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ग्रामीण विकास प्रक्रिया में सहकारिता की भूमिका

इस लेख में ग्रामीण विकास प्रक्रिया में सहकारिता की भूमिका पर विशेष जानकारी दी गयी है।

परिचय

सहकारिता आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य कृषकों, ग्रामीण कारीगरों, भूमिहीन मजदूरों एवं समुदाय के कमजोर तथा पिछड़े वर्गों (न्यन आय वाले व्यक्तियों, अर्ध्द रोजगार तथा बेरोजगार) को रोजगार, साख तथा उपयुक्त प्रौधोगिकी प्रदान कर एक अच्छा उत्पादक बनाना है। लेकिन ग्रामीण विकास का लक्ष्य न केवल उत्पादक बढ़ाना है अपितु सभी वर्गों को पूर्ण रोजगार तथा उनमें विकास प्रक्रिया का न्यायसंगत आबंटन करना है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां मानव शक्ति सर्वाधिक महत्वपूर्ण श्रोत है और जिसका एक भारी अंश समाज का कमजोर वर्ग है, ग्रामीण विकास किसी भी आर्थिक विकास की सार्थक प्रक्रिया के लिए व्यापक महत्व का होता है।

सहकारिता एक लोकतान्त्रिक आन्दोलन है जो मात्र अपने सदस्यों द्वारा प्रदर्शित गतिशीलता और निर्देश केवल एक सुयोग्य नेतृत्व में ही कारगर हो सकता है जिसके अभाव में आन्दोलन समस्त उपलब्धियों तथा असफलताओं पर उसके नेतृत्व के स्वरूप और किस्म की छाप होती है जो बदले में आन्दोलन के सामान्य जन का प्रतिबिम्ब होती है।

सहकारिता का विचार

सहकारिता का विचार हमारे देश में आज से लगभग १०० वर्ष पूर्व अपनाया गया तथा महसूस किया गया था कि इसके द्वारा अनेक ग्रामीण तथा शहरी समस्याओं को हल किया जा सकेगा।  देश को स्वतंत्र हुए ५७ वर्ष हो चुके हैं, परन्तु सहकारिता के संबंध में हमारी उपलब्धियां केवल आलोचनाओं एवं बुराइयों तक ही सीमित रह गयी हैं, जबकि लक्ष्य इसके विपरीत था।  आखिर ऐसी कौन सी बात है जिससे हमें यह प्रतिफल दिखाई दे रहा है।  सन १९०४ में सर्वप्रथम यह विचार अपनाया गया।  उस समय देश परतंत्र था।  अत: विदेशी शासकों नए अपने हितों को ध्यान में रखकर इसे ज्यादा पनपने नहीं दिया।  परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ती के बाद हमारे देशवासियों को ही यह कार्य-भार सौंपा गया।  फिर भी अभी तक अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो सके हैं।  अत्: इस पर गम्भीरता से विचार करने कि आवश्यकता है।  सर्वप्रथम तो यह तय करना होगा कि सहकारिता को वास्तविक रूप से हम ग्रामीण जीवन में उतारना चाहते हैं या घोषणा पत्रों तथा सरकारी एवं सहकारी दिखावे के रूप में इसे कार्यालयों तक ही सीमित रखना चाहते हैं।  वास्तव में सहकारिता कोई सैधांतिक बात नहीं है, बल्कि इसका गहरा संबंध तो सामान्य व्यक्ति कि भावना से है जहां निश्चित रूप से यह अपने उद्देश्यों में सफल हो सकती है।

हमारे देश के सर्वागीण विकास कि दो प्रमुख धाराएँ हैं –

(१) ग्रामीण विकास (२) शहरी विकास।  ग्रामीण विकास का सम्बन्ध देश कि ७० प्रतिशत जनसंख्या से है, जबकि शहरी विकास ला सम्बन्ध देश की ३० प्रतिशत जनसंख्या से है।  यातायात एवं संचार की सुविधाओं नए देश में शहरीकरण को बहुत अधिक प्रोत्साहित किया है।  हर व्यक्ति किसी न किसी बड़े शहर में रहना चाहता है, भले ही वहां का जीवन कष्टपूर्ण हो।  अत्: हमें विकास की दिशा को पूर्णत: ग्रामीण क्षेत्रों की ओर मोड़ना होगा, और इस कार्य के अंतर्गत  हमें गाँवों में शहरीकरण को प्रोत्साहन देना होगा, अर्थात वे सब सुविधाएँ जिनके कारण व्यक्ति गाँवो से शहर की ओर भाग रहा है,  गाँवों  में उपलब्ध करनी होगी।  इस महत्वपूर्ण कार्य को सहकारिता के माध्यम से ही संपन्न किया जा सकता है।  गाँधी जी भी कहा करते थे : “बिना सहकार नहीं उद्धार ”।

लेकिन सहकारिता आन्दोलन मुख्यता: सरकारी नीतियों तथा कारवाइयों का परिणाम है।  एक लम्बे समय तक सरकार ने इस पर अपना नियन्त्रण रखा, जिसके फलस्वरूप स्वतंत्रता के पश्चात केवल वही नेता समितियों पर अपना वर्चस्व कायम रख सके जिन्होनें सरकार पर कुछ प्रभाव डालने का प्रयास किया।

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था : सहकारियों का कार्यक्षेत्र

सहकारिता और उसके उद्देश्य को देखते हुए ऐसा लगता है कि भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का जो ढाँचा एवं क्षेत्र है; वह सम्पूर्ण विकास कि दृष्टि में सिर्फ सहकारिता का ही कार्यक्षेत्र हो सकता है।

आज भारत कि आर्थिक व्यवस्था कृषि एवं ग्रामीण विकास पर आधारित है।  भारत कि लगभग ७० प्रतिशत आबादी भारत के लगभग ६ लाख ग्रामों में रहती है जो कृषि तथा कृषि पर आधारित उद्दोगों पर आश्रित है।  शेष ३० प्रतिशत लोग शहरों में निवास करते हैं।  भारत भौगोलिक क्षेत्रफल में लगभग ९०% भूमि का उपयोग किया जाता है।  वन ६.५७ करोड़ हेक्टेयर में फैले हैं तथा बोई गई भूमि का क्षेत्रफल १३.९४ करोड़ हेक्टेयर है और फसलें १६.४० करोड़ हेक्टेयर में उगाई जाती हैं, किन्तु सिंचित क्षेत्रफल केवल २३ प्रतिशत (फसली क्षेत्र का)है।  आज भी सम्पूर्ण देश में ७.०५ करोड़ कृषि जोते हैं और औसत जोत का क्षेत्रफल २.०६ प्रति हेक्टेयर आता है।  खाद्यान फसलों का उत्पादन ८० प्रतिशत तथा अन्य फसलें २० प्रतिशत उत्पादित कि जाती हैं।  राष्ट्रीय आय में कृषि उत्पादन से होने वाली आय लगभग ४८ प्रतिशत है।

परम्परागत रूप से चली आ रही भारत कि भौगोलिक, सामाजिक व्यवस्था में यह बात निर्विवाद हो चली है कि आरम्भ से ही ह एक कृषि प्रधान देश है और भविष्य में भी यह आधार बना रहेगा;  ऐसी धारणा सभी की है।  इसलिए ग्रामों का देश भारत सहकारिता के लिए व्यापक कार्यक्षेत्र है।  जहाँ सहकारिता अपने सभी उद्देश्यों को ग्रामीण विकास प्रक्रिया में सहज ही प्राप्त कर सकती है।

ग्रामीण विकास – श्रेष्ठतम आधार

देश की ७० प्रतिशत जनसंख्या का विकास करने के लिए ग्रामीण क्षेत्र को विकसित करना अनिवार्य ही नहीं वरन एकमात्र श्रेष्ठतम विकल्प है।  रास्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने राजनीतिक आंदोलन के साथ ही ग्रामीण विकास का नारा दिया था; क्योंकि, “ भारत ग्रामों में निवास करता है”।  ग्राम उनके विकास कार्यक्रम का आधार है।  भारत के प्रत्येक व्यक्ति को खाना, कपड़ा, रोजगार उपलब्ध कराना गाँधी का एकमात्र लक्ष्य था।  गांधीजी के विचारानुसार आदर्श ग्राम पूर्णतया स्वावलम्बी होना चाहिए, घरों में प्रयाप्त प्रकाश एवं हवा की व्यवस्था होनी चाहिए, वे सभी स्थानीय साधन सामग्री से सम्पन्न होने चाहिए।  उनमें पानी की उचित व्यवस्था के साथ-साथ आपसी भेद-भाव मिटाने के लिए सार्वजानिक मिलन-स्थल भी होनी चाहिए।  सार्वजनिक चरागाह, दुग्धशाला, शिक्षा संस्थाएँ, जिनमें ओद्योगिक  शिक्षा उपलब्ध हो तथा अपनी पंचायत प्रत्येक ग्राम में होनी चाहिए, रक्षा के लिए ग्रामरक्षक भी होना चाहिए- ऐसी थी गांधीजी की कल्पना जिसे हम व्यावहारिक स्वरूप में परिवर्तित करने का सतत प्रत्यन कर रहे हैं।

कार्यक्रम एवं प्रभाव

विगत समय में ग्रामीण विकास तथा भारत के ग्रामों के आधुनिकरण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए विविध कार्यक्रम हाथ में लिए गए, नये परिवर्तन किए गए तथा प्रयोगात्मक मार्गदर्शक परियोजनाएं कार्यान्वित की गई।  जिनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं – मार्तण्ड परियोजना (१९२१), बड़ौदा का ग्रामीण पुननिर्माण कार्य (१९३२), मद्रास की फीको विकास योजना (१९४६), सामुदायिक विकास कार्यक्रम/राष्ट्रीय प्रसार सेवा (१९५२) सघन कृषि जिला विकास कार्यक्रम (१९६०-६१), लघु कृषक विकास अभिकरण, सूखा प्रणव क्षेत्र कार्यक्रम, कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम, “ग्रीन रिवोलियोषण” “व्यौइत रिवोलूशन” आदि।

कार्यक्रम/योजनाओं के सिद्धांत एवं व्यवहार में अन्तर होना स्वाभाविक है और यही समस्या उपरोक्त कार्यक्रमों में परिलक्षित हुई जिस कारण विकास कार्यक्रम में व्यवधान पड़ा।  कार्यक्रम में मुख्य समस्याएं इस प्रकार थीं :-

(क)    वास्तविक मापदण्ड के आधार पर सम्भावित लाभ-भोगियों की उचित पहचान।

(ख)    समर्पित एवं वचनबद्ध तंत्र के अभाव के कारण कार्यन्वयन प्रक्रिया में व्यवधान।

(ग)     ग्रामीण क्षेत्रों में आबादी के अपेक्षाकृत धनी तथा प्रभावशाली वगों की ओर से निहित स्वार्थ के प्रति दबाव।

(घ)     कार्यक्रम के प्रति लोगों में जानकारी का अभाव।

(ङ)      सहकारी विभागों, अभिकरणों आदि में आपसी तालमेल का अभाव।

(च)     कार्यक्रम के विश्लेषण करने एवं मार्गदर्शन देने हेतु उचित मशीनरी का अभाव।

(छ)    आधारभूत वित्त संस्थाओं एवं स्रोतों का अभाव तथा प्रशासनिक एवं बैंकिंग की कुव्यवस्था।

(ज)    ग्रामीण विकास कार्य हेतु उपलब्ध कराए गए ऋण के उपयोग की देख-रेख न करना आदि।

राष्ट्रीय सहकारी नीति संकल्प एवं ग्रामीण विकास कार्यक्रम

राज्यों के सहकारिता मंत्रियों ने १९७८ में हुए सम्मेलन में राष्ट्रीय आयोजन तथा विकास में सहकारी आन्दोलन की भूमिका और सहकारी आन्दोलन के लोकतंत्री स्वरूप तथा सहकारी संस्थाओं की व्यापार कुशलता को बढ़ावा देने व् बनाये रखने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, ग्रामीण विकास के लिए निम्न संकल्प किए:-

१. सहकारी समितियों का निर्माण विकेन्द्रित, श्रम प्रधान ग्रामोन्मुख आर्थिक विकास के एक प्रमुख साधन के रूप में किया जायगा।

२. सहकारी आन्दोलन का विकास “निर्बलों की ढाल” के रूप में किया जाएगा।  छोटे और सीमान्त किसानों तथा खेतिहर मजदूरों, ग्रामीण कारीगरों और मध्यम तथा निम्न आय वर्गों के साधारण उपभोक्ताओं की सहकारी कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए ज्यादा मौका दिया जायगा।

३. सम्पूर्ण तथा व्यापक ग्रामीण विकास के लिए ऋण, कृषि निवेश की आपूर्ति, डेयरी, कुक्कुट पालन, मछली पालन, सूअर पालन सहित कृषि उत्पादों, आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं के विपणन और वितरण में सम्बन्ध बनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में एक मजबूत, जीवन तथा समन्वित सहकारी प्रणाली बनाई जायगी।

४. सहकारी कृषि संसाधनों और औद्योगिक इकाइयों का (प्रत्येक स्थान-ग्राम एवं शहर में) जल बिछाया जायेगा जिससे उत्पादकों तथा उपभोक्ताओ के बीच लाभकर आर्थिक सम्बन्ध स्थापित किया जा सके।

५. उपभोक्ता सहकारी आन्दोलन का निर्माण इस प्रकार किया जायेगा जिससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (शहर तथा ग्राम दोनों में) मजबूत हो और उपभोक्ता संरक्षण को सहारा मिले, तथा वह मूल्य स्थिरीकरण का साधन बन सके।

समग्र/एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम संकल्पना (१९८०)

ग्रामीण विकास को अब राष्टीय उन्नति और सामाजिक कल्याण के लिए एक “अनिवार्य शर्त” अनुभव किया जाने लगा है।  समस्या केवल ग्रामीण क्षेत्र के विकास की ही नहीं, बल्कि ग्रामीण समुदायों, जिनमें हमारा राष्ट्र समाविष्ट है, के विकास की है।  प्रत्येक ग्रामीण परिवार को समग्र राष्ट्रीय उत्पादन एवं वर्तमान प्रति व्यक्ति आय में न्यायपूर्ण अंश प्राप्त होना चाहिए।  इस प्रकार समग्र विकास कार्यक्रम का प्रयोग इन कार्यों से जुड़ा है :-

(क)    आय, रोजगार और उत्पादन की वृद्धि एवं अधिकतम उपयोग जिससे लोगो को गरीबी की रेखा से ऊपर उठाया जा सके।

(ख)    जनसंख्या के कमजोर वर्गों के प्रति विकास के आनुपातिक लाभ की अपेक्षा अधिक लाभ सुनिश्चित करना।

(ग)     न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रमों, रोजगार, शिक्षा, जीवनस्तर, स्वास्थ्य, पेयजल, परिवहन, बिजली आदि को पूर्ण करना।

(घ)     काम के लिए अनाज कार्यक्रम से बेकारी दूर करना तथा उद्दोगों की स्थापना करना

(ङ)      सामाजिक एवं आर्थिक अवस्थापना का निर्माण।

(च)     गरीबों की भलाई के लिए विद्यमान संस्थाओं एवं संगठनों को नया मोड़ देना।

(छ)    विशेषकर ग्रामीण गरीबों को बचाने के लिए उपयुक्त संगठन की स्थापना।

(ज)    ग्रामीण विकास केन्द्रों को विपणन केन्द्र के रूप में मान्यता देना तथा इस प्रकार उनमें सभी तकनीकी, विकास रोजगार सम्बन्धी सुविधाओं का उपलब्ध कराना।

समग्र ग्रामीण विकास कार्य को सही दिशा में करने के लिए “खण्ड स्तरीय विकास कार्यक्रम “ के अतिरिक्त कोई अन्य प्रथा उपयुक्त न होगी, ऐसा विशेषज्ञों का मत रहा है।  विकास खंड ही विकास का आधार माना गया है जो राष्ट्रीय विकास योजना निर्माण में विशेष योगदान देता है।

उद्देश्य नेतृत्व के लिए ठोस कदम

आज हम जिस समाज के सदस्य हैं, उसकी नींव में आश्वासन और अविश्वास का समीक्षण है।  इस सब के पीछे जिस एक स्वार्थी का अदृश्य हाथ है, वह है आज की लाभ वृति जिसके कारण सहकारी संस्थाएँ अपने उद्देश्य को विकास का रूप नहीं दे पाई।  इसलिए पुन: विश्वासपूर्ण नेतृत्व के लिए दृढ़ संकल्प सहकारी संस्थाओं को चाहिए कि उन तमाम कारणों, जिसको लेकर उनका नेतृत्व लडखडा सा गया है, के लिए प्रयास करें –

(१) राजनीतिक प्रभाव को समाप्त करना

हालाँकि अब यह पूर्णतया सम्भव नहीं है; लेकिन कुछ प्रयासों से इसे स्वस्थ बनाया जा सकता है।  वह यह है कि एक सहकारी सतर्कता आयोग का गठन किया जाये।  वह उन बेईमान निदेशकों को दंडित करे जो समिति के विरुद्ध कार्य करते हैं।

(२) नियुक्ति के लिए निष्पक्ष और सक्ष्म समिति का होना

सहकारी समितियों के स्वस्थ विकास के लिए यह आवश्यक है कि सहकारी कर्मचारियों का चयन कर उनकी श्रेणी तैयार कि जाय और उसे विभिन्न कार्यकारी सहकारी समितियों के राज्य स्तरीय संघ को सौंपा जाये; ताकि उचित चुनाव गुण अवगुण के आधार पर, पदोन्नति के अवसर, अच्छा वेतन, नौकरी कि सुरक्षा के साथ सहकारी समितियों से अपनी संस्था के लिए निर्भय और निष्पक्ष होकर वे कार्य कर सकें।  एक बार यदि यह परिपाटी शुरू हो जाय तो कोई व्यक्ति स्वार्थ या अन्य उद्देश्य से निदेशक के रूप में चुने जाने का प्रयास नहीं करेगा।

(३) नेतृत्व कि परिपक्वता के लिए सहकारी शिक्षा को अनिवार्य करना

वर्तमान शिक्षा प्रणाली में डिग्री बटोर कर बेरोजगारों कि पंक्ति में खड़ा होने के सिवा ऐसी कोई बात नहीं झलकती जिसमें युवावर्ग अपने पैरों पर खड़ा होकर नेतृत्व कि बात सोचें।  इसलिए जरूरी है – स्कूलों तथा कालेजों में प्रारम्भ से ही सहकारी शिक्षा अनिवार्य कि जाए ताकि छोटी उम्र से ही सहकारी नेतृत्व कि बात व्यावहारिक रूप में प्रकट हो।  पदाधिकारियों के लिए नियमित रूप से गोष्टी का आयोजन होना चाहिए और यदि पदाधिकारी किसी संगठन में पूर्णकालिक या अंशकालिक काम करते हैं तो उन्हें उचित वेतन या मानधन दिया जाना चाहिए।  जिससे गलत रास्ते से पैसे लेने जैसी बातें बंद हों।

(४) संचालन के लिए योग्य व्यक्ति का चयन

जरूरी है एक बार सहकारी कानूनों में संशोधन करना।  प्राय: देखा जाता है कि सहकारी समितियाँ अपने संचालन के लिए ऐसे व्यक्ति को कार्यभार सौंप देती हैं जो उसके कार्य संचालन से अनभिग्य है।  ऐसा ठीक नहीं।  इससे वैमनस्य बढ़ता है।  लोग आलसी होने लगते हैं।  इसलिए जरूरी है अपनों में से ही यानी सहकारियों में से ही किसी योग्य व्यक्ति को कार्यभार सौंपना।  उन्हें ही सम्मानित करना। लेकिन यह भी इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि चुना गया व्यक्ति योग्य हो, निश्चित रूप से अपने में चुना गया व्यक्ति दिये गए कार्यभार का स्वागत करेगा, खुद पर गर्व करेगा साथ ही सहकारिता और सहकारियों के बीच वफादार भी रहेगा।  तभी प्रतियोगिता कि भावना से ओत-प्रोत हो यह सहकारिता आगे बढ़ेगी।

उपसंहार

वर्तमान समय में देश के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए सहकारी बैंक, भूमि विकास बैंक, औद्योगिक सहकारी संस्थाएँ, सहकारी कृषि समितियाँ, सहकारी विपणन समितियाँ, सहकारी उपभोक्ता समितियाँ, ग्रामीण विद्दुत सहकारिताएं आदि अनेकों संस्थाएँ कार्य कर रही हैं;  परन्तु इनके बारे में अधिक जानकारी नहीं है या इन संस्थाओं से उसके द्वारा कार्य कराना उसके वश कि बात नहीं है।  वास्तव में इन संस्थाओं का अधिकाधिक लाभ ग्रामीण क्षेत्र के कुछ सम्पन्न वर्ग से सम्बन्धित व्यक्तियों को मिला है।  इस कारण सामान्य ग्रामीण व्यक्ति को इन संस्थाओं के कार्यों में कोई रूचि नहीं है।  इसी तरह कि स्थिति शहरी क्षेत्रों के उपभोक्ता व् सहकारी समितियों आदि के सम्बन्ध में भी देखने को मिलती है।  अत्: अब सहकारिता सप्ताह मनाकर ग्रामीण क्षेत्रों कि समस्याओं को हल कर सकते हैं?  या इससे सामान्य ग्रामीण व्यक्ति के मन में इन संस्थाओं के प्रति विश्वास बढ़ेगा?

आज आवश्यकता इस बात कि है कि सच्चे दिल से जन-कल्याण एवं राष्ट्र-कल्याण कि भावना को ध्यान में रखकर इस बात पर विचार किया जाय कि देश में इतनी बढ़ी मशीनरी एवं करोड़ों रूपये के प्रावधान के बावजूद भी सहकारिता का कार्यक्रम सामान्य ग्रामीण व्यक्ति के लिए लाभप्रद क्यों नहीं हो सका?  युवा पीढ़ी क्यों सहकारिता के नाम से आक्रोश में आ जाती है?  इसका संक्षेप में यही उत्तर है कि सहकारिता विभाग ने अपनी मूल भावना को ध्यान में रखकर कार्य नहीं किया है और जो कार्य किया है वह इतना नगण्य है कि सामान्य ग्रामीण व्यक्ति का विश्वास अर्जित नहीं कर सकता।

इसलिए अब जरूरी है ग्रामीण विकास के लिए सहकारी संस्थाओं को निम्न प्रकार से प्रयोग लाने कि –

(क) सहकारी संस्था को ग्राम विकास योजना निर्माण एवं उसके कार्यन्वयन का एक अभिन्न अंग माना जाए।  सहकारी संस्थाओं का ग्राम पंचायत तथा अन्य विकास अभिकरण से पूर्ण समन्वय स्थापित रहे।

(ख) ग्राम कि सम्पूर्ण आवश्यकता में से अधिकाधिक आवश्यकताओं कि पूर्ति का उत्तरदायित्व सहकारी समितियों को दिया जाए।

(ग) ग्राम विकास योजना के लिए भी आर्थिक स्रोत के रूप में ग्रामीण सहकारी संस्था को प्रमुख स्थान दिया जाय।

(घ) सहकारी संस्था, ग्राम स्तिथ सभी प्रकार के अभिकरणों में समन्वय स्थापित करने का उत्तरदायित्व संभाले।

(ङ) “ग्राम अंगीकृत योजना” को समग्र ग्रामीण विकास योजना का आधार बिन्दु मानकर कार्यनिवत किया जाए।  इस कार्यक्रम को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संस्थाएँ भी अपना रही हैं।

ग्राम विकास रणनीति का एकमात्र साधन-सहकारिता

उद्देश्यों तथा विचारधारा कि दृष्टि से ग्रामीण विकास कार्यक्रम तथा सहकारी संगठन एक ही विषय के दो पहलू हैं।  दोनों का मुख्य उद्देश्य समाज का आर्थिक उत्थान करना एवं शोषण रहित समाज कि स्थापना करना है।  अन्तर केवल इतना है कि ग्रामीण विकास कार्यक्रम कि संज्ञा देकर सहकारिता के साधन का प्रयोग करना है।

सहकारिता की परिधि के अन्तर्गत सभी प्रकार के आर्थिक कार्यक्रम आते हैं, चाहे वे कृषि, विपणन,आपूर्ति, उद्योग, प्रक्रिया अथवा अन्य किसी भी सम्बन्धित क्रिया से जुड़े हों।  कहने का तात्पर्य यह है कि सहकारिता के लिए “जहाँ न आये रवि वहां जाये कवि” वाली कल्पना साकार होती है।  इतना ही नहीं ग्राम से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक, प्रत्येक स्तर पर सहकारी संगठन कार्यरत ही नहीं, निरंतर बढ़ते चले जा रहे हैं।  अतएव ग्रामीण विकास कार्यक्रम, एक प्रकार से सहकारिता का ही एक अंग माना जा सकता है क्योंकि सहकारिता के क्षेत्र ग्राम से भी आगे हैं।

वास्तविक रूप से सहकारिता आन्दोलन का प्रादुर्भाव ग्रामवासियों की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए ही हुआ।  सहकारिता ने भारत में ९० प्रतिशत ग्रामों से अधिक की अपनी कार्य परिधि कार्यक्षेत्र में लिया है।  औसतन प्रत्येक चार ग्रामों की बीच एक ग्रामीण सहकारी समिति कार्यरत है।  सहकारी सिध्दान्तो के अनुसार कार्य करने से ग्राम जन-समुदाय अपने आप ही सहकारिता की प्रगति को ग्रामीण विकास मानने लगा है।  सहकारिता की मुख्य रणनीति स्थानीय संसाधनों को विकसित कर उनका जनता के लिए उपभोग करना है जो ग्रामीण विकास कार्यक्रम के अनुरूप है।  नियोजकों तथा विशेषज्ञों के साथ एक कमी रही है कि उन्होंने सहकारिता सहकारी  इकायों जो मात्र “इनपुट” प्रदान करने वाली संस्था समझा, जबकि वास्तविक रूप से ये संस्थाएं सभी प्रकार का कार्य करने में न केवल सक्ष्म है वरन कर भी रही है और इस प्रकार ये ग्रामीण विकास के “मुख्य केन्द्र” के रूप में काम कर रही हैं।  इनकी क्षमता का पूर्ण उपयोग करना वर्तमान स्तिथि में आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो गया है।  सहकारिता का संगठनात्मक ढाँचा, कार्यप्रणाली, सिध्दान्त, जन-समुदाय कि साझेदारी, वित्तीय सुदृढता, विस्तार, आदि ऐसे आधार हैं जिनसे ग्रामीण विकास का मुख्य तथा एकमात्र साधन “सहकारिता” ही सिद्ध किया जा सकता है।

 

स्त्रोत: हलचल, ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान

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रवि कुमार Oct 21, 2019 11:37 PM

हमारे गावों में रहने वाली एक बड़ी आबादी का हिस्सा अनपढ़ है उनको ये सारी कागजी बाते समझ में नही आती है अतः सरकार को चाहिए की वो छोटी छोटी टीम बनाकर गावों में रहने वाली जनसंख्या को उनकी भाषा में संपूर्ण ज्ञान दे तथा उनको इस विकास के लाभ सिम्पल भाषा में समझहै तथा भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही करें जय हिन्द जय गावों

ROHIT KUMAR Jan 30, 2019 11:54 AM

मुझे पढ़ने में कुछ समझ में नहीं आता है कृपया कोई उपाय बताइए

Neeraj Kumar वर्मा Oct 09, 2018 09:41 AM

Mai swarojgar suroo Karna Chahta hun is Liye hamen lonkee awsykata hai maiapane Beebee bacon Ke palan posan Ka kharch uthana muskil ho Raha hai Mai berojgaree se tangho chuka Hun. Neeraj Kumar varma Bhawan khena ibrahimpur mallawan hardoi me janm se rahata hun

Annu Sharma Sep 18, 2018 04:51 PM

Very good

Mithunkumar Aug 21, 2018 05:44 PM

H me mtsy bibhag Ke like sheh kari smiti bnani he kya karna hoga

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