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ग्रामीण विकास में स्वैच्छिक कार्य के प्रोत्साहन के अंतर्गत परियोजनाएं तैयार करने के लिए दिशा निर्देश

इसमें ग्रामीण विकास में स्वैच्छिक कार्य के प्रोत्साहन के अंतर्गत परियोजनाएं तैयार करने के लिए दिशा निर्देश को बताया गया है|

उद्देश्य

परियोजना निम्नलिखित उद्देश्यों  को पूरा करेगी :

  • प्रायोगिक और नवपरिवर्तनीय प्रयासों के जरिए ग्रामीण विकास संबंधी उन कार्यकलापों को एकीकृत करना जो प्रतिवलित किए जा सकते हैं।
  • परिकल्पित कार्यकलापों के आयोजना, क्रियान्वयन और अनुरक्षण में भागीदारों को शामिल करना।
  • समाज के कमजोर वर्गों विशेषकर  गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों और महिलाओं के लिए आय के स्तर ऊपर उठाना और रोजगार के अवसर बढ़ाना।

स्थान

कार्यक्षेत्र ग्रामीण होना चाहिए, इसका मतलब है इसमें ग्राम पंचायतों के क्षेत्राधिकार में शामिल एक ग्राम। नगर निगमों, नगरपालिका, अधिसूचित क्षेत्र समितियों और नगर पंचायतों की सीमा में शामिल क्षेत्रों को ग्रामीण क्षेत्र नहीं माना जाएगा।

कार्यक्षेत्र में संगठन की मौजूदगी

संगठन के कार्यकर्ता गांव में अवश्य  होने चाहिए अथवा ग्रामवासियों के साथ इनका समन्वय होना चाहिए।

परियोजना की विषयवस्तु

कोई भी ग्रामीण विकास परियोजना जो भागीदारों की आय बढ़ाने, रोजगार के अवसर सृजन करने और उत्पादन बढ़ाने के लिए अभिकल्पित हो, सहायता के लिए पात्र है। ग्रामीण स्वास्थ्य और द्गिाक्षा संबंधी परियोजनाओं पर भी ऐसे क्षेत्रों के लिए विचार किया जा सकता है जहां ये सुविधाएं मौजूद नहीं हैं या इनकी तत्काल तथा सखत जरूरत है।

साधारणतः निम्नलिखित परियोजनाओं पर विचार नहीं किया जाएगा :-

  1. परिशुद्ध  रूप से अनुसंधान कार्यक्रम।
  2. ऐसी परियोजनाएं जो अनन्य रूप से भवन निर्माण तथा/अथवा वाहनों, मशीनरी  और उपस्कर की खरीद के लिए हैं।
  3. ऐसी परियोजनाएं जिनका लक्ष्य क्रियान्वयन स्वयंसेवी संगठनों की अवसंरचना सुविधाओं को सुदृढ़ करना है, और
  4. प्रबल रूप से कार्मिक अभिमुखी परियोजनाएं।

प्राथमिकताएं और वरीयताएं

कुछ क्षेत्र और भाग दूरस्थता, संचार सुविधा और पहुंच के अभाव सरकारी संस्थाओं की गैर-मौजूदगी तथा अनुनादी एवं मूलभूत सिविल संस्था संगठनों आदि की कमी की अतिरिक्त असुविधा से ग्रस्त हैं। ऐसे क्षेत्र जो तिरस्कार और अवसरों के अभाव से ग्रस्त हैं, को आसानी से पहाड़ी, रेगिस्तान,सीमावर्ती, निर्जल और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित आदि के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है; और असुविधा वाले वर्गों को एससी, एसटी, महिलाएं, विकलांग, विधवा, छोटे और सीमांत किसानों, मुक्त किए गए बंधुआ और भूमिहीन मजदूर, अनाथ, बीपीएल आदि की श्रेणी में रखा जा सकता हैं। एक सुदृढ़ निश्चयात्मक कार्य जो इन क्षेत्रों और वर्गों के लिए लक्षित हो को भी सांविधिक रूप से अधिदेशित  किया गया। इस अधिदेश  को आगे बढ़ाने के लिए इस दिशा  में स्वयंसेवी कार्य को दिशा निर्देशित करने की आवश्यकता है। इसलिए प्राथमिकता और वरीयता ऐसी परियोजनाओं के प्रस्ताव को दी जानी है जिनमें इन उपेक्षित और पिछड़े क्षेत्रों और वर्गों के लिए प्रतिवलनीय मॉडलों के विकास हेतु कार्यकलाप शामिल हैं।

सहायता की पद्धति

  • परियोजनाओं की सहायता सामान्य तौर पर कुल लागत के 90 प्रतिशत  तक की जाती है।तथापि, जहां तक संभव हो समुदाय/स्वैच्छिक संगठन का अंश दान परियोजना क्रियान्वयन एजेंसियों द्वारा जुटाया जाना है। अन्य स्रोत जैसे बैंक ऋण, सरकारी आर्थिक सहायता और सहायता का दोहन भी प्रायोजक संगठन के अंश दान के अलावा और लाभार्थियों के अंश दान किया जाता है। विभिन्न कार्यकलापों प्रकृति के आधार पर उन के लिए निधियन की विभिन्न दरें दी जाती हैं। निजी कार्यकलापों के लिए लाभार्थियों/स्वयंसेवी संगठनों का अंश दान अधिक हो सकता है।
  • यद्यपि अनन्य रूप से भवन निर्माण और/अथवा मशीनरी  और उपस्कर खरीदने के लिए परियोजना सहायता के लिए पात्र नहीं हो सकती है, इन मदों के लिए सहायता प्रदान की जाएगी यदि ये मूल कार्यक्रम के विच्चय  संघटक हों। उनका स्वामित्व समुदाय/प्रयोक्ता समूहों में सन्निहित होगा।
  • परियोजना  की  प्रशासनिक   लागत  जिसमें  वेतन,  वाहनों  का  रखरखाव,  फर्नीचर, आकस्मिकताएं और इसी प्रकार लागत शामिल है, की परियोजना की कुल लागत का 10 प्रतिशत  से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • भूमि की खरीद पर कपार्ट सहायता की पात्रता नहीं होगी।
  • बैंकिंग योग्य कार्यकलाप जैसे उत्पादन कार्यकलाप के लिए संचित निधि जुटाना, जानवरों, कच्ची सामग्री और मशीनरी  आदि को खरीदना, सामान्य तौर पर कपार्ट की सहायता के लिए पात्र नहीं होंगी।
  • केवल ऐसे स्वैच्छिक संगठनों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी जो सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किए गए मानदंडों और साथ ही कपार्ट द्वारा विकसित किए गए मानदंडों के भी अनुरूप हों।

महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों का  सशक्तिकरण

यह सुविदित है कि साधारणतः सुविधारहित समूहों जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाएं आदि की विकासात्मक प्रक्रियाओं में अनदेखी की जाती है। अधिकांशतः लाभ उन तक पहुंच नहीं पाते हैं। यह केवल उनके प्रति पक्षपात के कारण नहीं है परन्तु कार्यक्रमों तक पहुंचने में उनकी क्षमता के अभाव के कारण भी है। इसलिए यह आवश्यक  है कि कम से कम इनका 50 प्रतिशत लाभार्थी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के हों और पारिवारिक परिसंपत्तियां जो कपार्ट निधियों से सृजित की गई हैं, स्वामित्व महिलाओं का हो। इसकी प्राप्ति के लिए परिषद और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा सक्रिय रुख अपनाया जाना आवश्यक  है। इसके लिए ज्ञात और विश्वसनीय कमजोर वर्ग अनुकूल स्वयंसेवी संगठनों का पता लगाने और उनके साथ साझेदारी करने का दोहरा रुख अपनाने और परियोजनाओं का निष्पादन  अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं की आवश्यकताओं पर विशिष्ट संकेन्द्रण से विशेष  रूप से इन वर्गों को लक्षित करते हुए करने की आवश्यकता है।

संकेन्द्रण क्षेत्रों की निर्देशी  सूची निम्नांकित हैं :-

इस योजना के अधीन परियोजना प्रस्तावों में नीचे उल्लेख किएगए अनुसार एक या अधिक संकेन्द्रण क्षेत्रों का होना आवश्यक है :-

स्व-सहायता समूहों/संघ का संघटन, संवर्धन और निर्माण।

  • नेतृत्व प्रशिक्षण  और क्षमता निर्माण।
  • उत्पादक रोजगार के लिए कौशल  अभिमुखीकरण।
  • बाधारहित पर्यावरण और अभिगम्यता का संवर्धन।
  • कारपोरेट क्षेत्र सहित सरकारी और निजी नियोक्ताओं को सुग्राह्‌य बनाना।
  • क्रेडिट सहबद्धता/आंतरिक बचतों, परिक्रामी निधि और आधार पूंजी के साथ आजीविका संवर्धन।
  • मुद्दा आधारित जागरूकता सृजन कार्यक्रमों के माध्यम से सशक्तिकरण उदाहरणार्थ बालिका शिशु हत्या/भ्रूण हत्या, दहेज, लत छुड़ाना आदि।
  • लक्षित समूहों के सशक्तिकरण से संबंधित सभी मामलों की वकालत।
  • भूमि संबंधी कार्यकलाप जिनमें जल संचयन, लघु सिंचाई परियोजनाएं आदि शामिल हैं।
  • एकीकृत पर्यावरण और साफ-सफाई।

कार्य योजना

प्रत्येक परियोजना प्रस्ताव में प्रस्तावित कार्यकलापों का स्पष्ट  विवरण होना चाहिए। कार्य योजना बनाते समय निम्नलिखित पहलुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है :-

  • किए जाने वाले सभी कार्यकलापों को सूचीबद्ध करना।
  • इन कार्यकलापों का लक्ष्यों और अनुमानित लाभों से सीधा संबंध होना चाहिए।
  • कार्यकलापों की श्रृंखला की योजना बनानी चाहिए।
  • प्रत्येक कार्यकलाप के लिए समय और व्यय अनुसूचियां इस प्रकार परिकलित की जाएं जिससे कि अनुमानित परिकल्पित समय अवधि के भीतर संपूर्ण परियोजना पूरी हो जाए।
  • कार्य के प्रत्येक मद के लिए लागत अनुमान तैयार किए जाने चाहिए।

वर्गीकरण

  • यह महत्वपूर्ण है कि यह कार्यक्रम ग्रामीण/हैमलेट स्तर पर ग्रामीण जनता के सुदृढ़ समूह बनाने में सफल हो। जनता का समूह निर्माण महत्वपूर्ण पहला कदम है जो अधिक समय ले सकता है, कम से कम छः माह।
  • साधारणतः निर्धन ग्रामीण लोग अनेकानेक आर्थिक कार्यकलापों में लगे रहते हैं। इसलिए इस समूह के लोगों के लिए आर्थिक कार्यक्रम में जहां एक से अधिक कार्यक्रम शामिल हों, का संगठन और विकास किया जाए।
  • समूह आधार पर आय सृजन कार्यकलाप आयोजित किए जाने चाहिए।
  • आर्थिक कार्यक्रम की आयोजना और क्रियान्वयन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि ग्रामीण लोगों के समूह धीरे-धीरे संपूर्ण कार्यक्रम का प्रबंध अपने ऊपर ले सकें।

आर्थिक कार्यकलाप

  • कार्यकलापों में लोगों के मौजूदा कौशलों, अभिकल्पनों और प्रौद्योगिकी का उन्नयन, ऋण, कच्ची सामग्री और बाजार के लिए मध्यस्थों पर निर्भरता कम करने की व्यवस्था, प्रशिक्षण द्वारा अतिरिक्त व्यवसाय वर्धन शामिल हैं। साथ-साथ विभिन्न किस्म के कार्यकलापों पर विचार किया जा सकता है।
  • परियोजना बनाते समय प्रस्तावित कार्यकलाप की आर्थिक व्यवहार्यता प्रदर्शित  करने के लिए सरल लागत लाभ विशलेषण पहले ही किया जाए। इस परिप्रेक्ष्य में कच्ची सामग्री की उपलब्धता और तैयार उत्पादों का विपणन महत्वपूर्ण कारक हैं। इन दो निवेष्टियों  के संव्यवहार के लिए व्यवस्था की व्याख्या प्रस्ताव में की जानी चाहिए।
  • स्व-सहायता समूह (एसएचजीएस) के आय सृजन कौशल  को बनाए रखने के लिए बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थाओं द्वारा ऋण का आद्गवासन एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इस संबंधन के बगैर कपार्ट द्वारा परियोजना पर विचार नहीं किया जाएगा। उत्पादन के लिए तथा कार्यचलन आवश्यकताओं के लिए व्यच्च्टि अथवा सामूहिक परिसंपत्तियों का वित्तपोषण संस्थागत वित्तपोषण अनिवार्य है।

यह अनिवार्य है कि समुचित आर्थिक कार्यकलापों का चुनाव निर्धन ग्रामीण व्यक्तियों द्वारा स्वयं किया जाए।

  • परियोजना प्रस्तुत करने वाले स्वयंसेवी संगठन स्पष्ट  रूप से प्रतिमाह प्रति परिवार सृजित की जाने वाली आय के संबंध में प्रत्येक आर्थिक कार्यकलाप के लाभ/परिणाम, गरीबी रेखा के ऊपर लाए गए परिवारों की संख्या , रोजगार के लिए सृजित किए जाने वाले श्रम दिवस, बेरोजगारी में कमी की सीमा प्रत्येक गांव में सृजित किए जाने कुशल  मानवशक्ति  के पूल, अवसंरचना के संबध में अभिवर्धन, जोतयोग्य भूमि का संभावित अभिवर्धन, खाद्यान्न, दुग्ध, बागवानी, सब्जियों आदि के उत्पादन/उत्पादकता में अभिवृद्धि, अथवा कार्यकलापों को क्रियान्वित किए जाने के परिणामस्वरूप प्रमात्रात्मक रूप से सामाजिक और आर्थिक संकेतकों में कोई भी संभावित परिवर्तन निर्दिष्ट  करेंगे।

क्रियान्वयन संगठन की क्षमताएं

क्रियान्वयन संगठन को निम्न के लिए समर्थ होना चाहिए :-

  • ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धन व्यक्तियों की आवश्यकताओं को समझना।
  • आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों की प्राथमिकताओं को समझना।
  • अपने आप को अर्थव्यवस्था के सकारात्मक अंश दायी के रूप में देखने के लिए निर्धनों के लिए कार्यकलाप का निर्माण करना।
  • जन समूह बनाने की आवश्यकता को समझना और उसके लिए कौशल  प्राप्त करना।
  • कार्य अभिमुखीकरण का विकास।
  • आर्थिक कार्यकलापों की पहल करना और इन कार्यकलापों में शामिल विभिन्न चरणों को समझना।
  • नियमित क्षेत्रकार्य और अनुवर्ती कार्य के महत्व को समझना ।
  • प्रचालन क्षेत्र में प्रतिनिधित्व होना।

कार्यक्रम के सफल क्रियान्वयन के लिए संगठन के पास निम्नलिखित कौशल  होने चाहिए :-

  • व्यवहारिक कुशल ता अर्थात आत्मविश्वास  निर्माण, समूह निर्माण, नेतृत्व, संगठनात्मक क्षमता,अधिकारियों से संव्यवहार की क्षमता
  • व्यवसायिक कौशल  अर्थात आय सृजन कौशल

प्रबंधकीय कौशल  अर्थात कच्ची सामग्री की अधिप्राप्ति, विपणन, बजट व्यवस्था, लेखाकरण आदि निर्देशी  कार्यकलाप जिनके लिए यह सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है, निम्नलिखित हैं :-

  • जन समूहों का गठन।
  • सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण।
  • प्रेरणात्मक और जागरूकता निर्माण।
  • निर्धन व्यक्तियों का कौशल  प्रशिक्षण ।
  • स्थापना और उत्पादन संबंधी कार्यकलाप|
  • विपणन सहायता।
  • सामाजिक सहायता सेवाएं (शिशुगृह, बालवाड़ी आदि)।
  • कोई अन्य मदें।

परियोजना का स्थायित्व

कपार्ट सहायता बंद होने के बाद इस अवधि के दौरान शुरू  किए गए कार्यकलापों और प्रक्रियाओं के अनुवर्तन और निरंतरता के लिए योजना बनाना।

सामाजिक और आर्थिक लाभ

कपार्ट द्वारा सहायता प्राप्त परियोजना में स्पष्ट  रूप से परिणामों का उल्लेख किया जाए। परियोजना से परिकल्पित लाभों की विशिष्ट रूप से उल्लेख करने की आवश्यकता होगी। इनमें रोजगार, आय, उत्पादन, परिसंपत्ति और सुविधाओं अथवा परियोजना के लिए उपयुक्त किसी अन्य परिमापों के यूनिटों के संबंध में प्रमात्रात्मक होने की क्षमता होनी चाहिए। सामाजिक उपलब्धि जैसे पर्यावरण का सुधार, जागरूकता स्तर में वृद्धि, कौशलों  का उन्नयन, आत्म-निर्भरता और इसी प्रकार के तथ्यों को भी प्रमात्रात्मक रूप में दर्शाया  जाना चाहिए।

समय-अवधि

परियोजना की समयावधि प्रस्ताव में स्पष्ट  रूप से दर्शाया  जाना चाहिए। साधारणतः यह तीन वर्षों  से अधिक नहीं होगी। कार्यक्रम के प्रत्येक संघटक के लिए समय-सूची बनाई जाए जिसमें यह दर्शाया  जाए कि अनुमानित समय-सूची में संपूर्ण परियोजना को कैसे पूरा किया जाएगा।

निम्नलिखित 'चैक लिस्ट' सहायक हो सकती है :-

सर्वेक्षण

परामर्श

कार्मिक

कामचलाऊ पूंजी

प्रशिक्षण

भवन प्रचार

प्रकाशन

वाहन उपकरण

यात्रा

कील कब्जे और फर्नीचर

कच्ची सामग्री

आकस्मिक निधियां

मार्जिन धनराशि

निगरानी और मूल्यांकन

विपणन प्रबंधन पर विशेष  ध्यान देने की आवश्यकता है और इसका विस्तृत ब्यौरा दिया जाना चाहिए।

 

स्रोत: ज़ेवियर समाज संस्थान पुस्तकालय, कपार्ट, एन.जी.ओ.न्यूज़, ग्रामीण विकास विभाग,भारत सरकार|

3.05714285714

संतोष पटेल Nov 03, 2015 08:33 AM

हम भी मध्य प्रदेश के मण्डला जिले में नवसृजन संस्था संचालित करते हैं, आपके द्वारा दी गई अमूल्य जानकारी संस्था के लक्ष्य को पूर्ण करने में सहायक सिद्ध होगी !

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