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प्रजनन स्वास्थ्य की जानकारियाँ

इस भाग में प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारियाँ दी गई हैं।

पृष्ठभूमि

हमारे देश में जनसंख्या स्थिरीकरण के उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रजनन एवं शिशु स्वास्थय कार्यक्रम के विस्तृत आयाम को प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है| इसमें सिर्फ परिवार नियोजन के लिए स्थायी गर्भ निरोध का लक्ष्य ही नहीं निर्धारित किया गया बल्कि अन्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भी कार्यक्रम शुरू किए गए

झारखण्ड प्रजनन स्वास्थ्य : भारत के परिप्रेक्ष्य में

मुख्य मुद्दे : उच्च यद्यपि झारखण्ड की वर्त्तमान स्थिति में पिछले 4-5 वर्षों में प्रजनन दर (3.49) में कमी आयी है| झारखण्ड के गांवों का कूल प्रजनन दर 3.59 है तथा शहरों का कुल प्रजनन दर 2.75 है| झारखण्ड की जनसंख्या के 75.5% लोग परिवार नियोजन के इसी भी साधन का इस्तेमाल नहीं करते हैं| केवल 24.5% लोग ही किसी एक साधन का इस्तेमाल करते हैं| यहाँ 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं में सबसे ज्यादा प्रचलित महिला बंध्याकरण है जो कि 19.2% महिलाओं द्वारा अपनाया गया है| केवल 1.4% महिलाएँ ही आधुनिक अन्तराल विधि (जैसे- कंडोम, गर्भरोधक, गोलियां, आई. यु. डी.) का इस्तेमाल करती हैं| उच्च शिशु मृत्यु दर- झारखण्ड का वर्त्तमान शिशु मृत्यु दर लगभग 73 प्रति 1000 जीवित जन्में शिशुओं में से है जो कि कुछ राज्यों, केरल (16.3% प्रति 1000) से कहीं बहुत ही अधिक है| झारखण्ड में यह बड़ी संख्या निम्नलिखित कारणों से है :-

क) कम उम्र में गर्भधारण करना

ख) बच्चों के बीच अन्तराल की कमी

ग) ज्यादा गर्भधारण करना

उच्च मातृ मृत्युदर:

झारखण्ड में प्रतिवर्ष 100,000 गर्भ धारण करने वाली महिलाओं में 540-600 की मृत्यु हो जाती है| पूरे भारत के लिए यह औसत संख्या 540 है| झारखण्ड में यह संख्या भारत के औसत संख्या से ज्यादा है लेकिन यह संख्या विश्व के अन्य निर्धन देशों से भी कहीं अधिक ज्यादा है जो हमसे निर्धन तो हैं परन्तु स्वास्थ्य के मामले में कहीं बेहतर हैं| इसके कई कारणों में से यह भी है कि कम उम्र की महिलाओं में ज्यादा एवं जल्दी-जल्दी गर्भधारण करना तथा बहुत हद तक अनचाहा गर्भधारण करना इत्यादि|

आज जरूरत है कि अस्थायी गर्भरोधक के उपायों को अपनाया जाए ताकि जनसंख्या में स्थिरता आए एवं माँ एवं बच्चे भी सुरक्षित एवं स्वस्थ्य हो|

समस्याएँ : अधिकतर ग्रामीण महिलाओं में आमतौर पर पायी जानी वाली कुछ समस्याएँ हैं –

मासिक संबंधी – अनियमित मासिक, अत्यधिक रक्त स्राव, मासिक के दौरान पेडू, कमर और जांघो में दर्द

खून की कमी (एनीमिया) – हीमोग्लोबिन की कमी

प्रजनन मार्ग में संक्रमण (ल्यूकोरिया)

पेडू में सूजन (पी. आई. डी.)

यूटेरस- प्रोलेप्स (बच्चेदानी बाहर निकलना)

स्वयं- गर्भपात इत्यादि |

कारण :  इन समस्याओं की मुख्य वजह यह है कि अधिकांश महिलाओं को निम्न स्थितियों से गुजरना पड़ता है-

  • कम उम्र में गर्भधारण (18 वर्ष से कम)
  • दो बच्चों के बीच अन्तराल में कमी (तीन वर्ष से कम)
  • बार-बार गर्भधारण (4 से ज्यादा)
  • सफाई में कमी/संक्रमण
  • असुरक्षित प्रसव
  • कृत्रिम गर्भपात
  • कुपोषित इत्यादि|

यदि समस्या की जड़ को विश्लेषित करें तो दो मुख्य कारण उभर कर सामने आते हैं –

  • स्वास्थय संबंधी समुचित जानकारी का अभाव
  • विभिन्न स्वास्थय उत्पादों इ उपलब्धता लक्षित समूह की पहुँच के बाहर उपरोक्त स्थिति का परिणाम है- मातृ एवं शिशु मृत्यु|

प्रजनन एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम

भारत में परिवार कल्याण कार्यक्रम का क्रमिक विकास – परिवार नियोजन कार्यक्रम 1951 में शुरू किया गया था जिसका उद्देश्य मात्र जनसंख्या का नियोजन करना था| लेकिन बाद में जन – शिक्षा और प्रसार घटकों को भी इसमें शामिल कर लिया गया ताकि परिवार नियोजन कार्यक्रम के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके| सत्तर के दशक में परिवार नियोजन कार्यक्रम में मुख्यत: स्थायी साधनों पर जोर दिया गया और लक्ष्य-निर्धारित कर दृढ़ता से नीति का कार्यान्वयन किया गया जिसके परिणाम स्वरूप इस कार्यक्रम कुछ गतिरोध पैदा हो गया| बाहरहल, यह कार्यक्रम पूरी तरह स्वैच्छिक आधार पर चलाया जा रहा है और सरकार का भी मुख्य प्रयास यही रहा है कि एक ओर तो वह सेवाओं का उपयोग करने के लिए सूचना, शिक्षा तथा सम्प्रेष्ण गतिवधियों द्वारा नागरिकों को प्रोत्साहित करें|

देश और विदेश की अनुभवों से यह पूरी तरह सिद्ध हो चुका है कि जनसंख्या वृद्धि की समस्या को कारगर ढंग से हाल करने में प्रजनन आयुवर्ग की महिलाओं और छोटे बच्चों (5 वर्ष की आयु तक) के स्वास्थ्य का विशेष महत्व है| इसलिए, इस कार्यक्रम का स्वरूप परिवार नियोजन से बदलकर परिवार कल्याण किया गया| सातवीं योजना का कार्यान्वयन 1984-89 के दौरान किया गया था उसी समय से परिवार कल्याण कार्यक्रमों में जहाँ एक तरफ प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं तथा 5 वर्ष से कम आयु वाली बच्चें की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों पर ध्यान दिया जाता रहा है वहीं दूसरी तरफ इच्छुक दंपतियों को गर्भ – निरोधकों एवं बच्चों के जन्म में अंतर रखने के तरीकों की सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती रही है| आरंभ से भी परिवार कल्याण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य यही रहा है कि देश की जनसंख्या को राष्ट्रीय विकास की जरूरतों के अनुरूप स्थिर रखा जाए|

सातवीं योजना के दौरान मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के अंतर्गत अन्य विभिन्न कार्यक्रम भी लागू किए गए| इन सभी कार्यक्रमों का उद्देश्य माताओं तथा छोटे बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार करना और प्रमुख बीमारियों की रोकथाम करना तथा उपचार के लिए सुविधाएँ उपलब्ध कराना था| यद्यपि ये कार्यक्रम लाभदायक सिद्ध हुए| फिर भी हरेक कार्यक्रम की अलग पहचान उनके प्रभावकारी प्रबंधन में बाधाएँ उत्पन्न कर रही थी और इससे वांछित परिणामों में भी कुछ कमी आ रही थी| समान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अलग- अलग चलाए जा रहे कार्यक्रमों को एक साथ जोड़कर चलाने की प्रक्रिया को सी.एस.एस.एम. के साथ शुरु किया गया था उसे 1994 में काहिरा (मिस्र) में आयोजित “जनसंख्या एवं विकास” विषय आयोजित सम्मेलन में और भी मजबूती प्रदना की गई| इस सम्मेलन में सम्मिलित सभी देशों को यह निर्देश दिया गया कि “प्रजनन एवं शिशु स्वास्थ्य” पर उन्हें एक समान कार्यक्रम लागू करना चाहिए| इस सम्मेलन में यह भी सलाह दी गयी कि आर. सी. एच. का प्रयास यह होना चाहिए कि यह लोगों की जो क्षमता है, उसे सुनिश्चित करें| लोगों के पास क्षमता है कि-

  1. अपनी प्रजनन क्षमता का उपयोग नियंत्रित रूप से कर सकते है|
  2. महिलाएँ अपने गर्भावस्था और प्रसव को सुरक्षित बना सकती हैं|
  3. प्रसव का परिणाम सफल रह सकता है तथा माँ- बच्चा स्वथ्य रह सकते हैं|
  4. दम्पति (पति/पत्नी) यदि चाहे तो उनका यौन संबंध अनचाहे गर्भ या यौन संचारित रोगों की समस्या से मुक्त हो सकता है|

इस प्रकार हमारे देश में जनसंख्या स्थिरीकरण के उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रजनन एवं शिशु स्वास्थय कार्यक्रम के विस्तृत आयाम को प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है| इसमें सिर्फ परिवार नियोजन के लिए स्थायी गर्भ निरोध का लक्ष्य ही नहीं निर्धारित किया गया बल्कि अन्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भी कार्यक्रम शुरू किए गए, जैसे-

-   सुरक्षित प्रसव

-   बाल – मृत्यु को कम करना

-   गर्भ निरोधक ने अस्थायी एवं स्थायी साधनों की उपलब्धता

-   यौन संक्रमण एवं यौन संचारित रोगों की देखभाल

-   किशोरावस्था की देखभाल आदि

इस प्रकार प्रजनन एवं शिशु स्वास्थय कार्यक्रम (आर.सी.एच.) के अंतर्गत जो सेवाएँ दी जाती हैं उसमें महत्वपूर्ण हैं-

गर्भावस्था की देखभाल – जिसमें

-   प्रसव के समय कम से कम तीन जाँच

-   टेटनस का टिका लेना

-   आयरन –फौलिक एसिड की कम से कम 100 गोलियां खाना

-   पोषण संबंधी सलाह

-   गर्भावस्था के खतरनाक लक्षणों की पहचान

-   संस्थागत प्रसव

-   आपातकालीन जाँच

बाल स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए-

  • कम वजन वाले बच्चे की पहचान एवं उनकी विशेष देखभाल
  • टीकाकरण
  • डायरिया एवं ओ.आर.टी. संबंधी कार्यक्रम

गर्भ निरोध के स्थायी एवं अस्थायी साधनों की उपलब्धता

यौन संक्रमण एवं यौन संचारित रोगों से बचाव एवं इलाज

किशोरावस्था के स्वास्थ्य की देख-भाल आदि कार्यक्रम शामिल हैं|

 

आर.सी.एच. कार्यक्रम का उद्देश्य –

  • आर.सी.एच. संबंधी सभी सेवाएँ लोगों/समुदाय के पहुँच के अंदर हो|
  • प्रसूति सुरक्षा संबंधी विशेषज्ञों की उपलब्धता सब डिविजन स्तर के हॉस्पिटल में हो|
  • सुरक्षित गर्भपात (एम.टी.पी.)- पी.एच.सी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) स्तर में हो|
  • यौन संक्रमण एवं यौन संचारित रोगों की जाँच और इलाज की सुविधा जिला अस्पताल एवं सबडिवीजन हॉस्पिटल में हो|

आर.सी.एच. विशेषता –

  • (जरूरत पर आधारित) आवश्यकतानुसार
  • व्यक्ति विशेष पर केन्द्रित
  • मांग पर आधारित
  • लाभार्थियों के लिए उच्च गुणवत्ता वाला विकेंद्रीकृत आर.सी.एच सेवा

आर.सो.एच के लक्षित समूह-

1)  किशोर/किशोरी – 10-19 वर्ष

2)  योग्य दम्पति – 15-49 वर्ष

3)   गर्भवती महिला

4)   शिशु       - 0-5 वर्ष

काहिरा (मिस्र) सम्मलेन में प्रजनन स्वास्थ्य को इस प्रकार परिभाषित किया गया –

प्रजनन स्वास्थ्य का अर्थ सिर्फ बीमारियों का इलाज नहीं है बल्कि प्रजनन से संबंधित सभी बातों में शरीरिक, मानसिक एवं समाजिक रूप से स्वस्थ रहने की दशा ही प्रजनन स्वास्थ्य है| अर्थात, प्रजनन स्वास्थ्य के अंतर्गत –

  • प्रजनन अंग- रोगों से मुक्त हों, ठीक से कम करते हों|
  • सहवास – आनंददायी हो, परेशानियों से बचा रहे, गर्भ और यौन रोगों के भय से मुक्त हो|
  • गर्भावस्था – स्त्री गंभीर समस्याओं से मुक्त रहे और गर्भ में भ्रूण  का विकास अच्छी तरह से हो|
  • प्रसव – स्त्री सामान्य रूप से प्रसव करे तथा प्रसव के बाद गंभीर समस्याओं से बची रहे|
  • नवजात शिशु- नवजात शिशु सामान्य रूप से बाहर आए और शरीर का कम तापमान, टेटनस, दस्त जैसी गंभीर समस्याओं का  खतरा उसे न हो|

इन कार्यक्रमों में दम्पति के प्रजनन संबंधी मूल अधिकार निम्न प्रकार बतलाएं गये हैं-

  • बच्चा कब पैदा करें/कब नहीं, उसके में कितना अंतर हो- यह तय करने का अधिकार
  • ऐसा फैसला करने के लिए सूचना एवं जानकारी का अधिकार
  • यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के बेहतर तरीके अपनाने का अधिकार

स्वास्थ्य संबंधी इन कार्यक्रमों को लागू करने से जन्मदर (सी.बी.आर.) कूल प्रजनन दर (टी.एफ.आर.) मातृमृत्यु दर एवं शिशु मृत्यु दर आदि को कम किया जा सकता है एवं कारगर दम्पति सुरक्षा दर (सी.पी.आर.) को बढ़ाया जा सकता है, जो हमारे जनसंख्या स्थिरीकरण संबंधी कार्यक्रम का लक्ष्य है|

शरीर विज्ञान (एनाटोमी)

पुरूष के जनन - अंग

  • शिश्न (लिंग)
  • पेशाब की नली (मूत्र मार्ग)
  • अंडकोश की थैली
  • वीर्य नलिकाएँ
  • वीर्यकोश

शिश्न (लिंग) : यह संभोग के लिए पुरूष का अंग है| पुरूष में संभोग की इच्छा जागती है तो शिश्न की कोशिकाओं में खून का संचार होता है| वह खून से भर जाता है| इस कारण शिश्न कड़ा होकर तन जाता है और संभोग के लिए तैयार हो जाता है| अपनी सामान्य स्थिती में यह पेशाब को शरीर से बाहर निकालने का काम करता है|

पेशाब की नली (मूल नलिका): शिश्न के अंदर एक पतली नली होती है जो मूत्र नलिका या पेशाब की नाली कहलाती है| परंतु संभोग के समय पुरूष का वीर्य (बीज) और वीर्य में मौजूद शुक्राणु भी इसी रास्त से स्त्री के शरीर में प्रवेश करते है| शरीर से पेशाब इसी नली द्वारा बाहर आता है|

अंडकोश की थैली : यह एक थैली होती है जिसमें दोनों अंडकोश रहते हैं| यह शिश्न के पीछे तथा दोनों तरफ स्थित होती है|

वीर्य नलिकाएँ : यह संख्या में दो होती हैं| अंड-कोशों से एक-एक नलिका निकलती है और जाकर पेशाब की नली से मिल जाती है|

  • यह नलिकाएँ अंडकोशों में बनने वाले वीर्य को पेशाब की नली तक ले जाती है|
  • यह शरीर के अंदर होती है इसलिए बाहर से दिखाई नहीं देती|

पुरूष में पेशाब और वीर्य को बाहर लाने का एक ही रास्ता है| स्त्रियों में ऐसा नहीं होता| उनके जनन अंगों की रचना इससे अलग है|

स्त्री के प्रजनन अंग

स्त्री के प्रजनन अंग है:

दो अंडकोश – एक बाई और एक दायीं ओर| इनमें स्त्री के अंडों का उत्पादन होता है|
एक गर्भाशय जो नाशपाती फल के आकार की एक छोटी थैली है, जहाँ नौ महीने बच्चे का  विकास होता है|

गर्भाशय की दो नालियाँ – एक बाई और एक दायीं ओर|  नली में गर्भधारण होता है|

गर्भाशय का गला – जहाँ पूरे महीने धात का उत्पादन होता है|

गर्भाशय के अंदर का अस्तर – जो हर महीने फट कर गिरता है| (इसके कारण हर महीने खून बहता है; जिसे माहवारी के नाम से जाना जाता है)

गर्भाशय द्वार – जो बच्चे के जन्म का नहर है|

योनि – जो बच्चे के जन्म के नहर का बाहरी अंग है|

किशोरावस्था

  • यह बाल्यावस्था और वयस्कावस्था के बीच की अवधि है जो 10 वर्ष से 19 के बीच माना जाता है|

किशोरावस्था

लड़की – 10-16 वर्ष में

लड़का – 12-19 वर्ष में

  • यह उम्र अत्याधिक नाजुक, संवेदनशील एवं जिज्ञासुओं से भरा होता है| इस अवधि में होने वाले हार्मोनल परिवर्तन के करण बहुत से शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक परिवर्तन होते हैं, जो उनकी सोच एवं व्यवहार को प्रभावित करते हैं|
  • इसी उम्र में विभिन्न उत्तरदायित्वों को निभाने हेतु योग्यता की तैयारी शुरू हो जाती है जैसे –

-     एक स्वस्थ एवं उत्तरदायी माता-पिता बनना

-     समाज के भावी नागिरक

-     एक महान मानव संसाधन

  • किशोर – किशोरियों के स्वास्थय की समस्या बच्चों और वयस्कों से भिन्न होती है|
  • सही समुचित जानकारी के अभाव में उन्हें अनेकों तरह के प्रजनन स्वास्थ्य एवं व्यवहार से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है|
  • ऐसी स्थिति में सही मार्गदर्शन एवं परामर्श का अभाव उनके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है|
  • इन परिस्थितियों में एक स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता की जिम्मेवारी काफी महत्वपूर्ण हो जाती है ताकि किशोर - किशोरियों का इन समस्याओं से बचाव हो सके|

किशोरावस्था  में होने वाले शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन

  • लड़कियों में शरीरिक परिवर्तन 10 वर्ष की अवस्था से शुरू हो जाता है जो 16 वर्ष की अवधि तक लगभग पूर्ण हो जाता है| उसके बाद 18 वर्ष के उम्र तक वृद्धि तो होती रहती है पर बहुत धीमी होती है|
  • सबसे बड़ा परिवर्तन प्रजनन अंगों की क्षमता बढ़ने के कारण होता है|
  • किशोर के बीजदानी से महीने में एक बार स्त्री अंडा विसर्जित होने लगता है जबकि किशोर के अंडकोषों में शुक्राणु या पुरूष बीज लगातार होने लगता है|
  • इस कारण यौन संबंध होने पर किशोरी इस उम्र में भी गर्भधारण कर सकती है परन्तु शारीरिक और मानसिक वयस्कता या परिपक्वता के अभाव में माता-पिता बनने एवं बच्चे की जिम्मेवारी उठाने के योग्य नहीं बन पाते हैं|
  • किशोरावस्था में कुछ परिवर्तन ऊपर से दिखाई देते हैं जबकि कुछ अंदर ही अंदर घटित हैं|

लड़कियों में होने वाले शरीरिक परिवर्तन

  • शरीर में चर्बी बढ़ने के कारण अचानक वजन का बढ़ना|
  • अचानक कद का बढ़ना|
  • स्तनों में उभार का शुरू होना|
  • जननांगों के आस-पास एवं बगलों में बालों का उगना
  • मसिक धर्म की शुरूआत – यह सबसे महत्वपूर्ण लक्षण है जो योनि से रक्तस्राव के रूप में प्रकट होता है|
  • नितंबों का चौड़ा होना
  • शरीर के आकार में परिवर्तन
  • आवाज में परिवर्तन
  • पसीना ज्यादा आना

लड़कों में शरीरक परिवर्तन

  • अचानक वजन का बढ़ना
  • जननांगो के आस-पास, बगलों में चेहरे पर, छाती पर बालों का उगना|
  • आवाज में भारीपन
  • ज्यादा पसीना आना|
  • खुद ब खुद वीर्य का लिंग से बाहर निकलना, खासकर नींद में|
  • लिंग व अंडकोषों का बढ़ना|
  • शरीर के आकार में परिवर्तन| बांहें ज्यादा पुष्ट हो जाती हैं और मांसपेशियां कड़ी होने लगती है|
  • शरीरिक शक्ति का बढ़ना|

किशोर-किशोरी में भावनात्मक परिवर्तन

  • हारमोंस की मात्रा बढ़ने के कारण ज्यादातर नौजवानों में सेक्स-संबंधी विभिन्न ख्याल उमड़ते है – दिवा स्वप्न बढ़ जाते हैं|
  • लड़कों में लड़कियों के प्रति ओर लड़कियों में लड़कों के प्रति सेक्स-आकर्षण बढ़ जाता है|
  • मूड जल्दी-जल्दी बदलता है|
  • अपने कामों में आजादी की चाहत बढ़ जाती है|

सामाजिक बदलाव

  • अब बच्चा न समझा जाना
  • हम उम्र लोगों की बीच जरूरी प्रभावशाली बनना
  • जिन्दगी में लक्ष्य बनाना
  • अपनी पहचान बनाना
  • माँ- बाप के द्वारा जमाए गए अधिकारों को नापसंद करना, स्वावलम्बी होना|

किशोरावस्था में प्रजनन  स्वास्थ्य से संबंधित भ्रांतियाँ

भ्रांति :  एक बार के संभोग से स्त्री गर्भवती नहीं हो सकती है|

सच :  हर बार संभोग से गर्भवती होने का खतरा है|

भ्रांति : दो मासिक धर्मों के बीच का समय संभोग के लिए सबसे सुरक्षित है क्योंकी उस समय गर्भधारण का डर नहीं होता|

सच :  ज्यादातर स्रियों में (जिनका मासिक चक्र 28 दिनों का है) सबसे उर्वरक अवधि मासिक धर्मों के बीच 2 से 6 दिनों की होती है यानी 28 दिनों के मासिक चक्र के 10वें से 18वें दिन तक| इन दिनों को ‘बच्चे वाले दिन’ या ‘उर्वरक दिन’ कहा जाता है|

भ्रांति : परिवार नियोजन और प्रजनन स्वास्थय के बारे में जानकारी प्राप्त करना बुरी बात है|

सच :  परिवार नियोजन के बारे में जानकारी या ज्ञान होने से असुरक्षित संभोग के बुरे नतीजों का पता रहता है और अनचाहे गर्भावस्था तथा यौन रोगों से बचा जा सकता है प्रजनन स्वास्थय का ज्ञान हो तो अपनी देह के बारे में पूर्ण जानकारी होती है, उसके कामों को जानने तथा उसकी देखभाल करने में सहूलियत होती है| इसलिए इनका ज्ञान प्राप्त करने से कई लाभ प्राप्त होते है|

भ्रांति : सोते समय वीर्य का खुद व खुद बाहर निकलना (स्वप्न दोष) स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है|

सच :   सोते समय वीर्य का खुद व खुद  बाहर निकलना किशोरावस्था की एक स्वभाविक और सहज क्रिया है| यह हानिकारक नहीं है|

भ्रांति : मासिक धर्म के दौरान स्त्री गंदी हो जाती है और से छूना नहीं चाहिए|

सच :  सभी स्त्रियों में मासिक धर्म एक स्वाभाविक प्रक्रिया है उनकी योनि से जो खून बाहर निकलता है; वह गंदा नहीं होता है|

भ्रांति : मासिक धर्म के समय नहाना नहीं चाहिए|

सच :  मासिक धर्म चूंकि एक स्वाभाविक क्रिया है, इसलिए नहाने को लेकर कोई पाबन्दी नहीं हैं  सच तो यह है कि इस समय शरीर को स्वच्छ रखना बहुत जरूरी है, जिससे प्रजनन अंगों में संक्रमण न होने पाए|

भ्रांति : अगर हाईमेन (योनिछेद या योनि-पर्दा) फट जाए तो लड़की कुँवारी नहीं मानी जाएगी|

सच :  यह सही नहीं हैं| क्योंकि हाईमेन (पर्दा) बिना संभोग के भी फट सकता है, मसलन खेलकूद से बोझ उठाने से, गिर जाने से या मासिक धर्म के वक्त| यदि योनि में पैड्स रखे जाएँ तब भी परदा फट जाता है| कभी-कभी हाईमेन स्वत: ढीला होता है, या होता ही नहीं है और

भ्रांति :  अगर स्त्री में यौन उत्तेजना नहीं होती तो वह गर्भवती नहीं हो सकती है|

सच :   स्त्री उत्तेजित हो या नहीं, अगर पुरूष उसकी योनि में या योनि के आस पास वीर्य गिरा देता है तो स्त्री गर्भवती हो सकती है|

भ्रांति : किशोरावस्था में सेक्स की कल्पना करने से, या मूड बदलने से नुकसान होता है|

सच :  किशोरावस्था में घटित होने वाले ये महज स्वाभाविक भावनात्मक परिवर्तन हैं|

भ्रांति : परिवार नियोजन स्वास्थय के लिए नुकसानदेह है|

सच :  परिवार नियोजन, परिवार के स्वास्थ्य और प्रजनन स्वास्थय की बेहतर के लिए अपनाया जाने वाला तरीका है|

भ्रांति : हस्तमैथून स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और वह क्षमता को कम करता है|

सच :  किशोरों और वयस्कों में हस्तमैथून, यौन इच्छा को संतुष्ट करने के लिए एक स्वाभाविक के है और यह किसी के स्वास्थ्य या प्रजनन क्षमता पर कोई बुरा असर नहीं डालता|

माहवारी व इससे संबंधित कुछ सामान्य समस्याएँ

मासिक धर्म अथवा माहवारी

मासिक धर्म के आंरभ होने पर एक बलिका स्त्री में परिवर्तित हो जाती है| इस सारे घटना चक्र में बीज ग्रंथियां मुख्य भूमिका निभाती है| ई एवं पी नामक हार्मोन इन्हीं ग्रंथियों में बनते व बाहर निकलते हैं| हमारे मस्तिष्क में पिट्यूटरी नाम की एक नन्हीं सी ग्रंथी है जो शरीर की दूसरी ग्रंथियों से निकलने वाले ई एवं पी हार्मोनों की मात्रा शरीर में कम व अधिक होती रहती है| गर्भाशय में इसी के अनुसार प्रतिक्रिया होती है जो मासिक धर्म के रूप में प्रकट होती है|

जब कोई लड़की मासिक धर्म की उम्र को पहूँचती है तो इसके मस्तिष्क में स्थित पिट्यूटरी ग्रंथि उसके डिम्ब ग्रंथियों को रासायनिक संकेत भेजती है| इन संकेतों के मिलने पर डिम्ब ग्रंथियों ई हार्मोन को रक्त में भेजती हैं| यह हार्मोन शरीर में कई परिवर्तन पैदा करता है| इनका मुख्य प्रभाव गर्भाशय पर पड़ता है| इसके द्वारा गर्भाशय के भीतर एक झिल्ली का अस्तर तैयार होता है| इसका आप यूं समझिए जैसा वर्षा से पहले बीज बोने के लिए जमीन तैयार की जाए| यह प्रतिक्रिया पहले दो हफ्तों तक होती है| ई हार्मोन के कुछ गौण प्रभाव होती हैं जैसर स्तनों का भारी होना, शरीर में चर्बी बनना और शरीर कुछ नमक व पानी का इकट्ठा होना| इसके अलावा बगल और गुप्तांग के आस – पास बालों पर उगना भी ई हार्मोन के प्रभाव के कारण ही होता है| यह हार्मोन इन स्थानों पर बाल उगाता है और चेहरे पर बाल उगने से रोकता है| इसलिए स्त्रियों के चेहरे पर दाढ़ी मूंछे नहीं पाई जाती|

दस दिन बाद शरीर में ई हार्मोन का स्तर गिरने लगता और पी का स्तर बढ़ने लगता है| पी गर्भाशय गर्भित डिम्ब को अपने अंदर रखने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता है| अगर इस दौरान स्त्री का डिम्ब गर्भित नहीं होता है तो बेकार जाता है| इसी तरह गर्भाशय की पूरी तैयारी भी बेकार हो जाती है| समय पूरा हो जाने पर गर्भाशय में जो झिल्ली तैयार हुई थी वह उखाड़ने लगती है| उसके साथ कुछ खून भी बाहर आता है| यह 2 से 4 दिनों तक आता रहता है| यही माहवारी है| इसके समाप्त होने पर ई हार्मोन फिर सक्रिय हो जाता और अगले चक्र की तयारी करने लगता है| चक्र 28 दिन का होता है|

मासिक धर्म या माहवारी 12 सर 15 वर्ष की उम्र आरंभ होती है| स्त्री गर्भवती हो तो यह माहवारी गर्भ के पूरे 9 महीनों तक रूक जाती है| 45-50 की उम्र के बीच यह धीरे धीरे बंद हो जाती है| इसलिए स्त्री के लिए गर्भवती होने और बच्चे पैदा करने की उम्र 15 से 45 बीच है|

गर्भधारण करने का समय

ऊपर 28 दिन के जिस चक्र वर्णन किया गया है उसके बीच में किसी समय स्त्री का डिम्ब बाहर आता है| इसका जीवन 48 घंटो का होता है| पुरूष के शुक्राणु या बीच का जीवन काल भी 24 से 28 घंटे है| हर माहवारी चक्र में डिम्ब के बाहर आने की तिथि 1 से तीन दिन के बीच हो सकती है| इसलिए गर्भ धारण का संभावित समय मासिक चक्र के बीच 4 से 6 दिन का होता है| परिवार नियोजन के प्राकृतिक तरीकों की भाषा में इसे असुरक्षित समय कहा जाता है| इस समय स्त्री के गर्भवती होने की पूरी संभावना होती है|

प्रजनन क्षमता की जाँच के लिए योनि स्राव की जाँच भी की जा सकती है| स्त्री स्वयं उसे दो उँगलियों के बीच लेकर देख सकती है| यदि ऊँगली अलग करने पर वह साफ और धागे की तरह खींचता दिखाई दे तो गर्भ धारण करने की लिए यह समय उपयुक्त है| दुसरे समय में जिसमें जनन क्षमता नहीं है, और जिसे सुरक्षित कहा जाता है, डिम्ब गर्भ धारण करने के लिए तैयार नहीं होता| माहवारी आरंभ होने के पहले व बाद के 8-10 दिन आम तौर पर सुरक्षित रहते हैं| इन दिनों में योनि स्राव गाढ़ा, सफेद व अपारदर्शी हो जाता है| खींचने पर इसमें धागा नहीं बनता|

डिम्ब उत्सर्ग के समय शरीर के कुछ सामान्य बदलाव

डिम्ब ग्रंथि से डिम्ब बाहर आने की प्रक्रिया डिम्ब उत्सर्ग कहलाती है| इस समय स्त्री के शरीर में कुछ बदलाव आते है| इन पर ध्यान दिया जाए तो यह अनुमान लगाना संभव हो सकता है कि डिम्ब किस दिन बाहर आ रहा है| यह बदलाव कुछ इस प्रकार है :

  • स्तनों का भारीपन बहुत बढ़ जाता है|
  • शरीर का तापमान एक डिग्री बढ़ जाता है जिसको हम नाप सकते हैं|
  • योनि से रिसने वाला तरल पदार्थ साफ, पारदर्शी, पतला और लसदार होता है|

रक्तस्राव का समय

आमतौर पर रक्त स्राव आरंभ होने के दिन को माहवारी का आरंभ माना जाता है| आमतौर पर माहवारी का खून पहले धब्बों के रूप में बाहर आता है| फिर इसके मात्रा बढ़ जाती है| अब महिला को कपड़े की गद्दी लेने की आवश्यता होती है| दूसरे या तीसरे दिन से रक्तस्राव में कमी आने लगती है| अगले एक या दो दिन में यह समाप्त हो जाताहै इस तरह रक्त 2 सर 5 दिन तक जारी रह सकता है| अलग अलग स्रियों में रक्त की मात्रा अलग अलग हो सकती है| यदि हम इसे गद्दी बदलने के अनुसार नापें तो 24 घंटों में 1 से 3 गद्दियाँ बदली जा सकती है| मासिक धर्म की यह भिन्नता सामान्य है|

माहवारी के दौरान सफाई

माहवारी के रक्त को सोखने और स्वयं को साफ रखने के लिए स्त्रियाँ कई तरीके अपनाती है| उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

  • साड़ी या धोती के टुकड़े करके इस्तेमाल करके धो कर सुखा लेना और उसे पुन: इस्तेमाल करना|
  • बाजार में उपलब्ध पैड इस्तेमाल करना (यह केवल वह महिलाएँ करती है जिनमें इन्हें खरीदने की क्षमता हो)|
  • टैम्पोन – यह योनि में अंदर रखे जाते हैं| इनका उपयोग बड़े शहरों की कुछ महिलाओं तक सीमित है|

माहवारी के दौरान सबसे महत्वपूर्ण है सफाई| धुले तथा धुप में सुखाए हुए सूती कपड़े को कई तहों में मोड़ कर इस्तेमाल करना रक्त को सोखने के लिए काफी है| यह कपड़ा साफ न हो तो किटाणुओं को खूब पोषण देती है| साफ रहने के लिए महिला को चाहिए कि वह गुप्तांग और आस-पास के स्थान को दिन में कई बार धोए| माहवारी के दौरान रोज नहाने से कोई नुकसान नहीं होता| इसलिए नियमित रूप से नहाना चाहिए|

माहवारी से संबंधित रूढ़ियाँ

परंपरागत रूप से हमारे देश में माहवारी को अशुद्ध माना जाता है| कई जगहों पर तो स्त्री को अलग रहने के लिए कहा जाता है| अलग थलग किए जाने से उसके मन पर बुरा असर पड़ता है| महिलाओं और लड़कियों के लिए यह रिवाज बड़ा ही असुविधाजनक है| हमें चाहिए कि लोगों को माहवारी की वास्तविकता बताएँ ओर उन्हें समझाएँ कि इसके दौरान स्त्रियों को अलग शरीर की रचना और माहवारी का कारण समझ लेने के बाद इस रूढ़ी को मानने का कोई आधार नहीं रह जाता है| हाँ, माहवारी के दिनों में संभोग से बचने का रिवाज ठीक है| उन दिनों में संभोग करने से संक्रमण का खतरा बढ़ता है| इसके अलावा खून डिम्ब नालों की ओर जा सकता है| इसलिए स्त्री को अशुद्ध मानने का विचार त्याग देना चाहिए| परन्तु माहवारी हो रही हो तो स्वास्थ्य सिद्धांतो के अंतर्गत संभोग से बचना उचित होगा|

मासिक धर्म: शुद्धिकरण के रूप में

असलियत तो यह कि हर महीने महिला के शरीर सर होने वाला यह रक्तस्राव उसके गर्भाशय को शुद्ध बनाता है|  यह उसकी अंदरूनी झिल्ली के साथ ही गर्भाशय के छोटे-छोटे संक्रमण भी साफ कर देता है| इस तरह संक्रमण के पुराने और असाध्य होने से बचाव हो जाता है यहाँ यह याद दिला देना उचित होगा कि गर्भाशय की झिल्ली के गिरने में डिम्बनालों की कोई भूमिका नहीं होती| इसलिए डिम्बनालों में संक्रमण होने पर इलाज न किया जाए तो संक्रमण पुराना होकर गंभीर रूप से ले सकता है|

आइए सीखें-सिखाएं

कौशल 1: गर्भ धारण करने का समय जानने का तरीका

महिलाओं को प्राय: अपनी जनन क्षमता का एहसास हो जाता है| अगर उन्हें समझाया जाए तो वे उसे अच्छी तरह व्यक्त कर सकती है ग्रामीण स्वास्थ्यकर्मी को चाहिए कि वह महिलाओं को समझाए कि वे अपने मासिक धर्म को उसके विभिन्न चरणों में ध्यान से देखें| योनि स्राव और श्लेष्मा (कफ के सामान चिपचिपा पदार्थ) को वे ऊँगली और अंगूठे के बीच लेकर उसके जाँच कर सकती हैं| महिला स्वास्थ्यकर्मी को चाहिए वह उन्हें निम्नलिखित सुझाव देकर योनि स्राव की जाँच करना सिखायें :

  • योनि को थोड़ा अंदर तक अंगूठे और ऊँगली से छुए और वहां मौजूद से थोड़ा स्राव ले ले|
  • अंगूठे और ऊँगली को तनिक मलें और धीरे-धीरे दोनों को अलग करें|
  • अगर उंगली और अंगूठे को मलते हुए उन्हें सूखेपन का एहसास होता है तो अंगुली पर कोई स्राव नहीं आया है| इसका मतलब है कि स्राव है ही नहीं|
  • अगर उगूंली और अंगूठे को अलग करने से स्राव का तार टूट जाता है तो यह गर्भधारण का समय नहीं है|
  • अगर स्राव थोड़ा सा खींचता है और बीच में ही तार टूट जाता है तो शायद गर्भ धारण करने के समय की शूरूआत है|
  • अगर उंगली पर गीलेपन का एहसास है, स्राव में लस है और उंगली और अंगूठे के बीच खींचता है तो यह महिला के डिम्ब उत्सर्ग का समय है| उस समय गर्भधारण करने की पूरी संभावना है|

कौशल 2: घर पर माहवारी के लिए गद्दियां (पैड) कैसे बनाएं

महिलाएँ को माहवारी का रक्त स्राव सोखने के लिए कपड़े या रूई की आश्यकता होती है| इनकी गद्दियां घर पर बनाई जा सकती हैं| इनको इस्तेमाल करने से कपड़े ख़राब नहीं होते| महिलाएँ घर से बाहर निकलने में कोई परेशानी नहीं होती| गद्दी इस्तेमाल करने से योनि तथा त्वचा के रोगों से भी बचाव होता है| घर पर गद्दी तैयार करने के लिए रूई और साफ सूती कपड़े की जरूरत होती है|

घर पर गद्दी या पैड बनाते समय महिला को चाहिए कि –

  • वह धुला और धुप में सुखाया हुआ कपड़ा इस्तेमाल करें| धुप में सुखाने से अधिकतर किटाणु मर जाते है|
  • कपड़ा ऐसा लें जिसका रंग न निकले और जो मुलायम व नमी सोखने वाला हो| जिन कपड़ों का रंग निकलता है वह गीला होने पर महिला के कपड़ों पर डाग डाल देंगे| योनि की त्वचा में उनके रंग से जलन या खुजली भी हो सकती है|
  • महिला इतना कपड़ा ले जो रूई को पूरी तरह ढक दे| एक दिन में 3 से 5 गद्दियों की जरूरत पड़ सकती है| महिला को अपनी जरूरत के अनुसार गद्दियाँ तैयार रखनी चाहिए|
  • हर गद्दी के लिए रूई और कपड़ा पर्याप्त मात्रा में होना चाहिए| उसे चाहिए कि दोनों को अच्छी तरह लपेट ले ताकि मासिक का स्राव बाहर न निकले|
  • गद्दी को बदलने के बाद रूई को कागज में मोड़ कर कूड़ेदान में फेंक दे और कपड़े को अच्छे तरह धो कर धुप में सूखा कर दुबारा इस्तेमाल के लिए तैयार करें|

माहवारी संबंधी कुछ सामान्य समस्याएं

माहवारी न होना या देर से आरंभ होना

कुछ लड़कियों को सोलह वर्ष की उम्र तक मासिक धर्म नहीं होता| इसके लिए डॉक्टरी सलाह दिलवानी चाहिए| हो सकता है उसके शरीर के अंदर ही  कहीं यह खून इकट्ठा हो रहा हो| यह भी हो सकता है कि उसके जनन – अंगों या हार्मोन - ग्रंथियों में कुछ दोष हो|

कम आयु में माहवारी

कुछ लड़कियों में माहवारी जल्दी आरंभ हो जाती है, कभी – कभी तो केवल 9-10 साल की उम्र में ही| इससे कोई स्वास्थय समस्या नहीं पैदा होती लेकिन इस उम्र की लड़कियों को माहवारी की पूरी जानकारी देना जरूरी है| उसे डिम्ब उत्सर्ग और लिंग उत्पीड़न होने पर गर्भ ठहरने के खतरे से अवगत करा देना चाहिए| माहवारी आरंभ हो जाने पर कद बढ़ना कम हो जाता है| सन्तुलित भोजन और व्यायाम से कद कुछ बढ़ सकता है| खून की कमी से बचने के लिए भी सन्तुलित भोजन जरूरी है|

छोटे चक्र

कुछ महिलाओं का दो माहवारियों के बीच का समय कम होता है| 21 दिन से कम समय में दुबारा रक्त स्राव हो और नियमित रूप से ऐसा होता रहे तो उसे छोटा चक्रे कहते है| स्त्री के शरीर में डिम्ब का उत्सर्ग सामान्य रूप से होता है और उसकी प्रजनन क्षमता भी सामान्य रहती है| इन स्त्रियों में डिम्ब उत्सर्ग का समय जानने के लिए अगली माहवारी की अपेक्षित तिथि से 12 दिन पहले की तिथि निकालिए| (उदहारण के तौर अगर अगली माहवारी 24 तारीख को आने की उम्मीद है तो डिम्ब 12 तारीख को बाहर आने की संभावना होगी|) कुछ महिलाओं में माहवारी आरंभ होने के एक दो सालों तक मासिक चक्र छोटा होता है| परंतु धीरे-धीरे समान्य हो जाता है|

लम्बे चक्र

कुछ स्त्रियों, विशेषकर उन कम उम्र की लड़कियों का जिन्हें हाल में माहवारी आरंभ हुई है, मासिक चक्र लंबा हो सकता है| अगर दो माहवारियों के 45 दिनों से बढ़ा अंतराल हो तो वह लंबा चक्र कहलाता है| हो सकता है इन महिलाओं में डिम्ब का उत्सर्ग ही न रहा हो| इन्हें डॉक्टरी सलाह देनी चाहिए|

रक्त स्राव की कमी

कुछ महिलाओं को माहवारी के समय बहुत कम खून जाता है| वह समझती है कि इससे उनका गर्भाशय पूरी तरह साफ नहीं हो पाता| लेकिन माहवारी का समय होने पर कुछ धब्बे रह जाएँ तो कभी कभी इसका कारण गर्भाशय से बाहर का गर्भ भी हो सकता है| इसकी जाँच करवानी चाहिए|

भरी रक्त स्राव

कुछ महिलाओं को माहवारी के दौरान बाहरी रक्त स्राव होता है| उन्हें एक दिन में सामान्य से ज्यादा गद्दियाँ बदलने की जरूरत होती है| या रक्त स्राव कई दिनों तक जारी रहता है या यह दोनों समस्याएँ साथ होती हैं| इन स्त्रियों को खून की कमी की शिकायत हो सकती है| इन्हें डॉक्टरी सलाह की आवश्यकता है| उनसे कहिए कि जब माहवारी न हो रही हो उस समय वह डॉक्टर के पास जाएँ| माहवारी के दौरान जाने पर डॉक्टर उनकी जाँच नहीं कर सकेंगे| भारी रक्त स्राव कभी-कभी गर्भाशय में गांठ या रसौली के कारण भी हो सकती है| प्राय: इसका हार्मोन की गड़बड़ी होती है| कुछ स्त्रियों का इलाज ई और पी हार्मोन द्वारा हो जाता है परन्तु कुछ में गर्भाशय निकालने की आवश्यकता पड़ सकती है|

सुरक्षित मातृत्व

एक स्त्री के जीवन में गर्भाशय और प्रसव सामान्य प्राकृतिक अवस्थाएं हैं, फिर भी कई स्रियाँ गर्भावस्था और प्रसव के दौरान पैदा हुई जटिल, परिस्थितियों से मर भी जाती हैं| बहरलाल, बहुत थोड़े से लोग, जिनमें स्त्रियाँ भी शामिल है, उन खतरों के बारे में नहीं जानते जो बच्चे को जन्म देने से जुड़े हुए है| भारत जैसे विकासशील देश में संतान को जन्म दे सकने वाली उम्र की स्त्रियों की मृत्यु अधिकतर गर्भावस्था और प्रसव की जटिल परिस्थितियों के कारण ही होती है| इसे मातृ मृत्यु दर (माताओं की मृत्यु) की संज्ञा दी गई है|

भारत में मातृ मृत्यु दर 540 है यानी एक लाख जीवित बच्चों को जन्म देने वाली माताओं में से  540 स्त्रियाँ हर साल मर जाती हैं| माताओं की यह ऊँची मृत्यु दर साफ बताती है कि माता को गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद जैसी देखभाल मिलनी चाहिए; वह नहीं मिल पाती और उसका जीवन खतरे में पड़ जाता है| स्त्रियों को बचाने के लिए सुरक्षित मातृत्व कार्यक्रम को प्राथमिकता देनी चाहिए यानी ‘सुरक्षित मातृत्व कार्यक्रम के जरिए स्त्रियों को बचाने का कम भूत जरूरी है|

माता की मृत्यु के मुख्य कारण

  • गर्भावस्था के दौरान या प्रसव के दौरान या प्रसव के बाद बहुत ज्यादा मात्रा में खून निकलना|
  • एनीमिया/खून की कमी
  • एक्लैंपशिया नामक बीमारी होना जिसमें-

1. रक्तचाप बढ़ जाता है|

2. पैरों और मुख पर सूजन आ जाती है

3. दौरे पड़ सकते हैं|

  • प्रसव में कठिनाई
  • बच्चेदानी का किसी छूट की बीमारी से खराब होना
  • असुरक्षित गर्भपात

इनमें से कोई अवस्था खरतनाक गर्भावस्था मानी जाती है|

खतरनाक गर्भावस्थाएँ कब

  • जब स्त्री बहुत कम उम्र की हो- 18 वर्ष से छोटी
  • जब बहुत ज्यादा उम्र की हो- 35 वर्ष बड़ी
  • जब बहुत जल्दी- जल्दी गर्भवती हो- 2 वर्ष से कम अंतर पर
  • जब कई बार गर्भवती हो चुकी हो – 4 से अधिक बार – मृत बच्चा/समय से पूर्व प्रसव
  • पिछली गर्भावस्था के दौरान बीमार हो- क्षय रोग, हृदय रोग, डायबिटीज (मधुमेह), उच्च रक्तचाप इत्यादि|

माताओं के आलवा 12 महीने तक के बहुतेरे शिशु भी हर वर्ष मरते हैं| शिशु मृत्यु दर 73 (बिहार में) है, यानी प्रत्येक हजार जीवित जन्म लेने वाले शिशुओं में लगभग 73 बच्चे जीवन के पहले वर्ष में मर जाते हैं|

शिशुओं  की मृत्यु के कारण

  • जन्म के समय वजन कम होना
  • दस्त व निर्जलीकरण (पानी की कमी) होना
  • फेफड़ों में संक्रमण जैसे निमोनिया होना
  • टेटनस
  • खसरा
  • कुपोषण

शिशुओं की मृत्यु के कारण दस्त और साँस की तकलीफें हैं| कुपोषण इन्हें और भी जटिल बना देता है| जिन शिशुओं का वजन जन्म के समय कम होता है, यानी 2.5 किलो से कम, उनकी मृत्यु की आंशका अधिक रहती है|

बिहार में 54.4 प्रतिशत शिशु कम वजन के पैदा होते हैं| इसका कारण यही है कि माताएं जल्दी जल्दी और कई बार गर्भवती होने से कुपोषण का शिकार हो जाती हैं

1992 में प्रारंभ राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व कार्यक्रम का उद्देश्य मातृ दर एवं शिशु दर में कमी लाना था|

प्रजनन  क्रिया

गर्भधारण एक नये जीवन की शूरूआत है जो डिम्ब नलिका में शुक्राणु और डिम्ब के मिलने पर होती है|

भूर्ण गर्भाशय की ओर बढ़ता है और उसकी भीतरी सतह से जुड़ जाता है, जहाँ एक मोटा और गूदगुदा अंग बनाता है| इसे प्लेसेंटा कहते है| प्लेसेंटा का एक हिस्सा गर्भाशय की भीतरी दिवार से जुड़ता है| दूसरा हिस्सा नाल से जुड़ता है| भ्रूण यानी विकसित हो रहे बच्चा इसी नाल द्वारा प्लेसेंटा से जुड़ता है| भ्रूण को खून की सप्लाई माँ के शरीर से, प्लेसेंटा के जरिए ही मिलती है|

भ्रूण के चारो ओर पानी की एक थैली होती है, जो उसे झटकों, धक्कों और बाहरी चोटों से बचाती है| लगभग नौ महीनों में, अंडा एक पूरी तरह विकसित मानव-शिशु का आकार पा जाता है, जो अब जन्म लेने के लिए तैयार है| इसका वजन लगभग तीन किलो होता है|

गर्भावस्था के दौरान स्त्री कई शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों से गुजरती है| शरीरिक परिवर्तन इसलिए होते हैं कि उसके शरीर को grbhaawगर्भावस्था, प्रसव और स्तनपान के समय, शिशु की कई जरूरतों को पूरा करना पड़ता है|

गर्भ का विकास

शिशु को, पानी की थैली को, और प्लेसेंटा को संभालने के लिए गर्भाशय लगातार बड़ा होता जाता है| 12 हफ्तों के बाद शिशु इतना बड़ा हो जाता है कि पेट के बिलकुल निचले हिस्से में, (जहाँ योनि के पास के बालों की शुरूआत होती है), उसे छूकर महसूस किया जा सकता है| इस समय के आड़ वह 36वें हफ्ते तक 2 अंगूलियों की चौड़ाई के बराबर प्रतिमाह बढ़ता रहता है| भ्रूण का बढ़ना, गर्भाशय के बढ़ने से मालूम किया जा सकता है| 20 हफ्ते पूरे होने पर इसे नाभि के पास महसूस किया जा सकता है| 36वें हफ्ते तक गर्भ छाती की पसलियों तक उठ जाता है| इसके बाद वह 2 या 2 अंगूलियों तक उठ जाता है| फिर वह 2 या 3 की चौड़ाई के बराबर कम भी हो सकता है, क्योंकि भ्रूण पेडू में उतरने लगता है|

खून में परिवर्तन:

शिशु की बढ़ती हुई जरूरत को पूरा करने के लिए, और स्त्री के बढ़े हुए आकार के अनुपात में, खून की मात्रा 30 प्रतिशत बढ़ जाती है, इससे रक्त ‘पतला’ हो जाता है और एनीमिया हो जाता है| यह एक सामान्य प्रक्रिया है जो कुछ सप्ताह बाद ठीक हो जाती है क्योंकि तब तक लाल खून के सेल रक्त की ‘कमी’ को, या उसके पनीलेपन को पूरा करने के लिए बढ़ जाते हैं| लाला खून के सेल बढ़ाने के लिए स्त्री को अच्छी खुराक लेनी चाहिए जिसमें आयरन, फौलिक एसिड और प्रोटीन प्रचुर मात्रा में हो| जैसे – हरी पत्तेदार सब्जियाँ, दालें, फलियाँ, आंवला, केला, अमरुद, और सेब जैसे फल आदि| बहरहाल केवल खुराक के द्वारा स्त्रियों की बढ़ी हुई जरूरतों को पूरा करना कठिन होता है, और कई स्त्रियाँ जब गर्भ धारण करती हैं तो वे पहले से ही कमजोर होती हैं इसलिए खुराक की कमी को आयरन और फोलिक एसिड गोलियां से पूरा करें|

स्तनों में परिवर्तन

स्तन बड़े और भारी हो जाते हैं| यह परिवर्तन इसलिए होता है कि स्तन दूध पिलाने के लायक हो जाएँ| निप्पल के पास की त्वचा काली हो जाती है और निप्पल ऊपर की ओर उठ आते हैं| गर्भावस्था के शुरू होने के साथ ही कई बार निप्पल से एक पीला द्रव रिसने लगता है| शुरू का दूध वसा और प्रोटीन से भरा होता है| प्रसव के बाद इसकी मात्रा बढ़ती जाती है|

माँ एवं शिशु की देखभाल (स्वस्थ माँ स्वस्थ बच्चा)

गर्भावस्था में सामान्य लक्षण

प्रथम तीन माह में – माहवारी बंद होना, जी मिचलाना-चक्कर आना, स्तनों में भारीपन व दर्द, जल्दी जल्दी पेशाब आना|

चौथे माह से आठ माह तक- पेट बढ़ना, स्तन बढ़ना, दूध रिसना, बच्चा पेट में घूमने लगता है|

आखिरी तीन माह में- पेट  काफी बड़ा हो जाता है| बच्चे के अंग ऊपर से टटोले जा सकते है| बच्चा पेट में घूमता है|

गर्भवती की जरूरतें और सावधानियाँ:

  • पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक आहार
  • व्यक्तिगत सफाई
  • आराम और नींद
  • आरामदेह कपड़े व चप्पल
  • पति व घर के अन्य सदस्यों का पूरा सहयोग व हमदर्दी
  • नियमित रूप से कम से कम तीन बार डॉक्टरी जाँच
  • टिटनस से बचाव के लिए 2 सूई (गर्भ की जानकारी होते ही)
  • आयरन की गोलियां खाना
  • रक्तचाप की जाँच करवाना
  • चिकित्सा (डॉक्टर) से पूछ कर ही कोई दवा लें| बिना डॉक्टरी सलाह के किसी भी दवा का प्रयोग न करें|

अन्य परिवर्तन:

मासिक धर्म बंद हो जाना

वजन का बढ़ना

जैसे-जैसे भ्रूण बढ़ता है, स्त्री का वजन भी बढ़ने लगता है| हर महीने उसका वजन 1 किलोग्राम से डेढ़ किलोग्राम तक बढ़ जाता है| इसमें शिशु का, प्लेसेंटा का, पानी की थैली का, बढ़े हुए स्तनों का और खून की बढ़ी हुई मात्रा का वजन शामिल रहता है| अगर वजन कम बढ़े तो यह खतरे का लक्षण है, क्योंकि इसका मतलब यह भी हो सकता है कि भ्रूण का विकास सामान्य नहीं है|

प्रसव के दौरान देखभाल

  • जच्चा को अधिक शक्कर या गुड मिलाकर गर्म दूध, चाय या घी, गुड उबाल कर पीने को दे|
  • इसे बार-बार पेशाब जाने को कहें|
  • उसे थोड़े-थोड़े समय पर चलने को कहे, तथा हल्के हाथ से कमर, पैर दबाएँ और मालिश करें|
  • दर्द आने पर गहरी साँस लेने को कहें| महिला को आश्वासन, प्रेम और धीरज दे|
  • पानी की थैली फूटने पर उसे प्लास्टिक, अख़बार या बिछौने पर गूदड़ी पर लिटायें|
  • आप स्वयं या फिर दाई के मदद से पेट पर कान रखकर गर्भ की धड़कन सुनने का प्रयास करें, बार- बार योनि को ऊँगली से या हाथ से मत फैलाएँ|
  • बच्चे का सर नीचे आया है या नहीं, ऊपर से देखें|
  • हाथ डेटोल, सेवलोन से धोएं|
  • बच्चे का सिर योनि मुख पर आते ही कपड़े के गद्दी रखकर सहारा दें|

गर्भावस्था के जोखिम :

  • गर्भवती को सिर दर्द होना, चक्कर
  • हाथ पैर में सूजन
  • दौर पड़ना
  • रक्तस्राव  होना
  • गर्भावस्था के किसी भी महीने में पेट दर्द
  • गर्भवती फीकी दिखाई देना यानी खून की कमी
  • 16 वर्ष से कम होना, 35 साल से अधिक उम्र में पहला प्रसव होना
  • ऊँचाई पांच फीट से कम होना, पैरों में खोट होना
  • इससे पूर्व के प्रसव में बच्चा मर जाना
  • तीन से अधिक बच्चे होना
  • पेट पर ऑपरेशन का निशान होना
  • तीन महीने बाद भी अधिक उल्टी होना
  • गर्भ में बच्चा आड़ा होना
  • पेट अधिक बड़ा दिखाई देना

 

प्रसव

प्रसव से पहले तैयारी

  • प्रसव करवाने की जगह को साफ करके चुने से लीप दें|
  • 2-3 छोटे सूती कपड़े, चादर के टुकड़ा, पुरानी सूती धोतियाँ आदि धो कर धुप में सूखाएँ और सन्दूक में रखें|
  • प्रसव किट – साबुन, नया ब्लेड, सफ़ेद धागा, डेटोल, रूई या फिर साफ सूती कपड़ा, कैची आदि एक छोटे सूखे बॉक्स या डब्बे में रखें|
  • उबला पानी, बाल्टी, साफ, बिछौना, पुराने अख़बार, माचिस, लालटेन, हाथ का पंखा, भगोना, जलाने की लकड़ी तैयार रखें|
  • प्रशिक्षित दाई से संपर्क करें|

प्रसव के बाद माँ और शिशु की देखभाल

  • पैदा हुए शिशु का सिर थोड़ा नीचे की ओर रखकर पकड़ें|
  • आवंल आने के बाद नाल काटे| नाल प्रसव किट में रखे नये ब्लेड से ही काटें और बांधने के लिए धागा का प्रयोग करें|
  • नाल की धड़कन बंद होने पर बच्चे की नाभि से चार अंगूल नाप कर पहली गांठ बांधे, दो अंगुल नाप कर दूसरी गांठ बांधे| फिर दोनों गांठो के बीच में ब्लेड से नाल को काटें|
  • बच्चे की ऑंखें और मुंह साफ सूती कपड़े से हल्के हाथों पोछें|
  • बच्चे को माँ के पास रखें और स्तनपान करवाएं|
  • माँ को साफ करने के बाद गर्भ दूध पिलाएं|
  • याद रखें, बच्चे को खींच कर प्रसव कभी न करवाएं और न ही आवंल खिंच कर निकाले| पेट को दबा दबा कर धक्के कभी न लगाएँ|

 

नवजात शिशु के जोखिम

  • शिशु का न रोना या नीला पड़ जाना|
  • 24 घंटे के अंदर पेशाब पैखाना न होना|
  • बच्चा पीला दिखाई देना|
  • आँखों से पीला स्राव निकलना|
  • नाक पक जाना, बुखार आना उल्टियाँ करना|
  • बच्चा अत्यधिक रोता है|
  • मुंह साफ करने के बाद भी चिकनाई निकलना|
  • स्तनपान नहीं करना|
  • नाक नाभि से खून बहना तथा पेट फूल जाना|
  • तालू बैठा हो या तालू उभरा हो|
  • कम वजन का कमजोर बच्चा हो (डेढ़ से दो किलो)

 

टीकाकरण

बच्चे को कई खतरनाक रोगों से बचाने का एक सरल तरीका है  टीकाकरण

प्रतिरक्षक कार्यक्रम के अंतर्गत सभी शिशुओं को क्षय रोग, गलघोंटू, काली खाँसी, टेटनस, पोलियो और खसरे का टीका लगाया जाना चाहिए| गर्भवती महिलाओं को परिवार कल्याण कार्यक्रम के अंर्तगत टेटनस का टीका लगाया जाना चाहिए| बच्चों और गर्भवती महिलाओं का प्रतिरक्षण तभी होता है जब उनको टीकों की पूरी संख्या दी जाए|

टीकाकरण ए. एन. एम्, द्वारा किया जाता है| यह सभी सरकारी अस्पतालों में भी उपलब्ध है|

यह  भी महत्वपूर्ण है कि टीकाकरण 100% अर्थात सभी को और समय पर किया जाए और जो छूट गए हों, उनका पता लगा कर उन्हें लगाया जाना चाहिए|

स्वास्थय संस्थान में जन्म लेने वाले सभी बच्चों को बी.सी.जी. और पी.वी. (पोलियो) की खुराक जन्म के तुरंत बाद दी जानी चाहिए|

  • बिना टीका लगवाए हुए शिशुओं के कुपोषित, दुर्बल होने तथा मरने की संभावना अधिक हो जाती है|
  • टीकाकरण अति आवश्यक है| जन्म के एक साल के अंदर ही सभी प्रकार के टीके लग जाने चाहिए|
  • यदि बच्चे को हल्के खाँसी जुकाम हो, बुखार – दस्त इत्यादि हो या बच्चा कमजोर एवं कम वजन का हो तो भी टिका अवश्य लगवायें|
  • कमजोर बच्चे को 6 जानलेवा बीमारियाँ आसानी से पकड़ती हैं जिससे उनकी मृत्यु तक हो सकती है|
  • टिका के साथ नौवें महीने में विटामिन ‘ए’ की खुराक भी हर बच्चे को हर 6 महीने बाद पिलाएं/यह बच्चे को रंतौधि से बचाता है|
  • बच्चे का टीकाकरण कार्ड संभाल कर रखें| यह उसके स्वास्थय का परिचय है| आप भी कहीं जा रहे हैं और टिका लगवाने का समय है तो कार्ड साथ लेकर जाएँ और जहाँ भी टीकाकरण की सुविधा उपलब्ध हो निश्चित समय पर टिका अवश्य लगवाएं| याद रहे, टीका में देरी का अर्थ है बच्चे के स्वास्थय से खिलवाड़|

 

प्रतिरक्षा सूची गर्भवती महिला के लिए टीकाकरण

गर्भावस्था के प्रारंभ में टेटनस टोक्साईड – 1 या बूस्टर इंजेक्शन

टेटनस टोक्साईड -1 के एक माह बाद टेटनस टोक्साईड – 2 इंजेक्शन

 

प्रतिरक्षा सूची : बच्चों के लिए

क्र.सं

आयु

टीका

बीमारी से बचाव

1

जन्म पर अथवा 48 घंटे के अंदर

पोलियो खुराक बी.सी.जी.

पोलियो तपेदिक (टी.बी.)

2

डेढ़ माह पर

डी.पी.टी., पोलियो

गलघोंटू काली खाँसी, टेटनस, पोलियो

3

ढाई माह पर

डी.पी.टी., पोलियो

गलघोंटू काली खाँसी, टेटनस, पोलियो

4

साढ़े तीन माह पर

डी.पी.टी., पोलियो

गलघोंटू काली खाँसी, टेटनस, पोलियो

5

नौ माह पर

 

मीजल्स

खसरा

6

15-18 माह पर

 

एम.एम.आर.

खसरा, कनफेड़, जर्मन खसरा

7

16-24 माह पर

डी.पी.टी., पोलियो (बूस्टर खुराक)

गलघोंटू कनफेड़, जर्मन खसरा

8

5 साल पर

डी.पी.टी. (बूस्टर खुराक)

गलघोंटू व  टेटनस

गर्भनिरोधक के प्रचलित तरीके

गर्भधारण के मतलब है- गर्भवती होना और गर्भनिरोधक का अर्थ है स्त्री पुरूष तो मिलें परंतु उनके शुक्राणु और अंडे/डिम्ब का मिलन न हो| एक स्त्री के गर्भधारण के लिए या गर्भवती होने के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ जरूरी है

-    अंडे का बीजदानी से निकलना

-    गर्भाशय की खुली हुई नलिका

-    पुरूष के वीर्य में शुक्राणुओं का मौजूद होना

-    शुक्राणु ओं का योनि में पहूँचना

-    गर्भाशय के द्वार से शुक्राणु का गर्भाशय में प्रवेश करना

-    शुक्राणुओं  का ऊपर की ओर तीव्र गति से दौड़ना जिससे कि वह फैलोपियन नलिका से होते हुए बीच तक पहुंच सकें|

-    गर्भाशय की नर्म और गूदगूदी अंदरूनी सतह (जो स्त्री हार्मोन के सामान्य संतूलन से बनती है) जिसमें भ्रूण घूस सके और एक शिशु के रूप में विकसित हो सके|

गर्भधारण के लिए जरूरी उपरोक्त स्थितियों में सी कोई स्थिति बदल दी जाए तो गर्भावस्था से बचा सा सकता है या उसे रोका जा सकता है| कोई ऐसा उपाय जो अंडा को शुक्राणु से मिलने से रोक दे, गर्भ निरोधक कहलाता है|

गर्भनिरोधक के प्रचलित तरीके

प्राकृतिक तरीका

-   बाह्य वीर्यपात

-   उर्वरक दिनों का पहचान

-   स्तनपान / लैम

कृत्रिम तरीका

-   स्थायी

1. पुरूष नसबंदी

2. महिला बंध्याकरण

-   अस्थायी

1. डॉक्टरी तरीके

  • आई. यू. डी.
  • गर्भनिरोधक सूई

2. स्वयं इस्तेमाल करने के तरीके

  • गर्भनरोधक – हार्मोनल गोलियां
  • गर्भनिरोधक नॉन  हार्मोनल गोलियां
  • कंडोम

 

प्राक्रतिक तरीके : इसमें पुरूष संभोग की प्रक्रिया के दौरान स्त्री की योनि में होने वाले वीर्यपात को बाहर गिराता है| ध्यान रखना चाहिए कि वीर्य योनि के ऊपर या अगल - बगल भी नहीं गिरे|

उर्वरक दिनों की पहचान – मासिक धर्म शुरू होने के लगभग 14 दिन पूर्व अंडा विसर्जन होता है| इस दिन के तीन पहले और दो दिन अंडा विसर्जन होता है| इस दिन के तीन दिन पहले और दो दिन बाद तक यौन संबंध बनने पर गर्भधारण की संभावना रहती है| इसे बच्चेवाला दी या उर्वरक काल कहता हैं जो संभोग के लिए असुरक्षित काल है| बाकी के दिन सुरक्षित काल कहलाते हैं |

ये दोनों तरीके भरोसेमंद नहीं हैं क्योंकि यह संयम, पुरूष की क्षमता और मासिक चक्र के नियमित होने पर निर्भर करता है|

स्तनपान

स्तनपान कराने वाली उन औरतों के लिए लैम एक असरदार, सुरक्षित और प्राकृतिक गर्भ निरोधक का अस्थायी तरीका है जो निम्नलिखित तीन शर्ते पूरी करती हों:

  • जिसका बच्चा पूरी तरह से सिर्फ माँ के दूध पर निर्भर हो यानी दिन-रात, कभी भी बच्चे के चाहने पर माँ उसे अपना दूध पिलाती हो|
  • जिनका मासिक धर्म प्रसव के बाद शुरू नहीं हुआ हो|
  • जिनका बच्चा छह महीने से कम का हो|

अगर तीनों का जवाब ‘हाँ’ में है तो लैम 98 प्रतिशत तक असर करेगा|

लैम के फायदे

सुरक्षित और बहुत असरदार (पहले 6 महीनों में 100 में केवल 2-3 स्त्रियाँ गर्भवती होती है)

  • तुरंत असर करता है|
  • सहवास में कोई बाधा नहीं पहूँचाता |
  • कोई शारीरिक शिकायतें नहीं होती|
  • किसी डॉक्टरी देखरेख की जरूरत नहीं|
  • सप्लाई की जरूरत नहीं पड़ती|
  • कुछ खर्च नहीं करना पड़ता है|
  • जो स्त्रियाँ लैम को अपनाती हैं; वे बाद में दुसरे तरीके आसानी से अपना लेती हैं|
  • बच्चे के स्वास्थय पर इसका कोई बुरा असर नहीं पड़ता|

 

लैम विधि का कोई बुरा असर पड़ता है ?

  • लैम से कोई भी भीतरी-बाहरी शारीरिक शिकायत नहीं पैदा होती|
  • दरअसल यह तरीका तो माँ द्वारा दूध पिलाने को बढ़ावा देता है, जिससे माँ और शिशु को कई लाभ होते हैं|

 

लैम से संबंधित भ्रांतियाँ :

मिथ्या : लैम परिवार नियोजन का भरोसमंद तरीका नहीं है|

सच: अगर लैम से जुड़ी 3 शर्तें पूरी की जाएँ तो यह 98 प्रतिशत तक असर करता है|

मिथ्या : शिशु को केवल माँ का दूध पिलाना व्यवाहरिक नहीं है|

सच: एक बार अगर माँ यह बात अच्छी तरह समझ ले कि इससे बच्चे को स्वयं उसे कितने फायदे हैं तो ऐसा करना मुश्किल नहीं है|

मिथ्या : अगर माँ बच्चे को केवल अपना दूध पिलाती है, या ज्यादातर समय अपना ही दूध पिलाती है तो वह बहुत कमजोर और कुपोषित हो जाएगी|

सच: अगर माँ इस संदेश को स्पष्ट रूप से समझ लेती है कि “माँ खाएगी तो बच्चा भूखा नहीं होगा” और वह सन्तुलित भोजन करती है तो वह स्वस्थ रहेगी और बच्चे को पूरी तरह दूध पिला सकेगी|

मिथ्या : ज्यादातर माताओं में इतना दूध ही नहीं बनता कि ये पूरी तरह से बच्चों को दूध पिला सकें|

सच: बच्चा माँ के स्तनों से दूध जितना ज्यादा पियेगा, माँ में दूध भी उतना ज्यादा उतरेगा| माँ को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए| बल्कि स्तनों से दूध पिलाते रहना चाहिए जिससे कि ज्यादा से ज्यादा दूध बनता रहे| उसे अच्छी तरह भोजन करना चाहिए, वह सब जो उसके इलाके में मिलता है और खाया जाता है|

मिथ्या : शुरू के 6 महीने, में केवल माँ के दूध से बच्चे का विकास नहीं हो सकता और उसे अन्य चीजें भी खिलानी पिलानी चाहिए|

सच : शुरू के 6 महीनों में अगर बच्चा केवल माँ का दूध पीता है तो उसे पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक तत्व मिलता है और उन 6 महीनों में इसी से शिशु की सभी जरूरतें पूरी जो जाती हैं| इससे शिशु को कोमल देह में रोगों से लड़ने-भिड़ने की क्षमता बढ़ जाती है|

कंडोम

गर्भनिरोध के वे तरीके जिसमें किसी बाहरी या कृत्रिम चीज का इस्तेमाल किया जाए उसे कृत्रिम अस्थायी तरीका कहते हैं|

यह दो बच्चों के बीच अन्तराल रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है|

  • जब तक इस्तेमाल किया जाए, तभी तक गर्भधारण से सुरक्षा मिलती है|
  • इस्तेमाल बंद करने पर गर्भधारण की पूर्ण संभावना है|

इसमें एक महत्वपूर्ण तरीका हैं कंडोम :-

कंडोम :

यह कई ब्रांडो (यानी नामों) में उपलब्ध है

कंडोम पुरूषों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला गर्भनिरोधक है, जो थोड़ी देर तक काम आता है| यह रबर का बना हुआ महीन कवच है, जिसे सहवास के दौरान पुरूष अपने लिंग पर चढ़ा लेता है| कंडोम के इस्तेमाल का इतिहास बहुत पुराना है| अठारवीं शताब्दी में भी लोगों द्वारा यौन रोगों और अनचाहे गर्भ की समस्याओं से बचने के लिए कंडोम के इस्तेमाल का प्रमाण मिलता है| उन दिनों कंडोम जानवरों के चमड़े से तैयार किया जाता था|

आधुनिक कंडोम रबर या विशेष प्रकार के ऊतकों की बनी एक महिन पतली झिल्ली होती है| दुनियाँ भर में बनने वाले कंडोम में आकार, उनकी मोटाई, चिकनाई की मात्रा और शुक्राणुनाशक की उपस्थिति के अनुसार थोड़ा अंतर होता है|

आकार –

कंडोम सीधा या चपटा, मुलायम या महीन धारीदार चिकनाई रहीत, पारदर्शी और रंगीन अनेकों प्रकार के होते है| समान्यत: कंडोम एक आकार के ही होते है जिसकी लम्बाई – 5.2 सेंटीमीटर परिधि – 3.0 से 3.5 सेंटीमीटर; मोटाई – 0.0003 – 0.0007 सेंटीमीटर होता है| इसमें चिकनाई के लिए सुखा सिलिकोन तेल, जेली, पाउडर या शुक्राणुनाशक का इस्तेमाल किया जाता है|

कंडोम ऐसे कम करता है

लिंग और योनि के मेल के वक्त यह एक प्रकार की रूकावट पैदा करता है|

पुरूष का वीर्य, जिसमें शुक्राणु और यौन रोग पैदा करने वाले जीवाणु/विषाणु (जैसे कि एड्स का विषाणु एच.आई.वी आदि हो सकते हैं, ये कंडोम में कैद हो जाते हैं और बाहर नहीं आ पाते|

कंडोम या निरोध का इस्तेमाल ऐसे करें

  • एक्सपायरी डेट जाँच करें|
  • पैकेट को बीच से खोलकर कंडोम निकालें|
  • उसके निप्पल जैसे सिरे को अंगूठे और अंगुली के बीच दबाकर अंदर की सारी हवा निकाल दें, इससे वह यौन क्रिया के दौरान फटेगा नहीं|
  • चित्र में दिखाए गए तरीके से कंडोम को उसके छल्ले की तरफ से पकड़कर उतारें|
  • यौन संबंध के बाद कंडोम को उतार दें. कंडोम को उसके छल्ले की तरफ से पकड़कर उतारें. साथ ही ध्यान रखें कि गलती से कहीं कंडोम में पड़ा वीर्य छलककर योनि में न गिरे|
  • सहवास के दौरान पुरूष का वीर्य कंडोम में रूक जाता है, इसलिए कंडोम गर्भनिरोधक का काम करता है|

कंडोम इस्तेमाल के लाभ

  • बच्चों के बीच मनचाहा अंतर रखने में सहायक
  • सुखमय बैवाहिक जीवन के भरपूर आनन्द का सर्वोत्तम साधन|
  • खतरनाक यौन रोगों, एड्स आदि से बचाव
  • इस्तेमाल का कोई दुष्प्रभाव नहीं
  • मंहगा नहीं और आसानी से उपलब्ध
  • सुरक्षित और असरदार
  • पुरूष को परिवार नियोजन की सुविधा प्रदान करता है|
  • जब गर्भनिरोधक का इस्तेमाल कुछ अरसे के लिए करना हो तब इससे बहुत सहूलियत या आसानी रहती है|
  • यह स्तनपान को प्रभावित नहीं करता|

कंडोम के अन्य लाभ (स्वास्थय के लिए)

  • दोनों जीवन साथियों को यह यौन रोगों और एड्स से बचाता है|
  • गर्भाशय के मुंह के कैंसर से बचने में मदद करता है|
  • कोई पुरूष जिनको समय से पहले वीर्यपात हो जाता है, उनकी मदद करता है क्योंकि लिंग के निचले हिस्से में इनका रिम या घेरा लिंग को जल्दी ढीला नहीं होने देता उसे अधिक देर तक खड़ा रखता है|
  • स्त्रियों में पेडू की सूजन वाली बीमारियों (पी.आई.डी.) को होने से रोकता है, और फैलोपियन नलिका के अवरोध से होने वाले बाँझपन से उन्हें बचाता है|

ध्यान रखने योग्य बातें

  • सहवास के समय इसका इस्तेमाल होता है|
  • कई पुरूष सहवास के आनंद की कमी की शिकायत करते है| परन्तु आधुनिक तकनीकों से बने नए कंडोम से संभोग के आनंद में कुछ कमी नहीं होती है|
  • जो लोग ठीक से इसका इस्तेमाल करना जानते, उनके लिंग से यह सरक जाट है/फट जाता है और इस कारण शुक्राणु योनि में जा सकते हैं|
  • इसका इस्तेमाल करने वालों में सही इच्छाशक्ति और जानकारी होनी चाहिए, जिससे वे हर बार इसका उपयोग ठीक प्रकार से कर सकें|
  • जब इसका रख रखाव ठीक न हो तो यह जल्दी ही ख़राब हो जाता है|

भ्रांति और सच :

भ्रांति : एक ही स्टैंडर्ड साइज़ का कंडोम सबको ठीक से नहीं लग पाता|

सच : एक ही साइज सबको फिट जा जाती है|

भ्रांति : कंडोम फट जाता है|

सच : नये कंडोम बड़े मजबूत होते हैं| अगर उनका सही ढंग से इस्तेमाल  किया जाए तो वे नहीं फटतें हैं|

भ्रांति : कंडोम से सहवास का आनन्द कम हो जाता है|

सच : कंडोम बड़ी पतली और मुलायम रबर के बने होते हैं| हालाँकि कंडोम से यौन क्रिया का वही आनन्द नहीं मिलता जो बिना कंडोम मिलता है लेकिन इससे बहुत लोगों को बिलकुल असली सहवास का स आनन्द आता है| यह भरोसा कि कंडोम का इस्तेमाल करने से स्त्री गर्भवती नहीं होगी, वास्तव में दम्पति के यौन आनंद को और बढ़ा सकता है|

भ्रांति : कंडोम आमतौर पर एलर्जी पैदा करते हैं|

सच : कंडोम से एलर्जी कभी-कभी ही देखने में आती है|

भ्रांति : अगर कई वर्षो तक कंडोम का इस्तेमाल लगातार किया जाए तो ये नुकसान पहुंचाते हैं|

सच : यह अत्यंत सुरक्षित है और स्त्री पुरूष दोनों को सिर्फ अनचाहें गर्भ से ही नहीं बल्कि यौन रोगोंम एच आई.वी./एड्स, पेडू के सूजन  रोगों, और स्त्रियों में गर्भाशय के मुंह का कैंसर आदि से भी सुरक्षा प्रदान करता है| इसलिए कंडोम के लगातार इस्तेमाल की सलाह दी जाती है|

भ्रांति : कंडोम को धोकर पुन: इस्तेमाल किया जा सकता है|

सच : एक कंडोम का इस्तेमाल किया जा सकता है|

भ्रांति : एक कंडोम का इस्तेमाल सिर्फ एक ही बार हो सकता है|

गर्भनिरोधक गोलियां

गर्भनिरोधक का एक अस्थायी तरीका है गर्भ निरोधक गोलियाँ-

गर्भनिरोधक हार्मोनल गोलियाँ:-

गलियाँ क्या हैं ?

गर्भनिरोधक हार्मोनल गोलियों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोजन दो ऐसे हार्मोन होते हैं जो स्त्री के शरीर में आम तौर पर मौजूद रहते हैं|

कैसे काम करती है

  • अंडा विसर्जन को दबा देता है|
  • गर्भाशय के द्रव्य को गाढ़ा कर देती है जो योनि से लेकर गर्भाशय के खोखले हिस्से तक शुक्राणु को जाने से रोकता है
  • गर्भाशय के अंदरूनी सतह (एंडोमीट्रियम की झिल्ली) को पतला कर देता है|

कब लेना शुरू करें

  • मासिक चक्र के पांचवें दिन से
  • प्रसव के बाद, अगर स्तनपान न करा रही हो तो 6 हफ्ते बाद, अगर स्तनपान करा रही हों तो 6 महीनों बाद
  • गर्भपात के तुरंत बाद

गोलियां कैसे लें

  • मासिक चक्र के पांचवे दिन, रात को खाना खाने के बाद पहले पत्ते की पहली सफेद गोली लें|
  • रोज एक गोली लें,अच्छा हो कि एक ही समय पर, मसलन रात को खाने के बाद (टायर के निशान के साथ आगे बढ़ते जाएँ)| सफेद गोली खत्म होने के बाद लाल वाली गोली लें|
  • जिस दिन अंतिम लाल गोली लें उसके दुसरे दिन से अगले पत्ते की सफेद गोली से पुन: चक्र शुरू करें|

(नोट: कुछ पैकेटों में 28 गोलियां होती है| बाकी में 21 होती हैं| जब गोलियां वाला पैकेट खत्म हो, जाए तो अगले दिन से नया पैक शुरू करें दे जब 21 गोलियों वाला पैकेट खत्म हो, तो एक हफ्ता (सात दिन) रूक जाएँ और फिर आठवें दिन से नया पैक शुरू करें| अगर गोली लेने के तीस मिनट के भीतर उल्टी हो जाए तो दूसरी गोली लें या अगर सात दिनों में सहवास करना हो तो गर्भनिरोधक का कोई दूसरा तरीका भी साथ साथ इस्तेमाल करें)

यदि गोली लेना भूल जाएँ

  • अगर एक दिन भूलें तो जैसे ही याद आये, भूली/छूटी हुई गोली ले लें और उस दिन की गोली अपने निश्चित समय पर (यानी रात को खाना खाने के बाद) लें|
  • अगर दो दिन भूलें तो अगले दिन दो दिनों तक सुबह और रात में एक - एक गोली लेती रहें| पुन: तीसरे दिन से नियत समय पर सिर्फ एक गोली लेती रहें, साथ ही अगले सात दिनों तक गर्भनिरोधक का कोई अन्य तरीका इस्तेमाल करें (मसलन कंडोम या फिर सात दिनों तक सहवास न करें)
  • अगर दो दिनों से ज्यादा भूलें तो इसे पत्ते को फेंक दें, मासिक धर्म का इंतजार करें तथा मासिक शुरू होने पर पांचवें दिन सफेद गोली से पुन: चक्र आरंभ करें|

गोली इस्तेमाल करने के फायदे

  • अगर रोज ली जाए तो बहुत असरकारी
  • इस्तेमाल से पहले पेडू की जाँच जरूरी नहीं है
  • सहवास में कोई बाधा नहीं पहूँचती
  • इनका इस्तेमाल आसान है
  • इस्तेमाल आसानी से बंद किया जा सकता है
  • जब भी चाहे तो इनका इस्तेमाल करना बंद कर देने पर 2-3 महीनों के भीतर ही गर्भाधान हो सकता है|
  • कोई भी प्रशिक्षित जानकर व्यक्ति इनकी सप्लाई कर सकता है|

गोलियां के अन्य स्वास्थय लाभ

  • मासिक चक्र को नियमित करती है और अत्यधिक रक्त स्राव तथा मासिकधर्म की पीड़ा को कम करती है|
  • आयरन की कमी-एनीमिया को दूर कर सकते है|
  • बीजदानी और गर्भाशय के अंदरूनी सतह के कैंसर से बचाव करती है|
  • स्तन संबंधी रोगों को कम करती है|
  • गर्भाशय के बाहर की गर्भावस्था को, मसलन फैलोपियन ट्यूब में सीमित रह जाने वाली गर्भाशय के द्वार एक गाढ़ा तत्व जमा होता है, जिनकी वजह से रोगों के किटाणु गर्भाशय में प्रेवश नहीं कर पाते|

गोलियां किनके लिए सर्वाधिक उपयुक्त हैं

  • जो एक असरदार तरीके की चाह रखती हैं|
  • जिन्हें साधारण या अधिक एनीमिया की शिकायत है|
  • जिन्हें मासिक धर्म संबंधी बेहद शिकायतें रहती हैं, पानी ख़ोज ज्यादा आता है, पेट के निचले हिस्से में काफी पीड़ा होती है, मासिकधर्म अनियमित रूप से होती है, और मासिकधर्म से पूर्व जिन्हें खीझ और उदासी रहती है, स्तनों और पेट के निचले हिस्से में पीड़ा होती है|

गोलियों का इस्तेमाल किन्हें नहीं करना चाहिए

  • 35 वर्ष से अधिक आयु की उन स्त्रियों को जो बहुत ज्यादा सिगरेट-बीड़ी पीती हों
  • जिन्हें लिवर रोग या पीलिया हो
  • जिन्हें स्तनों में गांठ, सूजन की शिकायत रहती हो और जिनके स्तनों पर दाने हों या उनसे स्राव होता हो|
  • जिन्हें लगातार बहुत ज्यादा सिरदर्द रहता हो, उच्च रक्तचाप हो या हृदय रोग हो|
  • जो 6 महीनों से कम आयु के बच्चे को दूध पिलाती हों|
  • गर्भावस्था में (या यदि उसके संभवना हो)

गलियों का प्रारंभिक प्रभाव

  • उल्टी/चक्कर महसूस करना|
  • एक से दूसरे मासिकधर्म के बीच धब्बे लगाना या खून आना|
  • बेचैनी – उदासी
  • सिरदर्द
  • स्तनों में भारीपन और हल्का दर्द

छोटी – मोटी शारीरिक शिकायतें किसी बड़ी बीमारी के चिन्ह या लक्षण नहीं है और जब शरीर गोलियों के आदि हो जाता है तो आम तौर पर 2-3 महीने के भीतर ये बंद भी हो जाती हैं| कुछ औरतों को तो ये शिकायतें कभी होती ही नहीं|

अगर ये छोटी-मोटी शिकायतें 2-3 महीने बाद दूर न हो जाएँ/या वे बहुत ज्यादा परेशानी पैदा करें तो स्त्री को किसी अन्य तरीके से इस्तेमाल के बारे में सोचना चाहिए| लेकिन जब तक दूसरा तरीका अपना न लें तब तक गोलियों को बंद नहीं करना चाहिए|

चेतावनी के पांच लक्षण (ए.सी.एच.इ.एस)

  • ए- पेट के निचले हिस्से में दर्द बहुत ज्यादा
  • सी – छाती में दर्द बहुत ज्यादा, खाँसी, साँस लेने में तकलीफ
  • एच- सिरदर्द (बहुत ज्यादा)
  • ई – आँखों की समस्या (न दिखना या धुंधला दिखना)
  • एस - किसी एक पैर में उठने वाला तेज दर्द

लक्षणों के उभरने पर क्या करें

  • गोलियां बंद कर दें|
  • डॉक्टर से सलाह लें|
  • अगर सहवास करें तो अब तक किसी दुसरे तरीके (कंडोम) का इस्तेमाल करें जब तक स्वास्थय सेविका/स्वास्थ्य केंद्र आपकी मदद के लिए उपयुक्त तरीका न चुन ले|

नोट: ध्यान देने योग्य बात यह है कि उपरोक्त लक्षण उभरने की संभावना प्रति वर्ष गोली इस्तेमाल करने वाली एक लाख महिलाओं में किसी एक में होती है|

भ्रांति : गोलियों से कैंसर होती है|

सच : वैज्ञानिकों ने उन स्त्रियों को लेकर कई प्रकार अध्ययन किए हैं| पर, इन अध्ययनों से ऐसी कोई बात पता नहीं चली जो यह बताए कि गोलियों से कैंसर होता है सच तो यह है की ये अध्ययन यह बताते हैं कि गोली से स्त्रियों में कुछ प्रकार के कैंसर को रोका जा सकता हैं, या उनसे स्त्रियों का बचाव होता है| मसलन बीजदानी के कैंसर से या गर्भाशय की अंदरूनी सतह के कैंसर से| यह भी कि, जो स्त्री 35 साल से या उसके ऊपर की है, वह अगर गोलियां का इस्तेमाल करती है तो उसमें कैंसर के उभरने की आशंका कम है|

भ्रांति : गोली लेने से विकलांग बच्चे पैदा होते है, और एक साथ कई बच्चे होते हैं (जुड़वां, तीन)

सच : गोली लेने वाली स्त्री को ही विकलांग बच्चे पैदा होंगे या एक साथ भी हो सकता है जो गोली नहीं लेती है| यानी विकलांग बच्चे पैदा होने या एक साथ कई बच्चे पैदा होने या एक साथ कई बच्चे पैदा होने का कोई संबंध गोली के साथ नहीं है|

भ्रांति : अगर कोई स्त्री गोली का इस्तेमाल करती है तो इन्हें बंद कर देने बाद, उसे गर्भवती होने में मुश्किल होगी|

सच : ज्यादातर स्त्रियाँ, गोली लेना बंद करने बाद जल्दी गई गर्भवती जो जाती हैं| इस विषय के विद्वानों की राय है कि जिन थोड़ी सी स्त्रियों को गोली का इस्तेमाल बंद कर देने बाद भी गर्भवती होने में कोई मुश्किल होती है, उन्हें तो यह मुश्किल तब भी होती अगर वे गोलियों का इस्तेमाल न कर रही होती|

भ्रांति : गोली शरीर में इकठ्ठा हो जाती है|

सच : गर्भनिरोधक गोलियां स्त्री के पेट में ठीक उसी  तरह घूल जाती है, जैसी कि अन्य दवाएँ और कोई भी भोजन सामग्री जो वह खाती है| गोलियां शरीर के भीतर जमा नहीं होती है|

परिवार नियोजन के स्थायी तरीके

ये गर्भनिरोधन के वैसे साधन है, जिनसे गर्भधारण स्थायी रूप से रोका जाता है|

स्थायी तरीके दो प्रकार के हैं

1. पुरूष नसबंदी|

2. महिला बंध्याकरण या नलिका बंदी|

दोनों ही मामूली ऑपरेशन हैं| इन्हें ऑपरेशन वाली जगह को सुन्न करके किया जाता है| पुरूष नसबंदी, स्त्री नसबंदी के मुकाबले ज्यादा सरल, सुरक्षित और कम खर्च वाली है| आजकल एन.एस.बी. में चीरा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती है| पुरूषों को नसबंदी से न तो नसबंदी से न तो कमजोरी होता है न ही यौन सुख में कोई कमी आती है|

नसबंदी/ बंध्याकरण कौन करा सकता है

  • जिसे इसकी पूरी जानकारी हो, और जो यह फैसला पक्की तरह कर चुका हो कि वह और बच्चे नहीं चाहता/चाहती|
  • वह स्त्री जिसका स्वास्थय खराब हो और गर्भावस्था से खतरा हो| दम्पति इसका फैसला करें कि वे दोनों में से किसकी नसबंदी कराना चाहते हैं|

नसबंदी कहाँ करायी जा सकती है

  • अस्पताल में|
  • सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में|
  • प्राथमिक चिकित्सा केंद्र में|
  • प्राइवेट क्लिनिक में|

कौन कर सकता है?

  • प्रशिक्षित चिकित्सा अधिकारी|

नोट करें: नसबंदी वहाँ भी हो सकती है जहाँ एक छोटा आपरेशन कक्ष हो, जरूरी उपकरण (यंत्र और औजार) हो, संक्रमण से बचाव के लिए इंतजाम हो और अगर कोई इमरजेंसी हो तो महिला को जरूरी दवा दी जा सके तथा यंत्रों, औजारों के सहारे उसकी चिकित्सा की जा सके|

गर्भपात

गर्भपात क्या है

स्वभाविक गर्भपात या हमल गिरने का मतलब है अजन्मे बच्चे का नुकसान| कुछ कारणों से 10 में से लगभग 3 गर्भ प्राकृतिक रूप से गिर जाते हैं| आमतौर से स्वभाविक गर्भपात गर्भ के पहले तीन महीनों में होता है| परन्तु यह अगले 28 सप्ताहों अर्थात 6 ½ महीने तक भी हो सकता है|

गर्भपात के कारण

  • भ्रूण का ठीक से विकसित न होना गर्भपात का सबसे आम कारण है| भ्रूण एक अंकुरित दाने जैसे होता है| बहुत ही छोटा, कोमल और सरल|
  • गिरने, चोट लगने या संभोग के कारण भ्रूण को आघात पहुँचना गर्भपात का कारण बन सकता है|
  • गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) के ढीले होने से गर्भाशय 4-5 महीनों के बाद गर्भ को अंदर नहीं रख पाता और गर्भपात हो जाता है|
  • मलेरिया बुखार, खसरा का बुखार या कुछ दूसरी बीमारियों के कारण बुखार आना गर्भपात का कारण हो सकता है|
  • भारी काम करने विशेषकर भारी बोझ ढोने से पेडू के अंदर दबाव बनता है| यह दबाव भ्रूण को बाहर की ओर धकेल कर गर्भपात करा सकता है|
  • गर्भाशय की रचना की त्रुटियाँ गर्भपात का बन सकती है|
  • सूजाक, जो एक यौन संचारित रोग है, भी गर्भपात का कारण बन सकता है| क्योंकि यह जनन अंगों में घाव पैदा करता है|
  • खाने में जहरीले तत्वों की उपस्थिति (विशेषकर अर्गट नामक तत्व जो संक्रमित बाजरे में पाया जाता है) भी गर्भपात का कारण बनता है|

कानूनी तौर पर गर्भपात कब कराया जा सकता है

भारत में गर्भपात के निम्न कारणों को कानूनी मान्यता प्राप्त हैं :

  • स्त्री/पुरूष के गर्भनिरोधक उपाय अपनाने के बाद भी स्त्री का गर्भवती हो जाना अर्थात गर्भनिरोधक उपायों की असफलता|
  • कुछ बीमारियों जैसे – टोक्सिमिया, एक्लेम्पिया, हृदय रोग, पीलिया, गुर्दे के रोग, गंभीर मधुमेह आदि के कारण गर्भ से स्त्री का जीवन को खतरा|
  • कुछ बीमारियों जैसे खसरा, आतशक (गर्मी) एड्स या गर्भावस्था में कुछ दवाइयों के गलत इस्तेमाल के कारण होने वाले बच्चे के अपंग या दोषपूर्ण होने का खतरा|
  • भ्रूण में किसी विशेष जैसे सिर, रीढ़ की हड्डी, हाथ-पैर, हृदय के कपाट, गुर्दे आदि के दोष की पहचान जो सोनोग्राफी द्वारा गर्भधारण के बाद 16 सप्ताहों में की जा सकती है|
  • कुछ सामाजिक कारणों से भी गर्भपात मान्य हो जाता है जैसे गर्भपात की उम्र बहुत  होना, बलात्कार के कारण गर्भ ठहरना, गर्भ ठहरने के बाद तलाक हो जाना, महिला का बच्चा न चाहना, महिला का अविवाहित होना इत्यादि|
  • माँ को गंभीर मानसिक रोग होने पर गर्भपात कराया जा सकता है|

गर्भ में लड़की का होना गर्भपात का मान्य कारण नहीं है बल्कि बच्चे के लिंग की पहचान व उसके कारण गर्भपात कराना कानूनन अपराध है| इसके लिए सजा हो सकती है|

भारत में डॉक्टरी गर्भ समापन अधिनियम (एमटीपी एक्ट) 1972, गर्भ समापन के लिए कुछ शर्ते पेश करता है| महिलाएं इस अधिनियम द्वारा रखी गई शर्तों के अंतर्गत गर्भ समापन करा सकती हैं| इससे वह मृत्यु और गंभीर स्वास्थय समस्याओं से बच सकती हैं| यह सुरक्षित गर्भपात चार स्तम्भों पर आधारित है:

  • गर्भपात का मान्य कारण, ताकि गर्भपात से बचा जा सके, उसे न कराया जाए|
  • गर्भपात कराने के लिए मान्यता प्राप्त जगह – अस्पताल या कोई चिकित्सा केंद्र गर्भपात कराने के लिए प्रशिक्षण एवं मान्यता प्राप्त डॉक्टर
  • गर्भपात गर्भ के पहले 12 हफ्तों में या 20 सप्ताह से पहले कराया जाए|

गर्भपात के सुरक्षित तरीके

12 सप्ताह से पहले

एम.वी.ए (मैनुअल वैक्यूम एस्पिरेशन) सबसे आम तरीका है| यह सुरक्षित और सस्ता है| इसे 8 से 10 सप्ताह के गर्भ के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है|

गर्भाशय की सफाई (डी.एंड.सी अर्थात डायलेटिंग एंड क्यूरेटिंग) 12 सप्ताह तक के गर्भ के लिए उपयोगी एवं सुरक्षित है|

12 से 20 सप्ताह

इस समय तक भ्रूण की थैली काफी बड़ी हो जाती है| ऊपर हमने तरीकों का वर्णन किया वह इसके लिए उपयोगी नहीं रह जाते| उनको अपनाना खतरनाक हो सकता है| 12-20 सप्ताह के लिए प्रमाणित एवं योग्य डॉक्टर एक नली (कैथीटर) द्वारा एक दावा गर्भाशय के अंदर डालते हैं| यह दवा भ्रूण की थैली के चारों ओर फ़ैल जाती है और गर्भ गिरवा देती है| इस प्रक्रिया में 2 से 3 दिन लगते हैं और यह एम् वी ए की तुलना में खतरनाक है|

गर्भपात के खतरे

सभी गर्भपात स्त्री के लिए खतरनाक होते हैं| कानूनी तौर पर योग्य डॉक्टरों की देख रेख में किया गया गर्भपात भी खतरनाक हो सकता है| यद्यपि यह गैरकानूनी गर्भपात की तुलना में काफी सुरक्षित होता है| गर्भपात निम्न समस्याएं पैदा कर सकता है :

  • भरी रक्तस्राव
  • गर्भाशय की दिवार में छेद हो जाना या पेडू की अंदरूनी दिवार की आघात पहुँच कर घाव बनना (मिचली, उल्टी, पेट में दर्द, कड़ा और तना हुआ पेट, कंधे में दर्द इसके कुछ लक्षण हैं)|
  • श्रेणी का संक्रमण (कंपकंपी, बुखार, पेट में दर्द, योनि से खून मिश्रित स्राव इसके कुछ लक्षण हैं)|
  • डिंबनालों में अवरोध हो जाने के कारण स्त्री का बाँझ हो जाना| डिंबनालों में सूजन व अवरोध संक्रमण का नतीजा होते हैं|

एम वी ए पद्धति में आघात कम से कम होता है| रक्तस्राव तुरंत आरंभ हो सकता है या घर जाने के बाद| प्रया: इस का कारण गर्भाशय में रह जाने वाला भ्रूण थैली का कोई टुकड़ा होता है| संक्रमण लगभग 24 घंटे बाद होता है| संक्रमण से बचाव के लिए हर गर्भपात के बाद एंटीबायोटिक दवाएँ अवश्य  दी जाती हैं|

संक्रमण के लक्षण दिखाई दें तो बेहतर होगा कि गर्भपात के दुसरे दिन महिला को उसके घर जाकर देखा जाए| इससे उसे स्वास्थय समस्याओं से बचाया जा सकेगा| महिला से उसकी हालत पूछिए| विशेषकर रक्तस्राव, बुखार और दर्द के बारे में जानकारी लीजिए| कुछ महिलाओं को गर्भपात के बाद दर्द होता है| लेकिन किसी भी क्लिनिक में उन्हें 3 दिनों के लिए दर्द होता है| लेकिन किसी भी क्लिनिक में उन्हें 3 दिनों के लिए दर्द निवारक गोलियां दी जाती हैं| इसलिए यह कष्ट आम तौर पर बहुत कम होता है|

गर्भपात से बचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि गर्भनिरोधक के उपाय अपनाए जाएँ और महिला – पुरूष युगल डॉक्टर या नर्स की सलाह लें| जिस गर्भ को गिरने से रोका जा सके उसके लिए जहाँ तक हो सके महिला को रोकें|

गर्भपात के बाद पूछे जाने वाले कुछ आम प्रश्न

क्या अगला गर्भ सामान्य रह सकेगा ?

हाँ, अगर वर्तमान गर्भ गर्भाशय के किसी दोष या रोग के कारण न गिराया गया हो| माहवारी फिर कब सामान्य रूप से होने लगेगी

मासिक चक्र लगभग 2 महीनों के बाद सामान्य हो जाएगा| कभी-कभी थोड़ा समय और लग जाता है|

गर्भ धारण से बचने के लिए क्या करें?

गर्भपात के बाद कम से कम 4 सप्ताह तक संभोग से बचें| इस समय गर्भाशय अंदर से कच्चा होता है| इसलिए संक्रमण का खतरा होता है| इसके बाद कॉपर टी या खाने वाली गोलियां इस्तेमाल की जा सकती हैं| पति को कंडोम इस्तेमाल करने की सलाह दें, गर्भनिरोध के दुसरे तरीकों जैसे आई. यू. डी. आदि के लिए महिला को प्रेरित करें|

महिला अपना सामान्य काम फिर कब संभाल सकती है ?

साधारण काम दो हफ्ते बाद फिर आरंभ किए जा सकते हैं| पूरी तरह स्वस्थ होने के लिए आराम और इलाज जरूरी हैं| क्या गर्भपात के बाद इलाज जरूरी है ?

फैले हुए गर्भाशय के सिकुड़ने और संक्रमण की संभावना को कम करने के लिए कुछ इलाज आवश्यक हैं| गर्भपात पूरी तरह हो जाए रक्तस्राव बंद हो जाए तो भी महिला को निकटतम क्लिनिक भेज दें| रक्त की कमी  की स्थिति में आयरन गोलियां दी जा सकती है|

गैर कानूनी गर्भपात

जो गर्भपात एम. टी. पी. (डॉक्टरी सलाह के अनुसार गर्भपात) के नियमों के अंतर्गत न आता हो वह गैर कानूनी है और अपराध माना जाता है| नियमों का उल्लंघन निम्न सूरतों में होता है :

  • गर्भपात कराने वाला डॉक्टर या व्यक्ति प्रशिक्षण प्राप्त नहीं है|
  • गर्भपात का स्थान असुरक्षित व गंदा है और वहाँ जरूरी उपकरण/सुविधाएँ मौजूद नहीं हैं|
  • समय की सीमा (12 और 20 सप्ताह से कम) का ध्यान नहीं रखा गया है|
  • यह गलत कारणों जैसे बालिका भ्रूण हत्या के लिए कराया गया हो|

गर्भधारण की सुनिश्चितता

सुनिश्चित कीजिए की महिला गर्भवती है

आम तौर पर माहवारी रूक जाने से महिला को अपने गर्भवती होने का शक होता है| परंतु उसके ब्याह के कुछ ही दिन हुए हों या सत्रह साल या उससे कम उम्र की हो या उसका मासिक धर्म पूर्व से ही अनियमित हो तो माहवारी का न होना गर्भधारण करने का निश्चित लक्षण नहीं हो सकता|

गर्भवती होने के कुछ सामान्य लक्षण

महिला यदि गर्भवती हो तो गर्भधारण करने के तीन से चार सप्ताह के अंदर कुछ लक्षण प्रकट होंग जो उसके शक की पुष्टि करेंगे| महिला का गर्भवती होना इन लक्षणों से सुनिश्चित हो जाता है :

  • अक्सर महिला का जी मिचलाता है| कभी – कभी उल्टी हो जाती है| सुबह उठाने पर विशेषकर ऐसा होता है|
  • कुछ स्त्रियों को पेट में जलन महसूस होती हो|
  • कुछ महिलाएं हल्के सिर दर्द और थकान की शिकायत करती हैं|
  • स्तनों में भारीपन महसूस होता है| विशेषकर उन महिलाओं को जो पहले बार गर्भवती हुई हों|
  • बार – बार पेशाब करने की इच्छा होती है|

गर्भ की जाँच

महिला गर्भवती है या नहीं- यह जानने का सबसे अच्छा तरीका है गर्भ की जाँच| ऊपर हमने जिन लक्षणों का उल्लेख किया, सच पूछिए तो लक्षण भी गर्भवती होने को पूरी तरह सुनिश्चित नहीं बनाते| यदि महिला वास्तव में गर्भवती है तो गर्भाधान के सात दिन के अंदर उसके शरीर में एक विशेष प्रकार का हार्मोन (हार्मोन रासायनिक द्रव होते है जो शरीर में स्थित कुछ ग्रंथियों द्वारा बनते व छोड़े जाते हैं) बनता है; जो उसके मूत्र में प्रकट हो जाता हैं| ह्यूमन कोर्यनिक गोनाडोट्रोफिन नाम का यह हार्मोन गर्भित डिम्ब की आंवल (प्लेसेंटा) से निकलता है| मूत्र की विशिष्ट जाँच से गर्भ सुनिश्चित हो जाता है| यदि महिला बच्चा चाहती है तो गर्भ की जाँच जरूरी है इसलिए की अगर कोई स्त्री लम्बे समय तक इंतजार करने के बाद गर्भवती हुई तो वह जल्दी ही अपनी स्थिति जान कर संतुष्ट हो सकती है| इसके विपरीत यदि गर्भ अनचाहा है तो वह जल्द से सुरक्षित गर्भपात का निर्णय ले सकती है|

प्रसवपूर्ण देखभाल

कौशल 1 : प्रेगनेंसी स्ट्रिप द्वारा गर्भ की जाँच

प्रेगनेंसी स्ट्रिप द्वारा मसिक बंद होने के 7 दिन के अंदर यह पता लगाया जा सकता है की महिला गर्भवती है या नहीं| इस स्ट्रिप द्वारा महिला के पेशाब में एच. सी. जी. (एक प्रकार का हर्मोन जो गर्भित डिम्ब के आंवल से निकलता और पेशाब में प्रकट होता है) की जाँच की जाती है

पेशाब निम्नलिखित तरीके से जांचा जाता है –

पहला चरण : महिला से कहिए कि वे अपना पेशाब का नमूना रखें| सही जाँच के लिए पेशाब रखते समय निम्न बातों का ध्यान रखना जरूरी है :

  • पेशाब साफ और सूखी शीशी में लिया जाए |
  • पेशाब सबेरे ही लिया जाए|

दुसरे चरण : प्रेगनेंसी स्ट्रिप का इस्तेमाल

  • प्रेगनेंसी स्ट्रिप के पैकेट को ठंडी और अँधेरी जगह पर रखें|
  • जोड़ों में उसे दोनों हाथों से रगड़कर कमरे के सामान्य तापमान पर ले आएं|
  • पैकेट को जाँच के तुरंत पहले ही खोलें|
  • तब प्रेगनेंसी स्ट्रिप को पेशाबी में 3 सेकेंड के लिए डूबायें और 5 मिनट तक प्रतीक्षा करें|

तीसरा चरण :  स्ट्रिप पर उभरी रेखाओं को देखें

अगर स्ट्रिप पर गुलाबी रंग की दो रेखाएं दिखाई दे तो महिला गर्भवती है| अगर केवल एक रेखा दिखाई दे तो वह गर्भवती नहीं है| अगर एक भी लकीर न उभरे तो इसका मतलब यह है की जाँच असफल रही है| नये स्ट्रिप पर पुन: जाँच को असफल माना जाएगा और इसे दुबारा करने की जरूरत होगी|

प्रेगनेंसी स्ट्रिप द्वारा जाँच का परिणाम

 

प्रेगकलर कार्ड जाँच का परिणाम

 

 

 

परिणाम    नियंत्रण

महिला गर्भवती नहीं है

प्रेगकलर कार्ड जाँच का परिणाम

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिणाम    नियंत्रण                     परिणाम    नियंत्रण

  • स्त्री का मासिक धर्म अनियमित रहता हो|
  • जाँच एक सप्ताह से पहले ही कर ली गई हो| हो सकता है एक सप्ताह के बाद दुबारा जाँच करने पर गर्भ की पुष्टि हो जाए|

सलाह

1. लौह की गोलियां

गर्भवती महिला को चाहिए कि वह नाश्ते व दोपहर के खाने के बाद एक – एक लौह की गोली (200 मि. ग्रा. प्रति गोली) लें| स्थानीय तौर पर उपलब्ध किसी भी ब्रांड की गोलियां दी जा सकती हैं| यह दवा महिला के खून हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ाती है| इसे खाने से कभी कभी पेट में जलन मालूम होती है| यह एंटेसिड टिकिया या सिरप लेने से आसानी से दूर हो जाती है महिला को कब्ज हो सकता है और मल का रंग काला हो सकता है| कब्ज के लिए इसबगोल या अमलतास को कब्ज निवारक के रूप में लिया जा सकता है| इनमें से जो भी दवा लेनी हो | उसे सोते समय हल्के गर्म पानी के साथ लें| इसबगोल कुछ मंहगा होगा है| गेंहू की भूसी/चोकर को सत्तू के साथ मिला कर खाना पेट साफ करने का अच्छा उपाय है| लौह की गोलियों को बच्चों की पहुँच से दूर रखें|

 

2. कैल्शियम की गोलियाँ

गर्भवती महिला को 500 मि.ग्रा. की कैल्शियम की दो गोलियां हर रोज खानी चाहिए| कैल्शियम उसके बचे की हड्डियों के लिए जरूरी है| अगर भोजन में पर्याप्त कैल्शियम नहीं है तो उसकी अपनी हड्डियों का कैल्शियम शिशु के लिए खर्च होता है| इसके कारण महिला की हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं| ऐसी महिलाओं को उम्र बढ़ने पर कमर दर्द की शिकायत हो जाती है| हड्डियों में महीन दरारें भी पड़ने लगती हैं|

 

3. महिला को पर्याप्त मात्रा में सही भोजन खाने की सलाह दें

गर्भवती महिला को दिन में पांच बार भोजन करना चाहिए| अगर संभव हो तो वह मांस जरूर खाएँ| हरी पत्तेदार सब्जियाँ जैसे – मेथी, पालक या कोई भी स्थानीय साग उसके लिए लाभकारी हैं| इन्हें लोहे की कढ़ाही में पकाने से वो अधिक असरदार हो जाती हैं| महिला अंडे, दूध, फल जैसे केला, अमरुद, पपीता, शरीफा, सब कुछ खा सकती है| फलों से उसे कैल्शियम मिलेगा| लाल बाजरा (रागी) भी कैल्शियम और लौह का अच्छा स्रोत है|

 

4. गर्भवती महिला को घर पर भरी बोझ न उठाने की सलाह दें

गर्भवती महिला को सर पर भारी बोझ जैसे जलावन की लकड़ी आदि नहीं उठानी चाहिए| उसे दोपहर खाने के बाद रोजाना दो घंटे आराम भी करना चाहिए| परंतु महिला के लिए व्यायाम भी जरूरी है| इससे योनि और टांगों के बीच मांस पेशियाँ मजबूत होती है| गर्भ में बढ़ते शिशु को यही मांसपेशियां सहारा देती हैं| प्रसव के समय इन्हें पूरी ताकत लगानी होती है|

भोजन

गुण

बथुआ, पालक, सरसों, मेथी, अरवी के पत्ते और दूसरी हरी पत्तेदार सब्जियाँ, कोहड़ा, बंद गोभी, गाजर, मूली, शलजम और आलू

विटामिन और खनिज लवण प्रचुर मात्रा में

पपीता, केला, अंगूर, आम, सेव, अनानस, एवं चीकू|

विटामिन और खनिज लवण

मछली/सूखी मछली, बकरे का मांस/मुर्गी अंडा, दूध, धी, पनीर, मूंगफली, राजमा, फ्रेंचबीन, और सभी प्रकार की फलियां|

प्रोटीन

मछली/सूखी मछली, अंडा, बकरे का मांस, केंकड़ा, हरी पत्तेदार सब्जियाँ सभी फलियाँ और दालें, लाल बाजरा, गुड, बंदगोभी, फूलगोभी, शलजम, कद्दू, एवं अनानस |

लौह और फौलिक एसिड (एक आवश्यक तत्व)

दूध, दही, पनीर, तिल, लालबाजरा, बाजरा, फलियाँ, विशेषकर सोयाबीन, शरीफा एवं अमरुद

कैल्शियम

 

 

प्रजनन अंगों में संक्रमण, यौन रोग और एड्स

प्रजनन अंगों में संक्रमण और यौन रोग दोनों बहुत हद तक मिलते जुलते संक्रमण है| प्रत्येक यौन रोग को हम प्रजनन अंगो का संक्रमण कह सकते हैं, परन्तु सभी प्रजनन अंगों के संक्रमण को हम यौन रोग नहीं कह सकते हैं|

प्रजनन अंगों में संक्रमण

यह संक्रमण प्रजनन अंगों में होने वाले संक्रमण है| यह यौन रोग के कारण भी हो सकता है या प्रजनन मार्ग में किटाणुओं से भी हो सकता है|

यौन रोग

जब संभोग के द्वारा प्रजनन अंगों में संक्रमण होता है तो उसे यौन रोग कहते हैं|

1. प्रजनन अंगों में संक्रमण के कारण

  • प्रजनन अंगों को साफ न रखना|
  • बार-बार स्वास्थय खराब होना|
  • किसी दवा या साबुन के इस्तेमाल से किसी प्रकार का घाव, (प्रसव के दौरान किसी दवा की रासायनीक प्रतिक्रिया, संभोग के कारण)
  • संक्रमित व्यक्ति से संभोग के कारण
  • अस्वच्छता से किया गया प्रसव या गर्भपात|
  • माहवारी के समय गंदे पैड (कपड़े) का इस्तेमाल|
  • गंदे जगहों में बैठकर मल-मूत्र त्याग करने से स्त्रियों में ऐसे संक्रमण ज्यादा होते हैं क्योंकि अंगों की बनावट और उनके कार्य (मासिक धर्म, गर्भावस्था, प्रसव) के कारण किटाणु जल्दी प्रवेश करके देर तक पनप सकते हैं|

2. स्त्रियों के प्रजनन अंगों में संक्रमण और यौन रोगों के लक्षण –

  • योनि से बदबूदार गंदा पानी आना|
  • दर्द या बिना दर्द के जननांगों में फूंसियां या घाव|
  • जननांगों में पीड़ा या खुजली होना|
  • संभोग के दौरान पीड़ा या खुजली आना|
  • पेशाब के दौरान पीड़ा या जलन होना|
  • पेडू में नाभि, पेट के निचले हिस्से और यौन अंगों में पीड़ा होना|
  • मासिक धर्म में पहले से ज्यादा या कम खून बहना|

 

3. पुरूषों के प्रजनन अंगों में संक्रमण और यौन रोग के लक्षण –

  • लिंग में घाव या खुजली
  • प्रजनन अंगों में दाने या लाली|
  • लिंग से मवाद गिरना|
  • जांघों में फूली हुई और दर्दनाक गांठे|
  • पेशाब करने में परेशानी और दर्द|
  • संभोग के दौरान पीड़ा|
  • वीर्य में दुर्गन्ध|
  • यौन रोग का फैलना|
  • किसी ऐसे व्यक्ति से संभोग किया जाए जिसे संक्रमण हो|
  • योनि, लिंग, गुदा और मुंह किसी भी मार्ग से संभोग करने से  यौन रोग के किटाणु शरीर में घुसते हैं|

4. यौन रोग के लिए महत्वपूर्ण बातें

  • यौन रोग स्त्री और पुरूष दोनों को हो सकता हैं|
  • संक्रमित व्यक्ति से बिना कंडोम इस्तेमाल किये संभोग करने से दुसरे व्यक्ति को रोग हो सकता है| जितना ज्यादा संभोग करेंगे, रोग की संभावना उतनी ज्यादा होती है|
  • यौन रोगों से कोई सुरक्षित नहीं होता| ये किसी को भी हो सकते हैं|
  • कुछ यौन रोग ऐसे होते हैं जिनके कोई लक्षण नहीं होते, खास तौर पर स्त्रियों में परंतु ऐसे लोग स्वस्थ व्यक्ति को यौन रोग फैला सकते हैं|
  • यौन रोग से संक्रमित व्यक्ति ऊपर से सामान्य नजर आ सकता है|

प्रजनन अंगों में संक्रमण और यौन रोगों का इलाज जल्दी नहीं करने से गंभीर समस्याएँ आ सकती हैं –

  • पति पत्नी में बाँझपन आ सकता है|
  • बच्चेदानी के मुंह में कैंसर की संभावना अधिक होती है जिससे गर्भपात हो सकता हैं, अपंग या मरा हुआ बच्चा पैदा हो सकता है,
  • जन्म के दौरान प्रसव मार्ग में बच्चे की आँखों में संक्रमण हो सकता है जिससे वह अँधा हो सकता है|
  • एच. आई. वी./ एड्स का खतरा आठ से दस गुणा बढ़ सकता है|

 

रोकथाम

  • प्रजनन अंगों में संक्रमण और यौन रोगों की रोकथाम की जा सकती है|
  • प्रजनन अंगों की साफ-सफाई पर ध्यान दें खास कर माहवारी के दिनों में |
  • सहवास जीवन साथी के साथ ही करें|
  • कंडोम का इस्तेमाल करें|
  • अगर  पति- पत्नी में से किसी एक को ये लक्षण उभरे तो अवश्य जाँच कराएँ तथा पूरा इलाज करायें|
  • प्रजनन अंगों में संक्रमण तथा यौन रोगों का ज्यादातर इलाज संभव है| इन रोगों की पहचान अगर जल्दी किया जाए| और इलाज कराया जाए तो गंभीर समस्याओं जैसे- स्त्री – पुरूषों में होने वाली प्रजनन क्षमता की कमी को कम किया जा सकता है|

एड्स

यौन रोगों में सबसे खतरनाक बीमारी है एड्स जो एक जानलेवा बीमारी है और यह सारी दुनिया में तेजी से फ़ैल रही है|

यह बीमारी एक जीवाणु एच.आई.वी. के द्वारा फैलता है| किसी भी स्वथ्य व्यक्ति में यदि यह वायरस प्रवेश कर जाए तो ये बढ़ते जाते हैं और धीरे- धीरे रक्त के सफेद कणों में घुसकर उन्हें नष्ट करे देते हैं इससे शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता खत्म हो जाती है| जिस व्यक्ति में एच. आई. वी. प्रवेश कर चुके हों वह व्यक्ति 2 से 10 वर्षों तक ऊपर से सामान्य लग सकता हैं पर उसके बाद उस में रोगों से लड़ने की ताकत घटती जाती है| शरीर में प्रतिरोध करने की ताकत घट जाने उस व्यक्ति को कोई भी बीमारी लग सकती हैं| क्योंकि उसके शरीर में संक्रमणों से संघर्ष करने की शक्ति नहीं बचती है| इस स्थिति को एड्स कहते हैं|

एड्स में एक साथ कई बीमारियों के लक्षण उभरते हैं इसलिए उसे सिंड्रोम (कई लक्षणों का समूह)  कहते हैं| एड्स जानलेवा होता है| इसका इलाज नहीं हैं| सिर्फ रोकथाम की जा सकती है|

एच. आई. वी. हमारी प्रतिरोधक क्षमता को कैसे कमजोर करता है –

  • हमारी प्रतिरोधक प्रणाली जो हमेशा बीमारी से लड़ने के लिए तैयार रहती है|
  • हमारा सफेद रक्तकण किटाणुओं को मारता है जो हमारे शरीर में प्रवेश करना चाहते हैं|
  • एच. आई. वी. हमारी प्रतिरोधक प्रणाली को कमजोर करने के लिए सफेद रक्तकणों को खत्म करना है|
  • एच. आई. वी. हमारे शरीर को संक्रमण से बचाने वाली प्रतिरोधक क्षमता को रोक देती है|
  • हमारे प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने से जीवाणु और किटाणु हमारे शरीर में प्रेवश करते हैं और हम बीमार पड़ जाते हैं|

1. एच. आई. वी. हमारे में कैसे प्रवेश कर सकते हैं –

  • संक्रमित व्यक्ति से बिना कंडोम इस्तेमाल किए सहवास करने से|
  • एच. आई. वी. से संक्रमित खून चढ़ाने से|
  • वैसी सूई, सिरिंज या अन्य औजारों का इस्तेमाल करने पर जिनका प्रयोग एच. आई. वी. से संक्रमित व्यक्ति कर चुका है|
  • संक्रमित माता से गर्भावस्था में ही उसके बच्चे में एच. आई. वी. प्रवेश कर सकता है|

2. एच. आई. वी. के बारे में महत्त्वपूर्ण  बातें –

  • एच. आई. वी. के प्रवेश का सबसे आम जरिया असुरक्षित संभोग है|
  • जिनके पहले से ही कोई यौन रोग हो, उन्हें इस संक्रमण की संभावना आठ से दस गुणा तक बढ़ जाती है|
  • जिन्हें एच. आई. वी. संक्रमण होता है, वह सामान्य लगते हैं और उनमें योनिस्राव, छाले या मवाद जैसे लक्षण नहीं दिखाई पड़ते है, जबकि अन्य यौन रोगों में ये नजर आते हैं| लेकिन वे औरों को यह संक्रमण दे सकते हैं| क्योंकि एच. आई. वी. उनके रक्त और यौन द्रवों में मौजूद रहता है|
  • अगर किसी माँ में एच. आई. वी. हो नतो उसका दूध पीने पर शिशु को भी यह लग सकता है|

3. एड्स नहीं फैलता है –

  • मच्छर या खटमल के काटने से|
  • साथ खेलने से|
  • एक कार्यशाला में एक ही मशीन या औजार से काम करने से|
  • खांसने या छींकने से|
  • शौचालय के इस्तेमाल से|
  • भीड़ में लोगों के साथ होने से|
  • साथ खाने या बर्त्तन के इस्तेमाल से|
  • हाथ मिलाने या हाथ पकड़ने से|
  • किसी को बाहोँ में भरने या चूमने से|
  • एक साथ तैरने या खेलने से|
  • एड्स के रोगी के पास बैठने या उसकी देख-भाल करने से |
  • संक्रमणरहित सूई से रक्तदान करने से|

एड्स के लक्षण

  • एक महीने से लगातार खाँसी जिसका संबंध बीड़ी सिगरेट पीने या अन्य चीजों से न हो|
  • खुजली के साथ दाने/चकत्ते|
  • पूरे शरीर पर पिड़ाराहित दाने|
  • तीन महीने से भी ज्यादा समय तक जांघ के अलावा दो तीन जगहों पर गाँठे होना|
  • शरीर का वजन बहुत अधिक घट जाना|
  • एक महीने से भी ज्यादा समय से बुखार आना|
  • लगातार बेहद थकान होना|
  • रात को अधिक पसीना आना|
  • एक महीने से अधिक समय, जब – तब या लगातार दस्त होना|
  • 2 से दस वर्षों की अवधि में, एच. आई. वी. से ग्रस्त व्यक्ति की रोगों से लड़ने के क्षमता धीरे- धीरे चरमरा जाती है|

एड्स से कैसे बचा जा सकता है

  • एक जीवनसाथी से भरोसेमंद संबंध रखना और संक्रमण रहित व्यक्ति से सहवास करना|
  • जब बी सहवास करें, कंडोम का इस्तेमाल करें|
  • संक्रमित सिरिंज और सुईयों का प्रयोग न करें|
  • शरीर में गोदना स्वस्छ और किटाणुरत रहित औजार से कराएँ|
  • जितना संभव हो स्वस्थ रहा जाए, जिससे कि रक्त चढ़ाने की जरूरत न पड़े| कुपोषण गर्भावस्था के कारण खून की कमी न होने पाये| यदि रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़े तो पहले निश्चित कर लें कि दाता एच. आई. वी. तो नहीं|
  • यौन रोगों का इलाज शीघ्र करायें|
  • अधिक व्यक्तियों के साथ सहवास से खतरा अधिक होता है|
  • गुदा मैथुन से बचें इससे एच. आई. वी. के शरीर में प्रवेश का बहुत अधिक खतरा रहता है|

अभी तक एड्स से बचाव के लिए कोई दवा या टिका नहीं है| कुछ उपाय हैं जिससे एड्स और एच. आई. वी. की तकलीफ से बचा जा सकता है –

  • तबियत ख़राब होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखलाएं जैसे- मुंह के छाले,  निमोनिया इत्यादि|
  • संतुलित भोजन करें|
  • आराम और पूरी नींद लें|
  • निश्चित रहें और अपने खाली समय को खुशी से बितायें|
  • अपने शरीर का पूरा ध्यान दे|
  • अपनी मानसिक और आत्मिक शक्ति को बढ़ायें|
  • ज्यादा सिगरेट न पीयें|
  • अधिक चिंता और परेशानी से बचें|
  • संक्रमण से बचाव करें|
  • बिना कंडोम के संभोग न करें|
  • एड्स से बचाव ही इसका इलाज है|

 

एड्स संबंधी सामान्य प्रश्नोत्तरी

प्रश्न :- एच. आई. वी. आया कहाँ से सबसे पहले इसका कैसे और कहाँ पता चला? भारत में यह कब आया ?

उत्तर :  यह एक बड़ी भरी उलझन है जिसका अभी तक चिकित्सा जगत में पास कोई निश्चित उत्तर नहीं है| कुछ लोग कहते हैं कि एच. आई. वी. बंदरों/ चिपंजियों से मनुष्यों में आया, जबकि कुछ का विचार है कि पहले से ही वातावरण में घूम रहे किसी विषाणु (वायरस) में ही कुछ ऐसे परिवर्तन आए जिनके कारण वही विषाणु एच. आई. वी. में परिवर्तन हो गया है| खैर, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि  एच. आई. वी. सबसे पहले आया कहाँ से| महत्वपूर्ण बात तो यह है कि एच. आई. वी. अब मौजूद है और हम सबके लिए एक बड़ा खतरा बन गया है|

विश्व में सर्वप्रथम सन 1981 में इस वायरस का अमेरिका में पता चला था| शुरू में इसे कई अन्य नामों में जाना गया था परन्तु अब इसका एक ही नाम है - एच. आई. वी.| भारत में एच. आई. वी.की पहचान पहली बार 1986 में मुम्बई के एक व्यापारी में हुई थी| तभी से, भारत में एच. आई. वी. पॉजिटिव लोगों और एड्स रोगियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही है| एक अनुमान के अनुसार 2005 तक पूरे विश्व एच. आई. वी. पोजेटिव व्यक्तियों व एड्स रोगियों की सर्वाधिक संख्या भारत में होती| यह चिंता का विषय है|

प्रश्न : क्या दांत उखड़वाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले औजारों से एच. आई. वी./एड्स फैला सकते हैं|

उत्तर : जी हाँ यदि ऐसे औजार ठीक से किटाणु रहित नहीं किए गए हो, तो ये एच. आई. वी./एड्स फ़ैल सकते हैं|

प्रश्न : एच. आई. वी. में “विंडो पीरियड” क्या और कितना होता है?

उत्तर : जब एच. आई. वी. किसी के शरीर में प्रवेश करता है तो उसकी उपस्थिति का पता लगाने के लिए किए जाने वाले रक्त टेस्ट (जैसे – एलाइसटेस्ट) तुरंत यह पता नहीं लगा सकते हैं की किसी के शरीर में एच. आई. वी. है या नहीं| एच. आई. वी. के शरीर में प्रवेश करने से लेकर टेस्ट द्वारा उसकी उपस्थिति पता लगाए जा सकने तक के बीच के समय जो ही विंडो पीरियड कहते हैं| एच. आई. वी. के लिए यह आम तौर पर 3 महीने का माना जाता है पहली तो समझने की बात यह है कि विंडो पीरियड में एच. आई. वी. टेस्ट निगेटिव आ सकता है (जबकि एच. आई. वी. संक्रमण शरीर में मौजूद है) इस दौरान किए जाने वाले टेस्ट “ फ़ॉल्स निगेटिव” आ सकते हैं और व्यक्ति गलतफहमी में रह जाता है| दूसरी बात यह है कि विंडो  पीरियड में भी ऐसा व्यक्ति दूसरों को एच. आई. वी. संक्रमण फ़ैलाने में सक्षम है|

प्रश्न : किसी के गाल पर चुम्बन लेने क्या एड्स हो सकता है?

उत्तर : किसी गाल पर चुम्बन लेने से एड्स नहीं हो सकता है|

प्रश्न : यह कहा जाता है लार में एच. आई. वी. होता है| यदि ऐसा है तो हम अगर किसी एच. आई. वी. पॉजिटिव  व्यक्ति के साथ – उसी के बर्तन से भोजन खाएँगे तो क्या हमें एड्स नहीं हो जाएगा|

उत्तर : यह सही है कि मनुष्य की लार में एच. आई. वी. होता है परन्तु इसमें एच. आई. वी. की मात्रा इतनी कम होती है कि वह एच. आई. वी. संक्रमण फैलाने के लिए पर्याप्त नहीं है| इसके के साथ – साथ, लार में कुछ ऐसे रासायनिक पदार्थ होतें हैं जो कि उसमें उपस्थित एच. आई. वी. को नष्ट भी कर देते हैं| यही कारण है कि लार से एच. आई. वी. नहीं फैलता| और आप अगर चाहें तो, बिना किसी डर के, एच. आई. वी. पाजिटिव व्यक्ति के बर्तन से उसके साथ भोजन का सकते हैं|

प्रश्न : क्या गर्भवती महिला को भी असुरक्षित यौन संबंधों से एड्स हो सकता है अर्थात यदि वह बिना निरोध प्रयोग के किसी अन्य व्यक्ति से संभोग करती है?

उत्तर : जी हाँ, गर्भवती महिला को भी ऐसे सेक्स संबंधों से एड्स का उतना ही खतरा है जितना किसी भी अन्य महिला को|

प्रश्न : मैं महिला हूँ| लगभग 15 दिन पहले किसी अन्य व्यक्ति ने स्तन दबाए थे| क्या ऐसा करने से मुझे एड्स हो सकत है?

उत्तर : नहीं| ऐसा करने से एड्स नहीं हो सकता है|

प्रश्न : मैं एक से 19 वर्षीय लड़का हूँ तथा पिछले 1 वर्ष से अपने एक मित्र गुदा मैथुन करता हूँ| क्या इससे मुझे एड्स हो सकता है? मुझे मालूम नहीं है कि मेरा मित्र एड्स से ग्रस्त है या नहीं|

उत्तर : जी हाँ, यद गुदा – मैथुन में आप कंडोम का सही व पूर्ण प्रयोग नहीं करते हैं और आपका मित्र एच. आई. वी. पॉजिटिव है तो आपको एच. आई. वी. संक्रमण तथा एड्स होने का खतरा है आपका मित्र एच. आई. वी. पॉजिटिव है या नहीं, इसका पता तो केवल उसके रक्त की जाँच करके ही किया जा सकता है|

प्रश्न : एड्स का वायरस किसी व्यक्ति के शरीर से बाहर आने पर (जैसे की खून की बूँद या वीर्य में) कितनी देर तक जीवित रहता है?

उत्तर : एक अच्छी बात है कि एच. आई. वी. अत्यंत नाजुक वायरस है; जो कि वातावरण में आने पर 5-6 मिनट में स्वयं ही मर जाता है| एंटीसेप्टिक घोल जैसे कि- डेटोल, एल्कोहल , ईथर आदि के (शरीर के बाहर) संपर्क में आने पर यह और भी जल्दी मर जाता है| यह भी जान लीजिए कि केवल जीवित एच. आई. वी. वायरस ही एड्स फैला सकता है|

प्रश्न : यदि किसी के शरीर में एच. आई. वी. प्रवेश कर जाए तो क्या उस व्यक्ति का सारा खून बदल कर एच. आई. वी. को बहार नहीं निकाला जा सकता?

उत्तर: विचार तो अच्छा है परंतु चिकित्सा विज्ञान में अभी तक ऐसा करना संभव नहीं हो पाया है क्योंकि यह व्यवहारिक नहीं है| इसके अतिरिक्त एच. आई. वी. शरीर में केवल खून में ही नहीं होता है, अन्य अंगों में भी यह पाया जाता है| कहाँ – कहाँ में इसे हटायेंगे?

प्रश्न : यदि किसी का एलाइसा टेस्ट एच. आई. वी. के लिए पॉजिटिव है तो क्या वह व्यक्ति निश्चित रूप से एच. आई. वी. पॉजिटिव है?

उत्तर : नहीं यदि एलाइसा टेस्ट एच. आई. वी. के लिए पॉजिटिव है तो इसे कन्फर्म करने के लिए वेस्टर्न ब्लॉट टेस्ट कराना अति आवश्यक है| वैस्टर्न ब्लॉट के पॉजिटिव आने पर ही उसे व्यक्ति को एच. आई. वी. पॉजिटिव कहा जा सकता है|

प्रश्न: जब भी मैं अपने बाल कटवाने जाता हूँ| तो नाई इसके लिए अपना उस्तरा भी मुझे पर प्रयोग करता है| एक व्यक्ति के साथ काटकर वह उस्तरे को धोता भी नहीं है| क्या इससे एड्स फैलने का खतरा है?

उत्तर : यह एक दिलचस्प प्रश्न है जो हम सबके लिए महत्वपूर्ण है| नाई के उस्तरे से एड्स तभी फ़ैल सकता है जबकि –

1) पहले नाई ने उस्तरा किसी एच. आई. वी. व्यक्ति पर प्रयोग किया हो और प्रयोग करते समय उसने उसे एच. आई. वी. ग्राहक की चमड़ी पर कट लगा दिया हो जिससे खून निकलकर उस उस्तरे पर लग गया हो|

2) उसने उसी उस्तरे को, बैगर धोए, अगले 4-5 मिनट में अगले ग्राहक पर प्रयोग किया हो तथा उसी उस्तरे से इस ग्राहक की खाल पर भी कट लग गया हो और उस्तरे पर (पहले ग्राहक के कट से) लगा हुआ खून दूसरे ग्राहक के कट में जा मिला हो|

ये सारी घटनाएँ बिल्कुल इसे हों तो एड्स हो सकता है अन्यथा नहीं| प्रैक्टिकल रूप से कहें तो इन सारी घटनाओं का संयोग होना थोड़ी सी मुश्किल बात है| फिर भी, अपने बचाव के लिए नाइ से कहिए कि आप पर प्रयोग करने से पहले वह उस्तरे को किसी एंटीसेप्टिक घोल (जैसे डेटोल) से अच्छी तरह दो ले या फिर एक बिल्कुल नया ब्लेड बदल कर उस्तरे का प्रयोग करे| आप अपना ब्लेड अपने साथ भी ले जा सकते है|

प्रश्न : मेरे एक नजदीकी रिश्तेदार को एच. आई. वी. पॉजिटिव पाया गया है| अभी तक उसे कोई लक्षण नहीं है| ऐसे में उसकी देखभाल के लिए हमें और उसे क्या करना चाहिए?

उत्तर : जैसा की आप जानते हैं एच. आई. वी. पॉजिटिव व्यक्ति को देर-सवेर एड्स रोग के लक्षण तो आवश्य ही होगें| जब तक ये लक्षण पैदा नहीं होते, अच्छी बात है| जब तक किसी एच. आई. वी. पॉजिटिव व्यक्ति को लक्षणा पैदा नहीं होते तब उसकी देखभाल में यह सब होना चाहिए –

1)      पौष्टिक आहार लें व नियमित रूप से हल्का-फुल्का व्यायाम करें| इससे शरीर तंदरूस्त बना रहेगा और संक्रमण से बचाव में आसानी होगी|

2)      प्रतिदिन विटामिन सी युक्त खाद्य पदार्थ आवश्य लें (जैसे – नींबू मौसमी, संतरा, आवंला, अमरूद) विटामिन “सी” की एक गोली भी ले सकते हैं| इससे रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है|

3)      यौन संबंध बनाते समय – ऐसे व्यक्ति को हमेशा कंडोम को प्रयोग करना चाहिए|

4)      ऐसे व्यक्ति को स्वयं चाहिए की वह अपना ब्लेड, रेजर, टूथब्रश, शेविंग मशीन जैसे व्यक्तिगत सामान किसी अन्य को प्रयोग न करने दे|

5)      अपनी जीवन शैली सन्तुलित बनाइए| दिनचर्या को नियमित करिए| समय पर जागने व सोने की आदत डालिए| शराब व धूम्रपान से रहें|

6)      ऐसे लोगों से दूर ही रहें या उनसे बचाव के लिए उचित सावधानियाँ बरतें जिन्हें खाँसी आदि हैं|

7)      अपनी आर्थिक स्थिति का ध्यान करें| अपनी सम्पति व पैसे के लेन-देन आदि का अपनी पत्नी / पति/ घर के किसी अन्य सदस्य को विस्तृत विवरण देकर रखें|

8)      योग, मेडिटेशन आई के माध्यम से ध्यान लगाना सीखें| इससे माँ शांत रखने में बेहद सहायता मिलेग| यदि पूजा-पाठ करते हैं तो उससे भी चित्त शांत होता है| अपनी स्थिति के बारे में चिंता करने से स्थिति और भी ख़राब होगी| इसका क्या फायदा?

9)      प्रसन्नचित रहें व पढ़ने – लिखने, बागवानी या अपने किसी अन्य शौक में दिल लगाएँ|

10)  सारांश में कहें तो जो समय ऐसे व्यक्ति के पास बचा है, उसका भरपूर लाभ उठाकर एक सामान्य जीवन बिताने का प्रयास करें| मित्रों व परिवारजनों को ऐसे व्यक्ति के साथ सामान्य व प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिए| उसका तिरस्कार न करें| ऐसे व्यक्ति को दया व सहानूभूति नहीं बल्कि सामान्य प्रेमपूर्ण व्यवहार चाहिए|

प्रश्न : यदि कोई  सामान्य, स्वस्थ्य पुरूष किसी ऐसी महिला से, बिना कंडोम प्रयोग के हुए सेक्स करता है; जो कि एच. आई. वी. पॉजिटिव है तो कितनी बार सेक्स के बाद पुरूष को एच. आई. वी. संक्रमण की संभावना हो जाती है?

यदि ऐसे सेक्स संबंध के समय पुरूष के लिंग पर कोई कट, जख्म या खरोंच आदि नहीं है तो ऐसे पुरूष के शरीर में लिंग के माध्यम से एच. आई. वी. कैसे प्रवेश कर सकता है?

उत्तर : यह एक अत्यंत दिलचस्प प्रश्न है| यदि कोई सामान्य पुरूष किसी एच. आई. वी. पॉजिटिव महिला से बिना कंडोम के सेक्स संबंध बनाता  है तो कहा तो यह जाता की लगभग 80-100 बार संबंध बनाने से केवल 1 बार ही ऐसा हो सकता है कि पुरूष को उस महिला से एच. आई. वी. संक्रमण हो जाए| लेकिन जरा रुकिए| किसी को यह कैसे पता चलेगा कि वह एक संबंध कौन सा वाला है? चूंकि ऐसा पता नहीं चल सकता है, इसलिए हर ऐसे संबंध को खतरे वाला संबंध माना जाता है|

एच. आई. वी. पॉजिटिव महिला की योनि में स्रावों (द्रवों में  एच. आई. वी. की मात्रा काफी बहुतायत में होती है| जब बिना कंडोम के सेक्स किया जाता है तो यह एच. आई. वी. लिंग के अगले भाग पर उपस्थित कुछ सूक्ष्म रिसेप्टर्स पर चिपक जाता हैं और इन्हीं रिसेप्टर्स के माध्यम से लिंग के अंदर की खून की नालियों में पहुंच जाता है| वहाँ से यह सारे शरीर में फ़ैल जाता है| इस प्रकार हम देखते हैं कि लिंग पर बिना किसी जख्म, घाव, कट आदि के भी एच. आई. वी. संक्रमण हो सकता है|

एड्स फ़ैलाने के कारण

  • दूषित सिरिंज या सूई
  • एच. आई. वी. संक्रमित खून, वीर्य तथा योनि स्राव
  • नाई का उस्तरा या ब्लेड जो एच. आई. वी. संक्रमित आदमी पर प्रयोग किया गया है|
  • असुरक्षित यौन संबंध, बहूगामी स्त्री या पुरूष

पत्नी छोड़ कहीं न जाओ, एड्स को अपने घर  न लाओ|

भावी एड्स से बचाव का है राज, यौन रोगों का तुरंत करो इलाज

प्रजनन अंगों के संक्रमण और यौन रोग स्त्रियों में

पुरूषों और स्त्रियों की प्रजनन प्रणाली यानी प्रजनन के रास्तों में संक्रमण कई लक्षणों के रूप में उभरते हैं| यह संक्रमण तब होते हैं जब प्रजनन मार्ग में कोई किटाणु प्रवेश कर जाए| ये अंगों में स्वत: पाये जाने वाले किटाणुओं से भी हो जाते हैं हब इनकी संख्या बहुत बढ़ जाती है|

प्रजनन अंगों में निम्न कारणों से संक्रमण हो सकता है :

साधारण रूप से ख़राब स्वास्थ्य से:

  • अगर अनिंद्रा, कुपोषण और तनावों से स्वास्थ्य ख़राब हो जाए तो शरीर में इतनी ताकत नहीं बचती कि वह संक्रमण को रोक सके|

प्रजनन अंगों की अस्वच्छता से

  • प्रजनन अंगों को स्वच्छ रखने के उपाय न किए गए हो, मसलन यदि अंडरवियर साफ न हो, पैड बदलने या निकालने की याद न रहे, पखाने के बाद पीछे से सामने की ओर धुलाई की जाए|
  • कुछ साबुनों के इस्तेमाल से या ऐसे फर्फ्यूम या सुगन्धियों से जो त्वचा को नुकसान पहूँचाने वाले हों|
  • कुछ दवाएँ (एंटीबायोटिक) जो योनि के स्वास्थय की सुरक्षा करने वाले सामान्य बैक्टीरिया को नष्ट करते हों|
  • जिस व्यक्ति को संक्रमण हो उससे संभोग करने पर|
  • यदि कोई जख्म हो (प्रसव से, संभोग से या रासायनिकों के इस्तेमाल इत्यादि से)
  • स्वास्थय सेवाएँ सुलभ कराने वालों की अस्वच्छ कार्यों से (अस्वच्छ तरीकों से कराया गाय प्रसव, या गर्भपात या संक्रमित कॉपर टी लगाने से)

स्त्रियों के यौन रोग आम तौर पर ज्यादा होते हैं क्योंकि उनके शरीर की बनावट, और उसकी प्रणाली ही कुछ ऐसी है (जैसे मासिक धर्म, गर्भावस्था और प्रसव) कि उसमें रोगों की किटाणु जल्दी प्रवेश कर जाते हैं, और देर तक पनपते रह सकते हैं|

जो स्त्रियाँ इस उम्र की होती हैं कि बच्चे जन सकें, उनमें से प्राय: सभी में, प्रजनन अंगों का कोई न कोई संक्रमण देखने में आता है| जब ये संक्रमण उन तक संभोग के कारण पहुंचते हैं तो इन्हें यौन रोग कहा जाता है|

प्रजनन अंगों में संक्रमण/यौन रोग के लक्षण महिलाओं में

  • योनि से दुर्गन्धयुक्त, असामान्य स्राव|
  • पेडू में, नाभि  और यौन अंगों के बीच पीड़ा पेट के निचले हिस्से में पीड़ा|
  • पीड़ा के साथ या बिना पीड़ा में जननेद्रिय में फूंसियां या घाव|
  • जांघों में फूली हुए और पीड़ादायक गांठ|
  • संभोग के दौरान पीड़ा या जलन|
  • पेशाब के दौरान पीड़ा या खुजली|
  • जननेद्रियाँ में पीड़ा या खुजली|
  • मासिक धर्म का स्राव में परिवर्तन, योनि या तो ज्यादा खून बहना या कम खून बहना|

पुरूषों में

  • प्रजनन अंगों में दाने या लालिमा|
  • लिंग पर घाव|
  • लिंग से मवाद गिरना|
  • जांघों में फूली हुई|
  • पेशाब में पीड़ा, पेशाब करने में कठिनाई|
  • संभोग के दौरान पीड़ा|

1. सामान्य और असामान्य योनि स्राव का फर्क:

योनि से सामान्य स्राव गर्भाशय के द्वार से साफ श्लेष्मा के रूप में निकलता है| इसकी मात्रा बढ़ती जाती है और अंडा विसर्जन के वक्त योनि चक्र के बीच में यह पतली हो जाती है| योनि की दीवारों से निकलने वाला साफ स्राव, यौन उत्तेजना और भावावेग के समय और बढ़ जाता है| इसमें देह की सामान्य गंध होती है|

असामान्य स्राव की गंध अच्छी नहीं होती| रंग असामान्य होता है| यह जब तब होने लगता है और अक्सर जनेनेंद्निया में और उनके आसपास खुजलाहट और ललाई पैदा करता है|

2. यौन रोग कैसे फैलते हैं?

यौन रोग तब होता है, फैलता है जब किसी ऐसे व्यक्ति के साथ संभोग किया जाए जिसे संक्रमण हो और संभोग के दौरान न अपनाया गया हो, जो संक्रमण से बचाव कर सके| भले ही यह संभोग योनि या गुदा या मुंह में क्या गया हो| योनि, लिंग, गुदा और मुंह वे मार्ग हैं, जिनसे होकर यौन रोग के किटाणुओं को शरीर आक्रमण करने में सुविधा होती है|

3. यौन रोगों को लेकर खास हिदायतें :

  • यौन रोग स्त्री और पुरूष दोनों को हो सकते हैं|
  • अगर बिना बचाव के एक बार भी किसी ऐसे व्यक्ति से संभोग किया जाए जिसे रोग हो तो वह दुसरे को भी हो सकता है| स्त्री/पुरूष, बिना कोई सुरक्षित तरीका अपनाए जितना ज्यादा संभोग करेंगे, उन्हें यौन रोग होने की आशंका उतनी ज्यादा रहेगी|
  • यौन रोगों से कोई सुरक्षित नहीं होता|
  • यह ध्यान में रखना जरूरी है कि कुछ यौन रोग ऐसे भी होते हैं, जिनके लक्षण ऊपर से पहचान में नहीं आते, खास तौर पर स्त्रियों में| लेकिन छिपे रहकर भी ये रोगाणु अपना काम करते रहते हैं और किसी ऐसे व्यक्ति में यौन रोग फैला सकते हैं जो स्वयं स्वस्थ हो|
  • किसी को यौन रोग है या नहीं, यह देखने भर से पता नहीं चल सकता| क्योंकी स्त्री/पुरूष जिसे कोई यौन रोग हो, ऊपर से सामान्य लग सकती/सकता है|

4. यौन रोगों के रोकथाम:

इन रोगों से बचाव के लिए कोई ऐसा टिका या दवा नहीं है किसे ले लेने पर इनसे सुरक्षित हुआ जा सके| हाँ, ऐसे कुछ तरीके जरूर हैं, जिन्हें अपनाने से यौन रोग होने की आशंका कम हो जाती है| मसलन :

  • अपरिचित व्यक्ति के साथ संभोग न करें|
  • सहवास जीवन – साथी के साथ ही करें|
  • सहवास करने वाले दोनों ही जीवन- साथियों में जिसको भी यौन रोग हो, उसका इलाज करें|
  • कंडोम का इस्तेमाल करें|
  • अगर कोई भी लक्षण मौजूद हैं तो सहवास से बचें|
  • स्त्रियाँ शुक्राणुनाशक का इस्तेमाल करें|
  • प्रजनन अंगों की जाँच स्वयं करते रह जिससे की संक्रमण होने पर उन्हें शीघ्र पता चल जाए|

5. प्रजनन अंगों में संक्रमण/ यौन रोगों से उत्पन्न समास्याएं:

प्रजनन अंगों में संक्रमण और रोगों का अगर इलाज न किया जाए तो गंभीर समस्याएँ पैदा हो सकती हैं|

  • जैसे : पुरूषों और स्त्रियों में संतान पैदा करने की क्षमता न रहना|
  • अगर यौन-संसर्ग में सावधानी बरती जाए तो एच. आई, वी./एड्स का खतरा आठ से दस गुणा तक बढ़ जाता है|
  • गर्भाशय के मुंह का कैंसर होने का अधिक खतरा|
  • गर्भधारण के बुरे नतीजे, यानी  गर्भपात, मरा हुआ बच्चा या जन्म से ही शिशु में शरीरिक दोष|
  • प्रसव के समय, नवजात शिशु का माँ के प्रसव मार्ग से आँखों का संक्रमण हो सकता है और वह अँधा हो सकता है|

6. प्रजनन  अंगों में संक्रमण/यौन रोगों से संबंधित खास हिदायतें :

  • प्रजनन अंगो के सभी संक्रमणों/यौन रोगों की रोकथाम की जा सकती है|
  • प्रजनन अंगों के ज्यादातर संक्रमणों/यौन रोगों का इलाज संभव है|
  • इन रोगों की पहचान अगर जल्दी कर ली जाए और तत्काल ही उनका इलाज करा लिया जाए, तो गंभीर समस्याओं का कम किया जा सकता है, मसलन स्त्री पुरूष दोनों में होने वाली प्रजनन क्षमता की कमी को|

7. यौन रोगों से संबंधित भ्रांतियां और सच्चाईयां

भ्रांति : यौन रोग ईश्वर का अभिशाप है|

सच :  यौन रोग किटाणुओं से होते है, ये किटाणु यौन संसर्ग से शरीर में प्रेवश करते हैं, अगर सवास के वक्त सुरक्षित तरीके अपनाएं जाएँ तो इन्हें रोका जा सकता है|

भ्रांति : यौन रोग से पीड़ित पुरूष अगर किसी कुंआरी लड़की से सहवास करें तो यौन रोग से उसे छूटकारा मिला जाएगा|

सच : यौन समस्याओं का इलाज दवाओं से ही संभव है, इसलिए जल्दी से जल्द डॉक्टर की मदद लेनी चाहिए|

भ्रांति : यौन रोग समय के साथ अपने आप ठीक हो जाते है और उसके इलाज के लिए ज्यादा कुछ किया नहीं जा सकता है|

सच : यौन रोग दवाओं से ही ठीक होते हैं| हो सकता है कि इलाज किए बिना भी, उसके कुछ लक्षण दूर जाएँ पर संक्रमण के किटाणु शरीर में ही मौजूद रहते हैं और आगे चलकर गंभीर समस्या उत्पन्न कर सकते हैं|

भ्रांति :  अगर किसी स्त्री को यौन रोग है तो वह ‘चरित्रहीन’ है, और अपने पति से उसे जरूर ही विश्वासघात किया है|

सच :   आमतौर स्त्रियों को यौन रोग अपने पति से ही मिलते है, जो सुरक्षा का कोई तरीका अपनाए बिना, किसी संक्रामक रोग से ग्रस्त व्यक्ति से सहवास कर बैठते है

भ्रांति :  जिस यौन रोग हो उसे अपने पत्नी/पति से इसे छिपाकर रखना चाहिए|

सच :   रोग के इलाज के लिए जरूरी है कि दोनों का ही इलाज के लिए यह जरूरी है कि दोनों का ही इलाज किया जाए| मान लीजिए अगर कोई पुरूष बिना अपनी पत्नी को बताए अपने यौन रोग का इलाज कराता है तो उसे अपनी पत्नी के साथ सहवास करने पर यही रोग फिर से लग सकता है, क्योंकी जब तक पत्नी का भी इलाज न हो जाए तब तक रोग का किटाणु तो पत्नी के शरीर में मौजूद रहते हैं|

भ्रांति : पुरूषों को केवल वेश्याओं के साथ सहवास के दौरान कंडोम का इस्तेमाल करना चाहिए|

सच : पुरूषों को कंडोम का इस्तेमाल स्वयं अपने को, अपनी पत्नी को, और बच्चों को यौन रोगों और उसे पैदा होने वाली समस्याओं से बचाने के लिए करना चाहिए|

भ्रांति : अगर आप अपने प्रजनन अंगो के किसी संक्रमण से पीड़ित है, तो आपको इस की चर्चा किसी से ही करनी चाहिए|

सच : प्रजनन अंगों की कोई भी बीमारी, शरीर के किसी भी अन्य हिस्से में होने वाली बीमारियों के सामान है| इसके लिए डॉक्टरी मदद और सलाह आवश्य लेनी चाहिए|

प्रजनन तंत्र संक्रमण व यौन रोग से जुड़ी बातें

प्रजनन तंत्र संक्रमण

  • यह विभिन्न रोगाणु द्वारा होते हैं
  • ये यौन क्रिया, या बिना यौन क्रिया के हो सकते हैं
  • यौन संबंध से फ़ैलाने वाले संक्रमण को गुप्त/यौन रोग कहते हैं

स्त्रियों में निम्नलिखित प्रजनन अंगों में संक्रमण हो सकता है :

1. बाहरी जनेनेंद्निया

2. योनि

3. सर्विक्स (गर्भाशय का मुख)

4. अंडवाहिनी नली

5. अंडकोष

पुरूषों में निम्नलिखित प्रजनन अंगों में संक्रमण हो सकता है:

1. लिंग

2. अंडकोष

3. अंडकोष के थैली

  • प्रजनन तंत्र संक्रमण के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं :

1. कमजोर स्वास्थय

2. बाहरी जनेनेंद्निया की साफ़ सफाई का ध्यान न रखना

3. प्रजनन अंगों में घाव

4. अस्वच्छ /गलत तरीके से प्रसव या गर्भपात होना, या कॉपर - टी लगना

5. संक्रमित इंसान के साथ यौन संभोग

  • महिलाओं में निम्नलिखित प्रजनन तंत्र संक्रमण बिना यौन संपर्क के होते हैं :

1. योनि के सामान्य स्राव की मात्रा में बदलाव

2. प्रसूति व गर्भपात के बाद के संक्रमण

3. असुरक्षित गर्भपात, अस्वस्थ्य तरीके से कॉपर – टी लगवाने के बाद के संक्रमण

  • पुरूषों में निम्नलिखित प्रजनन तंत्र संक्रमण बिना यौन संपर्क के होते हैं :

1. प्रोस्ट्रेट ग्रंथि की सूजन

2. ऐपिडाइमस ग्रंथि की सूजन

गुप्त/ यौन रोग

  • यौन संपर्क (योनि, गुदा या मुख) से होने वाले यौन संक्रमणों को गुप्त/ यौन रोग कहते हैं|
  • 20 से भी अधिक प्रकार के यौन संक्रमणों की पहचान की गई है (जैसे की सुजाक, उपदंश, जूलपित्ति, एच. आई. वी./ एड्स आदि)|
  • कुछ यौन संक्रमण संक्रमित खून चढ़ाने से गंदी सुईयों और चमड़ी काटने वाले औजारों से भी होते हैं|
  • एच. आई. वी. उपदंश और हैपेटाइटिस – बी, माँ से बच्चे को गर्भावस्था, प्रसव और स्तनपान के समय हो सकता है|
  • जल्दी इलाज कराने पर एच. आई. वी./एड्स के सिवा अधिकतर यौन रोग ठीक हो सकता हैं|
  • एच. आई. वी./एड्स लाइलाज है
  • इसका परिणाम ज्यादातर मौत होता है
  • यदि किसी को गुप्त/यौन रोग है तो उसे एच. आई. वी./एड्स की संभावना 4-10 गुणा बढ़ जाती है

 

प्रजनन तंत्र संक्रमण/ यौन रोग के चिन्ह और लक्षण

स्त्रियों में

पुरूषों में

दोनों में  (पुरूषों व स्त्री)

असामान्य और बदबूदार स्राव, यानी कि:

  • दही जैसा (गाढ़ा)
  • सफेद बदबूदार
  • पीला या पीब के साथ
  • काफी अधिकतर, भारी मात्रा)
  • खून के साथ
  • योनि में खारिश के साथ

लिंग से असामान्य और बदबूदार स्राव, या लिंग पर घाव (पीले/हरे रंग का)

बाहरी जननेंद्रिय का लाल होना या दर्द या सूजन होना

पेट के नीचे दर्द (पेडू भाग)

 

पेशाब करते समय जलन या दर्द

संभोग के समय दर्द

 

बाहर जनेनेंद्निया में खारिश या खुजली

माहवारी के बिना, असामान्य तौर पर योनि से खून आना

 

हल्का बुखार और बीमार होने का अहसास

 

 

बाहरी जनेनेंद्निया पर या आस-पास, मलाशय के पास या अंदर, मुंह के अंदर-फोड़े या छाले

 

 

गले में सूजन या दर्द

 

 

फुंसी – हथेली और  के तलवों पर भी हो सकते है|

 

 

पेट में ऐठन/ सिकुड़न

 

  • सूचक : पुरूषों और स्त्रियों में कुछ यौन रोगों के कोई शारीरिक लक्षण नहीं होते| स्त्रियों में करीब आधी बार यौन रोग के कोई शारीरक लक्षण नहीं होते|

 

स्रोत : नव भारत जागृति केंद्र /जेवियर समाज संस्थान, राँची

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