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महिला व प्रजनन तंत्र के संक्रमण

इसमें महिला व प्रजनन तंत्र के संक्रमण को बताया गया है |

भूमिका

प्रजनन तंत्र के संक्रमण या प्र.तं.सं. विभिन्न कीटाणुओं से होने वाले जनन अंगों के संक्रमण हैं | हालांकि प्र.तं.सं. पुरुषों और महिलाओं दोनों में हो सकते हैं, ये महिलाओं में अधिक होते हैं क्योंकि उनके शरीर की रचना और कार्यप्रणाली कीटाणुओं के आसानी से प्रवेश के लिए अधिक अनुकूल है |

जो प्र.तं.सं. यौनिक संपर्क के द्वारा फैलते हैं, उन्हें यौन संचारित रोग (एस.टी.डी.), यौन संचारित संक्रमण ( यौ.सं.सं.) या राजित रोग (वी.डी.) कहते हैं | जनन अंग क्षति पहुंचने ( जैसे कि डिलीवरी, सहवास, या रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से कारण, डिलिवरी, गर्भपात, कॉपर-टी लगाने की प्रक्रिया में अस्वच्छता के कारण) तथा योनि में सामान्यत: पाये जाने वाले कीटाणुओं की अत्यधिक वृधि के कारण भी संक्रमित हो सकते हैं | सामान्य स्वास्थ्य का खराब स्तर, जनन अंगों की अस्वच्छता तथा कम आयु में यौनिक क्रिया की शुरुआत आदि से महिला में प्र.तं.सं. के होने की संभावना अधिक हो जाती है |

प्रजनन तंत्र के संक्रमण के प्रति लापरवाही

आमतौर पर महिलाएं असामान्य योनि स्त्राव तथा जनन अंगों पर जख्म आदि जैसी व्यक्तिगत समस्याओं के विषय में चर्चा करने में बहुत झिझकती व शर्माती हैं | उन्हें यौन संबंधित समस्याओं पर चुपचाप रह कर बर्दाश्त करते रहना सिखाया गया है | एक यह भी डर रहता है कि अगर कोई महिला प्र.तं.सं., विशेषत: एस.टी.डी., से पीड़ित पाई जाती है तो उसे “बदचलन” कहा जा सकता है | अपर्याप्त यौन शिक्षा तथा चिकित्सा सुविधाओं की कम उपलब्धता के कारण उपचार करवाने में झिझक होती है | घर के निर्णय लेने वाले, जैसे कि सास, महिला को गर्भ सम्बंधित समस्याओं, जैसे कि गर्भावस्था तथा निःसंतानता, के लिए तो स्वास्थ्यकर्मी के पास ले जाने की अनुमति दे देंगे लेकिन “अधिक योनि स्त्राव “ जैसे “मामूली” लक्षणों के लिए नहीं |

प्र.तं.सं. को गंभीरता से न लेने का एक अन्य कारण यह भी है कि उनसे जान को सीधा खतरा नही होता है | वे महिला के शरीर में घर बना लेते हैं और लंबे समय तक चलने वाला पेट दर्द या कमर दर्द अथवा निःसंतानता जैसी समस्याएं उत्पन्न कर देते हैं |

प्रजनन तंत्र के संक्रमण के लक्षण

प्र.तं.सं. (यौ.सं.रोगों. तथा गैर यौ.सं.रोगों) के कारण महिला में मुख्यतः ये लक्षण होते हैं :

  • असामान्य योनि स्त्राव जो दुर्गन्धपूर्ण तथा सामान्य से अधिक मात्रा में होता है |
  • बाह्रय जनन अंगों पर जख्म या घाव |
  • पेल्विक एन्फ्लामेंट्री डिजीज (पी.आई.डी.) के कारण पेडू में दर्द |
  • प्रजनन तंत्र के संक्रमण की उपस्थिति का संकेत इन लक्षणों से भी मिल सकता है :
  • संभोग के दौरान दर्द या रक्त स्त्राव होना
  • जांघों में दर्दनाक गांठें (गिल्टियां ) होना |
  • पेशाब करते समय जलन व दर्द |
  • जनन अंगों के आस-पास खुजली होना |

अगर प्र.तं.सं. का शीघ्र उपचार नहीं किया जाए तो कई जटिलताएं उत्पन्न हो सकती है जैसे कि पी.आई.डी., निःसंतानता, एच.आई.वी. संक्रमण होने की अधिक संभावना, गर्भाशय से बाहर गर्भधारण (एक्टोपिक गर्भ ), गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर तथा मृत्यु | इनके अतिरिक्त गर्भावस्था सम्बंधित जटिलताएं भी हो सकती हैं जैसे कि समय से पहले प्रसव, जन्म के समय बच्चे का कम वजन, मृत बच्चा पैदा होना, गर्भपात या जन्मजात विकार | जन्म के समय योनि में से गुजरते हुए बच्चे को आंखों का संक्रमण हो सकता है जिससे अंततः निमोनिया तथा अंधापन हो सकता है |

असामान्य योनि स्त्राव

योनि से थोडा सा गीलापन होना एक सामान्य बात है | यह योनि द्वारा अपने सफाई करने का एक प्राकृतिक तरीका है | स्त्राव की मात्रा तथा प्रकार माहवारी चक्र के विभिन्न दिनों में अलग-अलग तरह का हो सकता है | प्रजनन काम के दौरान यह स्त्राव मात्रा में अधिक तथा पानी जैसा साफ व पतला हो जाता है |

योनि से स्त्राव की मात्रा, रंग तथा गंध में परिवर्तन संक्रमण का संकेत हो सकता है परंतु इससे संक्रमण के प्रकार का पता चलाना कठिन हो सकता है | आपको स्वास्थ्यकर्मी द्वारा परिक्षण करवा कर संक्रमण के प्रकार का पता करवाना चाहिए | ध्यान रखिए कि कभी-कभी कैंसर जैसी किसी अन्य समस्या के कारण भी स्त्राव हो सकता है |

महत्वपूर्ण: अगर आपको योनि से स्त्राव के साथ पेडू में भी दर्द होता है तो आपको पी.आई.डी., जो कि एक गंभीर संक्रमण है, हो सकता है |

असामान्य योनि स्त्राव के आम कारण

कई प्रकार के संक्रमणों के कारण असामान्य योनि स्त्राव हो सकता है | नीचे कुछ ऐसे ही संक्रमणों का उनके सबसे आम लक्षणों के साथ वर्णन दिया गया है:

यीस्ट (फफूंद संक्रमण, केन्डीडा, सफेद पानी) :

आम तौर पर यह यौ.सं.रोग नहीं होता है और न ही इससे कोई जटिलताएं होती हैं परंतु इससे जनन अंगों में काफी परेशान करने वाली खुजली होती है | यीस्ट संक्रमण होने की संभावना तब अधिक होती है जब आप गर्भवती हैं या एंटीबायोटिक्स दवाईयों का सेवन कर रही हैं या मधुमेह अथवा एच.आई.वी./एड्स जैसी बीमारी से पीड़ित हैं |

लक्षण :

  • दही जैसा, सफेद दानों या धागों जैसा स्त्राव |
  • योनि के बाहर तथा अंदर की खाल चमकदार तथा लाल हो जाती है जिससे खून भी जा सकता है |
  • योनि के अंदर तथा बाहर खुजली होना |
  • पेशाब करते समय जलन महसूस होना |
  • डबलरोटी के बनाने जैसी दुर्गन्ध आना |
  • सहवास के दौरान दर्द होना |
  • जीवाणु-जनित योनि संक्रमण
  • यह यौ.सं.रोग नहीं है | अगर आप गर्भवती हैं तो यह समय से पहले ही प्रसव प्रेरित कर सकता है |

लक्षण :

  • सामान्य से अधिक योनि स्त्राव होना |
  • योनि से मछली की गंध आना विशेषकर सहवास के पश्चात तथा माहवारी के दौरान| योनि के आस-पास हल्की खुजली होना |

उपचार

दवाईयां केवल प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी की देखरेख में ही लेनी चाहिए |

 

योनि स्त्राव के लिए औषधियां

(ये दवाइयां यीस्ट, ट्राईकोमोनास तथा जीवाणु जनित योनि संक्रमण को ठीक करेंगी)

दवाइयां               कितनी लेनी है ?                 कब और कैसे लेनी हैं ?

बॉक्स 1’क’ की दवाईयां (केवल एक चुनें)

क्लोट्रिमाजोल पेसरी          500 मि० ग्रा०    1 पेसरी को योनि में गहराई में रखें

(योनि में रखने वाली गोली )

या

जेन्सन वायलेट द्रव्य         1%             रात को इस द्रव्य से रूई का एक

फोम भिगोएं | उसे योनि में गहराई

में रखें | थोड़ी देर बाद उसे निकाल

दें | 15 रातों तक ऐसा करें |

बॉक्स 1 ‘ख’ की दवाईयां

मेट्रोनिडाजोल गोली            400 मि० ग्रा०     मुख से हर आठ घंटे के बाद एक

गोली अर्थात प्रतिदिन तीन गोलियों

का सेवन 7 दिन तक यही खुराक

लेनी है

 

महत्वपूर्ण : मेट्रोनिडाजोल गोली का सेवन करने की अवधि में शराब का किसी रूप में बिल्कुल सेवन न करें |

जनन अंगों पर जख्म या घाव

जनन अंगों पर होने वाले अधिकतर जख्म या घाव यों.सं.रोगों के कारण होते हैं | यह कहना कठिन है कि ये किस रोग के कारण हो रहें हैं क्योंकि सिफलिस (आतशक) तथा सेंक्राइड द्वारा होने वाले जख्म एक जैसे ही दीखते हैं | जनना अंगों पर होने वाले जख्म या घाव एच.आई.वी. (एड्स एक विषाणु) के शरीर में प्रवेश का सबसे सरल तरीका है |

पेल्विक एन्फ्लामेंट्री डिजीज (पी.आई.डी.)

पी.आई.डी. महिला के पेट के निचले भाग में स्थित जनन अंगों के संक्रमण को दिया गया नाम है | इसे आप तौर पर “पेल्विक संक्रमण” भी कहा जाता है | यह तब हो सकता है जब आपको गोनोरिया (सूजाक ) या क्लेमाइडिया जैसे कोई यों.सं.रोग हुआ हो और उसका उपचार नहीं किया गया हो | अगर निकट पूर्व काल में प्रसव या स्वत: गर्भपात या गर्भपात अस्वच्छ परिस्थितियों में किया गया हो तो भी यह रोग हो सकता है |

पेल्विक संक्रमण करने वाले कीटाणु योनि तथा गर्भाशय ग्रीवा में से होते हुए गर्भाशय, फैलोपियन नलियों तथा अंडाशयों तक पहुंच जाते हैं | अगर इस संक्रमण का समय पर उपचार नहीं किया जाता है तो इससे लंबे समय तक रहने वाला दर्द, गंभीर बीमारी या मृत्यु हो सकती है | फैलोपियन नालियों में संक्रमण से वहां स्कार बन सकते हैं जिनसे आपको निःसंतानता या गर्भाशय के बाहर गर्भ ठहरने (“एक्टोपिक गर्भ”) का खतरा हो सकता है |

लक्षण : (आपको इनमें से एक या अधिक लक्षण हो सकते हैं )

  • पेट या कमर के निचले भाग में दर्द |
  • तेज बुखार, कंपकंपी |
  • अत्यधिक बीमार या कमजोर महसूस करना |
  • योनि से दुर्गन्ध युक्त पीला या हरा स्त्राव |
  • संभोग के दौरान दर्द या खून जाना |
  • माहवारी की अनियमितताएं |

 

उपचार :

नीचे बताई गई दवाईयों का सेवन तुरंत शुरू कर दें | अगर आप दो दिन व दो रातों (48 घंटों) के उपचार के बाद बेहतर महसूस नहीं करती हैं या आप अभी भी बहुत बीमार हैं और आपको तेज बुखार या उल्टियां हैं या आपको हाल में ही प्रसव या गर्भपात हुआ है तो तुरंत किसी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र जाएं | आपको नसों के द्वारा अधिक शक्तिशाली दवाईयों देने की आवश्यकता है |

पी.आई.डी.(पेल्विक संक्रमण) के लिए दवाईयां

(यह संक्रमण प्राय: विभिन्न कीटाणुओं के मिश्रण से होता है | इसलिए आपको तीन दवाईयां एक साथ लेनी पड़ेंगी)

दवाई बॉक्स 2

दवाई                     कितनी शक्ति की?               कब और कैसे लेनी है ?

नोरफ्लोक्सासीन              800 मि० ग्रा०         मुख से , दिन में एक बार (गर्भवती,स्तनपान कराने वाली

तथा 16 वर्ष से कम आयु की

महिलाओं को यह लेनी चाहिए)

डाक्सीसाइक्लिन                   100 मि० ग्रा०        मुख से, एक दिन में दो बार

(गर्भवती व स्तनपान कराने

वाली महिला इसे ने लें)

10 दिनों तक

मेट्रोनिडाजोल                     400 मि०ग्रा०              मुख से, दिन में 3 बार

सात दिनों तक

ये दवाईयां किसी कुशल स्वास्थ्यकर्मी की देखरेख में ही लेनी चाहिए |

 

पेल्विक संक्रमण के लिए अन्य दवाईयां

दवाई बॉक्स 3

दवाई                        कितनी शक्ति की?               कब और कैसे लेनी है ?

नोरफ्लोक्सासीन के स्थान पर आप इनमें से कोई भी दवाई प्रयोग कर सकती हैं :

सेफ्ट्रीआजोन                   250 मि० ग्रा०         दिन में केवल एक बार-मांसपेशी में इंजेक्शन के द्वारा

सेफिक्साइम                     400 मि.ग्रा.            मुख से, दिन में केवल एक बार

कोट्राइमोक्साजोल                480 मि.ग्रा.           मुख से, 2 गोलियां एक साथ दिन (80 मि.ग्रा. ट्राइमिथोप्रिम तथा 400 मि.ग्रा. सल्फामिथोक्साजोल)       में दो बार –सात दिनों तक

सिप्रोफ्लोक्सासीन                500 मि.ग्रा.             मुख से, दिन में 2 बार -5 से 7 दिनों तक (गर्भवती, स्तनपान

कराने वाली या 16 वर्ष से काम आयु

की महिला प्रयोग न करें)

केनामाइसिन               2 ग्रा                                    मांसपेशी में इंजेक्शन के द्वारा, दिन में एक बार

(गर्भवती, स्तनपान कराने वाली महिला तथा चल- फिर रही महिला में प्रयोग न करें )

डाक्सीसाइक्लिन के स्थान पर आप इनमें से कोई भी दवाई प्रयोग आकर सकती हैं:

टेट्रासाइक्लिन                   500 मि.ग्रा.         मुख से, दिन में चार बार दस दिनों   तक (गर्भवती व स्तनपान

कराने वाली महिला प्रयोग न करें)

इराइथ्रोमाइसिन                   500 मि.ग्रा.        मुख से, दिन में चार बार- दो दिनों तक

एमोक्सिसिलिन                    500 मि.ग्रा.       मुख से, दिन में 3 बार-दस दिनों तक

ये सभी दवाईयां केवल प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी की देखरेख में ही लेनी चाहिए |

जनन अंगों में खुजली

इनके अनके कारण हो सकते हैं :

अगर यह योनि द्वारा  के आस-पास है तो यह यीस्ट या ट्राइकोमोनास के कारण हो सकती है |

अगर यह जनन अंगों के तुरंत उपर के बालों या जनन अंगों के पास है तो यह खाज (स्केबिज) या जुओं के कारण हो सकती है | इस भाग को शेव करके सारे बालों को साफ कर लें | प्रभवित भाग में बेंजाइल बेंजोएट लोशन लगाकर, रातभर के लिए छोड़ दें | नीम की पत्तियों तथा हल्दी का पेस्ट बनाकर वहां लगा सकते हैं और रात भर छोड़ दें | अन्य और भी दवाईयां आप दवाई की दुकान से प्राप्त कर सकती हैं |

सुगन्धित साबुनों तथा दुर्गन्धनाशकों के प्रयोग से भी खुजली हो सकती है |

यौन संचारित रोग अर्थात एस.टी.डी.

यौन संचारित रोग या एस.टी.डी. एक व्यक्ति से दुसरे व्यक्ति को यौन संबंधों से फैलने वाले रोग हैं | किस प्रकार के यौन संबंध-योनि, मुख या गुदा का एस.टी.डी कर सकते हैं | कभी-कभी ये रोग केवल संक्रमित लिंग या योनि को अन्य व्यक्ति के जनन अंगों से रगड़ने से भी हो सकते हैं | एस.टी.डी. किसी संक्रमित गर्भवती महिला से उसके बच्चे को जन्म से भी पहले गर्भ में या प्रसव के दौरान संचारित हो सकते हैं |

भारत में एस.टी.डी.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि प्रतिवर्ष उपचार किये जा सकने वाले यौन संचारित संक्रमणों के लगभग 33.3 करोड़ नये मामले विश्व में होते हैं |

भारत में यौ.सं.रोगों के नयें मामलों की अनुमानित वार्षिक दर 5% है | इसका अर्थ है कि प्रतिवर्ष यौ.सं.रोगों के लगभग 5 करोड़ नये मामले हो जाते हैं |

यौ.सं.रोग शहरों तथा गावों दोनों में पाए गए हैं और ये 15 -45 वर्ष की महिलाओं में सबसे अधिक होने वाले संचारी रोग हैं |

महिलाओं तथा पुरुषों-दोनों को एस.टी.डी. हो सकते हैं परंतु महिला से पुरुष को फैलने की तुलना में पुरुष से महिला का संक्रमती होना कहीं अधिक आसान होता है | ऐसा लिंग-योनि सहवास क्रिया में महिला की योनि एक बड़ा भाग लिंग के संपर्क में आने तथा संक्रमित वीर्य का योनि में देर तक पड़े रहने के कारण होता है | इससे महिला को गर्भाशय, फैलोपियन नलिकाओं तथा अंडाशयों में संक्रमण होने की संभावना अधिक हो जाती है |

किसी महिला के लिए एस.टी.डी. से बचना एक कठिन कार्य हो सकता है क्योंकि उसे अकसर ही अपने साथी की सहवास क्रिया के लिए मांग पूरी करनी पड़ती है | इसके आलावा उसे यह भी नहीं पता होता है कि उसका साथी एस.टी.डी से पीड़ित है या वह अन्य महिला से सहवास कर सकता है तो वह अपनी पत्नी को संक्रमित कर सकता है | दोनों यौन साथियों की एस.टी.डी से रक्षा करने के लिए कंडोम एक अच्छा साधन हैं परंतु एक महिला के लिए पुरुष को कंडोम प्रयोग करने के लिए राजी करना कठिन हो जाता है |

प्रकट हुए लक्षणों के बिना यौ.सं.रोगों के होने की संभावना महिलाओं में अधिक होती है |

अकसर ही इनके कारण कुछ ऐसे भागों में जख्म हो सकते हैं जो रोगी को दिखाई नहीं देते हैं | हालांकि ऐसे परिक्षण उपलब्ध हैं जिनसे महिला में यौ.सं.रोग की उपस्थिति का पता लगाया जा सकता है परंतु ये परिक्षण काफी महंगे व हर जगह उपलब्ध नहीं होते हैं और कभी-कभी ये पूर्णतया सही परिणाम भी नहीं देते हैं |

एस.टी.डी. के परिणाम-पुरुषों की तुलना में महिलाओं से अधिक विविधता वाले तथा गंभीर होते हैं | इनके कारण महिलाओं को मानसिक तनाव भी अधिक होता है |

शीघ्र तथा पूर्ण उपचार न होने से, एस.टी.डी के कारण :

 

  • महिलाओं और पुरुषों में निसंतानता हो सकती है |
  • गर्भपात तथा बच्चे की गर्भ में मृत्यु हो सकती है |
  • गर्भाशय से बाहर, जैसे कि फैलोपियन नलियों में गर्भ ठहर सकता है (एक्टोपिक गर्भ)|
  • कमजोर, आकार में छोटे, समय से पहले या जनसे से अंधे बच्चे पैदा हो सकते हैं |
  • नवजात शिशुओं में निमोनिया हो सकता है |
  • पेट में लंबे समय तक चलने वाला दर्द रह सकता है |
  • गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर हो सकता है |
  • एच.आई.वी./एड्स हो सकता है |
  • गंभीर संक्रमण या एड्स के कारण मृत्यु हो सकती है |

 

केस स्टडी

एक ग्रामीण पत्नी का दु:खड़ा

मेरा पति हमारे गांव से दुरे के एक कसबे में काम करता है | साल में केवल एक या दो बार ही गांव में वापस आता था | एक बार जब वह आकार कसबे में वापस चला गया तो मैं तेज बुखार तथा पेट में भयंकर दर्द के साथ गंभीर रूप से बीमार पड़ गई | अपनी बीमारी का कोई कारण मेरी समझ में नहीं आ रहा था | मैंने स्थानीय उपचारक से इलाज कराया परंतु उससे कोई लाभ नहीं हुआ | मैं इलाज के लिए गांव से बाहर नहीं जाना चाहती थी क्योंकि न तो मरे पास पैसे थे और न ही मेरे पीछे कोई मेरे बच्चों का ध्यान करने वाला | मैं इतनी बीमार हो गई कि पड़ोसियों को लगा कि मैं मरने वाली हूँ | इसलिए वे मुझे एक ट्रक में डाल कर 90 किमी दूर एक अस्पताल ले गए | डॉक्टर ने वहां बताया कि मुझे गंभीर तरह का गोनोरिया रोग हो गया था और उसी के कारण मेरे पेट में भयंकर संक्रमण हो गया था | उसने कहा कि अब में एक महंगे ऑपरेशन और कई दिनों तक दवाईयां खाने से ही बच सकती थी | उसने यह भी बताया कि अब मैं भविष्य में मां नहीं बन सकूंगी | अब मुझे ख्याल आता है कि काश जब मैं पहली बार बीमार हुई थी, तभी सही उपचार करा लेती |

कैसे जानें कि आपको एस.टी.डी. का खतरा है या नहीं

अगर आपको कोई लक्षण भी नहीं हैं तो भी आपको यौ.सं.रो. का जोखिम है यदि –

  • आपके साथी को एस.टी.डी है | काफी संभावना है कि उसने वह एस.टी.डी. आपको फैला दिया होगा |
  • आप के एक से अधिक यौन साथी हैं | जितने अधिक यौन साथी, उतना ही अधिक संभावना होती है कि उसमें से कोई भी आपको एस.टी.डी. दे देगा |
  • आपका साथी घर से दूर रहता है अथवा आपको लगता है कि उसके अन्य यौन साथी भी हैं | इसका मतलब यह है उसके यौ.सं.रों से संक्रमित होने तथा बाद में उस संक्रमण को आपको फैलने की काफी संभावना है |

 

एस.टी.डी के प्रकार

ट्राइकोमोनायसिस

यह कोई संक्रमण नहीं है परंतु इससे होने वाली खुजली आपको बहुत परेशान कर सकती है | इस संक्रमण के कारण पुरुष के लिंग में सफेद या हरे पानी जैसा स्त्राव निकलना तथा पेशाब करते समय परेशानी जैसे लक्षण हो सकते हैं | उसके लिंग में संक्रमण होने के बावजूद भी वह लक्षण रहित हो सकता है और सहवास करने से वह संक्रमण को दूसरों को फैला सकता है |

महिला में लक्षण :

 

  1. हरे या पीले रंग का झागदार स्त्राव
  2. स्त्राव से दुर्गंध आना |
  3. जनन अंगों विशेषत: योनि में लाली व खुजली
  4. पेशाब करते समय जलन या दर्द
  5. गोनोरिया तथा क्लेमाइडिया

 

ये दोनों गंभीर रोग हैं लेकिन अगर इनका शीघ्र उपचार शुरू किया जाए तो ये आसानी से ठीक हो जाते हैं | अगर उपचार नहीं किया जाता है तो ये पुरुषों व महिलाओं –दोनों में गंभीर संक्रमण तथा नि:संतानता उत्पन्न कर सकते हैं |

पुरुष में किसी संक्रमित महिला के साथ सहवास करने के 2-5 दिनों के बाद लक्षण प्रकट होते हैं लेकिन महिला ने ये लक्षण कुछ सप्ताहों या महीनों के बाद ही आतें हैं | यह भी होता है कि संक्रमित होने के बावजूद भी पुरुष या महिला में कोई भी लक्षण नजर न आएं लेकिन फिर भी वे दुसरे व्यक्तियों को ये रोग फैलाने में सक्षम हैं |

महिला के लक्षण :

 

  1. योनि या गुदा से दुर्गन्ध युक्त पीला अथवा हरा स्त्राव निकालना|
  2. पेशाब करते समय दर्द, जलन या तकलीफ होना |
  3. बुखार |
  4. पेट के निचले भाग में दर्द या खून निकालना |
  5. “बराथोलिन एब्सेस” होना |
  6. या फिर कोई भी लक्षण न होना |

 

पुरुषों में लक्षण:

 

  1. लिंग में स्त्राव |
  2. पेशाब करते समय दर्द व जलन |
  3. अंडकोषों में दर्द या सूजन |
  4. या फिर कोई भी लक्षण न होना |

 

 

योनि स्त्राव के उपचार के लिए दवाईयां अगर आप सोचती हैं कि आपको एस.टी.डी. का खतरा हैं

(ये दवाईयां गोनोरिया, क्लेमाइडिया तथा ट्राइकोमोनायसिस के उपचार के लिए हैं )

 

दवाई                       कितनी शक्ति की ?               कब और कैसे लेनी है?

इन सभी दवाइयों को लें

नोरफ्लोक्सासीन                  800 मि.ग्रा.               मुख से, एक बार केवल |

और

डाक्सीसाइक्लिन                  100 मि.ग्रा.                मुख से, 7-10 दिन तक,  दिन में दो बार

(गर्भवती व स्तनपान

कराने वाली महिलाएं न लें )

और

मेट्रोनिडाजोल                      2 ग्रा. (200 मि.ग्रा.)   मुख से, पूरी खुराक एक साथ एक बार | (गर्भवती व स्तनपान

कराने वाली महिलाएं पूरी खुराक

एक साथ न लें |

400 मि.ग्रा. दिन में

दो बार 7 दिनों तक लें |)

इन सभी दवाईयों को किसी प्रशिक्षित चिकित्साकर्मी की देखरेख में ही लें |

जननांगों पर मस्से

मस्से ‘ह्यूमन पेपिलोमा विषाणु (एच.पी.वी.) के संक्रमण के कारण होते हैं | जननांगों पर होने वाले मस्से शरीर के अन्य भागों पर होने वाले मस्से की तरह दीखते हैं | यह संभव है कि जननांगों पर मस्से हों और व्यकित को इसका पता न हो विशेषत: अगर वे योनि के भीतर या लिंग के सिरे के भीतर हो | मस्से बिना उपचार के भी ठीक हो जाते हैं परंतु ऐसा होने में बहुत समय लग सकता है | आमतौर पर ये बढ़ते हैं, इसलिए उनका उपचार करना ही बेहतर है |

लक्षण:

 

  1. खुजली
  2. छोटे-छोटे, दर्दरहित, सफ़ेद या भूरे रंग के दाने जैसे उभार हो जाते हैं जिनकी सतह खुरदुरी होती है –
  3. महिलाओं में ये योनि प्रकोष्ठों, योनि के भीतर या गुदा के आस-पास होते हैं |
  4. पुरुषों में ये अकसर लिंग पर या उसके सिरे के एकदम भीतर, शुक्रकोष पर या गुदा के आस-पास होते हैं |

 

महत्वपूर्ण : सपाट, गिले आकार से बड़े, मस्से जैसे दिखने वाले उभार आतशक (सिफलिस) के लक्षण हो सकते हैं | सिफलिस के लिए रक्त परिक्षण करवाएं और इनके लिए मस्सों का उपचार नहीं |

उपचार :

स्वास्थ्य त्वचा की रक्षा करने के लिए हर मस्से के आस-पास की त्वचा पर कोई पेट्रोलियम जैल (क्रीम) लगाईए |

माचिस की तीली या दांत कुरेदने वाली छोटी से डंडी द्वारा मस्सों पर तीन –चार बार ट्राईक्लोरो एसिटिक एसिड (टी.सी.ए.) द्रव्य थोड़ी से मात्रा तब तक लगाएं जब तक वे सफेद न पड़ने लगें |

या

उसी प्रकार से इन पर 20% पोडोफाइलिन द्रव्य तब तक लगाएं जब तक मस्सा भूरा न पड़ जाएं पोडोफाइलिन को 6 घंटे पश्चात धोकर हटाना अति आवशयक है | गर्भवती महिलाओं को पोडोफाइलिन प्रयोग नहीं करना चाहिए |

अगर यह उपचार सफल हो जाता है तो मस्सा त्वचा से टूट कर स्वयं गिर जाएगा और उसे स्थान पर वहां एक छोटा से जख्म बन जाएगा | इसे सुखा व साफ़ रखें | जब तक जख्म पूरी तरह सुख न जाए तब तक सहवास न करें | अगर सहवास करना ही है तो आपके साथी को कंडोम अवश्य प्रयोग करना चाहिए | आमतौर पर ये जख्म 1-2 सप्ताह में भर जाते हैं | इसे संक्रमित होने से बचाएं |

(सभी मस्सों को समाप्त करने के लिए इस प्रकार का उपचार कई बार करना पड़ सकता है | इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है कि आप कौन सा द्रव्य प्रयोग करते हैं) |

मस्से के स्थान पर हुए जख्म पर ये द्रव्य बिल्कुल न लगाएं | अगर इन द्रव्यों के लगाने से जलन काफी समय तक रहती है तो अगली बार का उपचार अधिक समय पश्चात करें |

महत्वपूर्ण : मस्सों की उपस्थिति से आपको गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर होने का खतरा अधिक बढ़ जाता है | अगर आप मस्सों से ग्रस्त हैं तो आपको हर 1-2 साल पश्चात पेप टेस्ट अवश्य करवाना चाहिए |

जननांगों पैर जख्म (अल्सर)

जननांगों पर जख्मों के सामान्य कारण

जननागों पर अधिकतर जख्म यौन संचारित होते हैं | यह कहना कठिन हो सकता है कि ये किस रोग के कारण हुए हैं क्योंकि सिफलिस तथा शेंक्राइड के कारण होने वाले जख्म दिखने में एक जैसे होते हैं | जननांगों पर उपस्थिति जख्म शरीर में एड्स वायरस के प्रवेश के लिए सबसे आसान रास्ता है |

सिफलिस (आतशक)

यह एक गंभीर एस.टी.डी., हैं जिसके प्रभाव शरीर के अनके अंगों पर होते हिं तथा ये कई सालों तक चल सकते हैं | यह “ट्रीपोनिमा” नमक एक कीटाणु से होता है और यह दवाइयों से शीघ्र उपचार करने से पूर्णतया ठीक हो जाता है |

लक्षण :

इसका पहला लक्षण एक छोटा, दर्द रहित जख्म होता है जो एक मुहांसा, छाला, एक सपाट मस्सा या खुला जख्म हो सकता है | यह कुछ दिनों या सप्ताह तक जननांग पर रहकर, अपने आप गायब हो जाता है लेकिन रोग शरीर में धीरे-धीरे फैलता है |

कई सप्ताहों या महीनों के पश्चात यह रोग फिर से लक्षण उत्पन्न करता है | रोगी को गला ख़राब, बुखार, शरीर पर लाल दानें ( विशेषत: हाथ की हथेलियों तथा पैर की एड़ियों पर ), मुहं में छाले या जोड़ों में सूजन हो सकती है | इस अवस्था में रोगी इस रोग को अन्य लोगों को संचारित आकर सकता है |

ये सभी लक्षण बिना उपचार के फिर से गायब हो जाते हैं लेकिन बीमारी चालू रहती हैं | अगर इसका उपचार नहीं किया जाए तो सिफलिस ह्रदय रोग, लकवा, मानसिक रोग तथा मृत्यु भी कर सकती है |

गर्भवस्था तथा सिफलिस. गर्भवती महिला अपने अजन्मे बच्चे को सिफलिस संचारित कर सकती है जिसके कारण वह समय से पहले, विकृत या मृत पैदा हो सकता है | आप गर्भवस्था के दौरान सिफलिस के लिए रक्त परिक्षण तथा उसका उपचार करा कर ऐसा होने से रोक सकती हैं | अगर गर्भवती महिला व उसके साथी का सिफलिस के लिए रक्त परिक्षण पॉजिटिव पाया जाता है तको उन दोनों का बेंजाथीन पेनिसिलिन इंजेक्शन : 24 लाख यूनिट, सप्ताह में एक बार, तीन सप्ताहों तक, मांसपेशियों : में लगा कर उपचार होना आवशयक हैं |

शेंक्राइड

यह एक कीटाणु द्वारा होने वाला एस.टी.डी. है | अगर इसका शीघ्र उपचार किया जाए तो, यह औषधियों से ठीक हो सकता है|

लक्षण :

जननागों या गुदा पर एक या उससे अधिक जख्म जो नर्म व दर्द पूर्ण होते हैं और उनमें आसानी से खून बह सकता है |

जांघों में दर्द्पूर्ण गिल्टियां हो जाना (“ब्यूबो”)

मामूली सा बुखार

महत्वपूर्ण: जननांगों पर जख्मों में से, सहवास के दौरान, एड्स का विषाणु आसानी से गुजर सकता है | एच.आई.वी./ एड्स की रोकथाम के लिए यह आवशयक हैं कि आपके या आपके साथी के जननांगों पर जख्म की स्थिति में सहवास न करें |

जननांग ( जेनाईटल) हर्पीस

यह एक विषाणु द्वारा  होने वाले एस.टी.डी. है | यह जननांगों या मुख पर हो सकता है | इससे छोटे-छोटे दाने हो जाते हैं जो महीनों या सालों तक आते-जाते रहते हैं | आपको राहत देने के लिए उपचार उपलब्ध है |

हर्पीस द्वारा मुख पर होने वाले सभी दाने यौन संबंधों से नहीं फैलते हैं | बच्चों व बड़ों को अकसर ही ये दानें बुखार या जुकाम की स्थिति में भी हो जाते हैं |

लक्षण :

जननांगों या जांघों में झुनझुनाहट, खुजली या दु:खना महसूस होना |

तत्पश्चात वहां छोटे –छोटे फफोले जैसे दानें हो जाते हैं जो फूट कर, दर्द्पूर्ण घाव में परिवर्तित हो जाते हैं | पहली बार हर्पीस के दाने या जख्म होने पर वे 3 सप्ताह या उससे भी अधिक समय तक रह सकते हैं |

आपको जांघों में गिल्टियां, बुखार , सिरदर्द, शरीर में दर्द आदि भी हो सकता है |

अगली बार होने वाला संक्रमण इससे कम तीव्रता का होगा |

उपचार :

इससे राहत पाने के लिए :

 

  • जैसे ही ये दानें प्रकट होएं, उन पर बर्फ की सिकाई करें |
  • पानी में चाय की पत्ती डालकर उबालें और उसे छान लें | इस घोल में साफ कपड़ा भिगो कर उसे सीधे ही दानों पैर लगायें |
  • जननांगों को ठंडे व साफ पानी में डुबाएं | ( किसी बर्तन या नहाने के टब में बैठकर )
  • खाने का सोडा (बेकिंग सोडा ) या मक्की का आटा लेकर पानी में मीलायें व एक गाढ़ा लेप बनाएं |
  • ठंडे पानी से दानों की तराई करने से भी आराम मिलता है |
  • अगर आपको ये दाने बार-बार हो रहे हैं तो “इसाइक्लोवीर” नामक दवाई प्रयोग करें | हालांकि इससे हर्पीस जड़ से खत्म नहीं होती है पर यह आपके लक्षणों में जल्दी रहत पहुंचती है |

 

महत्वपूर्ण :

 

  • अपने दानों व जख्मों को छूने के बाद, हर बार, साबुन व पानी से हाथ धो लें |
  • आपने हाथों से अपनी व बच्चों की आंखों कभी न छुएं | आंखों में हर्पीस संक्रमण काफी गंभीर हो सकता है |
  • जब आपको हर्पीस के दाने या जख्म हों तब सहवास न करें | सहवास से आप आसानी से हर्पीस संक्रमण अपन यौन साथी को फैला सकती है |

 

गर्भवस्था तथा हर्पीस

हर्पीस से संक्रमित गर्भवती महिला को अगर प्रसव के समय उसके दाने व जख्म हैं तो वह इस संक्रमण को नवजात शिशु को भी संचारित कर सकती है | इससे बच्चे को गंभीर समस्याएं हो सकती है | कोशिश करें कि आपका प्रसव अस्पताल में हों | यहां ऑपरेशन द्वारा प्रसव कराकर बच्चे को जन्मा जा सकता है  या बच्चे के जन्म के पश्चात उसे कुछ विशेष दवाईयां दी जा सकती है |

एड्स (एक्वायर्ड एम्युनो डेफिसिएंसी सिंड्रोम, एच.आई.वी., स्लिम डिजीज)

एड्स/ एच.आई.वी. नामक विषाणु से होने वाला एक यौ.सं.रोग है | किसी व्यक्ति के खून, योनि द्रव्य या वीर्य के दुसरे व्यक्ति के शरीर में किसी भी माध्यम से प्रवेश करने से यह रोग फैलता है|

सहवास के दौरान महिलाओं को यह संक्रमण आसानी से फ़ैल सकता है | ध्यान रखिए, बाहरी रूप से एकदम स्वास्थ्य दिखने वाले लोगों से भी यह संक्रमण आपको फ़ैल सकता है |

एड्स/एच.आई.वी. संक्रमण का कोई उपचार अभी तक उपलब्ध नहीं है | अगर संभव हो तो किसी भी ऐसे व्यक्ति के साथ सहवास न करें जिसे एच.आई.वी. /एड्स होने का जोखिम हो | अपनी रक्षा के लिए हर सहवास क्रिया के समय एक नया कंडोम प्रयोग करें |

हिपेटाइटिस बी(पीलिया)

यह जिगर को हानि पहुंचाने वाले एक विषाणु द्वारा होने वाला खतरनाक रोग है | यह संक्रमण तथा फैलता है जब इस विषाणु से संक्रमित किसी व्यकित का रक्त, वीर्य, लार या योनि स्त्राव किसी अन्य व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाए | यह बहुत आसानी से, विशेषत: सहवास के दौरान, एक व्यकित से दुसरे व्यकित को फ़ैल सकता है |

लक्षण :

 

  • बुखार
  • थकावट व कमजोरी महसूस होना
  • आंखों व त्वचा का पीलापन
  • पेट में दर्द
  • पेशाब का रंग गहरा होना व मल का रंग सफेद/पीला होना |
  • कोई भी लक्षण न हो |

 

उपचार :

इसके उपचार के लिए कोई दवाईयां नहीं हैं | दरअसल, दवाईयां लेने से आपके जिगर को और भी नुक्सान हो सकता है | अधिकतर लोग हीपेटाइटिस बी से स्वयं ही ठीक हो जाते हैं | कुछ लोगों को जिगर की ठीक न होने वाली समस्याएं  हो सकती हैं जिनमें जिगर का कैंसर भी शामिल है | जितना हो सके, आराम कीजिए तथा आसानी से पचने वाला भोजन खाइए | कम से कम 6 महीनों तक शराब का सेवन बिल्कुल न करें |

यौ.सं.रोगों की जटिलताएं

पी.आई.डी. के अतिरिक्त, गोनोरिया तथा क्लेमाइडिया जैसे यौ.सं.रोग महिला के लिए अन्य जटिलताएं भी उत्पन्न कर सकते हैं | अगर एस.टी.डी. का उपचार नहीं हुआ है तो महिला को नि:संतानता तथा एक्टोपिक गर्भ जैसी समस्याएं हो सकती हैं | इनके अतिरिक्त, यौ.सं.रोगों के कारण ये जटिलताएं हो सकती हैं |

योनि की सूजन

(बारथोलिन ग्रंथि का संक्रमण)

योनि के अंदर उसकी भित्ति में 2 ग्रंथियां होती हैं जिन्हें बारथोलिन ग्रंथियां कहते हैं | ये योनि को गिला रखने के लिए द्रव का निर्माण करती है | कभी-कभी इनमें कीटाणु प्रवेश कर जाते हैं और एक या दोनों ग्रंथियों को संक्रमित कर देते हैं |

लक्षण :

  • योनि कि दीवार दर्द पूर्ण, गर्म व सूज जाती है और उसका रंग गहरा हो जाता है | आम तौर पर यह एक तरफ हो होती है |
  • कभी-कभी बिना दर्द की, केवल सूजन होती है |

हालांकि यह हमेशा एस.टी.डी. के कारण नहीं होता है परंतु गोनोरिया तथा क्लेमाइडिया से संक्रमित महिला के इसके होने की अधिक संभावना होती है |

उपचार :

साफ, गर्म पानी में एक कपड़ा भिगोकर उसे सूजन पर लगाएं | पानी इतना गर्म नहीं होना चाहिए कि वह आपको जला दे | ऐसा कई बार और उतने समय तक करते रहें जब तक सूजन फूट न जाए और उसकी मवाद बाहर न आ जाए या सूजन कम न हो जाए |

इसके अतिरिक्त, आपको व आपके साथी को गोनोरिया तथा क्लेमाइडिया के उपचार की दवाईयां भी लेनी आवशयक हैं |

अगर वह भाग सूजा हुआ तथा दर्दपूर्ण ही रहता है तो किसी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी से परामर्श करें जो सूजन में चीरा लगाकर, मवाद को बाहर कर सकेगी|

नवजात शिशुओं में समस्याएं

जिन महिलाओं को गोनोरिया या क्लेमाइडिया संक्रमण होता हैं तो वे बच्चे के जन्म के समय ये रोग उसे संचारित कर सकती हैं | बच्चे की आंखों में गोनोरिया संक्रमण (“ऑफथेलमिया निओनेटोरम “) की रोकथाम के लिए बच्चे के जन्म के तुरंत पश्चात उसकी आंखों में एंटीबायोटिक मलहम डालें | क्लेमाइडिया के कारण नवजात शिशुओं में निमोनिया हो सकता है |

बेहतर महसूस कैसे करें

यौ.सं.रोगों से अपनी मुक्ति के लिए इस अध्याय में बताई गई दवाईयों अवश्य लें | एस.टी.डी. से होने वाली तकलीफों से राहत के लिए –

 

  • प्रतिदिन 2 बार, 15 मिनट तक हल्के गुनगुने, साफ पानी से भरे हुए बर्तन में बैठें | ऐसा रहत महसूस होने तक करें | अगर आपको लगता है कि आपको यीस्ट संक्रमण है तो इस पानी में नींबू का रस, सिरका, दही या खट्टा दूध मिला लें |
  • अच्छा होने तक सहवास न करें |
  • सूती कपड़े से बनी हुई कच्चियां पहनें | इनमें हवा का आना जाना बेहतर रहता है और जननांगों पर जख्मों को जल्दी सूखने में सहायता मिलती है |
  • नीचे पहनने वाले कपड़ों (कच्छियों) को प्रतिदिन धोएं व धुप में सुखाएं | इसमें संक्रमण पैदा करने वाले कीटाणु मर जाते हैं |
  • कोई हल्दी दर्द निवारक दवा लें |
  • अगर आपको जननांगों के ऐसे जख्म हैं जिनसे पेशाब करने में दर्द होता है तो पेशाब करते समय जननांगों पर पानी डालते रहें | या फिर, ठंडे पानी से भरे बर्तन में बैठकर पेशाब करें |

 

एस.टी.डी. के उपचार की अन्य दवाइयां,इस अध्याय में हमने एस.टी.डी. व अन्य समस्याओं के उपचार की दवाइयों की सिफारिश की है | हमने इन दवाईयों को इसलिए चुना है क्योंकि ये –

कारगर व प्रभावी हैं |

आसानी से उपलब्ध हैं |

बहुत महंगी नहीं हैं |

आपको अन्य दवाईयां लेने की आवश्यकता भी पड़ सकती है अगर :

आप गर्भवती हैं या स्तनपान करा रही हैं और ऐसे में ये दवाइयां लेना सुरक्षित नहीं है|

जिस एस.टी.डी. का आप उपचार करना चाहती हैं उनमें ये दवाईयां अब प्रभावी नहीं रह गई है |

आपको किसी दवाई के प्रति संवेदनशीलता है | कुछ लोगों को पैनिसिलिन व सल्फा जैसी दवाइयों के प्रति संवेदनशीलता होती है |

इस अध्याय में सर्वोतम दवाइयों के बारे में बताने के अलावा प्रत्येक रोग के लिए उन दवाईयों का भी वर्णन किया है जो उसके उपचार में कारगर होंगी | यह भी याद रखिए कि अधिकतर लोगों को एक समय में एक से अधिक एस.टी.डी. या जननांगों की समस्या होती है, इसलिए वैसे भी एक से अधिक दवाई लेनी पड़ती है | जो भी दवाई आप लें, उसे सही समय व तरीके से लें पर चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें|

इसी कारण अनेक क्षेत्रों में गोनोरिया के विरुद्ध उपचार के लिए प्रयोग की जाने वाली दवाईयों के विरुद्ध प्रतिरोधन उतपन्न हो गया है | दवाई प्रतिरोधित यौ.सं.रोगों और उनके उपचार के लिए कारगर अन्य दवाईयों के बारे में अपने क्षेत्र के स्वास्थ्यकर्मी से जानकारी प्राप्त करें |

यौ.सं.रोगों का उपचार करते समय हमेशा याद रखिए कि :

 

  • सुनिश्चित करें कि आपके यौन साथी का भी उपचार हो |
  • सारी दवाईयां लें |
  • तब तक सहवास न करें जब तक आपके सभी लक्षण ठीक न हो जाएं और आप व आपके साथी ने सभी दवाईयां नहीं खा ली हों |
  • अगर उपचार समाप्ति के पश्चात भी आपके लक्षण पूर्णतया समाप्त नहीं हुए हैं तो स्वास्थ्य कर्मचारी से अवश्य परामर्श करें|
  • जब फिर से यौन संबंध शुरू करें तो सुरक्षित यौन संबंध ही बनायें |

 

 

प्रजनन तंत्र के संक्रमणों तथा परिवार नियोजन के साधनों में संबंध

कुछ प्रकार के परिवार नियोजन साधन भिन्न प्रकार के प्र.तं.सं. उत्पन्न कर सकते हैं या उन्हें बद्तर बना सकते हैं  | अन्य कुछ का या तो ऐसा कोई प्रभाव नहीं होता है या वे सक्रिय रूप से एस.टी.डी. से रक्षा करते हैं | इस चार्ट में प्र.तं.सं. तथा विभिन्न परिवार साधनों में संबंध का सारांश दिया गया है :

साधन                     प्र.तं.सं. से संबंध            क्या किया जा सकता है ?

डायाफ्राम और/अथवा शुक्राणुनाशक क्रीम

जीवाणुओं से होने वाले कुछ एस.टी.डी से गर्भाशय ग्रीवा के संक्रमणों की आंशिक रूप से रक्षा करता है | विषाणुओं से होने वाले यौ.सं.रोगों (एड्स सहित ) से रक्षा करता है |

यौ.सं.रोगों से अतिरिक्त रक्षा के लिए कुछ अन्य अधिक प्रभावी अवरोधक साधन सुझाएं |

पुरुष कंडोम

अगर सही तरीके से नियमित रूप से प्रयोग किया जाए तो एच.आई.वी/एड्स सही यौ.सं.रोगों से प्रभावशाली सुरक्षा देता है |

पुरुष कंडोम के सही व नियमित प्रयोग से प्रोत्साहित करें |

आई,यू.डी

(कॉपर-टी आदि)

अगर प्र.तं.सं.से पीड़ित महिला को इस संक्रमण के उपचार के बिना चढ़ा की जाए या इसे लगाने के लिए अस्वच्छ उपकरणों का प्रयोग किया जाए तो यह गर्भाशय का संक्रमण उत्पन्न कर सकती है | एस.टी.डी. से कोई सुरक्षा नहीं |

गर्भाशय या उसकी ग्रीवा में प्रयुक्त होने वाले सभी उपकरणों व औजारों को अच्छी तरह से कीटाणु रहित कर लें | इसे लगाने से पहले महिला की प्र.तं.सं. की उपस्थिति के लिए जांच करें | अगर वह है तो पहले उसका उपचार करें या फिर कोई अन्य साधन प्रदान करें | निरोधात्मक एंटीबायोटिक्स देना भी सोचें | एस.टी.डी. से अतिरिक्त सुरक्षा की लिए कोई अवरोधक साधन प्रयोग करने की सलाह दें |

गर्भनिरोधक गोली

इससे (विशेषकर उच्च मात्रा वाली गोलियों से) योनि के वातावरण में कुछ परिवर्तन हो सकते हैं जिससे यीस्ट संक्रमण को प्रोत्साहन मिल सकता है | एस.टी.डी. से कोई सुरक्षा नहीं मिलती है | पी.आई.डी. के जोखिम को कम कर सकती है |

निम्न मात्रा वाली गोलियों के प्रयोग को बढावा दें | यौ.सं.रोगों से अतिरिक्त सुरक्षा के लिए कोई अवरोध साधन प्रयोग करने की सलाह दें |

हार्मोन युक्त इम्प्लांट (भारत में इसे प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है )

एस.टी.डी. से कोई सुरक्षा नहीं | पी.आई.डी. के जोखिम को कम कर सकता है |

एस.टी.डी से अतिरिक्त सुरक्षा के लिए की अवरोधक साधन प्रयोग करने की सलाह दें |

इंजेक्शन

एस.टी.डी से कोई सुरक्षा नहीं | पी.आई.डी. के जोखिम को कम कर सकता है |

एस.टी.डी. से अतिरिक्त सुरक्षा के लिए कोई अवरोधक साधन प्रयोग करने की सलाह दें |

पुरुष तथा महिला बंधीकरण

डॉक्टर जनित संक्रमण का खतरा | पी.आई.डी. के जोखिम को कम कर सकता है |

शल्य चिकित्सा में प्रयोग होने वाले सभी उपकरणों व औजारों को अच्छी तरह से कीटाणु रहित करें | ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर का सही प्रशिक्षण होना चाहिए | एस.टी.डी. से अतिरित्क्त सुरक्षा के लिए कोई अवरोधक साधन प्रयोग करने की सलाह दें |

स्वास्थ्य सेवकों का प्रयास

प्रजनन तंत्र के संक्रमणों व यौ.सं.रोगों के उपचार की सिंड्रोमिक (लक्षण समूह) पद्धतियों (लक्षण के समूह को “सिंड्रोम” कहते हैं )

इस पद्धति में स्वास्थ्यकर्मी अपने रोगियों का लक्षणों के आधार पर, न कि विशेष एस.टी.डी. के लिए उपचार करते हैं | उदाहरणतया वे योनि स्त्राव के लिए उपचार करते हैं, न कि गोनोरिया अथवा यीस्ट के लिए, जननांगों के जख्मों के लिए उपचार करते हैं न कि सिफलिस अथवा शेंक्राइड के लिए, और पेट के निचले भाग में दर्द के लिए उपचार करते हैं, न कि पेल्विक इन्फ्लामेंट्री डिजीज के लिए |

इस पद्धति के अनके लाभ है :

इससे अतिरिक्त निदान में सुधार होता है |

यह हर स्तर के स्वास्थ्यकर्मी द्वारा सीखी जा सकती है |

इससे लक्षणों से पीड़ित रोगियों का एक ही बार में उपचार शुरू किया जा सकता है | इसके कारण उन्हें एक बार परिक्षण कराने और फिर बार बार उपचार कराने के लिए आना बच जाता है |

इस पद्धति का नुक्सान यह है कि यह एस.टी.डी से ग्रस्त उन महिलाओं को छोड़ देती है जिन्हें कोई लक्षण नहीं हैं | कभी-कभी व्यर्थ में ही उन बिमारियों के उपचार करने में दवाईयां बरबाद कर दी जाती है जी रोगी को है ही नहीं |

यौ.सं.रोगों की रोकथाम

सुरक्षित यौन व्यवहार अपनाएं |

सहवास की हर क्रिया में एक कंडोम का प्रयोग करें | कंडोम एस.टी.डी., एच.आई.वी./एड्स आपके साथी के स्वास्थ्य तथा अवांछित गर्भ से आपकी रक्षा करेगा | अपने साथी को कंडोम प्रयोग करने के लिए प्रेरित करना सीखने के लिए अध्याय 5 देखिये |

अगर आपका साथी कंडोम का प्रयोग नहीं करना चाहता है तो शुक्राणुनाशक क्रीम अकेले ही या डायाफ्राम के साथ प्रयोग करें | इससे आपकी गोनोरिया तथा क्लेमाइडिया से कुछ हद तक रक्षा हो जाएगी |

सहवास के बाद जननांगों को बाहर से भली भांति धोएं |

सहवास के बाद पेशाब अवश्य करने जाएं |

योनि में कोई तरल पदार्थ, जड़ी बूटी, या सुखाने के लिए स्वस्थ रहने के लिए निर्मित उसकी पाउडर आदि न डालें | योनि को साबुन-पानी से धुलाई या तराई स्वस्थ रहने के लिए उसकी प्राकृतिक नमी के विरुद्ध काम करती है | अगर सहवास के दौरान योनि सुखी है तो इससे उसमें घर्षण व खुरचन होती है जिससे एड्स संक्रमण व अन्य एस.टी.डी. का जोखिम बढ़ जाता है |

समुदाय में सुरक्षित यौन व्यवहार के लिए कार्यरत

यौ.सं.रोग पुरे समुदाय के लिए स्वस्थ समस्या है | अपने समुदाय में यौ.सं.रोगों की रोकथाम के लिए आप –

  • पुरुषों व महिलाओं को यौ.सं.रोगों से उनके व उनके परिवारों के स्वास्थ्य को होने वाले खतरों के विषय में शिक्षित कर सकते हैं | ऐसे मौकों की तलाश कीजिए जहां महिलाएं एक समूह में एकत्रित हों – जैसे कि बाजार में या स्वास्थ्य केंद्र में प्रतिक्षरता | उन्हें यौ.सं.रोगों के फैलने व उनकी रोकथाम के तरीकों के बारे में जानकारी दें |

अन्य लोगों के साथ कार्य करके पुरुषों को कंडोम प्रयोग करने के प्रेरित करने के तरीके ढूंढे | समूह में इस का अभ्यास करें कि अपने साथी को कंडोम के प्रयोग के लिए क्या और कैसे कहा जाए |

अपने समुदाय में कंडोम उपलब्ध करायें | यह निश्चित करने के लिए कार्य करें ताकि सस्ते या नि:शुल्क कंडोम आपके समुदाय में स्थानीय दुकानों पर स्वास्थ्यकेंद्रों तथा स्वास्थ्यकर्मीयों से आसानी से मिल सकें |

समुदाय के पुरुषों को कंडोम के सही प्रयोग की विधि में प्रशिक्षित करें ताकि वे अन्य पुरुषों को भी इसे सिखा सकें |

सामुदायिक समूह का निर्माण करें ताकि वहां स्वास्थ्य समस्याओं और एस.टी.डी., एच.आई.वी./एड्स के विषय में चर्चा की जा सके | यह स्पष्ट करें कि किस प्रकार एस.टी.डी. की रोकथाम से एच.आई.वी./एड्स की भी रोकथाम हो सकेगी|

अपने समुदाय के स्कूलों में यौन शिक्षा देने की हिमायत करें | अभिभावकों को यह समझाएं कि बच्चे को एच.आई.वी./एड्स सहित यौ.सं.रोगों के विषय में शिक्षित करने से वे बड़े होकर सुरक्षित यौन व्यवहार अपना कर अपनी यौ.सं.रोगों से रक्षा कर सकेंगे |

किशोरों को अपने मित्रों को यौ.सं.रोगों के विषय में शिक्षित करने के लिए प्रेरित करें |

स्वास्थ्यकर्मियों से :

अपने स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र से पता करें कि आपके समुदाय में व्याप्त एस.टी.डी. के उपचार में कौन से दवाईयां कारगर हैं |

एस.टी.डी. से पीड़ित लोगों से बातचीत करें | उन्हें इस प्रकार की उपयोगी जानकारी दें कि वे कैसे ठीक हो सकते हैं, कैसे वे अन्यों को संक्रमित होने से बचा सकते हैं और किस प्रकार वे फिर इस संक्रमण के होने से अपना बचाव कर सकते हैं | यह भी सुनिश्चित करें कि उनके साथी भी आपना उपचार करवाएं |

अपने परिवार कल्याण कार्यकर्मों में एस.टी.डी., एच.आई.वी./एड्स की रोकथाम के विषय में जानकारी अवश्य सम्मिलित करें |

यौ.सं.रोगों से पीड़ित आपके पास आने वाले लोगों को दोषी न ठहराएं और न ही उनके विषय में कोई निर्णय दें |

स्वास्थ्य समस्याओं या एस.टी.डी. से पीड़ित व्यक्तियों की गोपनीयता का सम्मान करें | उनकी समस्याओं के बारे में दूसरों से चर्चा करें |

एक महिला के विचार

जब यौ.सं.रोगों तथा एड्स के विषय में चर्चा करने के लिए एक स्वास्थ्य कर्मचारी हमारे महिला मंडल में आया तो हमने अपनी जिंदगियों के बारे में बातचीत करना शुरू आकर दिया | कुछ महिलाओं ने कहा कि उन्हें तो कोई चिंता नहीं हैं लेकिन जैसे-जैसे हमने और बातचीत की तो हरेक को महसूस होने लगा कि एस.टी.डी. तथा एड्स के विषय में प्रत्येक महिला व पुरुष को चिंता करना आवश्यक है |

हमनें आपस में विचार विमर्श किया की पुरुषों को कंडोम के लिए राजी किया जाए | यह भी निर्णय किया गया की सारे समुदाय को यौ.सं.रोगों तथा एड्स के बारे में खतरों व उनकी रोकथाम के बारे में शिक्षित करने की आवशयकता है | हमने एक नाटक का आयोजन किया और उसमें समुदाय के लोगों से अभिनय करवाया | इस नाटक में हमनें एक विशेष पात्र ” कमांडर कंडोम“ की रचना की जो दूसरों को यौन संचारित रोगों व एड्स के खतरों, जिम्मेवाराना यौन व्यवहार तथा गलत धारणाओं व विश्वासों को समाप्त करने के महत्त्व के विषय में समझाता है | हर कोई इस नाटक को देखने आया | लोगों ने इसका भरपूर आनंद लिया और इसे काफी कुछ सिखा भी |अगर पुरुषगण कमांडर कंडोम के बारे में मजाक करते है | लेकिन अब वे कंडोम के प्रयोग के लिए अधिक राजी भी हैं, बिमारियों के बारे में अधिक जानकार हैं और जिम्मेवाराना यौन व्यवहार का महत्व बेहतर रूप से समझते हैं | उन्हें पुरुषों व महिलाओं का एक दुसरे की अधिक देखभाल व सम्मान करने का भी अहसास है |

स्रोत: राज्य स्वास्थ्य विभाग, विहाई, स्वास्थ्य संस्थान|

3.09523809524

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