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सामाजिक विकास और सहभागी प्रशिक्षण

इस पृष्ठ में पंचायती राज व्यवस्था में प्रशिक्षकों के लिए उपलब्ध कराई गयी मार्गदर्शिका में महत्वपूर्ण सामाजिक विकास और सहभागी प्रशिक्षण की विस्तृत जानकारी दी गयी है।

परिचय

इस भाग में प्रशिक्षकों के लिए कुछ ऐसे विषय रखे गए है जिस पर उनकी खुद की समझ विकसितSamaj हो सकेगी, जिससे की विभिन्न स्तरों पर आयोजित होने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों में  उनका पुनरालोकन कर सके, इसमें मुख्य रूप से भारत में विकास की प्रक्रिया, सहभागिता की प्रक्रिया, विकेंद्रीकृत विकास का अवधारणा, विकेंद्रीकरण के प्रकार, विकेंद्रीकरण का स्वरूप, विकास और समाज, विकास और प्रशिक्षण से कैसे भिन्न है, प्रौढ़ कब और कैसे सीखते हैं, सहभागी प्रशिक्षण में प्रशिक्षक की भूमिका एवं इस संदर्भ में प्रशिक्षक का स्वयं व व्यक्तित्व विकास पर उसकी समझ, व्यक्तिगत विकास और सहभागी प्रशिक्षण।

भारत का विकास

स्वतंत्रता के बाद, भारत में नियोजित विकास का आरंभ प्रथम पंचवर्षीय योजना के साथ सन 1951 में हुआ। देश के नियोजित विकास के लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजना आयोग का गठन हुआ। योजना आयोग को देश के विकास के संबंध में नीतियाँ बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी। तब से लेकर अब तक, देश के विकास की प्रक्रिया में अनेक महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। यह बदलाव विकास की अवधारणा से भी काफी हद तक प्रभावित रहे। भारत में नियोजन एवं विकास की प्रक्रिया को हम मुख्य रूप से निम्न चरणों में विभाजित कर सकते हैं :

चरण

समय

मुख्य बदलाव

प्रथम

1950 से 60

समुदायिक विकास कार्यक्रम का आरंभ एवं कानून एवं व्यवस्था से कल्याण एवं विकास की ओर।

द्वितीय

1960 से 70

पंचायती राज

तृतीय

1970 से 80

विशिष्ट कार्यक्रमों का चरण ब्लॉक स्तरीय नियोजन पर विशेष बल

चतुर्थ

1980 से 90

जिला स्तरीय नियोजन का चरण समन्वित ग्रामीण विकास एवं रोजगार कार्यक्रम।

पंचम

1990 से आज तक

पंचायती राज का पुन: उदय

प्रथम चरण

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि भारत में नियोजित विकास की प्रक्रिया का आरंभ सन 1951 में हुआ।  पहली पंचवर्षीय योजना में सरकार द्वारा केंद्र से सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शुरूआत की गयी। इसमें सैद्धांतिक रूप से सोचा गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का कल्याण एवं आर्थिक विकास जन समुदाय के सहयोग से किया जाए। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण था। समुदायिक विकास कार्यक्रम के साथ साथ उसके एक वर्ष के उपरांत ग्रामीण पुनर्निर्माण का एक अन्य कार्यक्रम राष्ट्रीय प्रसार सेवा के नाम से आरंभ किया गया। यद्यपि यह सामुदायिक विकास कार्यक्रम की तुलना में कम लंबा चौड़ा था किन्तु दोनों के उद्देश्य समान ही थे। इसके साथ ही, सम्पूर्ण देश के विकास के लिए, आर्थिक विकास पर जोर दिया गया । इसके लिए नये – नये उद्योगों की स्थापना की गयी। सोचा गया जब देश की सम्पन्नता बढ़ेगी तब जन सामान्य भी लाभान्वित होगा, किन्तु दोनों की क्षेत्रों में ऐसा भी नहीं हो पाया।

सामुदायिक विकास कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय प्रसार सेवा के कार्यक्रमों के अध्ययन हेतु बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया। दिसंबर, 1957 में इस समिति ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत  करते हुए कहा की असफलता का मुख्य कारण स्थानीय स्तर लोकतंत्रिक जन प्रतिनिधि का अभाव रहा है। समिति के यह भी मत था कि वह कार्यक्रम केंद्र द्वारा निर्धारित किया गया था और इसके लिए आवश्यक संसाधनों का भी अभाव रहा। यह कार्यक्रम पूर्ण रूपेण ऊपर से नीचे की ओर रहा तथा जन सामान्य की भागदारी, कार्यक्रम नियोजन की प्रक्रिया में नगण्य रही है। अफसरशाही का इस संपूर्ण कार्यक्रम पर अत्यधिक बोलबाला रहा। साथ ही इस सम्पूर्ण कार्यक्रम कार्यक्रम में जन- सामान्य की सक्रिय भागदारी के बराबर रही।

समिति का यह भी मत था कि स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक जनप्रतिनिधि संस्थाओं का निर्माण किया जाना चाहिए तथा विकास संबंधी कार्यों को इन संस्थाओं को प्रदत्त कर देना चाहिए। मेहता समिति ने ग्रामीण स्थानीय सरकार के निर्माण के लिए एक त्रि-स्तरीय व्यवस्था की संस्तुति की जो पंचायती राज व्यवस्था के नाम से जानी गई। ये त्रि - स्तरीय हैं –

  • ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत
  • मध्य स्तर पर पंचायत समिति तथा
  • शीर्ष स्तर पर जिला परिषद्।

राष्ट्रीय विकास परिषद् ने जनवरी 1959 में जिला तथा खंड स्तर पर पंचायती राज की स्थापना का अनुमोदन किया किन्तु साथ ही उसने यह सुझाव भी दिया कि प्रत्येक राज्य को राज्य पंचायती राज व्यवस्था का विकास करना चाहिए जो राज्य में विद्यमान विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप हो।

2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान का नागौर जिले तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल  नेहरू द्वारा पंचायती राज व्यवस्था का श्रीगणेश किया गया। इसी दिन आन्ध्र प्रदेश में भी पंचायती राज का शुभारम्भ किया गया। अगले 3-4 वर्षों में देश के अधिकांश राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था लागू कर दी गई।

इस दशक में दो पंचवर्षीय योजनाएँ बनीं। दूसरी पंचवर्षीय योजना में इस बात पर जोर दिया या कि प्रत्येक राज्य एवं जिला, राष्ट्रीय योजना को ध्यान में रखते हुए, अपने क्षेत्र के विकास के संबंध ने योजनाएँ स्वयं बनायें परंतु यह कल्पना मात्र कागजों तक ही समिति रह गयी। इस दिशा में सार्थक प्रयास नहीं किए गए।

दुसरे दशक (1960-70) के आरंभ में जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, देश भर में पंचायती राज संस्थाएँ स्थापित कर दी गयी। पर धीरे- धीरे सारा जोश ठंडा होता चला गया। सारा नियंत्रण सरकार ने अपने हाथों में रखा। इस दशक के अंत तक पंचायतें मृतप्राय सी हो गयी। उनमें से जीवंतता की कल्पना की गयी कि पंचायतें अपने क्षेत्र के विकास की स्कीमें खुद बनाएगी और क्रियान्वित करेंगी वह खत्म हो गयी। उनका मात्र खोल एवं ढाँचा ही बचा रहा। कारणों को जानने के लिए सरकार ने अशोक मेहता समिति का गठन किया गया। सन 1978 अशोक मेहता समिति ने अपने प्रतिवेदन ने कहा कि पंचायतें तीन चरणों से होकर गुजरी हैं :

  • प्रथम चरण – 1959 – 64 – पंचायतों का उदभव एवं विकास
  • द्वितीय चरण – 1965 – 69 – पंचायतों में ठहराव
  • तृतीय चरण – 1969 – 77 – पंचायतों का पतन

अशोक मेहता समिति ने अपना विचार व्यक्त किया कि सन 1959 के पश्चात् लगभग एक दशक तक पंचायती राज की प्रगति की दिशा में भारत सरकार तथा विभिन्न राज्यों द्वारा कदम उठाये जाते रहे, किन्तु इसके पश्चात् पंचायती राज प्रणाली के प्रति जो प्रारंभिक उत्साह था, वह ठंडा पड़ता दिखाई देने लगा। केंद्र में तत्कलीन नेतृत्व के अधीन राज्य सरकारों ने पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत करने के लिए प्रयास किए। फिर भी इस कार्य के प्रति उत्साह मंद पड़ गया। इसके बाद ठहराव का चरण (1965 -69) आया। इस काल दौरान हस्तांतरित योजनाओं और कर्योक्रमों के संदर्भ में भी सरकार द्वारा पर्याप्त वित्तीय सहायता देना बंद कर दिया गया। वैसे स्वयं इन संस्थाओं ने भी अपने संसाधनों में वृद्धि के लिए उत्साह प्रदर्शित नहीं किया। प्रशासकीय और राजनीतिक स्तरों पर भी इन संस्थाओं के कार्यक्रम के प्रति उदासीनता दिखाई देने लगी। यद्यपि पंचायती राज संस्थाओं का एक महत्वपूर्ण ढाँचा अस्तित्व में लाया गया, किन्तु व्यवहार में इसकी प्रभावशाली समिति रही। अंतत: ये संस्थाएँ मरनासन्न हो गई। इस प्रकार 1969 – 77 का कल पंचायत राज संस्थाओं के लिए पतन का काल रहा।

समिति की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश यह थी कि पंचायत राज में द्वि - स्तीरय पद्धति का निर्माण किया जाए। राज्य स्तर से नीचे विकेंद्रीकरण का पहला बिन्दु जिला है जहाँ ग्रामीण विकास के लिए आवश्यक उच्च कोटि का तकनीकी ज्ञान उपलब्ध है। जिला परिषद् के नीचे एक मंडल- पंचायत बनाने का प्रस्ताव किया गया जिससे कई गांवों को मिलकर बनाना था।

अशोक मेहता समिति ने पंचायती राज संस्थाओं को कर लगाने के आवश्यक अधिकार दिए जाने की सिफारिश की। समिति ने सुझाव दिया कि इन संस्थाओं के चुनाव राजनीतिक दलों के आधार पर होने चाहिए।

अन्य प्रक्रियाएं जो इस समय चली उनमें भी एवं प्रभावशाली वर्ग का प्रभुत्व रहा। निर्णय की प्रक्रिया इन पंचायतों में अत्यंत जल्दबाजी की रही। जहाँ पर भी इन पंचायतों द्वारा अपने स्तर पर योजना बनाने के प्रयास किए गए उन योजनाओं के क्रियान्वयन के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार सरकारी अधिकारीयों ने अपने पास रखा। गुजरात और महाराष्ट्र इन राज्यों में स्थानीय स्तर पर योजना निर्माण के संबंध में कुछ सार्थक प्रयास अवश्य हुए। इनमें जिला स्तर पर नियोजन के संबंध में जिला पंचायत को मुख्य जिम्मेदारी सौंपी गयी और सरकारी प्रशासन को इस जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया।

तीसरे चरण की प्रक्रिया में (1970-80) सबसे प्रमुख योगदान चौंथी पंचवर्षीय योजना का रहा। अभी तक राज्य सरकार को जो सभी संसाधन केंद्र सरकार द्वारा अनुदान के रूप में दिए जा रहे थे, उनमें परिवर्तन लाया गया। केंद्र सरकार द्वारा दिए गए संसाधनों में 30 दिए जा रहे थे, उनमें परिवर्तन लाया गया। केंद्र सरकार द्वारा दिए गए संसाधनों में 30 प्रतिशत अनुदान एवं 70 प्रतिशत का समावेश किया गया। अर्थात अब राज्य सरकार को केंद्र से मिलने वाले संसाधनों में 70 प्रतिशत ऋण के रूप में थे जिनको कि वापस भी करना था। अत: अब राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर योजना बनाने की प्रक्रिया को और तेज किया ताकि इन संसाधन का सही ढंग से प्रयोग हो सके। इसके परिणामस्वरूप विशिष्ट कार्यक्रमों का आरंभ हुआ। इनमें से समुदाय के कमजोर वर्गों पर ज्यादा जोर दिया गया। इस दशक में कई सारे विशिष्ट कार्यक्रमों को आरंभ किया गया। उदाहरनार्थ डी. पी. ए. पी., कमांड एरिया विकास कार्यक्रम, जनजातीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम, हिल एरिया डेवलपमेंट कार्यक्रम आदि।

ग्रामीण विकास में अब क्षेत्र विशेष एवं समूह विशेष पर केन्द्रित कार्यक्रमों का बोलबाला रहा। पर इन सब कार्यक्रमों में समन्वय का अभाव रहा। एक ही विकास खंड में अनेक प्रकार के कार्यक्रम लागू किए गए। और, ये सभी कार्यक्रम अलग अगल रहे, इन सभी में समंजस्य नहीं रहा। इसके साथ ही इन कार्यक्रमों के उद्देश्यों एवं परिणामों में भी तालमेल नहीं रहा। अत: यह सोचा गया कि प्रत्येक क्षेत्र मूलभूत आवश्यकताओं का आंकलन किया जाए एवं उस क्षेत्र विशेष में उपलब्ध संसाधनों एवं आवश्यकताओं का आधार पर उस क्षेत्र के विकास की योजना बनायी जाए। इस संपूर्ण प्रक्रिया के लिए विकास खंड का स्तर उचित समझा गया।

ब्लॉक स्तरीय नियोजन पर अधिक स्पष्टता के लिए सरकार द्वारा प्रो. एम्. एल. दांतावाला की अध्यक्षता में वर्किंग स्तर पर नियोजन की प्रक्रिया में अपना सहयोग दें क्यों ब्लॉक स्तर पर इनका अभाव देखने को मिला। इस प्रक्रिया में अन्य संस्थानों के सहयोग पर भी इसने बल दिया। इस ग्रुप ने यह भी माना कि ब्लॉक स्तरीय नियोजन से जन समुदाय की सक्रिय भागीदारी भी हो सकेगी। अत: देश भर में करीब 300 ब्लॉक् स्तरीय योजनाएँ बनी। इससे पहले कि यह प्रक्रिया पूरे देश में लागू हो पाती केंद्र में सरकार बदल गयी। यह घटना सन 1980 की है। नयी सरकार ने उस समय तैयार की गयी छठी पंचवर्षीय योजना (1978-83) के स्थान पर नयी पंचवर्षीय योजना बनायी (1980 – 85) और उसने जिले को नियोजन का आधार माना।

भारत के विकास की प्रक्रिया का चौथा दशक (1980-90) छठी एवं सातवीं पंचवर्षीय भारत के योजनाओं का काल रहा। पूर्व दशकों में जो क्षेत्र एवं समुदाय विशिष्ट कार्यक्रम आरंभ किए गए थे वे जारी रहे और साथ ही कुछ नए कार्यक्रम भी जोड़े गए। सन 1979 में समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम शुरू किया गया। इसमें पूर्व के समुदाय विशिष्ट कार्यक्रमों को एक में मिला दिया गया। सन 1980 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम का आरंभ किया गया। 1983 – 84 में ग्रामीण भूमिहीनों के लिए रोजगार गारंटी योजना शुरू हुई।

साथ ही जिला एवं ब्लॉक स्तर पर नियोजन का मुद्दा भी इस दशक में चर्चा का विषय रहा। गुजरात में इस संबंध में प्रयास आरंभ किए गए। इस प्रक्रिया में जिला योजना बोर्डो का गठन किया गया और उनको लचीले संसाधन, अर्थात्त ऐसे संसाधन जिन्हें वे अपनी आवश्यक्तानुसार खर्च कर सकें, उपलब्ध कराये गए। साथ ही, इन बोर्डो से यह भी अपेक्षा की गयी कि कुछ हद तक अपने संसाधन वे स्वयं जुटाने का प्रयास करें।

इसी समय कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश राज्यों ने अपने यहाँ पंचायतों के सुदृढ़करण हेतु अधिनियम भी बनाए।

जिला स्तरीय नियोजन को प्रभावशाली बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा सन 1982 में प्रो. सी. एच. हनूमंत राव की अध्यक्षता में वर्किंग ग्रुप का गठन किया। इस ग्रुप ने से 1984 में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। प्रतिवेदन में इस ग्रुप ने खा की जिला स्तरीय योजना, जिले के विकास की सम्पूर्ण योजना हो एवं जिले में कार्यन्वित किए जा रहे सभी विकास कार्यक्रमों का समावेश एवं समंजस्य स्थापति करते हुए उसे बनाया जाए। उसको क्रियान्वित करने के लिए सभी आवश्यक ढांचागत एवं वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराये जाए। प्रक्रिया ऐसी हो कि उसमें जन सामान्य की भागीदारी को बढ़ावा मिल सके। स्थानीय आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाए।

क.    जिला स्तरीय नियोजन की सम्पूर्ण जिम्मेदारी जिला पंचायतों की हो

ख.    जिले से प्राप्त योजनाओं को सामेकित करने के लिए एवं उनमें सामंजस्य स्थापित करने के लिए जिला विकास कौंसिल का गठन किया जाए।

ग.     ब्लॉक स्तरीय कार्यालयों का स्तर ऊपर उठाया जाए।

घ.     चूंकि ब्लॉक का  अच्छे नियोजन की दृष्टि से अत्यंत बड़ा है अत: 10-12 गाँव के समूह, जिसे समिति ने मंडल की संज्ञा दी, की योजना बनायी जाए।

ङ.      गाँव के स्तर पर नियोजन हेतु एक इकाई की स्थापना की जाए जिससे कि लोगों की सक्रिय रूप से भागीदारी हो सके।

च.     जिला नियोजन संस्थानों को लचीले वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराये जाने चाहिए जिससे कि वे अपनी आवश्यक्तानुसार उन्हें खर्च कर सकें।

छ.    जिले स्तर पर जिला विकास कमिश्नर का स्थान बनाया जाए और इस महत्वपूर्ण पद पर सीनियर अधिकारी नियुक्ति हो।

ज.    जिला स्तर पर विकास के भिन्न – भिन्न विभागों में सामंजस्य स्थापित किया जाए।

उपरोक्त संस्तुतियों के आधार के पाई राज्यों में प्रयोग किए गए। उनसे मिली सीख के आधार पर अगले दशक में कुछ आवश्यक कदम उठाए गए।

पांचवे दशक (1990 से वर्तमान तक) में आठवीं एवं नवीं पंचवर्षीय योजनाओं की मुख्य भूमिका रही। आठवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार ने स्वीकारा की अभी तक जो उसने विकास की प्रक्रिया अपनाई उससे वांछित परिणाम समाने नहीं आए। बल्कि, लोगों की सरकार पर निर्भरता बढ़ती चली गयी। अब समय आ गया है कि लोग अपने विकास की प्रक्रिया में स्वयं आगे आयें और पहल करें। सरकार मात्र सहायक के रूप में कार्य करें। मुख्य भूमिका जन समुदाय की होनी चाहिए। यह स्वीकार करने के बाद सन 1992 में सरकार ने इस संबंध में स्पष्टता हेतु चिमनभाई पटेल की अध्यक्षता में एक समिति गठित की। समिति ने संस्तुति की इस प्रकार की प्रक्रिया को यदि हमें आगे ले जाना है और उसे मूर्त रूप प्रदान करना है ब्लॉक् स्तर पर या जिले स्तर पर, उसमें जन समुदाय की सक्रिय भागदारी हो।

इस इच्छाशक्ति को दर्शाते हुए सरकार सन 1992 में संविधान में दो संशोधन किए गए। संविधान का तिहत्तरवाँ संशोधन ग्रामीण क्षेत्रों से संबंधित है एवं चौहत्तरवाँ शहरी क्षेत्रों से।

सभागिता का अवधारणा

पृष्ठभूमि

विकास में जन सहभागिता आज का एक प्रमुख मुद्दा बनती जा रही है। बहुत से विकाशील देशों में हुए राजनीतिक बदलाव, अनेक समाजवादी शासनों का ध्वंस, और जन संगठनों का विश्वव्यापी उभार – ये सब एक ऐतिहासिक परिवर्तन की कड़ियाँ हैं कोई अलग – थलग घटनाएँ नहीं। ये सारे बदलाव इस स्पष्ट विश्वव्यापी रूझान के साक्षी है, कि आज लोग, उन घटनाओं और प्रक्रियाओं में सहभागी बनने की अधिकाधिक ललक दर्शा रहे हैं। जो उनके जीवन को दिशा देते हैं। राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संवादों में अब जनता केन्द्रीय मंच की ओर अग्रसर होने लगी है।

अंतराष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तरों पर इस बदलती स्थिति को देखते हुए अब पुरानी अवधारणाओं तथा विकास के ढांचों का संशोधन आवश्यक हो गया है। विकास के केंद्र में जनता होनी चाहिए, न कि इसके विपरीत। विकास ऐसा होना चाहिए जो व्यक्तियों और समूहों को समर्थ बनाए। आज यह सोच दुनिया के आर- पार बड़ी तेजी से उभर कर सामने आ रही है।

सहभागिता यानी जनता की भागीदारी हर जगह विकास संबंधी सोच और व्यवहार को अधिकाधिक प्रभावित कर रही है। इसके साथ ही निचले स्तर से मांग भी उठ रही है कि निर्णय में हम लोगों की हिस्सेदारी होनी चाहिए। अब विकास कार्यक्रमों और परियोजनाओं में निचले स्तर की सहभागिता की जरूरत के समर्थन में एक निश्चित विचार उभरता नजर आ रहा है – और विकासशील देशों में खास तौर पर ऐसा है।  सहभागिता की प्रति इस सरोकार, उसकी मांग और मान्यता को देखते हुए यह समझना आवश्यक है कि सहभागिता अर्थ वास्तव में है क्या? जब निचले स्तर के समुदाय के लोग सहभागिता की मांग उठाते हैं, या कोई खास विकास परियोजना सहभागिता की पेशकश करती है या जब सरकार इसे प्रचारित करती हैं तब क्या सहभागिता का एक ही अर्थ होता है? इसके विविध आयाम क्या है और प्रमाणिक व्यवहार के अर्थ में इसकी व्यवहारिकता क्या है? सहभागिता को अपने आवश्यक अंग के रूप में स्वीकार करने वाली कोई विकास परियोजना/कार्यक्रम क्या इसे सुनिश्चित कर सकते हैं और फिर वांछित परिणाम हासिल कर सकते हैं? सहभागिता के संबंध में ऐसे बहुत – से सवाल विभिन्न कोणों से उठाए जा रहे हैं। अब तक सहभागिता की अवधारणा और इससे तथा इसकी व्यवहारिकता से जुड़े बहुत से महत्वपूर्ण विषयों को समझने की दिशा में राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किए जा चुके हैं।

जहाँ तक विकास का प्रश्न है, इस पर राज्य का विशेषाधिकार बना रहा। सभी समुदायों के लिए तमाम तरह के हस्तक्षेपों पर भी राज्य का एकाधिकार बना रहा। विकास हस्तक्षेप की रणनीति केंद्रीकृत योजनाओं के जरिये अमल में उतारी गई। विकास के संबंध में ऊपर से नीचे की ओर वाला नजरिया अपनाया गया। मुख्य बल आर्थिक संवृद्धि और औद्योगिकीकरण पर दिया गया। यह मान लिया गया कि विकास और संवृद्धि का लाभ अपने आप ही बूँद – बूँद चू कर नीचे के जन समुदाय को हासिल हो जाएगा।

हालाँकि केन्द्रीय योजना दस्तावेजों में जन सहभागिता के महत्व को कम करके नहीं आंका गया है, किन्तु इसे अमल में नहीं लाया जा सका। संवृद्धि – उन्मुख विकास के लाभ नीचे तक नहीं पहुँच पाये क्योंकी विकास के लाभों पर अभिजनों का एकाधिकार बना रहा। गरीबी और निरक्षरता मिटाने, खासकर ग्रामीण युवाओं को रोजगार प्रदान करने का लक्ष्य लेकर चलने वाले विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों का लाभ उन साधन सम्पन्न लोगों को मिला जिनके पास इन्हें हासिल करने की क्षमता थी। गरीब तबका वंचित और निर्धन बना रहा। केंद्रीकृत नियोजित विकास के परिणामों पर हुए बहुत से अध्ययनों से पता चलता है कि अमीर और गरीब के बीच की खाई और चौड़ी हुई है, गरीबों के और गरीब होने और कंगाल होते चले जाने की प्रक्रिया तीव्र हुए है और नगर व ग्राम के बीच का विभाजन और बढ़ा है यह सोच कि विकास बूँद- बूँद चू कर नीचे के जन समुदाय को हासिल हो जाएगा, विफल सिद्ध हुई है। इन सबने नये - नये सामाजिक टकरावों और तनावों को जन्म दिया है। इतना ही नहीं, संसाधनों के वितरण और पूर्नावितरण के लिए जितने भी नीतिगत कदम उठाए गए- जैसे भूमिसुधार और संरक्षणकारी नीतियाँ – उन्हें शक्तिशाली अभिजनों ने रोक दिया। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि संवैधानिक आदेश और सहभागिता की सामूहिक इच्छा को मान्यता और इसे व्यवहार में उतारने के इरादे के बावजूद, भारत में जन भागीदारी वस्तविकता की बजाए सरकारी विचारधारा बनी हुई है। इसे संदर्भ में इन प्रक्रियाओं और शक्तियों की छानबीन करना और उन्हें समझना आवश्यक है जिन्होंने जन -  सहभागिता को अवरूद्ध किया है और गैर सहभागिता को जन्म दिया है।

इधर सहभागिता की धरना को व्यवहार में उतारने का प्रयास करते हुए अपनी रणनीति सूत्रित करने में संलग्न रही हैं। 73वां और 74वां संविधान संशोधन इसके प्रमाण हैं। स्वास्थय, शिक्षा, परिवार कल्याण, ग्रामीण रोजगार और सामाजिक विकास के बहुत से कार्यक्रम जन सहभागिता का अभिन्न अंग रहे हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना में जन सहभागिता के विश्वसनीय अमल पर जोर दिया गया है। इन सरकारी प्रयासों के अलावा, गैर सरकारी स्वयंसंगठन भारत में अधिकाधिक रूप में जन सहभागिता के विचार को आगे बढ़ा रहे स्वतंत्रता के बाद के राज्य – प्रायोजित विकास के दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए भारत और अन्य विकासशील देशों में भी बड़ी संख्या में गैर – सरकारी संगठन सूक्ष्म स्तर पर जन सहभागिता के विचार की पैरवी करने और उसे अमल में लाने का कार्य कर रहे हैं। ये संगठन समुदायों के विकास, लामबंदी और संगठन के उद्देश्य से जन सहभागिता के विचार को आगे बढ़ा रहे हैं। इससे लोग खुद अपने जीवन को रूपायित करने के प्रयास में प्रभावपूर्ण, दक्षतापूर्ण और सार्थक रूप में भागीदार बन सकेंगे।

जन सहभागिता की धारणा कोई अकस्मात तैयार किया गया बौद्धिक शब्द- जाल नहीं हैं, बल्कि इसने समय के साथ- साथ ऐतिहासिक संदर्भ में अपना निश्चय आकार धारण किया है। बहुत ही स्पष्टता से, ऐतिहासिक रूप से, यह पता लगाया जा सकता है कि एक अवधारणा और विकास की रणनीति के रूप में सहभागिता, औद्योगिक क्रांति के बाद की अवधि में, स्थापित विकास रणनीति से गहरे मोह-भंग का परिणाम है। विशेष रूप से छठे और सातवें दशकों अनुभव दर्शाता है कि पेशेवर विशेषज्ञता और आधुनिकीकरण लाने वाले प्रौद्योगिकी पर आधारित, ऊपर से नीचे की ओर अभिमुख, सकल राष्ट्रीय आय और वृद्धि – दर पर ही ध्यान केन्द्रित करने वाले विकास की रणनीति की बुनियादी कमजोरियां क्या - क्या हैं। इस अवधि में जिस विकास रणनीति को अपनाया गया था, उसमें बढ़ते हुए केंद्रीकृत नियोजन के सदंर्भ में जोर, आर्थिक संवृद्धि और औद्योगिकीकरण पर भारत और बहुत से अध्ययन दर्शाते हैं कि अबतक चली आ रही विकास के ढांचे से मोह भंग हो जाने के बाद विभिन्न अन्य रणनीतियां जैसे सामुदायिक विकास समेकित ग्रामीण विकास और आधारभूत जरूरतें विकसित करके अम्ल में उतारी गयी। पर ये रणनीतियां इसे ढांचे की कमजोरियों को दूर करने में विफल रहीं। अस्सी के दशक के माध्यम में इन विकास रणनीतियों से भी मोह भंग हो जाने के बाद एक नई विकास रणनीति के रूप में सहभागिता विचार पैदा हुआ। यह गौरतलब है कि अब, मोटे तौर पर, प्रत्येक विकास रणनीति, योजना या परियोजना में विभिन्न स्तरों पर सहभागिता का तत्व किसी न किसी रूप में रहते हैं।

सहभागिता क्या है?

जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि अलग-अलग लोगों के लिए सहभागिता का अर्थ अलग-अलग होता है। सहभागिता की कई परिभाषाएँ हैं, जिन्हें पढ़ने पर आपको यह भी महसूस होगा कि इस अवधारण तक में काफी बदलाव आया है। क्या बदलाव आया है, यह पता लगाने के लिए आइए दो- तीन परिभाषाओं पर नजर डालें।

  • राष्ट्रीय विकास के लिए चलाए किसी न किसी कार्यक्रम में अपनी इच्छा से जब लोग कुछ न कुछ योगदान करें तो उसे सहभागिता का नाम दिया जाता है। मोटे रूप से सहभागिता है

लोगों में संवेदनशीलता पैदा करना।

संवेदनशीलता के माध्यम से विकास कार्यों के लिए उनमें स्वागत – भाव जगाना और

स्थानीय पहल को प्रोत्साहन देना

  • ग्रामीण विकास के संदर्भ में, सहभागिता में शामिल है

निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में लोगों का भाग लेना

कार्यक्रमों के चलाने में लोगों का शरीक होना

विकास कार्यों से मिले लाभों में हिस्सेदारी लेना

इस तरह के कार्यक्रमों के मूल्यांकन हेतु किए गए प्रयासों में अपना योगदान देना

विकास की पहल में स्थानीय भागीदारों से क्या अपेक्षा होती है?

स्थानीय ज्ञान, कौशल एवं संसाधन अधिक कुशलता पूर्वक उपयोग में लाए जाते हैं।

मिलजुलकर योजना बनाने में विकास की पहल अधिक प्रभावशाली एवं कुशल हो जाती है।

स्थानीय लोग एवं बाहरी लोग समस्याओं, संसाधनों एवं अवसरों के प्रति अपनी जागरूकता को बढ़ाते एवं एक दुसरे के साथ बांटते हैं।

स्थानीय समितियाँ एवं संस्थाएँ बनती है और कालान्तर में आत्मविश्वास बढ़ने के साथ वे अधिक मजबूत तथा सक्षम होती जाती है।

स्थानीय पहल और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित एवं विकसित किया जाता है।

स्थानीय समुदाय अधिक परिपक्व एवं भाई-चारे के भावों से परिपूर्ण होत्ता है। फलत: टकराव की संभावनाओं में कमी आती है।

सहभागिता की प्रक्रिया

सहभागिता बहुआयामी एवं गतिशीलता प्रक्रिया है। यह कई रूप लेती है और योजना चक्र के दौरान बदलती रहती है। समुदाय के हितों एवं आवश्यकताओं के आधार पर देश काल के अनुरूप इसके रूप में बदलाव आता रहता है। विकास की प्रक्रिया में सहभागिता के चार विभिन्न स्तर हैं।

(i) ह्तिभागियों में जानकारी बाँटना

(ii) सलाह मशवरा करना

(iii) निर्णय लेना

(iv) क्रियात्मक पहल करना।

विकेंद्रीकरण

अर्थात एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें सारा कार्य एक जगह से संचालित एवं निर्णित न होकर, अलग - अलग जगहों से संचालित हो, उन्हीं स्तरों पर निर्णय लिए जाए एवं जहाँ तक संभव हो प्रत्येक स्तर पर उठने वाली समस्याओं के समाधान के प्रयास उसी स्तर पर किए जाए। इसका तत्पर्य यह नहीं कि प्रत्येक स्तर अपने मनमाने ढंग से कार्य करें परंतु प्रत्येक स्तर पर अनुशासन हो एवं विभिन्न स्तरों में सामंजस्य

भारत के विकास की प्रक्रिया में अभी तक कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे छाए रहे। जो निम्नवत है:

(i)   हमारे देश में नियोजन का स्तर क्या हो

(ii)   योजना बनाने की प्रक्रिया में लोगों की भागदारी को कैसे सुनिश्चित किया जाए।

(iii) लोकतंत्र शासन की वह पद्धति जिसमें शासन करने वाले जनता द्वारा चुने जाते हैं- को कैसे प्रभावी बनाया जाए, ताकि वह देश के विकास में अपना सक्रिय योगदान दे सके।

(iv) देश में नियोजित विकास को प्रभावी कैसे बनाया जाए।

विकेंद्रीकरण के प्रकार

विकेंद्रीकरण के भी कई प्रकार होते हैं।

  • डिकेन्सन्त्रेष्णन : अर्थात इसमें कार्य करने की जिम्मदारी तो नीचे के स्तर पर दे दी जाती है पर निर्णय लेने का अधिकार ऊपर होता है। इसे प्रशासनिक विकेंद्रीकरण भी कहा जाता है।
  • डेलिगेशन : इस प्रकार के विकेंद्रीकरण में केंद्र सरकार कुछ विशिष्ट कार्य एवं उत्तरदायित्व नीचे के स्तर की किसी एजेंसी या अधिकारी को दे देती है पर जिम्मेदारी केंद्र के पास बनी रहती है। इस प्रकार के विकेंद्रीकरण में यह आवश्यक नहीं है कि वह एजेंसी, जिसे उत्तरदायित्व दिया गया है, केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में हो।
  • डीवोल्यूशन : इसमें कार्यों के साथ – साथ अधिकारों का भी हस्तांतरण होता है। केंद्र सरकार द्वारा नीचे के स्तरों पर शासन एवं प्रशासन हेतु स्वतंत्र इकाईयों का गठन किया जाता है। ये इकाइयाँ अपने स्तरों पर निर्णय लेने में स्वतंत्र होती है पर केंद्र सरकार का अपरोक्ष रूप से नियंत्रण अवश्य रहता है। इसमें इन इकाईयों को अपने विकास की दशा एवं दिशा निर्धारण करने की स्वतंत्रता होती है। अपने स्तर पर वे निर्णय भी ले सकती हैं। बाहरी हस्तक्षेप इसमें न्यूनतम होता हैं।
  • निजीकरण : इसमें कार्यों की जिम्मेदारी निजी संस्थाओं को दे दी जाती है।

सच्चे मायनों में विकेंद्रीकरण

  • नीचे के स्तरों की इकाईयों को विकास के संबंध में जिम्मेदारियों के साथ- साथ अधिकार एवं शक्तियां भी प्रदान की जाएँ। इसके साथ ही आवश्यक वित्तीय संसाधन भी उनको उपलब्ध हो।
  • प्रत्येक स्तर अपनी गतिविधियों के लिए स्वयं जवाबदेह हो
  • प्रत्येक स्तर पर विकास संबंधी नियोजन एवं उसके क्रियान्वयन में स्थानीय जनता की सक्रिय रूप से भागदारी हो।

विकेंद्रीकरण के प्रक्रिया में प्रत्येक स्तर पर इकाईयों जो बनायी जाती हैं वे अपने आप में स्वतंत्र तो हों अर्थात स्वायत्त हो पर साथ ही वे ऊपर के स्तर की इकाईयों द्वारा बनाए  गए नियमों एवं कानूनों के अंदर कार्य करें। उसी तरह से जैसे राज्य सरकार को अपने राज्य के विकास के संबंध में नियम, कानून नीतियाँ आदि बनाने की स्वतंत्रता तो है पर साथ ही वह केंद्रीय नीतियों, कानून एवं संविधान से बंधी हुई भी है यह राष्ट्रीय हित एवं अनुशासन दोनों के लिए आवश्यक है। विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को लागू करने में इसके विभिन्न आयामों को ध्यान में रखना पड़ता है। ये आयाम है:

  • कार्यात्मक स्वायत्ता : अर्थात किस प्रकार के कार्यों को विकेंद्रीकरण किया जाए? कार्यों के साथ - साथ प्रत्येक इकाई को  किस प्रकार की शक्तियाँ प्रदान की जाएँ यह भी ध्यान देना पड़ता है। इन दोनों में सामंजस्य होना आवश्यक है।
  • वित्तीय स्वायतत्ता : से तत्पर्य है कि प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध संसाधनों को आवश्यकतानुसार खर्च करने की स्वंतत्रता। साथ ही साथ इस प्रकार की स्वतंत्रता कि प्रत्येक इकाई अपने स्तर पर स्वयं के लिए संसाधन जुटा सके।
  • प्रशासनिक स्वायतत्ता : अर्थात प्रत्येक स्तर पर कार्य करने के लिए आवश्यक प्रशासनिक व्यवस्था हो और ये सभी अधिकारी उसी स्तर पर लोक प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह हों।

विकास और प्रशिक्षण

विकास एक गतिशील प्रक्रिया है। विकास में समाज के विभिन्न पहलुओं पर परिवर्तन की अपेक्षा होती है। यह पहलु सामाजिक ढांचे को लेकर हो सकते हैं, व्यक्तिगत दृष्टिकोण परिवर्तन संबंधित हो सकते है, तथा सामाजिक सुविधाओं जैसे शिक्षा स्वास्थय आदि की स्थिति में परिवर्तन के भी हो सकते हैं। जब हम सहभागी विकास की बात करते हैं तो उसमें व्यक्ति की समाज में भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। सहभागी विकास में सामाजिक बदलाव में व्यक्ति की भूमिका केंद्र में होती है। व्यक्ति परिवर्तन के लिए पूर्ण रूप से निर्णायक भूमिका निभाता है। वह निर्णय के क्रियान्वयन की भी जिम्मेदारी लेता है व सफलता तथा निराशा दोनों के लिए ही समाज का हर व्यक्ति एक महत्वपूर्ण सहभागी भूमिका निभाता है। यह एक सामूहिक प्रक्रिया है जिसमें सामूहिक रूप से भी सभी व्यक्ति समाज के भलाई के लिए कम करते हैं।

विकास और प्रशिक्षण – समाज के प्रत्येक समाज की भलाई के लिए आगे कैसे आ सकेगा? आज के युग के संदर्भ में व्यक्ति सरकार व बाजार पर इस तरह आश्रित हो गया है कि वह समाज में अपनी भूमिका नहीं खोज पा रहा है। विभिन्न सामाजिक इकाईयों व्यक्ति की सामाजिक पहचान को और सामाजिक भूमिकाओं को प्रत्येक्ष लेन के इए कार्यरत हैं। इसके लिए व्यक्ति के व्यवहार दृष्टिकोण, ज्ञान, तक योग्यता आदि में सकारत्मक परिवर्तन की आवश्यकता है। प्रशिक्षण इस परिवर्तन को पाने का एक रास्ता है। सी उद्देश्य से कुछ एक सामाजिक इकाइयाँ प्रशिक्षणों से जुड़ी हुई हैं।

आज के भौगिलिक करण के दौर में व्यवस्थाएं बहुत तेजी से बदल रही है। सामाजिक, राजनैतिक व बाजारी व्यवस्थाओं तथा समाज में तेजी से परिवर्तन आ रहा है। कहीं तेजी से नई तकनीकें विकसित हुई है तो कहीं ढांचों में परिवर्तन आया है। इसने समाज में कई बदलाव लाये हैं। लेकिन इस दौड़ में एक वर्ग जो कि पहले से ही पिछड़ा और शोषित था, उसको विकास की मुख्य धारा में लाने का सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है उसमें विश्वास पैदा करना ताकि वह अपने आप को इस प्रक्रिया में अपने आप को अलग न महसूस न करे।

विकास के संदर्भ में जब भी प्रशिक्षण की आवश्यकता महसूस होती है तो मुद्दा सिर्फ ज्ञान नहीं होता है। व्यक्ति का दृष्टिकोण, आत्मविश्वास, सामाजिक अवलोकन बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अर्थात सहभागी प्रशिक्षण जिसमें पिछड़े वर्ग की विकास में सहभागिता केन्र में होती है, प्रशिक्षण एक सहकर्ता की भूमिका निभाता है जिसमें वह सीख और सोच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए एक आवश्यक और सुरक्षित माहौल का निर्माण करता है।

अक्सर हम ऐसा मानते हैं कि बहुत एक सहभागी कहलाने वाली पद्धतियाँ जैसे रोल प्ले, छोटे समूह में चर्चा इत्यादि करा लेने से प्रशिक्षण सहभागी हो जाता है। वास्तव में इन पद्धतियाँ से नहीं अपितु पद्धतियों के सही इस्तेमाल और वातावरण के सही निर्माण से प्रशिक्षण सहभागी प्रशिक्षण का दर्जा पाता है।

सहभागी प्रशिक्षण तथा उसकी भूमिका

सहभागी प्रशिक्षण को उसके सामान्य शब्द प्रशिक्षण से अलग देखना होगा। सहभागी प्रशिक्षण ऐसे मूल्यों पर आधारित है जो गरीबों, महिलाओं तथा सीमांत समुदायों के सशक्तिकरण, पारिस्थितिकीय सतत्ता तथा सामाजिक न्याय में विश्वास करता है। सहभागी प्रशिक्षण को हर स्थिति में नहीं किया जा सकता। सहभागी शब्द को किसी भी पद्धति जैसे रोल प्ले, सिमुल्सेशन एवं अन्य रोचक अभ्यासों के समानार्थक समझना एक भूल होगी। कोई भी तरीका किसी भी प्रशिक्षण को सहभागी अथवा असहभागी नहीं बनाता है। सहभागी प्रशिक्षण, प्रशिक्षक के विश्वास पर आधारित होता हैं, जिनका कि सीमांत समूहों की ओर अधिक झुकाव रहता है। सहभागी प्रशिक्षण की जड़ में कुछ मूल्य होते हैं जो कि गरीब लोगों के भविष्य में पुनर्निर्माण के लिए उनकी सहभागिता को केन्द्रित करती है। एक सहभागी प्रशिक्षक किसी जादू से सामाजिक असमानता को नहीं बदलता है। प्रशिक्षक सिर्फ एक शैक्षिणक हस्तक्षेप करता है, जिससे लोग अपनी स्थिति के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं। सहभागी प्रशिक्षण से विवेचनात्मक व विश्लेष्णात्मक सीख की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।

जो एजेंसी/ संस्थाएँ तथा परियोजनाएँ सहभागी प्रशिक्षण प्रक्रिया में विश्वास रखते हैं, वो संगठन सशक्तिकरण, सहभागिता, स्वप्रबंधन, सामुदायिक नियंत्रण तथा सततता जैसे संदर्भों को अपनी विषय समग्री में रखते हैं। वो साधारण लोग जिनके मूलभूत ज्ञान तथा अनुभवों को कई वर्षों तक अवमूल्यित तथा अवैध कर दिया गया हो, उनमें नियंत्रित करने के लिए आत्मविश्वास ही नहीं होता है। उनका खुद पर से विश्वास डिगा हुआ होता है, इसका कारण गरीबों को दी जा रही परम्परागत शिक्षा पद्धति में ढूँढा जाना है। यदि गरीबों को अनजान समझ कर, सिर्फ उन्हें सूचना रुपी ज्ञान प्रदान करना ही हमारी पद्धति है, तो ये कभी भी उन्हें आत्मविश्वास से परिपूर्ण तथा सशक्त नहीं बनाएगी। परंतु, इसका आशय यह नहीं है कि गरीबों को तकनीकी सूचनाएं नहीं देनी चाहिए।

सहभागी प्रशिक्षण की विशेषताएँ

  • यह प्रतिभागी केन्द्रित होता है तथा सीखने वालों की विशिष्ट सीखने की जरूरतों पर आधारित है।
  • इसमें सीखने केवल ज्ञान पर नहीं, बल्कि जागरूकता एवं दक्षता पर भी फोकस करता है। यह सीखने को पूर्ण, विवेचनात्मक एवं उपयोगी बना देता है। इन तीनों चीजों का समिश्रित फोकस, प्रशिक्षण पद्धतियों के चुनाव को जटिल बना देता हैं।
  • प्रतिभागियों के अनुभवों से सीख निकली जाती है। अनुभव आधारित सीख, सहभागी प्रशिक्षण के लिए निर्णायक होती है। सहभागी प्रशिक्षण में एक सीखने के माहौल की आवश्यकता होती है, जहाँ प्रतिभागियों एवं उनके अनुभवों को महत्व दिया जाए तथा प्रतिभागियों को भूलने के लिए मानसिक रूप से सुरक्षित महसूस करना चाहिए। अपने नये विचारों को रहने का प्रयास करना चाहिए तथा अपने अनुभवों को बाँटना चाहिए।
  • जब सहभागिता को महत्व दिया जाता है, तो प्रतिभागी अपने स्वयं के मूल्य को आदर्श बना लेते हैं तथा अपने सीखने की जिम्मेदारी स्वयं ले लेते हैं।
  • क्योंकी सहभागिता सुनिश्चित करना तथा एक सुरक्षित माहौल का निर्माण करना, सहभागी प्रशिक्षण की मुख्य आवश्यकतायें हैं, इसलिए प्रशिक्षकों की भूमिका बहुत निर्णयक हो जाती है। प्रशिक्षण न सिर्फ सहभागी प्रशिक्षण के सिधान्तों में विश्वास करता है, बल्कि उस जरूरत होती है कि वो उन्हें जीवन पद्धति के एक अंग की तरह दर्शाएँ।
  • सहभागी शिक्षण न सिर्फ एक विवेचनात्मक समझ बनाने में मदद करता है बल्कि प्रभावी तंत्र के सही तथा उपयोगी ज्ञान को संयोजित करता है।

सहभागी प्रशिक्षण व परंपरागत प्रशिक्षण में अंतर

विश्व स्तर पर पिछले दो दशकों से प्रशिक्षण को लेकर गहरा अध्ययन हुआ है और धीरे – धीरे प्रशिक्षण की अवधारणा को लेकर संस्थाओं के दृष्टिकोण परिवर्तन आ रहा है। ऐसी सोच विकसित हो रही है जिसका मानना है कि प्रौढ़ों को प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता अपितु उनकी अपनी सीखने की प्रक्रिया से सहज और केन्द्रित किया जा सकता है।

शिक्षा के औपचारिक ढांचे में पढ़ाने वाले ज्ञान का सृजनकर्ता एवं शिक्षा प्राप्त करने वाला ग्राहनकर्ता माना गया। इस प्रक्रिया में ज्ञान को केन्द्रित किया गया एवं इसी ज्ञान को सर्वोपरी माना गया। इस औपचारिक प्रक्रिया में लोकज्ञान व लोक अनुभव का महत्व नहीं माना जाता है। इसमें शिक्षण, ज्ञान, शिक्षा की पद्धति, ढाँचा, तकनीक व शिक्षक केंद्र में रहता है। लेकिन यदि उद्देश्य है लोगों की सीख, सोच और दृष्टिकोण में परिवर्तन, तो वह शिक्षक केन्द्रित पद्धति से नहीं आ सकता है। यह लोक केन्द्रित पद्धति से ही संभव है जिसमें वह अपने ज्ञान व सीख की परख वास्तविक परिस्थितियों में विश्लेष्ण और तक्र के आधार पर कर सकें। अर्थात सहभागी प्रशिक्षण पद्धति में सीखने का केंद्र बिन्दु समाज, सामाजिक इकाई व व्यक्ति होता है और उसका तत्पर्य समाज में परिवर्तन होता है।

सहभागी प्रशिक्षण के आवश्यक तत्व हैं समाज की कमजोर इकाई जैसे गरीब, दलित व महिलाओं का उत्थान हो। यह वर्ग जो कि सदियों से शोषित रहा है और अपनी पहचान खो चुका है ऐसे में पारंपरिक शिक्षण पद्धति जब यह मानकर चलती है कि वह अज्ञानी है और उन पर अपने ज्ञान को लादती है तो नयी सीख नहीं पनपती।

आमतौर पर होने वाले प्रशिक्षण

सहभागी प्रशिक्षण

  • प्रशिक्षण केन्द्रित
  • नियंत्रण प्रशिक्षक के हाथ में
  • मुख्य फोकस ज्ञानवृद्धि व तकनीकी जानकारी देने पर
  • फोकस परफोर्मेस सुधारने पर
  • दक्षता व जानकारी आधारित पद्धतियों का उपयोग
  • पूर्व निर्धारित पाठ्यक्रम पर जोर
  • सहभागी केन्द्रित
  • सीखने वाले नियंत्रण करते हैं।
  • सीखना जानकारी, जागरूकता व दक्षता के स्तर पर
  • व्यवहार में बदलाव पर केन्द्रित
  • अनुभव आधारित सीखने की पद्धतियों का उपयोग
  • प्रौढ़ों के सीखने के सिद्धांतों व सीखने के माहौल बनाने पर जोर

सहभागी सीख की प्रक्रिया

प्रशिक्षण  में सीख

हर प्रशिक्षण का उद्देश्य सीखना होता है और यह सीखने की प्रक्रिया तीन स्तर पर होती है।

सीखने का स्तर

  • ज्ञान
  • जागरूकता
  • दक्षता

जब सीखना तीनों स्तरों में होता है, तब व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आता है। प्रशिक्षण परिवर्तन लेन हेतु किया जाता है और यह परिवर्तन तीन स्तरों पर आ सकता है।

  • व्यक्ति
  • संस्था/समूह
  • समाज

सीखने के तरीके

अलग-अलग व्यक्तियों के सीखने के तरीकों में भी विभिन्नता पायी जाती है। मुख्य रूप से हम निम्नलिखित तरीकों से सीखते हैं:

1. कार्य करते हुए सीखना : कुछ व्यक्ति स्वयं कार्य करते हुए ही प्रभावी रूप से सीख पाते हैं।

2. शोध करके सीखने : ऐसे व्यक्ति प्रत्येक की विषय गहराई तक जाते हैं तथा विश्लेषणों के आधार पर सीख बनाते हैं।

3. नियोजनकर्ता के रूप में : कुछ व्यक्ति नियोजन में काफी दक्ष होते हैं तथा वे नियोजन के दौरन ही सीख बना पाते हैं।

4. कार्य सम्पादक के रूप में : ऐसे व्यक्ति कार्य को कराते हुए प्रभावी सीख बनाते हैं।

हमारे सीखने का तरीका काफी हद तक हमारे कार्यों से भी प्रभावित होता है। इस प्रकार हर एक व्यक्ति का अपना अपना अलग सीखने का तरीका होता है। एक प्रशिक्षक के रूप में हमें इस बात का ध्यान रखना पड़ता है तथा हमें ऐसी पद्धतियों का उपयोग करना होता है जिसमें सभी सहभागी अपने तरीकों से सीख पायें तथा सीखने के तरीकों को भी विकसित कर सकें। एक प्रशिक्षक के रूप में हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम अपना सीखने का तरीका दूसरों पर न लादें।

सीखने के माहौल

प्रौढ़ों का सीखने उचित माहौल में संभव हैं, जिसको बनाने में प्रशिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस माहौल को बनाने हेतु निम्न बिन्दुओं को ध्यान में रखना आवश्यक है :

  • प्रशिक्षण में ऐसी अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करना आवश्यक है जहाँ सीखने वालों तथा उनके अनुभवों एवं विचारों को सम्मान मिले।
  • माहौल में खुलापन हो जहाँ लोग अपनी बात खुलकर रख सकें।
  • सुरक्षित वातावरण हो जहाँ लोग सहज कर सकें।
  • एक दुसरे की भावनाओं की कद्र हो।
  • एक दुसरे कि फीडबैक दे व लें सके।
  • सहयोग की भावना हो।
  • प्रशिक्षक के व्यवहार अनुकूल हो। प्रशिक्षक में अनुकूल माहौल बनाने में प्रशिक्षक की अहम भूमिका होती है।
  • भाषा की समानता हो।
  • कुछ करने के लिए चुनौती हो।
  • समय का पूर्ण उपयोग तथा प्रस्तुत उबाऊ न हो।

उपरोक्त सिद्धन्तों के अनुसार प्रशिक्षक को प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान सहज एवं सुरक्षित वातावरण के निर्माण करना होता है जो की प्रशिक्षक के लिए एक चुनौती होती है। उचित वातावरण निर्माण के लिए प्रशिक्षक को बाहरी तथा आन्तरिक दोनों माहौल को सहज बनाना होता है तभी सीखने – सीखने की प्रक्रिया सुचारू रूप से पाएगी एवं सामूहिक सीख का निर्माण होगा।

सीखने का चक्र

  • अनुभव करना
  • नित्य नये अनुभव
  • जीवन में उतरना
  • विश्लेषण
  • सूत्र निकालना या सीख

लोक प्रशिक्षण

औपचारिक

  • गुरू ज्ञान का भंडार
  • शिष्य अज्ञानी
  • क्या पढ़ना है, कैसे पढ़ना है गुरू तय करते हैं
  • शिक्षक / गुरू केन्द्रित

 

अनौपचारिक

  • अनुभवों से सीखते हैं
  • प्रभावी

प्रशिक्षण

परम्परागत प्रशिक्षण

  • प्रशिक्षक – ज्ञान का भंडार
  • क्या सीखना है, कैसे सीखना है, कैसे सीखना है यह प्रशिक्षक तय करता है
  • प्रशिक्षक केन्द्रित
  • पूर्व निर्धारित पाठ्यक्रम पर जोर
  • फोकस-परफोर्मेंस सुधारने पर

वैकल्पिक प्रशिक्षण

  • अनुभवों को सम्मान
  • क्या सीखना है, कैसे सीखना है यह सहभागी तय करते हैं
  • सीखने तीन स्तर पर होता है
  • फोकस – व्यवहार परिवर्तन पर
  • अनुभवों से सीखने पर फोकस होता है।
  • सहभागी केन्द्रित होता है

सहभागी प्रशिक्षण

प्रौढ़ों में सीखने की प्रवृत्ति

प्रौढ़ों में सीखने की भाव : सहभागी प्रशिक्षण के संदर्भ में यह आधार मानकर चलना चाहिए कि प्रौढ़ों सीख सकते हैं वह बदल सकते हैं और उनका विकास संभव है। यह सच है कि यह कठिन है खासकर यदि हम इसकी तुलना बच्चों से करें। यह समझना बहुत जरूरी है कि प्रौढ़ों के पास उम्र के साथ दर्ज किए बहुत अनुभव हैं अपनी दृष्टिकोण हैं और समाज को देखने की एक नजर है। अर्थात वह तभी सीखेंगे जब उनके अनुभव, उनके दृष्टिकोण का आदर किए जाए। इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि सीख का केंद्र बिन्दु उनकी आवश्यकताओं और रुचि से जुड़ा हो।

ज्ञान चक्र

(i) नयी सीख

(ii) फीडबैक/ अवलोकन

(iii) नये ज्ञान का अभ्यास

(iv) नये ज्ञान का निर्माण

(v) विश्लेषण

  • प्रौढ़ों वही सीखते हैं जो उन्हें रूचिकर लगता है तथा दैनिक जीवन की आवश्यकताओं से जुड़ा होता है।
  • प्रौढ़ों अपने अनुभवों को आधार बनाकर सीखते है।
  • प्रौढ़ों अपने स्वयं के प्रति  एक अवधारणा लेकर आते हैं।
  • प्रौढ़ सुरक्षित, सम्मानजनक व सहयोगी वातावरण में सीखते हैं।
  • प्रौढ़ों के सीखने के अपने – अपने तरीके होते हैं।
  • प्रौढ़ तभी सीखते हैं जब उनके अनुभवों व विचारों को यथोचित महत्व व सम्मान मिलता है।

महिला प्रौढ़ों के सीखने के कुछ खास सिद्धांतों होते हैं –

  • महिला प्रौढ़ों के लिए अवसर मूल्यवान होते हैं अत: वे इसका पूरा लाभ उठाना चाहती हैं।
  • महिला प्रौढ़ भावनात्मक स्तर पर ज्यादा सीखती हैं।
  • अपनी पारिवारिक व व्यक्तिगत चिंताओं से मुक्त रहकर ज्यादा सीखती हैं।
  • पद्धतियों का चयन, सीखने में ऐसे तरीकों का उपयोग जो उन्हें जोड़ सके आदि महिला प्रौढ़ के सीखने की प्रक्रिया भूमिका अदा करते हैं।
  • व्यक्तिगत उदाहरणों से ज्यादा सीखती हैं।

सहभागी प्रशिक्षण की भूमिका

प्रशिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए अर्थात्त प्रशिक्षण के आधार पर  नये ज्ञान व परिवर्तित व्यवहार के निर्माण के लिए, सहभागी प्रशिक्षण में प्रशिक्षण की भूमिका महत्वपूर्ण है।नवह सीखने वालों की क्षमता खासतौर से विश्लेषण क्षमता और नयी सीख के लिए तैयारी बनाने की एक चुनौतीपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। वह एक समय में अनेक भूमिकाओं को निभाता है और प्रशिक्षणार्थियों को हमेशा सीख के लिए अग्रसर करता है। प्रशिक्षक की मुख्य जवाबदरियां निम्न हो सकती है :-

1. प्रशिक्षण नियोजन व डिजाइनर की भूमिका

2. प्रशिक्षक प्रबंधक की भूमिका

3. सहजकर्ता की भूमिका

4. प्रशिक्षक व नयी जानकारी प्रदर्शित करने की भूमिका

5. मित्र की भूमिका

6. स्वयं को एक प्रशीक्षार्थी के रूप में देखने की भी भूमिका

प्रशिक्षण एक जटिल प्रक्रिया है और प्रशिक्षक इस जटिल प्रक्रिया को संचालित करता है। इसके लिए वह स्थितयों का विश्लेषण करता है लोक ज्ञान को प्रत्यक्ष होने के वातावरण का निर्माण करता है। प्रशिक्षार्थियों की क्षमताओं को विकसित करता है यह क्षमताएँ उसकी ज्ञान, जागरूकता और दक्षता के आधार पर बांटी जा सकती है। प्रशिक्षक की भूमिका प्रशिक्षण के आरंभ से पहले ही शुरू हो जाती है व प्रशिक्षण की समाप्ति के बाद तक चलती हैं।

प्रशिक्षक की भूमिकाओं को तीन अंगों में बाँटा जा सकता है।

1.

प्रशिक्षण से पहले

  • डिजाइनर की भूमिका अर्थात रूपरेखा बनाने वाले की,
  • व्यवस्थापक की,
  • प्रशिक्षक के स्वयं की तैयारी

2.

 

प्रशिक्षण के दौरान

रायदाता की भूमिका जहाँ व्यक्ति को या पूरे समूह को विभिन्न मुद्दों पर राय देने का कार्य करना होता, प्रबंधक की भूमिका, फैसिलिटेटर की भूमिका सीखने- सिखाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद करने का कार्य, निर्देशक की भूमिका अर्थात आवश्यकतानुसार समूह को अथवा व्यक्तियों को आवश्यक निर्देश देने का कार्य करना, मूल्यांकन कर्त्ता की भूमिका, रिकार्डर की भूमिका प्रक्षिक्षण के दौरान हो रही चर्चा को नोट करने का कार्य, संचारकर्ता के रूप में

3.

प्राशिक्षण के बाद

प्रबंधन, रिकार्डिंग, रिपोर्टिंग इत्यादि

प्रशिक्षक की भूमिका

प्रशिक्षण डिजाइनर और नियोजक

  • सीख के बिंदूओं को प्रेषित करना और उसके आधार पर प्रशिक्षण के उद्देश्य निर्धारित करना।
  • प्रशिक्षण हेतु योजना की रणनीति बनाना।
  • प्रशिक्षण के विषय वस्तु तैयार करना तथा उनको एक नियोजित तरीके से क्रमबद्ध करना और उपयुक्त विधि का चयन करना
  • आवश्यकतानुसार संदर्भ व्यक्ति का चयन करना
  • प्रशिक्षण सामग्री को तैयार करना

प्रबंधक

  • प्रशिक्षण की जिम्मेदारियों का बंटवारा
  • वित्तीय प्रबंधन
  • दिवस और स्थान का चयन इसके साथ और अन्य प्रकार के भौतिक संसाधनों की तैयारी।
  • चयनित स्थान पर सुविधाओं का अवलोकन करना।
  • सभी सुविधाओं का परस्पर संबंध स्थापित करना।
  • प्रशिक्षार्थी से प्रशिक्षण के बाद भी सम्पक स्थापित रखना तथा उनको रिपोर्ट आदि भेजना।
  • आपात स्थिति जैसे बीमारी, दुर्घटना से निपटना।

सहजकर्ता

  • समूह प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाना व उन पर नियंत्रण रखना।
  • समूह व समूह के प्रत्येक को प्रोत्साहित और प्रेरित करना।
  • सीखने के वातावरण का निर्माण करना।
  • समूह में चर्चाओं को आरंभ करना व केन्द्रित करना।
  • प्रशिक्षार्थियों को हर प्रकार से प्रोत्साहित करना जिससे वे अपनी क्षमताओं के अनुसार काम कर सकें।

शिक्षक

  • नयी जानकारियाँ तथा तथ्यों को समझाना।
  • जानकारी व अनुभवों के आधार पर नया आधार बनाना।
  • सीख की प्रक्रिया को क्रमबद्ध तरीकों से बांधना।
  • विभिन्न पद्धातियां जैसे रोल प्ले, चर्चा, सिमुलेशन इत्यादि को संपादित करना।
  • प्रशिक्षण के नये संसाधनों जैसे वीडियो कैमरा, टेप, फ्लेश कार्ड इत्यादि को सही तरीके से इस्तेमाल करना।

सहभागी

  • प्रशिक्षार्थियों से बराबर संपर्क में रहना। उनके विचारों, कठिनाइयों, खुशी एवं निराशाओं में उनकी मदद करना।
  • अपने अनुभवों को उनमें बाँटना।
  • मित्रतापूर्ण व्यवहार से वातावरण को सहज बनाना।

प्रशिक्षार्थी

  • समूह के अनुभव के आधार पर स्वयं के सीखने की तैयारी रखना
  • दूसरों के दृष्टिकोण और सोच को समझना।
  • दूसरों के अनुभवों से सीखना।
  • समूह के द्वारा बनाये गए सीखने के ढांचों को ग्रहण करना।

प्रशिक्षक के स्वयं का विकास

अगर हम अपने आपको एक प्रभावशाली कार्यकर्ता के रूप में विकसित करना चाहते हैं तो हमें अपने स्वयं को विकसित करना होगा। हम सभी को जिन्दगी में कुछ बुनियादी प्रश्न उठाते हैं, जैसे- मैं कौन हूँ। मुझे दूसरे लोग किस प्रकार देखते हैं? मेरा अस्तित्व क्यों है? मैं क्या करना चाहता हूँ? आदि - आदि विभिन्न धर्म व संप्रदाय के लोग स्वयं को खोजने के लिए अनके रास्ते अपनाते हैं।

स्वयं क्या है?

किसी भी व्यक्ति का स्वयं खुद व्यक्ति में अंतर्निहित होता है।  यह व्यक्ति के आन्तरिक आवरण जैसे – उसकी सोच, विचार, दृष्टिकोण, मूल्य, ज्ञान, भावना, व्यवहार, संवदेनशीलता, क्षमता, दक्षता आदि का मिला-जुला सम्मिश्रण है। हर व्यक्ति की अपने बारे में एक खास अवधारणा (राय) होती है। वह अवधारणा घनात्मक हो सकती है जब वह अपने को योग्य, ज्ञानी, क्षमतावान, आदि मानता है। यह नकारात्मक भी हो सकती है जब व्यक्ति अपने को कमजोर, असमर्थ, अयोग्य, अज्ञानी, आदि समझने लगता है। ऐसी सोच अक्सर गरीब और शोषित लोगों में आमतौर पर पायी जाती है। उनके बीच करते हुए अनुभव करते हैं कि वे अपने-आपको किसी भी काम के योग्य नहीं मानते। ये उनके स्वयं की नकारात्मक पहलू हैं जो उनके अंदर बचपन से ही घर कर चुके होते हैं। कई बार हमें ऐसे भी लोग मिलते हैं जो अपने आपको बहुत बढ़ा-चढ़ा कर मानते हैं। कई व्यक्ति अपनी स्वयं अवधारणा के बारे में संतुलित एवं प्रैक्टिकल होते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण बात यह है कि हर व्यक्ति को अपनी स्वयं की अवधारणा को पहचानना चाहिए।

स्वयं को विकास

अगर उपरोक्त स्वयं है, तो स्वयं विकास क्या है? अपने आपको ज्ञान, भावना और व्यवहार के स्तर पर परखना एवं उसका विस्तार करना ही स्वयं विकास है। यदि हमें अपने बारे में मालूम करना है कि हमारे सोच नकारात्मक है तो उसे सकारात्मक करने की जरूरत है। कई बार हम बहुत कुछ जानते हैं पर उसे महसूस नहीं कर पाते हैं अर्थात भावनात्मक स्तर पर उसे समझा नहीं पाते हैं। हमें पता है कि आग से हाथ चलता है लेकिन हाथ जलने से कितना दर्द होता है यह वह ही महसूस कर सकता है जिसका कभी हाथ जला हो। आग से हाथ जलने से ज्ञान होना एक बात है। हाथ जलने से दर्द का एहसास होना और बात है। यदि व्यक्ति को केवल यह पता है कि आग से हाथ जलता है लेकिन इससे होने वाले दर्द को उसने कभी अनुभव नहीं किया है तो उसे दूसरों के हाथ जलने को एहसास नहीं हो सकता है। किसी भी चीज का एहसास होना ही भावना आधारित स्वयं को जन्म देता है। इन दोनों के तालमेल से हमारे अंदर जागरूकता पैदा होती है और यह जागरूकता हमारे व्यवहार में परिवर्तन लाने हेतु बाधित करता है।

उक्त तीनों आयामों में समंजस्य से ही स्वयं का विकास होता है। इन तीनों आयामों में सामंजस्य विकसित करने हेतु स्वयं में खुलापन लाना बहुत जरूरी है। स्वयं का खुलाप तात्पर्य यह है कि हम खुद अपने बारे में गहराई से जानें तथा दुसरे भी हमें अधिक से अधिक जानें। इसके लिए आत्म चिंतन करना, दूसरों से अपने बारे में पूछना तथा दूसरों को अपने बारे में बताना अत्यंत जरूरी होता है।

सहभागी प्रशिक्षण में प्रशिक्षक की भूमिका ढर्रावादी प्रक्षिक्षण से कही अधिक महत्वपूर्ण है। इसमें प्रशिक्षक को अधिक ज्ञानी, क्षमतावान, जागरूक व रचनात्मक होने की आवश्यकता है। इसके लिए प्रशिक्षक को अपने आप नीतिबद्ध तरीके से तैयार करने की आवश्यकता है। प्रशिक्षक की तैयारी करने की आवश्यकता है। प्रशिक्षक की तैयारी के लिए मुख्य बिन्दु निम्न लिखित हैं-

1. उसके ज्ञान से संबंधित

2. उसकी विश्लेषण क्षमता संबंधित जिससे वह एक अच्छे सहजकर्ता की भूमिका निभा सके।

3. उसके व्यक्तित्व और स्वयं के विकास से संबंधित।

प्रशिक्षक के रोप में स्वयं पर समझ विकसित करना महत्वपूर्ण है। स्वयं क्या है यह व्यक्ति के व्यक्तित्व, विचार, दृष्टिकोण, अनुभव, चेतन व अचेतन दोनों क ओ ही लेकर परिभाषित होता है। यह व्यक्ति में अंतर्निहित होता है। पिछले कई दशकों में मनोवैज्ञानिक व दर्शन शास्त्रियों ने स्वयं पर गहन अध्ययन किया है और इस बारे में कई वैज्ञानिक तथ्यों को विश्लेषण किया है। किसी भी व्यक्ति की स्वयं पर समझ उसके प्रशिक्षण पर गहरा प्रभाव डाल सकती है। जैसे कि-

अ. स्वयं को समझने की प्रक्रिया में ही दूसरों को समझने की प्रक्रिया निहित है।

किसी भी व्यक्ति में कुछ अपनी खूबियाँ और कमजोरियां होती है। कुछ चीजें उसकों प्रोत्साहित करती हैं रो कुछ परिस्थितियाँ विपरीत दिशा में ले जाती है। हर परिस्थिति में उसका व्यवहार भिन्न हो जाता है। अपने स्वयं की अच्छी समझ से ही वह प्रशीक्षार्थी के भी स्वयं को समझ सकता है।

ब. अपने व दूसरों के स्वयं को आदर देना

प्रशिक्षक अपने स्वयं को भली भांति समझकर खुद को आदर दे, तो उसके लिए सरल हो जाता है कि वह प्रशीक्षार्थी के स्वयं को भी आदर दे सके।

स. स्वयं को एक मॉडल के रूप में विकसित करना

प्रशिक्षक के व्यक्तित्व, दृष्टिकोण, सोच, व्यवहार प्रशिक्षार्थी पर गहरी छाप छोड़ती है। अत: यह जरूरी होता है कि प्रशिक्षक अपने व्यवहार व आचारण को समझे और कोशिश करें कि प्रशिक्षण की प्रक्रिया में वह एक आर्दश रूप प्रस्तुत कर सके।

व्यक्ति के स्वयं निम्नलिखित तीन बिन्दुओं पर आधारित हैं –

1. ज्ञान आधारित

2. भावना आधारित

3. व्यवहार आधारित

अर्थ यह है की हमारे आचारण में इन तीनों बिन्दुओं में समानता नजर आनी चाहिए अर्थात हम ज्ञान के आधार पर जो कह रहे हैं वह नही भावनाओं के आधार पर दर्शित होना चाहिए और हमारे व्यवहार में दिखना चाहिए। इन बिन्दुओं में विरोधाभास नजर आने से प्रशिक्षक की भूमिका कमजोर पड़ जाती है। जैसा कि हम जानते हैं कि माँ अपने बच्चे को प्यार करती है यह बिन्दु उसकी भावनाओं और व्यवहार सभी से प्रेषित होते हैं। यदि हम प्रशिक्षण में पिछड़े वर्गों के उत्थान की बात करते हैं और हमारे व्यवहार में विरोधाभास होगा तो, ज्ञान के आधार पर कितनी भी महत्वपूर्ण बातें कहें लोगों की नयी सीख विकसित करना अंसभव होगा। अत: प्रशिक्षक का स्वयं बहुत महत्वपूर्ण है और एक अच्छे प्रशिक्षक के लिए आवश्यक है कि वह निरंतर स्वयं का विकास करें।

प्रशिक्षक के लिए स्वयं का विकास

जोहरी खिड़की स्वयं को समझने के लिए एक कारगार स्वयं विकास का अर्थ स्वयं का खुला और लचीला होना भी है। खुलापन का यह गुण प्रशिक्षक होने के नाते तो महत्वपूर्ण है ही पर वैसे भी जीवन में हर व्यक्ति के लिए यह महत्वपूर्ण है। यह स्वयं भी उन व्यक्तियों को पसंद करते हैं, जो खुलापन रखते हैं और जिनका व्यक्तित्व खुला होता है न कि बातों को छुपाकर रखने वाला। इसलिए स्वयं – विकास में खुलापन विकसित करना एक चुनौती है, क्योंकी इसको विकसित करने के लिए यह आवश्यक है कि आप दूसरों द्वारा शोषित न हों व दूसरा आपके खुलापन का नाजायज फायदा न उठाए।

एक ढाँचा जिसको अपने स्वयं को समझने में उपयोग किया जाता है, नीचे दिया जा रहा है। इसे जोहरी खिड़की कहते हैं। इसके द्वारा स्वयं को पहचानने में सहायता मिलती है।

जोहरी खिड़की

खुला स्वयं

  • मैं जानता हूँ

अँधा स्वयं

  • नहीं जानता हूँ
  • दूसरों से पूछना पड़ेगा (फीडबैक)

छिपा स्वयं

  • दुसरे नहीं जानते हैं
  • दूसरों को बताना पड़ेगा  (अभिव्यक्ति)

अनखोजा स्वयं

इस मॉडल में स्वयं का पहला हिस्सा वह है जिससे खुला स्वयं कहते हैं। यह वह भाग है जिसे व्यक्ति और उसके साथ सभी जानते हैं। दूसरा हिस्सा जिसे छिपा स्वयं कहते हैं, व्यक्ति के स्वयं का  वह हिस्सा है जिसे व्यक्ति तो जनता है परंतु दुसरे लोग नहीं जानते। स्वयं का तीसरा हिस्सा अंधा स्वयं है। इसे दुसरे जानते हैं, परंतु व्यक्ति स्वयं हिन् जनता। अंत में चौथा भाग ऐसे स्वयं का है, जिसे न तो व्यक्ति स्वयं ही जानता है और न ही दूसरे। जोहारी खिड़की द्वारा स्वयं के ये चार भाग समझने से स्वयं विकास प्रक्रिया को समझने मदद मिलती है।

व्यक्ति जिस हिस्से को जानता है वही उसकी स्वयं संकल्पना होती है और उसी के आधार पर वह व्यवहार करता है। दूसरे व्यक्ति जिस स्वयं को जानते हैं उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं। उनके लिए यही उस व्यक्ति का स्वयं है। पर ये दोनों स्वयं बिल्कुल एकरूप नहीं होते और इसलिए मुश्किलें पैदा हो जाती है। किसी भी नजदीक और आपसी संबंध को बनाने के लिए खुद स्वयं को विकसित करना आवश्यक है। हम कुछ लोगों से खुले रहते हैं और कुछ के साथ नहीं। जब हम अपने बारे में दूसरों को बताते हैं तब हम उनके नजदीक आते है। यह बताना ही स्वयं – अभिव्यक्ति कहलाता है। दूसरों के नजदीक आने का यही तरीका है और इसी तरीके से हम विभिन्न लोगों से विभिन्न स्तर पर खुलते हैं।

खुले स्वयं को विकसित करने का अन्य तरीका या छिपा स्वयं को कम करने का तरीका यह भी है, कि व्यक्ति को अपने बारे में दूसरों के विचार जानने की कोशिश करनी चाहिए। यह तभी संभव है जब वह व्यक्ति स्वयं अपने बारे में जानने को तैयार हो। इसी प्रक्रिया को फीडबैक कहते हैं।

स्वयं की अभिव्यक्ति और फीडबैक की प्रक्रियाएं ज्यादातर एक साथ चाहित है, और दो लोगों के बीच में तालमेल से ही चलती है। इन दोनों प्रक्रियाओं को समझना और प्रयोग करना स्वयं- विकास के लिए अत्यंत जरूरी है।

जैसा कि हम जोहरी खिड़की में देखते हैं कि हमारे स्वयं का कुछ ही हिस्सा हमको और दूसरों को स्पष्ट होता है अत: एक अच्छा प्रशिक्षक होने के लिए हमें फीडबैक के माध्यम से यह प्रयास करते रहना चाहिए कि हमारा खुला स्वयं सबसे अधिक हो और हमारे नियंत्रण में हो। अनखोजे स्वयं और अंधे स्वयं को कम करने के लिए फीडबैक एक बहुत अच्छा तरीका है।

फीडबैक

फीडबैक एक प्रकार की मदद है। यह व्यक्ति को अपना व्यवहार और सोच में तालमेल स्थापित करने में मदद करता है।

फीडबैक लेने के सिद्धांत

फीडबैक देने के सिद्धांत

  • फीडबैक स्वयं के बारे में समझ विकसित करने के लिए बहुत उपयोगी है अत: स्वयं प्रयास करके विश्वस्त लोगों से मांगना चाहिए।
  • यह माइंड स्टडींग माइंड अर्थात दुसरे की हमारे बारे में समझ एक आयना के समान होती है जिसमें हम दुसरे के दृष्टिकोण से अपने बारे में समझ सकते हैं। इसके लिए फीडबैक लेने में एक खुलापन होना चाहिए।
  • फीडबैक को किसने और क्यों दिया, या फिर भविष्य में किसी प्रकार की बदले की भावना से नहीं देखना चाहिए।
  • यदि किसी फीडबैक से बिल्कुल संतुष्टि न हो तो स्पष्ट कर लेना चाहिए तथा उसको अस्वीकार भी किया जा सकता है।
  • फीडबैक सदैव स्पष्ट और विशिष्ट होना चाहिए। आंकड़ो व उदहारण के साथ देना चाहिए, ताकि व्यक्ति सही प्रकार से उसका विश्लेषण कर सके।
  • फीडबैक देने या लेने में व्यक्ति के बारे में अपनी नीयत को आड़े नहीं आने दें और इसमें व्यक्ति का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।
  • सृजनात्मक होना चाहिए।
  • समय पर दिया जाना चाहिए।
  • लोगों की समझ बनानी चाहिए।
  • सहयोगात्मक एवं रचनात्मक होना चाहिए।

व्यक्तित्व विकास और सहभागी प्रशिक्षण

व्यक्तित्व क्या है? हम लोग व्यक्तित्व शब्द का इस्तेमाल लोगों में कुछ खास लक्षण दर्शाने के लिए करते हैं। कुछ मायने में प्रत्येक विशिष्ट है। व्यक्ति के हाव-भाव, बोलचाल, चलने का तरीका, उसका प्रत्यक्ष रूप उसके व्यक्तित्व का हिस्सा होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की यह सामान्यता और विशिष्टता ही व्यक्तित्व के समझ को महत्वपूर्ण बनाते हैं।

व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके विचार, सोच, व्यवहार, दृष्टिकोण, मूल्यों, व्यवहार, शारीरिक बनावट, पहनावा, वेशभूषा, आदि सम्मिश्रण है। वास्तविकता में इसका अर्थ यह है कि कोई भी व्यक्ति किसी बिशेष परिस्थिति के कैसे समझता है और उसमें कैसे प्रतिक्रिया करता है, या खास तरह से कैसे व्यवहार करता है यह उसके व्यक्तित्व को दर्शाता है। समान परिस्थिति में अलग-अलग रूप से प्रतिक्रिया करता है या खास तरह से कैसे व्यवहार करता है यह उसके व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। कोई मनोवैज्ञानिकों ने जिसमें से फ्रायड, मास्लों तथा एरिक्सन इत्यादि प्रमुख इत्यादि प्रमुख हैं व्यक्तित्व निर्माण पर गहरी समझ विकसित की है।

फ्रायड (इड, ईगो और सुपर ईगो)

फ्रायड ने व्यक्तित्व के तीन प्रमुख मानसिक उपकरण इड, ईगो और सुपर ईगो का उल्लेख किया। ये तीनों मस्तिष्क द्वारा किए जाने वाले कर्यों को निर्देशित करते है। इनके मुताबिक व्यक्ति में व्यक्तित्व के आयाम इन्हीं तीन उपकरणों के इर्द- गिर्द बचपन से ही जुड़ना शुरू हो जाते हैं।

  • इड : मस्तिष्क में इड का काम अत्यधिक सूख एवं आनंद पाने वाली क्रियाओं को बढ़ावा देना है और उन्हें पाने की इच्छा प्रकट करना है। यह आमतौर पर देखा जा सकता है कि बच्चा सूख की प्राप्ति और कष्ट से दूर रहना चाहता है।
  • ईगो : ईगो का कार्य इड की इच्छाओं एवं वास्तविकताओं के बीच सामंजस्य बनाये रखना है। जब बच्चा किशोरावस्था में पहूंचता है तो सामाजिक पहलुओं को समझने लगता है, उसका विश्लेषण करता है और उसके आधार पर व्यवहार करता है।
  • सुपर ईगो: इसका काम इड और ईगो द्वारा किए गए कार्यों का पुरस्कार या सजा देना है। इसका तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के कुछ मूल्य स्थापित हो जाते हैं और वह सही और गलत में फक्र समझने लगता है।

फ्रायड के अनुसार किसी भी व्यक्तित्व के तीन आयाम या चरण होते हैं जिसे इड ईगो और सुपर ईगो कहते हैं। बचपन की अवस्था में बच्चों में सूख एवं आनंद की इच्छा अधिक होती है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता ई, उसमें सामाजिक मूल्यों एवं मन- मर्यादा की समझ होने लगती है बचपन से बतायी गयी वे साडी नसीहत – ये करो, ये न करो ऐसा करो, ऐसा न करो, यही सही है ये गलत है, आदि एक तरह से सामाजिक मूल्यों को स्थापित करता है अर्थात सुपर – ईगो हावी हो जाता है फ्रायड के अनुसार इन्हीं तीन पहलुओं के इर्द – गिर्द व्यक्ति का व्यवहार होता है जो उसके व्यक्तित्व को दर्शाता है। मास्लो के सिद्धांत के आधार पर मानवीय आवश्यकताएं व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है। यह आवश्यकताएं है भौतिक आवश्यकता, सुरक्षा, सामाजिक पहचान, आत्म सम्मान एवं आत्म संतुष्टि। एरिक्सन मॉडल के आधार पर व्यक्तित्व निर्माण एक निरंतर चलने वली प्रक्रिया है और मोटे तौर पर इसे आठ चरणों में बाँटा जा सकता है। यह चरण व्यक्ति के जन्म से लेकर उसके जीवन चक्र से साथ चलते है और उम्र में अलग – अलग अनुभव व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं।

व्यक्ति का व्यक्तित्व कैसे बनता है और किसी विशेष परिस्थिति में वह कैसा  करता है, यह समझना हमारे लिए कई कारणों से जरूरी हो जाता है।

क. यह हमें अपने - आप को और व्यक्तित्व को समझने में मदद देता है।

ख. यह हमें लोग और समूह किसी खास परिस्थिति में कैसे प्रतिक्रिया करते हैं, यह समझने में मदद करता है।

ग. यह हमें अपने व्यवहार और प्रतिक्रियाओं को और अच्छी तरह से समझने में मदद देता है, और

घ. यह हमें अपने दृष्टिकोण से अपने व्यक्तित्व का विकास करने में सहायक होता है।

अत: एक फैसिलिटेटर/सह्जकर्ता होने के नाते व्यक्तित्व की समझ की संकल्पना और इसका विकास हमारे लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

व्यक्तित्व कैसे बनता है

हमारा आज का व्यक्तित्व हमारे तमाम पुराने अनुभवों का मिला - जिला सम्मिश्रण है। बचपन से दूसरों ने हमें कैसे प्रभावित किया और हम कैसे अपने परिवेश में व्यवहार करते आये हैं, यह मिल-जुलकर हमारे आज का व्यक्तित्व बनाता है। माहौल का व्यक्तित्व को बनाने में कितना प्रभाव पड़ता है, इस पर काफी चर्चा होती आयी है, और यह स्पष्ट है की हम जिस वातावरण में पैदा हुए, बचपन से जिसमें बड़े हुए और विकसित हुए, उसका हमारे व्यक्तित्व को बनाने में काफी प्रभाव रहता है। फिर भी व्यक्तित्व के आधार पर व्यवहार करता है। अत: व्यक्तित्व दो तरह की प्रक्रियाओं का मिला-जुला परिणाम है। एक तो वह जिसमें व्यक्ति को उसके वातावरण ने और उस वातावरण में महत्वपूर्ण दूसरे लोगों ने जैसे कि माँ-बाप, शिक्षक इत्यादि ने प्रभावित किया और दूसरा स्वयं व्यक्ति ने अपने वातावरण को प्रभावित करने के लिए किस तरह से व्यवहार किया। इस तरह से देखें, तो व्यक्तित्व बाहरी प्रभावों और अंदरूनी पहल का मिला-जुला परिणाम है।

 

स्त्रोत: राज्य ग्रामीण विकास संस्थान, झारखंड सरकार

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