सामग्री पर पहुँचे | Skip to navigation

होम (घर) / समाज कल्याण / उद्यमिता / स्टार्ट-अप इंडिया / एक प्रयास / आर्थिक आजादी की अलख जगाती आधी आबादी
शेयर
Views
  • अवस्था संपादित करने के स्वीकृत

आर्थिक आजादी की अलख जगाती आधी आबादी

इस भाग में मधुबनी जिले के अंधराठाढ़ी प्रखंड में आर्थिक आजादी के लिए कार्य कर रही महिलाओं के प्रयासों को प्रस्तुत किया गया है।

आम तौर पर घूम-घूम कर सामान को बेचने का काम पुरुष करते हैं। अगर महिलाएं इसी तरीके से व्यापार करे और विपरीत परिस्थितियों में इसी व्यापार के जरिये दूसरे की भी सहायता करें तो यह कौतूहल का विषय हो सकता है, लेकिन यह सच है। सुदूर इलाके की महिलाएं स्वयं सहायता समूह के जरिये प्रशिक्षण लेकर हर घर से अनाज,फल एकत्र कर के उसे बेच रही हैं और दूसरों के भोजन की व्यवस्था कर रही है।

बदले हालात में जाना अन्न का महत्व

समाज के अंतिम कतार से ताल्लुक रखने वाली इन महिलाओं की कहानी अलग है। मधुबनी जिले के अंधराठाढ़ी प्रखंड अंतर्गत आने वाले इन ग्रामीणों की हालत बहुत दयनीय थी। इन क्षेत्रों में आय का एकमात्र जरिया मजदूरी था। पुरुष केवल मजदूरी कर के अपने परिवार का पेट पालते थे। इन घरों महिलाओं की भी हालत बहुत दयनीय थी। अन्न, पैसे की किल्लत हमेशा बनी रहती थी। इनकी हालत को देख कर ‘कमला स्वयं सहायता ग्रुप’ संस्था ने पहलकी। इस ग्रुप ने महिलाओं को बचत की आदत डालने की बातों का समझाया। साथ ही छोटे पैमाने पर बचत करने कीबात कही। ग्रुप ने सन् 2004-05 में इस की शुरुआत की। महिलाओं को ग्रुप से जोड़ने का काम शुरू किया गया। उन्हें यह बताने की कोशिश की गयी कि बचत कर के काफी हद तक पैसों और अन्न की कमी को दूर किया जा सकता है। संस्था की प्रोजेक्ट मैनेजर नीतू सिंह बताती हैं कि महिलाओं ध्यान ही नहीं देती थी। उनका कहना होता था कि खाने के लिए पैसे नहीं हैं तो बचत कहां से करेंगे? काफी मशक्कत के बाद महिलाओं ने बातों पर ध्यान देना शुरू किया।

कई विकल्प में से चुना अन्न एकत्र करने का काम

इन्होंने अन्न एकत्र करने का काम क्यों चुना? इस बारे में नीतू सिंह बताती हैं कि इन महिलाओं को हमने कई विकल्प दिये थे। हमारी सोच यही थी कि ये आर्थिक रूप से सबल हो। संस्था ने उनसे पूछा कि वह किस तरीके का काम करना पसंद करेंगी? इसके लिए अचार,पापड़ आदि बनाने का भी विकल्प दिया गया। इन्होंने इस विकल्प को खारिज कर दिया। फिर अन्न एकत्र करने की बात रखी गयी। इसके प्रति थोड़ी रुचि देखने को मिली। करीब 15 महिलाओं ने इसके लिए हामी भरी। सहमति मिलने के बाद उन्हें रुपया बचत करने की बात बतायी गयी। नीतू कहती हैं, यह पूरी तरह से ‘बचत ग्रुप’ बनाया गया था। इसका उद्देश्य बचत की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना था। फिर मीटिंग कीशुरुआत हुई। हर मीटिंग में हमारा जोर केवल बचत करने की बात को लेकर रहता था। हमने एक साल के लिए प्रति महिला 20 रुपये प्रति माह जमा करने की बात कही गयी। सबने पहल की। ग्रुप ने सलाना 36 सौ रुपये जमा किये। फिर महिलाओं का बैंक में खाता खुलवाया गया।

खुद काम चुनने का दिया गया विकल्प

बैंक में पैसा एकत्र होने के बाद महिलाओं को थोड़ी-थोड़ी मात्र में पैसा देने की शुरुआत की गयी। इनमें से पांच- छह महिलाओं ने पैसा लिया और अपनी जरूरतों को पूरा किया। इन महिलाओं ने ही दूसरी महिलाओं को प्रेरित करना शुरू किया। इसका काफी प्रभाव पड़ा। दूसरी महिलाओं ने भी ग्रुप से जुड़ने की इच्छा जतायी। इस दौरान वो महिलाएं जिन्होंने पहले पैसा लिया था। उन्हें जरूरत के लिए दुगुना पैसा देने की पहल की गयी। क्योंकि वो पहले लिये गये पैसे को ससमय वापस कर चुकी थी। नयी महिला सदस्यों को कम पैसा मिलता था। अन्न एकत्र करने की बात कैसे शुरू हुई? इस बारे में नीतू कहती हैं, हमने इन महिलाओं को यह कहा कि वो बचत करने के बाद अन्न एकत्र करने के काम में क्या कर सकती हैं? खुद बताये। इसके भी सुखद परिणाम सामने आये। इससे पहले इस तरह की बात किसी ने भी नहीं सोचा था। वह कहती हैं कि इन क्षेत्रों में लोग अन्न को रखने के लिए ‘बखाड़ी’ का उपयोग करते हैं। करीब हर घर में यह मिल जायेगा। फसल के मौसम में इन्हें हमने धान या गेंहू खरीदने की सलाह दी। बचत के पैसों से इन्होंने धान की फसल खरीदने का फैसला किया।

अल्प से बड़ी मात्र का सफर

अन्न खरीदने का काम ये कैसे करती हैं? इस बाबत नीतू बताती हैं कि क्षेत्र में गेंहू और धान दोनों की पर्याप्त उपज होती है। हमने इनको धान, गेंहू खरीदने की सलाह दी। यह भी बताया कि चावल या चूड़ा बना के इसे कैसे बेचा जा सकता है? एक किलोग्राम धान में करीब 700 ग्राम चावल या चूड़ा प्राप्त होता है। शुरू में ग्रुप ने दो कुंतल धान खरीदा और उसे चावल या चूड़ा के रुप में बेंच दिया। इससे काफी मुनाफा हुआ। अब दस कुंतल धान खरीद रही हैं। धान खरीदने के बाद चावल को अप्रैल, मई, जून, जुलाई महीने में बेचती हैं। धान से प्राप्त हुए मुनाफे ने इनका उत्साह बढ़ाया। फिर इन लोगों ने गेंहू खरीदना शुरू किया। इसके आटे को भी जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर में बेचती हैं। पूरे काम को ग्रुप की महिलाओं ने बांट लिया हैं। कुछ महिलाएं फसल को खरीदती हैं। कुछ इसे चावल, चूड़ा, आटा में तब्दील करवाती हैं। कुछ महिलाओं के जिम्मे इसे बेचना होता है। सब की अलग -अलग जिम्मेवारी है। सभी पूरे मन से इसे करती हैं।

लाभ से दुगुना हुआ जोश

अनाज खरीद के बेचने में हुए मुनाफे से इनका उत्साह चरम पर है। अब ये महिलाएं फलों, सब्जियों को भी खरीद कर बेंच रही है। फलों के लिए यह मार्च, अप्रैल में बागीचों को खुद के नाम पर पट्टे पर ले लेती हैं। फलों के मौसम में आम को बेच के बढ़िया लाभ प्राप्त करती हैं। इसी प्रकार अब इन्होंने मौसमी सब्जियों के साथ उन सब्जियों को भी उपजा के बेचने का काम शुरू किया है जो मौसम के पहले पैदा होती हैं। मौसमी सब्जियों को खरीदने-बेचने का काम पूरे साल करती हैं।

महिलाओं में आ रही है जागृति

सफलता मिलने से उत्साहित ये महिलाएं अब शिक्षा के प्रति भी गंभीर हो गयी हैं। कल तक अंगूठा लगाने वाली महिलाएं जो भूमिहीन और सुविधा से वंचित थी, समय निकाल पर शिक्षा पर भी ध्यान दे रही हैं। इन महिलाओं में से कई ने अपना घर भी बना लिया है। घर के पुरुष सदस्य इनके काम में सहयोग कर रहे हैं। इनके बच्चे जो स्कूल नहीं जा पाते थे। शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

लगातार संख्या में हो रहा है इजाफा

महज 15 महिलाओं के समूह से शुरू हुआ यह नायाब पहल अब पूरे शबाब पर है। इससे जुड़ने वाली महिलाओं कीसंख्या में वृद्धि होती जा रही है। अभी इनकी संख्या सौ से ऊपर पहुंच चुकी है। इसमें नवनगर, भदुआर, र्ही, ठाढ़ी, भगवतीपुर, रखवारी जैसे कई और गांवों की महिलाएं जुड़ी हुई हैं। नीतू कहती हैं, इनके काम को पहले लोगों ने सराहा ही नहीं था। लोग इसकी खामियों के साथ बात करना ज्यादा पसंद करते थे। कहते थे, इस तरह का काम कभी सफल नहीं हो सकता है। भला कोई क्यों खरीदेगा? अब वही लोग चावल,चूड़ा या आटा खरीदते हैं और इस पहल की सराहना करते हैं।

स्त्रोत: संदीप कुमार,स्वतंत्र पत्रकार,पटना बिहार।

3.04545454545
सितारों पर जाएं और क्लिक कर मूल्यांकन दें

Shakir Jun 21, 2016 09:37 PM

अच्छी पहल है

अपना सुझाव दें

(यदि दी गई विषय सामग्री पर आपके पास कोई सुझाव/टिप्पणी है तो कृपया उसे यहां लिखें ।)

Enter the word
नेवीगेशन
संबंधित भाषाएँ
Back to top

T612018/07/15 18:34:41.836437 GMT+0530

T622018/07/15 18:34:41.861805 GMT+0530

T632018/07/15 18:34:41.862544 GMT+0530

T642018/07/15 18:34:41.862822 GMT+0530

T12018/07/15 18:34:41.809682 GMT+0530

T22018/07/15 18:34:41.809855 GMT+0530

T32018/07/15 18:34:41.809993 GMT+0530

T42018/07/15 18:34:41.810128 GMT+0530

T52018/07/15 18:34:41.810212 GMT+0530

T62018/07/15 18:34:41.810283 GMT+0530

T72018/07/15 18:34:41.811056 GMT+0530

T82018/07/15 18:34:41.811243 GMT+0530

T92018/07/15 18:34:41.811463 GMT+0530

T102018/07/15 18:34:41.811684 GMT+0530

T112018/07/15 18:34:41.811728 GMT+0530

T122018/07/15 18:34:41.811816 GMT+0530