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बच्चों का संरक्षण

इस भाग में बच्चों का संरक्षण पंचायत किस प्रकार से कर सकती है, इसकी जानकारी दी गई है।

भूमिका

बाल संरक्षण का अर्थ है – बच्चों के स्वास्थय और उनकी सुरक्षा पर पूरा – पूरा ध्यान देते हुए उन्हें घर पर अथवा समाज में उपेक्षा, शोषण, दुर्व्यवहार, हिंसा अथवा किसी भी अन्य जोखिम से सुरक्षित रखना। बाल संरक्षण में बच्चे को उस स्थिति में सहायता और पुनर्वास प्रदान करना भी शामिल है, जब वह किसी असुरक्षित स्थिति का शिकार बन गया हो।

यदि हम अपने बच्चों का संरक्षण नहीं करेंगे, तो उन्हें मृत्यु, स्थायी विकलांगता, खराब शारीरिक और मानसिक स्वास्थय, शिक्षण संबंधी समस्याएँ, विस्थापन और घरों के विलग होने जैसे जोखिमों का सामना करना पड़ेगा।

वे जोखिम स्थितियां क्या हैं जिनसे बच्चों को सुरक्षित किया जाना चाहिए?

कुछ अत्यंत जोखिम स्थितियां जिनसे बच्चों को संरक्षण प्रदान किए जाने की आवश्यकता है, वे हैं – बाल श्रम, बाल विवाह, बाल अवैध व्यापार, बाल यौन उत्पीड़न, शारीरिक दंड, उपेक्षा और परित्याग कानून का उल्लंघन करने के लिए बच्चों का तिरस्कार तथा उनका शोषण अथवा उनके परिवार की बड़े लोगों द्वारा किए गए अपराधों के लिए उत्पीड़न अथवा एचआईवी संक्रमिक अथवा पीड़ित बच्चों की उपेक्षा। देश के विभिन्न भागों में बच्चों के विरूद्ध अनेक पारंपरिक कूप्रथाएं विद्यमान हैं जो बच्चों के लिए क्रूर और उनके जीवन को संकट में डालने वाली हैं। अनेक अवसरों पर, बच्चे समाज में फैले अंधविश्वासों के कारण अपने जीवन से तक हाथ धो बैठते हैं।

बाल श्रम

बाल श्रम का अर्थ है पैसा कमाने के उद्देश्य से बच्चों कों किसी ऐसे काम में नियोजित करना जो उन्हें उनकी बाल्यावस्था से वंचित करता हो, उन्हें विद्यालय जाने से रोकता हो तथा बच्चे के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए तथा साथ ही उसके विकास के लिए भी खतरनाक हो। बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम 1986 किसी भी जोखिमपूर्ण व्यवसाय में 14 वर्ष से कम बच्चों के रोजगार का प्रतिषेध करता है तथा 14-18 वर्ष तक बच्चों के लिए विभिन्न कार्य – परिस्थितियों को विनियमित करता है।

बच्चों को छोटी आयु में काम करने की आवश्यकता क्यों होती है।

गरीबी तथा सामाजिक सुरक्षा के अभाव बाल श्रम के प्रमुख कारण हैं। बच्चे अपने तथा अपने परिवारों के लिए पैसा कमाने के लिए देर तक काम करते हैं। पिछड़े हुए और निर्धन परिवारों के बच्चों की छोटी आयु से ही काम पर लगने की संभावना होती है क्योंकि उनके परिवारों के पास संसाधनों का अभाव होता है।

बाल श्रम के कुप्रभाव क्या हैं?

अनेक बच्चे, लड़के तथा प्राय: लड़कियाँ, जो घरेलू नौकरों के रूप में कार्य करते हैं आसानी से हिंसा और यौन शोषण के शिकार बन जाते हैं। बाल श्रम के परिणामस्वरूप प्राय: ऐसी ही अन्य अनेक जटिलताएँ उत्पन्न होती हैं, जिनके बारे में हम आगे पढ़ेंगे।

छोटे बच्चों को प्राय: कृषि क्रियाकलापों में, ढाबों में और घरेलू नौकरों के रूप में कार्य करते हुए देखा जा सकता है। अत्यंत गरीबी के कारण कुछ माता – पिता ऊँची ब्याज दर पर ली गई ऋण की अल्प राशि के बदले में अपने बच्चों को बंधुआ मजदरों के रूप में बेचने के लिए विवश हो जाते हैं। आजीविका की तलाश में, बच्चे अकेले अथवा अपने परिवारों के साथ अन्य गांवों अथवा शहरों में पलायन करने के लिए विवश हो जाते हैं जहाँ उन्हें देर तक काम करना पड़ता है और कभी – कभी तो एक दिन में वे 14 घंटे से अधिक कम करते हैं। इसके दौरान उन्हें किसी प्रकार की सुविधा भी नहीं मिलती तथा उनका नियोजन उन्हें पर्याप्त मजदूरी भी नहीं देता।

बाल विवाह

बाल विवाह का अर्थ है ऐसा विवाह जो किसी व्यक्ति के वयस्क होने से पूर्व जाता है। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 बालिकाओं का 18 वर्ष तथा बालकों का 21 वर्ष से पूर्व विवाह गैर – कानूनी ठहराता है।

बाल विवाह छोटी बालिकाओं को ऐसी  आयु में उनके माता – पिता, परिवार और मित्रों से लग कर देता है जब उन्हें अपने बेहतर विकास के लिए उनकी देख रेख और स्नेह की सबसे अधिक जरूरत होती है। इससे उनकी शिक्षा के अवसर भी समाप्त हो जाते हैं जिससे वे समाज की अधिक उपयोगी सदस्य बन सकती हैं। बाल विवाह के परिणामस्वरुप बालिकाएँ प्राय: बंधुआ  के मजदूरी, दासता, पेशेवर यौन शोषण और हिंसा की स्थितियों का सामना भी करती हैं। बाल बच्चों से उनका बाल्यपन चीन लेता है तथा वे छोटी आयु में ही परिवार की जिम्मेदारियों  के बोझ  तले दब जाते हैं जिसके फलस्वरूप उनकी शिक्षा प्रभावित होती है अथवा वे अशिक्षित ही रह जाते हैं। उनका कौशल विकास भी समुचित रूप से नहीं हो पाता।

बाल विवाह क्यों होंते हैं?

हमारे देश में बालिका बंधुओं की संख्या सबसे अधिक है। लड़कियों को ‘पराया धन’ (दूसरे की संपत्ति) माना जाता है। उनसे जिन मुख्य भूमिकाओं को निभाने की अपेक्षा की जाती है, वे हैं – बच्चों को जन्म देना, परिवार के लिए धन कमाने और परिवार की महिला सदस्यों की रक्षा करने के लिए उत्तरदायी होते हैं। इन आवस्थाओं और दहेज की कुप्रथा के कारण लडकियों का विवाह छोटी आयु में ही कर दिया जाता है।

बाल विवाह के क्या कुप्रभाव हैं?

बाल विवाह के कारण यौन संबंध भी छोटी आयु में ही स्थापित हो जाते हैं जिसका बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम भी उत्पन्न करता है। बार – बार गर्भधारण करने से बालिका का नाजुक शरीर प्रभावित होता है जो उस समय तक शिशु को जन्म देने के लिए तैयार नहीं हुआ होता। इससे गर्भावस्था के दौरान तथा प्रसव के उपरांत माता तथा नवजात शिशु की मृत्यु होने की संभावना भी बढ़ जाती है जो प्राय: नवजात शिशु की मृत्यु होने की संभावना भी बढ़ जाती है जो प्राय: कम वजन के होते हैं। उन्हें अन्य स्वास्थय संबंधी समस्याएँ भी झेलनी पड़ती हैं जैसा कि हमने अध्याय 4 और 5 में पढ़ा है। पर्याप्त संरक्षण के अभाव के कारण बालिका वधुएँ विभिन्न यौन – संचारित रोगों, विशेष रूप से एचआईवी/एड्स से प्रभावित होने का अधिक जोखिम झेलती हैं। बालक भी छोटी आयु में अपने परिवार की तथा धन कमाने करने की जिम्मेदारियों के कारण अपने बाल्यास्था अधिकारों से वंचित रह जाते हैं तथा उनकी वृद्धि और विकास के अवसर भी क्षीण हो जाते हैं।

विवाह के उपरांत प्राय: बालिकाएँ अपने शिक्षा को जारी नहीं रख पाती। चूंकि वे स्वयं का संरक्षण करने में समर्थ नहीं होती हैं, अत: बालिका प्राय: घरेलू हिंसा का शिकार बन जाती हैं जिसमें उनके साथ मार – पीट, उन्हें मानसिक यातनाएं देना और उनका यौन उत्पीड़न भी शामिल हैं।

पूछने के लिए प्रमुख प्रश्न

  • आपकी ग्राम पंचायत में कौन से बच्चों के बाल विवाह होने की अधिक संभावना है?
  • क्या आपने इस मुद्दे पर ओनके माता – पिता से अथवा ग्राम सभा में चर्चा की है?

 

बाल यौन – उत्पीड़न

बाल  यौन – उत्पीड़न है किसी बड़े व्यक्ति अथवा अधिक शक्तिशाली व्यक्ति द्वारा यौन संबंध बनाने के लिए किसी बच्चे का उत्पीड़न करना। इसका अपराधी सामान्यता: कोई वयस्क ही होता है परंतु यह बच्चे से बड़ा अथवा उससे अधिक शक्तिशाली कोई अन्य बच्चा भी हो सकता है। लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम, 2012 यौन हमलों, यौन उत्पीड़न तथा अश्लील साहित्य संबंधी अपराधों से 18 वर्ष की आयु से कम के सभी बच्चों को संरक्षण प्रदान करता हैं।

पोक्सो अधिनियम के अनुसार, किसी बच्चे के विरूद्ध हुए यौन – उत्पीड़न के मामलों की पुलिस को सूचना दिया जाना अनिवार्य है। इस कानून के तहत यदि किसी व्यवस्था या संस्था को यह जानकारी है कि किसी बच्चे के साथ यौन उत्पीड़न हुआ है यह होने की संभावना है तो उनकी यह जिम्मेदारी है कि वे तुरंत पुलिस को इसकी सूचना दें। यही प्रावधान सरपंच और ग्राम पंचायत सदस्यों पर भी लागू होता है।

बाल यौन – उत्पीड़न के कुप्रभाव क्या हैं?

यौन – उत्पीड़न के शिकार बच्चे जीवन भर उस सदमे को भूल पाने में सर्मथ नहीं हो पाते। उत्पीड़न की गंभीरता, अवधि और प्रकार पर निर्भर करते हुए उस घटना के प्रभाव भी अलग –अलग हो सकते हैं। परंतु सभी पीड़ितों को निश्चित रूप से कुछ न कुछ मनोवैज्ञानिक, सामाजिक यौन-संबंधी अथवा शारीरिक समस्याएँ तो झेलनी ही पड़ती हैं। उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है तथा उनका स्वयं पर विश्वास भी कम हो जाता है। यौन – उत्पीड़न के शिकार बच्चों में अवसाद, भय, अनिद्रा, बुरे सपने, चिडचिडापन, अचानक गुस्सा होना तथा सदमे की प्रतिक्रियाएं दिखाई पड़ती हैं। वे अन्य लोगों पर विश्वास करना छोड़ देते हैं। परिवार के ही किसी सदस्य द्वारा किए गए यौन-उत्पीड़न अथवा कौटुम्बिक व्यभिचार के परिणामस्वरूप बच्चे को और भी अधिक गंभीर तथा दीर्धकालिक मनोवैज्ञानिक आघात लग सकता है।

बच्चे के यौन – उत्पीड़न का बाल- पीड़ित पर न केवल हानिकारक एवं दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है बल्कि यह परिवारों, समुदायों तथा बड़े पैमाने पर समाज को भी प्रभावित करता है। किसी अन्य अनियंत्रित अपराध की ही भांति, घर के भीतर अथवा बाहर, बच्चों का यौन – उत्पीड़न एक गहन चिंता का विषय है तथा यह समग्र रूप से समाज के ताने – बाने को प्रभावित कता है।

छतीसगढ़ के सरगुजा जिले में एक गाँव में, अनुसूचित जनजाति परिवार की एक दस वर्षीय बालिका रीता (नाम परिवर्तित) के साथ उसके गाँव के किसी गैर – अनुसूचित जनजाति के  पुरूष ने बलात्कार किया। इस घटना के उपरांत, पाँचवी कक्षा में पढ़ने वाली रीता, जो अपने विद्यालय की एक मेधावी छात्रा थी, को उसके परिवार द्वारा विद्यालय से निकाल दिया गया। वह अपने ही परिवार द्वारा तथा गाँव के अन्य लोगों के उपहास का पात्र बन गई तथा उसे ताने दिए जाने लगे। उसके परिवार जनों ने यह कहते हुए उसके त्याग कर दिया कि रीता ने अपने लिए पुरूष ढूंढ लिया है, अत: उनकी उसके प्रति अब कोई जिम्मेदारी नहीं। समुदाय के अन्य बच्चों और लोगों ने उसका नाम उस अभियुक्त के साथ जोड़ते हुए उसे चिढ़ाना शुरू कर दिया। रीता अपनी पढाई को आगे जारी रखना चाहती थी परंतु उसके पास उसके परिवार अथवा समुदाय की ओर से कोई सहारा नहीं था।

शारीरिक दंड

शारीरिक दंड में बच्चों को सही राह पर लाने तथा अनुशासन में रखने के लिए वयस्कों द्वारा उनकी पिटाई किया जाना और उनके साथ हिंसक व्यवहार करना शामिल हैं। बच्चों को प्राय: घर पर अथवा विद्यालय में मारा- पीटा जाता है जिसके फलस्वरूप  बच्चों का मानसिक उत्पीड़न होता है।

अनेक परिवारों में बच्चों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार न किया जाना एक स्वीकार्य प्रथा है। इस मारपीट को न केवल औचित्यपूर्ण समझा जाता है बल्कि बच्चों को अनुशासन सिखाने के लिए बड़ों का यह कर्तव्य भी माना जाता है कि वे बच्चों की पिटाई करें और उन्हें सजा दें।

शारीरिक दंड के कुप्रभाव क्या हैं?

किसी भी रूप में दिया जाने वाला दंड बच्चे के विकास तथा उसकी पूर्ण क्षमता को प्रभावित करता है यह क्रोध उत्पन्न करता है तथा इसके फलस्वरूप बच्चे का व्यवहार उग्र और आक्रामक होता है, उसका चरित्र विध्वंसक प्रकृति  का बन जाता है, विद्यालय में उसका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहता, उसका पढाई में मन नहीं लगता और विद्यालयों से पढाई छोड़ने की स्थिति आ जाती है। इसके परिणामस्वरुप बच्चों में आत्मसम्मान की भावना में कमी आती है, चिंता बढ़ जाती है, निद्रा संबंधी समस्याएँ उत्पन्न जाती हैं तथा उनमें आत्महत्या की प्रवृत्तियां भी हमन लेने लगती हैं। अत्याधिक मार – पीट किए जाने से बच्चे अपने माता – पिता अपने विद्यालय तथा शिक्षकों से घृणा करना आरंभ कर देते हैं। अनेक अवसरों पर ऐसी कठोर मार – पीट और हिंसा से घबराकर वे अपने गांवों से शहरों की ओर भाग जाते हैं, जहाँ वे असुरक्षित होते हैं तथा अनेक  प्रकार के जोखिमों जैसे अवैध व्यापार उत्पीड़न, जबरन वेश्यावृति आदि के खतरे में होते हैं।

बच्चों का अवैध व्यापार

अवैध व्यापार का शिकार वह ब्च्चा है जो 18 वर्ष से कम आयु का है, जिसे देश के भीतर अथवा बाहर शोषण का प्रयोजन के लिए रोजगार पर नियुक्त किया गया, ले जाया गया, स्थानांतरित किया गया, रखा गया अथवा प्राप्त किया गया है। भारत में अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 1956 में पारित किया गया था जिसका उद्देश्य महिलाओं और बच्चो न के अवैध व्यापार को नियंत्रित करना है।

गरीबी और निरक्षरता के कारण, अनेक बच्चे गांवों में अवैध व्यापार का शिकार बन जाते हैं तथा ऐसे दलालों के माध्यम से जो अधिकांशत: गांवों में ही होते हैं अथवा बच्चे के परिवार के परिचित होते हैं, बच्चों को भारत के विभिन्न  भागों में तथा अन्य देशों तक में भेजा जाता है। सामान्यत: बच्चों का अवैध व्यापर उन्हें शहरों में अच्छी नौकरियों देने अथवा शिक्षा प्रदान करने का झांसा देकर किया जाता है। माता – पिता को कभी – कभी दलालों द्वारा इस आश्वासन के साथ कुछ राशि दे दी जाती है कि शहर में बच्चे की नौकरी लग जाने के बाद वह उन्हें पैसे भेजना शुरू कर देगा जिससे परिवार की गरीबी दूर हो जाएगी। परिवार से दूर इन बच्चों को अनजान लोगों के सुपूर्द कर दिया जाता है जो उनका अनेक स्वार्थपूर्ण प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल करते हैं जैसे सस्ता अथवा बिना वेतन श्रम, पेशेवर देह – व्यापार, नशीले पदार्थों की तस्करी, यौन पर्यटन, भिक्षावृत्ति, खेलों में उनका प्रयोग अथवा अंग व्यापार अथवा उन्हें घरेलू नौकर के रूप में रखना आदि।

बाल अवैध – व्यापार के कुप्रभाव क्या हैं?

बच्चों को अत्यंत शोषणकारी और अमानवीय परिस्थितियों में रहने को बाध्य किया जाता है तथा प्राय: उन्हें उनके परिवारों से मिलने अथवा संपर्क तक करने नहीं दिया जाता। गरीव परिवार अपने बच्चों की तलाश करने में अत्यंत कठिनाइयों का अनुभव करते हैं। उनमें से अनेक बच्चे गुमशुदा हो जाते हैं और कुछ तो अत्यंत अमानवीय परिस्थितियों के चलते मर भी जाते हैं।

निस्सहाय, त्यागे गए तथा अभिभावकीय देख रेख के बिना बच्चे

ऐसे बच्चों को अधिक देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता होती है जिनके साथ उनकी देखरेख करने वाला कोई नहीं होता है अथवा जिनके परिवारों ने गरीबी अन्य किसी कारण से उन्हें त्याग दिया हो। किशोर न्याय (बच्चों की देख रेख और संरक्षण अधिनियम) 2000 उनकी देखभाल, संरक्षण और पुनर्वास का प्रावधान करता है जिसमें दत्तक ग्रहण, पोषण देख – रेख, प्रायोजन  भी शामिल है।

कुछ बच्चे विभिन्न कारणों से अपने माता – पिता को खो देते हैं जैसे – गरीबी, विकलांगता, बीमारी, माता – पिता की मृत्यु अथवा कारावास, प्रवास अथवा सशस्त्र विवाद के कारण उनसे अलगाव। ऐसे बच्चों की संख्या भी बहुत अधिक है जिनके माता – पिटा में से एक अथवा दोनों जीवित नहीं हैं। अभिभावकीय देखरेख के अभाव वाले ऐसे बच्चे उत्पीड़न,शोषण और उपेक्षा के उच्च जोखिम में जीते हैं। कभी – कभी जीवन में आई कठिनाइयों और जीवित रहने के लिए उनके द्वारा किया जाने वाला संघर्ष उन्हें अपराध करने पर विवश कर देता है जिसके उन्हें कानूनी परिणाम झेलने पड़ते हैं। कभी – कभी एचआईवी/एड्स से पीड़ित बच्चे अथवा ऐसे बच्चे जिन्होंने स्वयं कानून का उल्लंघन किया है या जिनके माता – पिता ने अपराध किया है, गाँव में कलंक माने जाते हैं और सामाजिक बहिष्कार के शिकार बन जाते हैं। इससे उनका जीवन अत्यंत कष्टकर हो जाता है। शारीरिक अथवा मानसिक विकलांगता से पीड़ित बच्चों को भी प्राय: परिवार और समुदाय द्वारा बोझ समझा जाता है। लोग इन बच्चों को कोसते हैं तथा ऐसे बच्चे भी उत्पीड़न, उपेक्षा और हिंसा के शिकार बनते हैं।

कर्नाटक के बागलकोट जिले के दिगम्बेश्वर मंदिर में मनाए जाने वाले महोत्सव के दौरान, छोटे बच्चों को 30 फूट ऊँचे मंदिर की छत से नीचे फेंका जाता है। छत से फेंके जाने वाले बच्चे दो वर्ष से कम की आयु के होते हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है की यह अनुष्ठान बच्चे के लिए स्वश्त्य और भाग्य लेकर आता है।

भारत में चली आ कुछ परंपरागत और अंधविश्वासी प्रथाएँ बच्चों की संवृद्धि, विकास और कुशलता के लिए बहुत हानिकारक हैं।

  • पुत्रियों को परिवार में एक बोझ तथा परिवार का अवांछनीय सदस्य समझा जाता है  अनेक परिवारों में उन्हें जन्म लेने से पूर्व ही माता के गर्भ में अथवा जन्म के तत्काल पश्चात् मार दिया जाता है। ऐसे प्रथाओं के फलस्वरूप भारत में पुरूषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या में काफी कम हो गई है।
  • देवदासी (अर्थात मंदिर की सेविका) के नाम पर बालिकाओं को वेश्यावृति के लिए विवश करना दक्षिण भारत के कुछ भागों में एक प्राचीन प्रथा है जिसके फलस्वरूप छोटी बालिकाओं को 10 वर्ष के आयु से भी पूर्व वेश्यावृति में झोंक दिया जाता है।
  • अनके समुदायों में, यह अंधविश्वास व्याप्त है कि प्रसव के तुरंत पश्चात माता का दूध शिशु के स्वास्थय के लिए अच्छा नहीं होता है। अत: दाई/प्रसव परिचारिका/परिवार के सदस्य उस दूध को प्रसव के तत्काल पश्चात शरीर से निकाल कर फेंक देते हैं, जो वास्तव में बच्चे की प्रतिरक्षण प्रणाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
  • जब बच्चे पीलिया जैसे रोगों से पीड़ित होते हैं, तो उन्हें परिवार द्वारा इलाज के लिए नीम हकीमों के पास ले जाया जाता है। गलत धारणाओं के कारण शिशु के टीकाकरण को या तो आरंभ नहीं किया जाता या टीकाकरण पूरा नहीं किया जाता।
  • बच्चों के साथ यौन – क्रिया को यौन – संचारित रोगों के लिए उपचार माना जाता है, जिसके फलस्वरूप बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न की घटनाओं में वृद्धि होती है।
  • भारत के अनेक भागों में बच्चों के अंगों को ईश्वर के प्रति समर्पित करने के लिए अथवा  काटने तथा अंधविश्वासपूर्ण आस्थाओं के कारण बच्चों की बलि देने की प्रथा प्रचलित हैं।

जिला और ग्राम स्तर पर बाल संरक्षण प्रणालियाँ क्या है?

संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों को सहायता प्रदान करते समय, सरपंच तथा ग्राम पंचायत के सदस्यों को विभिन्न सरकारी एजेंसियों तथा जिला स्तर पर संवैधानिक निकायों से संर्पक स्थापित करने की आवश्यकता होती है। हमने प्रथम अध्याय में बच्चों के लिए मुख्य कानूनी प्रावधानों तथा कार्यक्रमों के बारे में पढ़ा है। बच्चों के संरक्षण के लिए कुछ महत्वपूर्ण निकायों और पदाधिकारियों के विविरण नीचे दिए गए हैं।

किशोर न्याय (बच्चों की देख रेख और संरक्षण) अधिनियम के अनुसार निम्नलिखित तीन निकाय स्थापित किए जाने चाहिए

  • बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) ऐसे बच्चों की देख रेख और उनके संरक्षण के लिए , जिनके पास अभिभावकीय या कोई अन्य देखरेख संबंधी सहायता उपलब्ध नहीं है, प्रत्येक जिले में एक बाल कल्याण समिति का प्रावधान किया गया है। बाल कल्याण समिति बच्चे की तत्काल देखरेख करने, उसे संरक्षण देने तथा उसका दीर्धकालिक पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए एक संवैधानिक निकाय है। इसके पास मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अथवा प्रथम श्रेणी के न्यानिक मजिस्ट्रेट के सामान शक्तियाँ हैं। उत्पीड़न का शिकार, नि:स्सहाय अथवा त्यागे गए बच्चे को बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया जाता है जो बच्चों के श्रेष्ठ हित को ध्यान में रखते हुए संबंधित पदाधिकारियों को उपयुक्त निर्देश जारी कर सकती है।
  • किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी): अपराध के दोषी बच्चे को पुलिस द्वारा किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। किशोर न्याय बोर्ड एक मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अथवा प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा दो सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलकर बनता है। किशोर न्याय बोर्ड का उद्देश्य बच्चों को उनके पुनर्वास करना है।
  • विशेष किशोर पुलिस इकाई (एसजेपियू) : अपराध के दोषी बच्चे को पुलिस द्वारा किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। किशोर न्याय बोर्ड एक मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अथवा प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा दो सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलकर बनता है। किशोर न्याय बोर्ड का उद्देश्य बच्चों को उनके अपराध के लिए सदोष ठहराना तथा दंड के स्थान पर परामर्श और बाल हितैषी व्यवहार के माध्यम से उनका पुनर्वास करना है।
  • विशेष किशोर पुलिस इकाई (एसजेपीयू) : विशेष किशोर यूनिट जिला स्तर पर पुलिस की एक ऐसी इकाई है जिसे बच्चों के मामलों को बाल – हितैषी तरीके से देखने के लिए तैयार किया गया है। प्रत्येक पुलिस स्टेशनमे बच्चों के मामलों को बाल- हितैषी तरीके के लिए तथा उन्हें बाल कल्याण समिति अथवा किशोर न्याय बोर्ड के पास अग्रेषित करने के लिए कम –से कम एक अधिकारी को “ किशोर अतवाह बाल कल्याण अधिकरी” के रूप में अभिहित किया जाता है। ये सभी बाल अधिकरी जिला स्तर पर विषेश किशोर पुलिस इकाई के सदस्य होते हैं।

बच्चों के संरक्षण के लिए महिला और बाल कल्याण मंत्रालय की प्रमुख स्कीम ‘एकीकृत बाल संरक्षण स्कीम (आईसीपीएस)’ के अंतर्गत जिला स्तर पर जिला बाल संरक्षण इकाई तथा ग्राम स्तर पर ग्राम बाल संरक्षण समिति (वीसीपीसी) गठित किए जाने का प्रावधान किया गया है।

  • डीसीपियू को जिला स्तर पर समन्वय और क्रियान्वयन करना होता है डीसीपियू हैण्ड एवं ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण समितियों की सहायता से तथा ग्राम स्तर के पदाधिकारियों, ग्राम पंचायतों तथा बाल संरक्षण मुद्दों के लिए कार्य करने वाले गैर - सरकारी संगठनों के साथ प्रभावी संपर्क स्थापित करके जोखिम में घिरे परिवारों तथा संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान करता है। डीसीपियू की अध्यक्षता जिला अधिकारी द्वारा की जाती है।
  • वीसीपीसी ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण समिति है। वीसीपीसी का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संकट से संभावित सभी बच्चों की पहचान तत्काल कर ली जाए। वीसीपीसी पहचाने गए बच्चे अथवा परिवार को तत्काल उपयुक्त सेवाएँ प्रदान करने के लिए डीसीपियू के सहयोग में काम करती है। वीसीसीपी ग्राम पंचायत के सदस्यों, ग्राम पंचायत की स्थायी/उप – समिति तथा ग्राम स्तर के विभिन्न पदाधिकारियों जैसे – एएनएम्, आंगनबाड़ी  कार्यकर्ता, आशा स्कूल प्रबंधन समिति, विद्यालय के शिक्षकों आदि के सहयोग से कार्य करती है।

यदि ग्राम पंचायत क्षेत्र में कोई वीसीपीसी नहीं है, तो ग्राम पंचायत के सदस्य तथा सरपंच अपनी ग्राम पंचायत में इस समिति के गठन के लिए जिला अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं।

ग्राम पंचायत क्षेत्र में बच्चों का संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए ग्राम पंचायत की भूमिकाएँ क्या हैं?

ग्राम स्तर पर, ग्राम पंचायतों को ग्राम पंचायत क्षेत्र में बच्चों का संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है। ग्राम पंचायत इस कार्य गाँव में एक बाल- हितैषी परिवेश सृजित करते हुए संपन्न कर सकती है जहाँ बच्चे सुरक्षित और संरक्षित महसूस कर सकें तथा वह ऐसी स्थितियों में उपयुक्त हस्तक्षेप कर सकती है जहाँ परिवारों को सहायता की आवश्यकता हो अथवा वे अपने बच्चों को पर्याप्त संरक्षण प्रदान करने में असमर्थ हों, वीसीपीसी बच्चों के लिए जोखिमपूर्ण स्थितियों की पहचान करे में तथा जिला स्तरीय सरंक्षण तंत्रों के साथ संबंध स्थापित करते हुए समस्या का समाधान करने में ग्राम पंचायत अथवा ग्राम पंचायत की स्थायी अथवा उप – समिति की सहायता कर सकती है। ग्राम पंचायत को बच्चों की स्कीमों के बारे में समुदाय के सदस्यों को जागरूक बनाना चाहिए तथा ऐसी स्कीमों के लाभ पाने के लिए लोगों की सहायता करनी चाहिए।

बाल श्रम के निवारण में ग्राम पंचायत की भूमिका

  • संभावित बाल मजदूरी वाले परिवारों और बाल मजदूरी कर रह बच्चों की पहचान और उनकी सहायता करना जैसा कि हमने पिछले पृष्ठों में पढ़ा है, ग्राम स्तरीय से ग्राम पंचायत गाँव में काम करने वाले बच्चों तथा काम करने वाले बच्चों के परिवारों अथवा संभावित बाल श्रमिकों की सूची तैयार करे सकती है। ग्राम पंचायत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे सभी परिवारों को मनरेगा के माध्यम से 100 दिन के कार्य अवश्य प्रदान किया जाए तथा पत्र लाभार्थियों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के समस्त लाभ उपलब्ध कराएँ जाएँ। ग्राम पंचायत को उन परिवारों पर भी ध्यान देना चाहिए जो वर्ष के कुछ महीने मजदूरी के लिए गाँव से बाहर जाते हैं।
  • जोखिम पूर्ण कार्य परिस्थितियों से बच्चों को सुरक्षित करना ऐसे मामलों में, जहाँ बच्चा अत्यंत जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में कार्य कर रहा है, जैसे कि कार्य के घंटे अत्यधिक हैं तथा कार्य की परिस्थितियाँ भी बच्चे के लिए हानिकारक हैं, वहाँ ग्राम पंचायत को उन्हें मुक्त करवाना चाहिए। वह वीसीपीसी/जिला प्रशासन/पुलिस/श्रम विभाग/बाल कल्याण समिति/जिला बाल संरक्षण इकाई को इसकी सूचना दे सकती है तथा बच्चों के लिए बचाव और उनके पुनर्वास के लिए सहायता प्राप्त कर सकती है।
  • ऐसे बच्चों तथा परिवारों पर नजर रखन जो काम के लिए गाँव से बाहर पलायन कर गए हैं: ग्राम पंचायत कायार्लय में उन सभी बच्चों, जो अपने परिवार के साथ अथवा उसके बिना काम की तलाश में गाँव से पलायन कर गए हैं, का रजिस्टर बनाया जा सकता है तथा उसे महत्वपूर्ण जानकारियों के साथ नियमित रूप से अपडेट किया जा सकता है, जैसे कि वे बच्चे कहाँ हैं, वे किन परिस्थितियों में कार्य कर रहे हैं तथा क्या वे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं अथवा नहीं। ऐसा इसलिए महत्वपूर्ण होता है ताकि वे बच्चा गुमशुदा न हो जाएँ अथवा वे शोषणकारी परिस्थितियों का शिकार न बन जाएँ।
  • विद्यालय न जाने वाले बच्चों को दाखिला दिलाना : ग्राम पंचायत को चाहिए कि वह अभिभावकों तथा नियोजकों को बच्चों को विद्यालय न भेजने के परिणामों तथा बाल श्रम के कुप्रभावों के बारे में जानकारी प्रदान करे। 14 वर्ष की आयु से कम के विद्यालय न जाने वाले तथा गांव के भीतर अथवा निकटवर्ती क्षेत्रों में कामकाज करने वाले बच्चों को ग्राम पंचायत विद्यालय प्रबंधन समिति की सहायता से विद्यालय में भर्ती करा सकती है। विद्यालय छोड़ देने वाले छात्रों को उनकी पढ़ाई पुन: जारी करने के लिए छात्रवृत्तियों, शैक्षणिक सहायताओं के रूप में आर्थिक सहायता भी दी जा सकती है। ग्राम पंचायत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों को आयु के अनुसार उपयुक्त कक्षा में दाखिला दिलाया जाए तथा उन्हें सहायक पाठ्यक्रमों के लिए सहायता प्रदान की जाए।

भोंगा शाला एक ऐसा अभिनव विद्यालय है जो ईंटों की भठ्टी के कर्मकारों के बच्चों को शिक्षा प्रदान करता है। इसे विद्यालय सांसद नमक एक गैर – सरकारी संगठन द्वारा महाराष्ट्र के ठाणे जिले के दो खण्डों में आरंभ किया गया था और आज सर्व शिक्षा अभियान की सहायता से ठाणे जिले में इसके 250 केंद्र खुल गए हैं। भोंगा का अर्थ है एक अस्थायी ‘झोपड़ी’ तथा शाला का अर्थ है ‘विद्यालय’। इन ‘अस्थायी झोपड़ियों’ में आने वाले अधिकांश बच्चे प्रवासी हैं। ईंट भट्टी मजदूरी के मौसम के दौरान पहली कक्षा से लेकर चौथी कक्षा तक की शिक्षा दी जाती है, जो दिसंबर में आरंभ होता है तथा मई में समाप्त होता है। इसकी पाठ्यचर्या नियमित विद्यालय के समान ही है परंतु यहाँ बच्चों को खेल- कूद के क्रियाकलाप का प्रयोग करते हुए एक अनौपचारिक तरीके से पढ़ाया जाता है।

बाल विवाह से बच्चों का संरक्षण करना

  • ग्राम पंचायत क्षेत्र में हुए समस्त जन्मों का पंजीकरण, जो बाल विवाह के मामले में विवाह की आयु का निर्धारण करने में सहायता प्रदान करता है, सुनिश्चित करने के अलावा विवाहों का पंजीकरण भी ग्राम पंचायत द्वारा अनिवार्य बनाया जा सकता है। यह विवाह करने वाले युवक और युवती की आयु जानने में सहायता करेगा।
  • ग्राम पंचायत को वर्ष की विशिष्ट अवधियों के दौरान बाल विवाह के आयोजनों के बारे में सतर्क रहना चाहिए जब कुछ क्षेत्रों में अनेक बाल विवाह आयोजित किए जाते हैं। उदहारण के लिए, राजस्थान में अक्षय तृतीय के त्योहार के दौरान बड़े पैमाने पर बाल विवाह आयोजित किए जाते हैं। ग्राम पंचायत तथा पीसीपीसी विवाह योग्य बच्चों पर निगरानी रख सकती हैं तथा उस स्थिति में उपयुक्त प्राधिकारियों को सूचित कर सकती है यदि उन्हें संदेह हो कि उनमें से किसी बच्चे का विवाह होने वाला है। अनके अवसरों पर, परिवार के किसी अन्य समारोह के नाम पर बाल विवाह आयोजित किए जाते है, जिनका समय पर पता लगाया जाना चाहिए।

कोई भी व्यक्ति किसी बाल विवाह के बारे में उसके होने से पूर्व अथवा होने के पश्चात सूचित कर सकता है। यह रिपोर्ट पुलिस/बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी/प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट अथवा मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट/बाल कल्याण समिति अथवा बाल हेल्पलाइन (1098) को की जानी चाहिए।

  • विद्यालय के शिक्षकों को इस बात पर नजर रखने के लिए संवेदनशील बनाया चाहिए कि कोई बच्चा गुम तो नहीं हुआ है, उसका अवैध बाल व्यापार तो नहीं किया गया है अथवा यदि कहीं कोई बाल विवाह हो रहा है। ऐसा होने पर वे इस सूचना को तत्काल ग्राम पंचायत अथवा वीसीपीसी को दें।
  • आन्ध्रप्रदेश में बाल विवाह कानून के क्रियान्वयन की निगरानी करने के लिए ग्राम बाल विवाह प्रतिषेध और अनुवीक्षण समितियाँ गठित की गई हैं। ग्रामपंचायत अपने ग्राम पंचायत क्षेत्र बाल विवाह के निवारण करने अथवा उसकी सूचना देने के लिए इस समिति के साथ समन्वय कर सकती है।

महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में, 17 पंचायतों ने अपनी – अपनी संबंधित पंचायतों के क्षेत्र में एक संकल्प करके बाल विवाह को समाप्त करने के निर्णय लिया। उन्होंने उन लोगों के विरूद्ध कड़ी करवाई करने का भी निर्णय लिया जो इस संकल्प का पालन नहीं करेंगे। इसके परिणाम स्वरुप, 18 परिवारों ने हाल ही में अपनी अवयस्क लड़कियों की शादियाँ रद्द कर देना। इसके उल्लंघनकर्त्ता पर अधिनियम के अंतर्गत करवाई की जाएगी” एक पंचायत के सरपंच ने बताया  (स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया)

  • यदि बच्चे अपने विद्यालय की शिक्षा समाप्त करें tatतथा विद्यालय के उपरांत उन्हें कौशल विकास कार्यक्रमों में शामिल करने से भी बाल विवाह की संभावनाओं में कम किया जा सकता है।

बच्चों को यौन उत्पीड़न से संरक्षित करना

ग्राम पंचायत क्षेत्र में बाल यौन- उत्पीड़न के मामले में, ग्राम पंचायत द्वारा निम्नलिखित भूमिका निभाई जा सकती है।

  • बच्चे के साथ निरंतर संपर्क में आने वाले सभी व्यक्तियों को जैसे आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा, अध्यापक और नि:संदेह उसके अभिभावकों को उत्पीड़न के किसी भी मामले की खबर मिलते ही इसकी सूचना वीसीपीसी अथवा पुलिस को देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • निर्वाचित प्रतिनिधियों, ग्राम बाल संरक्षण समिति तथा सहायता प्रदान करने में शामिल अन्य व्यक्तियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पीड़ित बच्चे के साथ संवेदनापूर्वक व्यवहार किया जा रहा है तथा सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस बच्चे की गोपिनीयता को कायम रखा जाए ताकि उसे किसी भी प्रकार के सामाजिक कलंक से बचाया जा सके। निर्वाचित प्रतिनिधियों को पीड़ित बच्चे के अभिभावकों और परिवारों से चर्चा करनी चाहिए तथा उन्हें कानूनी कार्यवाही में सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • पीड़ित बच्चे के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए ग्राम पंचायत परिवार तथा बच्चे को सलाह दे सकती है। कि वे घटना के किसी भी साक्ष्य को नष्ट न करें। उदहारण के लिए बच्चे को चिकित्सा परिक्षण होने तक नहाना नहीं चाहिए तथा उसे घटना के समय पहने हुए वस्त्रों को नष्ट नहीं करना चाहिए।
  • यदि आवश्यक हो, तो ग्राम पंचायत उस स्थिती में पीड़ित बच्चे को और उसके परिवार को सुरक्षा प्रदान करने के लिए पुलिस से अनुरोध कर सकती है यदि आरोपी की ओर से उन्हें धमकी मिलने की कोई संभावना हो।
  • यदि आरोपी बच्चे के परिवार का ही कोई सदस्य है, तो ग्राम पंचायत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे को उस समय तक सुरक्षित स्थान पर रखा जाए जब तक उसे बाल कल्याण समिति अथवा पुलिस के समक्ष पेश न कर दिया जाए।
  • सरपंच और निर्वाचित प्रतिनिधियों को इस बात की निगरानी करनी चाहिए कि पीड़ित बच्चे के साथ विद्यालय अथवा आंगनबाड़ी में कोई भेदभाव नहीं किया जाए और उसकी शिक्षा भी बीच में रूक न जाए।
  • ग्राम पंचायत अपने क्षेत्र में भी सभी संस्थाओं को ‘बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान’ बनाने के लिए कदम उठा सकती है जिनमें विद्यालय और आंगनबाड़ी तक पहुँचने वाली सडकें भी शामिल हैं। यदि आवश्यक हो, तो यह सुनसान सड़कों पर बच्चों के विद्यालय या आंगनबाड़ी जाने और वापिस आने के समय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय पुलिस की सहायता भी ले सकती है। समुदाय के कार्यकर्ताओं की भी सहायता ली जा सकती है।

केरल की मरारिकूलम दक्षिण ग्राम पंचायत, द्वारा अपराध की निगरानी

मरारिकूलम दक्षिण ग्राम पंचायत ने ग्राम पंचायत क्षेत्र में उत्पीड़न के प्रकार और स्थानों की पहचान करने के लिए क्राइम मैपिंग आरंभ की है। प्रत्येक वार्ड में परिवारों के साथ बैठकें आयोजित की गई। महिलाओं और बालिकाओं ने अत्याचारों के प्रकार तथा उनके घटित होने के स्थानों के बारे में लिखकर सूचित किया तथा अपनी शिकायतों का विश्लेषण करते हुए, ‘अपराध मानचित्र’ और ‘निर्गम मानचित्र’ तैयार किए गए। ऐसा विशेषज्ञों के मार्गदर्शन के अंतर्गत पंचायत में किया गया। इस पहल ने ग्राम पंचायत को पुलिस सहित विभिन्न हितधारकों के साथ नेटवर्किंग स्थापित करते हुए महिलाओं और बालिकाओं के प्रति अपराधों का निराकरण और निवारण करने में समर्थ बनाया।

ग्राम पंचायत द्वारा शारीरिक दंड पर

ग्राम पंचायत शारीरिक दंड पर अभिभावकों, शिक्षकों तथा अन्य देखरेख करने वालों को जानकारी प्रदान करते हुए शारीरिक दंड की समस्या का निवारण कर सकती है तथा इसके अंतर्गत वह शारीरिक दंड दिए जाने के गंभीर मामलों को वीपीपीसी को सौंप सकती है जिससे बच्चे को समुचित सहायता प्राप्त हो सके तथा अपराधी के विरूद्ध कानूनी कार्रवाई की जा सके  शारीरिक दंड के कानूनी परिणामों के बारे में जनता को जागरूक बनाने लिए गैर – सरकारी संगठनों और विधि सहायता से प्रत्येक गाँव में कानूनी जागरूकता शिविर भी आयोजित किए जा सकते हैं।

ग्राम पंचायत द्वारा बच्चों को दलालों से बचाना

ग्राम पंचायत बच्चों को दलालों के साथ, जो उनके रिश्तेदार अथवा पारिवारिक मीटर भी हो सकते हैं, बाहर भेजने वाले लभावाने प्रस्तावों के विरूद्ध ग्राम सभा के लोगों को सावधान करने तथा उनके बारे में जानकारी प्रदान करके बाल अवैध व्यापार को रोकने तथा बच्चों के गायब होने की घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

महत्वपूर्ण हेल्पलाइन नंबर द्वारा

महत्वपूर्ण हेल्पलाइन नंबर जैसे कि चाइल्डलाइन, निकटतम पुलिस स्टेशन, बाल कल्याण समिति आदि के संपर्क नंबर पंचायत घर और अन्य सुविधाजनक स्थानों पर प्रदर्शित किए जा सकते हैं ताकि समय अपने पर लोग इन्हें प्रयोग कर सकें।

महिला व बाल विकास मंत्रालय ने गुमशुदा बच्चों का पाता लगाने तथा उन्हें उनके परिवारों के साथ पुन: मिलाने और उनका पुनर्वास करने के लिए राष्ट्रव्यापी वेबसाइट “ट्रैक चाइल्ड” आरम्भ की है। राज्य स्तर पर, जिला बाल संरक्षण इकाई (डीसीपीयू) इस बाल ट्रेकिंग प्रणाली की स्थापना और इसके प्रबंधन में सहयोग प्रदान कर रही हैं ताकि देश के किसी भी भाग में गायब हुए बच्चे का पता लगाया जा सके और उसके परिवार से मिलाया जा सके।

अभिभावकीय देखरेख द्वारा

अभिभावकीय देखरेख के अभाव वाले बच्चों को डीसीपीयू और वीसीपीसी की सहायता से अथवा चाइल्डलाइन के माध्यम से उनकी देखरेख और पुनर्वास के लिए बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

ग्राम सभा में बाल अधिकारों द्वारा

ग्राम सभा में बाल अधिकारों के उल्लंघन के लिए ‘शून्य सहिष्णुता’ तथा समस्त बच्चे विद्यालय में आदि संकल्प पारित किए जा सकते हैं।

इन सभी मुद्दों पर विद्यालयों में तथा विभिन्न प्लेटफार्मों पर विचार विमर्श करने से निर्वाचित प्रतिनिधियों को इनसे जुड़ी समस्याओं को समझने तथा बच्चों के परिप्रेक्ष्य से इनका समाधान ढूँढने में सहायता मिलती है। यह इन समस्याओं का बाल हितैषी समाधान मिलती है। यह इन समस्याओं का बाल- हितैषी समाधान ढूँढने में ग्राम पंचायतों की मदद भी करेगा।

ग्राम पंचायत क्षेत्र में जागरूकता सृजन तथा लोगों को बच्चों के मुद्दों के बारे में संवेदनशील बनाने का कार्य बाल दिवसों के आयोजन, दिवार पेंटिंग के माध्यम से तथा ग्राम सभा, वार्ड सभा और ग्राम पंचायत की बैठकों में लोगों के साथ चर्चा के माध्यम से किया जा सकता है। वीसीपीसी, ग्राम पंचायत स्थायी समिति तथा ग्राम पंचायत स्तर पर आय पदाधिकारी ग्राम पंचायत क्षेत्र में बच्चों के संरक्षण के लिए जागरूकता अभियानों में सक्रिय रूप से ग्राम पंचयत की सहायता कर सकते हैं। बाल संरक्षण आवश्यकताओं पर संचालित किए जाने वाले अभियानों के लिए प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया, लोक थियेटर, कठपुतली कार्यक्रमों तथा कला के पारंपरिक स्रोतों आदि के उपयोग ग्राम सभा के सदस्यों में जागरूकता का सृजन करने के लिए किया जा सकता है।

चाइल्डलाइन सहायता की आवश्यकता वाले बच्चों के लिए भारत सरकार की 24 घंटे की नि: शुल्क आपातकालीन फोन सेवा है। कोई भी संबंधित वयस्क अथवा बच्चा सेवा का लाभ उठाने के लिए शुल्करहित नंबर 1098 को डायल कर सकता है। चाइल्डलाइन ने केवल बच्चों की आपातकालीन आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं, बल्कि उनकी दीर्घकालिक देखरेख और पुर्नवास के लिए उन्हें उपयुक्त सेवाओं से भी जोडती है।

बाल संरक्षण की प्रमुख योजनाएँ क्या हैं। तथा इन योजनाओं के लाभ सुनिश्चित करने में ग्राम पंचायत की भूमिका क्या है?

मुख्य बाल सुरक्षा योजनाओं को इकट्ठा करके समेकित बाल संरक्षण स्कीम बनाई गई है, जैसा हमने पिछले पृष्ठों में जाना कुछ अन्य संरक्षण स्कीमें तथा इनके संबंध में ग्राम पंचायत की भूमिकाएँ नीचे तालिका दी गई है।

क्रम सं

स्कीम का नाम

स्कीम की पात्रता

ग्राम पंचायत की भूमिका

1.

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान

यह बालिकाओं के प्रति लोगों की विचारधारा को बदलने तथा बालिका लिंग अनुपात में सुधार लाने के लिए भारत सरकार की स्कीम है। इसमें बालिका लिंग अनुपात में सुधार करने और बालिका शिक्षण के लिए अभियान तथा समुदाय की प्रतिभागिता शामिल है।

बालिकाओं को संरक्षण प्रदान करने और शिक्षित बनाने के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्त्ता, आशा स्वच्छता समूह युवक को प्रोत्साहित और संगठित करना, वीपीसीपी की सहायता से पंचायत को बालिका-हितैषी बनाना।

गुडा – गुडी बोर्ड पर नवजात बच्चों की संख्या को नियमित रूप से नवीकरण करना, बालिकाओं को मुद्दों पर महिला सभा व विशेष ग्राम सभा अयोजित करना, ग्राम सभा क्षेत्र में अल्ट्रासाउंड केन्द्रों पर निगरानी रखना और संदिग्ध केसों की सूचना पुलिस को देना।

2.

कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय

शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े ब्लॉकों में अनुसूचित जाती, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यक समुदायों तथा गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालयों का प्रावधान है।

जागरूकता सृजन तथा लाभार्थियों की पहचान, लाभार्थियों को सहायता तथा अन्य पदाधिकारियों के साथ संपर्क।

3.

उज्ज्वला – अवैध- व्यापार को नियंत्रित करने के लिए व्यापक स्कीम

इसमें बालिका अवैध – व्यापार का निवारण तथा वेश्यावृति के लिए अवैध रूप से बेची गई बालिका पीड़ितों का मुक्त कराने, उनके पुनर्वास, उन्हें मुख्य धारा से वापस लाने तथा उन्हें उनके परिवारों से मिलवाने के लिए सहायता प्रदान की जाती है।

अवैध – व्यापार को रोकने के लिए समुदाय सतर्कता समूहों का तहत गठन और प्रभावी कार्यकरण, बालिका/बाल संघों के कार्यकरण को प्रोत्साहन और सहायता स्कीमे के बारे में जागरूकता फैलाना, अवैध – व्यापार के शिकार बच्चों को मुख्य धारा में वापस लाने के लिए सहायता।

5.

राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (एनसीएलपी) स्कीम

यह स्कीम जोखिम व्यवसायों और प्रक्रियाओं में कार्यरत बच्चों के पुनर्वास पर ध्यान केन्द्रित करती है।

परियोजना के क्रियान्वयन में एनसीएलपी सोसाइटी के कार्य में सहयोग, बालश्रम से मुक्त कराए गए बच्चों के नामांकन की निगरानी तथा नियमित विद्यालयों में उन्हें प्रवेश दिलाना।

 

हमने क्या सीखा है ?

  • बच्चों पर विभिन्न जोखिमों, चुनौतियों तथा कठिन परिस्थितियों के शिकार होने का  खतरा बना रहता है।
  • बाल श्रम, बाल विवाह, बाल अवैध- व्यापार, यौन उत्पीड़न दंड, शारीरिक दंड, उपेक्षा और त्याग दिया जाना, उनके द्वारा किए गए अपराध अथवा उनके परिवार के वयस्कों द्वारा किए गए अपराधों के लिए उन्हें कलंकित करना और उनका उत्पीड़न करना, अथवा एचआइवी संक्रमित और प्रभावित बच्चों को साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करना बच्चों से संबंधित ऐसी महत्वपूर्ण समस्याएँ हैं जिनका समाधान किए जाने की आवश्यकता है।
  • ऐसे बच्चों के लिए जो उपर्युक्त समस्याओं का शिकार हैं, जिला स्तर पर विभिन्न संरक्षण तंत्र विद्यमान है जिनसे ग्राम पंचायत आवश्यकता के समय संपर्क स्थापित कर सकती है।
  • ग्राम पंचायत को विविध भूमिकाएँ निभानी चाहिए जिनमें ग्राम पंचायत क्षेत्र में सभी हितधारकों के संरक्षण और जागरूकता सृजन से लेकर पीड़ित बच्चे को अपनी ओर से अथवा जिला स्तरीय निकायों जैसे बाल कल्याण समिति, पुलिस, जिला बाल संरक्षण इकाई की ओर से संरक्षण प्रदान करने के लिए उपयुक्त स्थितियों पर नजर रखने के कार्य शामिल हैं।
  • ग्राम पंचायत को बाल – हितैषी बनाने के लिए ग्राम पंचायत को वीसीपीसी तथा ग्राम स्तरीय पदाधिकारियों के साथ सहयोग करते हुए कार्य करना चाहिए।
  • गाँव में बच्चों के संरक्षण के लिए अनेक स्कीमें विद्यमान हैं तथा ग्राम पंचायतों के लिए यह आवश्यक है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनका लाभ पात्र लाभार्थियों तक अवश्य पंहुचे।

 

स्त्रोत: पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार

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