অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

टिकाऊ खेती की अनुशंसाएँ

भूमिका

मिट्टी जाँच के आधार पर संतुलित मात्रा में अनुशंसित उर्वरक, जैविक एवं जीवाणु खाद के व्यवहार से समेकित पोषक तत्वों के आयामों को अपनाकर लंबे समय तक भूमि से फसल की निरंतर अच्छी ऊपज प्राप्त की जा सकती है अर्थात टिकाऊ खेती की परिकल्पना को साकार किया जा सकता है।

झारखण्ड राज्य में टिकाऊ खेती की अनुशंसाएँ

मृदा के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए वर्षो अनुसंधान के उपरांत सफल खेती हेतु झारखंड प्रदेश के अनुकूल निम्नलिखित तकनीकी अनुशंसाएँ की गई है:

  • टिकाऊ खेती के लिए मकई-गेहूँ, सोयाबीन-गेहूँ या धान-गेहूँ फसल प्रणाली में समेकित पोषक तत्व प्रबंधन हेतु गोबर की खाद या कम्पोस्ट की 5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से (25 किलो नेत्रजन) व्यवहार करें।
  • अम्लीय भूमि में मकई, गेहूँ, दलहनी एवं तेलहनी फसलों की खेती के लिए अनुशंसित अकार्बनिक उर्वरक-नेत्रजन, स्फूर एवं पोटाश के साथ 3-4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से चूना का प्रयोग कतार में करें। इससे 20 प्रतिशत उपज में वृद्धि की संभावना होगी। जिन खेतों का पी.एच. 5.5 से 6.5 तक है, वहाँ 3 क्विंटल तथा पी.एच. 5.5 से कम है वहाँ 4 क्विंटल चूना का प्रयोग करना चाहिए। डोलोमाइट/बेसिक स्लैग के व्यवहार करने पर दोगुनी मात्रा अर्थात 6-8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से व्यवहार करें।
  • अम्लीय भूमि में अत्यधिक अम्लीयता बढ़ाने वाले उर्वरकों जैसे – अमोनियम या अमोनियम क्लोराइड का व्यवहार नहीं करना चाहिए।
  • दलहनी एवं तेलहनी फसलों में अधिक उपज प्राप्त करने के लिए नेत्रजन, स्फूर एवं पोटाश की अनुशंसित मात्रा के साथ-साथ 30 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से सल्फर (सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में) व्यवहार करना चाहिए। एस.एस.पी. में 12 प्रतिशत सल्फर मौजूद रहता है। दलहनी एवं तेलहनी फसलों जैसे – चना, मटर, मसूर, अरहर, मूंग, मूंगफली एवं सोयाबीन के बीजों का उपचार के लिए फसल विशेष के राइजोबियम कल्चर (जीवाणु खाद) का प्रयोग करें।
  • फसल उत्पादन में लगातार नेत्रजन (नाइट्रोजन) मात्र का व्यवहार करने से फसलों द्वारा उपयोग किये गये फास्फोरस, पोटाश एवं अन्य तत्वों की पूर्ति न होने की दशा में भूमि में इन तत्वों का स्तर गिरता चला जाता है। जिससे मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • संतुलित उर्वरक के साथ जैविक खाद (कम्पोस्ट, वर्मी या अजोला) एवं जीवाणु खाद (फसल विशेष राइजोबियम कल्चर, एजोटोबैक्टर कल्चर, माइकोराइजा कल्चर, पी.एस.बी. कल्चर, नील हरित शैवाल) का व्यवहार करने से मिट्टी की उर्वरता एवं फसलोत्पादन में निरंतरता बनी रहती है।
  • फसलों के उत्पादन में पोटाशधारी उर्वरक का अनुशंसित मात्रा में प्रयोग करने से फसलों एवं सब्जियों की भण्डारण क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होता है। साथ ही साथ कीट व्याधि से लड़ने की क्षमता में वृद्धि होती है।
  • दलहनी एवं तेलहनी फसलों वाली खेतों की मिट्टी में सल्फर की कमी को दूर करने के लिए एस.एस.पी., फास्फो जिप्सम एवं सल्फर मिश्रित उर्वरक का प्रयोग लाभप्रद होता है।
  • चना एवं मटर में बोरॉन की कमी के लक्षण दिखते हैं। फूल गोभी, टमाटर एवं दलहनी फसलों में बोरॉन एवं मोलिब्डेनम की कमी के लक्षण अम्लिक मिट्टी में दृष्टिगोचर हो रहे हैं।
  • बोरॉन की कमी पाए जाने पर बुआई के समय कम्पोस्ट खाद तथा 4 किलो प्रति एकड़ बोरेक्स (सुहागा) का प्रयोग लाभकारी होता है। खड़ी फसल में बोरॉन की कमी के लक्षण दिखने पर 0.2 प्रतिशत बोरेक्स के घोल का दो से तीन बार छिड़काव कर अच्छी फसल पाई जा सकती है।
  • दलहनी एवं तेलहनी फसलों के बुआई से पूर्व एक किलो प्रति हेक्टेयर बोरॉन (10 किलो बोरेक्स) का प्रयोग करें।
  • मोलिब्डेनम की कमी होने पर बुआई के समय मिट्टी में कम्पोस्ट के साथ 700 ग्राम प्रति एकड़ अमोनियम मोलिब्डेट अथवा खड़ी फसल 0.1 प्रतिशत अमोनियम मोलिब्डेट के घोल का छिड़काव करना चाहिए।
  • आलू, मक्का, गेहूँ, गन्ना आदि के बीज को एजोटोबेक्टर कल्चर से उपचारित कर इनकी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
  • धान की फसल में नील हरित शैवाल का प्रयोग करें।

कैसे जानें भूमि में तत्वों की कमी को

फसलों द्वारा निरंतर पोषक तत्वों का उपयोग, भू-संरक्षण (भूमि का कटाव आदि) के कारण धीरे-धीरे भूमि में एक या अधिक तत्वों की कमी हो जाती है। जब अधिक उपज और सघन खेती के कारण फसल की पोषक तत्वों की आवश्यकता बढ़ जाती है, तो यह कमी और भी व्यापक और तीव्र हो जाती है और तब उर्वरकों एवं खाद्यों से पोषक तत्वों की आपूर्ति करनी होती है। विभिन्न फसलों के बुआई से पहले खेतों की मिट्टी के सही नमूनों की जाँच अवश्य करवाएं और मिट्टी जाँच के आधार पर अनुशंसित उर्वरकों की मात्रा खेतों में डालें। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के मृदा विभाग में किसानों की मिट्टियों की नि:शुल्क जाँच की जाती है।

स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार

अंतिम बार संशोधित : 2/22/2020



© C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate