অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

अम्लीय मृदा में चूना/डालोमाईट का प्रयोग एवं प्रबन्धन

परिचय

झारखण्ड में लगभग 10 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि अम्लीय भूमि के अंतर्गत आती है, जो मुख्यतः दुमका, जामताड़ा, पूर्वी सिंहभूम, रांची, गुमला एवं गढ़वा जिलों में पायी जाती हैं।  अम्लीय भूमि को समस्या ग्रस्त भूमि कहते हैं, क्योंकि इसमें अम्लीयता के कारण उसकी उपजाऊ शक्ति में कमी आ जाती है। ऐसी भूमि से उत्पादन की पूर्ण क्षमता दोहन करने के लिए रसायनिक खादों के साथ-साथ चूने का सही प्रयोग सबसे अटल व उपयोगी उपाय हैं।

मिट्टी की अम्लीयता एक प्राकृतिक गुण है, जो कि फसलों की पैदावार पर महत्वपूर्ण असर डालता अहि। जहाँ अधिक वर्षा के कारण  भूमि की उपरी सतह से क्षारीय तत्व जैसे –कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि पानी में बह जाते हैं जिसके परिणाम स्वरुप मृदा पी.एच. मान 6.5 से कम हो जाता है, ऐसी भूमि को हम अम्लीय भूमि कहते हैं।

अम्लीयता भूमि की समस्याएं

  1. अम्लीय भूमि में हाइड्रोजन व एल्युमिनियम की अधिकता से पौधों की जड़ों की समान्य वृद्धि रुक जाती है, जिसके कारण जड़े छोटी, मोटी और इकट्ठी रह जाती है।
  2. भूमि में मैगनीज और आयरन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे पौधे कई प्रकार की बीमारियों का ग्रस्त हो जाते हैं।
  3. अम्लीयता के कारण फास्फोरस व मोलिब्डेनम की घुलनशीलता कम हो जाती है, पौधों को इसकी उपलब्धता कम हो जाती है।
  4. कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटाश व् बोरोन की कमी हो जाती है।
  5. पौधे के लिए आवश्यक पोषक तत्वों में असंतुलन आ जाता है, जिससे पैदावार कम हो जाती है।
  6. अम्लीयता के कारण सूक्ष्म जीवियों की संख्या व कार्यकुशलता में कमी आ जाती है, जिसके परिणाम स्वरुप नाइट्रोजन की स्थिरीकरण व कार्बनिक पदार्थों का विघटन कम हो जाता है।

अम्लीयता भूमि का प्रबन्धन

वास्तव में जिस भूमि का पी.एच. 5.5 से नीचे हो इसमें हमें अधिक पैदावार हेतु प्रबन्धन की आवश्यकता होती है। झारखण्ड राज्य में लगभग 4 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि का पी.एच. 5.5 से नीचे हैं। देश भर में अम्लीय भूमि पर हो रहे वैज्ञानिक शोधों से अब यह बात पैदावार बिलकुल तय है कि चूने के प्रयोग से भूमि की अम्लीयता खत्म कर इसकी पैदावार में बढ़ोतरी की जा सकती है। इसके लिए बजारू चूना खेतों में डालने चूना खेतों में डालने से काम लाया जा सकता है।

अम्लीय क्षेत्रों पर किये गये शोधों के निष्कर्ष पर यह सिद्ध हो चूका है कि बाजारू चूना के अलावे अन्य क्षेत्रों में आसानी से उपलब्ध बेसिक स्लैग, प्रेस मड, लाईम शेल, पेपर मिल स्लज इत्यादि का प्रयोग सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

चूना का मृदा पर प्रभाव

चूना भूमि की रसायनिक, भौतिक एवं जैविक गुणों में सुधार का कृषि उत्पादन बढ़ाने में सहायता करता है। चूना का मृदा पर प्रभाव निमानंकित है-

रसायनिक प्रभाव

  1. हाइड्रोजन की मात्रा कम कर मिट्टी का पी.एच. मान बढ़ाता है।
  2. एल्युमिनियम, मैगनीज व् लोहा की घुलनशीलता को कम करता है।
  3. कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटाशियम की मात्रा को बढ़ाता है।

भौतिक प्रभाव

  1. चूना का प्रयोग भूमि  की बनावट को अच्छा करता है।
  2. जड़ों की वृद्धि में योगदान देता है।

जैविक प्रभाव

  1. चूना डालने से सभी प्रकार के जीवाणुओं में वृद्धि होती है, जो नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं।
  2. चूना डालने से हानिकारक कीटाणु समाप्त हो जाते हैं।
  3. सूक्ष्म जीवियों कि कार्य क्षमता में बढ़ोतरी होने से नाईट्रेट और सल्फेट बनने की क्रिया में वृद्धि होती है।

चूना के सही मात्रा का निर्धारण

अम्लीय भूमि को अच्छा बनाने हेतु चुना की कितनी मात्रा डाली जाए, यह प्रयोगशाला में मिट्टी परीक्षण द्वारा तय होती है। चूना की मात्रा का निर्धारण मुख्यतः चूना के रूप में प्रयोग किये जाने वाले पदार्थ के कणों का व्यास, मृदा पी.एच एवं मिट्टी की संरचना पर न्रिभर करता है। साधारणतः अम्लीय भूमि की पी.एच मान उदासीन स्तर पर पहुंचाने के लिए लगभग 30-40 क्विंटल चूना प्रति हेक्टेयर आवश्यकता पड़ती है। इसे बोआई से पहले छिंट कर खेत में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। इसका असर 4-5 साल तक जमीन में रहता है। अतः जहाँ चूना की मांग के हिसाब से चूना भूमि में डाला गया हो वहां 4-5 साल तक इसे डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस विधि द्वारा चूना डालने से किसानों को एक बार अधिक खर्च करना पड़ता है। नई खोजों के अनुसार यह पाया गया कि मात्रा 3-4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर चूना प्रतिवर्ष  बरसात के मौसम में फसल की बोआई के समय नालियों में डालने से पैदावार में वृद्धि की जा सकती है। क्योंकि चूना कम घुलनशील होता है, इसलिए बारीक बढ़ाई जा सकती है। चूना प्रयोग की यह विधि कम खर्चीला है, इसे हर साल डालना होता है, जब तक भूमि का पी.एच. मान 6.0 तक न पहुँच जाए।

आज के समय जब रसायनिक उर्वरक का मूल्य तेजी में बढ़ता जा रहा है, अम्लीय भूमि में कम्पोस्ट/भर्ती कम्पोस्ट के साथ चूना का प्रयोग कर किसानों द्वारा रासायनिक उर्वरक पर होने वाली खर्च को बचाया जा सकता है। जिससे कृषि व्यवसाय को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।

स्त्रोत एवं सामग्रीदाता: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार



© 2006–2019 C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate