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प्रजनन के बाद स्वास्थ्य

प्रजनन के बाद स्वास्थ्य जीवन के सभी चरणों में प्रजनन प्रक्रियाओं, कार्यों और प्रणाली से संबंधित है और इस भाग में जीवन के सभी चरणों में प्रजनन प्रक्रियाओं, कार्यों और प्रणाली, प्रजनन स्वास्थ्य आदि का वर्णन किया गया है।

आर्तव स्राव

आर्तव गर्भाशय की अंत: गर्भाशय कला (endometrium) के रक्त स्राव के साथ झड़ने को कहते हैं।यह गर्भावस्था को छोड़कर,स्त्री के सारे प्रजनन जीवन में लगभग हर महीने के चक्र में होती है।आर्तव वयस्कता प्राप्त करने के रज:स्वला होने के समय शुरू होती है और रजोनिवृति पर पूरी तरह से रुक जाती है।

आर्तव चक्र

आर्तव चक्र रक्तस्राव के पहले दिन शुरू होता है,जिसे दिवस 1 माना जाता है.यह चक्र अगले आर्तव चक्र के शुरू होने के ठीक पहले समाप्त होता है.आर्तव चक्र सामान्य तौर पर 25 से 36 दिनों के होते हैं.केवल 10 से 15% स्त्रियों में ठीक 28 दिनों का चक्र होता है।साधारणतः वयस्कता रज:स्वला प्राप्त होने के तुरंत बाद और रजोनिवृति के पहले के वर्षों में चक्रों में सबसे अधिक भिन्नता होती है और आर्तवचक्र के बीच अंतराल सबसे लंबे होते हैं।

मासिक रक्तस्राव 3 से 7 दिनों तक,या औसतन 5 दिनों तक होता है.एक चक्र में ½ से 2½ औंस तक रक्त ह्रास होता है.प्रकार के अनुसार एक सैनिटरी पैड या टैम्पोन एक औंस तक रक्त को सोख सकता है.आर्तव का रक्त का,चोट से निकलने वाले रक्त की तरह साधारणतः स्कंदन नहीं होता,सिवाय तब जब रक्त स्राव काफी अधिक हो रहा हो।

मासिक चक्र अंत:स्रावों द्वारा नियंत्रित होता है।पीयूष ग्रंथि द्वारा उत्पन्न लूटीनाइजिंग अंत:स्राव और फालिकल-स्टिमुलेटिंग अंत:स्राव, अंडोत्सर्ग(ovulation) में सहायक होते हैं और अंडाशयों को एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रान उत्पन्न करने के लिये प्रोत्साहित करते हैं.एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रान गर्भाशय और स्तनों को उत्तेजित करके संभावित निषेचन(fertilization) के लिये तैयार करते हैं|

मासिक चक्र के काल

इस चक्र के तीन काल होते हैं -

  1. पुटिकीय(अंडे के मुक्त होने के पहले)
  2. ओवुलेटरी(अंडे की मुक्ति)
  3. लूटियल(अंडे की मुक्ति के बाद)

पुटिकीय काल

यह काल मासिक स्राव के पहले दिन शुरू होता है(दिवस 1).लेकिन इस काल की मुख्य घटना अंडाशयों में पुटिकाओं का विकास होना है।
पुटिकीय काल के प्रारंभ में अंत: र्गभाशय कला( endometrium) भ्रूण के पालन के लिये द्रवों और पोषक तत्वों की उपस्थिति के कारण मोटी हो जाती है।यदि किसी भी अंडे का निषेचन न हो,तो एस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रान के स्तर कम रहते हैं.परिणामस्वरूप एंडोमेट्रियम झड़ने लगती है और मासिक रक्त स्राव शुरू हो जाता है।इस समय पीयूष ग्रंथि पुटिका-उत्तेजक अंत:स्राव के उत्पादन को थोड़ा बढ़ा देती है.यह अंत:स्राव 3 से 30 पुटिकाओं के विकास को उत्तेजित करता है.हर पुटिका में एक अंडा होता है।इस काल में आगे चलकर,जैसे-जैसे इस अंत:स्राव का स्तर बढ़ता है,इन पुटिकाओं में से केवल एक(मुख्य पुटिका) का विकास चालू रहता है.यह जल्दी ही एस्ट्रोजन का उत्पादन शुरू कर देती है और अन्य उत्तेजित पुटिकाएं बिखरने लगती हैं।

पुटिकीय काल औसतन 13 से 14 दिनों का होता है। इन तीन कालों में यही काल लंबाई में सबसे अधिक भिन्न होता है.यह रजोनिवृत्ति के आस-पास छोटा होने लगता है.जब लुटिनाइजिंग अंत:स्राव का स्तर नाटकीय रूप से बढ़ जाता है तो यह काल समाप्त हो जाता है.इस बढत के परिणामस्वरूप अंडे की मुक्ति होती है।

ओवुलेटरी(अंडे की मुक्ति)

यह दशा तब शुरू होती है जब लुटीनाइजिंग अंत:स्राव का स्तर बढ़ता है.लुटीनाइजिंग अंत:स्राव मुख्य पुटिका को अंडाशय की सतह पर उभरने और अंततः फूटकर अंडे को मुक्त करने के लिये प्रोत्साहित करता है.पुटिका-उत्तेजक अंत:स्राव का स्तर कम सीमा तक बढ़ता है.पुटिका-उत्तेजक अंत:स्राव में वृद्धि का उद्देश्य ज्ञात नहीं है।
ओवुलेटरी दशा 16 से 32 घंटों की होती है.यह अंडे के मुक्त होने के साथ समाप्त हो जाती है।

अंडे के मुक्त होने के लगभग 12 से 24 घंटों के बाद लुटीनाइजिंग अंत:स्राव की बढ़त को मूत्र में इस हारमोन के स्तर को माप कर जाना जा सकता है.इस मापन का प्रयोग यह जानने के लिये किया जाता है कि स्त्री किस समय गर्भाधान के लिये तैयार है.मुक्त होने के केवल 12 घंटों तक ही अंडा में गर्भाधान हो सकता है.गर्भाधान की अधिक संभावना तभी होती है जब शुक्राणु प्रजनन तंत्र में अंडे के मुक्त होने के पहले से मौजूद हो।
ओवुलेशन के समय कुछ स्त्रियों को अधो उदर के एक ओर हल्का दर्द महसूस होता है।उस दर्द को बीच का दर्द कहते हैं. यह दर्द कुछ मिनटों से कुछ घंटों तक रहता है।यह दर्द उसी ओर होता है जिस ओर के अंडाशय से अंडा मुक्त होता है,लेकिन इस दर्द का सही कारण ज्ञात नहीं है।यह दर्द पुटिका के फटने के पहले या बाद में हो सकता है और सभी चक्रों में नहीं हुआ करता है।अंडे की मुक्ति दोनों अंडाशयों में बारी-बारी से नहीं होती और अनियत रूप से होती है।यदि एक अंडाशय को निकाल दिया जाय तो दूसरा अंडाशय हर महीने एक अंडे को मुक्त करता है।

लूटियल(अंडे की मुक्ति के बाद)

लूटीयल दशा –यह दशा अंडोत्सर्ग के बाद शुरू होती है।यह करीब 14 दिनों तक रहती है (गर्भाधान होने तक) और आर्तव के शुरू होने के पहले समाप्त होती है.इस दशा में,फूटी हुई पुटिका अंडे को मुक्त करने के बाद बंद हो जाती है और पीत पिंड(corpus luteum) नामक एक रचना का निर्माण करती है,जो बढ़ती हुई मात्रा में प्रोजेस्ट्रान का उत्पादन करता है.गर्भाधान होने पर पीत पिंड गर्भाशय को तैयार करता है।

पीत पिंड द्वारा उत्पन्न प्रोजेस्ट्रान अंत: र्गभाशय कला को मोटा करता है,और भावी भ्रूण के पोषण के लिये उसमें द्रव और पोषक पदार्थ भर देता है.प्रोजेस्ट्रान के कारण र्गभाशय ग्रीवा(cervix) का आंव गाढ़ा हो जाता है,ताकि शुक्राणु या जीवाणू गर्भाशय में प्रवेश न कर सकें.प्रोजेस्ट्रान के कारण ही लूटियल दशा में शरीर का तापमान जरा बढ़ जाता है और आर्तव के शुरू होने तक बढ़ा रहता है.तापमान की इस वृद्धि को यह जानने के लिये काम में लाया जा सकता है कि अंडोत्सर्ग हुआ है या नहीं.लूटीयल दशा के अधिकांश भाग में एस्ट्रोजन का स्तर बढ़ा रहता है.एस्ट्रोजन भी अंत: र्गभाशय कला को मोटा होने के लिये उत्तेजित करता है.
एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रान स्तनों की दुग्ध नलियों को चौड़ा कर देते हैं.इसकी वजह से स्तन फूल जाते हैं और उन्हें छूने पर दर्द होता है।

यदि अंडे में गर्भाधान न हो तो पीत पिंड 14 दिनों के बाद नष्ट हो जाता है और नया मासिक चक्र शुरू होता है.यदि अंडे में गर्भाधान हो जाता है,तो विकसित हो रहे भ्रूण के चारों ओर की कोशिकाएं ह्युमन कोरियानिक गोनाडोट्रापिन नामक एक अंत:स्राव का उत्पादन करने लगती हैं.यह अंत:स्राव पीत पिंड को बनाए रखता है,जो तब तक प्रोजेस्ट्रान उत्पन्न करता रहता है,जब तक बढ़ता हुआ भ्रूण स्वयं अपने अंत:स्रावो का उत्पादन न करने लगे.गर्भाधान के टेस्ट ह्युमन कोरियानिक गोनाडोट्रापिन के स्तरों में वृद्धि के आधार पर किये जाते हैं।

आर्तव के रोग

छोटी-मोटी आर्तव की समस्या से लेकर अधिक समय तक रहने वाली समस्याओं से गंभीर रोगों तक मासिक धर्म से संबंधित अनेक रोग होते हैं

कष्टार्तव

आर्तव के कारण होनेवाली दर्दभरी मरोड़ को कष्टार्तव कहते हैं.इसके दो प्रकार होते हैं – प्राथमिक और द्वितीयक.प्राथमिक कष्टार्तव आर्तव का दर्द होता है. मासिक धर्म की उम्र वाली महिलाओं में प्राथमिक कष्टार्तव सबसे आम स्त्रीरोग समस्या है.इसे किसी ज्ञात श्रोणीय रोग की अनुपस्थिति में आर्तव की शुरूआत में अधो उदर में होने वाले मरोड़ जैसे दर्द के रूप में परिभाषित किया जाता है.इसे द्वितीयक कष्टार्तव से अलग पहचानना चाहिये,जो किसी श्रोणीय रोग जैसे अंत: र्गभाशय-अस्थनता (endometriosis) के कारण होने वाला दर्दभरा मासिक स्राव.

यह 90%.तक स्त्रीयो में होता है.बार-बार होने वाले अधिक गंभीर कष्टार्तव के साथ कई जोखम कारक जुड़े होते हैं –छोटी उम्र में मासिक धर्म का प्रारंभ,लंबे समय तक मासिक स्राव होना,धूम्रपान,मोटापा और मद्यपान.वजन कम करने की कोशिश करने पर भी मासिक धर्म का दर्द बढ़ सकता है.शारीरिक कार्य का दर्द से कोई संबंध नहीं है.यह राय कि बच्चों के जन्म के बाद मासिक धर्म का दर्द कम होने लगता है,विभिन्न अध्ययनों में सिद्ध नहीं हुआ है. द्वितीयक कष्टार्तव अत्यधिक प्रास्टाग्लैंडिनों,गर्भाशय के अधिक संकुचनों या किसी अन्य रोग के कारण उत्पन्न दर्द है.

अनार्तव

मासिक स्राव न होने को अनार्तव कहते हैं. अनार्तव के दो प्रकार होते हैं,प्राथमिक और द्वितीयक.प्राथमिक अनार्तव में स्त्री को कभी भी मासिक स्राव नहीं हुआ होता है.द्वितीयक अनार्तव में कम से कम छह महीनें से मासिक धर्म नहीं हुआ होता है. द्वितीयक अनार्तव अकसर गर्भावस्था के कारण होता है.

अत्यार्तव

अत्यधिक या लंबे समय तक होने वाले मासिक स्राव को अत्यार्तव कहते हैं. अत्यार्तव को हाइपरमेनोरिया भी कहते हैं. अत्यार्तव अर्थ सामान्य भारी मासिक रक्त स्राव नहीं है.इसका संबंध केवल बहुत भारी रक्तस्राव या सात दिन से अधिक तक होने वाले रक्त स्राव से है. अत्यार्तव में खून के बड़े थक्कों के साथ भी मासिक स्राव हो सकता है.यह अधिकतर अंत:स्रावो के असंतुलन या गर्भाशय के फाइब्रायड के कारण होता है।

एंडोमेट्रियल कैंसर

गर्भाशय की आंतरिक कला के कैंसर को एंडोमेट्रियल कैंसर कहते हैं.साधारणतःएंडमेट्रियल कैंसर में योनि से असामान्य रक्तस्राव होता है.यह एक गंभीर रोग है,लेकिन यदि इसका निदान जल्दी हो जाय तो इसका सफलतापूर्वक इलाज हो सकता है.यह 50 वर्ष से अधिक उम्र की स्त्रियों या उन स्त्रियों, जिनमें एस्ट्रोजन के उच्च स्तर हों,में सबसे आम है.

फाइब्रायड

गर्भाशय की मांसल भित्ति में उठने वाली वृद्धियों को फाइब्रायड कहते हैं..ये विभिन्न आकार के होते हैं और छोटे या बड़े हो सकते हैं.कुछ स्त्रियों को फाइब्राइडों के कारण कोई लक्षण नहीं होते.अन्य स्त्रियों को लंबे समय तक सामान्य से अधिक भारी मासिक रक्त स्राव हो सकता है.फाइब्राइडों के कारण निचले श्रोणीय भाग में दर्द,संभोग के समय दर्द,बार-बार मूत्रत्याग की इच्छा,बड़ी आंत पर दबाव और कब्ज हो सकते हैं.35 वर्ष से अधिक की स्त्रियों व अनेक बार गर्भवती होने वाली स्त्रियों में फाइब्रायड होने का जोखम अधिक होता है.

श्रोणीय शोथकारक रोग

श्रोणीय शोथकारक रोग(या पीआईडी) स्त्रियों के प्रजनन अंगों के किसी भी भाग में होने वाले संक्रमण का नाम है.योनि से दुर्गंध भरे स्राव का निकलना पीआईडी के लक्षणों में से एक है.इसके साथ अनियमित मासिक स्राव या संभोग के समय दर्द भी हो सकता है.पीआईडी का सबसे आम कारण संभोग से संचरित रोग से संपर्क में आना है.पीआईडी एक गंभीर रोग है जो फैलोपियन नलियों को हानि पहुंचा सकता है और भविष्य में गर्भाधान होने में बाधा उत्पन्न कर सकता है.

प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम

मासिक स्राव के सात से चौदह दिनों पहले होने वाले लक्षणों को प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम कहते हैं,जो कभी-कभी स्राव के शुरू हो जाने के बाद भी जारी रहते हैं.विभिन्न स्त्रियों को विभिन्न तरह से यह सिंड्रोम होता है.कुछ स्त्रियों को इस समय भीषण दर्द या मानसिक समस्याएं हो सकती हैं.

प्रारंभिक आर्तव समस्याओं का निदान

आर्तव समस्याओं का निदान करने के लिये चिकीत्सक को अनेक तरह की जांच करने की आवश्यकता पड़ सकती है.इन परीक्षाओं में श्रोणि की जांच,एक रक्त परीक्षा और अल्ट्रासाउंड शामिल हैं.मासिक धर्म की ऐसी समस्याएं जो केवल एक बार ही हुई हो या काफी समय से न हुई हो देर तक या दीर्घकालिक आर्तव समस्याओं में बदलने तक अनिदानित रह जाती हैं.

आर्तव की समस्याओं का उपचार कैसे करें

आर्तव की समस्याओं का उपचार समस्या के प्रकार और वह कितने समय से चला आ रहा है,इस पर निर्भर करता है.छोटी समस्याओं या छह महीनों से कम तक की समस्याओं के लिये आहका चिकीत्सक जीवन शैली में परिवर्तन और अन्य स्वतः किये जाने वाले उपचारों की सलाह दे सकता है.इन उपचारों में शामिल हैं -

  • नियमित व्यायाम
  • संतुलित आहार
  • आहार में अधिक लौह,कैल्शियम और विटामिन बी का समावेश
  • आर्तव के दर्द के लिये पैरासिटामाल लेने की सलाह
  • गर्म पानी की बोतलों का प्रयोग

आप अन्य वैकल्पिक उपचारों का भी आर्तव की समस्याओं के लिये प्रयोग कर सकते हैं.इनमें शामिल हैं -

  • समस्याओं के लिये खास तौर पर तैयार किये गए हर्बल सप्लीमेंट
  • मासिक के दर्द के लिये चैमोमाइल या अदरक की चाय का सेवन
  • जंगली याम या मदरवोर्ट जैसे मरोड़ निरोधकों का प्रयोग
  • पेट पर लैवेंडर तेल को मलना
  • रास्पबेरी लीफ चाय का सेवन
  • जिंगको सप्लीमेंट का सेवन
  • बैक फ्लावर उपचारों का प्रयोग
  • मालिश करवाना
  • आर्तव की समस्याओं के लिये अक्युपंक्चर करवाना

गंभीर या दीर्घकालिक आर्तव समस्याओं के लिये आपका चिकीत्सक दवाईयां दे सकता है.इनमें शामिल हैं -

  • आर्तव के दर्द के लिये शोथ-विरोधी दवाएं
  • अंत:स्राव विस्थापक उपचार
  • मासिक धर्म को नियमित करने के लिये मौखिक गर्भनिरोधक दवाईयां

यदि किसी गंभीर रोग जैसे फाइब्रायड या कैंसर का निदान हो तो शल्यक्रिया की आवश्यकता हो सकती है.अनेक आर्तव की समस्याएं साधारण होती हैं और कुछ भी करने की जरूरत नहीं होती.अनेक कारक मासिक चक्र में व्यवधान या उसे प्रभावित कर सकते हैं और प्रारंभिक आर्तव समस्याएं शरीर को आर्तव की आदत पड़ने के दौरान होती हैं.फिर भी यदि आपको लंबे समय तक आर्तव,गंभीर रक्तस्राव,खून के थक्के या दीर्घकालिक आर्तव की समस्याएं हों तो आपको अपने चिकीत्सक से परामर्श करना चाहिये.

गर्भपात

सभी गर्भ सामान्यतया नौ महीने (40 सप्ताह) नहीं ठहरते और न ही शिशु का जन्म होता है। कुछ मामलों में गर्भ खुद गिर जाता है। इसे गर्भपात या स्वतः गर्भपात कहा जाता है। गर्भपात सामान्यतौर पर 26वें सप्ताह से पहले होता है। कुछ मामलों में शल्य क्रिया के जरिये गर्भ खत्म किया जाता है। इसे थोपा गया गर्भपात कहा जाता है।

गर्भपात या स्वतः गर्भपात

गर्भपात शिशु के जीवित रहने की संभावना शुरू होने से पहले होता है। अधिकांश गर्भपात, गर्भ के पहले 12 सप्ताह में होता है।

गर्भपात के कारण

इसका सबसे सामान्य कारण है कि निषेचित अंडे के साथ कुछ गड़बड़ी होती है। इसके बावजूद यदि अंडा बढ़ता और विकसित होता है, तो उसके परिणामस्वरूप पैदा होनेवाला शिशु शारीरिक रूप से विकलांग होता है। इसलिए कभी-कभी गर्भपात ऐसे असामान्य जन्म को रोकने का प्रकृति का उपाय है। यदि महिला को मलेरिया या सिफलिस जैसी गंभीर बीमारी हो, वह गिर गयी हो या उसके जननांगों में समस्या हो, तो भी गर्भपात हो सकता है। कभी-कभी अंडा गर्भाशय के बदले कहीं अन्यत्र, सामान्यतया गर्भ-नलिकाओं में निषेचित होने से भी गर्भपात होता है। ऐसे गर्भ निश्चित रूप से गिर जाते हैं और तब स्थिति खतरनाक हो सकती है।

गर्भपात के लक्षण

गर्भपात के दो मुख्य लक्षण होते हैं- योनि से रक्तस्राव और पेट के निचले हिस्से में दर्द। शुरुआत में रक्तस्राव बहुत कम होता है, लेकिन बाद में यह तेज हो जाता है और जल्दी ही खून के थक्के दिखाई देने लगते हैं। रक्तस्राव और दर्द, विशेषकर आरंभिक गर्भपात के दौरान आमतौर पर वैसे ही होते हैं, जैसा कि मासिक-धर्म के दौरान होता है।

संपूर्ण गर्भपात

कोई भी गर्भपात संपूर्ण तब कहलाता है, जब विकासशील भ्रूण या गर्भ के सभी ऊतक और प्लेसेंटा योनि से बाहर निकल जाते हैं। गर्भपात संपूर्ण होने के कुछ दिन बाद रक्तस्राव अपने-आप रुक जाता है।

अपूर्ण गर्भपात

कोई गर्भपात उस समय अपूर्ण होता है, जब भ्रूण या प्लेसेंटा का कोई भाग गर्भ में रह जाता है। गर्भ धारण के 10वें और 20 वें सप्ताह के बीच में होनेवाला गर्भपात अक्सर अपूर्ण रह जाता है। उस हालत में रक्तस्राव जारी रहता है और गर्भ में बच गये ऊतकों में संक्रमण की आशंका बनी रहती है, जिससे बुखार और पेट में दर्द होता है। जब कोई गर्भपात अपूर्ण होता है, तब गर्भाशय को किसी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी द्वारा किसी अस्पताल या क्लिनिक में जल्द से जल्द पूरी तरह साफ कर देना चाहिए। यदि संक्रमण का तत्काल इलाज नहीं किया जाये, तो गर्भ नलिकाओं के छिलने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे महिला की प्रजनन क्षमता ही खत्म हो सकती है। यदि किसी महिला को गर्भपात के बाद संक्रमण के लक्षण दिखाई दे, तो उसे तत्काल पूरी जांच करानी चाहिए।

लगातार गर्भपात

कुछ महिलाओं में लगातार गर्भपात होता है। गर्भ धारण के शुरू में एक या दो बार गर्भपात होने के बाद महिला को चिंता नहीं करने का भरोसा देना चाहिए। लेकिन तीसरी और चौथी बार देर से गर्भपात होने पर महिला को किसी चिकित्सक से संपर्क करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि ऐसा क्यों हो रहा है।

थोपा गया गर्भपात

कभी-कभी किसी महिला को जबरन गर्भपात से गुजरना पड़ता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर गर्भधारण के शुरुआत में, यानी पहले तीन महीने में पूरी की जाती है। महिला को दर्द कम करने के लिए एक सूई लगायी जाती है और फिर चिकित्सक योनि द्वारा प्रवेश कराये गये कुछ उपकरणों की मदद से गर्भाशय को साफ करता है। इस शल्य क्रिया में अमूमन 15 मिनट का समय लगता है। यह किसी प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा समुचित उपकरणों की सहायता से साफ-सुथरे माहौल में किया जाता है। यह शल्य-क्रिया खतरनाक नहीं है।

यदि इस तरह के गर्भपात के लिए कोई असुरक्षित तरीका अपनाया जाता है, तो महिला के जननांगों में गंभीर संक्रमण का खतरा पैदा हो जाता है।

कानून

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 में जनसंख्या के स्थायित्व के लिए दी गयी कार्यसूची को प्रभावी और निष्पक्ष तरीके से कार्यान्वित करने के लिए समुचित और समग्र कानून का होना बहुत महत्वपूर्ण है। हालांकि इस बारे में दो कानून है जो दो विशिष्ट उद्देश्यों के लिए है। ये निम्नलिखित हैं-

पितृत्व उपचारित तकनीक (विनियमन व निषेध) कानून 1994

यह कानून एक जनवरी, 1996 को लागू हुआ। इसमें उन स्थितियों का विवरण है, जिनमें भ्रूण की गड़बड़ी को ठीक करने के लिए चिकित्सकीय तरीके से तकनीक के इस्तेमाल की इजाजत दी गयी है। भ्रूण के लिंग की जानकारी देना पूरी तरह निषिद्ध है। कानून के उल्लंघन के लिए सजा का प्रावधान है। प्रसव पूर्व चिकित्सकीय तकनीक (विनियमन व दुरुपयोग का निषेध) कानून, कन्या भ्रूण हत्या की सामाजिक बुराई के उन्मूलन के उद्देश्य से बनाया गया एक प्रगतिशील कानून है।

गर्भ के चिकित्सकीय समापन कानून (एमटीपी)

गर्भपात के कारण होनेवाली मौत और अपंगता पर नियंत्रण तथा रोकथाम के लिए गर्भ के चिकित्सकीय समापन कानून (एमटीपी) को 1971 में संसद ने पारित किया, जिसे जम्मू-कश्मीर को छोड़ पूरे भारत में एक अप्रैल 1972 से लागू किया गया। जम्मू-कश्मीर में इसे नवंबर 1976 में लागू किया गया।

एमटीपी कानून 1971 में उन परिस्थितियों का जिक्र है, जिनमें गर्भपात कराया जा सकता है, जो गर्भपात करा सकता है और जहां गर्भपात कराया जा सकता है।

कानून में निम्नलिखित बातें कही गयी हैं-

मां की चिकित्सकीय स्थिति-जब मां किसी शारीरिक या मानसिक बीमारी से ग्रस्त हो या गर्भ के कारण उसके जीवन को खतरा हो या गर्भ उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो।

अपंगता- यदि विषाणु संक्रमण, दवा खाने, गर्भकाल के दौरान एक्स-रे या विकिरण से गुजरने, रक्ताल्पता या मानसिक बीमारी के कारण पैदा होनेवाले शिशु को गंभीर शारीरिक या मानसिक बीमारी होने की आशंका हो।

मानवीय - जब बलात्कार के बाद गर्भ ठहर गया हो।

गर्भधारण - परिवार नियोजन के उपाय के विफल होने के कारण गर्भधारण। यह धारा महिला के अनुरोध पर गर्भपात की अनुमति देता है।

सामाजिक- आर्थिक स्थिति - वैसी स्थिति, जिससे मां के स्वास्थ्य पर असर पड़े।

कानून के अनुसार केवल ओबीजी में निर्धारित अनुभव रखनेवाले निबंधित चिकित्सक ही एमटीपी कर सकते हैं। यदि गर्भ 12 सप्ताह से कम का हो, तो चिकित्सक किसी दूसरे चिकित्सक से सलाह के बिना भी गर्भपात करा सकता है। यदि यह 12 सप्ताह से अधिक का है, तो दो चिकित्सक ही इस बारे में फैसला कर सकते हैं और कोई एक चिकित्सक गर्भपात करा सकता है। आपात स्थिति में यदि गर्भ 20 सप्ताह या उससे अधिक का हो, एक चिकित्सक किसी दूसरे से परामर्श के बिना भी किसी अनिबंधित अस्पताल या क्लिनिक में भी एमटीपी कर सकता है।

किसी भी स्थिति में महिला की लिखित स्वीकृति लेना बहुत महत्वपूर्ण है। यदि महिला अवयस्क या आघात से ग्रस्त या मानसिक रूप से असंतुलित है, तो उसके अभिभावक से लिखित स्वीकृति प्राप्त करना जरूरी है। एमटीपी कानून 1971 के तहत गर्भपात को व्यक्तिगत मामला माना गया है। इसलिए सेवा प्रदाता द्वारा संपूर्ण गोपनीयता बरतनी चाहिए तथा महिला की पहचान गोपनीय रखनी चाहिए।

गर्भपात के दौरान या उसके बाद पैदा होनेवाली समस्या या किसी अन्य गड़बड़ी के लिए चिकित्सक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती, बशर्ते चिकित्सक ने प्रक्रिया के दौरान पूरी सावधानी बरती हो। लेकिन यदि कोई नियम भंग होता है, तो चिकित्सक सजा का भागीदार बन सकता है, जिसके तहत एक हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

चिकित्सा या अपंगता के आधार पर गर्भपात मां और बच्चे, दोनों के लिए अच्छा है, लेकिन इसका उपयोग अनचाहे गर्भ या खास कर बालिका भ्रूण को समाप्त करने के लिए किया जाना सामाजिक बुराई, कलंक और अपराध है तथा इसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए। बार-बार का गर्भपात मां के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और इसके कारण शिशु मृत्यु दर व अपंगता बढ़ सकती है। महिलाओं को इस बात के प्रति जागरूक बनाया जाना चाहिए और उन्हें गर्भ रोकने के दूसरे तरीकों के बारे में बताया जाना चाहिए।

एमटीपी कानून में 1975 में संशोधन किया गया। उसमें निम्नलिखित बातें शामिल की गयीं -

  • गर्भपात कराने के योग्य चिकित्सकों के लिए आवश्यक योग्यता को प्रमाणित करने का अधिकार मुख्य जिला चिकित्सा पदाधिकारी को दिया गया है। पहले यह प्रमाणीकरण बोर्ड द्वारा किया जाता था।
  • गर्भपात कराने के लिए आवश्यक योग्यता-
      1. यदि निबंधित चिकित्सक 25 एमटीपी में सहयोग कर चुका हो।
      2. यदि चिकित्सक ने ओबीजी में छह महीने तक हाउसमैन शिप किया हो।
      3. यदि उसने ओबीजी में स्नातकोत्तर की डिग्री ली हो।
      4. यदि कोई चिकित्सक 1971 में इस कानून के लागू होने से पहले चिकित्सा की स्नातक डिग्री ले ली हो और उसे ओबीजी में एक साल का अनुभव हो।
  • गैर-सरकारी संगठन भी मुख्य जिला चिकित्सा पदाधिकारी से लाइसेंस लेकर गर्भपात सेवाएं दे सकते हैं।

गर्भपात प्रक्रियाओं के बारे में सूचनाएं

किसी महिला को न्यूनतम निम्नलिखित जानकारी दी जानी चाहिए-

  • प्रक्रिया से पहले और बाद में क्या किया जायेगा
  • उसे कैसा अनुभव होगा (जैसे माहवारी जैसी अकड़न, दर्द और रक्त-स्राव)
  • प्रक्रिया में कितना समय लगेगा
  • दर्द प्रबंधन के लिए उसे क्या उपाय उपलब्ध कराये जा सकते हैं
  • विधि से संबंधित खतरे और शिकायतें
  • वह कब सहवास समेत अपना सामान्य कामकाज फिर से शुरू कर सकेगी
  • बाद की देखभाल

यदि गर्भपात के विभिन्न तरीकों का विकल्प उपलब्ध हो, तो प्रदाता को इस बात के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वह महिला को स्पष्ट बताये कि उसके लिए कौन सी विधि उपयुक्त है। विधियों का चयन गर्भधारण की अवधि, महिला की चिकित्सकीय स्थिति और संभावित खतरों को देखते हुए किया जाना चाहिए।

बांझपन

प्रश्न 1. बांझपन क्या है ?

उत्तर: बांझपन, प्रजनन प्रणाली की एक बीमारी है जिसके कारण किसी महिला के गर्भधारण में विकृति आ जाती है। गर्भधारण एक जटिल प्रक्रिया है जो कई बातों पर निर्भर करती है- पुरुष द्वारा स्वस्थ शुक्राणु तथा महिला द्वारा स्वस्थ अंडों का उत्पादन, अबाधित गर्भ नलिकाएं ताकि शुक्राणु बिना किसी रुकावट के अंडों तक पहुंच सके, मिलने के बाद अंडों को निषेचित करने की शुक्राणु की क्षमता, निषेचित अंडे की महिला के गर्भाशय में स्थापित होने की क्षमता तथा गर्भाशय की स्थिति। अंत में गर्भ के पूरी अवधि तक जारी रखने के लिए गर्भाशय का स्वस्थ होना और भ्रूण के विकास के लिए महिला के हारमोन का अनुकूल होना जरूरी है। इनमें से किसी एक में विकृति आने का परिणाम बांझपन हो सकता है।

प्रश्न 2. बांझपन क्यों होता है ?

उत्तर: पुरुषों में प्रजनन क्षमता में कमी का सबसे सामान्य कारण शुक्राणु का कम या नहीं होना है। कभी-कभी शुक्राणु का गड़बड़ होना या अंडों तक पहुंचने से पहले ही उसका मर जाना भी एक कारण होता है। महिलाओं में बांझपन का सबसे सामान्य कारण मासिक-चक्र में गड़बड़ी है। इसके अलावा गर्भ-नलिकाओं का बंद होना, गर्भाशय में विकृति या जननांग में गड़बड़ी के कारण भी अक्सर गर्भपात हो सकता है।

प्रश्न 3. कृत्रिम गर्भाधान क्या है ?

उत्तर: कृत्रिम गर्भाधान या आइवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) में अंडों को अंडाशय से शल्य क्रिया द्वारा बाहर निकाल कर शरीर से बाहर पेट्री डिश में शुक्राणु के साथ मिलाया जाता है। करीब 40 घंटे के बाद अंडों का परीक्षण किया जाता है कि वे निषेचित हो गये हैं या नहीं और उनमें कोशिकाओं का विभाजन हो रहा है। इन निषेचित अंडों को महिला के गर्भाशय में रख दिया जाता है और इस तरह गर्भ-नलिकाओं का उपयोग नहीं होता है।

गर्भ-निरोध

गर्भ-निरोध का अर्थ है- सोच विचार कर गर्भ-धारण न होने देना। गर्भ-धारण तभी होता है जब अंडा वीर्य से मिलता है और युग्मनज (जाइगाट) (वीर्य और अंडों के मिलने पर तैयार उत्पाद) गर्भाशय के संस्तर से जुड़ जाता है और फिर वहीं से वह बढ़ने लगता है। इसी प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए गर्भ को रोकने के लिए मूलतः निम्नलिखित पांच उपाय अपनाये जा सकते हैं :

  • सबसे आम तरीका है - संभोग न किया जाए। इस पद्धति में लिंग को योनी से उस समय संपर्क में न लाया जाए जब स्त्री उर्वरक चक्र में हो। (लय पद्धति, उर्वरक जागरुकता पद्धति)
  • सबसे आसान तरीका है वीर्य को अंडे से न मिलने दिया जाए। इसके कई तरीके हो सकते हैं। (पुरुष और स्त्री के कंडोम, डायाफ्राम और सर्वाइकल कैप)। इसकी स्थायी पद्धति है-नस बंदी (पुरुष बंध्याकरण) और टुबुल लिगेशन (स्त्री बंध्याकरण)।
  • तीसरा तरीका है कि स्त्री को अंडे जनने न दिया जाए और/या पुरुष को वीर्य उत्पन्न करने न दिया जाए। इसके उदाहरण हैं- हारमोनल पद्धति जैसे- खाने वाली गर्भ निरोधक गोलियां, त्वचा के नीचे गोलियाँ रखना या प्रतिरोपण। इस कोटि में गैर उर्वरक इंजेक्शन भी आते हैं जिसे पुरुष और महिला दोनों के लिए तैयार किये जा रहे हैं।
  • इसका एक और तरीका है कि उर्वरक अंडों (जाइगाट) को गर्भाशय के संस्तरों से जुड़ने न दिया जाए। इसका एक उदाहरण है- इंट्रा-यूट्रीन डीवाइज (आई यू डी) और बिना स्टेरायड वाली गोलियां।
  • पांचवा तरीका है- भ्रूण को गर्भधारण और प्रतिरोपण के बाद निकाल देना। इसके उदाहरण हैं- गर्भपात करना या गर्भपात की गोलियां खाना।
  • इस प्रकार गर्भनिरोध के विभिन्न उपाय है जो विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग तरीके से काम करता है। प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे उपायों को चुनना चाहिए जो उसके लिए उपयुक्त हो और उसके स्वास्थ्य या जीवन के लिए खतरा भी न हो। इसके अतिरिक्त यह एक ऐसा भी निर्णय नहीं है जिसका पालन जीवन भर करना पड़े।

    सही गर्भ-निरोधक उपायों को चुनने के लिए ध्यान देने योग्य बातें -

    • प्रभावकारिता अर्थात गर्भधारण के अवसर कितने हैं।
    • क्या गर्भ-निरोधक उपाय सुरक्षित हैं या फिर इसके गंभीर साइड एफेक्ट हैं।
    • क्या लंबी अवधि तक उपयोग करने पर इसके प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है।
    • क्या इससे मां का दूध पिलाने पर कोई प्रभाव पड़ सकता है। क्या गर्भ-निरोध के उपाय का असर माँ के दूध पर प्रभाव डाल सकता है।
    • क्या इसका प्रभाव महिला द्वारा भविष्य में धारण किये जाने वाले बच्चे पर पड़ सकता है।
    • क्या गर्भनिरोधक के कोई विशेष परहेज हैं अर्थात जब महिला का नियमित रूप से खून जा रहा हो या जब पुनर्जनित सरणी (आर टी आई) संक्रमित हो तब क्या इसका उपयोग नहीं किया जाना है।
    • क्या गर्भ-निरोधक के उपयोग का नियंत्रण उपयोक्ता के हाथ में है या फिर स्वास्थ्य सेवक के हाथ में।
    • प्राकृतिक पद्धति ( लिंग को योनि के संपर्क में न आने देना विशेषकर जब उर्वरक के दिन हों)

    गर्भधारण न होने देने के लिए सबसे सुरक्षित और आसान तरीका है कि संभोग ही न किया जाए। इसके बाद जो सबसे अच्छा तरीका है कि लिंग को योनि के संपर्क में न आने दिया जाए। ऐसा करने पर भी संभोग में उतना ही आनंद का अनुभव होता है।

    लय (कैलेंडर) पद्धति

    इस पद्धति के अनुसार महिला का उर्वरक समय मासिक-चक्र के आरंभ होने के बाद से 10 दिन रहता तक है। अतः इन 10 दिनों में संभोग नहीं किया जाना चाहिए। मासिक धर्म के आरंभ होने के पहले और बाद के सप्ताह को सुरक्षित अवधि समझी जाती है। लेकिन यह विश्वसनीय नहीं है क्योंकि यह मासिक धर्म के चक्र में होने वाले परिवर्तन को हिसाब में नहीं लेता। लय-पद्धति में यह माना जाता है कि महिलाओं में 28 दिन का चक्र होता है और माह के मध्य में डिंब बनने की प्रक्रिया आरंभ होती है। तथापि, प्रत्येक महिला का चक्र अलग-अलग होता है और डिंब बनने की प्रक्रिया अलग-अलग समय में आरंभ होती है। किसी भी पद्धति को न अपनाने की तुलना में यह पद्धति थोड़ी बेहतर है।

    सर्वाइकल म्यूकस/बाइलिंग ओव्यूलेशन पद्धति- अधिकतर महिलाओं में महीने के अधिकांश समय योनी से स्राव होता रहता है। यह स्वस्थ संकेत है। इस म्यूकस की मात्रा, निरंतरता और रंग अलग अलग महिलाओं में अलग-अलग होता है। यह कभी कभी चिपचिपा और सफेद रंग का भी होता है। कभी-कभी यह फिसलनयुक्त और पारदर्शी होता है। म्यूकस की प्रकृति मासिक-धर्म के स्तर के अनुसार बदलती रहती है। मासिक धर्म के तुरंत बात यह म्यूकस थोड़ा, सूखा, गाढ़े टुकड़े तथा सफेद होता है। जैसे-जैसे डिंब किसी गर्भाशय में बढ़ने लगता है, शरीर में रहने वाले हार्मोन एस्ट्रोजोन इस म्यूकस को पारदर्शी बनाने के साथ इसे पसारता है तथा यह चिपचिपा हो जाता है। डिंबोत्सर्ग और इसके एक दिन के बाद यह चिप-चिपापन व विस्तारन अधिकतम होता है और इस प्रकार योनी से निकलने वाला यह चिप-चिपापन व विस्तारन महिला के उर्वरक दिनों की स्पष्ट और पहली निशानी है। कोई भी महिला उसी दिन उंगलियों में इस सर्वाइकल म्यूकस को लेकर इसमें हुए परिवर्तन को देखकर अपने उर्वरक तथा अनुर्वरक दिनों का पता कर सकती है।

शरीर का मूल तापमान- महिला को हर रोज सुबह-सुबह सो कर उठने के तुरंत बाद एक नियत समय में अपने शरीर का तापमान लेना होता है जिसे शरीर का मूल तापमान कहा जाता है। महीने के मध्य में डिंबोत्सर्ग के दौरान इस तापमान में उल्लेखनीय रूप से वृद्धित होती है (लगभग 1-2 डिग्री फैरेनहाइट) और अगले मासिक-धर्म तक यह बना रहता है। यदि केवल इसी पद्धति का उपयोग किया जाता है तो यह जरूरी है कि तापमान बढ़ने से पहले तक की पूरी अवधि में अर्थात लगभग 1-16 दिनों तक जननेंद्रियों का संपर्क न हो। एक बार डिंबोत्सर्ग हो जाने के बाद दूसरा 2 दिन उर्वरक माना जाता है। इस प्रकार संभोग के लिए सुरक्षित दिन काफी कम रह जाते हैं। इसके अतिरिक्त हर रोज तापमान लेने की पद्धति इसे और जटिल बनाती है।

अवरोध पद्धति

ऐसी पद्धति जिसमें अंडे को वीर्य के संपर्क में नहीं आने दिया जाता। अवरोध पद्धति वास्तव में वीर्य और अंडे के बीच अवरोध है। निम्नलिखित अवरोध आजकल प्रचलन में हैः

पुरुष कंडोमः यह रबड़ का बना होता है जिसे पुरुष द्वारा संभोग के दौरान अपने लिंग के ऊपर पहना जाता है। यह वीर्य को योनि के भीतर जाने से रोकता है। योनि और लिंग के संपर्क से पहले खड़े लिंग पर इसे खोला जाता है क्योंकि वीर्य निकलने से काफी पहले कुछ ऐसी बूंदे निकल सकती है, जिसमें शुक्राणु हो सकते हैं या यौन जनित बीमारी (एस.टी.डी) की बीमारी फैल सकती है। वीर्य निकलने के बाद योनि से लिंग को बड़ी सावधानी से निकाला जाना चाहिए ताकि वीर्य कंडोम से बाहर निकलकर योनि में या उसके आस-पास गिर न जाए। एक कंडोम को एक बार से ज्यादा उपयोग में न लाया जाए। पुरुष कंडोम गर्भ-निरोधक का सबसे प्रभावी और सुरक्षित उपाय है। पुरुष या महिला पर इसका कोई अतिरिक्त प्रभाव भी नहीं पड़ता। कंडोम एड्स और यौन-जनित बीमारियों को रोकने का प्रभावी जरिया भी है। कंडोम का उपयोग दो बच्चे के अंतराल के लिए भी किया जा सकता है। कंडोम सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला गर्भ-निरोधक है।

कुछ व्यक्तियों को, विशेषकर पुरुषों को ऐसा लगता है कि कंडोम से संभोग में वह लय और आनंद नहीं मिलता जितना कि मिलना चाहिए। कुछ लोगों को लेटेक्स रबड़ से एलर्जी होती है। यदि कंडोम की गुणवत्ता खराब हो या उसे काफी दिन पहले तैयार करके रखा गया हो, विशेषकर गर्म स्थान में, तो उसके फटने या इसमें से रिसाव की संभावना अधिक होती है। संभोग के दौरान यदि पर्याप्त मात्रा में स्नेहन न हो या कंडोम का उपयोग सही ढंग से न किया गया हो, तो भी यह फट सकता है। उदारहण के लिए जब कंडोम को संभोग के बाद खोला जाता है तो इसे बड़ी सावधानी से खोला जाना चाहिए।

डायाफ्रामः 19वीं सदी में डायफ्राम का आविष्कार किया गया था। इसके द्वारा महिला अपने उर्वरकता को नियंत्रित कर सकती है। डायाफ्राम गोल गुंबद के आकार वाली ठोस रिम के साथ रबड़ की चकती होती है जिसे गर्भाशय के मुंह को बंद करके शुक्राणु को उसमें न जाने देने के लिए योनि में डाला जाता है। आरंभ में डायाफ्राम डॉक्टर/स्वास्थ्य कर्मचारी द्वारा लगाया जाता है क्योंकि डायाफ्राम 2 से 4 इंचों के माप में उपलब्ध है। यह ऊपरी योनि के माप पर निर्भर करता है। एक बार सही माप वाला डायाफ्राम लगा दिए जाने के बाद महिला स्वयं आवश्यकतानुसार इसे निकाल या डाल सकती है। संभोग करने से पहले इसे कम से कम छह घंटे बाद निकालना चाहिए ताकि शुक्राणुनाशक उन शुक्राणुओं को मार सके जो योनि में रह गए हों। इसके बाद इसे निकालकर साबुन और पानी से अच्छी तरह धोकर तथा उसे अच्छी तरह सुखाकर रखना चाहिए।

लेकिन इसके उपयोग में एक समस्या है। कभी कभार डायाफ्राम अपने आप आगे की ओर खिसक जाता है जिससे गर्भाशय या मूत्रमार्ग के ब्लाडर में खींचाव आ जाता है। किसी-किसी महिला के मूत्रमार्ग में दर्द होता है या फिर बार-बार सिस्ट बनने लगता है। अतः ऐसी महिलाओं द्वारा इसका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए जिनके मूत्र-मार्ग में अक्सर संक्रमण होता हो या जिनका गर्भाशय बढ़ा हुआ हो। तथापि इसका एक विशेष लाभ है कि यह पूरी तरह महिला के नियंत्रण में होता है। डायाफ्रम भारत में आसानी से नहीं मिलता। कुछ महिला संगठनों द्वारा इसे आयात करके वितरित करने का प्रयास किया गया है। एक डायाफ्राम की लागत लगभग 400/- रुपये है। आरंभ में इसकी लागत थोड़ी अधिक होने के बावजूद यह नहीं भूलना चाहिए कि डायाफ्राम को बार-बार उपयोग में लाया जा सकता है और यदि इसे अच्छी तरह रखा जाए तो यह तीन से चार साल तक काम करता है।

गर्भाशय कैपः यह थिंबल के आकार का रबड़ का कैप होता है जिसे सुरक्षित रूप से गर्भाशय के ऊपर लगाया जाता है। डायाफ्राम की तरह गर्भाशय कैप भी वीर्य को गर्भाशय में जाने नहीं देता। कैप को इस तरह बनाया गया है कि यह गर्भाशय के मुख को इस तरह बंद कर देता है कि हवा भी भीतर नहीं जा सकती। सक्शन और सतही तनाव के कारण यह गर्भाशय में नजदीकी रूप से चिपके रहता है। दुर्भाग्यवश गर्भाशय कैप भारत में उपलब्ध नहीं है।

महिला कंडोमः महिला कंडोम नरम व ढीला-फिट किया हुआ आवरण है जिसे पोलीयूरीथेन से बनाया जाता है। इसका एक सिरा बंद होता है। यह निकले वीर्य को योनि में जाने से रोकता है। इस कंडोम को संभोग से पहले योनि में डाला जाता है। इसके दोनों सिरे पर लचीला पोलीयूरीथेन छल्ला लगा होता है। एक छल्ला उस बंद सिरे पर होता है जो गर्भाशय को ढकता है और दूसरी खुले सिरे पर जो योनि के बाहर रहता है। योनि के बाहर वाला छल्ला महिला कंडोम में अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है। यह भगोष्ठ (लेबिया) और लिंग के आधार के बीच अवरोधक का काम करता है। संभोग से पहले महिला कंडोम को डाल लिया जाना चाहिए। संभोग के बाद बड़ी सावधानी से इसे निकाला जाना चाहिए ताकि ऐसा न हो कि वीर्य निकलकर योनि में गिर जाए। महिला के खड़े होने से पहले इसे निकाला जाना चाहिए। महिला कंडोम में कंडोम और डायाफ्राम की विशिष्टियां होती हैं। इसे योनि में उसी प्रकार डाला जाता है जिस प्रकार कि डायाफ्राम को। डायाफ्राम की तरह इसमें गर्भाशय को सीधे ढकने के कारण इसपर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। पुरुष कंडोम की तरह महिला कंडोम को उपयोग भी केवल एक बार करना चाहिए।

महिला कंडोम न केवल योनि के संस्तरों को ढकता है बल्कि गर्भाशय को भी पूरी तरह ढक लेता है। अतः पुरुष कंडोम की तरह यह गर्भ को रोकने के लिए न केवल एक प्रभावी गर्भ-निरोधक है बल्कि एच.आई.वी और यौन-जनित बीमारी से भी यह पूरी तरह सुरक्षित रखता है। इसका अन्य लाभ है - संभोग से पहले इसे डाला जा सकता है ताकि संभोग में कोई बाधा न पड़े। यह मानक माप में होता है और इसे डॉक्टर द्वारा लगाये जाने की आवश्यकता नहीं है। इसकी सबसे बड़ी हानि यह है कि इसकी कीमत बहुत अधिक है। साथ ही, संभोग के समय इससे एक ऐसी आवाज आती है जिससे चिड़-चिड़ापन आ जाता है। मुख-मैथुन में आनंद नहीं आता। चूंकि यह भग्न-शिश्न (क्लिटोरिस) के बाहर भी रहता है अतः कई महिलाएं यह मानती हैं कि इससे उन्हें संभोग में उतना आनंद नहीं आता। इससे उनको असुविधा होती है। महिला कंडोम भारत में तैयार नहीं किया जाता। इसे कार्यरत स्वैच्छिक संस्थानों से प्राप्त किया जा सकता है।

शुक्राणुनाशकः शुक्राणुनाशक एक रसायन होता है जिसे योनि में लगाया जाता है। यह शुक्राणुओं को या तो निष्क्रिय कर देता है या फिर उन्हें मार देता है। यह फोम, गोली (उदाहरण के लिए टुडे), जेली या क्रीम (उदाहरण के लिए डेलफेन) के रूप में मिलता है। शुक्राणुनाशक योनि में लागक (एप्लीकेटर) से संभोग से पहले लगाना चाहिए। इसे सामान्यतः अपने-आप से उपयोग में नहीं लाया जाता लेकिन कंडोम या डायाफ्राम की प्रभावकारिता को बढ़ाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। यदि इन शुक्राणुनाशक को ही उपयोग में लाया जाता है तो इसकी निम्नतम प्रत्याशित असफलता दर 6 प्रतिशत है जबकि विशिष्ट मामलों में इसकी असफलता दर 26 प्रतिशत है। इन शुक्राणुनाशकों के सामान्यतः कोई गंभीर अतिरिक्त परिणाम नहीं होते लेकिन कुछ महिलाओं में सूजन या एलर्जी की प्रतिक्रियाएं देखी गई है।

परंपरागत पद्धतियाँ

स्तन-पानः बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं में मासिक-धर्म और डिंबोत्सर्ग की प्रक्रिया आरंभ होने में कुछ समय लग जाता है। कई महिलाओं में इसमें कुछ महीने भी लग जाते हैं।  मासिक-धर्म न होने पर स्तन-पान की इस अवधि को स्तन पान ऋतुरोध (लैक्टेशनल अमेनोरिया) कहा जाता है।  जब तक महिलाएँ स्तन-पान कराती रहती है अर्थात बच्चे को ऊपरी आहार न देकर रात और दिन बच्चे की मांग पर केवल स्तन-पान कराती है तो यह ऋतुरोध लंबे समय तक के लिए रहता है।  ऋतुरोध के दौरान गर्भधारण की संभावनाएं कम रहती है  तथापि पहले  मासिक धर्म से पहले डिंबोत्सर्ग होने लगता है, अतः यह भी संभव है कि मासिक-धर्म न होने पर फिर से गर्भ ठहर जाए।

संभोग भंग/निकासीः इस पद्धति में, वीर्यपात से ठीक पहले योनि से लिंग को बाहर निकाल लिया जाता है ताकि शुक्राणु योनि में जमा न हो सके।  निकासी कोई प्रभावी पद्धति नहीं है क्योंकि निकास का समय गलत हो सकता है और योनि और योनि तट के संपर्क को टालना मुश्किल हो सकता है।  इसके अतिरिक्त लिंग के खड़े होते ही थोड़ा बहुत शुक्राणु निकलने लगता है जो गर्भ धारण के लिए पर्याप्त है।

उर्वरण की रोकथाम पद्धति

गर्भाशय संबंधी भीतरी उपस्कर (आई यू डी): आई यू डी सामान्यतः एक छोटा लचीले प्लास्टिक का उपकरण है, जिसे गर्भाशय में लगाया जाता है। अधिकतर उपकरणों में तांबा या संश्लिष्ट प्रोगेस्ट्रोन होता है।  आई यू डी महिला के गर्भाशय में गर्भाशय के मुख से डाला जाता है। एक बार गर्भाशय में आई यू डी डाल देने के बाद डोरियां (सामान्यतः दो) ऊपरी योनि तक जाती है।  योनि में उंगली डालकर डोरियों को छूने से यह पता चलता है कि आई यू डी अपने स्थान पर है या नहीं।  आई यू डी का कार्यचालन अभी भी पूरी तरह समझ में नहीं आया है।  आई यू डी (विशेषकर जिसमें तांबा होता है) से गर्भाशय में सूजन आ जाती है या गर्भाशय में हमेशा छोटा मोटा संक्रमण रहता है।  ये परिवर्तन शुक्राणुओं का नाश करते हैं या फिर महिला के योनि मार्ग के संचलन के साथ मिलकर उर्वरण को असंभव बनाते है। आई यू डी डिंब के संचलन की गति को भी डिंबवाही नलिका में बढ़ाते हैं जिससे डिंब गर्भाशय में बहुत पहले आ जाता है और शुक्राणुओं से मिल नहीं पाता।  यदि फिर भी उर्वरण हो जाता है तो बाहरी वस्तु द्वारा पहुंचाई गई बाधा से गर्भाशय में यह ठहर नहीं पाता।

भारत में आजकल सबसे ज्यादा कॉपर-टी का इस्तेमाल होता है। इन आई यू डी का उपयोग दो या तीन वर्ष तक के लिए किया जाता है और फिर इसके बाद इसे बदलना पड़ता है।  आई यू डी को मासिक धर्म की अवधि के दौरान या इसके तत्काल बाद डॉक्टर द्वारा गर्भाशय में डाल दिया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंतर्वेशन के समय गर्भ ठहरा हुआ नहीं था।  गर्भ निरोधक के रूप में आई यू डी काफी प्रभावी है  तथापि इसके कुछ अतिरिक्त परिणाम भी है जिनमें से कुछ हैं-

  • अंतर्वेशन के पहले तीन से पांच दिन तक काफी खिंचाव और दर्द रहता है।
  • मासिक-धर्म के दौरान काफी खून जाता है या दो मासिक-धर्म के बीच भी खून जाता है जिसमें खून की कमी की संभावना बनी रहती है।
  • किसी-किसी मामले में गर्भाशय में छेद हो जाता है। यदि आई यू डी के चारों ओर गर्भाशय का संस्तर उगता है तो आई यू डी के विकृत होने की भी संभावना रहती है।  विकृत आई यू डी को निकालने में काफी दर्द होता है। कभी-कभी तो डी एंड सी (विस्तारण व खुरचन) की आवश्यकता पड़ जाती है।
  • श्रोणि सूजन बीमारी (पी आई डी) गर्भाशय मार्ग संस्तरण, गर्भाशय की भित्ती, फैलोपियन ट्यूब, डिंबाशय, गर्भाशय झिल्ली, गर्भाशय के चौड़े स्नायु या श्रोणि भित्ती को संस्तरण करने वाले झिल्ली, में होने वाला संक्रमण है। यह गोनोरिया और क्लेमेडिया जैसे संक्रामक घटकों के विभिन्न प्रकारों से होती है।  आई यू डी का उपयोग करने वाली महिलाओं में इसका खतरा कोई निरोधक उपयोग न करने वाली महिला के अनुपात में दुगुना हो जाता है।
  • गर्भाशय गर्भधारण, आई यू डी का उपयोग करने वाली महिलाओं में अधिक होता है (तांबे के आई यू डी का उपयोग करने वालों के बीच यह 3 प्रतिशत है)। गर्भाशय के बाहर गर्भधारण (गर्भाशय के बाहर गर्भधारण होना जो सामान्यतः फैलोपियन ट्यूब में होता है) एक गंभीर समस्या है जिसमें रक्त स्राव हो सकता है और रक्त स्राव से संक्रमण, बांझपन तथा कभी-कभी मृत्यु हो सकती है (जब तत्काल चिकित्सा सेवा उपलब्ध न हो)।
  • आई यू डी को गर्भ निरोधक के रूप में काफी सोच-विचार के बाद चुनना चाहिए। यदि किसी को बच्चा न हुआ हो तो आई यू डी डलवाना ठीक नहीं है। यह उन महिलाओं के लिए भी उपयुक्त नहीं है जिनके जननांग में बार-बार संक्रमण होता है, जिनका गर्भाशय के बाहर गर्भधारण का इतिहास रहा है, जो भारी डिस्मेनोरिया से पीड़ित हो अर्थात् जिनको मासिक-धर्म के समय काफी दर्द होता हो या वे महिलाएं जिनमें खून की काफी कमी हो।

अधिकांश सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में प्रसव या गर्भपात के तुरंत बाद   आई यू डी डलवाने पर दबाव डाला जाता है जबकि यह काफी खतरनाक होता है।

बिना स्टेरॉयड वाली गोलियाँ - सेंटक्रोमनः भारत में यह सहेली या च्वायस 7 के नाम से बिकती है। बिना स्टेरॉयड वाली गोलियां डिंब को गर्भाशय में तेजी से ले जाते हैं।  यह तब भी काम करता है जब उर्वरण हो चुका होता है।  बिना स्टेरॉयड वाली गोलियों  को सरकार आदर्श गर्भ निरोधक के रूप में बढ़ावा दे रही है।  यद्यपि यह हार्मोन गोलियां नही है, तथापि यह महिला के शरीर में एस्ट्रोजन-प्रोजेस्ट्रोन प्रकार्य में परिवर्तन लाती है।  सेटक्रोमन किसी-किसी उपयोक्ताओं में गर्भाशय डिंब तैयार करता है।

गर्भपातः

गर्भाधान की पूरी अवधि से पहले गर्भ समाप्त करने की प्रक्रिया को गर्भपात कहते हैं।  इसमें गर्भाशय से भ्रूण को निकाल दिया जाता है।  स्वतः गर्भपात या अपने आप हो जाने वाले गर्भपात प्राकृतिक गर्भ समाप्ति की प्रक्रिया है।  प्रेरणात्मक गर्भपात को गर्भ की चिकित्सकीय समाप्ति (एम टी पी) कहते है।  गर्भ-निरोधक के उपयोग के बाद भी कभी-कभी गर्भ ठहर जाता है।  बलात्कार, व्यभिचार या जबरदस्ती किये गये संभोग से भी गर्भ ठहर सकता है।  ऐसी परिस्थिति में महिला गर्भपात कराने का निर्णय ले सकती है।  अनादिकाल से गर्भपात को परिवार नियोजन के साधन के रूप में अपनाया जाता रहा है।  बाहर से मालिश, कठोर शारीरिक श्रम, किसी धारदार वस्तु से गर्भाशय को खुरोचना, गर्भपात कराने वाली जड़ी-बूटी खाना आदि ऐसे कुछ उपाय थे जिससे महिलाएं अनचाहे गर्भ को समाप्त करने का प्रयास करती रही हैं।  कई समाजों ने गर्भपात पर धार्मिक प्रतिबंध भी लगा रखे हैं, क्योंकि इससे जान को खतरा रहता है।  यद्यपि कई देशों में अभी भी गर्भपात को अवैध घोषित किया हुआ है, तथापि विश्व भर में महिलाओं ने इसे विधि सम्मत, सुरक्षित, वहनयोग्य और सुगम गर्भपात को अधिकार के रूप में प्रतिष्ठित कराने का आंदोलन छेड़ रखा है।  प्रेरणायुक्त गर्भपात को गर्भ की चिकित्सकीय समाप्ति अधिनियम, 1972 के अंतर्गत वैधानिक बनाया गया है।  गर्भपात के दौरान भ्रूण और गर्भनाल को गर्भाशय-मुख से निकाला जाना है।  गर्भ के विभिन्न स्तरों के आधार पर गर्भपात की विभिन्न पद्धतियों का उपयोग किया जा सकता है -

  • चूषण (सक्शन): यह उन गर्भों के लिए उपयुक्त है जो 6 से 8 सप्ताह तक का हो। इसमें दोनली या ट्यूब के एक सिरे को चूषण पंप से जोड़ा जाता है और दूसरा सिरा गर्भाशय में डाला जाता है। इसे सामान्य (जनरल) या स्थानीय( लोकल) अनेस्थिशिया के अंतर्गत किया जाता है। चूषण की प्रक्रिया से भ्रूणात्मक ऊतकों (टिश्यू) को कुछ ही मिनटों में निकाल लिया जाता है। इसके लिए अस्पताल में रहने की आवश्यकता नहीं होती।
  • डी एंड सी (विस्तारण और खुरचन): 8 से 16 सप्ताह के गर्भ के लिए इसका उपयोग किया जाता है। गर्भाशय को एक तनुकार छड़ से चौड़ा किया जाता है और खुरचनी से गर्भाशय को खुरचकर साफ किया जाता है। इसे सामान्य अनेस्थिशिया के अंतर्गत किया जाता है।
  • प्रेरणात्मक प्रसवः 16 से 20 सप्ताह वाले उन्नत गर्भ के मामले में इस पद्धति का उपयोग किया जाता है। सामान्यतः लवणीय, यूरिया या प्रोस्टाग्लेनडिन का घोल गर्भ थैली में डाला जाता है जिससे समय-पूर्व प्रसव से भ्रूण को निकाला जाता है। इसे स्थानीय अनेस्थिशिया के अंतर्गत किया जाता है और एक या दो दिन के लिए अस्पताल में रहने की आवश्यकता होती है।
  • गर्भपात की गोलियां: माइफप्रिस्टोन और मिसोप्रोस्टल औषधी के संयुक्त उपयोग से चिकित्सकीय गर्भपात संभव है। इसे भारत में वैध घोषित किया गया है। माइफप्रिस्टोन (जिसे आर यू 486 के नाम से भी जाना जाता है) गर्भपात निवारक गोली है जो अपने-आप में भरोसेमंद नहीं है। अतः इस गोली के लेने के 2 से 3 दिन बाद प्रोस्टोक्लेडीन (मिसोप्रोस्टल) गोली लेनी पड़ती है। आर यू 486, 6 से 8 सप्ताह वाले गर्भ के गर्भपात की प्रक्रिया आरंभ करने के लिए ही प्रभावी है। गर्भपात की गोलियां चिकित्सकीय पर्यवेक्षण में ही ली जानी चाहिए क्योंकि इससे इतना खून निकलने लगता है कि नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। इसके और अतिरिक्त परिणाम है- उल्टी, मिचली और अत्यधिक मात्रा में खून गिरना जिससे मृत्यु भी हो सकती है। गर्भपात में 12 दिन लग सकते हैं और इन 12 दिनों में लगातार खून निकलते रहता है। चूंकि आर यू 486 गर्भ के शुरू-शुरू में प्रभावी होता है, अतः यह अभी तक पता नहीं चल पाया है कि यदि गर्भपात न हो, तो भ्रूण पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

हार्मोनीय पद्धतिः

हार्मोनीय पद्धति में शरीर के हार्मोन, एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन, को प्रभावित किया जाता है, जिससे डिंबोत्सर्ग या शुक्राणु उत्पादन को रोका जा सके। ये गर्भाशय के श्लेषमा (म्यूकस) को गाढ़ा करने में भी सहायक सिद्ध होती है (इससे शुक्राणु गर्भाशय में प्रवेश नहीं कर पाता)। किसी-किसी मामले में गर्भाशय और फैलोपियन ट्यूब में परिवर्तन भी होता है जिससे उर्वरण को रोका जा सकता है।  हार्मोनीय पद्धति से शरीर के हार्मोन का नाजुक संतुलन बिगड़ सकता है।  इसके गंभीर अतिरिक्त परिणाम हो सकते हैं।  इसका असर न केवल जननेन्द्रियों पर पड़ता है, बल्कि शरीर के अन्य भागों में भी देखा जा सकता है। इससे प्रणालीबद्ध तरीके से परिवर्तन होता है। सरकारी गर्भ-निरोधक संस्थाएं इसे आदर्श गर्भ-निरोधक के रूप में बढ़ावा देती हैं, क्योंकि ये काफी प्रभावी होते हैं और इसे आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।

खाने वाली संयुक्त गर्भ-निरोधक गोलियां: खाने वाली विभिन्न प्रकार की गर्भ-निरोधक गोलियां इस प्रकार हैं-

खाने वाली संयुक्त गर्भनिरोधक गोलियां: इसमें दो हार्मोन होते हैं- एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन। इसका अनुपात भिन्न-भिन्न होता है। ये गोलियां गर्भ ठहरने नहीं देती।  मूलतः, चक्र के आरंभ में एस्ट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर डिंबाशय में डिंब के विकास में ये गोलियां बाधा पहुंचाती हैं।  टूडे का उच्च खुराक वाली संयुक्त गोली (जैसे ओवरल) की तुलना में कम खुराक वाली संयुक्त गोली (जैसे माला डी) काफी सुरक्षित है।  यह देखा गया है कि खाने वाली संयुक्त गर्भ निरोधक गोलियां सभी महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है।

प्रोजेस्ट्रोन -एक मात्र गोलीः खानेवाली संयुक्त गर्भ-निरोधक गोलियां डिंबोत्सर्ग को रोकती हैं, जबकि प्रोजेस्ट्रोन-एक मात्र गोलियां गर्भ को रोकती हैं। इससे श्रोणि श्लेष्मा (म्यूकस) बढ़ता है और शुक्राणुओं के साथ-साथ डिंबों के स्वाभाविक चाल की गति को कम करती है तथा गर्भाशय के संस्तरों को सही तरह से पनपने नहीं देती। इन गोलियों के कई लाभ है। उदाहरण के लिए प्रभावकारिता, सुविधा, निर्बाध संभोग और सिद्ध प्रत्यावर्तिता। लेकिन इसके कुछ अतिरिक्त परिणाम भी होते हैं, जिससे बचा जाना चाहिए।

गर्भ-निरोधक इंजेक्शनः डेपो प्रोवेरा (डेपो मैड्रोक्सी प्रोजेस्ट्रोन एसिटेट) और नेट एन (नोरेथिस्ट्रोन एनानथेट) एक मात्र प्रोजेस्ट्रोन इंजेक्शन वाला गर्भ निरोधक है। डेपो प्रोवेरा का प्रभाव तीन महीने तक रहता है और नेट एन का दो महीने तक।

परिवार नियोजन के लिए इंजेक्शन सुविधाजनक पद्धति है। इन इंजेक्शनों से थोड़े समय के साथ-साथ लंबे समय तक के अतिरिक्त परिणाम होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।  इसे भारी मात्रा में दिए जाने के परिणामस्वरूप इसका प्रभाव लंबी अवधि तक रहता है और इसके अतिरिक्त परिणाम गोलियों की तुलना में काफी अधिक होते हैं। महिला के चाहने पर भी इसके प्रभाव को दो-तीन महीने के भीतर रोकना संभव नहीं होता।  इस समय राष्ट्रीय परिवार कल्याण कार्यक्रमों में इसे शामिल करने के लिए इन इंजेक्शनों के उपयोग को लाइसेंस नहीं दिया गया है।  इसे 1994 में निजी व्यवसायकर्ता तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा "सामाजिक बाजार" के लिए निबंधित किया गया है।

प्रोजेस्ट्रोन-एक मात्र इंजेक्शन के उपयोग से होने वाले स्वास्थ्य संबंधी खतरेः

  • लंबी अवधि के स्पॉटिंग और अत्यधिक खून बहाव से लेकर खून बंद होने की प्रक्रिया समाप्त होने तक मासिक धर्म में गड़बड़ी।
  • एथरोस्लेरोसिस - रक्त नलिका का मोटा होना और हृदय की नसों से संबंधित बीमारी।
  • थ्रम्बोइम्बोलिज़्म-अप्रत्याश्ति स्थान पर खून का जमा होना जिससे दिल, फेफड़ा और मस्तिष्क आदि खराब होना।
  • ओस्टियोपोरोसिस/हड्डी के घनत्व में हानि जिससे अस्थि भंग होने के अधिक अवसर।
  • वजन में परिवर्तन
  • अन्य उपापचय (मेटाबोलिज़्म) परिवर्तन जिससे सर्करा, उदासी, थकावट, संभोग की इच्छा आदि में परिवर्तन
  • उर्वरकता की वापसी का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता (अंतराल पद्धति में गंभीर समस्या)
  • कैंसर का खतरा हमेशा बना रहता है।
  • भ्रूण पर विपरीत प्रभाव (आकस्मिक गर्भाधान के मामले में)

आकस्मिक गर्भ-निरोधक गोली अथवा मॉर्निंग आफ्टर गोली -

असुरक्षित यौनि संबंध बनाने के पश्चात आकस्मिक गर्भ निरोधक की खाने वाली गोलियां खाकर गर्भाधारण रोका जा सकता है। यह उन स्थितियों में विशेष रूप से प्रासंगिक है जब किसी महिला के साथ उसकी मर्जी के खिलाफ संभोग किया गया हो (बलात्कार), कंडोम फट गया हो अथवा योजना रहित संभोग किया गया हो। असुरक्षित संभोग क्रिया के बाद 72 घंटे (3 दिन) तक ही आपाती गर्भ निरोधकों का प्रयोग किया जा सकता है। चार मानक खुराकें अथवा कम मात्रा की खुराक। आपाती गर्भ निरोधक के लिए माला-डी या माला-एन जैसी खाने वाली गर्भ निरोधक गोलियों का प्रयोग किया जा सकता है। परिवार नियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत लेवेनोजेस्ट्रल औषधि से बनी एक मार्निंग आफ्टर गोली को भी शामिल किया गया है जिसमें से दो गोलियां असुरक्षित संभोग से चार दिन के अंदर प्रयोग कर लेनी चाहिए।

इसके अतिरिक्त परिणामस्वरूप मिचली व उल्टी होती है और अगली माहवारी अवधि अनियमित हो जाती है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि आपाती गर्भ-निरोधक किस प्रकार कार्य करता है। ऐसा माना जाता है कि इससे डिंबक्षारण रोका जा सकता है तथा यदि पहले से ही डिंबक्षारण हो चुका हो तो इससे प्रजनन शक्ति भी तितर-बितर हो जाती है। तथापि यह 100 प्रतिशत प्रभावी नहीं है। माहवारी के दूसरे और तीसरे सप्ताह के दौरान एक असुरक्षित संभोग करने से औसतन 8 प्रतिशत गर्भ धारण की संभावना रहती है तथा आपाती गर्भ-निरोधक प्रयोग करने के पश्चात यह घटकर 2 प्रतिशत तक रह जाती है।

यहां यह याद रखना बहुत जरूरी है कि आपाती गर्भ निरोधकों का प्रयोग करना कारगर साबित नहीं होता है, तो भ्रूण में खराबी आने की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता है। अतः आपाती गर्भ निरोधकों का प्रयोग करते समय अत्यंत सतर्क रहना जरूरी है तथा सुनिश्चत करें कि गर्भपात की कानूनी और सुरक्षित परामर्श की समुचित व्यवस्था हो।

स्थायी उपायः

पुरुषों और महिलाओं में स्थायी उपायों के लिए उनके अंडे/शुक्राणु प्रवाहित करने वाली ट्यूब अवरुद्ध करने या काटने की आवश्यकता होती है। नई चिकित्सा तकनीक के अनुसार, पुनः प्रवाह मार्ग क्रिया (ट्यूब को फिर से जोड़ना) अपनाई जाती है किंतु यह सदैव संभव हो या सफल सिद्ध हो, यह जरूरी नहीं है। अतः ये तरीके सभी व्यावहारिक प्रयोग के लिए अपरिवर्तनीय है। बन्ध्याकरण बहुत ही अधिक प्रभावी है। अतः उन लोगों के लिए उपयुक्त है जिनमें परिवार नियोजन की भावना जाग चुकी हो और आश्वस्त हों कि उनको और अधिक बच्चों की आवश्यकता नहीं है।

1. वासेक्टोमी/पुरुष बन्ध्याकरणः

वासेक्टोमी, पुरुषों के लिए शल्य क्रिया द्वारा बन्ध्याकरण प्रक्रिया है। इस क्रिया से पुरुषों की वाहक नलिका अवरुद्ध कर दी जाती है जिससे कि शुक्राणु वीर्य के साथ पुरुष लिंग तक न पहुंच सकें। पुरुष, तथापि वीर्य को छोड़ना जारी रखता है तथा इससे उसकी संभोग क्रिया में किसी भी प्रकार का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है। पुरुष को उसकी मर्दानगी और संभोग कार्य निष्पादन के विषय में चिंता से मुक्त होने के लिए पर्याप्त तथा सचेतन परामर्श की आवश्यकता हो सकती है। नश्तर बिना बन्ध्याकरण के मामले में अंडकोश की थैली के दोनों ओर एक मामूली सा छेद किया जाता है जिससे "वास डेफरन" बाहर आ जाता है जिसे या तो काट दिया जाता है, बांध दिया जाता है या फिर उस पर क्लिप लगा दिया जाता है। इसके लिए स्थानीय अनेस्थीसिया दिया जाता है। बन्ध्याकरण एक मामूली तथा साधारण सी शल्य क्रिया है किंतु पुरुषों को शल्यक्रिया के पश्चात कम से कम 48 घंटे आराम करना होता है तथा एक सप्ताह तक उन्हें कोई भारी सामान नहीं उठाना चाहिए। व्यक्ति को मैथुन क्रिया सभी प्रकार का दर्द बंद होने तथा किसी भी मामले में एक सप्ताह के बाद ही आरंभ करनी चाहिए। शल्य क्रिया के बाद 2 से 3 महीने तक वैकल्पिक परिवार नियोजन के उपाए अपनाना चाहिए, क्योंकि वीर्य अपने वीर्य डक्ट में 3 महीने तक रह सकता है। यदि शल्य क्रिया के बाद तेज बुखार, अधिकाधिक या लगातार रक्त स्राव, सूजन या दर्द होता हो, तो तत्काल डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। पुरुष का बन्ध्याकरण करना सुरक्षित और आसान है क्योंकि पुरुष का लिंग, महिला की तुलना में बाहर होता है। अतः बन्ध्याकरण के समय शारीरिक अंगों के साथ कम से कम छेड़ छाड़ करनी पड़ती है तथा जटिलता भी कम से कम होती है। इसके अतिरिक्त, बन्ध्याकरण क्रिया से कोई अन्य लंबी अवधि के खतरे नहीं जुड़े होते है।

2. ट्यूबेक्टोमी/महिला बन्ध्याकरणः
इस प्रक्रिया के अंतर्गत महिला के उदर में एक छोटा सा छेद करना पड़ता है जिससे कि महिला के फैलोपियन ट्यूब तक पहुंचा जा सके। फिर उसको काट कर बांध दिया जाता है या ढक दिया जाता है। यह स्थानीय एनेस्थेसिया देकर किया जा सकता है। महिला के अंदर का फैलोपियन ट्यूब ब्लाक कर दिया जाता है जिससे कि अंडाशय में उत्पन्न अंडे, शुक्राणुओं के साथ मिल न सके। सही तरीके की शल्यक्रिया करने पर महिला बन्ध्याकरण बहुत ही प्रभावी सिद्ध होता है। इसमें जटिलताएं पैदा हो सकती हैं तथा होती भी हैं। संक्रमण, आंतरिक रक्त स्राव, बच्चेदानी और/या अंतड़ियों में छिद्र हो सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप हृदय संबंधित समस्याएं, अनियमित रक्तस्राव, माहवारी के दौरान काफी तकलीफ देने वाला दर्द और बार-बार डी एंड सी करने की आवश्यकता अथवा जननेन्द्रिय थैली तक निकालने की आवश्यकता होती है। ऐसे मामले में तत्काल डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। बन्ध्याकरण क्रिया के पहले तथा बाद में समुचित सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। शल्य क्रिया के बाद कम से कम 48 घंटे आराम की आवश्यकता होती है। सामान्य क्रियाकलाप 2 या 3 दिन के बाद आरंभ किए जा सकते हैं किन्तु एक सप्ताह तक कोई भारी सामान नहीं उठाना चाहिए। संभोग क्रिया सामान्यतौर पर एक सप्ताह के बाद आरंभ की जा सकती है।

यौन जनित बीमारी

एड्स एच.आई.वी./ एड्स क्या है?

एड्स-एच.आई.वी. नामक विषाणु से होता है। संक्रमण के लगभग 12 सप्ताह बाद ही रक्त की जाँच से ज्ञात होता है कि यह विषाणु शरीर में प्रवेश कर चुका है, ऐसे व्यक्ति को एच.आई.वी. पॉजिटिव कहते हैं। एच.आई.वी. पॉजिटिव व्यक्ति कई वर्षो (6 से 10 वर्ष) तक सामान्य प्रतीत होता है और सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है, लेकिन दूसरों को बीमारी फैलाने में सक्षम होता है।

यह विषाणु मुख्यतः शरीर को बाहरी रोगों से सुरक्षा प्रदान करने वाले रक्त में मौजूद टी कोशिकाओं (सेल्स) व मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रभावित करता है और धीरे-धीरे उन्हें नष्ट करता रहता है। कुछ वर्षो बाद (6 से 10 वर्ष) यह स्थिति हो जाती है कि शरीर आम रोगों के कीटाणुओं से अपना बचाव नहीं कर पाता और तरह-तरह का संक्रमण (इन्फेक्शन) से ग्रसित होने लगता है, इस अवस्था को एड्स कहते हैं।

एड्स का खतरा किसके लिए

  • एक से अधिक लोगों से यौन संबंध रखने वाला व्यक्ति।
  • वेश्यावृति करने वालों से यौन सम्पर्क रखने वाला व्यक्ति।
  • नशीली दवाईयां इन्जेकशन के द्वारा लेने वाला व्यक्ति।
  • यौन रोगों से पीड़ित व्यक्ति।
  • पिता/माता के एच.आई.वी. संक्रमण के पश्चात पैदा होने वाले बच्चें।
  • बिना जांच किया हुआ रक्त ग्रहण करने वाला व्यक्ति।

एड्स रोग कैसे फैलता है

  • एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन संबंध से।
  • एच.आई.वी. संक्रमित सिरिंज व सूई का दूसरो के द्वारा प्रयोग करने से।
  • एच.आई.वी. संक्रमित मां से शिशु को जन्म से पूर्व, प्रसव के समय या प्रसव के शीघ्र बाद।
  • एच.आई.वी. संक्रमित अंग प्रत्यारोपण से।
  • एक बार एच.आई.वी.विषाणु से संक्रमित होने का अर्थ है- जीवनभर का संक्रमण एवं दर्दनाक मृत्यु

एड्स से बचाव

  • जीवन-साथी के अलावा किसी अन्य से यौन संबंध नहीं रखें।
  • यौन संबंध के समय निरोध(कण्डोम) का प्रयोग करें।
  • मादक औषधियों के आदी व्यक्ति के द्वारा उपयोग में ली गई सिरिंज व सूई का प्रयोग न करें।
  • एड्स पीड़ित महिलाएं गर्भधारण न करें, क्योंकि उनसे पैदा होने वाले शिशु को यह रोग लग सकता है।
  • रक्त की आवश्यकता होने पर अनजान व्यक्ति का रक्त न लें, और सुरक्षित रक्त के लिए एच.आई.वी. जांच किया रक्त ही ग्रहण करें।
  • डिस्पोजेबल सिरिन्ज एवं सूई तथा अन्य चिकित्सकीय उपकरणों का 20 मिनट पानी में उबालकर जीवाणुरहित करके ही उपयोग में लावें, तथा दूसरे व्यक्ति का प्रयोग में लिया हुआ ब्लेड/पत्ती काम में ना लावें।

एच.आई.वी. संक्रमण पश्चात लक्षण

एच.आई.वी. पॉजिटिव व्यक्ति में 7 से 10 साल बाद विभिन्न बीमारिंयों के लक्षण पैदा हो जाते हैं जिनमें ये लक्षण प्रमुख रूप से दिखाई पडते हैः

  • गले या बगल में सूजन भरी गिल्टियों का हो जाना।
  • लगातार कई-कई हफ्ते अतिसार घटते जाना।
  • लगातार कई-कई हफ्ते बुखार रहना।
  • हफ्ते खांसी रहना।
  • अकारण वजन घटते जाना।
  • मुँह में घाव हो जाना।
  • त्वचा पर दर्द भरे और खुजली वाले दोदरे/चकते हो जाना।

उपरोक्त सभी लक्षण अन्य सामान्य रोगों, जिनका इलाज हो सकता है, के भी हो सकते हैं। किसी व्यक्ति को देखने से एच.आई.वी. संक्रमण का पता नहीं लग सकता- जब तक कि रक्त की जाँच न की जायें।

एड्स निम्न तरीकों से नहीं फैलता है:-

  • एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्ति के साथ सामान्य संबंधो से, जैसे हाथ मिलाने, एक साथ भोजन करने, एक ही घड़े का पानी पीने, एक ही बिस्तर और कपड़ों के प्रयोग, एक ही कमरे अथवा घर में रहने, एक ही शौचालय, स्नानघर प्रयोग में लेने से, बच्चों के साथ खेलने से यह रोग नहीं फैलता है। मच्छरों/खटमलों के काटने से यह रोग नहीं फैलता है।
  • एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्ति को प्यार दें- दुत्कारे नहीं

प्रमुख संदेश:-

  • सुरक्षित यौन संबंध के लिए निरोध का उपयोग करें।
  • हमेशा जीवाणुरहित अथवा डिस्पोजेबल सिरिंज व सूई ही उपयोग में लावें।
  • एच.वाई.वी. संक्रमित महिला गर्भधारण न करें।
  • एड्स से बचाव ही उपचार है - स्वयं बचे-दूसरो को बचावें

एच आई वी व एड्स जानकारी एवं सच्चाई

एडस किसी को भी हो सकता है..पर एड्स से सभी बच सकते हैं

सुनीता का डर

रमेश का परिवार पेशे से किसान है। उसकी शादी पांच महीने पहले सुनीता से हुई थी। वह अपनी छोटी सी जमीन पर सब्जी उपजा कर जीवन यापन करता था। पर शादी के बाद आमदनी के पैसे कम पड़ने लगे। रमेश ने दसवीं तक की पढ़ाई की थी । मोटर चलाने का काम भी सीख लिया था। सो उसने शहर में काम ढूंढ़ने का मन बनाया।

एक दिन रमेश खुशी- खुशी घर आया। उसने बताया कि उसे ट्रक चलाने की नौकरी मिल गई है। अब वह रोज शहर चला जाता। खेत का काम सुनीता ने संभाल लिया। इधर कुछ दिनों से रमेश देर से घर लौटता। कभी-कभी तो सप्ताह लग जाते। उसे ट्रक लेकर शहर से बाहर जाना पड़ता था। इसी बीच सुनीता गर्भवती हुई। खबर सुनकर रमेश बहुत खुश हुआ। परंतु सुनीता चिंतित थी। उसने एक जानलेवा बीमारी ‘एड्स’ के बारे में सुना। उसने सुना कि इसे आदमी अपने साथ बाहर से लाते हैं। यौन संबंध के दौरान अपनी पत्नियों को संक्रमण दे देते हैं।

एक दिन शहर से लौटने पर रमेश ने सुनीता को चिंतित देखा। पूछने पर एड्स के प्रति अपना डर बताया। रमेश ने उसे विश्वास दिलाया कि डरने की जरूरत नहीं है। क्योंकि वह किसी गलत काम में शामिल नहीं रहा है। सुनीता ने उससे पूछा कि एड्स क्या है ? रमेश ने उसे विस्तार से एड्स के बारे में बतलाया।

एड्स, एच.आई.वी के कारण होता है। एच.आई.वी एक विषाणु या वायरस है। यह शरीर में बीमारी से लड़ने की ताकत कम कर देता है। इस कारण इंसान कई तरह की बीमारियों से घिर जाता है।

A

एक्वायर्ड

बाहर से प्राप्त किया हु

 

I

आई

इम्यूनो

प्रतिरक्षा या बीमारी से बचाने वाली ताकत

 

D

डी

डिफिसियेंसी

कम

 

S

एस

सिंड्रोम

रोग /लक्षणों का समूह

 

एच.आई.वी कैसे फैलता है -

  1. संक्रमित व्यक्ति से असुरक्षित यौन संबंध यानी संभोग के कारण । स्त्री और पुरुष दोनों ही अपने साथी को यह संक्रमण दे सकते हैं।
  2. संक्रमित सीरिंजों एवं सूई के प्रयोग से। वे लोग, जो सूइयों का इस्तेमाल ड्रग लेने में करते हैं, उन्हें एड्स का खतरा ज्यादा होता है। यदि किसी सिरिंज और सुइयों का प्रयोग किसी एच.आई.वी मौजूद व्यक्ति में किया जाता है और उसे बिना उबाले या साफ किये जब दूसरे व्यक्ति में किया जाता है तो एच.आई.वी विषाणु उसमें भी प्रवेश कर सकते है।
  3. संक्रमित रक्त या रक्त पदार्थ को शरीर में चढ़ाने से। बिना जांच किये गये खून शरीर में चढ़ाने से एच.आई.वी के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है ।
  4. एच.आई.वी संक्रमित गर्भवती से गर्भ के शिशु को यह संक्रमण हो सकता है। हालांकि इस संभावना को कम किया जा सकता है। एड्स स्त्री, पुरुष, नौजवान, बच्चे किसी को भी हो सकता है। जो लोग जोखिम वाले व्यवहार (ड्रग लेना, एक से ज्यादा औरत से यौन संबंध आदि) में लिप्त हैं, उन्हें एड्स होने की संभावना अधिक होती है।

एच.आई.वी एवं एड्स के लक्षण

एच.आई.वी संक्रमण के बाद एड्स की दशा आने में 6 से 10 वर्ष लग सकते हैं। इसके कुछ प्रमुख लक्षण है :

  • एक महीने में 10 प्रतिशत तक वजन का घटना।
  • एक महीने से ऊपर लगातार या कुछ समय के अंतराल में दस्त होना।
  • एक महीने से ऊपर लगातार या कुछ समय के अंतराल पर बुखार का आना।

इसके अलावा लगातार खांसी, मुंह और गले में छाले, ग्रंथियों में सूजन आदि भी लक्षण हो सकते हैं। ऐसे में खून की जांच अवश्य करानी चाहिए। खून की जांच द्वारा एच.आई.वी का पता लगाया जा सकता है।

एच.आई.वी की जाँच कहाँ कराएं

यह जांच सभी सरकारी चिकित्सा महाविद्यालयों में स्थित स्वैच्छिक जांच एवं परामर्श केन्द्रों में होती है।
यह सरल जांच मात्र दस रुपये में की जाती है। जांच के साथ मुफ्त सलाह भी दी जाती है।
जांच के परिणाम बिल्कुल गोपनीय रखे जाते हैं।

निम्न लोगों को एच.आई.वी की जाँच अवश्य करानी चाहिए-

  • सूई से ड्रग लेने वाले लोग
  • एक से ज्यादा साथी के साथ यौन संबंध बनाने वाले लोग
  • व्यावसायिक यौनकर्मी
  • जिन्हें यौन संक्रमित बीमारी हो
  • एच.आई.वी संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन संबंध रखने वाले
  • एड्स संबंधित बीमारी के लक्षण देखने पर

एच.आई.वी के साथ जी रहे व्यक्ति

  • एकदम स्वस्थ दिख सकते हैं।
  • उन्हें अपने संक्रमण की जानकारी नहीं भी हो सकती है।
  • संक्रमित व्यक्ति लंबे समय तक जी सकते हैं।
  • जोखिम भरे व्यवहार से दूसरों को संक्रमण दे सकते हैं।

एच.आई.वी एवं एड्स से कैसे बचें

  • शादी से पहले यौन संबंध न बनाएं।
  • अपने जीवन-साथी के प्रति वफादार रहें। यानी यौन संबंध सिर्फ पति-पत्नी के बीच हों।
  • यदि आपको संदेह हो कि आपके साथी को एच.आई.वी या एड्स है तो कंडोम का इस्तेमाल करें।

हमारी भूमिका क्या हो

  • इस संक्रमण की पूरी जानकारी लें। दूसरों को जानकारी देकर एच.आई.वी एवं एड्स के प्रति शिक्षित करें।
  • इसके लिए समुदाय को उपलब्ध कराई जा रही सेवाओं की पहचान करें। साथ ही, सेवाओं को लेने हेतु उन्हें प्रोत्साहित करें।
  • एच.आई.वी संक्रमित व्यक्ति को वही प्यार, सम्मान और सहयोग दें जिसके हम और आप हकदार हैं।

सूचना प्रदाता-

जनसंख्या एवं विकास शिक्षा प्रकोष्ठ
राज्य संसाधन केंद्र, आद्री
219/ सी , रोड न. 2, अशोक नगर,
रांची- 834002 (झारखंड)
दूरभाष संख्या : 0651-2245084; फैक्स : 0651-2241509
ई-मेल: srcjharkhand@yahoo.co.in

सिफलिस क्या है ?

सिफलिस यौन संचारित बीमारी(एसटीडी) है जो ट्रेपोनेमा पल्लिडम नामक जीवाणु से होता है।

लोगों को सिफलिस की बीमारी किस प्रकार लगती है?

सिफलिस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को लगती है। यदि एक व्यक्ति उस व्यक्ति के सीधे संपर्क में आता है जिसे सिफलिस की बीमारी है तो उसे सिफलिस लग सकता है। गर्भवती महिला से यह बीमारी उसके गर्भ में रहने वाले बच्चे को लग सकता है। सिफलिस शौचालय के बैठने के स्थान, दरवाजा के मूठ, तैरने के तालाब, गर्म टब, नहाने के टब, कपडा अदला-बदली करके पहने या खाने के बर्तन की साझेदारी से नहीं लगती।

वयस्कों में इसके क्या चिह्न या लक्षण होते हैं ?

सिफलिस से पीड़ित कई व्यक्तियों में कई वर्षों तक कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं।

प्राथमिक स्तर

सिफलिस में सबसे पहले एक या कई फुंसियां दिखाई पड़ती हैं। सिफलिस संक्रमण और पहले लक्षण में 10 से 90 (औसतन 21 दिन) दिन लग जाते हैं। यह फुंसी सख्त, गोल, छोटा और बिना दर्द वाला होता है। यह उस स्थान पर होता है जहां से सिफलिस ने शरीर में प्रवेश किया है। यह 3 से 6 सप्ताह तक रहता है और बिना उपचार के ठीक हो जाता है तथापि यदि पर्याप्त उपचार नहीं किया जाता तो संक्रमण दूसरे स्तर पर चला जाता है।

दूसरा स्तर

दूसरे स्तर की विशेषता है कि त्वचा में दोदरा (रैश) हो जाते हैं और घाव में झिल्ली पड़ जाती है। दोदरे में सामान्यतः खुजली नहीं होती। हथेली और पांव के तालुओं पर हुआ ददोरा खुरदरा, लाल या लाल भूरे रंग का होता है तथापि दिखने में अन्य प्रकार के दोदरे, शरीर के अन्य भागों में भी पाये जा सकते हैं जो कभी-कभी दूसरी बीमारी में हुए दोदरों की तरह होता है। दोदरों के अतिरिक्त माध्यमिक सिफलिस में बुखार, लसिका ग्रंथि का सूजना, गले की खराश, कहीं-कहीं से बाल का झड़ना, सिरदर्द, वजन कम होना, मांस पेशियों में दर्द और थकावट के लक्षण भी दिखाई पड़ते हैं।

अंतिम स्तर

सिफलिस का अव्यक्त (छुपा) स्तर तब शुरू होता है जब माध्यमिक स्तर के लक्षण दिखाई नहीं पड़ते। सिफलिस के अंतिम स्तर में यह मस्तिष्क, स्नायु, आंख, रक्त वाहिका, जिगर, अस्थि और जोड़ जैसे भीतरी इंद्रियों को खराब कर देते हैं। यह क्षति कई वर्षों के बाद दिखाई पड़ती है। सिफलिस के अंतिम स्तर के लक्षणों में मांस पेशियों के संचालन में समन्वय में कठिनाई, पक्षाघात, सुन्नता, धीरे धीरे आंख की रोशनी जाना और यादाश्त चले जाना (डेमेनशिया) शामिल हैं। ये इतने भयंकर होते हैं कि इससे मृत्यु भी हो सकती है।

एक गर्भवती महिला और उसके बच्चे पर सिफलिस किस प्रकार प्रभाव डालता है ?

यह इस पर निर्भर करता है कि गर्भवती महिला कितने दिनों से इस रोग से प्रभावित हैं। हो सकता है कि महिला मृत प्रसव (बच्चे का मरा हुआ जन्म लेना) करे या जन्म के बाद तुरंत बच्चे की मृत्यु हो जाए। संक्रमित बच्चे में बीमारी के कोई संकेत या लक्षण न भी दिखाई दे सकते हैं। यदि तुरंत उपचार नहीं किया गया हो तो बच्चे को कुछ ही सप्ताह में गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है। जिस बच्चे का उपचार न किया गया हो उसका विकास रुक सकता है, बीमारी का दौरा पड़ सकता है या फिर उसकी मृत्यु हो सकती है।

सिफलिस और एचआईवी को बीच क्या संबंध है ?

सिफलिस के कारण दर्द भरे जनेन्द्रिय {रति कर्कट (यौन संबंधी एक प्रकार का ज्वर)} में यदि संभोग किया जाए तो एचआईवी संक्रमण होने के अवसर अधिक होते हैं। सिफलिस के कारण एचआईवी संक्रमण होने का जोखिम 2 से 5 गुना अधिक है।

क्या सिफलिस बार-बार होता है ?

एक बार सिफलिस हो जाने पर यह जरूरी नहीं है कि यह बीमारी फिर न हो। सफलतापूर्वक उपचार के बावजूद व्यक्तियों में इसका संक्रमण फिर से हो सकता है।

सिफलिस की रोकथाम किस प्रकार की जा सकती है ?

इस बीमारी से बचने का सबसे पक्का तरीका है कि संभोग न किया जाए। शराब व ऩशे की गोलियां आदि न लेने से भी सिफलिस को रोका जा सकता है क्योंकि ये चीजे जोखिम भरे संभोग की ओर हमें ले जाते हैं।

क्लैमिडिया क्या है ?

क्लैमिडिया एक सामान्य यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) है जो क्लैमिडिया ट्राकोमोटिस जीवाणु से होता है और यह महिला के प्रजनन इंद्रियों को क्षति पहुंचाता है।

व्यक्तियों को क्लैमिडिया किस प्रकार होता है ?

क्लैमिडिया योनिक, गुदा या मुख मैथुन से संचारित हो सकता है। क्लैमिडिया संक्रमित मां से उसके बच्चे में योनि से जन्म लेते समय लग सकता है। यौनिक सक्रिय व्यक्ति में क्लैमिडिया संक्रमित हो सकता है।

क्लैमिडिया के लक्षण क्या-क्या हैं ?

महिलाओं को ग्रीवा(सर्विक्स) और मूत्र मार्ग में सबसे पहले यह रोग संक्रमित करता है। जिस महिला में यह रोग पाया जाता है उसके योनि से असामान्य रूप से स्राव(डिस्चार्ज) हो सकता है या पेशाब करते समय जलन हो सकती है। जब संक्रमण ग्रीवा(सर्विक्स) से फैलोपियन ट्यूब (अंडाशय से गर्भाशय तक अंडों को ले जाने वाला ट्यूब) तक फैलता है, तो भी किसी-किसी महिला में इसके न तो कोई संकेत पाए जाते हैं और न ही कोई लक्षण दिखाई देते हैं; किसी-किसी को पेट और कमर में दर्द होता है, मिचली आती है, बुखार होता है, संभोग के समय दर्द होता है या मासिक धर्म के बीच में खून निकलता है।

जिन पुरुषों को यह बीमारी होती है उनके लिंग से स्राव हो सकता है या पेशाब करते समय जलन हो सकती है। पुरुषों को लिंग के रंध्र (ओपनिंग) के आसपास जलन या खुजली हो सकती है। क्लैमिडिया का यदि उपचार न किया जाए तो उसके परिणाम क्या-क्या हो सकते हैं ?

यदि उपचार न किया गया तो क्लैमिडिया के संक्रमण से गंभीर प्रजनन और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आ सकती है जो कम अवधि से लेकर लंबी अवधि के भी हो सकते हैं। महिलाओं का यदि उपचार न किया गया तो संक्रमण गर्भाशय से होते हुए फैलोपियन ट्यूब तक फैल सकता है जिससे श्रोणि जलन की बीमारी(पीआईडी) हो सकती है। क्लैमिडिया से संक्रमित महिला में यदि उपचार न किया जाए तो एचआईवी से संक्रमित होने के अवसर 5 गुना अधिक बढ़ जाते हैं जबकि पुरुषों में इसके अनुपात में जटिलताएं बहुत कम हैं।

क्लैमिडिया की रोकथाम कैसे की जा सकती है ?

यौन संचारित बीमारी की रोकथाम का सबसे अच्छा उपाय है कि संभोग न किया जाए या फिर ऐसे साथी के साथ आपसी एक संगी संबंध रखा जाए जिसे यह बीमारी नहीं है।

सुजाक (गानोरिआ) क्या है ?

सुजाक एक यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) है। सुजाक नीसेरिया गानोरिआ नामक जीवाणु से होता है जो महिला तथा पुरुषों में प्रजनन मार्ग के गर्म तथा गीले क्षेत्र में आसानी और बड़ी तेजी से बढ़ती है। इसके जीवाणु मुंह, गला, आंख तथा गुदा में भी बढ़ते हैं।

व्यक्तियों को सुजाक (गानोरिआ) की बीमारी किस प्रकार लगती है ?

सुजाक लिंग, योनि, मुंह या गुदा के संपर्क से फैल सकता है। सुजाक प्रसव के दौरान मां से बच्चे को भी लग सकती है।

सुजाक के संकेत और लक्षण क्या-क्या है ?

किसी भी यौन सक्रिय व्यक्ति में सुजाक की बीमारी हो सकती है। जबकि कई पुरुषों में सुजाक के कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते तथा कुछ पुरुषों में संक्रमण के बाद दो से पांच दिनों के भीतर कुछ संकेत या लक्षण दिखाई पड़ते हैं। कभी कभी लक्षण दिखाई देने में 30 दिन भी लग जाते हैं। इनके लक्षण हैं- पेशाब करते समय जलन, लिंग से सफेद, पीला या हरा स्राव। कभी-कभी सुजाक वाले व्यक्ति को अंडग्रंथि में दर्द होता है या वह सूज जाता है। महिलाओं में सुजाक के लक्षण काफी कम होते हैं। आरंभ में महिला को पेशाब करते समय दर्द या जलन होती है, योनि से अधिक मात्रा में स्राव निकलता है या मासिक धर्म के बीच योनि से खून निकलता है।

सुजाक गर्भवती महिला और उसके बच्चे को किस प्रकार प्रभावित करता है ?

यदि गर्भवती महिला को सुजाक है तो बच्चे को भी सुजाक (गानोरिया) हो सकता है क्योंकि बच्चा प्रसव के दौरान जन्म नलिका(बर्थ कैनल) से गुजरता है। इससे बच्चा अंधा हो सकता है, उसके जोड़ों में संक्रमण हो सकता है या बच्चे को रक्त का ऐसा संक्रमण हो सकता हो जिससे उसके जीवन को खतरा हो सकता है। गर्भवती महिला को जैसे ही पता चले कि उसे सुजाक(गानोरिया) है तो उसका उपचार कराया जाना चाहिए जिससे इस प्रकार की जटिलताओं को कम किया जा सके। गर्भवती महिला को चाहिए कि वे स्वास्थ्य कार्यकर्ता से परामर्श करके सही परीक्षण, जांच और आवश्यक उपचार करवाए।

सुजाक (गानोरिया) की रोकथाम कैसे की जा सकती है ?

इस बीमारी से बचने का सबसे पक्का तरीका है कि संभोग न किया जाए या फिर ऐसे साथी के साथ आपसी एक संगी संबंध रखा जाए जिसे यह बीमारी नहीं है।

यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) के साथ गर्भधारण

क्या गर्भवती महिला को यौन संचारित बीमारी(एसटीडी) हो सकती है ?

हां, गर्भवती महिलाओं को भी उसी तरह की यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) लग सकती है जैसे कि बिना गर्भ वाली महिलाओं को।

यौन संचारित बीमारी(एसटीडी) गर्भवती महिला और उसके बच्चे को किस प्रकार प्रभावित करती है ?

गर्भवती महिलाओं के लिए यौन संचारित बीमारी(एसटीडी) के परिणाम उसी प्रकार हो सकते हैx जैसे कि बिना गर्भ वाली महिलाओं के। यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) से ग्रीवा(सर्विक्स) और अन्य कैंसर हो सकता है, लंबी अवधि के हेपटाइटिस, श्रोणि(पेल्विक) की जलन वाली बीमारी, बंध्यता और अन्य कोई बीमारी हो सकती है। यौन संचारित बीमारी(एसटीडी) से पीड़ित कई महिलाओं में इसके कोई संकेत या लक्षण भी नहीं पाये जाते हैं।

यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) से पीड़ित गर्भवती महिला को समय-पूर्व प्रसव, गर्भाशय में बच्चे को घेरी हुई झिल्ली का समय-पूर्व फटना और प्रसव के बाद मूत्र मार्ग में संक्रमण हो सकता है। यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) बच्चे को जन्म से पूर्व, जन्म के दौरान या जन्म के बाद संक्रमित कर सकती है। कुछ यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) (जैसे कि सिफलिस) प्लेसेंटा के पार जाकर गर्भाशय (पेट) में ही बच्चे को संक्रमित कर देती है। अन्य यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) {जैसे सुजाक (गानोरिया), क्लैमिडिया, हेपटाइटिस बी और योनि त्वचा रोग} प्रसव के दौरान मां से बच्चे को लग सकती है क्योंकि बच्चा जन्म-नलिका से गुजरता है। एचआईवी, प्लेसेंटा को गर्भकाल के दौरान पार करके जन्म की प्रक्रिया के दौरान बच्चे को संक्रमित कर सकती है। इसके अतिरिक्त अधिकांश अन्य यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) के विपरीत स्तनपान के दौरान भी बच्चा इससे प्रभावित हो सकता है।

यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) के अन्य हानिकारक प्रभाव हैं- मृत प्रसव (बच्चा मरा हुआ जन्म ले), बच्चे का वजन काफी कम हो (पांच पाउंड से कम), नेत्र शोथ (कन्जेक्टीवाइटिस)(नेत्र संक्रमण), निमोनिया, नवजात शिशु में रक्त पूर्ति दोष (बच्चे की रक्त धारा में संक्रमण), तंत्रकीय क्षति(मस्तिष्क क्षति या शरीर के विभिन्न अंगों के बीच समन्वय न होना), अंधापन, बहरापन, गंभीर प्रकार का हेपटाइटिस, मस्तिष्क आवरण बीमारी, लंबी अवधि वाले जिगर की बीमारी और सिरोसिस।

क्या गर्भवती महिला की यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) की जांच की जानी चाहिए ?

यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) के उपचार में यह कहा जाता है कि गर्भवती महिला जब बच्चे के जन्म से पूर्व पहली जांच के लिए आए तो उसका यौन संचारित बीमारी(एसटीडी) की निम्नलिखित जांच भी की जानी चाहिएः

  • क्लैमिडिया
  • सुजाक(गानोरिया)
  • हेपेटाइटिस बी
  • हेपेटाइटिस सी
  • एचआईवी
  • सिफलिस

क्या गर्भधारण के दौरान यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) का उपचार किया जा सकता है?

क्लैमिडिया, सुजाक (गानोरिया), सिफलिस, ट्राइकोमोनस और जैविक योनि (बीवी) का उपचार किया जा सकता है तथा एंटीबायोटिक से गर्भधारण के दौरान इसे ठीक भी किया जा सकता है। योनि त्वचा रोग और एचआईवी जैसे वायरल यौन संचारित बीमारी(एसटीडी) को ठीक नहीं किया जा सकता लेकिन एंटीवायरल दवाइयों से गर्भावती महिला में इसके लक्षण कम किए जा सकते हैं। जिन महिलाओं में प्रसव के समय योनि त्वचा रोग का घाव रहता है, उनका सिजेरियन प्रसव (सी-सेक्शन) कराना ठीक होता है ताकि नवजात शिशु को संक्रमण से बचाया जा सके। एचआईवी से पीड़ित कुछ महिलाओं में भी सी-सेक्शन एक विकल्प है। हेपटाइटिस बी वाली महिलाएं गर्भधारण के दौरान हेपेटाइटिस बी का इंजेक्श नहीं ले सकती हैं।

गर्भवती महिला संक्रमण से अपना बचाव किस प्रकार कर सकती है?

यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) से बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि संभोग न किया जाए या फिर ऐसे साथी के साथ आपसी एक संगी संबंध रखा जाए जिसे यह बीमारी नहीं है।

श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी)

श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) क्या है ?
श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) एक सामान्य शब्द है जो गर्भाशय (बच्चेदानी), फैलोपियन ट्यूब (अंडाशय से गर्भाशय तक अंडों को ले जाने वाला ट्यूब) और अन्य प्रजनन इंद्रियों के संक्रमण से संबंधित है।

महिलाओं को श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) कैसे होती है ?
श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) तब होती है जब जीवाणु महिला की जननेद्रिय या ग्रीवा(सर्विक्स) से जननेद्रिय अंग में ऊपर की ओर प्रवेश करती है। बहुत से अलग-अलग अवयवों से श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) होती है किंतु अनेक मामले सुजाक (गानोरिया) और क्लैमिडिया से संबंधित हैं और दोनों ही जीवाणु यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) नहीं हैं। कामेन्द्रियों में लिप्त महिलाओं को अपने प्रजनन वर्ष के दौरान अत्यंत खतरा होता है और जिनकी आयु 25 वर्ष से कम है, उनको 25 वर्ष से अधिक वालों से अधिक खतरा होता है और उनमें श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) विकसित हो सकती है। इसका कारण यह होता है कि बीस वर्ष से कम आयु की लड़कियों और युवतियों का ग्रीवा(सर्विक्स) पूरी तरह परिपक्व नहीं होता है और वे यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) के लिए संवेदनशील होती हैं जो कि श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) से संबद्ध होती हैं।

श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) के संकेत और लक्षण क्या होते हैं ?
श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) के लक्षण गंभीर से गंभीरतम हो सकते हैं। जब श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी), क्लैमिडिया संबंधी संक्रमण से उत्पन्न होती है तो महिला को बहुत हल्के लक्षणों अथवा न के बराबर लक्षणों का अनुभव हो सकता है किन्तु उसकी प्रजनन शक्ति अंगो की खराबी का गंभीर खतरा होता है। जिन महिलाओं को श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) के लक्षण प्रतीत होते हैं उनको सामान्यतः पेट के निचले भाग में दर्द होता है।  अन्य लक्षण हैं- स्राव, जिसमें बदबू आ सकती है, दर्द भरा संभोग, पेशाब करते समय दर्द होना और मासिक धर्म के दौरान अनियमित रक्तस्राव होना।

श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) को कैसे रोका जा सकता है ?
यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) से बचने का सबसे पक्का तरीका है कि संभोग न किया जाए या फिर ऐसे साथी के साथ आपसी एक संगी संबंध रखा जाए जिसे यह बीमारी नहीं है।

योनि त्वचा रोग(हर्पिस)

योनि त्वचा रोग क्या है ?
योनि त्वचा रोग काम क्रिया से फैलने वाली बीमारी {यौन संचारित बीमारी (एसटीडी)} है जो कि हर्पिस सिम्प्लेक्स नामक वायरस प्रकार - 1 (एच एस वी-1) और टाइप - 2 (एच एस वी-2) से पैदा होता है।

व्यक्तियों को योनि त्वचा रोग कैसे होता है ?
सामान्यतया किसी व्यक्ति को काम क्रिया के दौरान एच एस वी-2 संक्रमण तभी हो सकता है जबकि वह ऐसे व्यक्ति के साथ संपर्क करे जो योनि एचएसवी-2 से पीड़ित है। यह किसी ऐसे व्यक्ति से भी हो सकता है जो संक्रमण से प्रभावित हो और उसमें कोई दर्द न हो। साथ ही, उसे यह भी मालूम न हो कि वह संक्रमण से पीड़ित है।

योनि त्वचा रोग के संकेत और लक्षण क्या होते हैं ?
एचएसवी-2 से पीड़ित अधिकांश व्यक्तियों को अपने संक्रमण की जानकारी ही नहीं होती है। वायरस संप्रेषण को 2 सप्ताह बाद ही पहला प्रकोप होता है और संकेत दिखाई पड़ते हैं। वे विचित्र रूप में दो से चार सप्ताह में ठीक हो जाते हैं लेकिन जननांग या गुदा में या उसके आसपास एक या दो फफोले रह जाते हैं। फफोले फूट जाते हैं और नरम फुंसिया रह जाती हैं जिन्हें ठीक होने में दो से चार सप्ताह लग जाते हैं। ऐसा पहली बार होता है। विचित्र रूप से दूसरा रोग फैलता दिखाई दे सकता है जो कि पहले रोग से कई सप्ताह या महीनों के बाद दिखाई देता है किंतु यह पहले की अपेक्षा कम गंभीर और कम अवधि का होता है। भले ही संक्रमण शरीर में लंबी अवधि के लिए बना रहे किंतु कुछ वर्षों की अवधि के दौरान फैलने वाले रोगों में कमी आ जाती है। अन्य संकेत और लक्षण फ्लू के लक्षणों की तरह होते हैं, जिनमें बुखार और सूजी ग्रंथियां शामिल हैं।

क्या इस त्वचा रोग का इलाज है ?
ऐसा कोई इलाज नहीं है जिससे कि त्वचा रोग का उपचार किया जा सके, किंतु एन्टी वायरस दवाइयों के प्रयोग से दवाई प्रयोग की अवधि के दौरान इसे फैलने से रोका जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रतिदिन निरोधात्मक उपाय करने से लाक्षणिक त्वचा रोग से साथी को बचाया जा सकता है।

त्वचा रोग की रोकथाम कैसे की जा सकती है ?
यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) से बचने का सबसे पक्का तरीका है कि संभोग न किया जाए  या फिर ऐसे साथी के साथ आपसी एक संगी संबंध रखा जाए जिसे यह बीमारी नहीं है।

स्रोत: जनसंख्या एवं विकास शिक्षा प्रकोष्ठ राज्य संसाधन केंद्र, आद्री 219/C, अशोक नगर, रांची

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भारत सिंह Feb 05, 2017 06:45 PM

एक लड़की कितने उम्र तक बचा पैदा कर सकती hi

XISS Mar 21, 2014 04:38 PM

डॉ. देवाशीष चक्रवर्ती जी, आपके इस पोर्टल में विजिट का धन्यवाद! हमें आशा है कि आप इस पोर्टल के सम्बन्ध में अपने सुझाव नियमित रूप से देंगें |

डॉ. देबाशीष चक्रबोर्ती Mar 11, 2014 03:07 PM

ई फाउंड थिस न्यूज़ लैटर वैरी इंXोर्Xेटिव एंड उसेफुल . प्लीज इंकिउरगे थे पार्टीसपाX्स तो शेयर मोरे एंड मोरे रॅलीटीएस फ्रॉम ठैरे वर्किंग फील्ड . ई विष ई वौल्ड एक्टीवेली पर्तिकिपाते एंड आल्सो मोबिलिसे ओठेर्स तो शेयर रेगुलरली थ्रू ठैरे वृतेउप्स.. थैंक्स एंड रेगार्ड्स

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