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मशरूम उद्योग

मशरूम उद्योग द्वारा आर्थिक विकास की किन-किन जगहों पर संभावनाएं ज्यादा है इस बारे में यहाँ जानकारी दी गई है।

परिचय

गत दशक में मशरूम शनै: शनै: खाद्य के अपरम्परागत स्रोत के रूप में देश के विभिन्न भागों से प्रचलित हो रहा है, परंतुमशरूम उत्पादन के सम्बद्ध में कई तरह की भ्रांतियां भी फैली हुई हैं।

लगातार तीन दशकों तक असफल एवं उद्यमियों की अरूचि उत्पन्न होने के उपरांत शासकीय विभागों, उपक्रमों ने इस संबंध में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था। इसमें मूलत: इस उद्योग की असफलता के विभिन्न कारणों पर विचार किया गया। दुर्भाग्यवश इस संगोष्ठी में मूल मुद्दों पर विचार नहीं पूर्ण हो पाया।

तदनूपरांत खाद्य प्रसंस्करण विभाग, भारत सरकार द्वारा एक महत्वकांक्षी योजना को मूर्तरूप देते हुए वर्ष 1992 में इस क्षेत्र के अधोसंरचना विकास हेतु रू. 11.00 करोड़ की राशि स्वीकृत की गई। यह राशि विभिन्न राज्य सरकारों को राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के माध्यम से किया जा रहा है।

विश्वभर में मशरूम की 10000 प्रजातियाँ हैं जिसमें से मात्र 80 प्रजातियाँ प्रायोगिक तौर पर, 20 व्यावसायिक स्तर पर तथा 4-5 प्रजातियाँ औद्योगिक स्तर पर पैदा की जा रही है। मशरूम प्रोटीन, विटामिन एवं खनिज से परिपूर्ण है। भारत में 2000 प्रजातियों की पहचान  की की जा चुकी है। किन्तु यहाँ मुख्यत: आयस्टर मशरूम, बटन मशरूम, बटन एवं पेडिस्ट्रा मशरूम पैदा की जाती है। जहाँ तक अंतराष्ट्रीय बाजार का प्रश्न है, वहाँ आयस्टर मशरूम सर्वाधिक प्रचलित है। भारत में बटन मशरूम के लिए उपयुक्त जलवायु है। इस सम्बन्ध में हिमाचल प्रदेश के सोलन से विकास कार्य किये जा रहे हैं।

वर्ष 1987 से पंजाब एवं हरियाणा शीतगृहों से मशरूम को सफलतापूर्वक उगाया जा रहा है। इस क्षेत्र में भारत के कूल उत्पादन का लगभग 60 प्रतिशत मशरूम उत्पादित किया जा रहा है। इसमें 400 टन के लगभग मात्रा अंतराष्ट्रीय  स्तर पर मान्य आयस्टर मशरूम की है अथार्त निर्यात के लिए इसके कूल उत्पाद का मात्र 10 प्रतिशत ही उत्पादित किया जा रहा है।

भारतीय मशरूम उद्योग को अभी आकार लेना है। इसकी वास्तविक विकास दर भी अभी तक  ज्ञात नहीं है। इसका संगठित क्षेत्र में उत्पादन लगभग 2600 टन प्रतिवर्ष है, जबकि इस क्षमता का सिर्फ 20 प्रतिशत ही उत्पादन होता है। देश का वस्तविक उत्पादन लगभग 14000 टन ही है, जिसका लगभग 35 प्रतिशत ही निर्यात होता है।

इसके मुख्य आयातक यूरोपीय देश हैं जिन्होंने विभिन्न देशों से आयत का कोटा निर्धारित किया है। पोलैंड, चीन, दक्षिण कोरिया एवं ताइवान जैसे देशों को निर्यात हेतु निर्धारित कोटा आवंटित किया जाता है जबकि भारत को अन्य देशों में रखा  गया है जिसका कुल निर्यात कोटा ही 3790 टन प्रतिवर्ष है। संयूक्त अमेरिका द्वारा विश्व के कूल मशरूम व्यापर का 19 प्रतिशत आयत किया जाता है किन्तु कोई कोटा प्रणाली नहीं है। अमेरिका द्वारा आयातित मशरूम को अमेरिकन खाद्य एवं दवा प्रशासन द्वारा अनुमोदित होना अनिवार्य है। इस उद्योग की उच्च जोखिम दर उच्च श्रम लागत जैसे घटकों के कारण यु. एस. मान दण्डों का पालन अत्यंत द्न्श्कर है। अमेरिका जैसा देश, जो इसका प्रमुख उत्पादक एवं उपयोगकर्ता भी है, में भी मशरूम उद्योग से ठहराव आ रहा है। अमेरिका की इस कमजोरी का पूर्ण लाभ फ़्रांस एवं चीन ने उठाया है। हालाँकि मशरूम प्रोटीन, विटामिन एवं खनिज से परिपूर्ण है तथापि इसकी शेल्फ संरक्षण अवधि अधिक नहीं है। इसी कारण इसका अंतर्राष्टीय व्यापार प्रसंस्कारित रूप में हो रहा है।

भारतीय मशरूम उद्योग

भारतीय मशरूम उद्योग की बात करें तो भारत से मुख्यत: सूखे, तैयार एवं प्रसंस्करित मशरूम का निर्यात किया जाता है। वर्ष 94-95 से लगभग 500 मिट्रिक टन का निर्यात भारत द्वारा किया गया था, जिससे लगभग रू. 40 करोड़ इ विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई थी। इसका यदि वर्ष 91-92 के आंकड़ों रू. 3.81 करोड़ से तुलनात्मक अध्ययन करें तो प्रथम दृष्टया स्थिति प्रगतिवर्धक प्रतीत होती है, किन्तु वर्तमान में उपलब्ध संसधानों से इस क्षेत्र की इकाइयाँ निर्धारित मात्रा में उत्पादन करने से असक्षम है। देश के कूल उत्पादन 14000 मिट्रिक टन में से मात्र 5000 मिट्रिक टन ही निर्यात किया गया, इसमें से भी अधिकांश मात्रा विदेशी सहयोग से बनाये गए उत्पाद की

मशरूम के मुख्य आयातक यूरोपीय देश हैं जिन्होंने विभिन्न देशों में आयात का कोटा निर्धारित किया है। पोलैंड,चीन, दक्षिण कोरिया एवं ताईवान जैसे देशों को निर्यात हेतु निर्धारित कोटा आवंटित किया जाता है

अथार्त अधिकांश उत्पाद विदेशी कंपनियों द्वारा भारत से पैदा कर निर्यात किया गया एवं शेष उत्पादित माल या तो देश में ही उपयोग किया गया या बिना बिका पड़ा रहा।

क्या इसके लिए मात्र शासन की नीतियाँ ही दोषी हैं। नहीं, वर्तमान में उपलब्ध संसाधन एवं बाजार की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य से हमें इस उद्योग के पुनर्गठन पर विचार करना चाहिए। वर्तमान में मात्र 38 निर्यातोन्मुखी इकाइयों से भी केवल कुछ ही पूर्ण उत्पादन कर निर्यात कर पा रही हैं। यह नितांत सत्य है कि इसके इनपुट का उच्च लागत ही इस उद्योग का आधार है।

राज्य शासन इस उद्योग के विकास हेतु प्रयत्नशील है जैसा ही पूर्व में ही स्पष्ट किया जा चुका है, पंजाब एवं हरियाणा सहित देश के 21 राज्य इस हेतु कृषकों को आवश्यक प्रशिक्षण इस क्षेत्र में प्रदान कर रहे हैं। आन्ध्र प्रदेश से एक उद्योग, मशरूम की केनिंग सुविधा विकसित करने हेतु स्थापित हो रहा है।

यह भी सत्य है कि इस विशेषता एवं विशिष्ट अनुभव, सुपरविजन एवं देखभाल की आवश्यकता है। इन क्षेत्रों में जरा सी भी चूक उद्योग को बरबाद करने हेतु पर्याप्त है। यहाँ तक की पूर्णत: कम्प्यूटरीकृत इकाइयों में भी पर्याप्त मानवीय परीक्षण आवश्यक है। मशीनें, छह आयातित हों, भारतीय वातावरण एवं पर्यावरण मानदंडों के अनुरूप हों अनुभवहीन प्रबंध, श्रम शक्ति भी इस क्षेत्र में उत्पादन क्षमता में गिरावट लाते हैं। अत: प्रशिक्षण इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण घटक है। इस हेतु निवेशक, वित्तीय संस्थान एवं उद्यमियों को पर्याप्त धैर्य की आवश्यकता है। इस क्षेत्र में प्राथमिक कुछ वर्षों में अत्याधिक पूँजी निवेश एवं अन्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इस आवधि में कम उत्पादन होने से हानि भी अधिक होती है। अत: इस क्षेत्र में पर्याप्त धैर्य की आवश्यकता है। वृहद उद्योग ही इस क्षेत्र में सफल हैं। छोटे उद्योग जब तक कि वे वृहद उद्योगों पर आधारित नहीं हैं, उन्हें सदैव बंद होने का खतरा है।

इस हेतु चायना मॉडल जहाँ मशरूम मौसमी फसल के रूप में अतिरिक्त रूप से ली जाती है वृहद उद्योग भारतीय परिवेश हेतु सर्वोत्तम है। वैसे वर्तमान में भारत चीन की तुलना में लगभग 0-20 डॉलर प्रति किलो का प्राप्त करता है। चीन से इसका उत्पादन सामान्य वातावरण में बिना मशीनरी के उपयोग के सस्ते श्रम से इसका उत्पादन किया जाता है। वहाँ 5-6 किलोग्राम प्रति वर्गमीटर इसका उत्पादन होता है। चीन कोटा प्रणाली का लाभ उठाने के लिए इसका निर्यात सीधे न करते हुए हांगकांग के माध्यम से करता है।

भारत में इसके उत्पादन के लिए हमें वातावरण नियंत्रण की कीमतों से कमी तथा सेटेलाइट खेती चयनित स्थान पर करते हुए भारतीय वातानुकूल एवं अन्य मशीनरी से करने पर हमें गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। इससे इसकी लागत में कमी होगी एवं भारत अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता में टिक सकेगा। जहाँ तक मशरूम उद्योग में प्रशिक्षणार्थियों को चाहिए कि वे उनके उत्पाद को निर्यात किए जाने वाले देशों, वृहद उद्योगों से सम्बद्धता उनसे हुए अनुबंध एवं दर आदि के सम्बद्ध में पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ही किसी प्रकार का जोखिम इस उद्योग में लें।

स्रोत: जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची

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नरेंद्र पांडव Jan 29, 2018 02:39 PM

मशरूम बिजनेस करणा है. लोन के लियै अपलाय कहा करणा है.

रवीं KUMAR Jan 26, 2018 03:03 PM

डिअर सर मेरे को मशरूम की टर्निंग लेनी है कृपया सुझाब दे

सुधीर शिवजी WAGHMARE Jan 01, 2018 01:06 PM

मई मशरूम की खेती करना चाहता हु ,मुझे शासकीय योजना बताये ,और उसकी खरदी और विक्री कहाँ की जाती है उसी संभधा मई जानकारी देजा.

Sandeep Kumar vishwakarma Dec 12, 2017 12:31 PM

Bag me Kala Kala ho gaya h

vipin yadav Nov 23, 2017 09:03 AM

masrooom ke kheti Karna chahta hoon . sujjhab chaheye

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