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अनाथ एवं फुटपाथी बच्चे

इस आलेख में अनाथ एवं फुटपाथी बच्चे के विषय में विस्तार से जानकारी दी गयी है।

फुटपाथी बच्चे

स्ट्रीट चिल्ड्रेन एक ऐसा शब्द है, जो शहर की सड़कों पर रहने वाले बच्चों के लिए प्रयोग होता है। वेपरिवार की देखभाल और संरक्षण से वंचित होते हैं। सड़कों पर रहने वाले ज्यादातर बच्चे 5 से 17 वर्ष के हैं और अलग-अलग शहरों में उनकी जनसंख्या भिन्न है। स्ट्रीट चिल्ड्रेन निर्जन भवनों, गत्तों के बक्सों, पार्कों अथवा सड़कों पर रहते हैं। स्ट्रीट चिल्ड्रेन को परिभाषित करने के लिए काफी कुछ लिखा जा चुका है, पर बड़ी कठिनाई यह है कि उनका कोई ठीक-ठीक वर्ग नहीं है, बल्कि उनमें से कुछ जहां थोड़े समय सड़कों पर बिताते हैं और बुरे चरित्र वाले वयस्कों के साथ सोते हैं। वहीं कुछ ऐसे हैं, जो सारा समय सड़कों पर ही बिताते हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता।

यूनिसेफ द्वारा दी गई परिभाषा व्यापक रूप से मान्य है, जिसके तहत स्ट्रीट चिल्ड्रेन को दो मुख्य वर्गों में बांटा गया है-

  • सड़कों पर रहने वाले बच्चे भीख मांगने से लेकर बिक्री करने जैसे कुछ आर्थिक क्रियाकलापों में लिप्त रहते हैं। उनमें से ज्यादातर शाम को घर जाकर अपनी आमदनी को अपने परिवारों में दे देते हैं। वे स्कूल जा सकते हैं तथा उनमें परिवार से जुड़े रहने की भी भावना हो सकती है। परिवार की आर्थिक बदहाली के कारण ये बच्चे आखिरकार स्थाई तौर पर सड़कों पर की ही जिंदगी चुन लेते हैं।
  • सड़कों पर रहने वाले बच्चे वास्तव में सड़कों पर (या आम पारिवारिक माहौल से बाहर) ही रहते हैं। उनके बीच पारिवारिक बंधन मौजूद हो सकता है, पर यह काफी हल्का होता है, जो आकस्मिकतौर पर या कभी-कभी ही कायम होता है।

भारत में अनाथ व फुटपाथी बच्चों की दशा

  • एक अरब आबादी वाला भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है जिसमें बच्चों की आबादी 40 करोड़ के करीब है,
  • भारत बहु-जातीय, बहु-भाषायी एवं बहु-सांप्रदायिक पृष्ठभूमि वाला देश है। इसमें 15 आधिकारिक भाषाएं एवं 36 राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेश हैं,
  • यहां करीब 67 करोड़ 30 लाख हिंदू, 9 करोड़ 50 लाख मुस्लिम, 1 करोड़ 90 लाख ईसाई, 1 करोड़ 60 लाख सिख, 60 लाख बौद्ध तथा 30 लाख जैन संप्रदाय के लोग हैं,
  • देश की आबादी की करीब 29 फीसदी जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करती हैं और 72 फीसदी लोग शहरों में रहते हैं,
  • भले ही भारत की आबादी का सिर्फ 0.9% एचआईवी/एड्स से संक्रमित हैं, पर दक्षिण अफ्रीका के बाद दुनिया में एचआईवी/एड्स से संक्रमित लोगों की सबसे ज्यादा संख्या भारत में ही हैं,
  • अतीत में प्राप्त कई उपलब्धियों के बावजूद लैंगिक असमानता, गरीबी, निरक्षरता एवं आधारभूत संरचना की कमी एचआईवी/एड्स की रोकथाम एवं चिकित्सा में प्रमुख अवरोध बनी हैं। भारत में एड्स संकट का प्रभाव पूरी तरह से उभरना शुरु नहीं हुआ है और एड्स प्रभावित लोगों के सामाजिक बहिष्कार की घटना को सही तरह से दर्ज नहीं किया गया है,
  • फिर भी यह अनुमान लगाया जाता है कि भारत में एड्स की वजह से बहिष्कृत लोगों की संख्या दुनिया के किसी देश से ज्यादा है और माना जाता है कि यह संख्या अगले 5 सालों में दुगनी हो जाएगी,
  • भारत में एड्स से संक्रमित 55,764 मामलों में 2,112 बच्चे हैं,
  • एचआईवी/एड्स संक्रमण के 4 करोड़ 20 लाख मामलों में 14 फीसदी मामले ऐसे बच्चों के अनुमानित हैं जो 14 साल से कम उम्र के हैं,
  • आईएलओ द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि संक्रमित माता-पिता के बच्चों के साथ काफी भेदभाव किया जाता है, जिनमें 35% को मूलभूत सुविधा से वंचित होना पड़ता है और 17% को अपनी आमदनी के लिए घटिया स्तर के काम करने पड़ते हैं,
  • भारत में बाल श्रम की जटिल समस्या है जो गरीबी से गहरे तौर पर जुड़ी है,
  • वर्ष 1991 की जनगणना के मुताबिक भारत में 11.28 मिलियन बाल श्रमिक हैं,
  • बाल श्रम का 85% संख्य़ा ग्रामीण इलाकों में पाया जाता है। यह संख्या पिछ्ले दशक में बढ़ी है,
  • संरक्षण अनुमान के मुताबिक भारत में करीब 300,000 बच्चे व्यापारिक यौनवृति में लगे हुए हैं। ‘देवदासी’ जैसी परंपरा के जरिए देश के कई राज्यों में बाल वेश्यावृति को मान्यता दी गई है। सामाजिकतौर पर वंचित समुदाय की बच्चियों को देवताओं को समर्पित कर दिया जाता है और वे धार्मिक वेश्या बना दी जाती हैं। समर्पण निषेध अधिनियम 1982 के तहत ‘देवदासी’ की परंपरा पर रोक लगा दी गई है। यह परंपरा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश और असम में मौजूद है,
  • 50% से ज्यादा देवदासियां वेश्या बन जाती हैं, जिनमें करीब 40% शहरी चकलाघरों में यौन-व्यापार के धंधे में आ जाती हैं, वहीं शेष अपने गावों में ही वेश्यावृति में लिप्त रहती हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा अनुमानित 250,000 महिलाएं महाराष्ट्र और कर्नाटक सीमा पर देवदासियों के रूप में समर्पित हैं। वर्ष 1993 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक कर्नाटक के बेलगांव जिले की 9% देवदासियां एचआईवी/एड्स संक्रमित पाई गईं।
  • स्ट्रीट चिल्ड्रेन ऐसे बच्चे होते हैं जिनका अपने परिवारों से ज्यादा वास्तविक घर सड़क होता है। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें उन्हें कोई सुरक्षा, निगरानी या जिम्मेदार वयस्कों से कोई दिशा-निर्देश नहीं मिलती। मानवाधिकार संगठन के अनुमान के मुताबिक भारत में करीब 1 करोड़ 80 बच्चे सड़कों पर रहते या काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे अपराधों, यौनवृत्तियों, सामूहिक हिंसा तथा नशीले पदार्थों के शिकार हैं।

अनाथ एवं फुटपाथी बच्चे


अनाथ एवं फुटपाथी बच्चे

स्रोत : विकिपीडिया और येल स्कूल ऑफ एजुकेशन

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RAMKALYAN REGAR Feb 18, 2019 12:17 PM

Sir Jo बच्चे phutpat par भिक mang kar जीवन yapan kar rahe h उनकी हम किस तरह मदद करे की वो देश के अच्छे लोग बन sake?

Kailash suma Nov 12, 2018 01:07 PM

हम आपके साथ हैं श्रीमान जी और हमारा भी ये सब करने का मन है हमें भी प्रोसेसिंग समझाएं...💐

himanshu dasila Mar 20, 2018 10:43 PM

M chahta hu hmare ajkl ke jo youth h unko smjhakr sb ek sth milkr in anath bccho ko pdana hmara responsbility h

deepak singh bisht. Aug 10, 2017 12:32 PM

mera SBI logo se ye nivedn h ki aap un SBI jrurtmand logo ki help kro Jo ki beshay h ....apne liye to hr koe ji leta h dosto PR Jo log dusro ke liye jita h vo Bhut km hote h .khte h na bolne ko to ye insane esi bat ke deta h jaese ye Etna hi mhan h .mahan hoga PR hm ek swal q na kud se kre ki kya hmne kisi jrurtmnd ki shayta ki h ...

Kartikey Jun 11, 2017 12:22 PM

It is not necessary to give orphans money to survive. The love is very necessary to orphans give them love as you can give them. So that they loss aloneness

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