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राष्ट्रीय रक्त नीति

इस भाग में राष्ट्रीय रक्त नीति के विषय में जानकारी दी गई है।

प्रस्तावना

एक सुसंगठित रक्ताधान सेवा किसी भी स्वास्थ्य परिचर्या प्रदाय का एक महत्वपूर्ण घटक है। आधान संचारित संक्रमणों के उन्मूलन और लोगों को सुरक्षित और पर्याप्त रक्ताधान सेवाएँ प्रदान करने के लिए रक्त निरापदता हेतु एक एकीकृत कार्य नीति अपेक्षित है। एक एकीकृत कार्य नीति के मुख्य घटक में स्वैच्छिक, पारिश्रमिक ने लेने वाले रक्त दाताओं से रक्त का एकत्रण सभी आधान संचारित संक्रमणों के लिए जाँच और अनावश्यक आधान में कमी करना शामिल है।

देश में रक्ताधान सेवा अत्यधिक विकेंद्रीकृत है और इसमें जनशक्ति, पर्याप्त आधारभूत ढांचा और वित्तीय आधार जैसे अनेक महत्वपूर्ण संसाधनों की कमी है। मुख्य मुद्दा जो देश में रक्त बैकिंग पद्धति के लिए कष्टदायी है, वह है विखंडित प्रबंधन। मानक राज्य दर राज्य, शहर दर शहर और उसी शहर में केंद्र दर केंद्र भिन्न – भिन्न है। अस्पताल आधारित पद्धति के बावजूद, बहुत बड़े – बड़े अस्पतालों और नर्सिंग होमों के अपने रक्त बैंक नहीं है और इससे अकेले प्राइवेट रक्त बैंकों का प्रचुरोद्भाव हुआ है।

रक्त घटक उत्पादन/उपलब्धता और समुपयोजन अत्यधिक सीमित है। आधान चिकित्सा के क्षेत्र में प्रशिक्षित स्वास्थ्य परिचर्या व्यवसायियों की कमी है।

रक्त और रक्त उत्पादनों की गुणवत्ता, निरापदता और प्रभावकारिता के लिए पर्याप्त आधारभूत ढांचे और प्रशिक्षित जनशक्ति के साथ सुसज्जित रक्त केन्द्रों का होना एक अनिवार्य अपेक्षा हैं। रक्त के क्लिनिकल इस्तेमाल एक लिए क्लिनिकल स्टाफ को प्रशिक्षित करना आवश्यक है। अधिकतम निरापदता प्राप्त करने हेतु समग्र गुणवत्ता प्रबंधन की और गतिमान उत्तम विनिर्माण पद्धतियों और गुणवत्ता पद्धति के कार्यान्वयन की अपेक्षाओं ने रक्ताधान सेवा के संघटन और प्रबंधन के लिए एक चुनौती प्रस्तुत कर दी है।

इस प्रकार रक्ताधान सेवा में आशोधन और परिवर्तन की आवश्यकता से एक राष्ट्रीय रक्त नीति तैयार करना और एक राष्ट्रीय रक्त कार्यक्रम विकसित करना आवश्यक हो गया जिससे भारत के उच्चतम न्यायालय के 1996 के निर्देशों का कार्यान्वयन भी सुनिश्चित होगा।

मिशन विवरण

नीति का उद्देश्य उपकरणों से सुसज्जित परिसरों में किसी स्वैच्छिक पारिश्रमिक न लेने वाले नियमित रक्त दावा से एकत्र/प्राप्त किये गये निरापद और गुणवत्तायुक्त रक्त और रक्त और घटकों तक सहज पहुँच और पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति सुनिश्चित करना है जो आधान संचारित संक्रमण से मुक्त हो और जिसे इष्टतम स्थितियों के अंतर्गत भंडारित किया जाए और वाहन द्वारा लाया - ले जाया जाये। इस नीति के अधीन सुनिश्चित किया जायेगा।

नीति के उद्देश्य

उपर्युक्त लक्ष्य को हासिल के करने के लिए निम्नलिखित उद्देश्य रखे गये हैं –

1. रक्त, रक्त घटकों और रक्त उत्पादों की निरापद और पर्याप्त मात्रा प्रदान करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दृढ़तापूर्वक दोहराना।

2. पूरे देश में रक्ताधान सेवाओं के विकास और उन्हें पुर्नगठित करने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध करना।

3. रक्ताधान सेवाओं के संचालन के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी उपलब्ध करना और इसका एक अद्यतन तरीके से कार्यकरण सुनिश्चित करना।

4. निरापद रक्त की पर्याप्त उपलब्धता करने के लिए दाता की सूचना, शिक्षा, अभिप्रेरणा, भर्ती और उसे बनाए रखने के लिए गहन जागरूकता कार्यक्रम शुरू करना।

5. रक्त और रक्त उत्पादों के समुचित इस्तेमाल को बढ़ावा देना।

6. मानव संसाधन विकास के जरिए जनशक्ति को सुदृढ़ बनाना।

7. आधान चिकित्सा और संबंध प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास बढ़ावा देना।

8. रक्ताधान सेवाओं की मॉनिटरिंग और मूल्यांकन के लिए पर्याप्त विनियामक और वैधानिक उपाय शुरू करना और रक्त बैंकों में मुनाफाखोरी का उन्मूलन करने के लिए उपाय शुरू करना।

उद्देश्य- 1

रक्त, रक्त घटकों रक्त उत्पादों की निरापदों और पर्याप्त मात्रा प्रदान करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दृढ़तापूर्वक दोहराना।

कार्यनीति

1.1 देश में लाभ निरपेक्ष एकीकृत राष्ट्रीय और राज्य रक्ताधान सेवाओं की स्थापना सुनिश्चित करने हेतु एक राष्ट्रीय कार्यक्रम विकसित किया जायेगा।

1.1.1 रक्त केन्द्रों के प्रचालन से संबंधित सभी मामलों के बारे में राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद् नीति बनाने वाला शीर्ष निकाय होगा। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद् को रक्ताधान सेवा के सुदृढ़करण के लिए बजट आवंटित करेगा।

1.1.2 राज्य/संघ राज्य क्षेत्र रक्ताधान परिषद् राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद् की सिफारिशें के अनुसार राज्य/संघ क्षेत्र स्तर पर रक्त कार्यक्रम के कार्यन्वयन के लिए जिम्मेदार होगी।

1.1.3 राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद् और राज्य रक्ताधान परिषदों के बीच बेहतर समन्वय के लिए तंत्र राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद् द्वारा विकसित किया जाएगा विकसित किया जाएगा।

1.1.4 देश में राष्ट्रीय रक्त कार्यक्रम के कार्यान्वयन की मॉनिटरिंग और आवधिक मूल्यांकन करने हेतु तंत्र विकसित किये जाएंगे।

1.1.5 रक्त और रक्त उप्ताद मानकों का प्रवर्तन करना औषध और प्रसाधन सामग्री अधिनियम/नियमों के अनुसार पता लगाये गये विशेषज्ञों की सहायता से औषध महानियंत्रक (भारत) की जिम्मेदारी होगी।

1.1.6 राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद् रक्ताधान सेवाओं से संबंधित विभिन्न कार्यकलापों के लिए अन्य मंत्रालयों और अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रमों की भागीदारी सुनिश्चित होगी।

1.2 रक्त का व्यापार अर्थात रक्त की बिक्री और खरीद प्रतिसिद्ध होगी।

1.2.1 100 प्रतिशत स्वैच्छिक गैर – पारिश्रमिक वाले रक्तदान कार्यक्रम के लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रतिस्थापन दाताओं  की पद्धति को धीरे – धीरे समयबद्ध कार्यक्रम में समाप्त किया जायेगा।

1.2.1.1 राज्य/संघ राज्य क्षेत्र रक्ताधान परिषदें प्रतिस्थापन दाताओं को क्रमिक रूप से समाप्त करने के लिए एक कार्ययोजना तैयार करेगी।

1.3 लोगों को निरापद रक्त उपलब्ध करने के लिए आधान सेवाओं की निम्नलिखित श्रृंखला का संवर्धन किया जाएगा।

1.3.1 राज्य रक्ताधान परिषद् क्षेत्रीय रक्त केन्द्रों और सेटेलाईट केन्द्रों के नेटवर्क के जरिये तथा अन्य सरकारी, भारतीय रेड क्रास सोसायटी और गैर सरकारी, भारतीय रेड क्रास सोसायटी और गैर सरकारी संगठन द्वारा चलाये गये रक्त केन्द्रों के जरिए रक्ताधान सेवा का संघटन करेगी और उनके कार्यकरण की मॉनिटरिंग करेंगी। सभी क्षेत्रीय केन्द्रों को इर्द – गिर्द का क्षेत्र सौंपा जाएगा। जिसमें अन्य रक्त बैंकों और अस्पतालों, जो क्षेत्रीय केंद्र से संबद्ध होंगे, कि किसी भी अपेक्षा के लिए सहायता की जाएगी और उनकी क्षेत्रीय केंद्र द्वारा लेखा परीक्षा की जाएगी। यह इस क्षेत्र से डेटा एकत्र करने में राज्य करने में राज्य रक्ताधान परिषद् की मदद भी करेगा।

1.3.२ क्षेत्रीय केंद्र अपने दिन – प्रतिदिन के कार्यकरण के लिए स्वायत्त होंगे और उनका राज्य/संघ राज्य क्षेत्र रक्ताधान परिषदों सिफारिशों के द्वारा मार्गदर्शन किया जायेगा। क्षेत्रीय केंद्र इसे सौंपे गये क्षेत्र के लिए एक रेफरल केंद्र के रूप में कार्य करेगा।

1.3.3 राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद् गैर सरकारी संगठनों द्वारा चलाये जा रहे रक्त केन्द्रों को परिभाषित करने के लिए दिशा निर्देश तैयार करेगी रक्त बैकिंग में मुनाफाखोरी से बचा जा सके।

1.4 दूरस्थ सीमावर्ती क्षेत्रों में सशस्त्र बलों की विशेष अपेक्षा के कारण छोटे गैरिसन एककों को विशेष लाइसेंस को विशेष लाइसेंस प्रदान करने के लिए औषध और प्रसाधन सामग्री अधिनियम/नियमों में आवश्यक संशोधन किये जायेंगे। ये एकक इस क्षेत्र की असैनिक रक्त जरूरतों के लिए भी जिम्मेदार होंगे।

उद्देश्य – 2

पूरे देश में रक्ताधान सेवाओं के विकास और उन्हें पुन: संघटित करने के लिए पर्याप्त संसाधन उलब्ध करना।

कार्यनीति

2.1 राष्ट्रीय और राज्य/संघ राज्य परिषद् क्षेत्र परिषदों की विभिन्न मौजूदा कार्यक्रमों से संसाधनों के एकत्रीकरण और यदि संभव होगा तो अंतराष्ट्रीय/द्विपक्षीय अभिकरणों से निधियां एकत्र करके वित्तीय रूप से सहायता की जाएगी/उन्हें सुदृढ़ किया जायेगा।

2.2 प्रयासों को लाभ निरपेक्ष वसूली पद्धति के जरिए रक्ताधान सेवा को व्यवहार्य बनाने के लिए निर्देशित किया जाएगा।

2.2.1 राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद् लाभ निरपेक्ष लागत वसूली तथा आर्थिक सहायता पद्धति को सुनिश्चित करने के लिए दिशा निर्देश देगी।

2.2.2  रक्ताधान सेवाओं को आत्मनिर्भर बनाने हेतु निधियां जुटाने के लिए प्रयास किये जाये।

2.2.3  रक्त बैंकों को उनकी सेवाओं में सुधार लाने के लिए रक्त/रक्त घटकों की लागत वसूली के माध्यम से प्राप्त धन को प्रदान करने के लिए सरकारी क्षेत्र में तंत्र बनाया जाएगा।

उद्देश्य -3

रक्ताधान सेवाओं को चलाने के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी उपलब्ध करावाना और इनके कार्यकरण तरीके से सुनिश्चित करना।

कार्यनीति

3.1 जांच, संसाधन और भंडारण के न्यूनतम मानक बनाये जाएँगे और सुनिश्चित किये जायेंगा।

3.1.1 मानक औषध और प्रसाधन सामग्री अधिनियम/नियमों, और भारतीय भेषज को जब भी आवश्यक होगा अद्यतन किया जायेगा।

3.1.2 औषध और प्रसाधन सामग्री अधिनियम/ नियमों के उपबंधों के अंतर्गत बनाये गये सभी अनिवार्य जांचों को लागू किया जाएगा।

3.1.3 प्रभावी अनूविक्षण सुनिश्चित करने के लिए भारत के औषध नियंत्रक का निरीक्षक –वर्ग और राज्य खाद्य और औषध प्राधिकरण को सुदृढ़ किया जाएगा।

3.1.4  केंद्रीय/राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरणों के अंतर्गत एक सतर्कता कक्ष सृजित किया जाएगा।

3.2  सभी रक्त केन्द्रों में एक गुणवत्ता पद्धति स्कीम शुरू की जाएगी।

3.2.1 सौंपे गये क्षेत्र में रक्त और रक्त घटकों की गुणवत्ता नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए 15,000 यूनिटों से अधिक यूनिटें एकत्र करने वाले प्रत्येक रक्त केंद्र/रक्त केंद्र में गुणवत्ता आवश्वासन प्रबंधन पदनामित किया जायेगा। वह सिर्फ केवल गुणवत्ता आश्वासन के लिए जिम्मेवार होगा।

3.2.2 प्रत्येक रक्त केंद्र एन आन्तरिक लेखा – प्रणाली आरंभ करेगा और उसके बाद सतत सुधार कार्यक्रम के एक भाग के रूप में मानक प्रचालन प्रक्रियाओं में अंतरों में कमी लाने के लिए सुधारात्मक कार्यवाही करेगा।

3.2.3 रक्त केन्द्रों में काम करने वाले कार्मिकों को अद्यतन बनाने के लिए गुणवत्ता आश्वासन के विषय पर नियमित कार्यशालाएं आयोजित की जाएगी।

3.2.4 सभी रक्त केन्द्रों में कार्मिकों की नियमित दक्षता जांच शुरू की जाएगी।

3.3 उच्च मानक और एकरूपता प्राप्त करने में भागीदार केन्द्रों की सहायता करने के लिए राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद द्वारा अनुमोदित रैफरेल प्रयोगशालाओं के माध्यम से एक बाह्य गुणवत्ता आश्वासन स्कीम शुरू की जाएगी।

3.3.1 बाह्य गुणवत्ता आश्वासन स्कीम के कार्यान्वयन के लिए प्रत्येक राज्य/संघ राज्य क्षेत्र में रेफरेंस केन्द्रों से जाड़ा जाएगा।

3.3.2 देशी आयातित उपभोज्यों, रियेजेंटों और प्लाजमा उत्पादों की गुणवत्ता नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद् एक राष्ट्रीय महत्व के केन्द्रों की पहचान करेगी।

3.4 रक्त बैंकों में प्रयुक्त कीटों, उपस्करों और उपभोज्यों के देशीकरण के लिए प्रयास किये जाएंगे।

3.5 बढ़ी हुई कार्यक्षमता के साथ अधिक कार्यभार को निपटाने के लिए स्वचलन के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जायेगा।

3.6 भारत के बाहर से अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी/सुनिश्चित करने के लिए प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण हेतु एक तंत्र विकसित किया जाएगा।

3.7 रक्त बैंकिंग के विभिन्न पहलुओं पर अपने प्रत्येक रक्त केंद्र अपने स्वयं के मानक संचालन प्रक्रियाएं विकसित करेगा।

3.7.1 राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद द्वारा रक्त केन्द्रों के लिए दिशानिर्देश के रूप में जेनेरिक मानक संचालन प्रक्रियाएं विकसित की जाएंगी।

3.8 सभी रक्त केंद्र स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की नियमावली अस्पताल जनित संक्रमण नियंत्रण के लिए दिशानिर्देश में यथा उपबंधित जैव सुरक्षा दिशा निर्देशों और पर्यावरण  सुरक्षा अधिनियम 1986 के अंतर्गत मौजूदा जैव चिकित्सा अपशिष्ट (प्रबंधन और संभाल) नियम – 1996 के उपबंधों के अनुसार जैव खतरनाक अपशिष्ट के निपटान का कड़ा अनुपालन करेंगे।

उद्देश्य – 4

निरापद रक्त की पर्याप्त उपलब्ध सुनिश्चित करने के लिए दाता अभिप्रेरणा सहित रक्त बैकिंग सेवाओं के लिए व्यापक जागरूकता कार्यक्रमों को शुरू करना।

कार्यनीति

4.1 शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से स्वयंसेवी, पारिश्रमिक न लेने वाले रक्त दाताओं की भर्ती और उन्हें बनाए रखने के लिए प्रयास किये जाएंगे।

4.1.1 प्रतिस्थापी रक्त दाताओं के पंजीयन में कोई बल प्रयोग नहीं किया जायेगा।

4.1.2 प्रतिस्थापी दाताओं को नियमित स्वैच्छिक रक्त दाता बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

4.1.3 लोगों के बीच रक्तदान के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए गैर सरकारी संगठनों के कार्यकलापों को प्रोत्साहित किया जाएगा।

4.1.4 सभी रक्त बैंक में रक्त दाता नियोजन अधिकारी/दाता आयोजक होंगे।

4.1.5 प्रत्येक रक्त केंद्र रक्तादाताओं को डायरेक्टरी बनाएगा और उसे अद्यतन करेगा जिसे गोपनीय रखा जाएगा।

4.1.6 रक्तदान कार्यकलापों में युवाओं को शामिल करने के लिए दाता आधारित विशेष सूचना शिक्षा संचार अभियान को बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किये जाएंगे।

4.2 सुरक्षित रक्तदाताओं का पंजीयन सुनिश्चित किया जाएगा।

4.2.1  रक्तदाता जाँच निर्देशों का कठोरता से अनुपालन सुनिश्चित किया जाएगा।

4.2.2 रक्तदान शिविरों में उचित ध्यान एकत्रित यूनिटों की संख्या की बजाए राष्ट्रीय मानकों के अनुसार रक्तदाताओं के पंजीयन और जाँच पर दिया जाएगा।

4.2.3  दान एक पहले और दान के बाद परामर्श के लिए प्रत्येक रक्त बैंक में एक परामर्शदाता की नियुक्ति की जाएगी।

4.2.4  दान के बाद की सूचना और परामर्श के लिए परिणाम जानने के इच्छुक रक्तदाताओं को रक्त जाँच केंद्र में रेफर कर दिया जाएगा।

4.3 राज्य/संघ राज्य क्षेत्र रक्ताधान परिषदें नियमित स्वैच्छिक पारिश्रमिक व लेने वाले रक्तादाओं और रक्तदाता आयोजकों की सेवाओं को उचित मान्यता देगी।

4.4 राष्ट्रीय/राज्य/संघ राज्य क्षेत्र रक्ताधन परिषदें संचार के सभी माध्यमों का प्रयोग करते हुए जिनमें स्वैच्छिक रक्तादान को बढ़ावा देने के लिए जन प्रचार माध्यम और पैसा लेकर रक्तदान देने वालों से लिए गये रक्त के खतरों तथा अनधिकृत रक्त बैंकों/प्रयोगशालाओं से रक्त के प्रापण के बारे में जागरूकता पैदा करना भी शामिल है, एक सोचना शिक्षा संचार अभियान तैयार करेंगी और चलाएंगी।

4.5 स्वैच्छिक रक्तदान जी बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय/राज्य/संघ राज्य क्षेत्र रक्ताधान परिषदें अन्य विभागों/क्षेत्रों को शामिल करेंगी।

उद्देश्य – 5

रक्त और रक्त उत्पादों के उचित नैदानिक उपयोग को प्रोत्साहित करना।

कार्यनीति

5.1 रक्त का उपयोग तभी किया जायेगा जब आवश्यक होगा। रक्त और रक्त उत्पादों का रक्ताधान ऐसी स्थितियों जिनसे महत्वपूर्ण रूग्णता और मौतें होती है, जिन्हें अन्य उपायों द्वारा नहीं रोका जा सकता या जिनका प्रभावी उपचार नहीं किया जा सकता है, का उपचार करने के लिए ही किया जाएगा।

5.2 समय – समय पर जब भी आवश्यक होगा रक्त का नैदानिक उपयोग संबंधी राष्ट्रीय दिशा निर्देशों को उपलब्ध और अद्यतन किया जाएगा।

5.3 रक्त के प्रभावी और दक्ष क्लिनिकी इस्तेमाल को दिशा निर्देशों के अनुसार बढ़ावा दिया जाएगा।

5.3.1 राज्य/संघ राज्य क्षेत्र सरकारें यह सुनिश्चित करेंगी कि सभी अस्पतालों में रक्त के प्रभावी और दक्ष नैदानिक उपयोग के मार्गदर्शन, अनुविक्षण और लेखा – परीक्षा के लिए अस्पताल रक्ताधान समितियां स्थापित की जाये।

5.3.2 जहाँ कहीं भी उपयुक्त होगा रक्त के उपयोग को न्यूनतम करने के लिए प्लाविकावर्धक (प्लाज्मा एक्सपैंडर) के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा।

5.3.3 रक्ताधान की आवश्यकता को न्यूनतम करने के लिए वैकल्पिक कार्यनीतियों को बढ़ावा  दिया जायेगा।

5.4 रक्त के प्रभावकारी नैदानिक प्रयोग में शिक्षा एवं प्रशिक्षण आयोजित किया जाएगा।

5.4.1 भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद से निम्नलिखित पहले शुरू करने का अनुरोध किया जायेगा।

5.4.1.1 स्नातकपूर्व तथा सभी स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठयक्रमों में एक विषय के रूप में रक्ताधान चिकित्सा को शुरू करना।

5.4.1.2  इन्टर्नशिप के दौरान रक्ताधान चिकित्सा विभाग में कम से कम 15 दिनों की तैनाती आरंभ करना।

5.4.1.3 भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद द्वारा चिकित्सीय पंजीकरण के नवीकरण के लिए क्रेडिट आवर्स के परिकलन में एक विषय के रूप में रक्ताधान चिकित्सा, यदि इसे शुरू किया जाता है को शामिल करना।

5.4.2  राज्य रक्ताधान परिषदों द्वारा अपने राज्यों में निजी तथा सर्वाजनिक क्षेत्रों में कार्यरत सभी क्लिनिशियनों के लिए व्यवसायिक निकायों के साथ परार्मश करके नियमित अंतरालों पर आविछिन्न आयुर्विज्ञान शिक्षा तथा कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी।

5.5 आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम – 1956 के उपबंधों के अनुसार पंजीकृत चिकित्सा द्वारा ही रक्त तथा इसके संघटक नुस्खे के रूप में निर्धारित किये जाएंग।

5.6 पर्याप्त संख्या में रक्त संघटक पृथक्करण एककों को सृजित करके क्षेत्रीय केन्द्रों, अनुशंगी (सेटेलाइट) केन्द्रों तथा अन्य रक्त केन्द्रों के नेटवर्क के जरिए रक्त संघटकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।

5.7  मौजूदा केंद्र की क्षमता के विस्तार तथा देश में नए केन्द्रों की स्थापना के जरिए देश की आवश्यकतानुसार प्लाज्मा के अंशों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए उचित कदम उठाये जाएंगे।

5.8 रक्त की आपूर्ति का उचित प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए कोल्डचैन के उचित अनुरक्षण सहित रक्त तथा रक्त उत्पादों के परिवहन के लिए पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएंगी।

5.9 प्राकृतिक तथा मानव निर्मित आपदाओं के दौरान रक्त की आपूर्ति के प्रबंधन के लिए दिशानिर्देश उपलब्ध कराए जाएंगे।

उद्देश्य – 6

मानव संसाधन विकास के जरिए कार्मिक शक्ति को सुदृढ़ करना।

कार्यनीति

6.1  रक्ताधान चिकित्सा को एक विशेष विषय के रूप में समझा जायेगा।

6.1.1 मेडिकल कालेजों में रक्ताधान चिकित्सा का एक अलग विभाग स्थापित किया जाएगा।
6.1.2 रक्ताधान चिकित्सा में स्नातकोत्तर डिग्री (रक्ताधान चिकित्सा में एम.डी.) तथा डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए सभी राज्यों के मेडिकल कालेजों/विश्वविद्यालयों को प्रोत्साहित किया जाएगा।

6.1.3 रक्ताधान चिकित्सा (पी.एच.डी./एम/एस.सी.) में तकनीकी प्रशिक्षण के लिए स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों को भी प्रोत्साहित किया जाएगा।

6.2 नर्सों, तकनीशियनों तथा फार्मासिस्टों के लिए मौजूदा सभी पाठयक्रमों में एक विषय के रूप में रक्ताधान चिकित्सा किया जायेगा।

6.3 रक्त केन्द्रों में कार्यरत सभी श्रेणियों के कार्मिकों तथा औषध निरीक्षकों एवं विनियामक एजेंसियों के अन्य अधिकारीयों के लिए सेवारत प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे।

6.4 सभी राज्यों में नियमित एवं एक सामान प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने के कार्य को सुकर बनाने के लिए दाता आयोजकों/दाता भर्ती अधिकारीयों के प्रशिक्षण के लिए उचित मापदंड विकसित किये जाएंगे।

6.4.1 दाता आयोजक/दाता भर्ती अधिकारीयों के रूप में नियुक्त व्यक्ति राज्य रक्ताधान परिषदों द्वारा आयोजित दाता अभिप्रेरणा तथा भर्ती के लिए प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे।

6.5 समुदाय आधारति संगठनों/गैर- सरकारी संगठनों जो स्वैच्छिक रक्तदाता नियोजन कार्यक्रम में भाग लेने की इच्छा करते हैं के लिए दाता अभिप्रेरणा एवं नियोजन संबंधी लघु अभिविन्यास प्रशिक्षण सह हिमायत कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे।

6.6 रक्ताधान सेवा की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए केन्द्रों के साथ जुड़े हुए कार्मिकों के प्रशिक्षण एवं अनुभव के लिए देश के भीतर और दूसरें देशों के साथ आदान – प्रदान को प्रोत्साहित किया जाएगा।

उद्देश्य – 7

रक्ताधान चिकित्सा तथा संबंधित प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना।

कार्यनीति

7.1 रक्त बैंकिंग से संबंधित चिकित्सा तथा प्रौद्योगिकी में अनुसंधान को सुकर बनाने के लिए राष्ट्रीय रक्ताधान परिषद्/राज्य रक्ताधान परिषदों को निधियां उपलब्ध कराई जाएंगी।

7.2 देश में अनुसंधान तथा विकास का समन्वय करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक तकनीकी संसाधन कोर समूह सृजित किया जाएगा। यह समूह औषध नियंत्रक (भारत) के समन्वय में नई प्रौद्योगिकियों और प्रक्रियाओं के कार्यान्वयन की संस्तुति करने हेतु जिम्मेदार होगा।

7.3 रक्ताधान से संबंधित मामलों पर बहु – केन्द्रिक अनुसंधान पहलों को प्रोत्साहित किया जाएगा।

7.4 तथ्यपूर्ण सुचना के आधार पर उपयुक्त निर्णय लेने तथा/या नीतिगत पहल शुरू करने के लिए, विभिन्न पहलुओं जैसे कि रक्ताधान संचार्य रोगों दाताओं में ज्ञान मनोवृत्ति तथा व्यवहार, रक्त के नैदानिक प्रयोग, आवश्यकता निर्धारण इत्यादि के विभिन्न पहलुओं से संबंधित प्रचालनात्मक अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाएगा।

7.5 कम्प्यूटर आधारित सूचना तथा प्रबंधन प्रणालियाँ विकसित की जाएँगी जिनका प्रयोग नेटवर्क को सुकर बनाने के लिए सभी केन्द्रों द्वारा नियमित रूप से किया जा सकता है।

उद्देश्य – 8

रक्त बैंकों में मुनाफाखोरी के उन्मूलन के लिए पर्याप्त वैधानिक तथा शैक्षणिक कदम उठाना

कार्यनीति

8.1  रक्त बैंक की योजना सहित रक्त बैंक लाइसेंस प्रदान करने/लाइसेंसों के नवीकरण के लिए रक्ताधान चिकित्सा विशेषज्ञ, केन्द्रीय तथा राज्य/संघ राज्य क्षेत्र एफ.डी.ए. सहित राज्य/संघ राज्य क्षेत्र रक्ताधान परिषदों के सदस्यों वाली एक समिति गठित की जाएगी जो औषध महानियंत्रक (भारत) द्वारा दिए गये देशानिर्देशों के अनुसार सभी आवेदकों की जाँच करेगी।

8.2  निजी क्षेत्र के अकेले रक्त बैंकों को नये लाइसेंस नहीं दिए जाएंगे। ऐसे रक्त बैंकों का नवीकरण पूर्ण छानबीन के अध्यधीन होगा तथा लाइसेंस की किसी शर्त का पालन नहीं करने की स्थिति में इनका नवीकरण नहीं किया जाएगा।

8.3  सभी राज्य/संघ राज्य क्षेत्र रक्ताधान परिषदें राज्य/संघ राज्य क्षेत्र रक्ताधान सेवा के लिए राज्य कार्य योजना विकसित करेंगी जिनमें क्षेत्रीय रक्ताधान केन्द्रों की पहचान की जाएगी। ये केंद्र सरकार, भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी या अन्य गैर – सरकार संघठन द्वारा चलाये जा रहे प्रसिद्ध रक्त बैंकों के हैं। अनुमोदित क्षेत्रीय रक्त केन्द्रों/सरकारी रक्त केन्द्रों/भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी को सेटेलाईट केन्द्रों जिन्हें समिति द्वारा अनुमोदित किया जाता है जैसा कि पैरा 8.1 ने वर्णित है, के लिए उत्पादों की आपूर्ति करने की अनुमति दी जाएगी। सेटेलाईट केन्द्रों के जरिए रक्त तथा उत्पादों के परिवहन, भंडारण, क्रॉस मैंचिंग तथा वितरण के लिए क्षेत्रीय केंद्र जिम्मेवार होगा।

8.4  एक वरिष्ठ अधिकारी, जो मुख्यालय के औषध नियंत्रक (भारत) के कार्यालय में उप-  औषध नियंत्रक (भारत) के स्तर से नीचे न हो, के अधीन एक अलग रक्त बैंक सैल बनाया जाएगा। राज्य/संघ राज्य क्षेत्र औषध नियंत्रण विभाग उचित निरीक्षण एवं प्रवर्तन के लिए निरीक्षकों सहित प्रशिक्षित अधिकारीयों वाले ऐसे हेई सैल बनाएंगे।

8.5  पैसा देकर रक्तदान करने वाले दाताओं, जो प्रतिस्थापन दाताओं के  वेश में कार्य करते हैं, के लिए भयावह उपाय के रूप में ऐसी संस्थाएं, जो रक्ताधान के लिए रक्त का निर्धारण करती है, लाइसेंस प्राप्त रक्त केन्द्रों के साथ अपने संबंधन के जरिए अपने रोगियों के लिए रक्त की खरीद हेतु जिम्मेदार होंगी।

8.6  राज्य/संघ राज्य क्षेत्र नर्सिंग होमो के पंजीकरण के लिए नियम बनाएंगे जिनमें उनके रोगियों के लिए रक्त की खरीद हेतु लाइसेंस प्राप्त रक्त बैंक के साथ संबंधन के प्रावधानों को समाविष्ट किया जाएगा।

8.7  रक्त बैंकिंग प्रणाली में अनधिकृत/अनियमित पद्धतियों के लिए सख्त दंड शुरू करने हेतु औषध एवं प्रसाधन सामग्री नियमों के मौजूदा उपबंधों की समय – समय पर समीक्षा की जाएगी।

स्त्रोत: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, भारत सरकार

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