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निरीक्षण, तलाशी, जब्ती और गिरफ्तारी

इस पृष्ठ में निरीक्षण, तलाशी, जब्ती और गिरफ्तारी से सम्बन्धी सभी जानकारी दी गयी है।

शब्द तलाशीका क्या अर्थ है?

कानूनी शब्दकोश के अनुसार और विभिन्न न्यायिक निर्णयों में नोट के रूप में, शब्द तलाशी”, का सरल भाषा में अर्थ, सरकारी मशीनरी की एक कार्रवाई करना, देखना या एक स्थान, क्षेत्र, व्यक्ति, वस्तुओं इत्यादि का बड़ी सावधानी के साथ यह जानने के लिये निरीक्षण करना कि कहीं कुछ छिपाया तो नहीं गया है या किसी अपराध के साक्ष्यों की तलाशी के उद्देश्य के लिए  एक व्यक्ति या वाहन या परिसर आदि की तलाशी केवल कानून के उपयुक्त और वेध अधिकार करे अंतर्गत किया जा सकता है

निरीक्षण शब्द का क्या अर्थ है?

एमजीएल के अंतर्गत निरिक्षण शब्द एक नया प्रावधान है यह तलाशी की तुलना में एक नरम प्रावधान है जो अधिकारियों को कराधीन व्यक्ति के व्यापार के किसी भी स्थान पर और इसके साथ ही उस व्यक्ति जो माल के परिवहन में संलग्न है या जो स्वामी है या एक मालगोदाम या गोदाम का ऑपरेटर है उस तक पहुंच बनाने में सक्षम करता है।

निरीक्षण कार्यान्वयन करने के आदेश कौन तथा किन परिस्थिति में दे सकता है?

सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 67 के अनुसार, निरीक्षण का कार्यान्वयन सीजीएसटी/एसजीएसटी के संयुक्त आयुक्त या उससे ऊपर के रैंक के एक अधिकारी द्वारा लिखित अधिकार पत्र के अंतर्गत किया जा सकता है। संयुक्त आयुक्त उनसें उच्च अधिकारी इस तरह के प्राधिकार सिर्फ तभी दे सकते हैं जब उनके पास यह विश्वास करने के प्रयाप्त कारण हैं कि संबंधित व्यक्ति ने निम्न में से एक किया है:

i. आपूर्ति के किसी लेनदेन को दबाया है,

ii. हाथ में वस्तुओं के स्टॉक को दबाया है;

iii. ज्यादा इनपुट कर क्रेडिट का दावा किया है;

iv. कर के लिए सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम के किसी प्रावधान का उल्लंघन किया है,

v. एक ट्रांसपोर्टर या गोदाम के मालिक के पास कुछ माल रखा है जिसपर कर को भुगतान बचाया गया है या अपने खातों या माल को इस तरीके से किसी स्थान पर रख दिया है कि कर से बचने की संभावना हो

क्या इस धारा के अंतर्गत उचित अधिकारी किसी व्यक्ति की किसी संपति/परिसर का निरीक्षण अधिकृत कर सकते हैं?

नहीं, प्राधिकृति केवल सीजीएसटी/एसजीएसटी के अधिकारी को निम्न में से किसी एक के निरीक्षण करने के लिये दी जा सकती है:

i. कराधीन व्यक्ति के व्यापार का कोई स्थान;

ii. एक व्यक्ति जो वस्तुओं के परिवहन के कारोबार में संलग्न है उस व्यक्ति के व्यापार के किसी भी स्थान पर चाहे वह पंजीकृत कराधीन व्यक्ति है या नहीं,

iii. एक मालिक या मालगोदाम या गोदाम क संचालक क किसी व्यापारिक स्थान पर

एमजीएल के प्रावधानों के अंतर्गत तलाषी और जब्ती के लिए कौन आदेश दे सकता है?

संयुक्त आयुक्त या उससे ऊपर की रैंक का अधिकारी किसी अधिकारी को लिखित रूप में तलाशी और वस्तुओं, दस्तावेजों, केताबों या अन्य चीजों को जब्त करने की लिखित रूप में प्राधिकृति दे सकते हैं। संयुक्त आयुक्त इस तरह के प्राधिकार सिर्फ तभी दे कोई माल जब्ती के लिये उत्तरदायी है या कोई दस्तावेज या खाते या वस्तुएं किसी कार्यवाही के लिये प्रासंगिक हैं उन्हें किसी स्थान पर छिपाया गया है।

विश्वास करने के कारण का क्या अर्थ है?

विश्वास करने के कारण तथ्यों को जानने का ज्ञान, हालांकि प्रत्यक्ष ज्ञान के बराबर नहीं होना है जिससे एक तकसंगत, वैसे ही तथ्यों को जानने वाला, व्यक्ति तक संगत रूप से उसी तरह के नतीजे पर पंहुचता है। भारतीय दंड सहिता 1860 की धारा 26 के अनुसार , एक व्यक्ति को एक चीज का विश्वास करने का कारणरखते हुए कहा जाता है यदि उसके पास उस बात पर विश्वास करने का पर्याप्त कारण है किन्तु अन्यथा नहीं। "विश्वास करने के लिए कारणविशुद्ध रूप से व्यक्ति परक विचार से भिन्न बुद्धिमत्तापूर्ण देखभाल एवं मूल्यांकन पर आधारित एक उद्देश्य के लिए दृढ़ संकल्प का चिन्तन है। प्रासंगिक सामग्री और परिस्थितियों के आधार पर एक ईमानदार एवं उचित (तर्कसंगत) व्यक्ति का यह ( विश्वास करने के कारण”) होना चाहिए एवं होना ही चाहिए।

निरीक्षण या तलाषी और जब्ती की प्राधिकृति जारी करने से पहले, क्या कथित विश्वास करने के कारणको उचित अधिकारी द्वारा लिखित रूप में दर्ज किया जाना अनिवार्य है?

हालांकि अधिकारी को तलाशी के लिए एक प्राधिकृति जारी करने से पहले इस तरह के विश्वास के लिए कारणों को व्यक्त करना आवश्यक नहीं है, उसे वह सामग्री जिस पर उसका विश्वास आधारित था उसे विश्वास है उसका खुलासा करना होगा। विश्वास करने का कारण' प्रत्येक मामले में निरपवाद रूप से दर्ज किये जाने की जरूरत नहीं है। हालांकि, यह बेहतर होगा यदि सामग्री/ जानकारी आदि सर्च वारंट जारी करने से पहले या तलाशी की कार्यवाही से पहले दर्ज की जाएं।

सर्च वारंट क्या है और उसकी विषय-वस्तु क्या है?

तलाशी करने के लिये लिखित प्राधिकृति को आमतौर पर सर्च वारंट कहा जाता है। सर्च वारंट जारी करने के लिए सक्षम प्राधिकारी संयुक्त आयुक्त या उससे ऊपर के रैंक का अधिकारी है। एक सर्च वारंट में एक तर्कसंगत विश्वास का संकेत होना आवश्यक है जिसके कारण तलाशी की जा रही है। सर्च वारंट में निम्नलिखित विवरण शामिल करना चाहिए:

i. अधिनियम क अंतर्गत उल्लंघन,

ii. तलाशी किये जाने वाला परिसर,

iii. प्राधिकृत तलाशी करने वाले व्यक्ति का नाम और पदनाम,

iv. जारी करने वाले अधिकारी की गोल मुहर सहित पूर्ण पदनाम और नाम,

v. जारी करने की तारीख और स्थान,

vi. सर्च वारंट का क्रमांक नबर,

vii. वैधता की अवधि अथति एक दिन या दो दिन आदि

सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 130 के प्रावधानों के अंतर्गत कब वस्तुएं जब्ती के लिए उत्तरदायी हो जाती हैं?

सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 130 के व्यक्ति निम्न गतिविधियों में संलग्न रहता है:

(i) इस अधिनियम के प्रावधानों या उसके अंतर्गत बने नियमों का उल्लंघन करते हुए किसी भी वस्तुओं की

आपूर्ति करता है जो कर की चोरी में परिणत होती है;

(ii) इस अधिनियम के अंतर्गत कर का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी वस्तुओं नहीं रखता,

(iii) बिना पंजीकरण हेतु आवेदन इस अधिनियम के अंतर्गत किसी प्रकार की वस्तुओं की आपूर्ति करता है जिस पर कर का दायित्व है,

(iv) कर भुगतान से बचने के इरादे से सीजीएसटी/एसजीएसटी

अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के प्रावधानों का किसी भी प्रकार का उल्लंघन

एक अधिकारी द्वारा वैध तलाषी के दौरान किन शक्तियों का प्रयोग किया जा सकता है?

एक तलाशी करने वाले अधिकारी को पास तलाशी किये जाने वाले परिसर से वस्तुओं (जो जब्ती के लिए उत्तरदायी हैं) और दस्तावेजों, खाता बहियों या अन्य सामान (सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम के अंतर्गत किसी भी कार्यवाही के लिए प्रासंगिक) की तलाशी और जब्ती करने की शक्तियां होती हैं। तलाशी के दौरान, जिस परिसर पर एक अधिकारी को तलाशी के लिये प्राधिकृत किय गया है यदि उसे प्रवेश करने से इन्कार किया जाता है तब उस अधि कारी के पास परिसर के प्रवेश द्वार को तोड़ने की शक्ति भी प्राप्त है। इसी प्रकार, परिसर के भीतर तलाशी करते समय, वह किसी भी अलमारी या डिब्बे को तोड़ सकता है यदि उसे कथित अलमारी या बॉक्स की जांच करने से इन्कार किया जाता है और उसे उसमें किसी प्रकार की वस्तुओं, खातों, रजिस्टर या दस्तावेज़ के छिपा होने का संदेह है  वह परिसर को सीलबंद भी कर सकता है यदि उसे प्रवेश करने से इन्कार किया जाता है।

तलाशी के संचालन के लिए क्या प्रक्रिया है?

सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 67(10) निर्धारित करती है कि तलाशी दड प्रक्रिया संहिता, 1973 के प्रावधानों के अनुरूप क्रियान्वित की जानी चाहिए। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 100 तलाशी के लिए प्रक्रिया का वर्णन करती है

तलाशी अभियान के दौरान किन बुनियादी आवश्यकताओं का अवलोकन किया जाता है?

तलाशी के दौरान निम्नलिखित सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए:

सक्षम अधिकारी द्वारा जारी वैध सर्च वारंट के बिना परिसर की तलाशी नहीं ली जानी चाहिए।

वहाँ निरपवाद रूप से किसी आवास में तलाशी दल के साथ हमेशा एक महिला अधिकारी शामिल रहनी चाहिए

तलाशी शुरू करने से पहले अधिकारियों को परिसर के प्रमुख व्यक्ति को अपना पहचान पत्र दिखा कर अपनी पहचान का खुलासा करना चाहिए।

सर्च वारंट तलाशी शुरू करने से पहले परिसर के प्रमुख व्यक्ति को दिखाकर निष्पादित किया जाना चाहिए और उसके हस्ताक्षर सर्च वारंट पर ले लेने चाहिए जो प्रमाण होगा कि उक्त व्यक्ति ने सर्च वारंट देखा है। कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर भी सर्च वारंट पर लिये जाने चाहिए

तलाशी इलाके के कम से कम दो स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति में की जानी चाहिए। यदि ऐसे कोई निवासियों उपलब्ध/इच्छुक नहीं है, तब पास के किसी अन्य इलाके के निवासियों को तलाशी की गावाही को लिये निवेदन किया जाना चाहिए। गवाहों को तलाशी के उद्देश्य के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए।

तलाशी की कार्यवाही शुरू करने से पहले, तलाशी सहित परिसर के प्रमुख व्यक्ति को उनकी स्वयं की व्यक्तिगत तलाशी करने के लिए प्रस्तुत करना चाहिए इसी तरह, तलाशी पूर्ण हो जाने के बाद सभी अधिकारी और गवाहों को एक बार फिर उनकी स्वयं की व्यक्तिगत तलाशी करने के लिए प्रस्तुत करना चाहिए।

तलाशी की कार्यवाही का पंचनामा/महाजर तलाशी स्थल पर तैयार करना अति आवश्यक है। सभी बरामद/ जब्त की गई वस्तुओं, दस्तावेजों की सूची तैयार कर पंचनामा/महाजर के साथ संलग्न की जानी चाहिए। पंचनामा/महाजर और सभी बरामद/जब्त की गई वस्तुओं, दस्तावेज़ों की सूची पर गवाहों, परिसर प्रमुख,/ परिसर को स्वामी जिसक समक्ष तलाशी का संचालन किया गया है और प्रभारी अधिकारी जिसे तलाशी के लिये प्राधिकृत किया गया है निरपवाद रूप से उन सबके हस्ताक्षर लेने चाहिए।

तलाशी की समाप्ति के बाद, निष्पादित सर्च वारंट को उसके मूल रूप में उसके जारीकर्ता को तलाशी के संबंध में नतीजे तलाशी के नतीजे के रिपोर्ट सहित वापस लौटा देना चाहिए। जिन अधिकारियों ने तलाशी में भाग लिया है उनके नाम भी तलाशी वारंट के पीछे लिखे जा सकते हैं।

सर्च वारंट जारीकर्ता अधिकारी को जारी किए गए तथ वापस लौटाए गए सर्च वारंट के रिकार्ड का रजिस्टर बनाना चाहिए तथा प्रयोग किए गए सर्च वारंट क रिकार्ड ने रखना चाहिए।

अपने संलग्नक के साथ पंचनामा/महाजर की एक प्रति उस परिसर प्रमुख/ परिसर के स्वामी जहाँ पर तलाशी ली थी उसकी अभिस्वीकृति प्राप्त करने के साथ सौंप देनी चाहिए।

क्या एक सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिकारी किसी भी अन्य परिस्थितियों के अंतर्गत व्यापारिक परिसर में प्रवेष कर सकता है?

हाँ। सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 65 के अनुसार प्रवेश किया जा सकता है। कानून का यह प्रावधान सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 66 के अंतर्गत नामित सीजीएसटी/एसजीएसटी या एवं सीएसीजी या एक लागत लेखाकार या चार्टर्ड एकाउंटेंट की एक लेखा-परीक्षण की पार्टी को अनुमति के लिये बनाया गया है, लेखा-परीक्षण, जांच, सत्यापन और निरीक्षण के प्रयोजनों के लिये सर्च वारंट जारी किये बिना भी किसी व्यावसायिक परिसर में प्रवेश किया जा सकता है जैसा राजस्व के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक हो। हालांकि, उसके लिये सीजीएसटी या एसजीएसटी के अपर/संयुक्त आयुक्त के रैंक के अधिकारी द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृति जारी की जानी चाहिए। यह प्रावधान उस व्यवसायिक परिसर में प्रवेश की सुविधा प्रदान करता है जिसे कराधीन व्यक्ति द्वारा उसके प्रमुख या अतिरिक्त व्यापारिक स्थल के रूप में पंजीकृत नहीं किया गया, लेकिन वहां पर उसके खाता बहियां, दस्तावेज, कप्यूटर आदि रखे हैं जो लेखा-परीक्षण या कराधीन व्यक्ति के खातों के सत्यापन के लिए आवश्यक हैं।

शब्द जब्तीका क्या मतलब है?

सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम में शब्द जब्तीको विशेषरूप से परिभाषित नहीं किया गया है  लॉ लेक्सिकॉन शब्दकोष में, “जब्तीको कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत एक अधिकारी द्वारा संपत्ति का कब्जा लेने की कार्रवाई के रूप में परिभाषित किया गया है।

आम तौर पर इसका आशय संपत्ति के मालिक की इच्छा की विरूद्ध जबरन कब्जा प्राप्त करना या जिसके कब्जे में संपत्ति है एवं जो वह उसे बीटना/भाग लेना नहीं चाहता था।

क्या जीएसटी अधिनियम के पास वस्तुओं और वाहनों को नजरबंद (Detention) रखने की भी शक्ति है?

हाँ, सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 129 के अंतर्गत एक अधिकारी के पास मालवाहक वाहन (एक ट्रक या अन्य प्रकार का वाहन) के साथ-साथ वस्तुओं को हिरासत में लेने की शक्ति है। ऐस उस तरह की वस्तुओं के साथ किया जा सकता है जिन्हें सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए मार्ग में ले जाया जा रहा है या जमा किया गया हो। ऐसी वस्तुएं जिन्हें भण्डारित किया गया हो या स्टोर में जमा किया गया हो परन्तु उनका कोई हिसाब नहीं रखा जाता उन्हें हिरासत में लिया जा सकता है। इस तरह के सामान और वाहन को उनपर लागू कर के भुगतान के बाद या समतुल्य राशि की सुरक्षा राशि प्रस्तुत करने पर छोड़ा जा सकता है।

कानून में जब्ती और हिरासत के बीच क्या भेद है?

संपत्ति के मालिक या जिस व्यक्ति के कब्जे में संपत्ति है उस व्यक्ति को समय के किसी विशेष क्षण पर कानूनी आदेश/नोटिस द्वारा संपति में प्रवेश करने से इन्कार करने को हिरासत कहा जाता है। जब्ती विभाग द्वारा वस्तुओं पर वास्तविक कब्जा लेना है। जब्ती का आदेश तब जारी किया जाता है जब यह संदेह होता है कि वस्तुएं जब्ती के लिए उत्तरदायी हैं। हिरासत तब की जाती है जब पूछताछ/जांच करने के बाद पूरा विश्वास हो जाता है कि वस्तुएं जब्ती के लिए उत्तरदायी हैं।

जीएसटी अधिनियम में तलाशी या जब्ती के संबंध में प्रदान किये गये सुरक्षा उपाय क्या हैं?

सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 67 में तलाशी या जब्ती की शक्ति के संबंध में कुछ सुरक्षा उपाय प्रदान किये गए जाते हैं। ये निम्न प्रकार से हैं:

i. जब्त की गई वस्तुएं या दस्तावेज उनके निरीक्षण के लिए आवश्यक अवधि के बाद नहीं रखे जाने चाहिए,

ii. जिस व्यक्ति की अभिरक्षा में से दस्तावेज़ जब्त किये गये हैं वह दस्तावेजों की फोटोकॉपी ले सकता है,

iii. जब्त की गई वस्तुओं के लिये, यदि जब्त करने के साठ दिनों के भीतर नोटिस जारी नहीं किया जाता, तब उस व्यक्ति को वह वस्तुएं वापस लौटा दी जाएंगी जिसके कब्जे से वे जब्त की गई थी। साठ दिनों की यह अवधि छह महीने की अधिकतम अवधि तक न्यायोचित आधार पर बढ़ाई जा सकती है,

iv. जब्त करने वाले अधिकारी द्वारा सामान/वस्तुओं की सूची बनाई जाएगी,

v. सीजीएसटी नियमों के अंतर्गत कुछ वस्तुओं की श्रेणियां निर्दिष्ट (जैसे जल्दी खराब होने वाली, खतरनाक आदि) की गयी है जिनका जब्ती के तुरंत बाद निपटारा किया जा सकता है,

vi. दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तलाशी और जब्त करने से संबंधित प्रावधान लागू होंगे। हालांकि, दण्ड प्रक्रिय संहिता की धारा 165 की उपधारा (5) के संबंध में एक संशोधन किया गया है - बजाय तलाशी से संबंधित किसी रिकार्ड की प्रतिलिपि अपने निकटतम मजिस्ट्रेट, जिसे अपराध का संज्ञान लेने का अधिकार है, के पास भेजने के उन्हें सीजीएसटी/एसजीएसटी के प्रमुख आयुक्त/आयुक्त आयुक्त को भेजा जाना है।

क्या कराधीन वस्तुओं के परिवहन के दौरान कोई विशेष दस्तावेज़ रखना अनिवार्य है?

सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 68 के अंतर्गत, एक परिवहन वाहन के प्रमुख को यदि वह ऐसा माल ले जा रहा है जिसका मूल्य पचास हजार रुपए से अधिक है तब उसे एक निधरित दस्तावेज रखना आवश्यक हो सकता है।

शब्द गिरफ्तार का क्या मतलब है?

शब्द गिरफ्तार को सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की में परिभाषित नहीं किया गया है। हालांकि, न्यायिक घोषणाओं के अनुसार, यह अर्थ है किसी व्यक्ति को कानूनी आदेश या अधिकार के अंतर्गत अपने अधिकार में लेना है। दूसरे शब्दों में एक व्यक्ति को गिरफतार किया गया कहा जाता है जब उसे ले लिया जाता है और कानून वैध वारंट की शक्ति या रंग से उसकी स्वतंत्रता को नियंत्रित किया जाता हे

सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम के अंतर्गत सक्षम अधिकारी किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी को कब प्राधिकृत कर सकता है?

सीजीएसटी/एसजीएसटी के आयुक्त, एक सीजीएसजी/ एसजीएसटी अधिकारी को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिये अधिकृत कर सकता है, यदि उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि व्यक्ति ने अपराध किया है जिसकी सजा सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 132(1) (ए)(बी)(सी)(डी) या धारा 132 (2) के अंतर्गत निर्धारित की गई है। अनिवार्यता इसका अर्थ यह है कि एक व्यक्ति को केवल तभी गिरफ्तार किया जा सकता है जहां कर चोरी दो करोड़ रूपये से अधिक हो यहां, जहां वह पहले सीजीएसटी अधिनियम के अंतर्गत दोषी ठहराया गया हो।

एक व्यक्ति जिसे गिरफ्तारी रखा गया है उसके लिये सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम के अंतर्गत प्रदान किये सुरक्षा उपाय क्या हैं?

धारा 69 के अंतर्गत एक गिरफ्तार व्यक्ति को कुछ सुरक्षा उपाय प्रदान किये गये है: वे हैं:

i. यदि एक व्यक्ति को एक संज्ञेय अपराध के लिए गिरफ्तार किया है, उसे गिरफ्तार करने के आधार के बारे में लिखित रूप में सूचित किया जाना चाहिए और उसकी गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना आवश्यक है,

ii. यदि एक व्यक्ति को एक गैर-संज्ञेय और जमानती अपराध के लिए गिरफ्तार किया है, तब सीजीएसटी/एसजीएसर्ट के उप/ सहायक आयुक्त उसे जमानत पर रिहा कर सकते हैं और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436 के अंतर्गत वह पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी के रूप में उन सभी प्रावधानों के अधीन होगा,

iii. सभी गिरफ्तारी दड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अनुसार होनी चाहिए,

गिरफ्तारी के दौरान कौन सी सावधानियों बरती जानी चाहिए?

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में गिरफ्तार करने और उसकी प्रक्रिया से संबंधित प्रावधानों का पालन किया जाना चाहिए। इसलिए सीजीएसटी/एसजीएसटी के सभी क्षेत्र अधिकारियों को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के प्रावधानों के साथ अच्छी तरह परिचित होना आवश्यक है।

सीआरपीसी, 1973 की धारा 57 के एक प्रावधान पर ध्यान आकर्षित करना बहुत महत्वपूर्ण है जो प्रदान करता है कि एक व्यक्ति को बिन वारंट के गिरफतार करने पर हिरासत में लंबी अवधि तक नहीं रख जा सकता, मामले की परिस्थिति के अंतर्गत, यह उचित है लेकिन वह 24 घंटों (गिरफ्तारी की जगह से यात्रा के समय को छोड़कर मजिस्ट्रेट की अदालत तक) से अधिक नहीं होगा। इस अवधि के भीतर, जैसा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 56 कि अंतर्गत प्रदान किया गया है, गिरफ्तार करने वाला व्यक्ति बिना वारंट के गिरफ्तार किये व्यक्ति को मामलें में प्रस्तुत करेगा।

डी. के. बसु बनाम प. बंगाल सरकार को मामले का एक ऐतिहासिक फैसला 1997(1) एससीसी 416 में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ विशिष्ट दिशानिर्देश निर्धारित किये है जिनका गिरफ्तारी करते समय पालन करना आवश्यक था। जबकि इसका संबंध पुलिस से है, इसका अनुसरण उन सभी विभागों द्वारा करना आवश्यक है जिन्हें गिरफ्तारी की शक्तियां प्रदान की गई हैं। ये निम्न प्रकार हैं:

i. वे पुलिसकर्मी जो गिरफ्तारी और गिरफ्तार व्यक्तियों से पूछताछ करते हैं उन्हें सटीक, दृश्यता और स्पष्ट पहचान और विवरण एक रजिस्टर में दर्ज करने चाहिए।

ii. पुलिस अधिकारी जो गिरफ्तारी करते हैं वह गिरफ्तारी के समय एक गिरफ्तारी ज्ञापन तैयार करेंगे और ऐसे ज्ञापन को कम से कम एक गवाह द्वारा अभिप्रमाणित किया जाएगा, इलाके का एक सम्मानित व्यक्ति हो सकता है जहां पर उनक पदनाम क साथ नाम के बिल्ले जो या तो परिवार का एक सदस्य या गिरफ्तारी की गई है। इसे गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा भी प्रतिहस्ताक्षरित किया जाएगा और उसमें गिरफ्तारी का समय और तिथि शामिल होनी चाहिए।

iii. एक व्यक्ति जिसे गिरफ्तार किया गया है या हिरासत मे रखा गया है और एक पुलिस स्टेशन या पूछताछ केंद्र या अन्य लॉक अप में निगरानी में रखा गया है, उसे जितनी शीघ्र व्यावहारिक है उसके एक दोस्त या रिश्तेदार या अन्य परिचित व्यक्ति या ऐसे व्यक्ति को सूचित करना चाहिए जिसे उसके कल्याण में रुचि है, कि उसे गिरफ्तार किया गया है ओर अब किसी विशेष स्थान पर हिरासत में रखा गया है, सिवाय उस स्थिति को छोड़कर जिसमें गिरफ्तारी के ज्ञापन का सत्यापन गवाह स्वयं ऐसा एक दोस्त या गिरफ्तार व्यक्ति का कोई रिश्तेदार है।

iv. गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तार करने का समय, स्थान और हिरासत में रखे जाने वाला स्थल पुलिस द्वार अधिसूचित किया जाना चाहिए और जहां गिरफ्तार व्यक्ति का अगला दोस्त या रिश्तेदार जिले या शहर से बाहर रहता है वहां पर जिले के विधिक स्थानीय सहायता संगठन के माध्यम से क्षेत्र के संबंधित पुलिस स्टेशन पर तार के माध्यम से गिरफ्तारी के बाद 8 से 12 घंटे की अवधि के भीतर करना चाहिए।

v. व्यक्ति की गिरफ्तारी के संबंध में हिरासत स्थल की प्रविष्टी एक डायरी में दर्ज की जानी चाहिए जिसमें उसके अगले करीबी दोस्त का नाम लिखा जाना चाहिए जिसे गिरफ्तारी के बारे में सूचित किया गया है और उन पुलिस अधिकारियों के ब्यौरे दर्ज करने चाहिऐ जिनके अधिकार में उस गिरफ्तार व्यक्ति को रखा गया है।

vi. गिरफ्तार व्यक्ति को, उसको निवेदन पर, गिरफ्तारी के समय उसकी छोटी-बड़ी चोटों के लिये जांच की जानी चाहिये और यदि उसके शरीर में कोई पाई जाती है, उसे उसी समय दर्ज कर देना चाहिए। 'निरीक्षण ज्ञापन' गिरफ्तार व्यक्ति और गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर किया जाना चाहिए और उसकी एक प्रति गिरफ्तार व्यक्ति को प्रदान की जानी चाहिए

vii. हिरासत की दौरान गिरफ्तार व्यक्ति की स्वास्थय जांच हर 48 घंटे बाद प्रशिक्षित चिकित्सक द्वारा की जानी चाहिए जिसकी नियुक्ति

निदेशक, स्वास्थ्य सेवा, संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के स्वास्थ्य सेवा द्वारा नियुक्त अनुमोदित डॉक्टरों के पैनल में से की गई है, साथ ही निदेशक, स्वास्थ्य सेवा को सभी तहसीलों और जिलों के लिए एक पैनल बनाना चाहिए।

viii. गिरफ्तारी ज्ञापन सहित ऊपर उल्लिखित सभी दस्तावेजों की प्रतियां मैजिस्ट्रेट को उनके रिकार्ड के लिये भेज दी जानी चाहिए।

ix. पूछताछ के दौरान गिरफ्तार व्यक्ति को उसके वकील से मिलने की अनुमति दी जा सकती है, यदपि पूछताछ के सारे समय नहीं

x. सभी जिलों और राज्य मुख्यालयों में एक पुलिस कट्रोल रूम प्रदान करना चाहिए जिसमें गिरफ्तारी से संबंधित और गिरफ्तार व्यक्ति की हिरासत के स्थल की सूचना गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी द्वारा, गिरफ्तारी करने के 12 घंटे के भीतर, संचारित की जाएगी और पुलिस नियंत्रण कक्ष पर और इसे एक विशिष्ट नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

सीबीईसी में गिरफ्तारी के लिए किन व्यापक दिशा निर्देशों का अनुपालन करना चाहिए?

गिरफ्तार करने के निर्णय में अलग अलग मामलों में विभिन्न कारकों पर विचार करके लिए जाते हैं, जैसे, अपराध की प्रकृति एवं गंभीरता, कितने परिमाण में शुल्क की चोरी की गई है या अनुचित तरीके से क्रेडिट का गलत लाभ उठाया, साक्ष्य की प्रकृति और गुणवत्ता, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने की संभावना के साथ या गवाहों को प्रभावित करना, जांच के साथ सहयोग करना, आदि गिरफ्तारी के लिए शक्ति का निष्पादन सावधानी के साथ मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद निष्पादित करना चाहिए जिनमें निम्न शामिल हो सकते हैं:

i. अपराध की उचित जांच सुनिश्चित करना,

ii. ऐसे व्यक्ति को फरार होने से रोकने के लिए,

iii. वस्तुओं की संगठित तस्करी से जुड़े मामलों या छिपाने के माध्यम से सीमा शुल्क की चोरी,

iv. बेनामी आयात/छदमी एवं गैर-विद्यमान व्यक्तियों के नाम से किए जा रहे निर्यात/आईईसी, इत्यादि करने वाले अति चतुर या प्रमुख संचालक;

v. जहां शुल्क से बचने का इरादा स्पष्ट है और अपराधी मन के तत्व/ दोषी मन साफ नजर आता है,

vi. साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना की रोकथाम,

vii. गवाहों को डराना या प्रभावित करना, तथा

viii. बड़ी मात्रा में शुल्क या सेवा कर की चोरी जिसकी कीमत कम से कम एक करोड़ रुपए से अधिक है।

एक संज्ञेय अपराध क्या है?

आमतौर पर, संज्ञेय अपराध का मतलब एक गंभीर वर्ग का अपराध है जिसके संबंध में एक पुलिस अधिकारी के पास बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार है और अदालत की अनुमति के साथ या बिना अनुमति लिए जांच शुरू करने का अधिकार है।

एक-गैर संज्ञेय अपराध क्या है?

गैर-संज्ञेय अपराध अपेक्षाकृत कम गंभीर अपराध है जिसके संबंध में एक पुलिस अधिकारी के पास बिना वारंट के गिरफ्तारी का अधिकार नहीं है और बिना अदालत के आदेश के जांच शुरू नहीं की जा सकती

सीजीएसटी अधिनियम के अंतर्गत संज्ञेय और गैर-संज्ञेय अपराध क्या हैं?

सीजीएसटी अधिनियम की धारा 132 में, यह प्रदान किया जाता है कि जहां कराधीन वस्तुओं और/या सेवाओं से संबंधित अपराधों में कर चोरी 5 करोड़ रुपये से अधिक हो जाती है, वह संज्ञेय और गैर-जमानती हो जाएंगे  अधिनियम के अंतर्गत अन्य अपराध के गैर-संज्ञेय और जमानती हैं

सीजीएसटी अधिनियम के अंतर्गत उचित अधिकारी कब सम्मन जारी कर सकते हैं?

सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 70 विधिवत सीजीएसटी/एसजीएसटी के अधिकृत अधिकारी को यह अधिकार प्रदान करता है कि वे सम्मन जारी कर एक व्यक्ति को उपस्थित रहने के लिये बुलाएं जिससे वह व्यक्ति सम्मन जारी करने वाले व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत रहकर या तो साक्ष्य प्रस्तुत करे या दस्तावेज पेश करे या पूछताछ में कोई भी अन्य तथ्य रखे जो अधिकारी जानना चाहता है। दस्तावेजों या अन्य तत्वों को प्रस्तुत करने के लिए दिया सम्मन कुछ निर्दिष्ट दस्तावेजों या सामान प्रस्तुत करने के लिए है या सभी दस्तावेजों को प्रस्तुत करने या कुछ निश्चित विवरण के सामान जो सम्मन जारी किए गए व्यक्ति के कब्जे या नियंत्रण में हो सकते हैं।

जिस व्यक्ति को सम्मन भेजा गया है उसकी क्या जिम्मेदारियां हैं?

जिस व्यक्ति को सम्मन भेजा गया है वह या तो व्यक्तिगत रूप से या अपने प्राधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से उपस्थित रहने के लिये कानूनी तौर पर बाध्य है और कथित सम्मन जारी करने वाले अधिकारी के समक्ष सत्य प्रकट करने के लिये बाध्य है जिसने किसी वषय पर उसे सम्मन जारी किया है जो निरीक्षण का मामला है और उसे वे सब दस्तावेज़ और अन्य संबंधित सामग्री प्रस्तुत करनी होगी जसकी आवश्यकता हो सकती है

सम्मन प्राप्त करने के बाद गैर-उपस्थिति के क्या परिणाम हो सकते हैं?

जिस अधिकारी ने सम्मन जारी किया है उस अधिकारी के समक्ष कार्यवाही एक न्यायिक कार्यवाही के समान मानी जाएगी। यदि एक व्यक्ति बिना उचित औचित्य के सम्मन पर दी गई तारीख पर उपस्थित नहीं होता, उसके विरूद्ध भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 174 के अंतर्गत मुकदमा चलाया जा सकता है। यदि वह सम्मन प्राप्त करने से बचने के लिए फरार हो जाता है, तब उस पर भारतीय दंड संहिता की धारा 172 के अंतर्गत मुकदमा चलाया जा सकता है और इस मामले में यदि वह दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख/रिकार्ड नहीं प्रकट करता, उसपर भारतीय दंड संहिता की धारा 175 के अंतर्गत मुकदमा चलाया जा सकता है। यदि किसी मामले में वह झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करता है, तब उसपर भारतीय दंड संहिता की धारा 193 के अंतर्गत मुकदमा चलाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, अगर एक व्यक्ति सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिकारी के समक्ष पेश नहीं होता जिन्होंने उसे सम्मन जारी किया है, तब सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 122(3)(डी) के अंतर्गत पच्चीस हजार रूपए तक के दंड के लिए उत्तरदायी होगा।

सम्मन जारी करने के लिए क्या दिशा निर्देश हैं?

वित्त मंत्रालय को राजस्व विभाग करे कन्द्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) ने समय-समय पर यह सुनिश्चित करने के लिये दिशा-निर्देश जारी किये हैं कि सम्मन प्रावधानों का क्षेत्र/फील्ड में दुरुपयोग नहीं किया जाए। इन दिशानिर्देशों के कुछ महत्वपूर्ण मुख्य तथ्य यहां दिये जा रहे हैं:

· सम्मन अंतिम उपाय के रूप में जारी किए जाएं जहां निर्धारित सहयोग नहीं कर रहे हैं और इस खंड का शीर्ष प्रबंधन के लिए प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए,

· सम्मन की भाषा कठोर और कानूनी नहीं होनी चाहिये जो अनावश्यक मानसिक तनाव और प्राप्तकर्ता को लिये शर्मिदगी का कारण बन जाए,

· अधीक्षकों द्वारा सम्मन सहायक आयुक्त और उसके उपर की रैंक के अधिकारियों की पूर्व लिखित अनुमति प्राप्त कर जारी किया जाना चाहिए और सम्मन में जारी करने का कारण लिखित रूप में दर्ज किया जाना चाहिए,

· जहां परिचालन कारणों से, कथित अधिकारियों से पूर्व लिखित अनुमति प्राप्त करना संभव नहीं है, ऐसी स्थिति में मौखिक/ टेलीफोन पर अनुमति लेकर उसे लिखित रूप में दर्ज करने के बाद कथित अधिकारी को यथाशीघ्र संभव समय पर तद्नुसार सूचित कर दें,

· सभी मामलों में, जहां सम्मन जारी किए जाते हैं, सम्मन जारी करने वाले अधिकारी को एक रिपोर्ट प्रस्तुत करना चाहिए या मामले की फाइल में कार्यवाही का संक्षिप्त रिकॉर्ड, जिस अधिकारी ने सम्मन जारी करने की प्राधिकृति दी थी, उसे प्रस्तुत कर देनी चाहिए,

· बड़ी कपनियों या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के वरिष्ठ प्रबंधन के अधिकारियों जैसे सीईओ, सीएफओ, महाप्रबंधकों को आमतौर पर पहली बार सम्मन जारी नहीं किया जाना चाहिए उन्हें तभी सम्मन जारी करने चाहिए जब जांच-प्रक्रिया में संकेत मिलता है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी है जिसके कारण राजस्व की हानि हुई है।

सम्मन जारी करने के समय किन सावधानियों का ध्यान रखना चाहिए?

आम तौर एक व्यक्ति को सम्मन देने से पहले निम्नलिखित सावधानियां अपनाई जानी चाहिए: -

(i) सम्मन उपस्थिति के लिये जारी नहीं किया जाना चाहिए जहां यह उचित नहीं है। सम्मन की शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब किसी जांच की कार्यवाही की जा रही है और उसमें व्यक्ति की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती हे

(ii) आम तौर पर, सम्मन बारंबार जारी नहीं किये जाने चाहिए। जहाँ तक व्यावहारिक हो, आरोपी या गवाह का बयान कम से कम उपस्थितियों में दर्ज किया जाना चाहिए

(iii) सम्मन में दिए गए उपस्थिति के समय का सम्मान करें। किसी भी व्यक्ति को उसके बयान दर्ज करने से पहले ज्यादा देर तक प्रतीक्षा नहीं करवानी चाहिए सिवाय उस परिस्थिति को छोड़कर जब एक रणनीति के मामले के तहत जानबूझकर ऐसा करने का निर्णय लिया गया हे

(iv) प्राथमिकता के साथ, बयान कार्यालय समय के दौरान दर्ज किये जाने चाहिए हालांकि मामलों के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बयान दर्ज करने के स्थान और समय के मामले में अपवाद किया जा सकता हैं।

क्या अधिकारियों का कोई ऐसा वर्ग है जो सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिकारियों की सहायता के लिए आवश्यक हैं?

सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम की धारा 72 के अंतर्गत, निम्न अधिकारियों सशक्त किया गया है और एमजीएल निष्पादन के लिये इन्हें सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिकारियों की सहायता करना आवश्यक हैं। सीजीएसटी/एसजीएसटी अधिनियम में निर्दिष्ट की गई श्रेणियां निम्न प्रकार से हैं:

i. पुलिस;

ii. रेलवे,

iii. सीमा शुल्क,

iv. जीएसटी कर संग्रह में संलग्न राज्य/केन्द्र सरकार के अधिकारी

v. भू-राजस्व के संग्रह में संलग्न राज्य/केन्द्र सरकार के

vi. सभी गांव के अधिकारी

vii. अन्य कोई भी श्रेणी के अधिकारी जिन्हें केंद्र/राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किया जा सकता है।

स्रोत: भारत सरकार का केंद्रीय उत्पाद व सीमा शुल्क बोर्ड, राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय

3.05882352941

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