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खाद्य व पोषण सुरक्षा समुदाय

इस आलेख में खाद्य व पोषण सुरक्षा समुदाय के विषय में विस्तार से जानकारी दी गयी है।

भोजन पाने के अधिकार का कार्यान्वयन

 

खाद्य व पोषण सुरक्षा समुदाय के सोल्यूशन एक्सचेंजः समेकित जवाब

भोजन पाने का अधिकार का कार्यान्वयन- अनुभव

गोपी एन घोष, संसाधन व्यक्ति और टी एन अनुराधा, रिसर्च एसोसिएट द्वारा दस्तावेजीकरण जारी करने की तिथिः १८ नवंबर २००७

  • के वी पीटर, केरल कृषि विश्वविद्यालय, त्रिशूर
  • पी के थांपन, पीके ट्री क्राप्स डेवलपमेंट फाउंडेशन, कोच्ची
  • टी पी त्रिवेदी, इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च, नई दिल्ली
  • बी एल कौल, सोसाइटी फॉर पॉपुलराइजेशन ऑफ साइंस, जम्मू
  • एन पी वाई रमण, राष्ट्रीय सहकारिता विकास संघ, नई दिल्ली
  • रंजन महापात्र, विजन फाउंडेशन फॉर डेवलपमेंट मैनेजमेंट. नई दिल्ली
  • गोपी एन घोष, फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गैनाइजेशन ऑफ द यूनाइटेड नेशंस (एफ ए ओ) नई दिल्ली
  • उमेश कपिल, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नई दिल्ली
  • राज गांगुली, स्वतंत्र परामर्शदाता, नई दिल्ली
  • अनाम शर्मा, सेंटर फॉर साइंस, डेवलपमेंट एंड मीडिया स्टडीज (सीएसडीएमएस), नोएडा
  • रमेश वी भट्ट, सेंटर फॉर साइंस, सोसाइटी एंड कल्चर, हैदराबाद

 

प्रतिक्रियाओं का सार

Bhojanभोजन पाने के अधिकार एक मूलभूत मानवीय अधिकार है, जो हरेक आदमी को पर्याप्त, पोषक तत्वों से भरपूर और सांस्कृतिक तौर पर स्वीकार्य खाद्यान्न मुहैया कराने का अधिकार देता है, ताकि वह एक सक्रिय और स्वस्थ जिंदगी जी सके। भारत में 106.54 करोड़ की जनसंख्या है, जिसमें 28.6 फीसदी को अब भी पर्याप्त भोजन नसीब नहीं होता है। भोजन पाने के अधिकार के प्रयासों के बारे में सवाल पूछे जाने पर सदस्यों ने सफल प्रयासों के बारे में अनुभवों को बाँटा और साथ ही इनके कार्यान्वयन के लिए संभव रणनीतियों का भी खुलासा किया, जिसमें व्यापक स्तर पर जागरूकता फैलाने की भी बात कही गई। सदस्यों ने ग्लोबल इंटरनेशनल असेसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंस एंड टेक्नोलॉजी फॉर डेवलपमेन्ट रिपोर्ट(आईएएएसटीडी रिपोर्ट) का हवाला दिया, जिसमें ग्रामीण (30.2 फीसदी) और शहरी (24.7 फीसदी) गरीबी, भूखमरी और कुपोषण (जनसंख्या का 20 फीसदी हिस्सा कुपोषित है और पांच साल से कम उम्र के 49 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से काफी कम है), लैंगिक भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार, पर्यावरण क्षरण और शहरी-ग्रामीण भारत के बीच बढ़ती खाई पर चिंता जताई गई। उन्होंने सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र के लगातार कम होते योगदान पर भी चेतावनी दी गई, खासकर इसको देखते हुए कि खेती अब भी लाखों के लिए आजीविका का मुख्य साधन है।

सदस्यों ने विकास कार्यक्रमों को दयनीय ढंग से बढ़ाने और अधिकार-आधारित मसलों की भारत में कम चर्चा को भी रेखांकित किया। सदस्यों ने महसूस किया कि भोजन पाने के अधिकार के मसले को बढ़ावा देने और/या जागरूकता पैदा करने के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं की गई। प्रतिभागियों ने इस बात पर जोर दिया कि भोजन पाने के अधिकार के विचार को बढ़ावा देने के लिए इससे जुड़े मिथकों को नष्ट कर बहुत जरूरी है। एफएओ के दिशा-निर्देशों के मुताबिक पर्याप्त भोजन पाने के अधिकार से मतलब खिलाए जाने का अधिकारनहीं लगाना चाहिए। यह किसी को भी पूरे सम्मान से खाने का अधिकार सुनिश्चित करने से है। दूसरी जो गलत धारणा इससे जुड़ी है, वह खाने के अधिकार को खाने की गुणवत्ता या सुरक्षित खाने से बराबर करती है। खाने के अधिकार के दिशा-निर्देश इस पर जोर देते हैं कि मात्रा, गुणवत्ता और सुरक्षित खाने के साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि यह कोई पश्चिमी विचार नहीं है बल्कि सभी सभ्यताओं की मूलभूत धारणा है, केवल विकास की अवधारणा से उपजा कोई विचार नहीं।

भोजन पाने के अधिकारको लेकर व्यापक जागरूकता की जरूरत पर बल देते हुए प्रतिभागियों ने इस विचार के विविध पक्षों पर बल दिया है। एक मान्यता यह भी है कि लोगों की जरूरत मानवाधिकार नहीं वरन् खाना है। दूसरी तरफ मानवाधिकारवादी रवैया लोगों को विकास के केंद्र में रखने की जरूरत पर बल देता है और उनको सशक्तीकृत कर अपने अधिकार मांगना सिखाता है। अधिकार-आधारित रवैया पर बात करते हुए सदस्यों ने व्याख्या की कि यह रवैया सरकार को उसकी जिम्मेदारी से मुकरने का मौका नहीं देता और उसे वह जरूरी वातावरण निर्मित करने के लिए बाध्य करता है, ताकि हरेक व्यक्ति सम्मानपूर्वक अपने खाने का प्रबंध कर सके। ठीक इसी समय यह भी महसूस किया गया कि केवल सरकार से ही हरेक को खिलाने की उम्मीद रखना गलत होगा।
दूसरा अहम् मसला यह उठाया गया कि लोगों को यह जानने का भी अधिकार है कि वह क्या खा रहे हैं। इस संदर्भ में सदस्यों ने उड़ीसा में प्रतिबंधित कॉर्न सॉय ब्लेंड मिक्सचर (मक्के के बीज) के वितरण का उदाहरण दिया जिसके खानेवाले को एलर्जी हो जाती थी। प्रतिभागियों ने महसूस किया कि जीन संवर्द्धित (जीएम) और गैर-जीनसंवर्द्धित खाद्यान्नों के उचित लेबल चस्पां किए जाने की जरूरत है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि हरेक अनुवंशकीय परिवर्तित (जीएम) खाद्यान्न मानव के खाने के लायक नहीं होता और इसका लाभ उठानेवाले लोगों को इसके प्रभावों के बारे में ढंग से बताया नहीं जाता। राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक जागरूकता-विज्ञापनों और इसे बढ़ावा देनेवाली योजनाओं के माध्यम से- के बाद ही यह ज्यादा प्रभावी हो सकता है। इस तरह के प्रचारात्मक कार्यक्रम अभी हाल में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (एनआरईजीएस) और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के लिए चलाए भी जा रहे हैं।

हालांकि हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाकर और दलहन का निर्यातक बनने की हालत में लाकर कुछ बड़ा बदलाव जरूर किया, पर हाल के वर्षों में इसका उल्टा असर भी देखने को मिल रहा है। भारत एक बार फिर से खाद्यान्न का बड़ा आयातक बन रहा है। बेहतर कृषि उत्पादन व्यवस्था के माध्यम से भोजन पाने के अधिकार को सफलीभूत करने के लिए विविध रणनीतियों पर चर्चा करते हुए सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया कि उत्पादन और उत्पादकता की समस्याओं को दोहराते रहने की बजाय व्यावहारिक कदमों को उठाना अधिक बेहतर रहेगा। उन्होंने महसूस किया कि स्थानीय स्व-प्रशासन संस्थाओं (एल.एस.जी.आई), खासतौर पर ग्राम-पंचायत खाने के विविध स्रोत के साथ ही आय और आजीविका के भी कई साधनों को सृजित करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। पंचायती राज संस्थाओं के क्षमता-निर्माण द्वारा दीर्घकाल तक कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के तौर पर खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के सुझाव भी दिए गए। इसके साथ ही, प्रतिभागियों ने इस बात को भी रेखांकित किया कि खाद्यान्न सुरक्षा के प्रबंधन को स्थानीय प्रयासों जैसे, सहकारिता, स्वयं सहायता समूह और दूसरे समानधर्मी नागरिक भागीदारी वाले प्रयासों पर निर्भर होना चाहिए न कि केवल सरकारी विभागों का मुंह ताकना चाहिए।

प्रतिभागियों ने कंद और मूलों के साथ ही रक्षा करनेवाले खाद्यान्नो, जैसे फलों और सब्जियों के साथ ही पशु उत्पादों (दूध, घी वगैरह) को दालों के साथ खाने में स्थान देने की जरूरत पर बल दिया। एक व्यावहारिक उत्पादन व्यवस्था को अपनाने की जरूरत पर बल देते हुए प्रतिभागियों ने इस बात पर जोर दिया कि अलग-अलग खाद्यान्न की जरूरतों के हिसाब से एकीकृत सघन कृषि प्रणाली अपनाई जाए। उन्होंने केरल के अल्लापुझा जिले के पट्टनक्कड प्रखंड के किसानों के सफल प्रयोग का उदाहरण दिया। दूसरा विकल्प जो सुझाया गया, वह समय की कसौटी पर खरा उतरा वही उपाय है जिसमें मोटे अनाजों का उत्पादन कर खाद्य सुरक्षा को पाया जा सकता है।

दूसरे सुझावों में दूसरे अहम् राष्ट्रीय स्तर के विकास कार्यक्रमों जैसे एनआरईजी, एनआरएचएम और मिड-डे मील के जैसे ही खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम और इसके लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कोष स्थापना करने की भी राय दी गई। इसमें सरकार, निजी और सार्वजनिक, स्वयंसेवी संस्थाएं और संगिठत क्षेत्र के कर्मियों से धन लिया जाए। दूसरी सिफारिश यह की गई कि भोजन पाने के अधिकार कार्यक्रम के क्रियान्वयन के दौरानसामाजिक ऑडिट करने पर जोर दी गई ताकि भागीदारी एवं पारदर्शिता सुनिश्चित किया जा सके और व्यवस्था के छिद्र को भरा जा सके और व्यवस्थागत मूल्यांकन और परीक्षण किया जा सके। इस तरह की व्यवस्था सफलतापूर्वक आंध्र प्रदेश में राष्ट्रीय काम के लिए अनाज कार्यक्रम में की जा चुकी है, जिसके फलस्वरूप प्रशिक्षित स्रोत व्यक्तियों का एक मजबूत संजाल तैयार किया गया, जिससे लाभ पाए परिवारों का मूल्यांकन किया जा सके।
सदस्यों ने यह भी महसूस किया कि समग्र विश्लेषण के तौर पर यही कह सकते हैं कि कोई भी क्रिया तब तक जमीनी तौर पर सफल नहीं होगी, जबतक राजनीतिक इच्छाशक्ति न हो। उन्होंने महसूस किया कि जमीनी स्तर की संस्थाओं जैसे, पंचायती राज संस्थान, ग्राम सभाएँ और दूसरे जनाधारित कार्यक्रम को सशक्त करना होगा, ताकि इच्छित लाभार्थियों को लाभ मिल सके। सरकारों को माँग की व्यवस्था को मजबूत कर वितरण की व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए भी प्रेरित करना चाहिए ताकि वायदे के मुताबिक ही कार्यक्रमों का लाभ भी पहुंच सके। निष्कर्ष के तौर पर उन्होंने ज्ञान की खाई को भरने की आवश्यकता पर भी बल दिया ताकि जिन लोगों के हित दांव पर हैं, उनकी भी भागीदारी सुनिश्चित की जा सके।

तुलनात्मक अध्ययन

आँध्र प्रदेश
सामाजिक अंकेक्षण (ऑडिट) भोजन पाने के अधिकार को सुनिश्चित कर सकता है (द्वारा एन पी वाय रमण, नेशनल कॉपरेटिव कॉरपोरेशन, नई दिल्ली)
राष्ट्रीय काम के बदले अनाज कार्यक्रम ने इसके काम पर एक सामाजिक अंकेक्षण किया, जिसने काफी बहुमूल्य अंतर्दृष्टि यह समझने में दी कि एक बेहतर वितरण व्यवस्था किन तत्वों से बनती है। विकास की प्रक्रिया का आकलन गांव में ही रहनेवाले साक्षर लाभुकों ने किया। इस सामाजिक ऑडिट की सफलता के आधार पर राज्य में रोजगार गारंटी योजना का भी इसी तरह का सामाजिक ऑडिट करने की योजना है।

इंटेंसिव इंटीग्रेटेड एग्रीकल्चर फॉर रीयलायजिंग राइट टू फूड, अलप्पुझा (द्वारा, पी. के. थंपन, पीके ट्री क्रॉप्स डेवलपमेंट फाउंडेशन, कोच्ची)
पट्टनक्कड प्रखंड के थुरावुर पंचायत के श्री विश्वनाथन ने एकीकृत कृषि प्रणाली को अपनाया और अपने खेत के 20 फीसदी हिस्से में मुर्गी, खरगोश और सूअर पालन किया। इस एकीकृत प्रणाली से उनके परिवार को महीने में 10,000 रुपये की अतिरिक्त आय होती है और यह सचमुच ही खाने, आय और रोजगार के विविध तरीकों को सुनिश्चित करने का एक अनूठा तरीका है।

उड़ीसा
जानने का अधिकार कि आप क्या खाते हैं (द्वाराः रमेश वी भट्ट, सेंटर फॉर साइंस, सोसाइटी एंड कल्चर, हैदराबाद)
राज्य में जीन संवर्द्धित मक्के के बीज की स्टारलिंक किस्म बांटी गई थी। इससे उन लोगों में एलर्जी हो गई, जिन्होंने भी उसका सेवन किया था। अनुवंशकीय संशोधित बीज की इस किस्म को अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया में प्रतिबंधित कर दिया गया है, क्योंकि यह केवल जानवरों के खाने लायक है। नतीजे के तौर पर देश में इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि जनता को यह बताया जाए कि उसे क्या परोसा जा रहा है।

संबंधित स्रोत


अनुशंसित दस्तावेज
डेवलपिंग अ सिस्टम फॉर मैनेजिंग फूड सेक्युरिटी थ्रू पंचायती राज (द्वारा- रंजन महापात्र, विजन फाउंडेशन फॉर डेवलपमेंट मैनेजमेंट, नई दिल्ली)
आलेख- द्वारा, रंजन महापात्र, विजन फाउंडेशन फॉर डेवलपमेंट मैनेजमेंट, नई दिल्ली
उपलब्धः - http://www.solutionexchange-un.net.in/food/cr/res171007.doc

जेनरेटिंग जॉब्स थ्रू फूड फॉर वर्क (द्वारा- एन पी वाय रमण, नेशनल कॉपरेटिव डेवलपमेंट कॉरपोरेशन, नई दिल्ली
आलेखः द्वारा- अदिति लाहिरी, प्रेस इंफॉरमेशन ब्यूरो, 26 मई 2005
उपलब्धःhttp://www.pib.nic.in/release/release.asp?relid=9497
द्वाराः गोपी घोष, स्रोत व्यक्ति

एनफोर्सिंग राइट टू फूड इन इंडियाः बॉटलनेक्स इन डेलीवरिंग द एक्सपेक्टेड आउटकम
प्रपत्रः द्वारा जॉर्ज चेरियन, कंज्यूमर यूनिटी एंड ट्रस्ट सोसाइटी (सीयूटीएस), जयपुर, आईसीएसएसआर-डब्ल्यूआईडीईआर, यूएनवी के खाद्य सुरक्षा पर संयुक्त कार्यक्रम में द्वितीय इंटरनेशनल के लिए प्रपत्र
हेलसिंकी, फिनलैंड, 12-14 अक्तूबर 2005
उपलब्धः http://www.wider.unu.edu/

स्टेटस ऑफ सोशल सेक्युरिटी स्कीम्स अंडर राइट टू फूड

राइट टू फूड इन इंडिया
प्रपत्र, द्वारा- एस मानवेंद्र देव, सेंटर फॉर इकॉनॉमिक एंड सोशल स्टडीज, आइडियाज
उपलब्धःhttp://www.ideas.repec.org/p/ind/cesswp/50.html

द ह्यूमन राइट टू फूड इन इंडिया
आलेखः द्वार- जॉर्ज केंट, यूनिवर्सिटी ऑफ हवाई, 12 मार्च 2002
उपलब्धःhttp://www.earthwindow.com/grc2/foodrights/HumanRightToFoodinIndia.pdf
द्वाराः टी एन अनुराधा, रिसर्च असोसिएट

द राइट टू फूड इन प्रैक्टिस
प्रपत्रः एफएओ, रोम 2006
उपलब्धःhttp://www.fao.org/

द राइट टू फूड
आलेखः द्वारा-बिराज पटनायक, इंफोचेंज, अक्तूबर 2006
उपलब्धःhttp://infochangeindia.org/

एससी चेकिंग फूड क्राइसिस
आलेखः इंडिया टुगेदर, अगस्त 2003
उपलब्धःhttp://www.indiatogether.org/2003/aug/pov-rtfupdate.htm

नेशनल ह्युमन राइट्स कमीशन (एनएचआरसी) रेकमेंड्स कांन्सटिट्यूशन ऑफ वाच कमिटीज फॉर अ हंगर फ्री इंडिया
आलेखः नेशनल ह्युमन राइट्स कमीशन (एनएचआरसी), नई दिल्ली, 16 अक्तूबर 2007
उपलब्धःhttp://www.nhrc.nic.in/dispArchive.asp?fno=1492

अनुशंसित संगठन और कार्यक्रम
द्वाराः टी एन अनुराधा, रिसर्च एसोसिएट

राइट टू फूड कैंपेन, नई दिल्ली
5 ए, जुंगी हाउस, शाहपुर जाट, 110049 नई दिल्ली
righttofood@gmail.comhttp://www.righttofoodindia.org

सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट, मुंबई
बांबे हाउस, 24 होमी मोदी स्ट्रीट, मुंबई 400001 महाराष्ट्र, टेलीफोनः- 91-22-66658282
फैक्सः 91-22-22045427
sdtt@sdtatatrust.comhttp://dorabjitatatrust.org/

अनुशंसित पोर्टल्स और सूचना के आधार
द्वाराः रेबेका किक, एफएओ, नई दिल्ली

द राइट टू फूड, एफएओ, रोम
http://www.fao.org/wfd2007/index_wfd2007

यूएन मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स, य़ूनाइटेड नेशंस

http://www.un.org/millenniumgoals

 

 

हरी पत्तेदार सब्जियों की पोषणात्मक गुणवत्ता

 

हरी पत्तेदार सब्जियों की पोषणात्मक गुणवत्ता

समन्वयनःगोपी एन. घोष, स्रोत व्यक्ति औरटी एन अनुराधा
एवं वंदना अग्रवाल, रिसर्च असोसिएट

जारी करने की तिथिः ३१ अक्तूबर २००७

द्वारा वनिषा नांबियार द्वारा. एम एस विश्वविद्यालय, वड़ोदरा

प्रेषितः ९ अक्तूबर २००७

फलों और सब्जियों में विटामिन और प्रो-विटामिन के साथ ही उन प्रतिरोधक रसायनों (फाइटोकेमिकल्स)veg का भी होना हाल के दिनों में जरूरी माना जाने लगा है, ताकि पोषकता के साथ ही गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर, हृदयवाहिनी के रोग और मधुमेह से भी निबटा जा सके। स्नायविक और मस्तिष्कीय रोगों से होने वाली मौतों और फलों एवं सब्जियों के कुल उपभोग में भी एक विषम अंतर्संबंध पाया गया है। फलों और सब्जियों में फाइटोकेमिकल्स के जटिल मिश्रण से स्वास्थ्य पर बेहतर प्रभाव पड़ता है, बनिस्बत एक अकेले फाइटोकेमिकल के।

भारत में वनस्पतियों की कुल 6000 प्रजातियों को उपभोग के काम में लाया जाता है, जिसमें से एक-तिहाई हरी पत्तेदार सब्जियाँ हैं। ये हरी पत्तेदार सब्जियाँ विटामिन और खनिजों-लवणों के बेहद अच्छे स्रोत हैं। इनके लगातार सेवन से भारतीय जनता के अल्पपोषित वर्ग की हालत में खासा सुधार ला सकते हैं। इनमें से कई का इस्तेमाल तो औषधीय कार्यों में भी होता है। स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और पोषक तत्वों से भरपूर ये सब्जियां, इसी वजह से भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या से लड़ने में सहायक साबित होती हैं। इसी कारण इनको भोजन का अनिवार्य अंग बनाने की जरूरत है।
हालांकि ये हरी पत्तेदार सब्जियों में पानी की अधिक मात्रा होने से इनके काफी तेजी से नष्ट भी होने की संभावना हो जाती हैं, इसीलिए इनकी नमी को हटानेवाले उपाय करने से इनको काफी दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। कई तकनीकों जैसे सौर किरणों के प्रत्यक्ष इस्तेमाल, छाया में सूर्य किरणों का प्रयोग, या विद्युत कैबिनेट के इस्तेमाल से सुखाना या पूर्वशोधित तरीके से सुखाने से होनेवाले निर्जलीकरण से आवश्यक पोषकता में कमी आने की प्रतिशतता का भी अलग-अलग खाद्यों के संदर्भ में अध्ययन किया गया और इनको अलग-अलग स्तरों पर 25.7 फीसदी से 90 फीसदी तक पाया गया।

ये निर्जलीकृत सब्जियां पारंपरिक खानों के तौर पर भी अपनाई जा सकती हैं जो समुदाय में मान्य हों। इसके पीछे की रणनीति खाद्य आधारित दृष्टिकोण को अपनाकर पोषण के तत्व को बढ़ाना है।

मैं एफएनएस के सदस्यों से उनके अनुभवों को इन विषयों पर बांटने का अनुरोध करता हूं-

  1. उनके कार्यक्षेत्र में हरी पत्तेदार सब्जियों की फेहरिस्त उनके रासायनिक विवरण (और वानस्पतिक नाम) के साथ।
  2. हरी सब्जियों को बचाने के लिए अपनाई गई निर्जलीकरण विधि, जिसमें सुखाने और भंडारण के अलग चरणों में पोषक तत्वों की कमी का भी उल्लेख हो।
  3. किसी भी बड़े सामुदायिक या राष्ट्रीय खाद्य कार्यक्रम में स्वीकार्य मसालों के साथ सूखी हुई पत्तेदार सब्जी का इस्तेमाल का अनुभव
  4. महिलाओं के लिए सुखाई हुई हरी सब्जियों या उनके पूरक मसालों के इस्तेमाल से रोजगार सृजन के अनुभव या विचार
  5. एक लाभदायक और बेहतरीन बहस की उम्मीद के साथ

 

निम्नलिखित से प्रतिक्रियाएँ प्राप्त, सधन्यवाद

  • के वी पीटर, केरल कृषि विश्वविद्यालय, त्रिशूर
  • दीक्षा शर्मा, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) नई दिल्ली
  • एच एस शर्मा, स्वतंत्र परामर्शदाता, नई दिल्ली
  • काजल पांड्या, सीताराम भरतिया इंस्टीट्यूट फॉर साइंस एंड रिसर्च, नई दिल्ली
  • अनुपम पॉल, एग्रीकल्चर ट्रेनिंग सेंटर, फुलिया, पश्चिम बंगाल
  • राज गांगुली, स्वतंत्र परामर्शदाता
  • स्वर्ण  के, संयुक्त राष्ट्र का खाद्यान्न एवं कृषि संगठन (एफ ए ओ), नई दिल्ली
  • राजेश्वरी रमण, न्यूट्रीशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया, नई दिल्ली
  • अर्द्धेंदु एस चटर्जी, डेवलपमेंट रिसर्च कम्युनिकेशन एंड सर्विसेज सेंटर (डी आर सी एस सी), कोलकाता
  • नेहा श्रीवास्तव, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी
  • इंदिरा चक्रवर्ती, अखिल भारतीय स्वच्छता एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान, कोलकाता
  • सुशांत रॉय, नेशनल हॉर्टिकल्चर मिशन, नई दिल्ली

 

प्रतिक्रयाओं का सार

हरी पत्तेदार सब्जियाँ खाने की वस्तुओं में एक अहम स्थान रखती हैं, क्योंकि ये मानवों को पर्याप्त मात्रा में विटामिन और खनिज मुहैया कराती हैं। सब्जियों की पोषणात्मक गुणवत्ता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता, क्योंकि लोगों में जानकारी का अभाव होता है और उनके प्रभावी उपयोग के लिए जरूरी तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया जाता। भोजन में पोषक तत्वों को बढ़ाने के लिए हरी पत्तेदार सब्जियों के इस्तेमाल के सवाल पर सदस्यों ने पोषक तत्वों को रेखांकित किया, उनके व्यापक इस्तेमाल में होनेवाली दिक्कतों का उल्लेख किया, व्यंजनों में हरी पत्तेदार सब्जियों के इस्तेमाल के प्रयास के अनुभव बताए और उनके इस्तेमाल को बढ़ावा देने के उपाय सुझाए।

हरी पत्तेदार सब्जियों में पायी जानेवाली व्यापक पोषक गुणवत्ता को रेखांकित करते हुए सदस्यों ने इसकी व्याख्या की कि सब्जियां मौसमी (हरबेशस), झाड़ीदार (श्रब) या फिर पादपीय मूल की हो सकती हैं, जिनकी पत्तियों को खाया जा सकता है। पत्तों में विटामिन ए, सी, फॉलिक एसिड, रिबोफ्लविन, थियामिन, बी कैरोटीन और लोहा और कैल्सियम जैसे खनिज, काफी अधिक रेशे और प्रति-उपापचयी (एंटीऑक्सिडेंट्स) पदार्थ पाए जाते हैं। हरी पत्तेदार सब्जियों में मौजूद कैरोटीन शरीर में जाकर विटामिन ए बनाता है जो हमें अंधेपन से बचाता है। सब्जियों की पोषणात्मक गुणवत्ता मौसम, रसायन के उपयोग और उत्पादन के लिए प्रयुक्त बीज के आधार पर अलग-अलग होती है। विटामिन सी, बी, चीनी और प्रति-उपापचयी पदार्थ, रासायनिक तौर पर उगाई सब्जियों में कम पाये जाते हैं। कम मेहनत और प्रबंधन से हरी पत्तेदार सब्जियों के उत्पादन पर जोर दिया गया।

हरी पत्तेदार सब्जियों के इस्तेमाल के मुद्दे और रुकावटों पर चर्चा करते हुए सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया कि सब्जियों में पानी और मिट्टी के जरिए होनेवाले प्रदूषण और उससे पैदा होनेवाले कीटाणु, कीड़े, जीवाणु और बाकी नुकसानदेह तत्वों की वजह से माताएँ अपने शिशुओं को ये नहीं देतीं। इस प्राथमिक जानकारी का भी अभाव है कि हरी सब्जियों को खूब अच्छी तरह से धोना चाहिए ताकि ये नुकसानदेह तत्व निकल जाएं और अतिसार (डायरिया) से बचाव हो सके। दूसरा जो अहम मसला उठाया गया, वह लगभग 60 फीसदी सब्जियों और फलों की बर्बादी का था, जो उचित भंडारण और संरक्षण तकनीक के अभाव से होती हैं। हरी पत्तेदार सब्जियां काफी नाजुक और आसानी से नष्ट होनेवाली होती हैं और लंबी दूरी तक इनको ले जाना, अधिक तापमान और आर्द्रता की वजह से संभव नहीं हो पाता। दूसरी आधारभूत गड़बड़ी बिजली की कमी है। सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया कि खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल व नाली के पानी से सिंचाई की वजह से सब्जियाँ भारी तत्व (हेवी मेटल) और सूक्ष्म जैविक प्रदूषण से प्रदूषित हो जाता है। शहरी घरों में पश्चिमी खाद्यान्न जैसे ब्राकोली और लाल बंदगोभी के इस्तेमाल से भी भारतीय सब्जियों की मांग घटी है।

सदस्यों ने मौजूदा व्यंजनों में हरी पत्तेदार सब्जियों के इस्तेमाल के लिए किए गए उपायों के अनुभव भी बताए। न्यूट्रीशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने ऐसे व्यंजन तैयार किए हैं, जिनमें सब्जियों और हरी पत्तेदार सब्जियों के इस्तेमाल को मौजूदा खाने में ही शामिल किया जा सके ताकि बच्चे उनको खाने से हिचकें नहीं। ये व्यंजन दिल्ली में मध्याह्न भोजन योजना के तहत सरकारी स्कूलों में दृश्य और अदृश्य रूपों में खानों में मिलाए गए हैं। पश्चिम बंगाल में छोटे स्तर पर सहजन, तुलसी और कड़ी पत्ते वगैरह के चूर्ण को बड़ी, पापड़, रस (सूप) और सॉस में मिलाकर परीक्षण किया गया ताकि गुणवत्ता और स्वाद बरकरार रह सके। गेहूं और चावल के आटे और बेसन में गोभी के पत्ते का चूर्ण मिलाकर भी देखा गया, ताकि रोटी, पूरी, इडली, डोसा और पकौड़ा वगैरह बनाते समय बी-कैरोटीन तत्व की पूर्ति की जा सके, जो विटामिन ए की कमी से निबटने में काफी सहायक होता है। हिमाचल प्रदेश में चौलाई (अमरनाथ) के पत्ते के चूर्ण को गली में बिकने वाले खानों में मिलाया गया, जो पोषक तत्वों को बढ़ाने में सहायक होता है।

सदस्यों ने हरी पत्तेदार सब्जियों के उत्पादन और इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए अग्रांकित सुझाव दिएः-

  • रोजाना के खाने में हरी पत्तेदार सब्जियों को शामिल करना, जिनकी पोषकता अत्यधिक है
  • हरी पत्तेदार सब्जियों के संग्रहण के लिए कम खर्चे वाली तकनीक के विकास पर ध्यान देने की जरूरत
  • पकाने की विधि को सिखाने पर बल देना, जो शिक्षा कार्यक्रम या सलाह के सत्र में दिया जा सके, जैसे हरी पत्तेदार सब्जियों को बहुत अधिक नहीं पकाना, हरी सब्जियों को नहीं भूनना वगैरह
  • खाना पकाने के दौरान पोषक तत्वों के नुकसान को कम से कम करने के अनूठे उपाय खोजना
  • मौसमी हरी सब्जी के संग्रहण पर जोर ताकि कम उत्पादन वाले मौसम में भी उपलब्धता बनी रहे, साथ ही नुकसान कम से कम हो
  • हरी पत्तियों के चूर्ण के इस्तेमाल पर जोर देना, खासकर गर्मियों के मौसम में जब इनकी उपलब्धता कम होती है, ताकि धोने, साफ करने और हरी पत्तेदार सब्जियों के काटने वगैरह की झंझट से बचा जा सके
  • बच्चों में सब्जियों के इस्तेमाल के बारे में जागरूकता लाना, ताकि उनके खान-पान की आदतों में सकारात्मक बदलाव आ सके
  • गाँव की महिलाओं को आजीविका का मौका देने के लिए अपारंपरिक खाद्यान्न के इस्तेमाल को बढ़ावा देना

 

हमारी पोषकता से जुड़ी अधिकतर समस्याओं का जवाब एक ऐसा प्राकृतिक उत्पाद है, जिसमें तमाम जाने-अनजाने प्रति उपापचयी (नॉन-ऑक्सिडेंट्स) हों। इसीलिए आसानी से उपलब्ध, गैर-खर्चीले और सूक्ष्म-पोषकता से भरपूर सब्जियों के अधिक इस्तेमाल से जनसंख्या के हरेक तबके में पोषकता को बढ़ाया जा सकता है।

तुलनात्मक अनुभव

हिमाचल प्रदेश

हरी पत्तेदार सब्जियों ने पालमपुर में सड़कों पर बिकनेवाली खाद्य सामग्री में पोषकता बढ़ाई (स्वर्ण के, एफ ए ओ, नई दिल्ली) आमतौर पर बाजार में बिकनेवाले भारतीय खाद्य पदार्थों जैसे मठरी और आलू की टिक्की में पोषकता को बढ़ाने का प्रयास हरी पत्तेदार सब्जियों की मार्फत किया गया। चौलाई (अमरनाथ) के पत्तों को सुखाया गया, मसालों को मानकीकृत किया गया और खाने को चौलाई के पत्ते के चूर्ण के विविध स्तरों को मिलाया गया। खाने की दोनों ही किस्मों में पोषकता को काफी बढ़ते देखा गया।

नई दिल्ली

मध्याह्न भोजन योजना को हरी सब्जियों से संवर्द्धित करना (राजेश्वरी रमण की ओर से, न्यूट्रीशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया, एन एफ आई, नई दिल्ली)
एनएफआई ने मध्याह्न भोजन योजना की गुणवत्ता सुधारने के लिए काफी व्यापक प्रयत्न किए, जो सभी सरकारी स्कूलों में दिए जाते हैं। छात्रों और शिक्षकों को जागरूक करने की गतिविधियाँ की गईं, ताकि सब्जियों के महत्व को समझाया जा सके और पहले से ही दिए जा रहे पकवानों में हरी पत्तेदार सब्जियों का इस्तेमाल हो सके। इससे बच्चों में सब्जी और हरी पत्तेदार सब्जियों के महत्व को समझाने में काफी मदद मिली और उन्होंने स्वाद को भी सराहा।

तमिलनाडु

हरी पत्तेदार सब्जियों से लोहे की प्राप्ति (टी एन अनुराधा, रिसर्च एसोसिएट) पन्नमडई गाँव के स्कूल में एक अध्ययन किया गया, जिसमें छात्रों को दो दिनों पर रोजाना 25 ग्राम सहजन की पत्तियां दी गई और तीसरे दिन चौलाई के साथ वहाँ का स्थानीय व्यंजन कूटू दिया गया, ताकि स्कूल के लंच को संवर्द्धित किया जा सके। वहीं थालियुर गांव के बच्चों को किसी तरह की हरी सब्जी नहीं दी गई। छह महीने के बाद अध्ययन में यह पाया गया कि जिन बच्चों को हरी पत्तेदार सब्जियां दी गईं, उनके खून में हीमोग्लोबिन का स्तर काफी पाया गया।

संबंधित स्रोत

अनुशंसित दस्तावेज

अंडरयूटिलाइज्ड एंड अंडरएक्सप्लॉयटेड हॉर्टिकल्चरल क्रॉप्स (from (लेखक, के.वी. पीटर, केरल कृषि विश्वविद्यालय, त्रिशूर))

किताब के लेखक, के वी पीटर, वेदम्स, नई दिल्ली, २००७

उपलब्धः http://www.vedamsbooks.com/no49272.htm
यह किताब पत्तेदार सब्जियों जैसे अगाथी, चेक्कुरमानिस, जलपत्री, सहजन की पत्ती, तुलसी की पत्तियाँ और अलुवादी की पत्तियों के बारे में बताता है जो रेशे, खनिज और बी कैरोटीन से भरपूर होती हैं।

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