एक उपयोगी तरीका मृदा प्रबंधन के लिए वानस्पतिक पदार्थों को जलाने की ऐतिहासिक प्रथाओं के परिणामस्वरूप बायोचार दुनिया भर की मिट्टी में पाया जाता है। अमेजॉन (टेरा प्रीटा) की बायोचार से परिपूर्ण काली मृदा के गहन अध्ययन से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए इसके के अद्वितीय गुणों का पता चलता है। बायोचार का उपयोग करने का विचार हजारों साल पहले अमेजॉन बेसिन में शुरू हुआ था। वहां उपजाऊ मृदा के द्वीपों को टेरा प्रेटा (काली धरती) कहा जाता था, जिन्हें वहां के स्थानीय लोगों द्वारा तैयार किया गया था। वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि बायोचार को मृदा में डालने के परिणामस्वरूप मृदा की उर्वरता एवं कार्बन पदार्थ की मात्रा में वृद्धि होती है। ये मृदा आज भी उस कार्बन को पकड़े हुए हैं और काफी पोषक तत्व समृद्ध हैं। मृदा को सुधारने और कार्बन को अनुक्रमित करने के लिए बायोचार का प्रयोग एक उपयोगी तरीका हो सकता है। पुरानी तकनीक बायोचार बनाने व प्रयोग करने की यह तकनीक लगभग 2,000 साल पुरानी है। इसके द्वारा कृषि अपशिष्ट पदार्थों को मृदा सुधारक के रूप में बदल दिया जाता है, जो कि कार्बन को मृदा में पकड़े रखता है। यह खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देता है और मृदा की जैव विविधता में वृद्धि करता है। इस तकनीक द्वारा वनों की कटाई पर भी रोक लगती है। बायोचार बनाने की प्रक्रिया में अत्यधिक बढ़िया छिद्रपूर्ण चारकोल बनता है, जो मृदा में पोषक तत्व और पानी की उपलब्धता को बनाए रखने में मदद करता है। गंभीर रूप से कमजोर मृदा वाले क्षेत्रों में, जहां पर कार्बनिक पदार्थों, पानी व उर्वरकों की कमी हो वहां पर, खाद्य सुरक्षा और कृषि भूमि में फसल-विविधता बढ़ाने के लिए बायोचार एक दुर्लभ काबर्निक संसाधन है।। लगभग सभी प्रकार की मृदा में बायोचार का उपयोग सुधारक के रूप में किया जा सकता है। शुष्क व अर्धशुष्क क्षेत्रों की कम वर्षा पोषक तत्व वाली मृदा में बायोचार के प्रयोग का विशेष प्रभाव देखने को मिलता है। विकसित बायोचार प्रौद्योगिकी द्वारा मृदा की उर्वरता और मृदा में कार्बन जकड़ने के लक्ष्य के लिए आई.बीआई. (इंटरनेशनल बायोचार इनीशिएटिव) ने पर्याप्त दिशानिर्देश भी जारी किए हैं। कार्बन संचय की संभावनाएं खाद्य एवं कृषि संगठन के एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2050 में विश्व की जनसंख्या लगभग 9.2 बिलियन हो जाएगी। इस बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वैश्विक कृषि उत्पादन में 70 प्रतिशत की वृद्धि की जरूरत है। इसके लिए उपलब्ध सीमित क्षेत्रफल के उपयोग में कुछ बदलाव कर उच्च उत्पादन प्राप्त करना होगा। अकृष्य भूमि को कृषि में प्रयोग लाने से उसका पर्यावरण पर प्रभाव विभिन्न प्रबंधन प्रणालियों के अनुरूप भिन्न होता है। हमारी धरती वैश्विक कार्बन के संचयन के लिए एक अच्छा व महत्वपूर्ण सिंक भंडार है। वास्तव में इस सिंक का आकार दुनिया के घास के मैदानों के अंतर्गत क्षेत्रफल पर निर्भर करता है। इसलिए मृदा में अधिक कार्बन संचय के लिए सबसे व्यवहार्य और लागत प्रभावी दृष्टिकोण यही है कि निम्नीकृत मृदा में बड़े पैमाने पर कार्बन सिंक को फिर से बढ़ाया जाए। कार्बन संचय के लिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि वायुमंडलीय कार्बनडाइऑक्साइड से कार्बन को स्थिर कर उसका दीर्घकालिक भंडारण मृदा में कर लिया जाए। मृदा कार्बन संचय से तात्पर्य है कि मृदा की जैविक गतिविधियों को बढ़ाने, मृदा के स्वास्थ्य में सुधार करने और ग्लोबल वार्मिंग को कम करने या स्थगित करने के लिए कार्बन का लंबे समय तक मृदा में भंडारण करना। इसे जीवाश्म ईंधन को जलाने से वातावरण में निष्कर्षित होने वाली ग्रीनहाउस गैसों के वायुमंडल और समुद्र मे संचय को धीमा करने के तरीके के रूप में भी देखा जाता है। कार्बन को मृदा में संचय करने के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। इनमें जैविक, भौतिक और रासायनिक विधियां शामिल हैं जिनमें बायोचार एक भौतिक तरीका है। यह अनुमान लगाया गया है कि धरती की एक मीटर गहराई तक लगभग 1500 गीगा टन (1012 कि.ग्रा.) जैविक कार्बन संग्रहित है। यह संयुक्त रूप से वानस्पतिक और वायुमंडलीय कार्बन से अधिक है। इससे पता चलता है कि हमारी धरती कार्बन को संचित करने के लिए एक अच्छा भंडार अर्थात सिंक है। विभिन्न कृषि प्रथाओं में बदलाव कर कार्बन संचय बढ़ाना एक सशक्त विधि है। वर्ष 2010 में किए गए एक अनुमान के अनुसार मृदा में बायोचार कार्बन के संचय से कार्बनडाइऑक्साइड के वार्षिक उत्सर्जन को 20 प्रतिशत तक निष्प्रभावी किया जा सकता है। बायोचार द्वारा मृदा में कार्बन संचयन यह सर्वविदित है। कि वायुमंडलीय कार्बनडाईऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने के लिए बायोचार एक प्रबल तकनीकी है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2100 तक बायोचार द्वारा लगभग 400 अरब टन कार्बन का संचयन मृदाओं में हो सकता है। इससे वायुमंडलीय कार्बनडाइऑक्साइड की सांद्रता को 37 पी.पी.एम. तक कम किया जा सकता है। इसके साथ-साथ बायोचार बनाने से रोगजनक सूक्ष्मजीवों को भी दूर रखा जा सकता है। मृदा में भारी धातुओं की विषाक्तता के स्तर में भी कमी लाई जा सकती है। बायोचार जीवाश्म ईंधन के वैकल्पिक स्रोत के रूप में भी कार्य कर सकता है। परंतु कृषि में एक धीमी रिहाई उर्वरक व कार्बन संचयक के रूप में ही इसके प्रयोग पर बल दिया जाता है। मृदा में बायोचार के उपयोग से अनेक लाभ है। कृषि अपशिष्ट पदार्थों को एक शक्तिशाली सुधारक बनाने से यह मृदा को अधिक उपजाऊ बनाता है। यह मृदा में पौधों और फसलों के लिए पोषक तत्वों की प्रतिधारण क्षमता को बढ़ाता है। इसके साथ-साथ भू-जल में न्यूनतम लीचिंग के कारण मृदा प्रदूषण को कम कर देता है। यह अन्य तरीकों द्वारा भी लाभदायक है जैसे-इसके उपयोग द्वारा हम खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा दे सकते हैं। वनों की कटाई को हतोत्साहित कर सकते हैं और फसल व भूमि विविधता को संरक्षित कर सकते हैं। बायोचार उपयोग से तत्काल लाभ उसमें बड़े पैमाने पर उपलब्ध पोषक तत्वों जैसे-उच्च पोटेशियम, फॉस्फोरस,जिंक, और कुछ हद तक, कैल्शियम तथा तांबा की उपलब्धता के कारण होते हैं। यह मृदा के भौतिक गुणों को भी बदलता है। इससे मृदा की जलधारण क्षमता में वृद्धि होती है। यह मृदा में वायु विनिमय को बढ़ा सकता है। और मृदा से नाइट्रसऑक्साइड नामक ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कम कर देता है। वर्तमान समय में बायोचार को वायुमंडलीय कार्बनडाइआक्साइड की मात्रा को कम करने के लिए एक सशक्त साधन के रूप में देखा जा रहा है। यह प्रकाश संश्लेषित कार्बन की पुनः वायुमंडल में लौटाने की दर को अत्यन्त धीमा कर देता है। इसके अलावा बायोचार कम उपजाऊ तथा निम्नीकृत मृदाओं में कृषि उत्पादकता में सुधार कर सकता है और गरीब किसानों के लिए भी विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। यह अपवाह द्वारा होने वाले पोषक तत्वों और कृषि रसायनों के नुकसान को भी कम करता है।। इसके साथ-साथ बायोचार के प्रयोग से अनेक लाभ हैं। जैसे-मृदा में लाभकारी सूक्ष्मजीवों जैसे मायकोराइजल कवक की संख्या में वृद्धि विभिन्न तंत्रों के माध्यम से फसल उपज में वृद्धि मृदा में संतृप्ति बेसिक आयनों में वृद्धि जलधारण क्षमता में वृद्धि और पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार। बायोचार एवं जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण बायोचार मृदा में जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण (बीएनएपफ) को भी बढ़ाता है। ज्यादा बायोचार की मात्रा का उपयोग करने से मृदा में जैविक नाइट्रोजन निर्धारण, उपलब्ध नाइट्रेट सांद्रता आमतौर पर कम होती है। उपलब्ध कैल्शियम, फॉस्फोरस और सूक्ष्म पोषक तत्वों की सांद्रता उच्च होती है। अधिकतम जैविक नाइट्रोजन स्थिर करने के लिए आदर्श होती है। बायोचारकी उपस्थिति में बेहतर जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिए मृदा में पोषक तत्वों की उपलब्धता से संबंधित कारकों का संयोजन और पौधों का सूक्ष्मजीवों के साथ इंटरैक्शन प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इसके परिणामस्वरूप मृदा में सूक्ष्मजीवों की अच्छी कॉलोनी बनती है। दलहनी फसलों में बायोचार के उपयोग से जैविक पैदावार व जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण में वृद्धि होती है। पौधों द्वारा संचित कार्बन और वायुमंडल में कार्बन के लौटने के बीच एक संतुलन रहता है। मृदा में संग्रहित कार्बन की मात्रा आसानी से नहीं बदलती है। भूमि प्रबंधन में परिवर्तन से कार्बन चक्र बाधित होता है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2001 में भारत में कुल फसल अवशेषों का 16 प्रतिशत जला दिया गया था (लगभग 116 मिलियन टन)। भारत में बायोमास की उपलब्धता (2010-2011) लगभग 500 मिलियन टन प्रतिवर्ष अनुमानित है। वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधन दहन के कारण सालाना लगभग 78 से 90 गीगा टन कार्बन का उत्सर्जन वायुमंडल में हुआ जो कि कुल कार्बनडाइऑक्साइड उत्सर्जन का 29 प्रतिशत है।। मृदा कार्बन हमें जलवायु नियंत्रण, जल आपूर्ति, जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र सेवाएं प्रदान करने में अहम भूमिका निभाता है, जो मानव कल्याण के लिए अति आवश्यक है। मृदा की भौतिक, रासायनिक और जैविक अखंडता को बनाए रखने के लिए उसमें कार्बनिक पदार्थ के दहलीज स्तर (क्रिटिकल लेवल) का प्रबंधन महत्वपूर्ण है। बायोचार बनाने की तकनीक बायोचार धीमी पायरोलिसिस विधि द्वारा उत्पादित एक प्रकार का कोयला है। इसे कार्बनिक पदार्थों को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में व नियंत्रित तापमान (300-500 सेल्सियस) पर जलाकर बनाया जाता है। इसमें कुल कार्बन की मात्रा उच्च रहती है। यह इसे (60-80 प्रतिशत) दीर्घकाल के लिए मृदा में कार्बन भंडारण के लिए एक संभावित पदार्थ बनाती है। इसका मृदा में क्षय बहुत कम होता है। यह मृदा में हजारों सालों के लिए स्थिर हो सकता है। बायोचार का आधा जीवन 100 से 10000 साल तक हो सकता है। इस प्रकार यह वायुमंडल में कार्बनडाइऑक्साइड की समग्र एकाग्रता को कम करता है। इसी कारण अनुसंधानकर्ताओं का ध्यान इसकी ओर आकर्षित हुआ है। यह न केवल कार्बन भंडारण में योगदान देता है बल्कि इसके साथ-साथ पोषक तत्वों के भंडारण में भी सहयोग करता है। बायोचार का वैश्विक उत्पादन 50 से 270 टेरा ग्राम (1 टेरा ग्राम=109 कि.ग्रा.) प्रतिवर्ष होने का अनुमान लगाया गया है। इसका लगभग 80 प्रतिशत भाग मृदा में हठीले कार्बन के रूप में रह जाता है जिसे सूक्ष्मजीव विघटित नहीं कर पाते हैं। हालांकि जब ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जैविक कार्बनिक पदार्थ को जलाया जाता है। तब भी हाइड्रोजन गैस, कार्बनमोनोऑक्साइड और अन्य जलने योग्य गैसें व टार तथा गैर-उपयोगी गैसें जैसे कार्बनडाइआक्साइड का उत्सर्जन होता है। यह खुली हवा में कृषि-अपशिष्ट पदार्थ जला देने से अपेक्षाकृत कम होता है। बायोचार बनाने के लिए विभिन्न तरीके तैयार किए गए हैं जिनमें स्थानीय स्तर पर आसान विधि से लेकर व्यावसायिक रूप से कारखानों का प्रयोग तक शामिल है। खेत-खलिहान स्तर पर तो मृदा में जैविक पदार्थों को दबाकर आग लगाने से भी बायोचार तैयार कर सकते हैं। केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान व भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने भी छोटे स्तर पर बायोचार बनाने के यंत्र तैयार किए हैं जिनके उपयोग से बायोचार खेत स्तर पर सफलतापूर्वक तैयार किया जा सकता है। पाइरोलिसिस द्वारा बायोचार बनते समय उसमें अनेक धनायन, ऑक्साइड, हाइड्राऑक्साइड, और कार्बाेनेट्स (राख) में परिवर्तित हो जाते हैं। मृदा में डालने पर ये चूने के रूप में कार्य करते हैं। वनों के अंतर्गत भूमि को कृषि भूमि में बदलने के दौरान जंगल काटने व प्राकृतिक वनस्पति के जलने से बने बायोचार के 30 प्रतिशत भाग का लगभग 30 वर्षों में अपघटन हो जाता है। बायोचार के भूमि में प्रयोग से यह कार्बन संचय के साथ-साथ खाद का भी काम करता है। अनेक अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि बायोचार मृदा में कार्बन भंडारण व दीर्घकालीन संचयन के साथ-साथ मृदा की उर्वरता में सुधार करता है। इस प्रकार कृषि भूमि पर फसल पैदावार में वृद्धि करता है। बायोचार समृद्ध मृदा की पफसलोत्पादन क्षमता में सुधार होने के साथ उसमें से उत्सर्जन होने वाली ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होता है, जिससे जलवायु परिवर्तन को रोकने में अहम योगदान मिलता है। मृदा पोषक तत्वों पर बायोचार उपयोग द्वारा पोषक तत्व प्रतिधारण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसा खासतौर पर कम उपजाऊ व अत्यधिक निम्नीकृत मृदा में होता है। बायोचार के प्रयोग से मृदा में कुल कार्बन, कार्बनिक कार्बन, कुल नाइट्रोजन, उपलब्ध पफॉस्पफोरस, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम और पोटेशियम जैसे विनिमय योग्य धनायनों की मात्रा में वृद्धि होती है और मृदा में एल्यूमिनियम की सक्रियता घट जाती है। यह भी देखा गया है कि बायोचार अनुप्रयोग से इन पोषक तत्वों को पौधे आसानी ले पाते हैं। भौतिक गुणों पर प्रभाव मृदा में बायोचार उपयोग करने से उसमें उपलब्ध तत्व पुनः मृदा में मिल जाते हैं। उच्च सतह क्षेत्र और उच्च सतह आवेश घनत्व के कारण, बायोचार मृदा की पोषक तत्वों और पानी की उपलब्धता को बनाए रखने की क्षमता को बढ़ाता है। निक्षालन द्वारा पोषक तत्वों और कृषि रसायनों के ह्रास को कम करता है। बायोचार एक कम घनत्व वाला पदार्थ है, जो मृदा के घनत्व को कम करता है।। इस प्रकार जल संचरण,जड़ प्रवेश और वायु विनिमय तथा ढेलों की स्थिरता को बढ़ाता है। बायोचार का उच्चतम अंश मृदा के छोटे ढेलों में मिलता है, जबकि बड़े ढेलों में यह मात्रा कम पाई जाती है। सूक्ष्म-ढोलों में बायोचार की सतह पर काबर्निक पदार्थों के समावेशन से इसके अपघटन को कम करने में सहायता मिलती है। बायोचार के अंश पर प्रूमिक एसिड में टूट जाते हैं तो मृदा कणों के एकत्रीकरण को बढ़ावा मिलता है, जिससे इसके अपघटन को राकने में मदद मिलती है। मृदा जैविक गुणों पर प्रभाव बायोचार से मृदा के पी-एच मान में बायोचार सुधार होता है, जिससे उसमें सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है। इसमें उपलब्ध सूक्ष्म छिद्रों की अधिकता के कारण मृदा में सूक्ष्मजीवों के विकास के लिए आवास क्षेत्रा बढ़ जाता है। अधिकांश बायोचार में मैक्रो-छिद्रों की उच्च सांद्रता होती है, जो सतह से अंदर तक पफैली होती है, इसमें खनिज और छोटे कार्बनिक कण जमा हो सकते हैं। उच्च पृष्ठीय सतही क्षेत्रों वाले बायोचार कीट नियंत्रण के लिए विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। शुरुआत में रासायनिक ऑक्सीकरण और माइक्रोबियल प्रक्रियाओं द्वारा बायोचार में प्रारंभिक गिरावट दर्ज की जा सकती है। विभिन्न प्रक्रियाओं के सुचारू कामकाज के लिए मृदा का स्वास्थ्य बहुत महत्वपूर्ण है। बायोचार कार्बन समृद्ध मृदा में सूक्ष्मजीवों की आबादी भी अधिक होती है। इस प्रकार मृदा के संशोधन के रूप में बायोचार के प्रयोग से माइक्रोबियल बायोमास और मृदा माइक्रोबियल समुदायों में भी परिवर्तन देखा गया है। अधिकांश मृदा में पारिस्थितिकी तंत्र में केंचुओं के महत्व को मृदा के जीवों का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। उनकी उपस्थिति को मृदा के स्वास्थ्य के उपयोगी संकेतक के रूप में माना जाता है। इसलिए केंचुओं की संख्या को व्यापक रूप से जैविक और अकार्बनिक प्रदूषक तथा जैव उपलब्धतादोनों के माप के रूप में भी उपयोग किया जाता है। बायोचार के माध्यम से मृदा में कार्बन संचय साधारणतः मृदा की संरचना और कार्यों में सुधार के लिए कई प्रकार के सुधारक व उर्वरक मृदा में डाले जाते हैं। बायोचार एक प्रकार का कोयला ही है जिसे अपशिष्ट जैविक पदार्थों के पायरोलिसिस द्वारा बनाया जाता है। इसके उपयोग से जैविक कार्बन को पुनः कार्बन चक्र में स्वाभाविक रूप से पुनर्नवीनीकरण किया जाता है। बायोचार को पायरोलिस करने से इसमें उपस्थित कार्बन अपेक्षाकृत निष्क्रिय होता है ताकि यह मृदा में ही अनुक्रमित अर्थात संचित रहे। इसके अलावा, मृदा में नए कार्बनिक पदार्थ के साथ मिलकर यह अतिरिक्त संचय का भी लाभ प्रदान करता है। मृदा में यह सूक्ष्मजीवों को कार्बन ऑक्सीकरण के लिए अनुपलब्ध रहता है। कार्बन संचय के लिए बायोचार कोई नई वस्तु नहीं है। इसका उपयोग पुरातन काल से ही हो रहा है लेकिन इसका महत्व हमने हाल ही में महसूस किया है। अमेजॉन वर्षावन क्षेत्रा में विम सोम्ब्रोक नामक वैज्ञानिक ने 1950 के दशक में टेरा प्रीटा की खोज की थी। टेरा प्रीटा अभी भी अमेजॉन बेसिन के 10 प्रतिशत क्षेत्रफल में पफैला है। इसी तरह की मिट्टी पश्चिम अप्रफीका में इक्वाडोर, पेरु, बेनिन और लाइबेरिया में भी देखी गई है। अमेजॅनिया में कई जनजातियों ने हजारों वर्षों तक धरती पर सबसे कम उर्वरता वाली मृदा अर्थात ऑक्सीसोल (उष्णकटिबंधीय वर्षा वन मृदा) में सफलतापूर्वक खेती की है। उन्होंने अतिशीघ्र निक्षालन वाली मृदाओं में पौधों के लिए पोषक तत्वों को लंबे समय तक मृदा में बनाए रखने का प्रबंधन कैसे किया? यह पाया गया है कि मानव हस्तक्षेप से तैयार इन मृदाओं में उपस्थित कार्बन इनकी अच्छी उर्वराशक्ति के लिए जिम्मेवार है। सामान्यतः पौधों को स्लैश करना एवं जलाना प(ति की तुलना में बायोचार बनाने की यह तकनीक मृदा में सुधार करने के लिए लगभग 16 गुना अधिक कुशल है। हमारे इतिहास में कई प्रथाएं दर्ज हैं जैसे-रसोईघर में जलाने के लिए वनों की कटाई, श्मशानघाट पर शवदाह के लिए लकड़ी का जलाना, शादी व अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में लकड़ी जलाना, खेती करने के लिए स्लैश करना और जलाना (झूम खेती) आदि जिनके द्वारा पहले भी कुछ बायोचार उत्पन्न हो जाता था। इसे ज्यादा महत्व शायद इसलिए नहीं मिल पाया। क्योंकि यह कम मात्रा में तैयार होता था व इसकी गुणवत्ता भी अनुसंधान के अभाव में कम रही होगी। 1970 और 1980 के दशक में मृदा वैज्ञानिकों ने इसे मृदा में सुधारक के रूप में देखना शुरू कर दिया, लेकिन 1990 के दशक के अंत तक यह समझ लिया गया कि बायोचार एक प्रकार का लकड़ी का कोयला है, जो मृदा को कार्बन से समृद्ध कर सकता है। बायोचार एवं माइकोराइजी बायोचार पौधों व कवकों के परस्पर गठबंधन को बढ़ावा देता है। कवक पौधों के लिए अधिक पानी लाते हैं, जिससे पौधे सूखे के प्रति अधिक सहनशील बन जाते हैं। कवक, पौधों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक खनिज पदार्थ इनकी जड़ों तक पहुंचाते हैं। ये जड़ों के रोग जनकों के प्रति एंटीबायोटिक बाधाओं के रूप में कार्य करते हैं। अधिक तापमान व पी-एच मानकी स्थिति में पौधों की सहिष्णुता की चरमसीमा को बढ़ाते हैं। इससे पौधों को विभिन्न तनावों जैसे-प्रत्यारोपण सदमा, मृदा कठोरपन,मृदा में विषाक्त पदार्थों और भारी धातुओं की अधिकता इत्यादि को सहने में मदद मिलती है। बायोचार मायकोर्जिजल संक्रमण को बढ़ाता है। यह अतिरिक्त रेडिकल हाइफा के लिए एक आवास के रूप में काम करने में सक्षम है। यह भी देखा गया है कि बायोचार के उपयोग से अरवेस्कुलर माइकोराइजी द्वारा पौधों की जड़ों में बेहतर संक्रमण होता है। मृदा में बायोचार और अरवेस्कुलर माइकोराइजल कवक(ए.एम.एपफ.) पोषक तत्व उपलब्धता को एक परिवर्तित स्तर की ओर ले जाते हैं। पौधों और मायकोर्जिजल कवक दोनों को प्रभावित करता है। निम्नीकृत मृदाओं में बायोचार द्वारा फसलों का उत्पादन बढ़ जाता है। बायोचार का अपघटन बायोचार, मैक्रोमोलेक्युलर संरचना के कारण सूक्ष्म जैविक अपघटन के लिए अधिक हठीला (रिकैल्सीट्रेंट) होता है। इसका अपघटन इतनी धीमी गति से होता है कि इसके क्षय का पता लगाना बहुत आसान नहीं है। इष्टतम परिस्थितियों में प्रतिवर्ष लगभग 0.5 प्रतिशत से भी कम बायोचार का क्षय हो पाता है। यदि प्राकृतिक कारकों के तहत 10 गुना धीमी गति से बायोचार का विघटन हो तो भी इसका मृदा में निवास समय लगभग 2000 वर्ष रहेगा और आधा जीवन लगभग 1400 साल होगा। एक उष्मायन अध्ययन में यह पाया गया है कि 624 दिनों के बाद सूक्ष्मजीवों में मृदा में डाले गए कार्बन का 1.5 प्रतिशत कार्बन देखा गया। भिन्न-भिन्न जैविक पदार्थों से बनाए गए बायोचार का क्षय भी अलग जल उपलब्धता स्तरों पर भिन्न होता है। बायोचार से कार्बन का निकलना इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस जैविक पदार्थ/फसल के बायोमास से बना है।। बायोचार का ऑक्सीकरण ही उसकी स्थिरता को नियंत्रित करने वाला प्रमुख तंत्र होता है। मृदा की गुणवत्ता और मृदा कार्बन संचयन में सुधार के लिए मृदा के संशोधन के रूप में बायोचार ने व्यापक पैमाने पर वैश्विक ध्यान आकर्षित किया है। मृदा के स्वास्थ्य को बनाए रखने, कार्बन का दीर्घ काल के लिए मृदा में संचयन करने, फसल पैदावार में वृद्धि करने और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने और जैसी अनेक कृषि की जरूरतों को पूरा करने की योग्यताएं बायोचार में विद्यमान हैं। इस प्रकार मृदा के स्वास्थ्य में सुधार करने में बायोचार की अपार संभावनाएं हैं। फिर भी उस मौलिक तंत्र जिसके द्वारा बायोचार मृदा को लाभदायक कार्य प्रदान कर सकता है, के बारे में और अधिक खोज करने की आवश्यकता है। यद्यपि कृषि में बायोचार के लाभकारी उपयोग की कुछ विरोधाभासी रिपोर्टें भी हैं। ऐसा लगता है कि बायोचार मृदा में कार्बन संचय को बढ़ाने और पर्यावरण में बढ़ती कार्बनडाइऑक्साइड की एकाग्रता को कम करने के लिए एक चमत्कारी पदार्थ हो सकता है। इसके प्रयोग करने की दर और इसके कार्यात्मक तंत्र को पूरी तरह और अच्छे से समझते हुए इसके दीर्घकालिक उपयोग से मृदा की भौतिक, रासायनिक, जैविक और पारिस्थितिक गुणों में सुधार के लिए व्यापक रूप में प्रयोग में लाने की आवश्यकता है। इसके अलावा विभिन्न कृषि-पारिस्थितिकीय क्षेत्रों के तहत फसलों के प्रति इसकी प्रतिक्रिया को जानने के बारे में भी अनुसंधान होते रहने चाहिए। स्त्रोत : खेती पत्रिका,ब्रज लाल लकारिया, प्रमोद झा, भारत मीणा, अभय शिराले, ए.के. विश्वास, प्रिया गुरव, संजीव बेहेरा और ए.के. पात्रा,भाकृअनुप-भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, नबीबाग, भोपाल (मध्यप्रदेश)