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राष्ट्रीय स्वापक औषधि-वैध खेती

इस पृष्ठ में राष्ट्रीय स्वापक औषधि-वैध खेती की जानकारी दी गयी है I

अफीम पोस्त की खेती

भारत अफीम का एक परम्परागत उत्पादक देश है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह बात सर्वमान्य है। केन्द्रीय स्वापक नियंत्रण ब्यूरो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान के अधिसूचित क्षेत्रों में अफीम पोस्त की खेती के लिए लाइसेंस देता है। यह खेती केवल केन्द्र सरकार की ओर से की जाती है। किसानों द्वारा उत्पादित सारी अफीम को स्वापक नियंत्रण ब्यूरो खरीद लेता है और इस गवर्नमेंट ओपियम एंड अल्कलाइड वर्क्स (जीओएडब्लू) को अंतरित कर देता है। जीओएडब्ल्यू अफीम को सुखाता है, उसका निर्यात करता है और यह इसकी कुछ मात्रा राज्य सरकारों को देता है ताकि वे इसको नशेड़ियों को मुहैया करा सकें, वे इसकी कुछ मात्रा आयुर्वेदिक दवा कम्पनियों को देता है शेष मात्रा को वे अपने अल्कलायड योजनाओं के लिये रखता है ताकि अलकलायड का निष्कर्षण कर सकें। जोओएडब्लू कई तरह के अल्कलायड का विनिर्माण करते हैं जैसे कि मार्फीन, कोडीन, थेबाइन, नोसकैपाइन, पेपावेरीन, हाइड्रोकोडोन, आक्सीकोडोन, फोलकोडीन आदि और फिर उन्हें से औषधि कम्पनियों को उपलब्ध कराते हैं।

वास्तविक जरुरत के मुताबिक चिकित्सा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिये उपर्युक्त प्रकार से अफीम पोस्त की खेती जारी रहेगी। साथ ही साथ निम्नलिखित क्षेत्रों का भी अन्वेषण किया जायेगा।

(क) पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करने के पश्चात् पोस्त भूस के सान्द्र (सीपीएस) के उत्पादन के लिये अफीम पोस्त की खेती

(ख) अनुसंधान संस्थानों और कम्पनियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना कि वे ऐसे बीजों का विकास/आयात करें, ऐसे पोस्त का पता लगाया जा सके जिनमें अलकलायड की मात्रा ज्यादा हो और यह भी पता लग सके कि क्या उनमें भारत में पोस्त गम उत्पादन या सी पी एस के उत्पादन के लिए उपर्युक्त हैं या नहीं।

(ग) अनुसंधान संस्थानों और कम्पनियों को इस बात के लिये प्रोत्साहित करना कि कम अलकलायड वाली या अलकलायड मुक्त अफीम पोस्त की किस्मों का आयात/विकास करें जो कि केवल पोस्त बीजों के उत्पादन के लिए उपयुक्त हो।

पोस्त बीजों के उत्पादन के लिये अफीम पोस्त की खेती और पोस्त बीजों का आयात

पापावेर सोमिनीफेरम के बीजों को पोस्त बीज कहा जाता है और जबकि इसका लेटेक्स जो रिस कर बाहर आता है और सूख जाता है उसे हम अफीम गोंद कहते हैं। पोस्त गोद कई प्रकार के अलकलायडों का स्रोत होता है और नशीली दवा के रुप में इनका दुरुपयोग होता है जबकि पोस्त बीज को स्वापक नहीं माना जाता है और भारतीय भोजन में इसका मसाले के रुप में प्रयोग किया जाता है। अफीम पोस्त की वैध खेती से उत्पाद के रुप में जितना पोस्त बीज प्राप्त होता है। भारत में पोस्त बीजों की उससे कहीं ज्यादा मांग होती है अत - मांग और आपूर्ति के इस अंतर को पूरा करने के लिए इस समय पोस्त बीजों का आयात किया जा रहा है। कुछ देश ऐसे हैं जो कम अलकलायड वाली पोस्त की पैदावार करते हैं। जिससे कि केवल पोस्त बीजों का ही उत्पादन हो सके। पोस्त भूस को नष्ट कर दिया जाता है आगे चलकर भारत में भी इसी दृष्टिकोण की जरुरत पड़ेगी जिससेकि पर्याप्त मात्रा में पोस्त बीजों का उत्पादन हो सके और देश की जरुरत पूरी हो सके।

भारत सरकार अफीम पोस्त की कम अल्कलायड वाली या गैर अलकलायड वाली किस्मों की खेती को बढ़ावा दे रही है। जिसका केवल पोस्त बीजों के उत्पादन के लिये ही उपयोग किया जा सकता है। भारत सरकार अन्य देशों में उपलब्ध कम अलकलायड वाली किस्मों के बीजों के परीक्षण और बहुलीकरण को बढ़ावा देगी। यदि एक बार सुस्थापित और परीक्षण की ऐसी पद्धतियों का पता चल जाता है। जिससे कि अपील के उत्पादन में प्रयोग किये जाने वाले संयंत्रों से ऐसे संयंत्रों का अलग किया जा सके जिनका प्रयोग पोस्त बीजों के उत्पादन के लिए होता है तो सरकार कम अल्कलायड वाली या अलकलायड मुक्त अफीम पोस्त की खेती को बढ़ावा दे सकती है जिनका प्रयोग केवल पोस्त बीजों के उत्पादन के लिए हो सकता है जिससे इस क्षेत्र में आत्म निर्भरता प्राप्त हो सके और पोस्त बीजों का निर्यात किया जा सके। हालांकि अलकलायड उक्त किस्मों की खेती को तभी अनुमति दी जा सकती है जब ऐसी किस्मों का पर्याप्त परीक्षण हो सकता है और इसमें ऐसे गुण प्रकट होते है जिससे कि इनको अफीम के निष्कर्षण के लिए प्रयुक्त होने वाली जा सीपीएस के उत्पादन के लिए प्रयुक्त होने वाली किस्मों से अलग किया जा सके।

पोस्त बीजों का आयात तब तक जारी रहेगा जब तक कि इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता नहीं प्राप्त कर ली जाती है। इस नीति का उद्देश्य किसी भी देश से पोस्त बीज के आयात की अनुमति प्रदान करना है बशर्ते कि इसका उत्पादन उस देश में हुआ हो जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस बात के लिए प्राधिकृत किया गया हो कि वह निर्यात के लिए अफीम पोस्त का उत्पादन कर सकता है और इसकी खेती भी वैध रुप से की गई हो। ऐसे किसी देश से अफीम पोस्त के आयात की अनुमति नहीं दी जा सकती जहां इसकी खेती अवैध रुप से की जाती हो। पोस्त बीजों के आयात से संबंधित सभी अनुबधों को स्वापक आयुक्त के पास अनिवार्यतः पंजीकृत कराया जायेगा। ऐसे अनुबंधों को पंजीकृत करने के पहले स्वापक आयुक्त अपने को इस बात से संतुष्ट करेगा कि वह देश जहां से पोस्तबीज का आयात किया जाना है अफीम पोस्त की खेती वैध रुप से करता है और जितना आयात किया जाना है उतनी मात्रा में बीज उपलब्ध करा सकता है।

कुछ देशों में पोस्त बीजों का प्रयोग पोस्त बीज तेलों के उत्पादन के लिए किया जाता है। भारत सरकार भी पोस्त बीज तेल के उत्पादन को बढ़ावा देगी ताकि भारत में इनका इस्तेमाल हो सके और इसका निर्यात भी किया जा सके।

पोस्त भूस का प्रयोग और इसको नष्ट करना

स्वापक औषधि और मन -प्रभावी पदार्थ अधिनियम के अनुसार पोस्त भूस से अभिप्राय अफीम पोस्त के पौधे के सभी भाग, केवल इसके बीजों को छोड़कर, से है। हालांकि मार्फीन मुख्य रुप से केवल इसकी फली के भूस में होती है और ऊपरी तने के लगभग पांच मिलीमीटर तक होती है। रस के निष्कर्षण के बाद फली की भूस में फिर भी अल्कलायड की थोड़ी मात्रा बची रह जाती है और यदि इसका पर्याप्त मात्रा में सेवन किया जाय तो इस भूस से नशा हो जाता है। अफीम गोद को निकाल लेने पर किसान लोग फली को तोड़कर उसके बीज को निकालकर बेच देते हैं। फली के भूस को पोस्त भूस भी कहा जाता है। स्वापक औषधि और मन - प्रभावी पदार्थ अधिनियम की धारा 10 राज्य सरकार को यह शक्ति प्रदान करती है। कि वह पोस्त भूस के परिवहन विक्री आदि की अनुमति दे सकती है और उसको विनियमित भी कर सकती है। राज्य सरकारों की यह शक्ति धारा 8 के अंतर्गत लगाये जाने वाले प्रतिबंधनों के अधीन होती है जिसके अनुसार किसी भी स्वापक औषधि और मन -प्रभावी पदार्थों का प्रयोग चिकित्सा और वैज्ञानिक उद्देश्यों से भिन्न अन्य किसी उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता है। राज्य सरकारें वह न्यूनतम मूल्य निर्धारित कर सकती हैं जिसका भुगतान लाइसेंस प्राप्त क्रेता पोस्त भूस के लिए किसानों को करेंगे। पोस्त भूस व्यापार प्रयोग आदि के लिए लाइसेंस जारी करते समय राज्य सरकारों को निम्नलिखित सिद्धांतों का अनुपालन करना होगा यथा

(क) प्रत्येक राज्य जो पोस्त भूस से संबंधित क्रियाकलापों के लिए लाइसेंस जारी करेगा वह एक नोडल अधिकारी नामित करेगा जो कि पोस्त भूस से संबंधित सभी मामलों की देख रेख किया करेगा।

(ख) पोस्त भूस के सभी विद्यमान नशेड़ियों को उनके समुचित चिकित्सीय उपचार के लिए पंजीकृत किया जाना होगा -

(ग) नशेड़ियों के पंजीकरण और उनके द्वारा घोषित मात्रा के आधार पर और चिकित्सकों और अन्य विशेषज्ञों से परामर्श किये जाने के बाद यह अधिकारी यह निश्चित करेगा कि प्रत्येक नशेड़ी और सम्पूर्ण राज्य के लिए कुल कितनी मात्रा में पोस्त भूस की जरुरत हैं।

(घ) नशेड़ियों को दी जाने वाली पोस्त भूस की मात्रा धीरे-धीरे कम की जायेगी जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि कुछ अवधि के बाद यूं कहिये कि इस नीति की घोषणा के तीन वर्ष के बाद ऐसा कोई नशेड़ी नही होगा जिसे पोस्त भूस की जरुरत पड़े। इसके बाद नशा मुक्ति के लिए पोस्त भूस की इजाजत नहीं होगी फिर इसके बाद नीचे

(ज) में दर्शाई गई विधि के अनुसार वापस ले लिया जायेगा। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को स्वापक आयुक्त की निगरानी में पूरा किया जायेगा।

(इ.) नशेड़ियों को पोस्त भूस की आपूर्ति किये जाने में सख्त शर्तों का अनुपालन किया जायेगा जिससे कि यह सुनिश्चित हो सके कि इस कार्य को एनडीपीएस एक्ट/उसके अंतर्गत बनाये गये नियमों के अनुसार ही किया जा रहा है।

(च) पोस्त भूस की खरीद और विक्री के लिए जारी किये गये लाइसेंसों में वह मात्रा विनिर्दिष्ट की जानी है जिसकी खरीद अथवा बिक्री की जा सकती है।

(छ) किसी राज्य में खरीद और बिक्री के लिए लाइसेंस प्राप्त पोस्त भूस की कुल मात्रा नशेड़ियों की चिकित्सा के लिए जरुरी कुल मात्रा और पोस्त भूस की वैज्ञानिक आवश्यकता की मात्रा से अधिक नहीं होगी।

(ज) सभी पोस्त भूस जिसका उपयोग नहीं हो पाता है को नोडल अधिकारी के निरीक्षण में पुनः वापस खेतों में डालकर जुतवा दिया जायेगा। जो स्वापक आयुक्त को इस आशय का प्रमाण पत्र जारी करेगा कि पोस्त भूस की सम्पूर्ण अप्रत्युक्त मात्रा को उसकी निगरानी में खेतों में पुन - जुतवा दिया गया है।

भांग की खेती

एनडीपीएस एक्ट 1985 की धारा 10, इस अधिनियम की धारा 8 के साथ पठित के अंतर्गत राज्य सरकारों को अधिकार दिया गया है कि वे चिकित्सा और वैज्ञानिक उपयोग के लिए भांग की खेती के लिए अनुमति दे सकती हैं। भांग का चिकित्सा परक उपयोग इस समय बहुत ही सीमित है और होमियोपैथिक और आयुर्वेद में वैकल्पिक दवा के रुप में इसका इस्तेमाल होता है। वास्तव में राज्य सरकारें भांग की खेती की अनुमति नहीं देती है। काफी समय बाद वैज्ञानिकों में भांग की चिकित्सा परक प्रयोग के प्रति अभिरुचि जगी है। भांग की खेती के लिए अनुमति दी जा सकती है। बशर्ते कि इसका प्रयोग चिकित्सा संबंधी प्रयोग के लिए हो। इसकी खेती की अनुमति अनुसंधान के लिए ही दी जा सकती है जिसमें भांग की विभिन्न किस्मों का परीक्षण भी शामिल है।

भांग को भांग की पत्तियों से तैयार किया जाता हैं, भारत में जिसका सेवन कुछ त्योहारों के समय किया जाता है। चूंकि इसे भांग की रेसिन या फूल से तैयार नहीं किया जाता है अत - इसे एनडीपीएस एक्ट 1985 के अंतर्गत नहीं लाया गया है। कई राज्य सरकारों ने भांग के उत्पादन और उसकी बिक्री की अनुमति दे रखी है। जिसके पास इस तरह का लाइसेंस होता है वह भांग का उत्पादन कर सकता है। लेकिन वह इसे जंगली भांग की पत्तियों से पैदा कर सकता है। वे फूलों और पौधों के रेसिन का उपयोग नहीं कर सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति भांग में फूलों और रेसिन का प्रयोग करता हुआ पाया जाता है तो उसे एनडीपीएस एक्ट, 1985 के सुसंगत प्रावधानों के अंतर्गत दंडित किया जायेगा और यदि लाइसेंस शुदा व्यक्ति ऐसा करता है तो उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है।

बागवानी और औद्योगिक उद्दश्यों के लिए भांग की खेती

भांग के पौधों का प्रयोग बायोमास के स्रोत के रुप में हो सकता है और औद्योगिक उद्देश्य के लिए इसका रेशे के रुप में इस्तेमाल किया जा सकता है। भांग के बीज की पैदावार भांग बीज के तेल के लिए की जा सकती है जिसकी कीमत बहुत अधिक होती है। कुछ देश भाग की ऐसी किस्मों की खेती के लिए लाइसेंस जिसमें टेट्राहाइड्रो कैन्नाबिनोल (टीएचसी) की बहुत कम मात्रा होती है, जिसका प्रभाव नशा पैदा करना होता है। भांग की इन किस्मों का उत्पादन फाइबर उत्पादन के लिए होता है जिसका इस्तेमाल फेब्रिक्स और बायोमास के उत्पादन में किया जा सकता है।

एनडीपीएस एक्ट की धारा 14 के तहत् सरकार को यह शक्ति प्रदान की गई है कि वह विशेष आदेश जारी करके केवल वैज्ञानिक और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए भांग की खेती की अनुमति दे सकती है। केन्द्र सरकार भांग की कम टीएचसी वाली किस्मों के अनुसंधान और परीक्षण को बढ़ावा दे सकती है। हालांकि केन्द्र सरकार बागवानी और/या औद्योगिक उद्देश्यों के लिए भांग की खेती के प्रति सावधानीपूर्ण और साक्ष्य आधारित दृष्टिकोण अपना सकती है और अनुसंधान परिणामों के आधार पर निर्णय ले सकती है।

कोका बुश की खेती

एनडीपीएस एक्ट की धारा 9 के अंतर्गत केन्द्र सरकार को यह शक्ति प्रदान की गई है कि वह चिकित्सा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए कोका बुश की खेती के लिए अनुमति दे सकती है। केन्द्र सरकार ने अभी तक भारत में कोकाबुश की खेती के लिए अनुमति नहीं दी है। केन्द्र सरकार इस नीति को जारी रखेगी तथा केवल शोध के प्रयोजनार्थ किसी खेती के लिए लाइसेंस देने पर विचार करेगी।

स्रोत: राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार
2.91176470588

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