनपीपीसीएफ को आरंभ करने के लिए अपेक्षित कार्यकलाप।

1 फ्लोराइड परीक्षण के लिए आयन मीटर और अन्य मदें।

2 प्रयोगशाला तकनीशियनों को किसी ख्याति-प्राप्त संस्थान जहां फ्लोराइड परीक्षण नियमित रूप से होता है, में 5 दिन का प्रशिक्षण।

3 परामर्शदाताओं को फ्लोरोसिस के सभी पहलुओं के बारे में प्रशिक्षण - 2 दिन का प्रशिक्षण।

कार्यक्रम के कार्यकलाप

  1. ग्राम / ब्लाक / समूह के अनुसार फ्लोरोसिस का सामुदायिक निदान।
  2. निवारण, स्वास्थ्य संवर्धन, नैदानिक सुविधाएँ, पुनरचनालक सर्जरी और चिकित्सीय  पुनर्वास की दृष्टि सुविधा निर्धारित करना ग्राम /ब्लाक / जिला अनुसार
  3. ऊपर वर्णित रणनीति के अनुसार सुविधाओं में कमी का विक्षेषण और उस  कमी को दूर करने के लिए भौतिक और वित्तीय सहायता की व्यवस्था।
  4. उपयुक्त आईईसी कार्यनीति के माध्यम से व्यवहारलक परिवर्तन।
  5. फ्लोरोसिस से ग्रस्त सभी सदस्यों को हस्तक्षेत्रों के बारे में बताया जाएगा और स्वास्थ्य में सुधार के लिए उनको  मानीटर किया जाएगा। 3 महीने के बाद स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों और यूएफएल का पुनः मूल्यांकन किया जाएगा।
  6. गंभीर मामलों के लिए रेफरल और उनका  फालोअप।

5 स्तरों पर प्रस्तावित कार्यकलापों को नीचे तालिका में दिया गया है-

क्रमांक

स्तर

कार्यकलाप

1

समुदाय(ग्राम)

  1. परामशीं क्षेत्र कार्मिकों के साथ संपूर्ण स्थानिक ग्राम का मूल्यांकन करेगा और फ्लोरोसिस के किसी रूप से पीड़ित व्यक्तियों की पहचान करेगा जिससे वह क्षेत्र आधारित अंतिम निदान तक पहुंच सके।
  2. फ्लोरोसिस के सामान्य लक्षणों 3भीर निवारणा प्रबंधन के बारे मे पीएचसी / सीएचसी और जिला अस्पताल के चिकित्सा अधिकारियों के लिए जागरूकता - सह - प्रशिक्षण कार्यक्रम।
  3. जल स्रोतों की लाइन - लिस्टिंग, पीएचईडी के माध्यम से सुरक्षित स्रोतों की पहचान और कलर कोड शुरू किया जाए - फ्लोरोसिस निवारण के लिए हस्तक्षेप कार्यकलापाँ को शुरू किया जाए। पुनर्वासन हस्तक्षेप, पुनर्रचनालक सर्जरी और स्थानीय रूप से असंभव मामलों को आगे भेजने की पद्ध प्रणाली।
  4. उपयुक्त आईईसी अभिगम के माध्यम से व्यवहार मूलक परिवर्तनों की शुरूआत।
  5. सुरक्षित स्रोतों की पहचान और कलर कोड पर विशेष बल देते हुए फ्लोरोसिस के निवारण और नियंत्रण के लिए अन्तर-क्षेत्रीय सहयोग।
  6. निवारण और स्वास्थ्य संवर्धन की शुरूआत किए जाने, व्यवहार मूलक परिवर्तन, सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति के लिए चुनिंदा हस्तक्षेप। मानीटरिंग और प्रभाव निवारण अपेक्षित है।
  7. किसी जिले में फ्लोरोसिस की विद्यमानता को रिकार्ड किया जाए। हस्तक्षेपों को आरंभ करके कम समय के भीतर ही अस्केलेटल फ्लोरोसिस का प्रबंधन किया जा सकता है।

2

सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र(सीएचसी )

1. सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र स्तर के कर्मचारियों और ब्लाक स्तर के पदधारकों के लिए समान प्रकार के कार्यकलाप शुरू किए जाएं।

2. क्लिनिकल जांच और फलोरोसिस के मामलों के प्रबंधन के लिए - चिकित्सा अधिकारियों, सीएचसी के स्वास्थ्य कार्मिकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम।

3. बीडीसी, आईसीडीएस कर्मचारियों और ब्लाक स्तर के पदधारकों के लिए समुचित पर्यवेक्षण और कार्यान्वयन के लिए कार्यक्रम के विभिन्न घटकों के बारे में प्रशिक्षण-सह-जागरूकता कार्यक्रम।

4. यदि सुविधाएं उपलब्ध हैं तो मूत्र फ्लोराइड स्तर और स्केलेटल फ्लोरोसिस स्तर का नैदानिक  परीक्षण।

5. ग्राम / पीएचसी स्तर के कार्यकलापों की मोनिटरिंग

6. आगे उपचार  के लिए भेजना (रेफरल)

3

जिला

1. जिला स्तर पर सीएचसी स्तर की भांति समान कार्यकलापों को शुरू किया जाए।

2. जल फ्लोराइड अनुमान आंकडों और स्कूली बच्चों में दंत्य फ्लोरोसिस तैयार करना।

3. फ्लोरोसिस के मामलों के व्यापक प्रबंधन के लिए चिकित्सा अधिकारियों और स्वास्थ्य कार्मिकों के लिए विस्तृत प्रशिक्षण कार्यक्रम

4. कार्यक्रम के विभिन्न पहलुओं के बारे में डीडीसी, आईसीडीएस और

5. जिले में दन्त्य स्केलेटल और नॉन-स्केलेटल फ्लोरोसिस के लिए नैदानिक सहायता स्थापित करना।

6. जिला स्तरीय विशेषज्ञों द्वारा निदान किए गए मामलों के लिए चिकित्सीय, शल्य चिकित्सीय और पुनर्वास कार्यकलाप

7. मानिटरिंग

8. जटिल मामलों को नजदीकी चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल को भेजना

9. जिले का मुख्य चिकित्सा अधिकारी एनपीपीसीएफ के लिए नोडल अधिकारी होगा।

4

राज्य

 

1. राज्य नोडल  अधिकारी के माध्यम से कार्यक्रम आयोजना, कार्यक्रम कार्यकलापों का निष्पादन, मानीटरन, मध्यावधिक मूल्यांकन और केन्द्र (भारत  सरकार) को रिपोर्ट करना।

2. आवंटन को प्राप्त  करना और उसका वितरण करना

3. प्रारूप के अनुसार केन्द्र (भारत सरकार) को प्रक्रिया के पश्चात उपयोग प्रमाण पत्र और भौतिक प्रगति भेजना।

4. अनुवर्ती कार्यकलापों में केन्द्रीय दल को सहायता प्रदान करना

5. राज्य  नोडल  अधिकारी जिलों में प्रगति की नियमित मानिटरिंग करेगा।

5

केंद्र

1. राज्यों संघ राज्य क्षेत्रों के माध्यम से कार्यक्रम विकसित करना, कार्यक्रम आयोजन और कार्यान्वयन।

2. निधि प्रबंध करना और राज्यों / संघ राज्य क्षेत्रों को जारी करना

3. पर्यवेक्षण, मानोटरन और प्रभाव निर्धारण

4. निष्पादन समीक्षा

 

कार्यकलापाँ की समय अनुसूची

क्रमांक

नए जिलों के लिए कार्याकलाप

भर्ती / प्रापण की अवधि

 

1

जिला स्तरीय परामशीं, प्रयोगशाला तकनीशियन और क्षेत्र, अन्वेषकों (6 माह के लिए 3) की नियुक्ति

2 माह

2

प्रयोगशाला उपस्करों  की खरीद -आयन मीटर आदि

4 माह

3

जिला स्तर पर चिकित्सा अधिकारियों / चिकित्सकों, सीएचसी और पीएचसी का प्रशिक्षण

4 माह

4

फ्लोरोसिस के मामलों का समुदाय स्तर पर निर्धारण और निदान

नियुक्ति  के पश्चात् 6 माह

 

5

समुदाय में चिन्हित किए गए फ्लोरोसिस के मामलों का व्यापक प्रबंधन

कार्यक्रम आरंभ करने के 6 माह पश्चात्

अवसंरचना

कार्यक्रम के अंतर्गत केन्द्रीय स्तर पर या राज्य स्तर पर कोई नियमित पद स्वीकृत नहीं किए गए हैं। केन्द्र स्तर पर कार्यक्रम का समन्वय सेवा महानिदेशालय में पोषाहार सलाहकार/ प्रभारी पोषाहार और आईडीडी द्वारा और राज्य स्तर पर राज्य नोडल  अधिकारी द्वारा और जिला स्तर पर जिला नोडल अधिकारी द्वारा किया जाएगा।

कार्यक्रम के स्टाफ इस प्रकार होंगें

राष्ट्रीय स्तर -

राष्ट्रीय परामशीं (1)

डीईओ (1)

जिला  स्तर –

जिला परामशीं (1)

प्रयोगशाला तकनीशियन (1)

क्षेत्र अन्वेषक (3 छ महीने के लिए)

समुदाय में फ्लोरोसिस का सर्वेक्षण

किसी स्थानिक क्षेत्र में फ्लोरोसिस की गंभीरता का निर्धारण मामला परिभाषाओं सहित समुचित स्वास्थ्य संवर्धन कार्यकलापों, विरूपता सुधार और मामलों के पुनर्वास के आधार पर किए जाने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम के तहत फ्लोरोसिस मामलों की पुष्टि के लिए जिला प्रयोगशालाओं स्थापना/ सुदृढ़ीकरण किया जाता है समुदाय आधारित कार्यकलापों के संचालन के लिए सचलता, सहायता हेतु जिला नोडल अधिकारी के अधीन जिला प्रकोष्ठ की स्थापना की गई है और उस के लिए परामर्शी, प्रयोगशाला सहायक, क्षेत्र सहायक नियुक्त  किए गए हैं और निधियां उपलब्ध  कराई गई हैं। सर्वेक्षण कार्यक्रम के प्रभाव निर्धारण के लिए डेटाबेस भी सृजित करेगा। मामला परिभाषा, सैम्पलिंग प्रक्रिया और सर्वेक्षण पद्धति नीचे दिए अनुसार है

क. मामला परिभाषा

1 संभावित्त मामला

दंत्य फ्लोरोसिस (बच्चों में)

कोई मामला जिसका स्थानिक क्षेत्र में निवास का इतिहास रहा हो जिसमें निम्न में से कोई एक या दोनों लक्षण हो-

• इनेमल की परत पर चूने जैसे सफेद दांत / सफेद धब्बे

• इनेमल की तार में आड़ी तिरछी पीली / भूरी / काली धारियां या धब्बे (रंगहीनता मसूड़े से दूर हो सकती है ये समानांतर हो सकता है)

स्केलेटल फलोरोसिस

कोई मामला, जिसमें 1.0 मिग्रा/ली. या और अधिक फ्लोरोइड वाले क्षेत्र में निवास का इतिहास रहा हो और निम्नलिखित स्वास्थ्य शिकायतों में से कोई एक या अधिक हो।

  • गर्दन, रीढ की हड्डी (पेट से नीचे), कंधे, घुटने और कूल्हे के आसपास अत्यधिक दर्द और कठोरता। 1 या 2 या अधिक जोड़ों से शुरू हो सकता है। रोगी की सचलता गर्दन और / या पेट के नीचे की रीढ़ की हड्डी में कम हो जाती है और उसे किसी और दिशा में देखने के लिए पूरा शरीर मोड़ना पड़ता है।
  • नॉक नी/बो लेग (बच्चों, किशोरों में)
  • पालथी मारकर बैठने में असमर्थता (स्केलेटल फ्लोरोसिस का उच्च  चरण)
  • बेढगी चाल और भंगिमा (स्केलेटल फ्लोरोसिस का उच्च चरण)

नॉन-स्केलेटल फ्लोरोसिस

कोई मामला जिसमें स्थानिक क्षेत्र में निवास का इतिहास रहा हो और निम्नलिखित स्वास्थ्य समस्याओं में से एक या अधिक हो।

  • गेस्ट्रो-इन्टेस्टिनला समस्या -
  • पेट में लगातार दर्द , डायरिया/कब्ज का होते रहता, फूला हुआ सा महसूस करना, मितली, भूख न लगना।
  • तंत्रिका संबंध लक्षण -
  • बैचैनी और अवसाद, ऊंगलियों और तलवों में झनझनाहट होना, अत्यधिक प्यास और बार-बार मूत्र त्याग की प्रवृति (पोलिंडिप्सिया और पोलिप्यूरिया)
  • पेशीय लक्षण -
  • मांसपेशियों में कमजोरी और कठोरता, मांसपेशियों में टर्ट और ठळनका शक्तिहीन होना, चलने और कार्य करने में असमर्थता ।
  • फ्लोरोसिस स्थानिक क्षेत्र का अर्थ -
  • किसी ऐसे बसावट / ग्राम / कस्बा से है जहां पेयजल में फ्लोराइड का स्तर 1.5 पीपीएम से अधिक है। यह भी संभव है कि 1.5 मि.ग्रा./ली. फ्लोराइड युक्त  पेयजल फ्लोराइड सुरक्षित हो सकता है, परंतु फ्लोरोसिस से संबंधित सभी स्वास्थ्य संबंधी शिकायते हो। शरीर में फ्लोराइड का प्रवेश खाद्य/ पेय / स्नैक्स / काला नमक युक्त  स्ट्रीट फूड के उपयोग से हो सकता है जिसमें 157 पीपीएफ फ्लोराइड होता है।
  • नॉन-स्केलेटल फ्लोरोसिस को चिन्हित करना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह फ्लोराइड विषाता का सबसे पहले दिखाई देने वाला संकेत होता है।

2. मामले की पुष्टि

  • किसी भी संभावित मामले की पुष्टि निम्नलिखित जांच से प्राप्त  निदानिक पूर्ववृत के आधार पर की जाएगी।
  • कोई भी संभावित मामला जिसमें मूत्र में फ्लोराइड का उच्च  स्तर हो (>1मिग्रा/ली)
  • किसी भी संभावित मामले में एक्स-रे, रेडियोग्राफ से प्रबद्ध में इंटेरोस्सियस मेम्बरेन कैल्सिफिफेशन की पुष्टि होती हो।
  • किसी संभावित मामला जिसमें किडनी में बीमारी विद्यमान हो। मूत्र फ्लोराइड के अलावा सीरम फ्लोराइड की भी जांच की जानी चाहिए।

ख. सैंपलिंग प्रक्रिया

फ्लोरोसिस स्थानिक क्षेत्र तथा पेयजल स्रोतों में फ्लोराइड के स्तर संबंधी सूचना संबंधित स्थानिक राज्य के जन स्वास्थ्य इंजीनियरी विभाग (पीएचईडी) से प्राप्त  की जानी चाहिए।

फ्लोरोसिस के लिए सर्वेक्षण स्ट्रेटिफाइड सैम्पत्रिण प्रक्रिया के माध्यम से फ्लोरोसिस स्थानिक क्षेत्रों में जिला कार्यक्रम प्रकोष्ठ के कर्मचारियों द्वारा संचालित की जाएगी।

संभावित मामलों में विद्यालयों और समुदायों दोनों में ही मूत्र विक्षेषण किया जाना चाहिए।

  • फ्लोराइड के स्तर के आधार पर ग्रामों को निम्नलिखित 3 श्रेणियों में चिन्हित किया जा

सकता है।

स्तर

फ्लोराइड स्तर

1

1.0-3.0 पीपीएम

2

3.1-5.O पीपीएम

3

> 5.O पीपीएम

फ्लोरोसिस के मामलों की विद्यमानता के लिए प्रत्येक स्तर से 1O प्रतिशत ग्रामों को यादृच्छिक रूप से चयन किया जाएगा। यदि ग्रामों की संख्या 20 तक है तो सभी ग्रामों का सर्वेक्षण किया जाएगा। यदि ग्रामों की संख्या 20 से अधिक है तो प्रत्येक संस्तर से 10 प्रतिशत ग्रामों का सर्वेक्षण किया जाएगा। (कम से कम कुल 20 ग्राम)।

  • दंत्य फ्लोरोसिस की विद्यमानता ब्लाक के ग्रामों के प्राथमिक विद्यालयों (3 से 5वीं कक्षा) के 6-11 वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चों का सर्वेक्षण किया जाएगा।
  • जिले के प्रत्येक यादृच्छिक रूप से चयनित ग्रामों में जहां दंत्य फ्लोरोसिस पाया गया है कम से कम 2O गृहस्थियों का स्केलेटल और नॉन-स्केलेटल फ्लोरोसिस के लिए सर्वेक्षण किया जाएगा।

ग . सर्वेक्षण पद्धति

दो प्रकार के सर्वेक्षण किए जाने की उम्मीद की जाती है - विद्यालयी और सामुदायिक सर्वेक्षण। विद्यालय सर्वेक्षण स्कूली बच्चों में दंत्य फ्लोरोसिस (डीएफ) के लिए है। स्कूली बच्चों में दंत्य फ्लोरोसिस और दृश्मान अस्थि विरूपता (बीडी) के लिए बेस लाइन डेटा का मूल्यांकन कक्षावार किया जाता है।

मूत्र नमूने का विश्लेषण

मूत्र विक्षेषण आयन मीटर की सहायता से किया जाता है। नमूना एकत्र करना (मूत्र और जल) -

1 प्लास्टिक के स्क्रू ढक्कन वाले बोतलों (कांच में नहीं) संभावित मामलों का 30 मिली तत्क्षण मूत्र सैम्पल लिए जाएंगे।

2 मूत्र सैम्पल पर एक पूरी परत बनाने के लिए टाठलिन (एआर ग्रेड) की 1-2 बूंदे डाले।

3 प्रत्येक सैम्पल में समुचित लेबल, संख्या और संगत जानकारी होनी चाहिए।

4 इसी प्रकार स्रोत से, रसोई में रखे किसी बर्तन से नहीं, 30 मिली जल का सैम्पल भी एकत्रित करना चाहिए।

सैंपलों का परिवहन

  • मूत्र के सैम्पलों को यथाशीध्र जिला प्रयोगशाला भेजें और रेफ्रिजरेटर में भण्डार किया जाए।
  • जल के सैंपलों को यदि तत्काल जिला प्रयोगशाला में कमरे के तापमान पर रखा जाए यदि उस का विश्लेषण तत्काल नहीं किया जाता है, मूत्र को रेफ्रिजरेटर में रखा जाए।
  • विश्लेषण केवल आयन मीटर से किया जाए। जांच की तारीख और जांच की पद्धति का उल्लेख  रिपोर्ट में होना चाहिए।
  • रिपोर्ट राज्य नोडल  अधिकारी को पूर्व-रचित प्रारूप में भेजी जानी चाहिए जब एक ग्राम पूरा हो जाए, डेटा शीष्ट अपर डोडोजी, डोजीएचएस, नई दिल्ली के साथ साझा किया जाना चाहिए।

क्षमता निर्माण

क्षमता निर्माण केंद्र के साथ साथ राज्य स्तर पर किया जायेगा I राज्य, जिला कार्यक्रम अधिकारियों, प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण के रूप में परामर्शों सहित चिकित्सकों और प्रयोगशाला तकनी शियनों  का प्रशिक्षण केन्द्रीय  रूप से आयोजित किया जाएगा। कार्यक्रम में स्वास्थ्य कार्यकर्ता समुदाय आधारित स्वास्थ्य लिंक वर्कर्स (आशा और एडब्ल्यूडब्ल्यू नीति निर्माताओं को संवेदी बनाना, पीआरआईडीएचएससी और स्कूली शिक्षक इसके कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण सोपान हैं जिनके लिए जिला स्तर पर कार्य किया जाएगा।

प्रशिक्षण अनुसूची अवधि स्थान प्रशिक्षक, प्रशिक्षण पद्धति व  प्रशिक्षण विषय-वस्तु के लिए विस्तृत दिशा निर्देश देखें I

फ्लोरेसिस से ग्रस्त व्यक्तियों की व्यापक पहचान और प्रबंध

विशेषज्ञ समूह जिसकी बैठक जून 2009 में हुई थी, की सिफारिशों पर फ्लोरोसिस संबंधी राष्ट्रीय कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए निम्नलिखित दिशानिर्देश स्वीकार किए गए हैं -

क. फ्लोरोसिस की शुरूआत में पहचान

ख. तुरंत हस्तक्षेप

क. फ्लोरोसिस की शुरुआत में पहचान

इसके अंतर्गत आते हैं पूर्ववृत पुनः प्रासि, शारीरिक और रेडियोजिकल जांच (यदि एक्स-रे उपलब्ध  है) शारीरिक जांच में मामलों को संभावित मामलों के रूप में लिया जाना चाहिए जिसके बाद में मूत्र में फ्लोराइड के स्तर पेलजल फ्लोराइड की जांच करके पुष्टि की जानी चाहिए। संभावित मामलों के लक्षण निम्नानुसार हैं -

  1. दांतों से संबंधित परिवर्तन - चूने जैसे सफेद दांत जो धब्बे जैसे दिखते हैं।
  2. प्रमुख जोड़ों में दर्द और कठोरता (एड़ियों और ऊंगलियों के जोड़ों में नहीं)
  3. बच्चों में निचले अंगों में विरूपता
  4. महत्वपूर्ण रूप से शिकायत का इतिहास - अंककालीय फ्लोरोसिस पर ध्यान केन्द्रित करते हुए

मामलों की पुष्टि निम्नलिखित तरीकों से की जाएगी

क. शरीर की जांचा ख. रेडियोलाजिकल जांच (यदि एक्स रे उपलब्ध है)

1 प्रबाहु का एक्सरे (एपी व्यू)

2 सबसे अधिक प्रभावित भाग का एक्स रे (एपी और पाश्र्धिक)

ख. प्रयोगशाला जांच

१. फ्लोराइड स्तर के लिए मूत्र जांच

२. फ्लोराइड स्तर के लिए सीरम विश्लेषण (समुदाय अभिगम नहीं)

३. फ्लोराइड स्तर के त्रिए पेयजल विश्लेषण

ख. स्वास्थ्य सुधार के लिए हस्तक्षेपों का अभ्यास

हस्तक्षेपों के अभ्यास की आयोजना निम्नलिखित रूप से की जाएगी

1.  निवारणालक ठपाय - इसमें आहार सुधार आहार परामर्श आते हैं। (आहार सुधार - फ्लोराइड उपभाग को दूर करना! आहार परामर्श - पोषक आहार को बढावा देना) 3 माह के पधात मूत्र फ्लोराइड की जांच

2.  उपचार  -फ्लोरोसिस रोग का कोई उपचार  नहीं है। कैल्सियम, विटामिन सी और डी जैसी दवांए दी जा सकती, परंतु आहार संबंधी हस्तक्षेप सर्वोतम है।

3.  पुनर्वास, यदि अपेक्षित हो, का समाधान निकाला जाना चाहिए।

1. स्वास्थ्य शिक्षा समग्र प्रबंध का बहुत महत्वपूर्ण पहलू है। यह निम्नानुसार किया जाना चाहिए

  • समुदाय, राज्य स्वास्थ्य विभाग, चिकित्सकों सभी में रोग के बारे में जागरूकता पैठा करना|
  • आईईसी, मीडिया, स्टरों, बाल पेटिंग्स के माध्यम से जल स्रोत (सुरिक्षत / असुरक्षित) के बारे में जागरूकता।

2. निवारक उपाय

1.  यदि उपलब्ध हो तो फ्लोराइड रहित सुरक्षित जल उपलब्ध कराना या विद्यमान सुरक्षित जल स्रोतों से जल लेना (परामर्शी / एनपीपीसीएफ के तकनीशियों द्वारा सही जांच करके)

2.   आहार संबंधी आदतों मे परिवर्तन लाना

  • अत्यधिक फ्लोराइडयुत भोजन, काला नमक का उपयोग  न करें
  • अत्यधिक फ्लोराइड युत दंत उत्पादों / औषधियों का उपयोग न करें
  • कैल्सियम, विटामीन सी, एन्टी आक्सीडेन्ट आदि की प्रचुरता वाले भोजन का सेवन करें।

3.  जल संचयन (वर्षा जल) जिससे सुरक्षित भूजल का स्तर न गिरे।

4.  फ्लोराइड विषाक्तता और फ्लोराइड के उपभोग से बचने की आवश्यकता पर केन्द्रित स्वास्थ्य शिक्षा

फ्लोरोसिस रोग से उपचार

यद्यपि फ्लोरोसिस रोग मुक्ति को प्रलेखित नहीं किया गया है। कुछ प्रयास जो किए जा सकते हैं- फ्लोरोसिस जनित विकलांगता को कम करना और प्रभावित व्यक्ति यों के जीवन की गुणवता में सुधार लाना।

उपचार  के घटक हैं -

  1. पूरक खुराक - विटामिन सी, विटामिन डी, एंटी आक्सीडेन्टस, कैल्सियम को देना और कुपोषण को सुधारना। इससे भी बेहतर पोषक तत्वों की प्रचुरता वाली हरी सब्जियां और फल, डेयरी उत्पाद आदि का सेवन सुनिश्चित  करना।
  2. विरूपता का उपचार
  • यह रिकेट्स हो सकता है, मूत्र और पेयजल फ्लोराइड की जाँच की गयी है, फ्लोराइड को कम करके सामान्य स्तर O.1-1.O मिग्रा/ली. तक लाएँ।
  • शल्य चिकित्सीय प्रबंध - कम्प्रेसिव माइलोपैथी और पैथोलाजिकल फैक्चर की दशा में रीढ की हड्डी के डिकम्प्रेसन के लिए चुनिंदा मामलों में सर्जरी का सुझाव दिया जाता है। अन्यथा उपर्युक्त  प्रबंध के लिए तृतीयक देखरेख अस्पताल को भेजा जाए। डिकम्प्रेशन के प्रारंभिक चरण की समस्या की दशा में हड्डियों का सर्जन न्यरो सर्जन मामले के आधर पर निर्णय लेंगे।
  • पुनर्वास विरूपता के उपचार  के अलावा निशुल्क मोबिलिटी-सहायक उपकरण जैसे बैशाखी,व्हील चेयर, तिपाहिया साइकल, जैसा कि प्रभावित व्यक्ति  के लिए विशेषज्ञ निर्धारित करें, दिए जाने का प्रावधान है।
  • फिजियोथैरेपी तीन वर्ष के बच्चे जिसे बहिर्नत जानु है को सुधारात्मक  प्लास्टर दिया जाना है जहां मैजिओलर दूरी 3 इंच से कम है। सुधारात्मक  प्लास्टर 3-4 ससाह के अंतराल पर किया जाना है इस बीच में बच्चे को चिकित्सीय उपचार  भी देना है। प्रत्येक बच्चे को लगभग 5-6 सुधारात्मक  प्लास्टर किया जाता है जिसके पश्धात समुचित लोअर लिम्ब आर्थोंसिस / साधित्र दिया जाएगा। यही पद्धति अन्र्तनत जानु के लिए लागु होती है जिसमें इंटरकोन्डिलर दूरी उपचार से पहले और बाद में मापी जाती है।

आर्थोंसिस- घुटने संबंधी विरूपता में सुधार समुचित साधित्रों जैसे मरमेड स्प्लिंट, केएएफओ (परंपरागत) धात्विक / प्लास्टिक) से किया जा सकता है। सुधार और अनुरक्षण के लिए कुछ मामलों विशेष आर्थोंपिडिक जूते भी जरूरी हो सकते हैं। ये साधित्र बच्चों के बढ़ने की ऊम्र तक कुछ वर्षों के लिए अपेक्षित होते हैं।

चुनिंदा जिलों में ये सुविधाएं दिए जाने की प्रत्याशा है।

फ्लोरोसिस के निवारण और नियंत्रण के लिए सूचना, शिक्षा और संप्रेषण (आईईसी)

आईईसी योजना में प्रभावित जिलों में समुदाय स्तर पर जागरूकता पैदा करने, व्यवहार मूलक परिवर्तन लाना शामिल है जोकि समुदाय में फ्लोरोसिस निवारण और नियंत्रण के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसके लिए समुदाय को उच्च  फ्लोराइड स्तर (1 पीपीएम से अधिक) वाले पेयजल के स्वास्थ्य संबंधी प्रतिकूल प्रभावों के बारे में शिक्षित किए जाने की आवश्यकता है। समुदाय को उनके बसावटों में सुरक्षित पेयजल स्रोतों के बारे में शिक्षित करना और पंचायत राज स्तर पर वर्षां जल संचयन के उपायों को अपनाना, आवश्यक हस्तक्षेप है|

फ्लोराइड से जल के संदूषण के अलावा समुदाय को काला नमक (व्रत का नमक - फ्लोराइड की मात्रा अत्यधिक होती है) डाले गए खाद्य वस्तुओं को खाने से बचने के लिए संवेदी बनाया जाना चाहिए)।

जिला स्तरीय मीडिया दल को समुदाय स्तर के कार्यकर्ता अर्थात आशा, एएनएम, स्कूल शिक्षक, पंचायत सदस्य आदि सहित जिले के विभिन्न पदाधिकारियों को इसकी हिमायत किए जाने का कार्य सौंपा जाएगा। जिसका विवरण नीचे तालिका में दिया गया है -

राष्ट्रीय और राज्य स्तर

  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की वेबसाइट
  • कार्यक्रम के बारे में राष्ट्रीय/राज्य समाचार पत्रों में प्रेस प्रकाशनियों में
  • पेयजल के वैकल्पिक स्रोतों के उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय के साथ समन्वय और स्रोतों को इन्टरनेट पर सूचीबद्ध करना I

जिला स्तरीय कार्यकलाप

क्रमांक

मीडिया / एजेंसी

पद्धति

आवृति

विषय वस्तु

1

स्थानीय समचार पत्र

क- प्रेस प्रकाशनिया

ख- प्रश्नोतर

कार्यक्रम प्रारंभ करने के छ- महीने बाद दुबारा

कार्यक्रम के लक्ष्य और उद्देश्य, उपलब्ध  कराई जाने वाली सेवाएं, लक्ष्य निवारण उपाय

2

स्थानीय टीवी

(क) विडियो स्पॉट(क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय कार्यक्रम से पहले),

(ख) विशेषज्ञों के साथ साक्षात्कार

एक दिन छोडकर वर्ष में दो बार

फ्लोरोसिस होने के कारण उपचार  सुविधांए, सुरक्षित पेयजल स्रोत

3

स्थानीय रेडियो

क आडियोस्पॉट

ख प्रश्नोत्तर सत्र

दिन मे एक बार दिन में तीन बार

फ्लोरोसिस होने का कारण उपचार सुविधा, सुरक्षित पेयजल स्रोत

4

अस्पताल/डिस्पेंसरी/ सीएचसी/ पीएचसी

क पोस्टर (स्थानीय भाषा)

प्रत्येक वर्ष दोहराएं

उपचार सुविधाएं आहार संबंधी हस्तक्षेप, सुरक्षित पेयजल

5

क्षेत्र प्रचार, गीत और नाटक प्रभाग

क समूह चर्चा

ख नुक्कड़ नाटक

ग गीत

घ सेमिनार आदि

ड फिल्म

महीने में दो बार

उपचार  सुविधाएं सुरक्षित पेयजल स्रोत

6

स्वास्थ्य कार्मिक एएनएम, आशा, महिला मंडल प्रतिनिधि

क चर्चा और आपसी परिचर्चा

प्रतिदिन

उपचार सुविधाएं सुरक्षित पेयजल स्रोत

7

क्षेत्र के स्कूल/होम साइंस कालेज

क पोस्टर

ख शिक्षकों के साथ चर्चा

ग फिल्म शो

वर्ष में एक बार

सुरक्षित पेयजल स्रोत, असुरक्षित सोतों से बचाव

8

निजी और सरकारी दोनों अस्पतालों के चिकित्सक

क जिला स्तर पर सेमिनार

क जिला स्तर पर जागरूकता बैठकें

फ्लोरोसिस मामले की पहचान, उनका रेफरल और व्यापक प्रबंध

9

जन स्वास्थ्य इंजीनियरी विभाग के  कार्मिक

क जिला  स्तर पर जागरूकता बैठकें

एक दिन, सभी संबंधित को शामिल करने के लिए वर्ष में एक बार

सुरक्षित पेयजल  सोतों की आवश्यकता फ्लोरोसिस के हानिकारक प्रभाव

 

आहार संबंधी परामर्श

निवारण के लिए आहार संबंधी परामर्श एक महत्वपूर्ण पहलू है। सुरक्षित पेयजल की दिशा में परिवर्तन के साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि उच्च फ्लोराइड स्तर वाले खाद्य पदार्थों से बचा जाए।

वे खाद्य पदार्थ जिनसे बचा जाना चाहिए तथा वे जिनका सेवन करना चाहिए नीचे दी गयी है संतुलित आहार के साथ फल और सब्जियों का सेवन विटामिन और खनिजों की कमी को दूर करने के लिए आवश्यक है। यह पाया गया है कि जिन व्यक्तियों का पोषाहार स्तर अच्छा है उनमें उच्च फ्लोराइड स्तर का प्रतिकूल असर काफी कम होता है। लोगों को यह जानकारी भी होनी चाहिए कि जल के अतिरिक्त  उच्च फ्लोराइड मात्रा वाले खाद्य पदार्थी से भी बचना चाहिए ।

मॉनिटरिंग

जिला नोडल अधिकारी और राज्य नोडल अधिकारियों द्वारा नियमित मानिटरिंग अपेक्षित है।

जिला स्तर पर किये गए व्यय और अन्य सभी कार्यकलापों की मासिक रिपोर्ट जिला नोडल  अधिकारी द्वारा राज्य नोडल  अधिकारी को प्रत्येक महीने की 10 तारीख तक भेजनी चाहिए।

जिला नोडल  अधिकारी द्वारा त्रैमासिक रिपोर्ट भी भेजनी होती है जिसकी जांच राज्य व्नोडोय अधिकारी करते हैं और केन्द्रीय फ्लोरोसिस प्रकोष्ठ को भेजी जाती है यह अनुवर्ती माह की 15 तारीख तक अनुबंध 10 में दिए गए प्ररूप में भेजी जानी चाहिए। कम से 1 और 2 की जानकारी तिमाही रिपोर्ट में दिए जाने की आवश्यकता नहीं होगी परंतु जिला परामर्शी या प्रयोगशाला तकनीशियन की स्थिति में कोई परिवर्तन होने की दशा में इसे सूचित किया जाए।

राष्ट्रीय फ्लोरोसिस नियंत्रण कार्यक्रम के तहत वर्षवार चयनित राज्य व जिले

वर्ष

राज्य

जिले

2OO8-O9

आन्ध्र प्रदेश

1. नैल्लोर

गुजरात

2. जामनगर

राजस्थान

3. नागोर

मध्य प्रदेश

4 उज्जैन

उडीसा

5. नयागढ़

तमिलनाडु

6. धर्मापुरी

2OO9-1O

आसाम

7. नेगांव

 

बिहार

8. नवादा

 

छतीसगढ

9. दुर्ग

 

आन्ध्र प्रदेश

1O. नालगोंडा

 

झारखण्ड

11. पलामु

 

कर्नाटक

12. मैसुर, 13. बैल्लारी

 

केरल

14. पलाकड़

 

महाराष्ट्र

15. चन्दरपुर 16. नान्देड

 

पंजाब

17. संगूर

 

उत्तर प्रदेश

18. उन्नाव 19. रायबरेली

 

पश्चिम  बंगाल

20. बांकुरा

2O1O-11

आन्ध्र प्रदेश

21. करीमनगर 22. प्रकासम

 

आसाम

23. के. लोंग, 24. कामरुप

 

उत्तर प्रदेश

25. प्रतापगढ, 26. फिरोजाबाद

 

कर्नाटक

27. चिकबल्लपुर, 28. कोपेल, 29. दावनगेरे, 3o. टुमकुर

 

मध्य प्रदेश

31. धार, 32. सिओनी, 33. चिन्दवाडा, 34. मंडला

 

पंजाब

35. फिरोजपुर

 

 

हरियाणा

36. महेन्द्रगढ, 37. मेवाड

 

 

बिहार

38. बांका, 39. औरंगाबाद, 40. भागलपुर, 41. गया, 42. जम्मुइ, 43. नालन्दा, 44. शेखपुरा

 

 

झारखण्ड

45. गढ़वा , 46. चतरा

 

 

उड़ीसा

47. आंगुल, 48. नोंपाडा

 

गुजरात

49. साबरकांठा

 

राजस्थान

5O. अजमेर, 51. राजसमन्द 52. भिलवाडा, 53. टौंक, 54. जोधपुर

 

महाराष्ट्र

55. लातुर, 56. वासिम, 57. यवतमाल

 

पश्चिम बंगाल

58. बीरभुम, 59. पुरलिया, 6O. डी. दिनाजपुर

 

2O11-12

आन्ध्र प्रदेश

61. गुंटुर, 62. मेहबूब नगर

 

बिहार

63. कैमूर, 64. मुंगेर

 

 

झारखण्ड

65. हजारीबाग

 

केरल

66. अलप्पुझा

 

 

महाराष्ट्र

67. बीड

 

उत्तर प्रदेश

68. मथुरा

 

 

पश्चिम  बंगाल

69. मालदा

 

कर्नाटक

 

7o. बंगालकोट, 71. बंगलोर, 72. बीजापुर, 73. राय्चुर, 74. चित्रदुर्ग, 75. गडण, 76. गुलबर्गा, 77. हासन, 78. कोलार, 79. मांडिया, 8O. रामनगरम, 81. शिमोगा

 

राजस्थान

82. बीकानेर, 83. चुरु, 84. दौसा, 85. डुगरपुर, 86. जयपुर, 87. जैसलमेर, 88. जालौर, 89. पाली, 90. सीकर, 91. उदयपुर

 

मध्य प्रदेश

92. बेतुल, 93. झाबुआ, 94. रायगढ, 95. सेहोर, 96.अलीराजपुर, 97. डिंडोरी, 98. खरगांव, 99. रायसेन, 1oo. शाजापुर

2O13-14

राजस्थान

101. बांसवाडा, 102.सवाई माधोपुर

 

छतीसगढ

1O3. कांकेर

 

गुजरात

104. वडोदरा

 

जम्मू कश्मीर

105. डोडा

2O14-15

राजस्थान

106. करौली, 107. चितोड.गढ, 108. गंगानगर, 109. झालावाड. 110. झुनझुनू

 

गुजरात

 

111. बनास कांठा

जिला परामर्शी के लिए योग्यता

जिला परामर्शी और प्रयोगशाला तकनीशियन के लिए योग्यता 11 मई, 2012, 17 सितम्बर, 2012 और 15 जुलाई, 2013 के पत्र संख्या जी2011/12/2011-एनयूटी एण्ड आईडीडी सेल द्वारा संसूचित की गई है। समग्रतः योग्यता निम्नानुसार है

जिला परामशीं (फलोरोसिस)

1 आवश्यक योग्यता

(क) चिकित्सीय व्यक्ति  के लिए सामुदायिक मेडिसिन / जन स्वास्थ्य / जैव रासायन/ माइक्रोबायोलॉजी / पैथॉलाजी / सामुदायिक संसाधन प्रबंध / पर्यावरण स्वास्थ्य में स्नातकोत्तर उपाधि (एमडी) या समकक्ष या

(ख) गैर-चिकित्सीय व्यकितयों के लिए जैव रसायन / पोषाहार/ माइक्रोबायोलॉजी / माल्कुलर बायोलॉजी / लाइफ साइसेंस / जन स्वास्थ्य / सामुदायिक संसाधन में डाक्टरेट की ठापाधि या समकक्ष

2 वांछनीय

गैर चिकित्सीय के लिए स्नातकोत्तर चिकित्सीय योग्यता/ डॉक्टरेट योग्यता के पश्चात् अनुसंधान / शिक्षण / प्रयोगशाला सेवाएं / कार्यक्रम कार्यान्वयन में कम से कम 3 वर्ष का अनुभव।

नोट- एमडी योग्यता वाले चिकित्सीय व्यक्ति और पीएचडी योग्यता वाले गैर चिकित्सीय  व्यक्ति  की अनुपलब्धता की दशा में योग्यता को शिथिल करके चिकित्सीय व्यक्ति  के लिए एमबीबीएस/बीडीए या गैर चिकित्सीय व्यक्ति के लिए ऊपर विनिर्दिष्ट विषयों में एमएससी किया जा सकता है। ऐसे मामलों में वांछनीय अनुभव, ऐसे मामलों में जिनमें योग्यता में शिथिल दी गई है, अनुसंधान/शिक्षण प्रयोगशाला सेवाएं/ कार्यक्रम कार्यान्वयन आदि में 6 वर्ष होगी।

प्रयोगशाला तकनीशियन

योग्यता राज्य सरकार भर्ती के अनुसार

क्षेत्र अन्वेषक (केवल छ महीने के लिए) 3 पद क्म से कम कुल अंकों का 50 प्रतिशत अक 10+2 में 60 प्रतिशत या उस से अधिक अंक प्राप्त  करने वालों को वरीयता दी जाएगी।

कार्य उत्तरदायित्व इस प्रकार से होगी

जिला परामशीं (फलोरोसिस)

  • जिले में फ्लोरोसिस की गंभीरता के निर्धारण के लिए सर्वेक्षण संचालित करना।
  • पीएचईडी विभाग से जल में फ्लोराइड की जानकारी एकत्र करना और जिले के स्थानिक ग्रामों की मैपिंग करना। जल, मूत्र और सीरम में फ्लोराइड के लिए प्रयोगशाला की स्थापना करना।
  • विभिन्न श्रेणी के कार्मियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सहायता प्रदान करना।
  • डेटा बेस की मोनिटरिंग और अनुरक्षण करना
  • स्थानिक जिलों में फ्लोरोसिस संबंधी जागरूकता और व्यवहार में परिवर्तन के लिए आईईसी और बीसीसी कार्यकलापों के लिए समन्वय
  • डीएचएस / राज्य नोडल  अधिकारियों / जन स्वास्थ्य इंजीनियरी विभाग (पीएचईडी) और  अन्य स्टेकहोल्डरो के साथ समन्वय
  • रिपोर्ट तैयार करना और डेटा की नियमित रिपोर्टिग करना
  • फ्लोराइड से प्रभावित ग्रामों, फ्लोराइड जांच के लिए जिले में उपलब्ध  प्रयोगशाला सुविधाएं, एमओ के परामर्श से चिकित्सीय हस्तक्षेप से लाभान्वित हो सकने वाले व्यक्ति  और सुधारात्मक  सर्जरी के लिए केन्द्रों अस्पतालों की लाइन लिस्टिंग।

प्रयोगशाला तकनीशियन

  • फ्लोराइड स्तर के विक्षेषण के लिए विद्यालयों और ग्रामों से जल और मूत्र के सैम्पल एकत्र करना।
  • सैंपलों का विश्लेषण
  • जिला परामर्शी/नोडल  अधिकारी को नियमित रूप से प्रयोगशाला रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
  • रिपोर्ट तैयार करने में सहायता प्रदान करना ० प्रशिक्षण और आईईसी कार्यकलापों में सहायता प्रदान करना।

क्षेत्र अन्वेषक

  • स्कूली बच्चों में दंत्य फ्लोरोसिस और ग्रामों में स्केलेटल और अस्केलेटल फ्लोरोसिस के लिए सर्वेक्षण संचालित करने में सहायता प्रदान करना।
  • जल और मूत्र के सैम्पल एकत्र करने में सहायता प्रदान करना

 

मुख्य जोड़ों में दर्द की पहचान कैसे करें (संभावित स्केलेटल फ्लोरोसिस)

सामान्य व्यक्ति

 

जोड़ों के दर्द से पीड़ित व्यक्ति

 

सामान्य स्वस्थ व्यक्ति आ पन्ने शरीर को मोड सकता है और फर्श/पैरों की ऊंगलियों को छू सकता है।

 

घुटने को मोड़े बिना मुड़ पाने में असमर्थ होता है।

 

सामान्य स्वस्थ व्यक्ति अपनी ठुडडी से छाती को छू सकता है।

 

गर्दन मोड़ने में असमर्थ और ठुड्डी से छाती को छू पाना संभव नहीं होता।

 

सामान्य स्वस्थ व्यक्ति हाथों को सीधा कर सकता है बाजूओं को मोडकर सिर के पिछले हिस्से को छू सकता है।

 

हाथों को सीधा करने, बाजूओं को मोड़कर सिर के पिछले भाग को छुने में असमर्थ होता है।

 

 

उच्च  फ्लोराइड वाले खाद्य पदार्थ (जिनसे बचा जाए) और अनुशंसित खाद्य पदार्थ

 

आहार सबंधी दिशा-निर्देश

आहार संबंधी लक्ष्यों को प्राप्त  करने के लिए सही पोषाहार आदतें और आहार संबंधी विकल्पों की आवश्यकता होती है। आहार संबंधी निम्नलिखित 15 दिशा-निर्देश समुचित कार्यवाही के लिए व्यापक ढांचा प्रदान करती हैं -

  1. संतुलित आहार सुनिश्चित  करने के लिए विविध खाद्य पदार्थ खाएं।
  2. गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए अतिरिक्त  भोजन और स्वास्थ्य देखकर सुनिश्चित  करें।
  3. पहले छ महीने केवल स्तनपान को बढावा दें और दो वर्ष या जितना अधिक हो सकता है स्तनपान को प्रोत्साहित करें।
  4. छः महीने के पश्चात शिशुओं अर्द्धठोस आहार आधारित घर में तैयार भोजन दें।
  5. स्वास्थ्य और बीमारी दोनों में बच्चों और किशोरों के लिए पर्यास और समुचित आहार सुनिश्चित  करें।
  6. सब्जियां और फल खूब खाएं ।
  7. खाद्य तेल और मांसाहार का कम उपयोग करें और घी/मकखन/वनस्पति का कम प्रयोग करें।
  8. अधिक वजन और मोटापे से बचने के लिए आवश्यकता से अधिक न खाएं।
  9. शारीरिक रूप से सक्रिय रहने और आदर्श वजन के लिए नियमित रूप से व्यायाम करें।
  10. नमक का प्रयोग कम से कम करें।
  11. सुरक्षित और स्वच्छ भोजन का सेवन सुनिश्चित  करें।
  12. भोजन पकाने से पूर्व की और भोजन बनाने की सही प्रक्रिया को अपनाएं।
  13. पानी खूब पीएं और शीतल पेय आदि ज्यादा मात्रा में न लें।
  14. अत्यधिक नमक, चीनी और वसायुक्त  संसाधित खाद्य का उपयोग कम से कम करें।
  15. सूक्ष्म पोषकों से युक्त  भोजन को अधिक उम्र के लोगों के भोजन में सम्मिलित करें जिससे वे स्वस्थ और सक्रिय बने रहें।

स्रोत: भारत सरकार का स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय

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