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महिलाओं में कैंसर

इस पृष्ठ पर महिलाओं में कैंसर की बीमारी व स्थिति को बताया गया है|

भूमिका

कैंसर एक गंभीर है जो शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर सकती है | अगर इसका समय पर, शीघ्र उपचार किया जाए तो यह अकसर ठीक हो जाती है परंतु अगर इस जल्दी ध्यान नहीं दिया जाए तो इससे मृत्यु हो सकती है | जिन लोगों को कैंसर होता है, वे अकसर मृत्यु का शिकार हो जाते हैं – विशेषत: जिन्हें स्वास्थ्य सेवाएं आसानी से उपलब्ध नहीं हैं |

महिलाएं प्राय: स्वास्थ्य कर्मचारी तथा डॉक्टर के पास तब तक  नहीं जाती हैं जब तक वे भुत बीमार न हों | इसलिए उन महिलाओं की, जिन्हें कैंसर होता है, बहुत अधिक बीमार होने और मर जाने की संभावना अधिक होती है क्योंकि उनमें कैंसर की पहचान शीघ्र नहीं हो पाती है | इसके अतिरिक्त कभी-कभी कैंसर ग्रस्त महिलाओं को “श्राप-पीड़ित” मानकर उनके परिवारों तथा समुदायों द्वारा उनका त्याग कर दिया जाता है | अन्य लोगों से कैंसर पीड़ित महिला को दूर रखना, महिला तथा अन्य लोगों-दोनों के लिए ही खाराब बात है क्योंकि ऐसा करने से ये लोग कैंसर तथा उससे होने वाले कष्टों के बारे में जान नहीं पाते हैं |

कैंसर क्या है ?

सभी सजीव प्राणी, मनुष्य के शरीर की तरह, ऐसी छोटी-छोटी कोशिकाओं से निर्मित होते हैं जिन्हें सूक्ष्मदर्शी यंत्र की सहायता के बिना नहीं देखा जा सकता है | कभी-कभी ये कोशिकाएं परिवर्तित हो जाती हैं और असामान्य रूप से बढ़कर अबुर्द (ग्रोथ, रसौली) उत्पन्न कर देती हैं | इनमें से कुछ रसौलियां बिना उपचार के अपने आप ठीक हो जाती हैं परंतु कुछ बढ़ती जाती हैं या फ़ैल जाती हैं और उनके स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न कर देती हैं | अधिकांश रसौलियां कैंसर नहीं बनती हैं लेकिन कुछ अवश्य कैंसर बनती हैं ,इसलिए हर रसौली को गंभीरता से लेना चाहिए |

कैंसर की शुरुआत तब होती है जब कुछ कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और शरीर के भिन्न भागों पर कब्जा जमा लेती हैं | अगर कैंसर की शीघ्र पहचान हो जाए तो शल्य चिकित्सा के द्वारा इसे निकाला जा सकता है या दवाईयों अथवा विकिरण द्वारा इसका उपचार किया जा सकता है | ऐसे में इसके ठीक होने के अवसर अधिक होते हैं | अगर कैंसर फैल जाता है तो इसका उपचार करना कठिन और अंततः असंभव हो जाता है |

विभाजन द्वारा बनी कोशिकाएं

कैंसर शरीर के कोशिका उतकों में होता है | सामान्य उतक में यदा कदा होने वाला कोशिका विभाजन पुरानी या क्षतिग्रस्त कोशिका को विस्थापित कर देती हैं लेकिन कैंसर में, उग्र कोशिकाओं के अनियंत्रित विभाजन से रसौली बन जाती है | महिलाओं में होने वाले कैंसर में गर्भाशय ग्रीवा, स्तन तथा गर्भाशय का कैंसर सर्वाधिक होता है | जो कैंसर महिलाओं तथा पुरुषों दोनों में होते हैं, उनमें फेफड़ों, बड़ी आंत (कोलोन), जिगर, अमाशय (पेट), मुख तथा त्वचा के कैंसर सम्मिलित हैं |

कैंसर कोई संक्रमण नहीं होता है | यह एक व्यक्ति से दुसरे व्यक्ति को नहीं फैलता है और न ही आप इसे किसी से प्राप्त कर सकते हैं |

कैंसर होने के कारण

अधिकांश कैंसर के प्रत्यक्ष कारणों का अभी तक पता नहीं चला है लेकिन निम्नलिखित के कारण कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है :

  • तम्बाकू का प्रयोग : सभी कैंसर में 60%, तम्बाकू का विभिन्न रूपों में प्रयोग करने से होते हैं |
  • धुम्रपान: जिसके कारण फेफड़ों का कैंसर होना माना गया है, अन्य प्रकार के कैंसरों के होने के जोखिम को भी बढ़ा देता है |
  • कुछ प्रकार के विषाणुओं (वायरस) के संक्रमण जी कि-हेपेटाइटिस बी तथा जननागों के मस्से |
  • अत्याधिक चिकनाई या हानिकारक रसायनयुक्त खाद्य पदार्थों का सेवन |
  • कुछ दवाइयों, जैसे कि हार्मोन हा गलत प्रयोग |
  • कुछ रसायनों, जैसे कि कीटनाशक दवाइयों, रंग तथा घोलक द्रव्यों के साथ काम करना या उनके वातावरण में रहना |
  • शराब पीने से खाद्य नली तथा अमाशय का कैंसर हो सकता है |

जैसा कि स्तन के कैंसर में देखा गया है, अगर किसी महिला के परिवार में किसी विशेष कैंसर होने का इतिहास है तो उसे भी उसी प्रकार का कैंसर होने का अधिक खतरा होता है | इसे अनुवांशिक जोखिम कहते हैं |

भारत में वजन अनुपात में तम्बाकू की कुल मात्रा के सेवन का केवल 20% सिगरेटों के रूप में प्रयोग किया जाता है | लगभग 40 प्रतिशत बीडियों के रूप में तथा 40 % चबाने के तम्बाकू, नसवार, पान मसाला, गुटखा, हुकली, चट्टी घुमती, तथा अन्य मिश्रणों के रूप में प्रयुक्त होता है|

स्वस्थ जीवन शैली अनके प्रकार के कैंसर की रोकथाम कर सकती है | इसका अर्थ है पोषक खाद्य पदार्थों का सेवन करना तथा कैंसर उत्पन्न करने वाली चीजों से परहेज करना जैसे कि :

  • तम्बाकू सेवन ( धुम्रपान या चबाना) से बचें |
  • शराब न पिएं |
  • अपने घरों व कार्यस्थल पर हानिकारक रसायनों से बचें | ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन न करें जो इनमें उगाये गए हों या सुरक्षित किए गए हों |
  • एस.टी.डी. से अपनी रक्षा करें |
  • हरी, पत्तेदार सब्जियां, फलों तथा अंकुरित दलों व फलियों का अधिक मात्रा में सेवन करें|
  • विटामिन ‘ए’ तथा अन्य एंटीआक्सीडेंटस कैंसर से बचाव करते हैं |

कैंसर का शीघ्र पहचान तथा उपचार

कैंसर की शीघ्र पहचान करने से महिला की जान बचाई जा सकती है क्योंकि इससे कैंसर के फैलने से पहले ही उसका उपचार किया जा सकता है | कुछ कैंसरों के चेतावनी देने वाले लक्षण होते हैं जिनसे पता चलता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है | लेकिन आमतौर पर कैंसर की पहचान व निदान करने के लिए संभावित भाग से कुछ कोशिकाएं लेकर उनकी जांच की जाती है | यह जांच सूक्ष्मदर्शी यंत्र की सहायता से किसी प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा ही की जा सकती है |

जिन कैंसरों के चेतावनी चिन्ह नहीं होते हैं, उनकी शीघ्र पहचान स्क्रीनिंग परीक्षणों द्वारा ही की जाती है | उदाहरण के तौर पर गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के लिए किया जाने वाला “पेप टेस्ट “ ऐसा ही एक स्क्रीनिंग परिक्षण है |

गर्भाशय की ग्रीवा की आम समस्याएं

नेबोथियन पुटियाँ ( सिस्ट ) गर्भाशय ग्रीवा पर होने वाले वे छोटे-छोटे फफोले या उभार होते हैं जिनमें द्रव्य भरा होता है | इसके कारण कोई लक्षण नहीं होते हैं लेकिन इन्हें पेल्विक (आंतरिक) परिक्षण के दौरान स्पेकुलम की सहायता से देखा जा सकता है | ये सिस्ट्स हानिरहित होते हैं इसलिए इनका उपचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है |

पोलिप्स: ये गहरे लाल रंग के अबुर्द (उंगली के आकार की ग्रोथ) होती हैं जो कभी-कभी गर्भाशय ग्रीवा पर पाई जाती हैं | ये गर्भाशय के अंदर भी हो सकती हैं | इनके विषय में और अधिक जानकारी के लिए देखिए “ गर्भाशय की सामान्य रसौलियां “

गर्भाशय ग्रीवा का शोथ : योनि से कई संक्रमण और कभी कभी कुछ एस.टी.डी. भी गर्भाशय ग्रीवा को प्रभावित करते हैं और अबुर्द, जख्म या क्षोम तथा संभोग के पश्चात रक्तस्त्राव कर सकते हैं | इन समस्याओं के विषय तथा उनके उपचार के विषय में “ प्रजनन तंत्र संक्रमण वाला अध्याय” देखें |

गर्भाशय की ग्रीवा का कैंसर

अल्पविकसित देशों में महिलाओं में होने वाले कैंसरों में गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर सर्वाधिक होता है | इसका मुख्य कारण एक विषाणु है जो जननागों के मस्से उत्पन्न करता है | यह कैंसर लगभग 10 वर्ष तक धीरे-धीरे वृधि करता है और इसीलिए अगर इसका उपचार जल्दी कर दिया जाए तो इसको पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है | इसके बावजूद भी अनके महिलाओं की इस कैंसर के कारण मृत्यु हो जाती है क्योंकि उन्हें यह पता नहीं होता है कि उन्हें कैंसर था |

किसी महिला को गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर होने का जोखिम अधिक होता है अगर –

  • उसकी आयु 35 वर्ष से अधिक है |
  • उसने कम आयु में ही (मासिकधर्म शुरू होने के कुछ वर्ष के भीतर ही) संभोग क्रिया आरम्भ कर दी थी |
  • उसके अनेक यौन साथी रहे हैं या उसके साथी के अनेक यौन साथी हैं |
  • वह एस.टी.डी. – विशेषत: जननांगों के मस्सों को बार बार शिकार हुई है |
  • उसे एच.आई.वी./एड्स है |
  • वह घूम्रपान करती है |

खतरे के लक्षण :

  • अनियमित या असामान्य रक्त स्त्राव |
  • योनि से रक्तरंजित या दुर्गंधयुक्त सफेद स्त्राव होना |
  • संभोग के बाद खून जाना |
  • रजोनिवृति के बाद खून जाना |

ये सारे लक्षण किसी गंभीर समस्या के सूचक हो सकते हैं जिसमें गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर भी शामिल है | यह बहुत महत्वपूर्ण है कि नियमित रूप से परीक्षण कराया जाए ताकि समस्या का शीघ्र पता चल सके और उसके-लाइलाज होने या फैलने से पहले ही उसका उपचार किया जा सके |

गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर का निदान तथा उपचार

चूँकि गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के शीघ्र होने वाले खतरे के लक्षण नहीं होते हैं और शीघ्र पता चलने पर इसका पूर्ण उपचार संभव है,इसलिए यह आवशयक है कि इसकी उपस्थिति की नियमित जांच करवाई जाए | इन परीक्षणों में गर्भाशय ग्रीवा में असामान्य या कैंसर वाले (इसके फैलने से पूर्व वाले) हो सकते हैं |

पेप टेस्ट

इन परीक्षणों में सर्वाधिक रूप से किया जाने वाला टेस्ट है – पेप टेस्ट | इस टेस्ट के लिए स्वास्थ्यकर्मी पेल्विक (आंतरिक) परिक्षण के दौरान गर्भाशय ग्रीवा से दर्द रहित तरीके से , कुछ कोशिकाएं खुरच कर उन्हें परिक्षण के लिए प्रयोगशाला में भेज देता है जहां उनकी सूक्ष्मदर्शी की सहायता से जांच की जाती है | जब आप यह टेस्ट करवाएं तो इसकी रिपोर्ट लेने कुछ सप्ताह बाद अवश्य जाएं |

आंखों से अवलोकन

गर्भाशय ग्रीवा में कैंसर की शीघ्र पहचान करने के लिए एक नया, कम खर्च वाला तरीका ढूंढा गया है जिसमें सिरके के घोल (एसिटिक एसिड) को जब महिला की गर्भाशय ग्रीवा पर लगाया जाता है तो यह कैंसर या असामान्य ऊतक को सफेद कर देता है | कभी-कभी एक छोटे से लैंस की सहायता से गर्भाशय ग्रीवा का अवलोकन किया जाता है | अगर वहां कोई असामान्य ऊतक नजर आता है तो महिला के अन्य परिक्षण या उपचार किया जाता है |

कैंसर की पहचान के अन्य टेस्ट

  • बायोप्सी. इसमें गर्भाशय ग्रीवा से के छोटा टुकड़ा लेकर उसे कैंसर कोशिकाओं के परिक्षण के लिए प्रयोगशाला में भेजा जाता है |
  • कोल्पोस्कोपी. यह उपकरण केवल कुछ अस्पतालों में उपलब्ध है और इससे गर्भाशय ग्रीवा को बड़ा करके देखा जाता है | इससे कैंसर के चिन्हों को देखने में आसानी होती है |

महत्वपूर्ण : अगर आपका योनि स्त्राव के लिए दवाइयों से उपचार हो रहा है लेकिन वह ठीक नहीं हो रहा है तो आप अपनी गर्भाशय ग्रीवा का परिक्षण अवश्य करवाएं और एक पेप टेस्ट करवा कर कैंसर के लिए जांच करवाएं |

महिलाओं के लिए कितनी बार जांच होनी चलिए

गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की शीघ्र पहचान करने तथा उसक सरलता से सफलतापूर्वक उपचार करने के लीए यह आवशयक है कि महिलाओं की 3 वर्ष में कम से कम एक बार जांच अवश्य होनी चाहिए | जहां यह संभव न हो, वहां महिलाओं की, विशेष रूप से 35 वर्ष में एक बार जांच अवश्य करवाने का प्रयत्न करना चाहिए | आपकी अधिक बार जांच तब अवश्य होनी चाहिए जब-

  • आपको गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर होने का जोखिम अधिक हो |

आपके पेप टेस्ट में कुछ असामान्य कोशिकाएं पाई गई हों | ये कोशिकाएं अक्सर कैंसर में परिवर्तित नहीं होती हैं और 2-3 वर्ष में सामान्य हो जाती है | लेकिन चूँकि ये कोशिकाएं कैंसर का शीघ्र सूचक हो सकती हैं, इसलिए आपको पहले पेट टेस्ट के 1-2 वर्ष के भीतर ही दूसरा पेप टेस्ट करवाना चाहिए ताकि यह सुनिशिचित किया जा सके कि कैंसर बढ़ नहीं रहा है |

उपचार :

अगर जांच से पता चलता है कि आपको अत्यधिक डिस्प्लेसिया या बढ़ा हुआ कैंसर है तो आपको उपचार की आवशयकता होगी | आप और आपके डॉक्टर को मिलजुल कर यह निश्चित करना चाहिए कि आपके लिए सर्वोतम उपचार क्या रहेगा | कैंसर की शुरू की अवस्था में उपचार आम तौर पर सरल रहता है जिससे कैंसर वाले ऊतक को निकाल दिया जाता है या उसे नष्ट कर दिया जाता है |

कुछ स्थानों पर “क्रायोथेरेपी” नामक उपचार उपलब्ध है जिसके द्वारा गर्भाशय ग्रीवा को बहुत ठंडा करके जमा दिया जाता है और कैंसर को नष्ट आकर दिया जाता है | एक अन्य तरीका है गर्भाशय ग्रीवा की “शंकु (कोन) बायोप्सी” जिसमें कैंसर ग्रस्त गर्भाशय ग्रीवा के भाग को निकाल दिया जाता है | अगर यह उपचार उपलब्ध है तो यह आपके लिए उस स्थिति में सर्वोतम रहेगा जब आप और बच्चे चाहती हैं क्योंकि इसमें गर्भाशय को सुरक्षित रहने दिया जाता है | अगर कैंसर की फैलने से पहले ही पहचान करके उसका उपचार कर दिया जाए तो यह ठीक हो जाता है |

अगर कैंसर गर्भाशय ग्रीवा में ही सीमित है तो गर्भाशय को निकलने (हिस्तेरेक्टोमी) से काफी लाभ होता है | अगर काफी बढ़ने के बाद कैंसर का पता चलता है तो वह गर्भाशय ग्रीवा से बाहर फैल चूका हो सकता है | उस अवस्था में विकिरण (रेडिएशन) उपचार से सहायता मिल सकती है|

गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है

जब लोगों को यह पता नहीं होता है कि गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर कितन खतरनाक हो सकता है और किस प्रकार इसकी जल्दी पहचान से मृत्यु रोकी जा सकती है तो काफी महिलाएं इस कारण मृत्यु का शिकार हो जाती है | इस स्थिति को बदलने के लिए, हम सब कर सकते हैं :

  • इसके बारे में जानें कि महिला के लिए किन कारणों से जोखिम बढ़ जाता है और मिल-जुलकर इन जोखिमों को कम करने के तरीके ढूंढें | यह लड़कियों के लिए विशेषत: महत्वपूर्ण है की वे पूर्णतया विकसित महिला बनने तक संभोग क्रिया शुरू न करें | महिलाओं को यौ.सं.रोगों से अपनी सुरक्षा कर सकने में भी सक्षम होना चाहिए |
  • कैंसर के लिए स्क्रीनिंग (जांच) के विषय में जानें | गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की शीघ्र पहचान से जिंदगियां बचाई जा सकती है |

विश्व के कई भागों में अस्पतालों के नजदीक रहने वाली महिलाओं के लिए “पेप टेस्ट की सुविधा उपलब्ध है | अन्य महिलाएं भी उन क्लीनिकों से पेप टेस्ट करा लेती हैं जो मातृ व शिशु स्वास्थ्य, परिवार नियोजन व यौ.सं.रोगों के उपचार की सेवाएं प्रदान करती हैं |

स्क्रीनिंग कार्यक्रमों को विकसित करना काफी महंगा लग सकता है लेकिन यह उपचार के मुकाबले बहुत सस्ता पड़ता है | सास्ते दामों में महिलाओं की सहायता करने में स्क्रीनिंग कार्यक्रम काफी प्रभावी हो सकते हैं अगर –

  • वे थोड़ी अधीक आयु की महिलाओं को लक्षित करें | हालांकि गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर युवा महिलाओं को भी हो सकता है परंतु 35 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को इसका जोखिम अधिक होता है |
  • वे जीतनी अधिक महिलाओं जांच कर सकें, उतना ही अच्छा चाहे इसका अर्थ महिलाओं की कम बार जांच करना ही क्यों न हों | 5-10 वर्ष में एक बार सभी महिलाओं की जांच करने से, एक महिला कम समय में बार-बार जांच करने की अपेक्षा, कैंसर के अधिक रोगियों का पता चल सकता है |
  • स्थानीय स्वास्थ्य कर्मचारियों को पेप टेस्ट करने तथा गर्भाशय ग्रीवा का सीधा अवलोकन करने की विधि में प्रशिक्षित किया जाए |

गर्भाशय की सामान्य रसौलियां

फाइब्राइड रसौलियां

ये गर्भाशय की रसौलियां है | इनके कारण योनि से असामान्य रक्त स्त्राव, पेट के निचले भाग में दर्द तथा बार-बार स्वत: गर्भपात हो सकतें हैं | ये लगभग कभी भी कैंसर नहीं होती है |

लक्षण :

अधिक माहवारी होना या महीने में असामान्य रूप से खून जाना |

  • पेट के निचले भाग में भारीपन या दर्द होना
  • संभोग के दौरान गहराई में दर्द होना |

फाइब्राइड की पहचान व उपचार

इनकी पहचान आमतौर पर पेल्विक परिक्षण के दौरान होती है | गर्भाशय अत्यधिक बड़ा या गलत आकार का महसूस होता है | अगर एक परिक्षण – जिसे “अल्ट्रासाउंड” कहते हैं – उपलब्ध हो तो इससे फाइब्राइड के आकार का अंदाजा लग सकता है |

अगर फाइब्राइड के कारण कोई लक्षण उत्पन्न हो रहे हैं तो उन्हें शल्य चिक्तिसा के द्वारा निकाला जा सकता है | अगर फाइब्राइड के कारण रक्त स्त्राव अधिक हो रहा है | इसकी रोकथाम के लिए लौह तत्व से भरपूर पौष्टिक भोजन खाईए |

पोलिप्स

ये गहरे लाल रंग के अबुर्द (उंगलीयों के आकार की ग्रोथ) होते हैं जो गर्भाशय के अंदर या गर्भाशय ग्रीवा में हो सकती है | वे विरले ही कैंसर होती है |

लक्षण :

  • संभोग के बाद खून जाना
  • माहवारी अधिक होना या महीने में असामान्य रक्त स्त्राव होना |

पोलिप्स का निदान व उपचार :

पेल्विक परिक्षण के दौरान किसी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी द्वारा गर्भाशय ग्रीवा पर स्थित पोलिप्स को देखकर, उन्हें दर्दरहित तरीके से निकला जा सकता है | गर्भाशय के अंदर स्थित पोलिप्स के निदान के लिए गर्भाशय की भीतरी भित्ति को खुरचा जाता है (इस क्रिया को डी.एंड.सी. कहते हैं) | डी.एंड.सी. से पोलिप्स भी निकाल दिए जाते हैं | इस खुरचन को प्रयोगशाला में यह सुनिश्चित करने के लिए भेजा जाता है कि उसमें कैंसर तो नहीं है | एक बार पोलिप्स को निकल देने के बाद, वे आमतौर पर फिर से नहीं उगते हैं |

गर्भाशय का कैंसर

(एन्डोमिट्रिअल कैंसर )

आम तौर पर गर्भाशय का कैंसर गर्भाशय की अंदरूनी भित्ति (एंडोमिट्रिअम) में शुरू होता है | अगर इसका उपचार शुरू नहीं किया जाए तो यह गर्भाशय के अंदर और शरीर के अन्य अंगों में भी फ़ैल सकता है | यह कैंसर अधिकतर उन महिलाओं को होता है जो –

  • 40 वर्ष से अधिक आयु की हैं (विशेषत: जो रजोनिवृति हो चुकी हैं ) |
  • मोटी हैं |
  • मधुमेह (डायबिटीज) की रोगी हैं |
  • इस्ट्रोजन हार्मोन का, प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन को लिए बिना, सेवन कर चुकी हैं |
  • बहुत कम बार या बिल्कुल भी गर्भवती नहीं हुई हैं |

लक्षण :

  • माहवारी अधिक भारी होना
  • असामान्य माहवारी होना या महीने में असामान्य रक्त स्त्राव होना |
  • रजोनिवृति के बाद रक्त स्त्राव होना |
  • दुर्गंधयुक्त सफेद या रक्तरंजित योनि स्त्राव |

गर्भाशय के कैंसर का निदान तथा उपचार

गर्भाशय के कैंसर के निदान के लिए किसी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी द्वारा गर्भाशय की डी.एंड.सी. करके उसकी खुरचन को परिक्षण के लिए प्रयोगशाला में भेजा जाता है | अगर उस परीक्षण में कैंसर का पता चलता है तो इसे शीघ्रातिशीघ्र सल्य चिकित्सा द्वारा निकलवाना चाहिए | ( गर्भाशय को निकलना या “हिस्टेरेक्टमी” ) विकिरण चिकित्सा ( “रेडिएशन थेरेपी”) का भी प्रयोग किया जा सकता है |

गर्भाशय को निकलना या (“हिस्टेरेक्टमी”)

हिस्टेरेक्टमी में कभी-कभी केवल गर्भाशय को (आंशिक हिस्टेरेक्टमी) और कभी-कभी उसके साथ अंडाशयों तथा फैलोपियन नलिकाओं को भी निकाला जाता है (पूर्ण हिस्टेरेक्टमी) | चूँकि आपके अंडाशय ह्रदय रोगों तथा हड्डियों को कमजोर होने से बचाने के लिए आवशयक हार्मोन का निर्माण करते हैं, इसलिए उन्हें, अगर संभव है तो, छोड़ना ही अच्छा है | तदापि अगर उनमें कैंसर के फैल चुके होने का जरा सा भी अंदेशा है तो अंडाशयों तथा फैलोपियन नलिकाओं को निकालना अति आवशयक है | इस विषय में अपने डॉक्टर से परामर्श करें |

अगर गर्भाशय के कैंसर का जल्दी पता चल जाए तो यह उपचार से ठीक हो सकता है | अगर यह अधिक बढ़ चूका है तो इसका उपचार कठिन होता है |

महत्वपूर्ण :

कोई भी महिला अगर 40 वर्ष से अधिक आयु की है और उसे असामान्य रक्त स्त्राव है तो उसे स्वास्थ्यकर्मी से परिक्षण कराना चाहिए |

स्तनों की समस्याएं

स्तनों में गांठे

अधिकांश महिलाओं में स्तनों में गांठें-विशेषत: नर्म तथा तरल पदार्थ से भरी हुई गांठें (पुटि या सिस्ट ) होना एक आम बात है | ये आम तौर पर महिला के मसिक चक्र के हिसाब से घटती-बढ़ती रहती है और कभी-कभी इन्हें दबाने पर दर्द भी होता है | स्तनों में होने वाली गांठों में से बहुत कम ही कैंसर की गांठें होती हैं | लेकिन चूँकि इन गांठों में कैंसर की संभावना होती अवश्य है, इसलिए महिला को महीने में एक बार अपने स्तनों का गांठों को उपस्थिति के लिए परिक्षण अवश्य करना चाहिए |

चूचक (निप्पल) से स्त्राव (डिस्चार्ज)

अगर महिला ने पिछले 12 महीनों में बच्चे को स्तनपान कराया है तो एक या दोनों निप्पलों से स्त्राव होना लगभग सामान्य बात है | निप्पलों – विशेषकर केवल एक निप्पल से, भूरा, हरा या रक्त रंजित स्त्राव कैंसर का एक चिन्ह हो सकता है | अपना परिक्षण किसी स्वास्थ्य कर्मचारी से करवाएं जो आपके स्तनों का परिक्षण कर सकने में कुशल हो |

स्तनों में संक्रमण

अगर कोई महिला स्तनपान करा रही है और उसके स्तनों के किसी भाग में गर्माहट तथा लाली उत्पन्न हो जाए , तो शायद उसे स्तनों का संक्रमण हो गया है या उसमें मवाद भर गई है | यह कैंसर नहीं है और इसका उपचार पूर्णतया संभव है | परंतु अगर महिला स्तनपान नहीं करा रही हैं तको ये लक्षण कैंसर के सूचक हो सकते हैं |

स्तनों का कैंसर

स्तनों का कैंसर बहुत धीरे-धीरे बढ़ता है | अगर इसकी जल्दी पहचान हो जाये तो कभी कभी इसका पूरा उपचार किया जा सकता है | यह कहानी कठिन है कि किस महिला को यह कैंसर होगा, किस को नहीं | जिन महिलाओं की मां या बहन को स्तनों का कैंसर हो चूका है यका जिन्हें गर्भाशय का कैंसर है / हो चूका है, उन्हें स्तनों का कैंसर होने की संभावना अधिक होती है | 50 वर्ष से अधिक महिलाओं में स्तन कैंसर अधिक होता है | स्तनपान न कराने वाली महिलाओं को भी इसका जोखिम अधिक होता है |

खतरे के संकेत चिन्ह :

  • केवल एक स्तन में ऐसी दर्दरहित, उबड़-खाबड़ किनारों वाली गांठ का होना जो उपरी त्वचा से एकदम चिपकी हुई हो |
  • स्तन के ऊपर लाली या ऐसा जख्म जो भर न रहा हो |
  • स्तन के ऊपर की त्वचा में ऐसा खुरदुरापन होना जैसे कि गढ़े हो गए हों, जो संतरे के छिल्के के ऊपर की सतह जैसे दीखते हैं |
  • अंदर की ओर धंसा हुआ निप्पल |
  • निप्पल से असामान्य स्त्राव |
  • कभी-कभी बगल में दर्द रहित गांठ बनना |
  • विरले स्तन में दर्द होना

अगर इनमें से एक या अधिक चिन्ह है तो तुरंत किसी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी से संपर्क करें |

स्तनों का स्वयं-परिक्षण कब करें

स्तन कैंसर के विरुद्ध सफलता की कुंजी हिया गांठ का शीघ्र पहचान | गांठ जितनी छोटी होगी, उसके उपचार की संभावना उतनी अधिक होगी | आपके स्तन में गांठ की पहचान करने वाला पहला व्यक्ति आप ही होनी चाहिए | इसलिए यह आवशयक है कि आप अपने स्तन का विधिवत परिक्षण करना सीखें |

स्तनों का स्वयं परिक्षण कब करें

माहवारी समाप्त होने के 3-4 दिन बाद इसे करने का सर्वोतम समय है | तब आपके स्तनों में न तो सूजन होती है और न ही दर्द | अगर आपकी माहवारी नियमित नहीं है या वह किसी महीने आती नहीं है तको प्रत्येक माह एक निश्चित तारीख को यह परिक्षण करें | 20 वर्ष से कम आयु से शुरू करके , प्रत्येक महिला को अपने स्तनों का गांठों, मोटापन या अन्य कोई परिवर्तनों के लिए परिक्षण करना चाहिए |

स्तनों का स्वयं परिक्षण कैसे करना चाहिए

  1. अपने स्तनों को दर्पण में देखें | उनके आकार, या रूप में परिवर्तन, निप्पलों के अंदर घंसने, उनके ऊपर की त्वचा मोटा होने या उस पर गड्ढे पड़ने या कोई स्पष्ट रूप से दिख रही असामान्य गांठ पर गौर करें |
  2. अपने दोनों हाथों को सिर से ऊपर उठायें और दोनों स्तनों की समरूपता पर गौर करें |
  3. अपने दोनों हाथों को कमर पर रखकर उन्हें कमर पर दबायें | यह स्थिति स्तन के ऊपर उपस्थित कोई धंसाव या गड्ढों को अधिक स्पष्ट कर सकेगी |
  4. कमर के बल लेटकर एक बांह को सीधा रखकर उसे फैलायें | दुसरे हाथ की उंगलीयों को एक दुसरे से मिलकर, इनकी सपाट सतह से दूसरी और के स्तन का परिक्षण करें | स्तन को अंगूठे व उंगलीयों के बीच दबाकर परिक्षण न करें | परिक्षण करते समय स्तन को इतनी जोर से अवश्य दबायें कि आपको अपने स्तन के स्पर्श का अनुभव हो जाए | प्रत्येक स्तन के निचले हिस्से पर एक सख्त घुमाव का महसूस होना सामान्य है |
  5. पुरे स्तन को विधिवत रूप से महसूस करें | स्तन को पाँच भागों में बंटा हुआ माने : उपरी अंदरूनी भाग, उपरी बाहरी भाग, निचला अंदुरुनी भाग, निचला बाहरी भाग, तथा निप्पल के नीचे केन्द्रीय भाग | किसी भी भाग को छोड़े बिना पुरे स्तन को महसूस करें |
  6. इसी तरीके से दुसरे स्तन का भी परिक्षण करें | स्तन में किसी गांठ के होने का अर्थ कैंसर नहीं होता है | वास्तव में अधिकतर गांठे कैंसर वाली नहीं होती हैं और बहुत सरल उपचार से ठीक हो जाती है | तदापि स्तन में गांठ का अर्थ उसकी पूर्ण चिकित्सकीय जांच करवाना |

स्वयं स्तन परिक्षण स्नान करे समय भी किया जा सकता है | साबुन युक्त हाथ त्वचा पर सरलता से फिसलता है और स्तन के स्पर्श को महसूस करना काफी आसान हो जाता है |

स्तन कैंसर की पहचान तथा उपचार

अगर आप अपने स्तनों का नियमित रूप से स्वयं परीक्षण करती हैं तो आप उनमें होने वाले किसी परिवर्तन या नई गांठों को पहचान सकेंगी | प्रतिमास आपकी माहवारी के पांचवे या छठे दिन स्तनों को स्वयं परिक्षण करना काफी उपयोगी होता है | रजोनिवृति महिलाओं को मॉस में एक बार, किसी निश्चित सुविधाजनक समय पर स्तनों का स्वयं परिक्षण करना चाहिए  | मेमोग्राम नामक एक विशेष प्रकार के एक्स-रे से स्तनों ही गांठ को जल्दी ही तभी पहचाना जा सकता है जब वे छोटी व हानिरहित होती हैं | लेकिन मोनोग्राम काफी महंगे तथा हर स्थान पर उपलब्ध नहीं होते हैं | इसके अतिरिक्त, इनसे यह भी पता नहीं चलता है कि कोई गांठ कैंसर वाली है या नहीं |

स्तन कैंसर के निदान का एकमात्र विश्वसनीय तरीका है गांठ की बायोप्सी कराना | इसके लिए शल्य चिकित्सक गांठ के एक भाग को या उसे चाकू या सुई द्वारा पूर्णतया निकल देता है और इसे कैंसर के परिक्षण के लीये प्रयोगशाला में भेज दिया जाता है |

स्तन कैंसर का उपचार उसकी अवस्था तथा आपके क्षेत्र में उपलब्ध सुविधाओं पर निर्भर करता है | अगर गांठ छोटी है और इसकी शीघ्र पहचान हो जाती है तो केवल उसी को शल्यचिकित्सा द्वारा निकालना ही पर्याप्त हो सकता है | लेकिन स्तन कैंसर के कुछ मामलों में पुरे स्तन को ऑपरेशन द्वार निकालने की आवशयकता पड़ सकती है | कभी-कभी डॉक्टर्स दवाइयां तथा विकिरण चिकित्सा का भी प्रयोग करते हैं |

स्तन कैंसर की रोकथाम के बारे में किसी को भी पूरी तरह से पता नहीं है | लेकिन यह अवश्य पता है कि इस कैंसर की शीघ्र पहचान व उपचार से इसके ठीक होने की संभावना काफी अच्छी हो जाती है | कुछ महिलाओं में यह फिर से नहीं होता है परंतु कुछ में यह कुछ वर्षों के बाद फिर से हो सकता है | यह उसी स्तन में , दुसरे स्तन में या शरीर के अन्य भागों में प्रकट हो सकता है |

अंडाशयों में पुटियां (सिस्ट्स)

ये द्रव से भरी हुई वे “थैलियों“ जैसे पुटियां (सिस्ट्स) है जो महिला के अंडाशयों में हो जाती है | ये केवल प्रजनन काल (किशोरावस्था तथा रजोनिवृति के बीच के समय ) में ही होती है | सस्ते के कारण पेट के निचले भाग में दर्द तथा अनियमित माहवारी हो सकती है लेकिन अकसर ही महिलाओं को इनके बारे में तब पता चलता है जब स्वास्थ्य कर्मचारी उनका पेल्विक (आंतरिक) परिक्षण करता है |

अधिकतर सिस्ट्स कुछ ही महीनों तक रहती है और अपने आप ही ठीक हो जाती है लेकिन इनमें से कुछके बहुत बड़ी हो सकती है और उनको शल्य चिकित्सा के द्वारा निकालना आवशयक हो जाता है | अगर आपको दर्द बहतु अधिक है तो तुरंत किसी स्वास्थ्यकर्मी से संपर्क करें |

अंडाशयों का कैंसर

अंडाशयों का कैंसर अधिक होने वाली बीमारी नहीं है | इसके कोई खतरे के लक्षण भी नहीं होते हैं लेकिन स्वास्थ्यकर्मी को पेल्विक परिक्षण करते समय यह महसूस हो सकता है कि अंडाशय सामान्य से बड़े आकार के हैं | इसके उपचार के लिए शल्य चिकित्सा, दवाइयां तथा विकिरण चिकित्सा प्रयोग की जाती है लेकिन उपचार काफी कठिन होता है |

अन्य सामान्य कैंसर

 

फेफड़ों का कैंसर

फेफड़ों का कैंसर एक बढ़ती हुई समस्या है जो प्राय: तंबाकू के धुम्रपान से होती है | यह पुरुषों में अधिक होती है क्योंकि वे महिलाओं की अपेक्षा अधिक घूम्रपान करते हैं | लेकिन आजकल चूँकि अनके महिलाओं पुरुषों के बरबर धुम्रपान करती हैं,इसलिए उन्हें भी यह कैंसर अधिक होने लगा है | कुछ देशों में आजकल फेफड़ों के कैंसर से मरने वाली लड़कियों व महिलाओं की संख्या में वृधि हो रही है, इसलिए फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित महिलाओं की संख्या और भी बढेगी |

आम तौर पर फेफड़ों का कैंसर 40 वर्ष से कम आयु के लोगों को नहीं होता है | अगर कोई महिला घुम्रापन करना छोड़ देती है तो उसे फेफड़ों के कैंसर का खातर कम हो जाता है | फेफड़ों के कैंसर का खतरा कम हो जाता है | फेफड़ों के कैंसर के लक्षण (खांसी,बलगम के साथ खून आना, वजन में गिरावट, सांस लेने में कठिनाई ) तब प्रकट होते हैं जब यह काफी बढ़ चूका होता है अरु इसका उपचार कठिन हो जाता है | इसके उपचार के लिए शल्यचिकित्सा, दवाइयां व विकिरण सभी प्रयोग की जाती है |

मुख व गले का कैंसर

मुख व गले के कैंसर धुम्रपान व तंबाकू चबाने से हो सकते हैं|अगर आप धुम्रपान करते हैं या तंबाकू चबाते हैं और आपके मुख में न भरने वाले जख्म है या फिर आपना मुहं पूरी तरह से नहीं खोल सकते हैं तो तुरंत डाक्टरी सलाह लें|

जिगर (यकृत) का कैंसर

हेपेटाइटिस-बी नामक जिगर के संक्रमण से पीड़ित कुछ लोगों को कई वर्षों के बाद यह कैंसर हो सकता है | इसके लक्षणों में पेट का फूलना तथा समान्य कमजोरी सम्मिलित हैं | अगर आपको लगता है कि आपको जिगर का कैंसर हो सकता है तो किस स्वास्थ्यकर्मी से संपर्क करें |

हेपेटाइटिस-बी की सुरक्षित यौन व्यवहार अपनाने तथा टीकाकरण से रोकथाम की जा सकती है | शिशुओं की हेपेटाइटिस-बी से रक्षा के लिए जन्म पर ही टिका लगवा देना चाहिए | वयस्कों को यह टिका किसी भी आयु पर लगवाया जा सकता है |

पेट (अमाशय) का कैंसर

यह 40 वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों व महिलाओं को हो सकता है | अकसर ही अधिक बढ़ जाने की अवस्था तक इसके कोई लक्षण नहीं होते हैं | शल्यचिकित्सा ही इसका एकमात्र उपचार है और यह हमेशा नहीं होती है |

जब कैंसर लाइलाज हो

अनके प्रकार के कैंसरों का उपचार संभव है जबकि अन्य का उपचार संभव नहीं होता है –विशेषत: अगर वे शरीर के अन्य अंगों में फैल चुके हों | इसके आलावा, कैंसर का उपचार करने वाले अस्पताल प्राय: बड़ी दूर, बड़े शहरों में होते हैं और उपचार भी काफी महंगा होता है |

कभी-कभी जब कैंसर की पहचान देर से होती है तो यह असाध्य (लाइलाज) हो चूका होता है | ऐसी स्थिति में शायद अपने परिवारजनों की देखरेख में घर पर रहना ही सर्वोतम है | यह समय बहुत कठिन हो सकता है | ऐसे में जिनता हो सके, ठीक से भोजन करें और पर्याप्त आराम करें | दर्द, चिंता तथा नींद की समस्याओं के लिए दवाइयां लेकर आप काफी राहत पा सकते हैं | अपने किसी नजदीकी व्यक्ति से बातचीत करके आप अपने आपको अन्तकाल के लिए तैयार कर सकते हैं, अपने बाद आपके परिवार के भविष्य की योजना बना सकते हैं |

स्थानीय आवश्यक कार्यवाही

कैंसर से होने वाली अनेक अनावश्यक मौतों को रोका जा सकता है | अगर अनेक कैंसरों का शीघ्र निदान व उपचार हो जाए तो कैंसर से होने वाली अनके अनावश्यक मौतों को रोका जा सकता है | इसे संभव करने के लिए, महिलाओं तथा पुरुषों को यह सब करने के लिए संगठित करें :

  • स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर की स्क्रीनिंग की बेहतर सुविधाएं |
  • स्थानीय स्वास्थ्य कर्मचारीयों का गर्भाशय ग्रीवा का आंखों से अवलोकन, पेप टेस्ट तथा स्तन परिक्षण करने में प्रशिक्षण |
  • पेप टेस्ट को ठीक से पढ़ने के लिए आवशयक प्रयोगशालाएं व प्रशिक्षित कर्मचारी |
  • कैंसर की रोकथाम के लिए समुदाय में अधिक जागरूक व शिक्षा, कैंसर के खतरे के चिन्ह तथा अधिक जोखिम वाली स्थितियों और कैंसर स्क्रीनिंग के लाभों के बारे में जानकारी महिलाओं के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि वे –
  • स्वयं स्तन परिक्षण करना सीखें |
  • कैंसर-विशेषत: गर्भाशय, स्तन तथा गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के लक्षणों के बारे में जानें |

जब समुदाय में अधिकांश व्यक्ति कैंसर उत्पन्न करने वाले पदार्थों के विषय में जानकार होंगे तो संभवत: वे उनसे अधिक बच सकेंगे | ऐसा होने से अनके प्रकार के कैंसर को शुरू होने से रोका जा सकता है | अपने समुदाय में लोगों को यह समझने में सहायता कीजिए कि अगर वे धुम्रपान तथा तंबाकू से बचें और महिलाएं अपने आप की यौन संचारित रोगों से रक्षा कर सकें तो कैंसर से होने वाली अनेक अनावश्यक मौतों को रोक सकते हैं |

स्रोत: स्वास्थ्य विभाग, विहाई, ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान लाइब्रेरी|

2.97872340426

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