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पंचायत की सामाजिक भूमिकाएं

इस पृष्ठ में बिहार राज्य में पंचायत की सामाजिक भूमिकाएं एवं उसके कार्यों की जानकारी दी गयी है।

परिचय

पंचायत की शुरुआत एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में ही हुई थी।अतः इसके सारे कार्यकलापों की कसौटी एवं मापदंड का आधार यह है कि यह सामाजिक रूप से कितनी प्रासंगिक है? इसलिए यदि यह कहा जाए कि पंचायत की सारी भूमिकाएं  सामाजिक भूमिकाएं हैं तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।

फिर भी, वास्तव में केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा संपोषित योजनाओं के क्रियान्वयन में पंचायतें इतनी उलझ गयी हिं कि उनकी सामजिक भूमिकाओं की अलग में चर्चा करना जरूरी हो गया है।

पंचायत की सामाजिक भूमिकाएं मूलतः पंचायत के क्षेत्र में अवस्थित मानवीय पूजी को संपोषित करते हुए उस क्षेत्र के सामजिक जीवन को स्वस्थ एवं स्वच्छ बनाने से सम्बन्धित हैं।स्वच्छता, स्वास्थ्य एवं पोषण, शिक्षा, तथा महिला एवं बाल कल्याण – ये चार ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें पंचायत को प्रभावी पहल लेनी है। इन चारो क्षेत्रों में केंद्र और राज्य सरकार द्वारा संपोषित योजनाओं के अलावा यूनिसेफ ने भी व्यापक स्तर  हस्तक्षेप किया है। इन योजनाओं/स्कीमों की सफलता भी बहुत कुछ पंचायतों पर ही निर्भर करती है।पंचायतों को इसके लिए पर्याप्त सहयोग-समर्थन देना जरूरी है।ऐसा करने के लिए पंचायतें अधिनियम द्वारा अधिकृत भी हैं।

स्वच्छता, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा महिला एवं बाल कल्याण- ये चार ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें पंचायत को प्रभावी पहल लेनी है।इन चारों क्षेत्रों में केद्र और राज्य सरकार द्वारा संपोषित योजनाओं के अलावा यूनिसेफ ने भी व्यापक स्तर पर सहयोग किया है।सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं/स्कीमों की सफलता भी बहुत कुढ़ पंचायतों पर ही निर्भर करती है।पंचायतों को इसके लिए सरकार द्वारा संचालित कार्यक्रमों को पर्याप्त सहयोग-समर्थन देना जरूरी है ऐसा करने के लिए पंचायतें अधिनियम द्वारा अधिकृत भी हों।

ग्रामीण स्वच्छता, स्वास्थ्य एवं पंचायत राज   स्वच्छ वातावरण, स्वस्थ जीवन की पहली आवश्यकता है।इसके लिए लगातार कोशिश करते रहना हर व्यक्ति का कर्तव्य है।परन्तु हमारे समाज में, विशेषकर ग्रामीण समाज में, इसकी महत्ता पूजा-पाठ तक ही सिमट कर रह गई है।स्वच्छता को आम जीवन में उतारने में हम सफल नहीं रहे हैं।इस सन्दर्भ में स्थिति इतनी बुरी है कि बहुत पहले गांधीजी ने इसकी ओर इशारा करते हुए लिखा। ‘ज्यादातर भारतीय गाँवों में प्रवेश के समय आंख और नाक बंद कर लेना पड़ता है।क्योंकि वहाँ की गंदगी और दुर्गन्ध को बर्दाश्त करना मुशिकल होता है।’ महात्मा गांधी के इन शब्दों से भारतीय गाँव को जो दृश्य उभरता है, उससे स्थिति आज भी बेहतर नहीं है।अस्वच्छता और गंदगी में एक अमानवीय वातावरण की सृष्टि होती है।इससे हर हाल  में बचा  जाना चाहिए।

स्वच्छता एवं स्वास्थ्य की महत्ता को ध्यान में रखते हुए पंचायत राज की अवधारणा में ग्राम पंचायत के कार्यों में इसे महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है।बिहार पंचायत राज अधिनियम 2006 की धारा 22 में जहाँ ग्राम पंचायत के कार्यों का जिक्र है उसमें-

-          पेयजल

-          ग्रामीण स्वच्छता एवं पर्यावरण

-          लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण

-          महिला एवं बाल विकास

को विशेष स्थान दिया गया गया है।अधिनियम की धारा 25 में जहाँ स्थायी समितियों का विवरण हैं, उसमें एक स्थायी समिति लोक स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एंव ग्रामीण स्वच्छता के लिए अलग से बनाई गिया है।

पंचायत समिति स्तर पर भी उसके कार्यों में अधिनियम की धारा 47 में, तथा जिला परिषद स्तर भी अधिनियम की धारा 73 में उनके कार्यों में उपरोक्त तीनों कार्य विशेष रूप से वर्णित हैं।

पंचायत समिति स्तर पर अधिनियम की धारा 50 में एवं जिला परिषद स्तर पर धारा 77 तहत बनने वाली स्थायी समितियों में एक-एक समिति को लोक स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एंव ग्रामीण स्वच्छता सम्बन्धी काम देखने की जिम्मेदारी सौपी गई हैं।

पंचायतों को अपने इन्हीं सामाजिक कर्तव्यों एंव उत्तरदायित्वों के निर्वहन में मदद करने के उद्देश्य से यूनिसेफ ने, राज्य सरकार के साथ मिलकर, कई कर्यक्रमों के क्रियान्वयन में रूचि ली है।पंचायतें लोगों के बीच इनका प्रचार-प्रसार करके, सरकारी योजनाओं की तरह इनके क्रियान्वयन में सहायता प्रदान करके अपनी सामजिक भूमिकाओं का निर्वहन कर सकती हैं।

सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान

खुले में शौच करना, न सिर्फ बींमारी और गंदगी फैलाना है बल्कि सभ्य समाज में एक शर्मनाक व्यवहार भी है।सामाजिकता एवं स्वच्छता की दृष्टी से इसे समाप्त करना हमारी एवं पंचायतों की पहली चेष्टा होनी चाहिए। सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान कार्य्रकम का उद्देश्य गाँव में खुले में शौच करने की कुप्रथा को समाप्त करना तथा स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाकर आम लोगों के जीवन स्तर में बदलाव लाना है। इसके तहत गरीबी  रेखा से नीचे के परिवारों को अपने घरों में शौचालय निर्माण के लिए सरकार के द्वारा प्रोत्साहन राशि (1200 रु०) की व्यवस्था की गई है।गरीबी  रेखा के ऊपर के परिवारों के भी प्रोत्साहित करने करने लिए समुचित प्रावधान किया गया है।

पंचायतें अपनी स्थायी समिति के माध्यम से, लोगों के बीच  इस कार्यक्रम के विषय में जागरूकता फैलाकर अधिक से अधिक लोगों को लाभांन्वित करा सकती है।हर ग्राम सभा की बैठक में इसकी चर्चा की जा सकती है और इसका ठोस रूप में क्रियान्वित करने के लिए एक निगरानी समिति का गठन केवल इसकी विषय  पर चर्चा एवं कार्य करने हेतु किया जा सकता है।उसी प्रकार, विद्यालय स्वच्छता एवं स्वास्थ्य  शिक्षा कार्यक्रम के तहत सरकारी विद्यालयों में बच्चों के बीच स्वच्छता का महत्व समझाने एवं स्कूलों में बालिका एवं बालकों के लिए अलग-अलग शौचालय बनवाने सम्बन्धी कार्यक्रम को क्रियान्वित किया जा सकता है।इसके लिए कार्यक्रम में समुचित राशि का प्रावधान भी किया गया  अहि।पंचायतों अपनी स्थायी समितियों के माध्यम से इस कार्यक्रम के अंतर्गत अपने क्षेत्रों के स्कूलों में शौचालय बनवाने एवं स्वच्छता के प्रति जागरूकता एवं रूचि पैदा करने में पूरी सहायता प्रदान कर सकती है।इसके लिए शिक्षिकाओं को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जा सकता है।

प्रत्येक आंगनबाडी केंन्द्र में बच्चों के अनुकूल शौचालय निर्माण हेतु राशि का प्रावधान है।पंचायत अपनी स्थायी समितियों  के माध्यम से तथा आंगनबाड़ी सेविकाओं को प्रशिक्षित कराकर बच्चों के लिए स्वच्छ माहौल तैयार करने, तथा उन्हें स्वच्छता की आदतों को अपनाने के लिए प्रेरित एवं क्रियान्वित कर सकता है।

सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान को आकर्षक बनाने एवं पंचातयों को इसमें रूचि लेकर काम करने को प्रेरित करने हेतु ‘निर्मल ग्राम पुरस्कार’ का गठन किया गया है।इसके अंतर्गत उन गांवों को जिनमें:

-          प्रत्येक परिवार द्वारा शौचालय निर्माण, उसकी देखभाल और उसका उपयोग

-        सभी विद्यालय में बालक एवं बालिकाओं के लिए अलग-अलग शौचालय और आंगनबाडी केन्द्रों में शौचालय का निर्माण एवं उपयोग

-          खुले में शौच से पूर्ण रूप से मुक्ति, तथा

-          घर के कूड़े-कचरे एंव गंदे पानी का ठीक से निपटान करने की व्यवस्था पूरी कर ली गई है।

आबादी के आधार पर 50 हजार रूपये से लेकर 5 लाख रूपये तक की पुस्कार राशि देने का प्रावधान किया गया है।

स्वजल धारा

इस कार्यक्रम के तहत ग्रामवासियों की पूर्ण सहभागिता एवं जवाबदेही के आधार पर पयेजल योजना के चयन, निर्माण एवं क्रियान्वयन का प्रावधान किया गया है।इसके तहत नीचे दिए विकल्पों  में से कोई हबी योजना पंचायतों के माध्यम से क्रियान्वित करायी जा सकती है-

-          गाँव में उपलब्ध पेयजल के साधनों को सुदृढ़/ पुनर्गठित करना

-          वर्तमान में चल रही पेयजल योजनाओं को और उन्नत करना

-          नई पेयजल योजनाओं का निर्माण करना

स्वजलधारा   के अंतर्गत योजनाओं के निर्माण के लिए कुछ शर्तें इस प्रकार है:

-          पेयजल योजन के चयन, निर्माण एवं रखरखाव में ग्रामवासियों की पूरी भागीदारी एवं जबावदेही होनी चाहिए।(ये सभी काम ग्रामसभा की बैठक में कराए जा सकते हैं)

-          योजना में में कुल लागत का दस से बीस प्रतिशत अंशदान लाभान्वित परिवारों द्वारा किया जान चाहिए।इस अंशदान में

वास्तु/मजूदरी/भूमि आदि भी शामिल है ) यह निर्णय भी ग्रामसभा की बैठक में लिया जा सकता है)

इस योजना के माध्यम से न केवल पुरानी पयेजल व्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सकता है बल्कि नई पेयजल व्यवस्था योजनाबद्ध तरीके से खड़ी की जा सकती अहि।

इस तरह के कार्यक्रमों में योजना निर्माण एवं क्रियान्वयन से ज्यादा आवश्यक उसका नियमित रखरखाव होता है।चूँकि योजना क्रियान्वयन के बाद यह परिसंपत्ति पंचायत की होती है।अतः पंचायत का इसमें सक्रिय योगदान अति आवश्यक हो जाता है।

स्वच्छ, स्वच्छ एवं सुरक्षित सामाजिक जीवन जीने के लिए चार तरह के कार्य करने जरुरी अहि; संरक्षणात्मक, निरोधात्मक, सुरक्षात्मक तथा निदानात्मक।इन चारो स्तरों पर कार्य करने के लिए यूनिसेफ ने राज्य सरकार के सहयोग से, शिक्षण-प्रशिक्षण, कार्यक्रम के लिए धन एवं अच्छे काम के लिए राशि-युक्त पुरस्कार आदि की व्यवस्था की है।इन सभी का उपयोग करते हुए ग्रामीण जन-जीवन को संवारना पंचायतों का काम है जो यूनिसेफ की इन पहलकदमियों से आसान भी हो गया है और आकर्षक भी।

जन्म-मृत्यु का पंजीकरण

संरक्षणात्मक कार्यों के अंतर्गत सबसे पहला काम है- जन्म-मृत्यु का पंजीकरण ।जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1969 पर आधारित जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण नियमावली बिहार राज्य में अप्रैल 1970 से लागू की गई है और जिसे बिहार जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण नियमावली, 1977 से प्रतिस्थापित करते हुए जनवरी, 2000 प्रभावी बनाया गया है।इस अधिनियम में निहित प्रावधान के अंतर्गत राज्य में होने वाली प्रत्येक जन्म एवं मृत्यु की घटना का पंजीकरण अनिवार्य अहि।यह कानून आवश्यक है तथा घटना के घटित होने के 21 दिनों तक निःशुल्क किया जाता है।समय पर पंजीयन करवाने से भविष्य में होने वाले कई परेशानियों एवं झंझटों से बचा जा सकता अहि।

जन्म के पंजीकरण के उपरांत जो प्रमाण-पत्र दिया जाता है वह जन्म की तारीख एवं स्थान का एक प्रामाणिक दस्तावेज है।यह दस्तावेज स्कूल में प्रवेश के समय, राशन कार्ड में नाम, दर्ज करवाने हेतु, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने हेतु, विदेश यात्राओं के पासपोर्ट बनवाने के लिए, मताधिकार प्राप्त करने के लिए, वृद्धावस्था पेंशन प्राप्त करने के लिए लिए, बालिका समृद्धि योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए, बाचों के स्वास्थ्य संबंधी रिकार्ड एवं  टीकाकरण  के लिए तथा देश की वर्तमान जनसंख्या की स्थिति ज्ञात करने के लिए बहुत जरूरी है।

जन्म की तरह मृत्यु का पंजीयन भी अति आवश्यक है। मृत्यु के पंजीयन के उपरांत जो प्रमाण-पत्र निर्गत किया जाता है वह मृत्यु की तारीख का एक प्रमाणिक दस्तावेज होता है।इसका उपयोग पैतृक सम्पत्ति के दावे के निराकरण मे, कोर्ट कचहरी में मृत्यु के साक्ष्य के रूप में, जीवन बीमा, बैंक खातों के लिए, दुर्घटना आदि में मृत्यु होने की स्थिति में मुआवजा की प्राप्तियों में तथा मृत्यु के कारणों का पता लगाकर उसके अनुरूप उपचार हेतु आवश्यक कदम उठाने के लिएकिया जा सकता है।

ग्रामीण क्षेत्र में जन्म-मृत्यु का पंजीकरण ग्राम पंचायत सचिव-सह-रजिस्ट्रार (जन्म-मृत्यु) या चौकीदार को घटना की सूचना देकर कराया जा सकता है।घटना का पंजीकरण स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता से सम्पर्क करके भी कराया जा सकता है।अगर घटना किसी अस्पाताल में हुई हो तो उसका पंजीकरण अस्पताल में कियाजाएगा।अगर घटना किसी यात्रा के समय हुई हो तो उसका पंजीकरण’ पहले पड़ाव स्थल के अतर्गत आनेवाले पंजीकरण इकाई में कराया जाना चाहिए।

पंचायतों को, विशेषकर ग्राम पंचायत को जन्म-मृत्यु का पंजीकरण के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने का काम सघन रूप से करना अतिआवश्यक है।इससे उन्हें विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत लोगों को शांमिल करने का कानूनी आधार मिलेगा।

इसी प्रकार विवाह रजिस्ट्रेशन अधिनियम, सम्पत्ति रजिस्ट्रेशन, वाहन रजिस्ट्रेशन एवं इंश्योरेंस का प्रचार-प्रसार पंचायतों को योजनाबद्ध तरीके से अदा करना चाहिए।

स्वास्थ्य

निरोधात्मक कार्यों में बच्चों का टीकाकरण कार्ड बनवाकर नियमित टीका लगवाने से लेकर आयोडीन नमक का नियमित सेवन तक सम्मिलित है।ग्राम पंचायत आम जन, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकती है।यह उनका अधिकार है।वैसे तो मातृ एवं बाल स्वास्थ्य सम्बन्धी सेवायें प्रसव पूर्व देखभाल से सही शुरू हो जाती है जिसके अंतर्गत गरीबी के रेखा के नीचे आनेवाले माताओं को प्रसव के लिए अस्पताल पहुंचाने के लिए वाहन की व्यवस्था तथा प्रसव एवं प्रसव पश्चात् दवाएं इत्यादि आवश्यक वस्तु खरीदने के लिए आर्थिक मदद देने का प्रावधान से ही शुरू होते हैं जिनमें विशेषकर, ग्रामीण क्षेत्रों में, पंचायतों की भूमिका कई तरह से आवश्यक हो जाती है।

हमारे देश में हर साल लाखों बच्चे विनाशकारी रोगों का शिकार बनते हैं।ये रोग तो .जानलेवा होते हैं यह  फिर जीवनभर के लिए हानिकारक प्रभाव छोड़ जाते हैं।टी.बी/, पोलियो, डिप्थीरिया, कुकर खांसी, टेटनस, खसरा ऐसे छः जानलेवा बीमारियाँ हैं जो अंधेपन, विकलांगता या मृत्यु का कारण बन सकती हैं।किन्तु इन सभी रोगों से नियमित टीकाकरण द्वारा बच्चों को बचाया जा सकता है।पोलियों, बी.सी.जी., डी.पी.टी., मीजिल्स,विटामिन ‘ए’ के टीके उपलब्ध हैं जिनसे उपरोक्त घातक बीमारियों से लगभग निश्चित बचाव  हो जाता है।इन सभी टीकों की बँधी खुराकें हैं जिन्हें निश्चित समय के अन्तराल में दिया जाना होता है।

पोलियो उन्मूलन के लिए यूनिसेफ द्वारा अन्य राज्यों के साथ बिहार में सघन अभियान चलाया जा रहा है।इसमें सरकार तथा अन्य संस्थाओं के साथ-साथ समुदाय का भी भरपूर सहयोग लिया जा रहा है।पंचायतों की इसमें अहम भूमिका है।

कुपोषण से सम्बन्धित श्वसन रोग, डायरिया, आदि बीमारियों की रोकथाम में भी पंचायत निम्नलिखित कार्य करके अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं:

-          अपने पंचायत में साफ पीने के पानी की व्यवस्था करके

-          नालियों एंव कूड़े-कचरे की नियमित सफाई करा कर

-          स्वास्थ्य केन्द्रों पर ओ।आर।एस। के पैकटों की उपलब्धता सुनिश्चित कराकर, और

-          बाढ़ के समय साफ पीने का पानी की व्यवस्था सुनिश्चित करके।

कुपोषण से बचने के लिए कई प्रकार की पूरक पोषाहार उपलब्ध हैं जिसके जानकारी पंचायतें अभियान चलाकर, तथा स्थायी समितियों के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने का काम सुनिश्चित कर सकते हैं।

कुपोषण के बाद आयोडीन की कमी से होने वाले कई घातक प्रभाव हैं।पंचायत अपने क्षेत्र में आयोडीन मिले नमक की बिक्री सुनिश्चित करके लोगों।

को इनसे मुक्ति दिला सकती है।साथ ही, लोगों को आयोडीन की कमी से होने वाले कुप्रभावों की जानकारी देकर उन्हें इसके प्रति सचेत भी कर सकती है।गर्भवती माताओं को आयोडीन की कमी से गर्भपात का खतरा झेलना पड़ सकता अहि, या उनका बच्चा शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकलांग पैदा पड़ सकता है।इसकी कमी से बच्चे घेघा और भैंगापन कमजोरी से ग्रसित हो सकते हैं, यह जानकारी जन सामान्य को दी जानी चाहिए।

इसी प्रकार विटामिन ‘ए’ की कमी के कारण हुए रोगों की रोकथाम में पंचायत अभियान चलाकर संतुलित एवं विटामिन ‘ए’ युक्त भोजन के बारे में जानकरी प्रदान करा सकती है।विटामिन ‘ए’ की कमी से होने वाली रतौधी, आँख की रौशनी में कमी आदि बीमारियों से अवगत करा सकता है।भोजन में विटामिन ‘ए’ की कमी को दूर करने के लिए इसकी खुराक छः महीने के अंतराल में दी जाती है जिसकी व्यवस्था पंचायत स्वास्थ्य केन्द्रों के माध्यम से कर सकती है

एनीमिया या खून की कमी से अभी स्वास्थ्य को गंभीर खतरा पहुँचता है।भोजन में लौह तत्व एवं प्रोटीन की कमी के कारण, विशेषकर महिलाओं, किशोरियों तथा बच्चों में काम करने की क्षमता कम हो जाती है।इससे बचने के लिए लौहतत्व की गोलियां आंगनबाड़ी स्वास्थ्य केन्द्रों के माध्यम से उपलब्ध कराकर पंचायत एक अहम भूमिका अदा कर सकती है।

इनके अलावा  परिवार नियोजन, कन्या भ्रूण हत्या, बालश्रम, बाल विवाह, बच्चों का  अवैध व्यापार, बच्चो का यौन शोषण आदि क्षेत्रों में भी पंचायत इनकी रोकथाम एवं नियन्त्रण में एक प्रमुख भूमिका निभा सकने की स्थिति में है।अपने सामाजिक, आर्थिक यहाँ तक कि भौगोलिक क्षेत्रों के के कारण  सभी बच्चों को सुरक्षा की आवश्यकता है लेकिन कुछ बच्चे अन्य बच्चों की अपेक्षा ज्यादा असुरक्षित हैं।इन बच्चों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। ये बच्चे है-

-          बेघर बच्चे/अनाथ, बेसहारा बच्चे

-          प्रवासी बच्चे

-          बाल श्रमिक

-          अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति परिवारों के बच्चे बाल श्रमिक/बालविवाह/ बच्चों का अवैध व्यापार की रोकथाम और यौन शोषण रोकने के लिए पंचायत सदस्य

-          बच्चों से काम कराने के खतरों के बारे में  जागरूकता पैदा कर सकते हैं।

-          माता-पिता को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित कर सकते हैं

-          स्कूल की शिक्षा का स्तर और सुविधाएं बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं

-          बाल विवाह/भ्रूण हत्या/बच्चों का अवैध व्यापार से संबंधित कानून के बारे में लोगों को शिक्षित/जागरूकता करने की पहल कर सकते हैं

सुरक्षात्मक उपायों के अंतर्गत एड्स, कैंसर, मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों, जैसे मलेरिया, फायलेरिया, डेंगू आदि से बचाव के उपाय आते हैं।उन्मुक्त समाज में फैलते एड्स का न तो कोई इलाज है और न ही उससे बचने का कोई टीका है।बस केवल बचाव के कुछ साधन हैं। एड्स की सही जानकारी ही इसका बचाव है।एड्स होने की सामान्यतया दो कारण होते हैं” अनभिज्ञता एवं गैर जिम्मेदाराना व्यवहार।और दोनों स्तरों पर पंचायत जागरूकता अभियान चलाकर अपने क्षेत्र के सभी अनभिज्ञ लोगों को इससे संक्रमित होने से बचा सकती है।एड्स फैलने के चार कारण होते हैं-

-          असुरक्षित संभोग, यानी एड्स से संक्रमित या ग्रस्त व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनाने से

-          एड्स से संक्रमित व्यक्ति का खून चढ़ाने से

-          संक्रमित सूई (इंजेक्शन) के प्रयोग करने से तथा

-          एच।आई।वी। संक्रमित माता से गर्भस्थ शिशु को एड्स की बीमारी हो सकती है।

एड्स से बचाव के कुछ सुरक्षात्मक उपाय भर हैं।इन उपायों का प्रचार-प्रसार करना पंचायतें का दायित्व है।अक्सर प्रवासी मजदूर/श्रमिक/व्यवसायी एच.आई.वी. के शिकार बनते हैं और गाँव वापस आकर अपनी पत्नी (अथवा पति), अपनी गर्भस्थ संतान अथवा अन्य लोगों को संक्रमित करते हैं

इस सन्दर्भ में पंचायतों की मुख्य भूमिका इस प्रकार है:-

-          पंचायत के कार्यकर्त्ता सुनिश्चित करें कि एच.आई.वी./एड्स से संक्रमित लोगों के साथ भी अन्य लोगों की तरह प्यार भरा व्यवहार हो ताकि वे खुलकर समाज के सामने आ सकें और यह संक्रमण अन्य लोगों में न फैला सके।

-          पंचायत के सभी सदस्य अपनी प्रत्येक बैठक में एच.आई.वी./एड्स के कारणों एवं बचने के सुरक्षित तरीकों/व्यवहारों व्यवहारों पर अवश्य चर्चा करें।

-          ग्रामीण स्तर पर चल रहे एच.आई.वी./एड्स के प्रत्येक सदस्य अपना विशेष योगदान दें।

इसी तरह मलेरिया, फायलेरिया एवं कालाबाजार जैसी बीमारियों से स्वास्थ्य केन्द्रों के माध्यम से गाँव के सभी घरों में डी.डी.टी. का छिड़काव कराकर, इन रोगों से ग्रसित लोगों के खून की जाँच की व्यवस्था कराकर एवं सही दवाओं को समय से स्वास्थ्य केन्द्रों के माध्यम से उपलब्ध कराकर पंचायत अपनी सामजिक एवं संस्थागत दोनों भुमिकारों का निर्वहन कर सकती है।यह काम सघन अभियान के रूप में तथा ग्राम सभा के माध्यम से निगरानी समिति बनाकर भी किया जा सकता है।

सामजिक जीवन में उपचारात्मक कार्यों की कोई सीमा नहीं।गरीबी उन्मूलन, आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और समता आदि व्यापक उद्देश्यों को ध्यान में रखकर बनाई गई जितनी भी योजनाएं और कार्यक्रम है, वे इसी श्रेणी में आते हैं।उल्लेखनीय है कि इन सब में ग्राम पंचातयों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है।

इन सभी पायदानों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कई सहायक कार्यक्रमों की संरचना कर क्रियान्वयन किया जा रहा है।सामाजिक-आर्थिक विकास के कई कार्यक्रमों जैसे-प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना, ग्रामीण आवास कार्यक्रम आदि का अगर पंचायत सूक्ष्म स्तरीय योजना बनाकर उपयोग करे तो पांच वर्षों के अंदर ही पूरे ग्राम पंचायत की कायाकल्प की जा सकती है।

इसी प्रकार सामाजिक न्याय, सुरक्षा एवं कल्याण के क्षेत्र में स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, बिहार ग्रामों रोजगार गांरटी स्कीम, स्वयं सहायता समूह योजना, सामाजिक सुरक्षा योजना, महिला सशक्तिकरण योजना, दहेज प्रथा उन्मूलन, सुचना का अधिकार अधिनियम आदि के माध्यम से पंचायत महिला, बालिका एवं बालक, गरीब एवं वंचित वर्गों कार्यक्रम केंद्र एवं राज्य सरकार के डरा चलाये जा रहें हैं जिनके माध्यम से वृद्ध लोगों को, महिलाओं को, विकलांग एवं रुग्ण व्यक्तियों को, समुचित सहायता पहुँचाने में पंचायत एक अहम भूमिका निभा सकने में, सक्षम है।

शिक्षा का महत्व

शिक्षा हमारे जीवन को अर्थवान बनाती है।शिक्षा सिर्फ ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम भर नहीं है, बल्कि यह हमें ज्ञान के उपयोग की असीमित संभावनाएं प्रदान करती है।इसका लाभ हम खुद अपने विकास और उत्थान के लिए भी उठाते हैं, साथ ही अपने परिवार, समाज, देश और दुनिया के कल्याण के लिये भी, पंचायत प्रतिनिधियों या एक साधारण व्यक्ति को शिक्षा को इस रूप में भी देखना चाहिए।शिक्षा का प्रचार-प्रसार, शैक्षिक वातावरण व व्यवस्था का निर्माण पंचायतों के प्राथमिक कर्त्तव्यों में शामिल है।

पंचातयों को 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों के शिक्षा के मौलिक अधिकार की रक्षा करना, सर्वशिक्षा अभियान को अपनी पंचायत में सफल बनाना, स्कूल से बाहर के बच्चों को स्कूल से जोड़ना, लड़कियों को स्कूल से जोड़ना, गाँव के स्कूलों के संचालन में सकारात्मक हस्तक्षेप व शिक्षा समिति के माध्यम से सहयोग करना, आदि शिक्षा से जुड़े तमाम कार्यों की जिम्मेदारी लेने के प्रावधान है।पंचातयों को शिक्षा के क्षेत्र प्रभावी भूमिका निभानी है जिससे स्कूलों में पठन- पाठन का वातावरण बन सके और वर्ष 2010 तक 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चों को उपयोगी तथा कोटिपरक प्रांरभिक शिक्षा के क्षेत्र में मुख्य रूप से निम्नलिखित पहल लेने का प्रावधान है-

  • हर उस परिवार से स्थानीय स्तर पर संपर्क  करना, जहाँ स्कुल जाने योग्य बालक/बालिका हो।
  • अभिभावकों को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करना।
  • चूँकि त्रिस्तरीय पंचायत राज व्ववस्था में शिक्षा सम्बन्धी कार्यक्रम के अनुश्रवण का कार्य पंचायत का है।अतः अपन उत्तरदायित्व का पालन करते हुए अपने कार्यक्षेत्र में शिक्षण कार्य ठीक से चले, यह सुनिश्चित करना।
  • समय-समय पर सरकार द्वारा शिक्षा सम्बन्धी घोषणाओं का लाभ खासकर पिछड़े और वंचित समुदाय को दिलाना।
  • शिक्षण में बाधा उत्पन्न करने वाली समस्याओं की सही जनाकारी समय से सम्बद्ध उच्च पदाधिकारी को देकर उनका समाधान करा लेना।
  • स्थानीय स्तर पर शिक्षा मित्र या वर्तमान में शिक्षक की बहाली की जिम्मेवारी पंचायत पर ही है।व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर शिक्षकों की नियुक्ति में पारदर्शिता बरतना और योग्य शिक्षकों को बहाल करना पंचायत प्रतिनिधियों का कर्त्तव्य है।

उपरोक्त सामाजिक भूमिकाएँ पंचायत के उद्देश्यों और कार्यों को व्यापकता प्रदान करती हैं तथा सार्थकता भी।

 

स्त्रोत: पंचायती राज विभाग, बिहार सरकार

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