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पुनर्वास और सामाजिक पुनर्समेकन

इस पृष्ठ पर किशोर न्याय नियमावली के तहत पुनर्वास और सामाजिक पुनर्समेकन के बारे में विस्तार से बताया गया है।

परिचय

पुनर्वास और सामाजिक पुनर्समेकन का मुख्य उद्देश्य बालकों को उनके सम्मान और स्वाभिमान को पुन: स्थापित करने तथा जहाँ कहीं संभव हों, उनके ही परिवार में पुनर्वास के माध्यम से अथवा अन्यथा वैकल्पिक देखभाल कार्यकर मों के माध्यम से न्य्हें मुख्यधारा से जोड़ने में सहायता करना है तथा दीर्घकालीन संस्थागत देखभाल अंतिम प्रयास होगा ।

दत्तक ग्रहण

(1) दत्तक ग्रहण का मुख्य उद्देश्य ऐसे बालक को, जिसकी उसके जन्मदाता माता-पिता द्वारा देखभाल नहीं की जा सकती है, स्थायी वैकल्पिक परिवार प्रदान करना है ।

(2) दत्तक ग्रहण से सबंधित सभी मामलों के लिए केन्द्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन अभिकरण द्वारा जारी किए गए था अधिनियम की धारा 41 की उपधारा (3) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित दिशानिर्देश लागू होंगे ।

(3) अनाथ और परित्यक्त बालकों के मामले में निम्नलिखित प्रक्रिया लागू होगी, अर्थात:-

(क) जहाँ कहीं भी विशिष्ट दत्तक अभिकरण परित्यक्त बालक प्राप्त करते हों, 24 घंटे के भीतर पुलिस थाना को इसकी सूचना देंगे ।

(ख) विशेष दत्तक ग्रहण अभिकरण ऐसे सभी अनाथ और परित्यक्त बालकों को, जिन्हें दत्तक ग्रहण हेतु विधिक रूप से मुक्त घोषित किया जाना है, ऐसे बालकों की प्राप्ति के समय से, यात्रा में लगे समय को छोड़ कर, चौबीस घंटे के भीतर, समिति के समक्ष पेश करेंगे ।

(ग) कोई बालक दत्तक ग्रहण हेतु तब पात्र हो जाता है, जब समिति अपनी जाँच पूरी कर लेती है तथा बालक को दत्तक ग्रहण हेतु विधिक रूप से मुक्त घाषित कर देती है ।

(घ) ऐसी घोषणा प्रपत्र -XIV में की जाएगी ।

(ड.) किसी बालक को दत्तक ग्रहण हेतु विधिक रूप से मुक्त घोषित करते समय उस बालक को समिति के समक्ष अवश्य पेश किया जाएगा ।

(च) जब कभी पुलिस को किसी परित्यक्त शिशु के बारे में सूचना प्राप्त होती है, पुलिस उस शिशु को अपने अधिकार में लेगी तथा शीघ्र चिकित्सा सहायता और देखभाल प्रदान करने के लिए व्यवस्था करेगी ।

(छ) तत्पश्चात, बालक को विशेष दत्तक ग्रहण अभिकरण अथवा मान्यता प्राप्त और प्रमाणित बाल गृह अथवा किसी सरकारी अस्पताल के शिशु इकाई में रखा जाएगा, तत्पश्चात चौबीस घंटे के भीतर बालक को समिति के समक्ष पेश किया जाएगा ।

(ज) किसी बालक को परित्यक्त घोषित करने और दत्तक ग्रहण के लिए विधिक रूप से मुक्त प्रमाणित करने की प्रक्रिया:-

(i) किसी परित्यक्त बालक के मामले में, मान्यताप्राप्त अभिकरण चौबीस घंटे के भीतर उस पुलिस स्टेशन में, जिसकी अधिकारिता में बालक परित्यक्त पाया गया था, फाइल की गई रिपोर्ट की प्रति के साथ समिति के समक्ष रिपोर्ट करेगा और बालक को पेश किया जाएगा ।

(ii) समिति जाँच प्रक्रिया शुरू करेगी, जिसके अंतर्गत, यथास्थिति, परिवीक्षा अधिकारी अथवा बाल कल्याण अधिकारी द्वारा की गई जाँच भी है और जो एक मास के भीतर प्रपत्र – XIII में निष्कर्षों वाली अपनी रिपोर्ट समिति को देगा ।

(iii) विशेष दत्तक ग्रहण अभिकरण द्वारा यह कथन करने वाली एक घोषणा की जाएगी किदो वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए कम से कम एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्र तथा एक क्षेत्रीय भाषा के समाचार पत्र में अधिसूचित करने के पश्चात भी बालक के लिए कोई दावा करने वाला/वाली नहीं है तथा दो वर्ष से अधिक आयु के बालकों के लिए टेलीविजन अथवा रेडियो पर या किसी अन्य प्रचलित तरीके से अतिरिक्त उद्घोषणा की जाएगी तथा गुमशुदा व्यक्ति तलाश दल अथवा ब्यूरो को अधिसूचित किया जाएगा ।

(iv) उपरोक्त (iii) में कथित उपाय, दो वर्ष से कम आयु के बालकों के मामले में बालक के पाए जाने के समय से साठ दिन की अवधि के भीतर किए जायेंगे था दो वर्ष से अधिक आयु के बच्चों के मामले में, यह अवधि चार माह होगी ।

(v) अधिसूचना की अवधि, इस उप नियम के खण्ड (ii) के अधीन की जाने वाली जाँच और रिपोर्ट पेश करने का साथ-साथ चलेगी ।

(vi) समिति, विशेष दत्तक ग्रहण अभिकरण की इस उपनियम के खण्ड (ii) और (iii) के अधीन घोषणा सहित जाँच की प्रक्रिया पूर्ण होने पर बालक को विधिक रूप से मुक्त घोषित करेगी ।

(vii) सात वर्ष से अधिक आयु के किसी भी बालक को, जो समझ सकता है तथा अपना विचार व्यक्त कर सकता है, बालक का कथन बाल कल्याण समिति के समक्ष रिकार्ड किया जाएगा तथा बालक की सहमति के बिना दत्तक ग्रहण के लिए मुक्त घोषित नहीं किया जायेगा ।

(4) अभ्यर्पित बालकों के मामले में, निम्नलिखित प्रक्रिया लागू होगी, अर्थात:

(क) अभ्यर्पित बालक, ऐसा बालक है जिसे समिति द्वारा सम्यक जाँच प्रक्रिया के पश्चात उस रूप में घोषित किया गया है तथा दत्तक ग्रहण के लिए विधिक रूप से मुक्त घोषित किए जाने के लिए अभ्यर्पित है । अभ्यर्पित बालक निम्नलिखित में से कोई होगा:-

(i) असहमति से बने संबंधों के परिणामस्वरूप जन्मा बालक;

(ii) अविवाहित माँ अथवा विवाहेत्तर संबंध से जन्मा बालक;

(iii) ऐसा बालक, जिसके मामले में जन्मदाता माता-पिता में से एक की मृत्यु हो गई हो तथा जीवित माता/पिता उसकी देखभाल करने में असमर्थ है;

(iv) कोई बालक, जहाँ उसके माता–पिता अथवा अभिभावक अपने नियन्त्रण से परे शारीरिक, भावनात्मक तथा सामाजिक कारणों से उसका त्याग करने के लिए मजबूर है ।

(ख) समिति द्वारा माता-पिता को समझाने, उन्हें दत्तक ग्रहण के परिणामों को बताने तथा माता-पिता द्वारा बालकों को रखने की संभावनाओं का पता लगाने के लिए गंभीर प्रयास किए जाएँगे तथा यदि माता-पिता बालक को रखने के इच्छुक नहीं हैं, तब, ऐसे बालकों को शुरू में पालन-पोषण देखरेख में रखा जाएगा तथा उके प्रायोजकों की व्यवस्था की जाएगी ।

(ग) यदि अभ्यर्पण अपरिहार्य है तो समिति के समक्ष गैर-न्यायिक स्टाम्प पेपर पर प्रपत्र –XV में अभ्यर्पण विलेख निष्पादित किया जायेगा ।

(घ) दत्तक ग्रहण अभिकरण, अभ्यर्पण के बाद जन्मदाता माता या पिता अथवा माता-पिता को पुन: विचार करने के लिए दिए गए दो मास के समय के पूरा होने तक इंतजार करेगा ।

(ड.) जन्मदाता माता-पिता अथवा माता-पिता द्वारा अभ्यर्पित बालक के मामले में, माता-पिता द्वारा अभ्यर्पण दस्तावेज समिति के समक्ष निष्पादित किया जाएगा ।

(च) समिति सम्यक जाँच के पश्चात केन्द्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन अभिकरण के दिशानिर्देशों के अनुसार साठ दिनों की पुन: विचार की अवधि के पश्चात यथास्थिति प्रपत्र – XIII में अभ्यर्पित बालक को दत्तक ग्रहण हेतु विधिक रूप से मुक्त घोषित करेगी।

(5)  अधिनियम की धारा 41 के प्रयोजनों के लिए न्यायालय से ऐसा सिविल न्यायालय अभिप्रेत है, जिसकी दत्तक ग्रहण और संरक्षता के मामलों पर अधिकारिता हो तथा इसके अंतर्गत जिला न्यायाधीश का न्यायालय, परिवार न्यायालय और व्यवहार न्यायालय भी है ।

 

पालन-पोषण देखभाल

(1) जिन बालकों को दत्तक ग्रहण में नहीं रखा जा सकता है, उनके लिए इस अधिनियम की धारा ४२ की उपधारा (2) के अनुसार, यथास्थिति, परिवीक्षा अधिकारी अथवा केस वर्कर अथवा सामाजिक कार्यकर्ता के पर्यवेक्षण के अधीन सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रपत्र – में पालन पोषण देखभाल का आदेश जारी किया जाएगा और पालन-पोषण देखभाल की अवधि बच्चे की जरूरत पर निर्भर करेगी ।

(2) राज्य सरकार, अपना स्वयं का पालन पोषण देखभाल कार्यक्रम तैयार करेगी, जिससे बालकों का संस्थानिकरण कम किया जा सके तथा प्रत्येक बालक का पारिवारिक वातावरण में पालन पोषण हो सके ।

(3) राज्य सरकार पालन पोषण देखभाल कार्यक्रम तैयार करने में बोर्डों अथवा समितियों, गैर सरकारी संगठनों, शिक्षाविदों एवं बालकों के लिए वैकल्पिक देखभाल संबंधी कार्य कर रहे संगठनों से विचार विमर्श करेगी ।

(4) बच्चों के गैर संस्थानिकरण करने एवं उन्हें पालन-पोषण देखभाल में रखने का निर्णय बाल कल्याण समिति की स्वीकृति से लिया जाएगा ।

 

पालन पोषण देखभाल के लिए परिवारों के चयन हेतु मापदंड

(1) इस नियमावली के नियम 34 के अंतर्गत आने वाले बालकों के मामलों में, पालन-पोषण देखभाल के लिए परिवार के चयन हेतु निम्नलिखित मापदंड लागू होंगे, अर्थात-

(i) पोषक माता-पिता का परिवार के साथ स्थायी भावनात्मक सामंजस्य होना चाहिए;

(ii) पोषक माता-पिता की अपनी ऐसी आय होनी चाहिए, जिसमें वे बालक की जरूरत को पूरा करने में समर्थ हों अथवा वे पालन पोषण देखभाल भत्ते के संदाय पर निर्भर न हों;

(iii) परिवार की मासिक आय पोष्य बालकों की देखरेख करने के लिए पर्याप्त तथा समिति द्वारा अनुमोदित होगी;

(iv) यह निर्धारित करने के लिए कि परिसर में रहने वाले परिवार के सभी सदस्य, चिकित्सीय दृष्टि से स्वस्थ्य हैं, एच०आई०बी० (ह्यमू ने इम्यूनो देफिशिएंसी वायरस) एवं हैपटाईटेस-बी संबंधी जांचों सहित उनकी चिकित्सा रिपोर्ट प्राप्त की जानी चाहिए;

(v) पोषक माता-पिता में बाल देख-रेख का अनुभव तथा अच्छी बाल देखभाल प्रदान करने की क्षमता होनी चाहिए;

(vi) पोषक माता-पिता शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक रूप से स्वस्थ होने चाहिए;

(vii) घर में पर्याप्त स्थान एवं बुनियादी सुविधाएँ होनी चाहिए;

(viii) पालन पोषण देखभाल करने वाला परिवार शिशु रोग विशेषज्ञ से बालक के नियमित जाँच कराने, बालक के स्वास्थ्य एवं उनके रिकॉर्ड की देखरेख सहित अभिकथित किए गए नियमों का पालन करने का इच्छुक होना चाहिए;

(ix) परिवार ऐसे करार पर हस्ताक्षर करने का तथा जब कभी ऐसा करने को कहा जाए, बालक को विशेष दत्तक ग्रहण अभिकरण को वापस करने का इच्छुक होना चाहिए;

(x) पोषक माता-पिता को प्रशिक्षण अथवा अभिविन्यास कार्यकर मों में हिस्सा लेने को इच्छुक होना चाहिए;

(xi) पोषक माता-पिता को बालक को अभिकरण द्वारा अनुमोदित शिशु रोग विशेषज्ञ के पास नियमित जाँच (शिशुओं के मामले में मास में कम से कम एक बार) के लिए ले जाने का इच्छुक होना चाहिए;

(xii) एकल माता-पिता को विपरीत लिंग के बच्चे को पालन-पोषण देख-रेख में नहीं दिया जा सकता यदि उनकी आयु का अंतर 20 वर्ष से कम हो ।

(2) पोषक माता-पिता के चयन में जाति, धर्म, जातीय परिस्थिति, विकलांगता के आधार पर कोई भेद भाव नहीं किया जाएगा या पालन पोषण देखभाल स्थापन का विनिश्चय करने में बालक की दशा या स्वास्थ्य और उसका सर्वोतम हित प्रमुख होगा;

(3) प्रपत्र XVI के अनुसार, बाल कल्याण अधिकारी अथवा सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा किये गए व्यापक मूल्यांकन के बाद अधिनियम की धारा 2 के खण्ड (1) में अभिकथित उपबंधों के अनुसार, बच्चे को पालन-पोषण हेतु देने के पहले पोषक माता-पिता को समिति द्वारा उपयुक्त व्यक्ति द्योशित किया जाएगा;

पूर्व दत्तक ग्रहण-पालन पोषण

पूर्व दत्तक ग्रहण-पालन पोषण देखभाल के मामले में, अधिनियम की धारा 42 की उपधारा (1) तथा धारा 41 की उपधारा (3) के अधीन अधिसूचित संगत दिशा-निर्देशों में अंतर्विष्ट उपबन्ध लागू होंगे ।

भरण-पोषण अनुदान

भरण-पोषण करनेवाला माता-पिता यदि रक्त नातेदार हो तो उसे बालक के भरण पोषण के लिए समय समय पर नियत की जाने वाली राशि भुगतान की जाएगी। भरण पोषण करनेवाले परिवार को राज्य सरकार द्वारा बनाई गई योजनानुसार राशि दी जायेगी।

लक्ष्य-समूह

(1) असमर्थ परिवारों से या संस्थानों से आने वाले बच्चे या जिनके जैविक माता-पिता या तो अक्षम है या संकट की स्थिति में है और बच्चे की देख-रेख एवं संरक्षण देने में असमर्थ है, वे भरण पोषण देखरेख के लिए लक्ष्य समूह होंगे ।

(2) जिन बच्चों को विभिन्न कारणों से दत्तक ग्रहण हेतु नहीं दिया जा सकता, उनपर भरण पोषण देख-रेख के लिए विचार किया जा सकता है ।

कार्यक्रम का कार्यान्वयन

भरण पोषण देख-रेख का कार्यान्वयन प्रत्येक जिला में बाल कल्याण समिति द्वारा किया जायेगा । जिला बाल संरक्षण इकाई तथा अधीक्षक, बाल गृह द्वारा निम्नांकित कार्यो का संपादन करेंगे:

(क) भरण पोषण करने वाले परिवार का चयन करना;

(ख) भरण पोषण करने वाले परिवारों को दत्तक ग्रहण हेतु समीक्षा करना, उनका अभिविन्यास करना और उन्हें प्रशिक्षित करना;

(ग) परिवारों और बच्चे को परामर्श-सहयोग एवं जानकारी प्रदान करना होगा;

(घ) परिवार और बच्चे के बीच के संबंधों के बारे में पाक्षिक समीक्षा करना;

(ड.) यदि जैविक परिवार उपलब्ध हो तो इस संबंध को बनाए रखेगा बशर्ते वह सुरक्षित संबंध हो;

(च) बालक के सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करने हेतु पालन पोषण करने वाले परिवार में रह रहे बालक के पुनर्वास संबंधी उपायों के लिए निरतंर शिक्षा के रूप में या व्यावसायिक प्रशिक्षण या किसी शिल्प के विकास कार्यक्रम के माध्यम से हल निकालना;

(छ) परामर्श एवं अन्य समर्थन प्रदान करना;

(ज) बाल कल्याण समिति बालकों की प्रगति का अनुश्रवण करेगा ।

 

पालन-पोषण करने हेतु योग्य व्यक्तियों को मान्यता देना

(i) पालन पोषण करने वाले माता-पिता के रूप में मान्यता प्राप्त करने का नियमावली के अधीन मान्यता प्राप्त करने का इच्छुक कोई व्यक्ति बाल कल्याण समिति के समक्ष आवेदन करेगा । आवेदन के साथ वह अन्य पति/पत्नी यदि कोई हो, की सहमति तथा अपने परिवार के सभी सदस्यों के स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में रजिस्ट्रीकृत व्यवसायिक चिकित्सक का प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, किसी राजपत्रित पदाधिकारी से चरित्र प्रमाण पत्र या स्थानीय स्थानिक कल्याण संध से अनुशंसा अनुलग्न करेगा/करेगी।

(ii) मान्यता प्रदान करने या वापस लेने का निर्णय कल्याण पदाधिकारी और/या स्वयं सेवी संगठन के प्रतिवेदन का घन परीक्षण के उपरान्त बाल कल्याण समिति के द्वारा लिया जाएगा ।

(iii) समिति पालन पोषण देखरेख में रखे गए बालक के अभिरक्षा का एक योग्य व्यक्ति से दूसरे योग्य व्यक्ति को अंतरण, उनके कारणों की सम्यक व्याख्या करते हुए कर सकेगी । संबद्ध व्यक्ति, समिति के ऐसे आदेश के 24 घंटों के भीतर बालक की अभिरक्षा अतिरित कर  देगा ऐसा नहीं करने पर समिति विधि सम्मत उपयुक्त कार्रवाई करेगी ।

2. स्वयंसेवी संगठन का विनियोजन:-

(i) इस नियमावली के अधीन विनियोजन का इच्छुक कोई संगठन नियमों, उप विधियों, संगम- अनुच्छेद, सोसायटी या संगठन को चलाने वाले संध के सदस्यों की सूची, पदधारकों की एक-एक प्रति तथा संगठन द्वारा प्रदान की गई विशिष्ट बालक देख-रेख सेवाओं की स्थिति एवं पूर्व के रिकॉर्ड दर्शान वाले विवरण के साथ बाल कल्याण समिति को आवेदन करेगा, जो संगठन की क्षमता का सत्यापन करने के पश्चात नियोजन की प्रस्विकृति इस नियमावली के अधीन इस शर्त पर दे सकेगा कि वह संगठन अधिनियम एवं इसके अधीन समय-समय पर बनाए नियमों में निर्धारित मापदंडों को अनुपालन करेगा ।

(ii) स्वयं सेवी संगठन सम्बद्ध बाल कल्याण समिति को बालक देख-रेख में दिए जाने से सबंधित समिति द्वारा यथानिर्देषित सभी प्रतिवेदन, समिति द्वारा विहित समय-सीमा के भीतर, प्रस्तुत करेगा । इन प्रतिवेदनों में प्रपत्र – XVI में आच्छादित बिन्दुओं सहित सभी आवश्यक विवरण होंगे ।

(iii) समिति के निदेशानुसार स्वयंसेवी संगठन द्वारा प्रस्तुत सभी प्रतिवेदन के लिए उसे निर्धारित शुल्क का भुगतान बाल कल्याण समिति सुनिश्चित करेगी ।

 

पालक माता-पिता के द्वारा किया जाने वाला एकरारनामा

पालन पोषण देख-रेख अवधि के दौरान, पालन-पोषण वाले माता-पिता निम्नलिखित बातों को सुनिश्चित करने के लिए बाल कल्याण समिति के साथ एक एकरारनामा करेगा:-

(i) कि पालक माता-पिता यह सुनिश्चित करेगा बच्चे को समुचित शिक्षा प्रदान की जाए;

(ii) कि बच्चे को प्यार और स्नेह के साथ व्यवहार किया जाएगा और बच्चे के सर्वागीण विकास हेतु उपयुक्त वातावरण सुनिश्चित किया जाएगा;

(iii) कि बच्चे के साथ दुराचरण नहीं किया जाएगा;

(iv) पालक माता-पिता जैविक माता-पिता को आने की अनुमति देंगे और बालक की देख-रेख एवं विकार हेतु उनके विचारों का सम्मान करेंगे;

(v) पालक माता-पिता, बाल कल्याण समिति एवं राज्य सरकार के निदेशों का अनुपालन सम्यक तत्परता से करेंगे;

(vi) बालक के भावी योजना के संबंध में विचार-विमर्श हेतु जब भी बुलाया जाएगा, पालक माता-पिता बाल कल्याण समिति के समक्ष उपस्थित होंगे;

(vii) पालक माता-पिता कल्याण पदाधिकारी या अधिकृत स्वयंसेवी संगठन के समक्ष बालक के स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यवहार, चाल-चलन एवं समय-समय पर यथापेक्षित बालक के संबंध में किन्ही अन्य बातों की जानकारी देंगे;

(viii) समिति द्वारा जब कभी ऐसा आदेश दिया जाए पालक माता-पिता, बालक को बाल कल्याण समिति को वापस कर देगा;

(ix) यदि बच्चा गंभीर रूप से बीमार हो तो पालक माता-पिता अविलम्ब इसकी सूचना कल्याण पदाधिकारी, बाल कल्याण समिति एवं स्वयंसेवी संगठन को देगा;

(x) पालक माता-पिता आवासीय पता-परिवर्तन की सूचना बाल कल्याण समिति एवं सम्बद्ध स्वयंसेवी सगंठन को देगा;

(xi) एक सप्ताह से अधिक के लिए बच्चे को बाहर ले जाने की स्थिति में पालक माता-पिता बाल कल्याण समिति की लिखित पूर्वानुमति लेगा;

(xii) यदि पालन-पोषण देख-रेख में रखा गया बच्चा गुम हो जाये तो पालक माता-पिता इसकी सूचना अविलम्ब पुलिस को देगा;

(xiii) बच्चों की न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति, बिना इनकार के करनी होगी;

(xiv) विशिष्ट मामलों में अधिरोपित किन्ही अन्य शर्त्तो का अनुपालन पालक माता-पिता करेंगे;

(xv) पालक माता-पिता इस बात से पूर्णत: अवगत है कि शर्त्तो के उल्लघंन करने या बच्चों के साथ दुराचार की स्थिति में बच्चे को उनके अभिरक्षा से वापस ले लिया जाएगा । शारीरिक या यौन दुराचार के मामले में पालक माता-पिता के विरुद्ध अपराधिक कार्रवाई चलाई जाएगी ।

राज्य सरकार की भूमिका

(1) राज्य सरकार, राज्य के संसाधन को ध्यान में रखते हुए योजना के कार्यान्वयन हेतु निधि आवंटित करेगी । निदेशक, समाज कल्याण योजना के प्रभावकारी कार्यान्वयन के लिए नोडल प्राधिकारी होंगे ।

(2) समाज कल्याण विभाग या राज्य बाल संरक्षण समिति:-

(i) बाल कल्याण समिति के माध्यम से पालन पोषण देख-रेख कार्यक्रम का कार्यान्वयन करेगा;

(ii) योजना के कार्यान्वयन का मूल्यांकन एवं अनुश्रवण करेगा;

(iii) पालक माता-पिता द्वारा शर्त्तो को पूरा करने में विफल रहने की स्थिति में, आवश्यक जाँच करने के उपरांत एवं बाल कल्याण समिति को सूचित कर पालक माता-पिता की मान्यता समाप्त कर देगा;

(iv) जागरूकता लाने, समन्वय एवं रेट वकिर्ग कार्य करने वालों को प्रशिक्षण के संबंध में उपयुक्त कदम उठाएगा;

(3) जिला बाल संरक्षण इकाई या बाल गृह के अधीक्षक/केस कार्यकर्त्ता/सामाजिक कार्यकर्त्ता:-

(क) अभिलेखों एवं केस संचिकाओं तथा विहित प्रपत्र में अनुवर्ती प्रतिवेदनों को संधारित करेगा;

(ख) समिति को आवधिक प्रतिवेदन न प्रस्तुत करेगा जिसमें लेखा, व्ययन, पालन-पोषण देख-रेख करने वाले परिवार को सहायता एवं बालक के विकास के ब्यौरे होंगे;

(ग) योजना का कार्यान्वयन हेतु एक या अधिक अर्हता प्राप्त सामाजिक कार्यकर्त्ता की नियुक्ति करेगा जिसे 5000/- (पाँच हजार) रूपये प्रतिमाह की दर से मानदेय दिया जाएगा जिसे सरकार आदेश द्वारा समय-समय पुनरीक्षण कर सकेगी ।

प्रायोजन

(1) राज्य सरकार गैर सरकारी संगठनों, बाल कल्याण समितियों, अन्य सुसंगत सरकारी अभिकरणों तथा कॉर्पोरेट क्षेत्र के परामर्श से प्रायोजन कार्यक्रम तैयार करेगी ।

(2) राज्य सरकार जिला या राज्य बाल संरक्षण इकाइयों की सहायता से, जोखिम में रह रहे परिवारों और बालकों की पहचान करेगी तथा बाल शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण तथा अन्य विकासात्मक आवश्यक्ताओं, के लिए प्रायोजन के रूप में आवश्यक समर्थक सेवाएँ प्रदान करेगी ।

(3) बाल गृह और विशेष गृह अधिनियम की धारा 43 में यथा अभिकथित प्रायोजन कार्यकर मों को बढ़ावा देंगे ।

(4) प्रायोजन प्राप्त करने वाली संस्थाएँ कार्यक्रम के लिए सभी प्राप्तियों और संदायों के उचित और पृथक लेखा संधारित करेगी ।

(5) बोर्ड अथवा समिति किसी किशोर अथवा बालक को सहायता देने के लिए प्रपत्र XVIII में एक आदेश करेगी तथा इसकी एक प्रति आवश्यक कार्रवाई हेतु जिला अथवा राज्य सरकार बाल संरक्षण इकाई अथवा राज्य सरकार को भेजेगी ।

(6) राज्य सरकार, व्यक्तियों, संस्थानों, कॉर्पोरेट क्षेत्रों, वित्तीय संस्था, उद्योग इत्यादि को बदले में किसी लाभ की आशा किए बिना निम्नलिखित को प्रायोजित या समर्थित करने की अनुमति दे सकेगी:-

(i) बच्चे को बालश्रम से वापस लेने के लिए किसी भी बच्चा या उसके परिवार को प्रायोजन के अधीन सहायता दी  जाएगी;

(ii) बाल व्यक्तित्व विकास कार्यक्रम एवं बालक के आचरण में सुधार से सबंधित कोई क्रियाकलाप;

(iii) सांस्कृतिक कार्यक्रम, पिकनिक, अवकाश-शिविर, चिकित्सीय सहायता, प्रतिरक्षण कार्यक्रम,विशेष चिकित्सीय सहायता, अंतर विद्यालय खेल-कूद कार्यक्रम , रचनात्मक कला, प्रतियोगिता तथा प्रख्यात व्यक्तियों को शामिल करते हुए सेमिनार ;

(iv) कोई भी रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण कार्यक्रम, व्यवसायिक प्रशिक्षण सह पुनर्वास केन्द्रों की स्थापना, सामुदायिक महाविद्यालय इत्यादि;

(v) पुस्तकालयों की स्थापना, खेल कूद कार्यक्रम , कला एवं प्रतियोगिता इत्यादि या कोई अन्य विकासात्मक कार्यक्रम ;

(vi) आधारभूत संरचनाओं एवं सुविधाओं की अभिवृद्धि निर्माण या रददों बदल इत्यादि ।

(7) निदेशक, समाज कल्याण किसी संस्था के अधीक्षक को निदेशक, समाज कल्याण को संसूचित करते हुए कोई प्रायोजन स्वीकार करने की अनुमति देगा ।

(8) अधीक्षक जो किसी प्रायोजित को स्वीकार करेगा वह इसका उचित लेखा संधारित करेगा और विशेष त्रैमासिक प्रतिवेदन निदेशक, समाज कल्याण को भेजेगा ।

(9) जिला बाल संरक्षण इकाई या क्रियाकलापों को निरिक्षण करने के लिए प्राधिकृत निरिक्षण के दौरान प्रायोजन से सबंधित सुसंगत का अभिलेखों का सत्यापन करेगा और अनुवर्तन के लिए प्रतिवेदन निदेशक, समाज कल्याण को भेजेगा ।

 

पश्चातवर्ती देखभाल संगठन

(1) राज्य सरकार सामाजिक पुनर्समेकन हेतु किशोरों अथवा बालकों के विशेष गृहों एवं बाल गृहों को छोड़ने के पश्चात उनके लिए पश्चातवर्ती देखभाल कार्यक्रम तैयार करेगी ।

(2) धारा 16 के उपधारा (2) के अधीन बोर्ड द्वारा निर्दिष्ट किशोरों के समायोजन हेतु समय-समय पर यथा विहित रीति से राज्य सरकार “सुरक्षित स्थान” अधिसूचित करेगी।

(3) इस अधिनियम की धारा 44 द्वारा पश्चातवर्ती देखभाल कार्यक्रम 18-21 वर्ष के उन व्यक्तियों को उपलब्ध कराया जाएगा, जिनके पास कही जाने का कोई स्थान नहीं है अथवा अपनी सहायता करने में असमर्थ हैं ।

(4) जब बोर्ड या समिति किसी किशोर अथवा 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले बच्चे को पश्चातवर्ती देखभाल कार्यक्रम के अधीन रखने के लिए प्रपत्र XIX में आदेश करती हो तो ऐसे आदेश की एक प्रति जिला और राज्य बाल संरक्षण इकाई तथा निदेशक, समाज कल्याण को भेजी जाएगी, जो पश्चातवर्ती देखभाल की व्यवस्था करने के लिए उत्तरदायी होंगे सूचना की प्रति संबद्ध गृह के अधीक्षक को उपलब्ध करा दी  जायेगी ।

(5) पश्चातवर्ती देखभाल में रखे गए व्यक्ति पर बोर्ड अथवा समिति की अधिकारिता होगी।

(6) इन संगठनों का उद्देश्य ऐसे बालकों को समाज के प्रति अनुकूल होने के लिए समर्थ बनाना है तथा इन अंत: कालीन गृहों में इनके निवास के दौरान इन बालकों को संस्था आधारित जीवन से सामान्य जीवन में जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा ।

(7) सभी किशोर या बालक उत्तर रक्षा कार्यक्रम के तहत क्रमांकित , सभी सुनिश्चित योजनाओं एवं कार्यक्रम के जो राज्य सरकार के द्वारा प्राथमिकता के आधार पर संचालित हैं, के लिए निश्चित रूप से लाभार्थी समझे जायेंगे ।

(8) कार्यक्रम के मुख्य संघटकों में निम्नलिखित होंगे:-

(क) 18-21 वर्ष की आयु के युवाओं के लिए अस्थायी आधार पर सामुदायिक समूह आवास;

(ख) व्यवसायिक प्रशिक्षण रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण एवं आवास किराया या भरण पोषण के अन्य व्यय, प्रति योगदान के लिए प्रोत्साहित करना;

(ग) धीरे-धीरे राज्य की सहायता के बिना आत्मनिर्भर बनने के लिए तथा अपने उपासन के माध्यम से पर्याप्त रकम बचाने के पश्चात समूह गृह से निकलकर अपने स्वयं के गृह में निवास करने के लिए प्रोत्साहित करना;

(घ) इन समूहों से उनकी पुनर्वास योजनाओं पर विचार-विमर्श करने तथा उसकी ऊर्जा हेतु सृजनात्मक अभिव्यक्ति का मार्ग प्रदान और उनके जीवन में आने वाली संकटमय अवधि पर काबू पाने के लिए नियमित रूप से सम्पर्क में रहने वाले अभिजात परामर्शदाता के लिए व्यवस्था करना ।

(9) पश्चातवर्ती देखभाल कार्यक्रम में युवाओं को उनके द्वारा किए गए आवेदन तथा ऐसे ऋण की आवश्यकता के सम्यक सत्यापन एवं आवश्यक व्यवासयिक सलाह के आधार पर उद्यम/क्रियाकलाप स्थापित करने के लिए ऋणों की व्यवस्था की जाएगी और इस संबंध में पश्चातवर्ती देखरेख कार्यक्रम में युवाओं को प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाएगा।

(10) उत्तर रक्षा संगठन उत्तर रक्षा कार्यक्रम में नामांकित व्यक्ति के नाम से मतदाता पहचान-पत्र, बैंक बचत खाता, आवास प्रमाण-पत्र इत्यादि, जैसे दस्तावेज जारी कराना सुलभ कराएगा ।

सम्पर्क एवं समन्वयन

(1) राज्य सरकार, यथास्थिति, बोर्ड अथवा समिति के माध्यम से किशोरों अथवा बालकों के पुनर्वास एवं सामाजिक पुनर्समेकन को सुकर बनाने के लिए विभिन्न सरकारी, गैर सरकारी, कॉर्पोरेट एवं अन्य सामुदायिक अभिकरणों के बीच प्रभावी सम्पर्क स्थापित करेगी ।

(2) राज्य सरकार, इस अधिनियम और नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु राज्य एवं जिला स्तरों पर प्रत्येक विभाग को भूमिका और उतरदायित्व का पता लगाएगी तथा उन्हें अधिसूचना के माध्यम से अधिसूचित करेगी ।

(3) राज्य सरकार, इन विभागों के कर्मचारियों के लिए उपयुक्त प्रशिक्षण तथा संचेतना पैदा करने की व्यवस्था किसी समुचित अभिकरण के साथ समय-समय पर करेगी ।

(4) राज्य सरकार, राज्य अथवा जिला बाल संरक्षण इकाई की सहायता से व्यावसायिक प्रशिक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, पोषण, मानसिक स्वास्थ्य उपाय, नशा मुक्तिकरण तथा विधिक सहायता सेवाओं जैसी विशेषज्ञ सेवाओं एवं तकनीकी सहायता हेतु स्थानीय गैर सरकारी संगठनों के साथ प्रभावी नेटवर्क और सम्पर्क स्थापित करेगी ।

(5) कार्यशाला, सांस्कृतिक कार्यक्रम , खेल-कूद शिविर, परामर्श एवं मनोरंजन सेवाओं के आयोजन के लिए अवकाश प्राप्त व्यक्तियों के संगठन, सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्वास्थ्य कर्मियों की स्वैच्छिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया जायेगा ।

 

पीड़ित सहायता केंद्र

पीड़ित बालक जिसे बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया जाता है या किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष लाया जाता है या किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष लाए गए किशोरों द्वारा किए गए अपराध के पीड़ित अवसर तत्काल सहायता या चिकित्सीय, कानूनी, आर्थिक, परामर्शी या अन्य तरह के पुनर्वास, विषयक अनुवर्ती कार्रवाई के अपेक्षा वाले होते हैं । ऐसी तात्कालिक सहायता प्रदान करने के लिए, निदेशक, समाज कल्याण के द्वारा निम्नलिखित सदस्यों वाला “सेवा केंद्र” गठित किया जा सकेगा:-

(1) अधीक्षक, विशेष गृह/सम्प्रेक्षण गृह-सदस्य/सचिव

(2) निकटवर्ती सरकारी अस्पताल का चिकित्सा पदाधिकारी-सदस्य

(3) एक जिला विधि सेवा प्राधिकार द्वारा नामनिर्दिष्ट अधिवक्ता-सदस्य

(4) जिला परवीक्षा पदाधिकारी – सदस्य

(5) बच्चों के पुनर्वास में संलग्न हो तथा निदेशक, समाज कल्याण द्वारा नामनिर्दिष्ट दो सामाजिक कार्यकर्त्ता-सदस्य ।

(6) निदेशक, समाज कल्याण द्वारा नामनिर्दिष्ट एक बाल परामर्शी/शिशु रोग विशेषज्ञ-सदस्य

“पीड़ित सेवा केंद्र” को बाल गृह/पर्यवेक्षण गृह/जिला परवीक्षा कार्यालय से संबद्ध किया जा सकता है । तात्कालिक सहायता सदस्य विशेष द्वारा अकेले या समूह के रूप में प्रदान की जा सकती है । सदस्यगण महीना में एक बार या उससे अधिक, बैठक कर सकते हैं और मामले की प्रगति की समीक्षा कर सकते हैं । ऐसे कार्य जिला परवीक्षा पदाधिकारी के समन्वय से बच्चे के प्रति, शारीरिक दुराचार, यौन दुराचार, आर्थिक दुराचार, मानसिक दुराचार या भावनात्मक दुराचार के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त करने या अन्य सुधारात्मक उपाय हेतु किया जायेगा ।

स्रोत: समाज कल्याण विभाग, बिहार सरकार।

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