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श्रमेव जयते कार्यक्रम पर प्रधानमंत्री के भाषण का मूल पाठ

इसमें पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय श्रमेव जयते कार्यक्रम की शुरूआत के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी द्वारा दिये गए भाषण का मूल पाठ है ।

श्री नरेन्‍द्र मोदी द्वारा दिये गए भाषण का मूल पाठ

 

उपस्थित सभी महानुभाव,

श्रमेव जयते, हम सत्‍यमेव जयते से परिचित हैं। जितनी ताकत सत्‍यमेव जयते की है, उतनी ही ताकत राष्‍ट्र के विकास के लिए श्रमेव जयते की है। और इसलिए श्रम की प्रतिष्‍ठा कैसे बढ़े? दुर्भाग्‍य से हमारे देश में वाइट कॉलर जॉब , उसका बड़ा गौरव माना गया। कोई कोट-पैंट टाई पहना हुआ व्‍यक्ति घर में दरवाजे पर आकर के बेल बजाता है, पूछने के लिए कि फलाने भाई हैं क्‍या, तो हम दरवाजा खोल कर कहते हैं, आइए-आइए, बैठिए-बैठिए। क्‍या काम था? लेकिन एक फटे कपड़े वाला, गरीब इंसान घंटी बजाए और पूछता है, फलाने हैं तो कहते हैं इस समय आने का समय है क्‍या? दोपहर को घंटी बजाते हो क्‍या? जाओ बाद में आना।

हमारा देखने का तरीका, सामान्‍य व्‍यक्ति की तरफ देखने का तरीका, क्‍यों, कि हमने श्रम को प्रतिष्ठित नहीं माना है। कुछ न कुछ कारणों से हमें उसे नीचे दर्जे का माना है। एक मनोवैज्ञानिक रूप से राष्‍ट्र को इस बात के लिए गंभीरता से सोचना भी होता है और स्थितियों को संभालने के लिए, सुधारने के लिए अविरत प्रयास करना भी आवश्‍यक होता है। उन्‍हीं प्रयासों की कड़ी में यह एक प्रयास है श्रमेव जयते।

श्रमयोगी, हमारा श्रमिक एक श्रमयोगी है। हमारी कितनी समस्‍याओं का समाधान, हमारी कितनी सारी आवश्‍यकताओं की पूर्ति एक श्रमयोगी के द्वारा होती है। इसलिए जब तक हम उसकी तरफ देखने का अपना दृष्टिकोण नहीं बदलते हैं, उसके प्रति हमारा भाव नहीं बदलता है, समाज में हम उसको प्रतिष्‍ठा नहीं दे सकते हैं। इसलिए शासन की व्‍यवस्‍थाओं में जिस तरह से समयानुकूल परिवर्तन की आवश्‍यकता है, काल बाह्य चीजों से मुक्ति की आवश्‍यकता होती है, नित्‍य नूतन प्राण के साथ प्रगति की राह निर्धारित करने की आवश्‍यकता होती है। उसी प्रकार से समाज जीवन में भी श्रम की प्रतिष्‍ठा, श्रमिक की प्रतिष्‍ठा, श्रमयोगी का गौरव, ये हम सब की सामूहिक जिम्‍मेवारी भी है और व्‍यवस्‍थाओं में परिवर्तन करने की आवश्‍यकता भी है। यह उस दिशा में एक प्रयास है।

हम जानते है एक बेरोजगार ग्रेजुएट हो या एक बेरोजगार पोस्ट ग्रेजुएट हो, तो ज्‍यादा से ज्‍यादा हम इस भाव से देखते हैं अच्‍छा, बेचारे को नौकरी नहीं मिल रही है। बेचारे को काम नहीं मिल रहा है। लेकिन गर्व करता है, नहीं ग्रेजुएट है, पोस्‍ट ग्रेजुएट है, डबल ग्रेजुएट है। काफी अच्‍छा पढ़ता था। लेकिन कोई आई टी आई  वाला मिले तो नहीं यार, आई टी आई है। चलो यार, तुम आई टी आई वाले हो, चलो। यानी, हमारी टेक्निकल एजुकेशन  का सबसे एक प्रकार का शिशु मंदिर है। सबसे छोटी ईकाई है। लेकिन हमने पता नहीं क्‍यों उसके प्रति इतना हीन भाव पैदा किया है। जो बच्‍चा आई टी आई  में, वह भी रेल में, बस में कहीं मिल जाता है, तो परिचय नहीं देता है कि कहां पढ़ता है। उसको संकोच होता है। आई टी आई बोलना बुरा लगता है। आज हमने एक नया इनिशिएटिव  लिया है। और मैं इन सबको बधाई देता हूं, जो आज हमारे इस क्षेत्र के एम्बासडर  बने हैं।

 

अब इस क्षेत्र में एम्बासडर  के लिए किसी बहुत पढ़े-लिखे व्‍यक्ति को ला सकते थे, किसी नट-नटी को ला सकते थे, किसी नेता को रख सकते थे। लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। जो स्‍वयं निर्धन अवस्‍था में बड़े हुए हैं, ITI से ज्‍यादा जिनको शिक्षा प्राप्‍त करने का सौभाग्‍य नहीं मिला, लेकिन उसी आई टी आई  की शिक्षा के बलबूते पर आज वो इतनी ऊंचाईयों को पार कर गए कि खुद भी हजारों लोगों को रोजगार देने लगे हैं। ये वो लोग हैं, जिन्‍होने आई टी आई  में प्रशिक्षण पाया, लेकिन उसी बदौलत अपनी जिंदगी को बना दिया। हर आई टी आई  में पढ़ने वाला, हर श्रमिक, भले ही आज उसकी जिंदगी की शुरूआत किसी न किसी सामाजिक आर्थिक कारणों से अति सामान्‍य अवस्‍था से हुई हो, लेकिन उसका भी हौसला बुलंद होना चाहिए कि भाई ठीक है। यह कोई एंड ऑफ़ जर्नी  नहीं है। इट्स अ बेगीनिंग |

देखिए कितने लोग हैं, बहुत आगे निकले हैं। जब तक हमारे सामान्‍य से सामान्‍य नागरिक के अंदर भीतर विश्‍वास नहीं पैदा होता है, वो अपने आप को कोसता रहता है तो उसकी जिंदगी खुद के लिए बोझ बनती है, परिवार के लिए बोझ बनती है। देश के लिए भी बोझ बनती है। लेकिन उसके पास जो कुछ भी उपलब्‍ध है, उसमें भी गौरव के साथ अगर जीता है, तो वह औरों को भी प्रेरणा देता है। इसलिए, एक युवा पीढ़ी में विश्‍वास और भरोसा पैदा करने के लिए, सेल्फ कॉन्फिडेंस  को क्रिएट  करने के लिए एक ऐसे प्रयास को हमने प्रारंभ किया है। और बाहर का कोई व्‍यक्ति उपदेश दे तो ठीक है साहब, आप तो बहुत बड़े व्‍यक्ति बन गए। और मेरा हौसला बुलंद कर रहे थे। लेकिन उसी में से कोई बड़ा बनता है, तब जाकर कहता है कि अच्‍छा भाई वह भी बना था। वह आईटीआई में टर्नर था। और वह भी लाखों लोगों को रोजगार देता है। ठीक है, मैं भी कोशिश करूंगा।

आखिरकर यही सबसे बड़ी ताकत होती है। और उस ताकत को जगाने के लिए ये एम्बासडर, मैं तो चाहूंगा कि ऐसे सफल लोग, हर राज्‍य में होंगे, हर राज्‍य में ऐसे सफल लोगों के गाथाओं की किताब निकले। पोर्टल  पर उनके जीवन रखा जाए कि कभी आई टी आई  में पढ़े थे, लेकिन आज जीवन में इतने सफल रहे है। इस क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोग हैं गरीब, उनका विश्‍वास पैदा होता है। और हर बार ऐसे लोगों को सम्‍मानित करना।

कोई ताल्‍लुका का ब्रांड  एम्बासडर  हो सकता है, कोई जिले का ब्रांड एम्बासडर  हो सकता है, कोई राज्‍य का ब्रांड एम्बासडर  हो सकता है, कोई राष्‍ट्र का। धीरे-धीरे इस परंपरा को विकसित करना है मुझे। नीचे तक उसको परकुलेट  करना है, उसको एक्सपैनड  करना है। एकदम से हॉरिजॉन्टल इसको स्प्रेड  करना है। मैं चाहूंगा सब राज्‍य से, हमारे मंत्री महोदय आए हैं, वो इस दिशा में उनकी प्रतिष्‍ठा के लिए कुछ न कुछ करेंगे।

उसी प्रकार से आई टी आई  एक ऐसी व्‍यवस्‍था नहीं हैं, जो कि प्राणहीन हो। कभी-कभार कागजी लिखा-पट्टी में जो विफल रहते हैं, उनको एक ऐसा सॉफ्टवेयर  परमात्‍मा ने दिया होता है, कि मैकेनिकल वर्क  में, टेक्निकल वर्क  में वो बहुत इन्नोवेटिव  होते हैं। हमारी आई टी आई  में ऐसे जो होनहार लोग होते हैं, उनको अवसर मिलना चाहिए। अगर 2 घंटे बाद में उसको मशीन पे बैठ के काम करना है तो उनको अवसर मिलना चाहिए। यहां कुछ लोगों को इसके लिए अवार्ड  दिया गया है कि अपना टेम्परामेंट  होने के कारण इस व्‍यवस्‍था का उपयोग करते हुए उन्‍होंने कोई न कोई चीज इनोवेशन  के लिए कोशिश की। कुछ नया प्रयास किया। एक डिसिप्लिन  में गया लेकिन मल्टीप्ल डिसिप्लिन  को ग्रास्प करने की ताकत थी। ये जो किताबी दुनिया से बाहर, इंसान की अपनी बहुत बड़ी शक्ति होती है। हमारे आई टी आई  इसको पहचाने। उस दिशा में प्रयास करने का एक प्रयास हुआ है, और उस प्रयास का लाभ मिलेगा।

उसी प्रकार से जब हम पढ़ते हैं, 27,000 करोड़ रुपये ऐसे ही पड़े हैं, तब ज्‍यादा से ज्‍यादा अख़बार में दो-चार दिन अखबार में आ जाता है, सरकार सोई पड़ी है, नेता क्‍या कर रहे हैं। सिर्फ भाषण दे रहे हैं। वगैरह-वगैरह। लेकिन उसका 27,000 करोड़ रुपये का कोई उपाय नहीं निकलता है। पड़ा है, क्‍या करें साहब, लेने वाला कोई नहीं है।

मैं हैरान हूं, हमारे देश में मोबाईल फोन, आप स्‍टेट बदलो तो नंबर चल जाता है, आप दूसरे देश चले जाओ तो नंबर बदल जाता है। सर्विस प्रोवाइडर , इस राज्‍य में है, दूसरे राज्‍य में नया सर्विस प्रोवाइडर है तो वो प्रोवाइडर  आपको कनेक्टिविटी  दे देता है। मोबाईल फोन वाले के लिए सबसे सब सुविधाएं हो सकती हैं, एक गरीब इंसान नौकरी छोड़ करके दूसरी नौकरी पर जाएं, उसको वो लिंक क्‍यों नहीं मिलना चाहिए ? इसी सवाल ने मुझे झकझोरा और उसी में से रास्‍ता निकला है कि अगर उसके साथ एक परमानेंट  नंबर लग जाएगा, वो कहीं पर भी जाएं, एकाउंट उसके साथ चलता चला जाएगा। फिर उसका पैसा कभी कहीं नहीं जाएगा। इस प्रयत्‍न के कारण, ये 27 हजार करोड़ रूपये जो पड़े हैं न, ये किसी न किसी गरीब के पसीने के पैसे हैं, वो सरकार के मालिकी के पैसे नहीं हैं। मुझे उन गरीबों को पैसा वापस देना है और इसलिए मैंने खोज शुरू की है इस एकाउंट  नंबर से।

 

वैसे कोई सरकार 27 हजार करोड़ की स्कीम  लगा दे तो सालों भर चलता है, वाह कैसी योजना लाए ! कैसी योजना लाए ! लेकिन योजना का क्‍या हुआ कोई पूछता नहीं है। ये ऐसा काम है.. जो दुनिया कहती है न, मोदी का क्‍या विजन है? उनको दिखेगा नहीं इसमें। क्‍योंकि विजन देखते-देखते उनके चश्‍मे के नंबर आ गए हैं, इसलिए उनको नहीं दिखाई देगा। लेकिन इससे बड़ा कोई विजन नहीं हो सकता है कि 27 हजार करोड़ रुपए गरीब का पड़ा है, गरीब की जेब में वापस जाए। इसके लिए कहीं तो शुरू करें। हो सकता है कुछ लोग नहीं होंगे जिनका .. रहे नहीं होंगे। एक सही दिशा में प्रयास है जिसमें बैंकिंग को जोड़ा है, इंडसत्रीअल  को जोड़ा है और उस व्‍यक्ति को भी उसका मिल रहा है।

देखा होगा आपने, योजना दिया जला करके लांच  नहीं की गई है। योजना किसी किताब का फोल्डर खोलकर नहीं की गई है। एक्टिविटी  योजना में उन सबको एस एम एस  चला गया है, लाखों लोगों को और योजना लागू हो गई है। यानी मेहनत पहले पूरी कर दी गई है, बाद में उसको लाया गया है। वर्क कल्चर कैसे बदला जाता है, उसका ये नमूना है वरना क्‍या होता, आज हम लांच  करते उसके फिर चार-छह महीने के बाद रिव्यु  करते, एकाध साल के बाद हम आते। अब हो गया है। तो योजना वहीं की वहीं रह जाती। तो पहले पूरा करो, लोगों के पास ले जाओ, ये प्रयास किया है। मैं इसके लिए मंत्रालय को और उसकी पूरी टीम को बहुत-बहुत बधाई देता हूं कि एडवांस  में उन्‍होंने काम किया है।

उसी प्रकार से हमारे देश की एक सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि हम, जो सरकार में बैठे हैं, हम मानते हैं कि हम से ज्‍यादा कोई जानता ही नहीं है, हम से ज्‍यादा समझ किसी को नहीं है, हम से ज्‍यादा ईमानदार कोई नहीं है, हम से ज्‍यादा देश की परवाह किसी को नहीं है। ये गलत सोच है। सवा सौ करोड़ देशवासियों पर हम भरोसा करें। सरकार आशंकाओं से नहीं चलती है। सरकार प्रारंभ भरोसे से करती है और इसलिए आपने देखा होगा, अंग्रेजों के जमाने से एक व्‍यवस्‍था चलती थी कि आपको किसी सर्टिफिकेट  को जेरोक्स  करके कहीं भेजना है तो गजेटेड ऑफिसर  का साइन लेना पड़ता था। हमने कहा, मुझे यह समझ में नहीं आती है कि तुम तो बेईमान हो, गजेटेड ऑफिसर  ईमानदार है, किसने तय किया है ? ये किसने तय किया है ? और इसलिए मैंने कहा कि तुम खुद ही लिख के दे दो कि तुम्‍हारा सर्टिफिकेट सही है और वो मान्‍य हो जाएगा। ये सेल्फ सर्टिफिकेसन !

ये वो बड़े विजन में नहीं आया होगा क्‍योंकि 60 साल में वो विजन किसी को दिखाई नहीं दिया है, लेकिन घटना भले ही छोटी हो, लेकिन उस इंसान को विश्‍वास पैदा होता है, हां! ये देश मुझ पर भरोसा करता है। मेरा सर्टिफिकेट है और मैं कह रहा हूं, मेरा है तो मानो न। जब नौकरी देते हों, तब ओरिजिनल सर्टिफिकेट देख लेना। इसके कारण जो बेचारे नौजवानों को रोजगार लिया है, कुछ लेना है तो अपना कॉपी सर्टिफाई  कराने के लिए इतना दौड़ना पड़ता था, हमने निकाल दिया।

इसमें भी हमने उद्योगकारों को कहा है, जो एम्प्लोयेर  हैं, बड़े-बड़े उद्योगकार नहीं, छोटे-छोटे लोग हैं, छोटे-छोटे उद्योग हैं, किसी के यहां तीन एम्प्लोयी  हैं, 5 हैं, 7 हैं, 11 हैं, 18 हैं, और पचासों प्रकार डिपार्टमेंट उसका गला पकड़ते हैं। पचासों प्रकार के उसको फार्म भरने पड़ते हैं। दुनिया बदल चुकी है। आखिरकर मैंने मंत्रालय को कहा कि भाई मुझे ये सब बदलना है। मैंने तो इतना ही कहा था, बदलना है। लेकिन क्‍या बदलना है, मंत्रालय ने मेहनत की, अफसरों ने लगातार काम किया। और आज 16 में से, 16 अलग-अलग प्रकार के फार्म है, एक एक फार्म शायद 4-4, 5-5 पेज का होगा, सबको हटाकर के एक बना दिया गया, वह भी ऑनलाइन और अब किसी और जरूरत होगी, उस नंबर पर जांच करेगा तो सब वहां उपलब्‍ध होगा। अब वह बार-बार पूछने नहीं जाएगा क्‍या करोगे?

ये जो सुविधाएं है, और यही तो मैक्सिमम गवर्नेंस  है। मिनिमम गवर्नेंस , मक्सिमम गवर्नेंस का मतलब क्‍या है? यही है कि आप, उनकी सारी झंझटें खत्‍म हो गई। उन्‍होंने कह, यह है हमारा, हो गया। एक बड़ी समस्‍या रहती है कि इंस्पेक्टर  राज। ये ऐसा शब्‍द है जो, मैं जब छोटा था, तब से सुनते आया हूं। मुझे लगता था कि शायद पुलिस वालों के लिए यह कहते हैं। तब मुझे मालूम नहीं था, इंस्पेक्टर  है ना, तो उसे पुलिस समझते थे। धीरे-धीरे बड़े होने लगे, समझने लगे, तब पता चला कि यह दुनिया तो बहुत है भई। हर गली-मोहल्‍ले में है।

क्‍या इसका कोई समाधान हो सकता है और इसी में से टेक्नोलॉजी इंटरवेंशन हम लगाए। और मैं मानता हूं – ई-गवर्नेंस , ईजी गवर्नेंस है, इफेक्टिव गवर्नेंस है। इकनोमिक गवर्नेंस भी है, एट द सेम टाइम , ई-गवर्नेंस ट्रांसपेरनसी के लिए भी कुल मिलाकर के एक विश्‍वास पैदा करता है। अब कंप्यूटर ड्रा  तय करेगा कि कल तुम्‍हें इंस्पेक्शन कहाँ करना है और कंप्यूटर से ड्रा होगा कि इतने बजे ड्रा हुआ, इंस्पेक्शन कितने बजे किया, वहां से एस एम एस  जाएगा, पता चलेगा कि महाशय जी कब पहुंचे और 72 हावर्स  में उन्‍हें जो भी रिपोर्ट करना है, उसको ऑनलाइन  कर देना पड़ेगा।

मैं नहीं मानता हूं कि जो हरासमेंट  वाला मामला है, वह भी रहेगा। कुछ लोग ऐसे होते हैं कि गलती खूब करते हैं, चोरी खूब करते हैं। फिर गाली इंस्पेक्टर  को देते हैं कि वह आके हमें परेशान करते हैं। तो दोनों तरफ से गड़बड़ी होती है, ये दोनों तरफ की गड़बड़ी का निराकरण है इसमें। स्‍वाभाविक है, इसके कारण एक वेल स्प्रेड एक्टिविटी  होगी। मुझे अभी भी कोई समझ नहीं है।

मैं कभी सोचता हूं, हम कार खरीदते हैं। हमारी कार का ब्रेक ठीक है कि नहीं है, एक्‍सीलेटर ठीक है कि नहीं, गियर बराबर काम करता है कि नहीं है। वह कोई सरकारी अफसर आकर के इंस्पेक्ट  करता है क्‍या? हमीं करते हैं न। मुझे मालूम है कि मुझे जीना, मरना है तो गाड़ी को मेरी ठीक रखूंगा। ऐसे फैक्ट्री  वाले को भी मालूम है कि बायलर , में ऐसे थोड़े ही रखूंगा कि मैं मर जाऊं तो हम उसमें भरोसा करें। तुम अपने बायलर का सर्टिफिकेट  लेकर के सरकार के पास जमा करा दो। तुम्‍हारा बायलर ठीक है, तुम आके बता दो बस।

मैं तो हैरान हूं। कभी किसी जमाने में एक बड़े शहर में एक या दो लिफ्ट हुआ करते थे। बड़े शहरों में, जिस जमाने में लिफ्ट शुरू हुआ था। अब सरकार ने, लिफ्ट का इंस्पेक्शन  मुनिसिपलिटी  ने अपने पास रखा। अब हर जगह पर लिफ्ट होने लगी और इंस्पेक्टर  एक है। और लिफ्ट का परीक्षण उसको करना पड़ता है। वह कहां से करेगा। सोसाइटी  वाले को बोलो कि तुम छह महीने में एक बार लिफ्ट को चेक कराओ और उसको चि‍ट्ठी लिख दो कि किससे चेक किया। और तुम्‍हारा सटीसफैक्सेन लेटर  भेज दो। क्‍योंकि वो भी नहीं चाहता है, लिफ्ट में मरना।

हम उसको जितना जोड़ेंगे, उस पर जितना भरोसा करेंगे, हमारी व्‍यवस्‍थाएं कम होती जाएंगी और लोग अपने आप रेस्पोंसिबल  बनते जाते हैं। उस दिशा में काम करने का एक महत्‍वपूर्ण प्रयास ये सुविधा पोर्टल के माध्‍यम से किया गया है। इंसपेक्‍टर के इंस्पेक्शन  की नई टेक्नोलॉजी एडेड  व्‍यवस्‍था की गई है। उसके कारण मुझे विश्‍वास है कि हम जो ईज ऑफ़ बेजिनेस की बात करते हैं, आखिर कर मेक इन इंडिया  को सफल करना है। ईज ऑफ़ बेजिनेस, सबसे पहली रीक़ुइरेमेन्त है । ईज ऑफ़ बेजिनेस प्रमुखतया शासन की जिम्‍मेवारी होती है। उसकी कानूनी व्‍यवस्‍थाएं, उसका इन्फ्रास्ट्रक्चर , उसकी स्पीड  ये सारी बातें उसके साथ जुड़ी हुई हैं। और इसलिए ईज ऑफ़ बेजिनेस , मेक इन इंडिया  की प्राथमिकता है।

 

इसलिए ईज ऑफ़ बेजिनेस, मेक इन इंडिया  की प्रायोरिटी  है। उसी प्रकार से हम उद्योगकारों पर कहने पर, उनके आग्रह पर या उनकी सुविधा के लिए लेबर  के लिए सोचते रहेंगे तो कभी लेबर को हम न्‍याय नहीं दे पाएंगे। हमने लेबर समस्‍या को लेबर  की नजर से ही देखना है। श्रमिक की आंखों से ही श्रमिक समस्‍या देखनी चाहिए। उद्योगकार की आंखों से श्रमिक की समस्‍या नहीं देख सकते और इसलिए श्रमिक की आंखों से श्रमिक की समस्‍या देख करके, उसके जीवन में सुविधाएं कैसे बढ़े, वो अपने हकों की रक्षा कैसे कर पाएं.. अब देखिए परंपरागत रूप से हमारे यहां कुछ लोगों को बहुत काम आता है, लेकिन वो किसी व्‍यवस्‍था से नहीं निकला है इसलिए उसके पास कोई सर्टिफिकेट  नहीं है। क्‍यों न हम उसे अपने तरीके से, अपनी मर्जी से कुछ सिखाएं।

 

मान लीजिए कोई किसी के यहां पीओन  के नाते काम करता है, लेकिन पीओन का काम करते करते उसने ड्राइविंग  सीख ली है। आ गई है ड्राइविंग, लेकिन चूंकि उसके पास सर्टिफाई व्‍यवस्‍था नहीं है, कहां सीखा क्‍या सीखा, प्रॉपर  लाइसेंस  की व्‍यवस्‍था नहीं है इसलिए कोई उसको ड्राइवर  रखता नहीं है। सब पूछते हैं कि पहले कहीं ड्राइवरी की थी क्‍या ? तो, मिलता नहीं। क्‍यों न हम इस प्रकार के लोगों के लिए कोई व्‍यवस्‍था खड़ी करें कि जो अपनी ताकत से, अपने बल पर उन्‍होंने ज्ञान अर्जित किया है, परंपरा से किया है, उसके वैल्यू ऐड  आई टी आई on के लिए काम किया है, हम उस दिशा में काम करें! ताकि वो फिर एक एथोरिटी के रूप में जाएगा। हां भई! कंस्ट्रक्शन  में इन चार कामों में मास्‍टरी है मेरी, मेरा इतने साल का एक्सपीरियंस  है, यहां यहां काम किया है और जो एथोरिटी  है, एथोरिटी ने मुझे दिया हुआ है, वरना वो क्‍या होगा, अनस्किलड लेबर में बेचारा जिंदगी काटता रहता है, जबकि है स्किलड लेबर! उसके पास किताबी ज्ञान से ज्‍यादा स्किल  है।

 

ये जो अनस्किलड में से स्किलड में लाना, ये जो ब्रिज  है, वो इंसान खुद नहीं निकाल सकता। उसके लिए सरकार ने एक लंबी सोच के साथ.. चिंता करनी पड़ेगी। उस चिंता को पूरा करने का हमारा प्रयास, इन प्रयासों के साथ जुड़ा हुआ है और इसलिए .. अब आप मुझे बताइए.. हमारे देश के नौजवान को रोजगार चाहिए, उद्योगकारों को लोग चाहिए। हम चाहते हैं, नौजवान बेचारा जो फ्रैश निकला है, उसको कहीं न कहीं तो एक्सपोज़र  मिलना चाहिए, प्रैक्टिकल  होना चाहिए। उद्योगकार उसको घुसने नहीं देता है, क्‍यों ? लेबर इंस्पेक्टर  आ जाएगा। तुम बाहर रहो भई। तुम आओगे तो मेरी किताब में ऐसा भरा जाएगा, मैं कहीं का नहीं रहूंगा, मैं उसमें से बाहर ही नहीं निकलूंगा। वो सरकारी डर से आने नहीं देता। आने नहीं देता, करता है, तो कभी बेईमानी से करता है। क्‍यों न उसके लिए हम ऐसी व्‍यवस्‍था करें ताकि हमारे जो अपरेंटिस जो हैं, हमारे नौजवानों को अवसर मिले।

 

एक बार अवसर मिलेगा तो जो क्वालिटी मैंन पॉवर  है, वो अपने आप ऊपर आएगा, उनको अच्‍छा स्‍कोप मिल जाएगा और देश की जो रीक़ुइरेमेन्त  है, वो रीक़ुइरेमेन्त पूरी होगी और इसीलिए .. जैसा मंत्री जी ने बताया, पार्लियामेंट  में इस बात को कहा कि चार लाख अपरेंटिस  हैं। अब आप बताइए कितने लोगों को ऐसे छोटे, छोटे, छोटे हर्डलस  हैं, उनको भी अगर स्मुदेन अप  कर दिया जाए तो हम किस प्रकार से गति दे सकते हैं, ये हम अनुभव कर रहे हैं। इसलिए सरकार ही देश चलाए, उस मिजाज से हमें बाहर आना है, देश के सब मिल करके देश चलाएं, उस दिशा में हमें जाना है और इसी के लिए सबकी भागीदारी के साथ, सबको साथ जोड़ करके काम करने की दिशा में हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

 

स्किल डेवलपमेंट  भारत के लिए बहुत बड़ी एपोर्टचुनिटी  है। पूरे विश्‍व को ट्वेंटी ट्वेंटी  तक करोड़ों करोड़ों लोगों की जरूरत है। दुनिया के वर्क फोर्स  को प्रोवाइड  करने का सामर्थ्‍य हमारे पास है। हमारे पास नौजवान हैं, लेकिन अगर वो स्किल्ड मैंन पॉवर  नहीं होगा तो जगत में उसको कहीं स्‍थान नहीं मिलेगा और इसलिए हमें एक तो वो तैयार करना है, जनरेशन  को, नई जनरेशन  को, जो जॉब क्रिएटर  हो, और दूसरी वो जनरेशन  हो जो जॉब क्रिएटर  नहीं बन सकती है लेकिन कम से कम लोग उसको जॉब  के लिए ढूंढते आ जाएं, इतनी कैपेसिटी  वाला वो नौजवान तैयार हों। उन बातों को ले करके अगर हम चलते हैं .. और इस प्रकार का एक स्किल्ड वर्क फोर्स जो पूरे विश्‍व की रेकुइरेमेंट  है, आने वाले दिनों में .. उसी को हम आज से ही तैयारी करते हैं। हम उस रेकुइरेमेंट को पूरा कर सकते हैं।

 

मैंने देखा है, मैं कई आई टी आई  के ऐसे स्टूडेंट्स  को जानता हूं जिनको विदेशों में, खास करके गल्फ कन्ट्रीज  में एक एक, दो दो लाख के पैकेज पर काम करते हैं। बड़ी बड़ी कंपनियों में, क्‍येांकि इस प्रकार के वर्क फोर्स  की बहुत रेकुइरेमेंट बढ़ती चली जा रही है। हम इन बातों पर ध्‍यान देंगे। हमारी कोशिश ये है कि हमने उस दिशा में प्रयास शुरू किया है। और आज एक साथ, ये एक-एक योजना ऐसी है कि हर महीने एक-एक लांच कर दें तो भी एक बड़ा काम दिखता। लेकिन 5 साल में काफी काम करने है। इसलिए मैं एक-एक दिन में 5-5 काम निबटा रहा हूं।

जिनको आज पुरस्‍कार मिला है, उनका मैं अभिनंदन करता हूं और मैं आशा करता हूं कि आप स्‍वयं में, ये आई टी आई  के नौजवानों में विश्‍वास करिये। आप बात कीजिए उनसे मिलिये। आप देखिए, क्‍या, कहां बुलंदी पर पहुंच सकते हैं। हम श्रमिक का सम्‍मान करना सीखेंगे। कभी-कभार मुझे विचार आ रहा है, कोई बढि़या सा शर्ट खरीदा, पहन करके दफ्तर आए या समारोह में गए। 5-10 दोस्‍त ने कहा, क्‍या बढि़या शर्ट है। कॉलेज में गए हैं, बहुत बढि़या टी –शर्ट  पहन कर गए हैं।, वाह सब लड़के देखते हैं,वाह क्‍या बढि़या T-shirt है तो सेल्‍फी भी निकाल देता है। सरकुलेट  भी कर देता है। लेकिन क्‍या सोचा है, क्‍या मेरे जेब में पैसे थे, इसलिए शर्ट आया है। क्‍या मेरे पिताजी ने 2-4 हजार रुपये मेरे पॉकेट खर्च के लिए दिए थे, उसके लिए शर्ट आया है? नहीं मेरे पैसे के कारण मेरा शर्ट नहीं आया है।

मेरा शर्ट इसलिए आया है, कि किसी गरीब किसान ने मई-जून की भयंकर गर्मी में खेत जोता होगा। कपास बोया होगा। बारिश में भी रात-भर काम किया होगा। तब जाकर कपास हुआ। किसी गरीब मजदूर ने उसमें से धागा बनाया होगा। किसी बुनकर ने उसको कपड़े में परिवर्तित किया होगा। किसी रंगरेज ने अपनी जिंदगी के रंग की परवाह किए बिना अपने शरीर के रंग की परवाह किये बिना हाथ कितने ही रंग से रंग क्‍यों न जाएं, उस कपड़े को अच्‍छे से रंग से रंगा होगा। कोई दर्जी होगा, जिसने उसकी सिलाई की होगी। कोई गरीब विधवा होगी, जिसको अपनी बेटी की शादी करवानी है, इसलिए रात-रात भर बुढ़ापे में भी उन कपड़ों पर काज-बटन किया होगा। कोई धोबी होगा जो कपड़ों पर बढि़या सा प्रेस किया होगा। कोई पैकेजिंग करने वाला बच्‍चा मजदूर होगा जिसने कि जाके पैकेजिंग का काम किया होगा, तब जाकर के एक shirt बाजार में आके मेरे शरीर पर आया होगा। मेरे पैसों के कारण नहीं आया।

शर्ट मेरे पैसों से नहीं निकलता है अच्‍छी साड़ी हो, शर्ट हो, कपड़े हो, किसी न किसी गरीब के परिश्रम का प्रयास है और इसलिए समाज के इन श्रमिक वर्ग के प्रति उस संवेदना के साथ, उस गौरव के साथ अगर देखना हमारा स्‍वभाव बनता है, तो मुझे विश्‍वास है कि सच्‍चे अर्थ में ये श्रमयोगी राष्‍ट्रयोगी बनेगा। ये श्रमयोगी राष्‍ट्र निर्माता बनेगा। और उसी दिशा में एक बहुत बड़ी जिम्‍मेवारी के साथ आज एक अहम कदम की और आगे बढ़ रहे हैं जो मेक इन इंडिया  के सपने को पूरा करेगा। विश्‍व वो भारत में लाने का निमंत्रण देने के लिए मेरा श्रमिक खुद भी एक शक्ति बन जाएगा।

इसी विश्‍वास के साथ सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

 

स्रोत: पत्र सूचना कार्यालय

3.0618556701

Govind Ram shakya(पंजाब अबोह2र) Jun 14, 2018 10:16 AM

में एक ईट भट्टा मजदूर हु करीब10 साल काम करते हो गये हमें सिकायत ईट भट्टा मलिकों से कोई सिकायत नहीं हैं पर उन नेताओं गण से हैं एक मजदूर को देवाता बना देते और अपनी पिठ थपता ते हैं हमारे ही देश हमारे ही राज्य में मजदूर को लूटा जा रहा हैं और हमारे नेता सहब केहते नहीं थक रहें कि सिटम अपना कम कर रहा हैं या देश बदल रहा हैं कभी किसी मजदूर के झूगी या झोपडी में गये हो नहीं न और उन से केहिये गा कि देश बदल रहा हैं और फिर आप को एक मजदूर बताये गा कि देश बदल रहा पर सिस्टम और. ( नियोकतो या मलिक) कि सोच नहीं बदल रही न ही नेताओं के भाषण बदल रहें आप नेता लोगों को गरिबों से वोट लेने के तरिके जरुर बदल रहें हैं

देव कुमार 9939359924 Apr 30, 2015 07:45 AM

ईस भाषण जमीनी स्तर बकवास साबित हुआ ।

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