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राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग

इस पृष्ठ में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की जानकारी दी गयी है ।

भूमिका

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना अनुच्छेद 338 में संशोधन करके और संविधान (89वां संशोधन) अधिनियम, 2003 के माध्यम से संविधान में एक नया अनुच्छेद 338क अंतःस्थापित करके की गयी थी। इस संशोधन द्वारा तत्कालीन राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को 19 फरवरी, 2004 से दो अलग-अलग आयोगों नामतः (i) राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, और (ii) राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में विभक्त किया गया था। राष्‍ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्‍यक्ष, उपाध्‍यक्ष और तीन अन्‍य सदस्‍यों की सेवा शर्त्तें एवं पदावधि 20 फरवरी, 2004 को जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा अधिसूचित राष्‍ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्‍यक्ष, उपाध्‍यक्ष और सदस्‍यों (सेवा शर्त्तें एवं पदावधि) नियम, 2004 तहत नियंत्रित होती हैं।

पृष्ठभूमि

  • कुछ समुदायों को उनके हितों के सुरक्षणों के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जो अस्पृश्यता, आदिम कृषि-प्रथा, आधारभूत सुविधाओं का अभाव, भौगोलिक एकाकीपन जैसे गहन सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन से पीड़ित रहे हैं;
  • इन समुदायों को संविधान के अनुच्छेद 341(1) और 342(1) के प्रावधानों के अनुसार क्रमशः अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित किया गया है;
  • संविधान के अनुच्छेद 338 के मूल प्रावधानों के अधीन अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए नियुक्त विशेष अधिकारी (आयुक्त) को विविध विधानों में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षणों से संबंधित सभी मामलों की जाँच करने एवं इन सुरक्षणों के कार्यान्वयन पर राष्ट्रपति को रिपोर्ट देने का कार्य सोंपा गया था;
  • अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए आयुक्त के कार्यों को सुकर करने के लिए देश के विभिन्न भागों में 17 क्षेत्रीय कार्यालय स्थापित किए गए;
  • 1978 में सरकार ने (एक संकल्प के द्वारा) अध्यक्ष के रूप में श्री भोला पासवान शास्त्राó एवं 4 सदस्यों (3 वर्ष के कार्यकाल के साथ) अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए एक बहु-सदस्यीय आयोग (गैर-विधायी) की स्थापना का निर्णय लिया; अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए आयुक्त के कार्यालय का अस्तित्व भी बना रहा ;
  • पूर्व में महानिदेशक (पिछड़ा वर्ग कल्याण) को अन्तरित 17 क्षेत्रीय कार्यालयों को नये बहु सदस्यीय आयोग के नियंत्रण के अधीन वापस लाया गया;
  • 1987 में सरकार ने (अन्य संकल्प के माध्यम से ) विस्तृत नीति मामलों पर सरकार को सलाह देने के लिए आयोग के कार्यों को (इसे राष्ट्रीय स्तर का सलाहकारी निकाय बनाकर) संशोधित किया और अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के विकास को समान कर दिया है;
  • अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए वैधानिक राष्ट्रीय आयोग (65वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1990, 08-06-1990 को अधिसूचित होने के बाद) 12-03-1992 को कार्यरूप में आया। इसकी अध्यक्षता श्री रामधन द्वारा अध्यक्ष के रूप में की गयी और श्री बंदी उरांव उपाध्यक्ष तथा श्री बी0 सम्मैया, डा0 सरोजनी महीशी, चौधरी हरि सिंह, श्री एन0 ब्रह्मा और श्री जिना भाई दाराजी सदस्य के रूप में थे जिन्होंने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष अधिकारियों का स्थान लिया;
  • श्री एच0 हनुमन्थपा अध्यक्ष, श्रीमती ओमेम मोयोंग देवरी उपाध्यक्ष एवं श्री एन0सी चतुर्वेदी, श्री आनन्द मोहन बिस्वास, वे लामा लोपजेंग, श्री नार सिंह बैथा और श्री बी0 यादैया सदस्यों के साथ 05-10-1995 को दूसरा आयोग गठित किया गया;
  • तीसरा आयोग दिसम्बर, 1998 को गठित किया गया जिसमें श्री दिलीप सिंह भूरिया अध्यक्ष, श्री कामेश्वर पासवान उपाध्यक्ष और श्री हरिन्दर सिंह खालसा, वेन लाम्बा लोपलेंग, श्री छोत्रेय माझी, श्री एम0 कन्नन, श्रीमती बीना नय्यर सदस्य के रूप में थे। श्री एम. कन्नन के त्यागपत्र देने के पश्चात् श्री सी. चेल्लपन सदस्य बने;
  • चौथा आयोग मार्च 2002 में गठित किया गया जिसमें विजया सोनकार शास्त्री  अध्यक्ष, वेन लामा चोस्फल जोट्पा उपाध्यक्ष और श्री विजय कुमार चौधरी, श्री नारायण सिंह केसरी, श्री तापीर गाओ सदस्य के रूप में थे जबकि श्रीमती वीना नय्यर और श्री सी. चेल्लपन उनके 3 वर्ष के कार्यकाल के पूरा होने तक पद पर बने रहे। अगस्त, 2002 में श्रीमती वीना प्रेम कुमार भी श्रीमती वीना नय्यर के स्थान पर सदस्य बनी। श्री चेल्लपन का कार्यकाल पूरा होने पर श्री सम्पत कुमार दिनांक 30-09-2003 को सदस्य बने;
  • दिनांक 19-02-2004 की अधिसूचना के अनुसार संविधान के (89वें) संशोधन अधिनियम, 2003 के प्रावधानों के क्रियान्वयन के फलस्वरूप पूर्ववर्ती राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग का स्थान दो आयोगों यथा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) ने लिया। प्रथम राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की संरचना में श्री कुंवर सिंह अध्यक्ष (15-03-2004 से), श्री गजेन्द्र सिंह राजुखेरी उपाध्यक्ष (29-05-2006 से), वेन लामा लोपजेंग (02-03-2004), श्रीमती प्रेमा बाई मांडवी (04-03-2004 से), श्री बुदुरू श्रीनिवासुलु (11-03-2004 से) सदस्यों के रूप में शामिल थे। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं सदस्यों प्रत्येक का 3 वर्षों का कार्यकाल होता है। अध्यक्ष का स्तर संघीय केबीनेट मंत्री का होता है जबकि उपाध्यक्ष का स्तर राज्य मंत्री का होता है और सदस्य, भारत सरकार के सचिव का स्तर रखते है। श्री कुंवर सिंह ने फरवरी, 2007 में अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और श्री गजेन्द्र सिंह राजूखेरी ने मई, 2007 में अपने पद से त्यागपत्र दे दिया जबकि अन्य सदस्यों ने मार्च, 2007 में अपना कार्यकाल पूरा होने पर पदत्याग किया।
  • द्वितीय आयोग के रूप में श्रीमती उर्मिला सिंह, अध्यक्ष (कार्यभार 18-06-2007 से 24-01-2010 तक), श्री मोरिस कुजुर, उपाध्यक्ष (कार्यभार 25-04-2008 से 24-04-2011 तक), श्री छेरिंग सम्फेल, सदस्य (कार्यभार 14-06-2007 से 13-06-2010 तक) और श्री वरीस सीय्म मारीयाव, सदस्य (कार्यभार 17-04-2008 से 16-04-2011 तक) थे।
  • तीसरे आयोग में, डा. रामेश्वर उरांव ने दिनांक 28-10-2010 को अध्यक्ष का कार्यभार ग्रहण किया, श्रीमती के.कमला कुमारी ने दिनांक 21-07-2010 को सदस्य का कार्यभार ग्रहण किया जबकि श्री भैरू लाल मीणा ने दिनांक 28-10-2010 को सदस्य का कार्यभार ग्रहण किया। आयोग में उपाध्यक्ष तथा एक सदस्य का पद रिक्त पड़ा रहा। श्रीमती के कमला कुमारी अपनी तीन वर्ष की कार्य अवधि पूरा करने के पश्चात् दिनांक 20-07-2013 को कार्यालय से पदत्याग किया, डा0 रामेश्वर उरांव, अध्यक्ष अपनी तीन वर्ष की कार्य अवधि को पूरा करने के पश्चात् दिनांक 27-10-2013 को अपने कार्यालय से पदत्याग किया और श्री भैरू लाला मीणा, सदस्य ने दिनांक 28-10-2013 (पूर्वाह्न) को अपने कार्यालय को पदत्याग किया।
  • डा0 रामेश्वर उरांव को अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के रूप में तीन वर्ष की दूसरे सत्र के साथ पुनः नियुक्त किया गया। उसी तरह श्रीमती के.कमला कुमारी और श्री भैरू लाल मीणा को भी आयोग के सदस्य के रूप में तीन वर्ष की दूसरे सत्र के साथ पुनः नियुक्त किया गया। सभी ने दिनांक 01-11-2013 को संबंधित कार्यालय का कार्यभार ग्रहण किया। श्री रवि ठाकुर, एमएलए, हिमाचल प्रदेश विधानसभा को आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। श्री रवि ठाकुर ने दिनांक 14-11-2013 को कार्यभार ग्रहण किया। तथापि, दिनांक 17-07-2014 को श्रीमती के. कमला कुमारी तथा दिनांक 19-08-2014 को श्री और भैरू लाल मीणा का आकस्मिक निधन हो जाने के कारण, आयोग में सदस्यों के तीन पद वर्तमान में रिक्त पड़े हैं।

पहुंच और कार्य प्रणाली

 

संवैधानिक बाध्यताओं एवं मुद्दों को ध्यान में रखते हुए जो अब, अनुसूचित जनजातियों के सम्पूर्ण विकास एवं उन्हें मुख्य धारा में लाने के लिए स्वतंत्रता की लगभग आधी सदी के बाद जटिल हो गये हैं, वर्तमान आयोग जो फरवरी, 2004 में गठित किया गया था ने अपने कार्यों को करने के लिए एक अत्यधिक तीव्र पहुंच अपनायी है। आयोग की बैठकें नियमित रूप से होती हैं और लिए गये निर्णयों के कार्यान्वयन की निगरानी की जाती है।

विकास स्कीमों के प्रभाव का मूल्यांकन एवं निगरानी करने के बारे में, आयोग ने मुख्य सचिवों और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ राज्य समीक्षा  बैठकों के आयोजन तथा क्षेत्र स्तर दौरों के आयोजन के माध्यम से राज्यों/संघ शासित सरकारों के साथ वार्ता करने का निर्णय लिया है। आयोग महसूस करता है कि इन दौरों एवं बैठकों के परिणामस्वरूप, राज्य/संघ शासित सरकारें अनुसूचित जनजातियों की वास्तविक समस्याओं के प्रति अधिक सचेत हो जाएगी और सुधारात्मक उपायों को करने में आवश्यक पहल करेगी तथा उपयुक्त कार्य नीति अपनायेगी।

आयोग, अपने मुख्यालय एवं राज्य कार्यालयों के माध्यम से क्षेत्र स्तर जांच एवं अध्ययन भी आयोजित करता है। इस प्रक्रिया से तत्काल राहत सुनिश्चित करने की दृष्टि से नई ताकत मिली है, मुख्य रूप से उन मामलों में जो अनुसूचित जनजातियों पर अपराधों एवं अत्याचारों से संबंधित हैं और विकास संबंधी लाभों की मंजूरी से भी संबंधित हैं।

शिकायतों के अन्वेषण की प्रक्रिया, विशेष रूप से जो सेवा सुरक्षणों के उल्लंघन के संदर्भ में है, को वास्तविक मामलों में राहत प्रदान करने एवं मामलों के शीघ्र और तुरन्त निपटान को सुनिश्चित करने के लिए सुप्रभावी बनाया गया है। सुसंगत अभिलेखों सहित आयोग में अधिकारियों एवं संबंधित लाइजन अधिकारियों को बुला कर लम्बे समय से लम्बित मामलों को एक या दो बैठकों में निपटाया जा रहा है। आयोग ने जांच के दौरान उपस्थित होने एवं दस्तावेज प्रस्तुत करने में समन करने की सिविल न्यायालय की अपनी शक्तियों का प्रयोग भी किया है।

आयोग का मत है कि केवल सही योजना एवं विकास के लिए उपयुक्त स्कीमों के प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से ही अनुसूचित जनजातियाँ, शेष जनसंख्या के स्तर तक पहुंचने की आशा कर सकती हैं एवं अपनी पूर्ण क्षमता को पहचान सकती हैं। आयोग ने इस प्रकार स्वयं को सक्रिय रूप से सम्बद्ध करके एवं राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर योजना प्रक्रिया में भाग लेकर एक शुरूआत की है। योजना आयोग जनजातीय कार्य मंत्रालय और राज्य/संघशासित सरकारों के साथ नियमित पत्राचार किया जा रहा है। केन्द्रीय मंत्रालयों, राज्य और संघ शासित सरकारों की वार्षिक योजना का विश्लेषण आयोग में अपने राज्य कार्यालयों की मदद से किया जा रहा है।

आयोग के कार्य

(अनुच्छेद 338क  के  खण्ड (5) के अन्तर्गत)

  1. अनुसूचित जनजातियों के लिए इस संविधान या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या सरकार के किसी आदेश के अधीन उपबंधित सुरक्षणों से संबंधित सभी विषयों का अन्वेषण और अनुवीक्षण करना तथा सुरक्षणों के कार्यकरण का मूल्यांकन करना;
  2. अनुसूचित जनजातियां को उनके अधिकारों और सुरक्षणों से वंचित करने से संबंधित विशिष्ट शिकायतों की जांच करना;
  3. अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लेना और सलाह देना तथा संघ और किसी राज्य के अधीन उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना;
  4. अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं सामाजार्थिक विकास से संबंधित कार्यक्रमों/स्कीमों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए अपेक्षित सुरक्षणों, उपायों के कार्यकरण के बारे में प्रतिवर्ष, और अन्य समयों पर, जो आयोग ठीक समझे, राष्ट्रपति को प्रतिवेदन पेश करना;
  5. अनुसूचित जनजातियों के संबंध में अन्य कार्यों का निपटान करना जो राष्ट्रपति, संसद द्वारा बनाए गए किसी विधि के उपबंधो के अधीन रहते हुए, नियम द्वारा विनिर्दिष्ट करें;
  6. आयोग अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण, विकास तथा उन्नयन के संबंध में निम्नलिखित अन्य कृत्यों का निर्वहन करेगा -

 

(i) वन क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों के लिए गौण वन उत्पाद के संबंध में स्वामित्व अधिकार प्रदान करने की आवश्यकता हेतु उपाय किए जाने चाहिए।

(ii) खनिज संसाधनों, जल संसाधनों आदि पर कानून के अनुसार जनजातीय समुदायों को सुरक्षण अधिकार प्रदान करने के उपाय करना।

(iii) जनजातियों के विकास के लिए और अधिक विकासक्षम जीविका संबंधी युक्तियों के कार्यान्वयन के लिए उपाय करना!

(iv) विकास परियोजनाओं द्वारा विस्थापित जनजातीय समूहों के लिए राहत एवं पुनर्वास उपायों की प्रभावोत्पादक्ता में सुधार करना।

(v) भूमि से जनजातीय लोगों के हस्तान्तरण को रोकने संबंधी उपाय करना और व्यक्तियों को प्रभाव पूर्ण तरीके से पुनर्स्थापित करना जिनके मामले में हस्तान्तरण प्रक्रिया पहले ही हो चुकी है।

(vi) वनों का संरक्षण करने और सामाजिक वनरोपण का दायित्व लेने के लिए जनजाति समुदायों का अधिकतम सहयोग प्राप्त करने तथा उन्हें शामिल करने के लिए उपाय करना।

(vii) पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) अधिनियम, 1996 (1996 का 40) के उपबंधों के सम्पूर्ण कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के उपाय करना।

(viii) जनजातीय व्यक्यों द्वारा सिफ्टिंग खेती की प्रथा को पूर्णतः समाप्त करने तथा कम करने के उपाय करना जिससे भूमि और पर्यावरण लगातार कमजोर एवं क्षय होता है।

(ix) राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के संदर्भ में विस्तारित शर्त्तों के बारे में जनजातीय कार्य मंत्रालय की दिनांक 23-08-2005 की अधिसूचना की प्रति।

(x) राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के सुदृढ़ीकरण के लिए विस्तारित प्रस्ताव भेजते हुए मंत्रालय को दिनांक 21-10-2008 का राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का पत्र।

(xi) जनजातीय कार्य मंत्रालय को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष का दिनांक 13-01-2011 का अ.शा0 पत्र।

(xii) महत्वपूर्ण लम्बित मुद्दों पर की जाने वाली कार्रवाई के बारे में जनजातीय कार्य मंत्रालय को प्रधानमंत्री कार्यालय का दिनांक 24-05-2010 का अ.शा. पत्र।

(xiii) राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के दक्ष कार्य निष्पादन में संलग्न महत्वपूर्ण मुद्दों को हल करने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के उपाध्यक्ष का दिनांक 05-03-2010 को अ.शा. पत्र।

आयोग की शक्तियाँ

(अनुच्छेद 338क  के  खण्ड (8) के अन्तर्गत)

1. आयोग में अन्वेषण एवं जांच के लिए सिविल न्यायालय की निम्नलिखित शक्तियाँ निहित की गयी है -

(क)   किसी व्यक्ति को हारिज होने के लिए बाध्य करना और समन करना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

(ख)   किसी दस्तावेज का प्रकटीकरण और पेश किया जाना;

(ग)   शपथ पर साक्ष्य ग्रहण करना;

(घ)   किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अध्यपेक्षा करना,

(ड.)   साक्षियों और दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन जारी करना; और

(च)   कोई अन्य विषय जिसे राष्ट्रपति, नियम द्वारा अवधारित करें।

2. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को केन्द्रीय सरकार के विभाग की शक्तियों की मंजूरी के बारे में कल्याण मंत्रालय के दिनांक 05-02-1996 के आदेश की प्रति।

3. कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग कार्यालय ज्ञापन सं0 36036/2/97-स्था.(आ.) दिनांक 01-01-1998 ।

4. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के दक्ष कार्य निष्पादन में संलग्न महत्वपूर्ण मुद्दों को हल करने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के उपाध्यक्ष का दिनांक 05-03-2010 को अ.शा. पत्र।

संघ और राज्यों द्वारा परामर्श(अनुच्छेद 338क  के  खण्ड (9) के अन्तर्गत)

संघ और प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले सभी प्रमुख नीतिगत मामलों पर आयोग से परामर्श करना।

अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक सुरक्षण

 

शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक सुरक्षण

अनुच्छेद 15(4)

अन्य पिछड़े वर्गों (जिसमें अनुसूचित जनजातियां शामिल हैं) के विकास के लिए विशेष प्रावधान

अनुच्छेद 29

अल्पसंख्यकों (जिसमें अनुसूचित जनजातियां शामिल हैं) के हितों का संरक्षण;

अनुच्छेद 46

राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के, विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय एवं सभी प्रकार के शोषण से उसकी संरक्षा करेगा;

अनुच्छेद 350

पृथक भाषा, लिपि या संस्कृति की संरक्षा का अधिकार;

अनुच्छेद 350

मातृभाषा में शिक्षण।

सामाजिक सुरक्षण

 

अनुच्छेद 23

मानव दुर्व्यापार और भिक्षा एवं अन्य समान बलपूर्वक श्रम का प्रतिषेध;

अनुच्छेद 24

बाल श्रम निषेध।

आर्थिक सुरक्षण

 

अनुच्छेद 244

पांचवी अनुसूची का उपबंध खण्ड (1) असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा जो छठी अनुसूची के अन्तर्गत, इस अनुच्छेद के खण्ड (2) के अन्तर्गत आते हैं, के अलावा किसी भी राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के लिए लागू होता है;

अनुच्छेद 275

संविधान की पांचवी एवं छठी अनुसूचियों के अधीन आवृत विशेषीकृत राज्यों (एसटी एवं एसए) को अनुदान सहायता।

राजनीतिक सुरक्षण

अनुच्छेद 164(1)

बिहार, मध्य प्रदेश और उड़ीसा में जनजातीय कार्य मत्रियों के लिए प्रावधान;

अनुच्छेद 330

लोक सभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण;

अनुच्छेद 337

राज्य विधान मण्डलों में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण;

अनुच्छेद 334

आरक्षण के लिए 10 वर्षों की अवधि (अवधि के विस्तार के लिए कई बार संशोधित);

अनुच्छेद 243

पंचायतों में सीटों का आरक्षण;

अनुच्छेद 371

पूर्वोत्तर राज्यों एवं सिक्किम के संबंध में विशेष प्रावधान;

सेवा सुरक्षण

 

(अनुच्छेद 16(4), 16(4क), 164(ख), अनुच्छेद 335, और अनुच्छेद 320(40)

 

स्रोत: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग

3.10687022901

ऋषि kumar Feb 20, 2017 11:23 PM

सर जी मेरा सवाल ये हे की दलित की सुनवाई क्यों नहीं होती हे न थो फॉर लिखी जाती हे न कुछ ..मई कानपुर का रहना वाला हु .

सुनील चौहान मनावर Jan 18, 2017 07:47 PM

सर मेरी मदद करे बैक संबंधी हैं

Rupali आकाश kambale Nov 27, 2016 03:10 PM

मै. रूपाली आकाश कांबळे रूई ता. इंदापूर जि. पुणे इसी गाव मे महिला मागासवर्गीX सरपंच है।लेकीन मै मागासवर्गीX होने के कारण गाव मे काम करने के हेतु मुझे गाव के कही लोग परिशान करते है नाहक त्रास देते है। कही लोग मेरे विरुध्द षडयंत्र रचने की कोशीश करते है. मुझे हिन वागणुक देते है. तो मेरे बंदोबस्त के लिए आपकी तरफ से क्या सहायता मिल सकती है। धन्यवाद. मेरा नंबर 91XXX77

सुबाष च'द गौतम Nov 03, 2016 03:27 PM

रेलवे भरती बोड इलाहाबाद गुप डी मे धाधली

aruna kumari phaleja Jul 07, 2016 12:14 PM

jila parishd dungarpur drara 15 mahino se thread gread teacher ki santosh purn seva de rahi 24 sikshika ko manmani she hata diya hai ath 24 sikshikao ko punh nokri par bahal karvane ki shayta kare

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