कटाई उपरांत प्रक्रियाएं एवं इनमें शामिल जोखिम कटाई उपरांत प्रक्रियाओं में कई चरण शामिल हैं, जैसे गहाई, छिलका उतारना, सुखाना, सफाई, भंडारण आदि। इनमें से प्रत्येक चरण कठिन होता है एवं इनमें कठिन शारीरिक श्रम की जरुरत पड़ती है। कटाई उपरांत विभिन्न कार्य श्रमिकों द्वारा विभिन्न शारीरिक मुद्राओं एवं अलग-अलग कार्य विभिन्न वातावरण में किए जाते हैं। कुछ कटाई उपरांत क्रियाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें कार्यकर्ता एक जगह स्थिर बैठकर करता है तथा कुछ में कार्यकर्ता निरंतर गतिशील रहता है। पर्वतीय क्षेत्रों में कटाई उपरांत क्रियाएं अधिकतर मानव श्रम पर निर्भर करती हैं। यहां कटाई उपरांत कार्यकलापों में यंत्राीकरण अभी कापफी कम है। कुछ कटाई के बाद की क्रियाओं में कार्यकर्ता को कई प्रकार के संभाव्य शारीरिक जोखिम हो सकते हैं। इसका प्रभाव किसानों की उत्पादकता पर पड़ सकता है। अतः किसानों में कृषि कार्यों को करते समय सुरक्षा एवं कठिन श्रम या मशक्कत प्रबंधन की विधियों से संबंधित जागरूकता लाना आवश्यक है ताकि उच्च कार्यकुशलता एवं सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। मानवीय श्रम गहनता वाले कार्य फसल उत्पादन चक्र के दौरान खेत में बहुत से कार्य किए जाते हैं। ये कार्य अत्यधिक थकाने वाले होते हैं। इनमें काफी मानवीय श्रम की आवश्यकता होती है। आवश्यक सुविधाओं का अभाव, स्थिर कार्य मुद्रा, मांसपेशीय बल एवं शक्ति पर निर्भरता, इन कार्यों को और भी कठिन बना देती है। कठिन श्रम या मशक्कत एक शब्द है, जो कार्य करने के अनुभवों से संबंधित है। अप्रिय मौसम, कार्य की थकाने वाली प्रवृत्ति, पीड़ाकारी कार्यानुभव, व्यवसाय से उत्पन्न विकार आदि इस शब्द की व्याख्या करते हैं। तीन गुण मुख्यतः कठिन श्रम को परिभाषित करते हैं: अधिक समय लागत, दोहराव एवं कठिन कार्य। इन कारकों से श्रम तो अधिक लगता है, कभी-कभी ये शरीर में विकार की स्थिति भी पैदा कर देते हैं। कटाई उपरांत क्रियाओं में कार्य प्रणाली कटाई उपरांत क्रियाओं में कार्य प्रणाली विभिन्न कटाई उपरांत कार्यकलाप श्रमिकों द्वारा अलग मुद्राओं एवं भिन्न वातावरण में किए जाते हैं। फसलों में कटाई उपरांत क्रियाओं के निष्पादन में प्रायः कार्य प्रणाली देखी गई हैः पारंपरिक तरीके से गहाई करने में हाथों व पैरों को तीव्र गति से बार-बार लगातार चलाना होता है। ये पुनरावृति वाली क्रियाएं लगभग एक से दो घंटे तक की जाती हैं। कृषि श्रमिक अधिक लंबे समय तक बेपरवाह मुद्रा में कार्य करते हैं, जैसे बार-बार लट्ठे को उठाना व फसल पर जोर से पटकना, सूप चलाना, सूप या अन्य पात्र में सामग्री को भरकर उठाना आदि। व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण जैसे मास्क, दस्ताने आदि का प्रयोग सामान्यतः नहीं किया जाता। खुले वातावरण में ये क्रियाएं अधिकतर की जाती हैं। इससे प्रतिकूल वातावरण का प्रभाव भी किसान पर पड़ता है। ये सभी क्रियाएं, जागरूकता के अभाव में, व्यवसाय से उत्पन्न विकारों को जन्म दे सकती हैं। इन क्रियाओं के कार्यकर्ताओं पर शारीरिक प्रभाव होते हैं । कठिन श्रम एवं पेशीय विकारों का प्रबंधन चिकित्सकों के अनुसार 90 प्रतिशत लोगों को अपने जीवनकाल में किसी न किसी समय रीढ़ की हड्डी में दर्द की शिकायत से जूझना पड़ता है। ऐसे में काम करने के गलत तरीकों तथा गलत मुद्राओं में बैठने से समस्या और भी अधिक बढ़ जाती है। कठिन श्रम का न्यूनीकरण थोड़ी जागरूकता तथा उन्नत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण द्वारा किया जा सकता है। कार्य करते समय किसानों को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिएः लंबी अवधि तथा दोहराव/पुनरावृत्ति वाले कार्यों के बीच छोटे अंतराल पर आराम करें या अन्य कार्य करें। कार्य करते समय कार्य मुद्रा का ध्यान रखें, अच्छी मुद्रा रीढ़ के प्राकृतिक वक्र को बनाए रखती है। अधिक झुकने तथा मुड़ने वाले आसन से बचें। इससे रीढ़ की डिस्क पर दबाव पड़ता है। भार उठाने के लिए एक हाथ की बजाय दोनों हाथों का प्रयोग करें। जितना संभव हो हाथ व कलाई की मुद्रा तटस्धल कणों या घास-फूस से बचने के लिए चश्मा तथा मास्क का प्रयोग करें इसके अतिरिक्त उन्नत उपकरणों एवं यंत्रों के समावेश द्वारा भी किसान कठिन श्रम को कम कर सकते हैं। कृषि यंत्रीकरण द्वारा कटाई उपरांत प्रसंस्करण के कई हस्तचालित एवं बिजली के यंत्र विकसित किए गए हैं जैसे धान मड़ाई यंत्र, मूंगफली दाना निकालने का यंत्र, अनाज छीलना, मक्के से दाने निकालने का यंत्र, ओसाई यंत्र आदि। इन मशीनों का सावधानीपूर्वक उपयोग कर किसान कटाई उपरांत प्रक्रियाओं में लगने वाली मशक्कत को कम कर सकते हैं तथा इसके साथ ही अपनी कार्यक्षमता में भी वृद्धि कर सकते हैं। श्वसन एवं रक्त संचार पर दबाव सामान्यतः गहाई लकड़ी के लट्ठों से पीटकर या पैरों से रौंदकर की जाती है। पारंपरिक कटाई उपरांत इस विधि में लकड़ी के लट्ठे को उठाना एवं फसल को पीटना, सामग्री से भरे हुए सूप को बार-बार कंधे से ऊपर उठाना आदि क्रियाओं में अत्यधिक बल लगता है। गहाई कार्य में श्रमिक सबसे अधिक समय खड़े होकर कार्य करते हैं। कठिन परिश्रम को मापने के लिए मक्के का दाना निकालने की पारंपरिक प्रक्रिया हृदय गति एक प्रमुख पैमाना है। कार्य जितना कठिन होगा, हृदय गति उतनी ही अधिक बढ़ेगी। असहाय एवं कष्टकारी मुद्रा से मांसपेशीय विकार कुछ क्रियाएं जैसे गहाई, पृथक्कीकरण एवं सफाई निरंतर दोहराव वाले कार्यकलाप हैं। इनमें शरीर की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। विभिन्न मुद्राएं जो कटाई उपरांत प्रक्रियाओं में बार-बार प्रयुक्त होती हैं, उनमें आगे की ओर झुकना, मुड़ना, बैठना, घुटनों के बल बैठना, हाथ, पैर, कमर को घुमाना आदि प्रमुख हैं। कुछ कटाई उपरांत क्रियाओं में मांसपेशियों का संकुचन एवं कुछ में गतिशीलता बनी रहती हैं। जब शरीर असामान्य मुद्रा में निरंतर काम करता है तो शरीर का गुरुत्वाकर्षण केंद्र भी बदल जाता है। इसके पफलस्वरुप शरीर अस्थिर हो जाता है और कमर में तनाव शुरू हो जाता है। इस तरह की कार्य मुद्राओं से शरीर में दर्द, व्याधि एवं कार्य क्षमता में कमी आती है। कटाई उपरांत प्रक्रियाओं में प्रयुक्त जोखिम मुद्राएं हैं : हाथों को प्रतिदिन दो घंटे से अधिक समय तक सिर से ऊपर रखकर कार्य करना, हाथों को बार-बार सिर से ऊपर या कोहनी को कंधे से ऊपर रखकर कार्य करना, कमर को 30 डिग्री से अधिक मोड़कर आगे की ओर झुककर कार्य करना, गर्दन को 30 डिग्री से अधिक झुकाकर कार्य करना, कलाई को 30 डिग्री से अधिक मोड़कर दोहराव वाले कार्य करना, घुटने के बल बैठना, घुटने मोड़कर बैठना, इत्यादि। व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय संस्थान (1997) की रिपोर्ट के अनुसार झुकने, बैठने और गैर तटस्थ आसन अप्राकृतिक मुद्राएं हैं, जो पीठ के निचले हिस्से में विकार के लिए जिम्मेदार हैं। भौतिक कारक घास-फूस, धूल कण जैसे कारकों से आंखों एवं श्वास नलिका में जलन, एलर्जी, सांस के रोग, निमोनिया, फेफड़े के रोग इत्यादि होने की आशंका रहती है। पारंपरिक विधि से पैर से रौंदकर गहाई करने से पैर की चमड़ी में घाव पड़ना तथा लकड़ी के लट्ठे से मड़ाई करने पर हथेलियों में सूजन, लालिमा तथा अंगुलियों का सुन्न पड़ना इत्यादि जोखिम देखे गए हैं। कृषि में कटाई उपरांत क्रियाएं एवं उनसे शारीरिक विकार कुछ कटाई उपरांत क्रियाएं ऐसी होती हैं जिन्हें कृषि कर्मी एक जगह स्थिर बैठकर करता है तथा कुछ में निरंतर गतिशील रहता है। पर्वतीय क्षेत्रों में कटाई उपरांत क्रियाएं अधिकतर मानव श्रम पर निर्भर हैं। यहां कटाई उपरांत गतिविधियों में यंत्रीकरण अभी काफी कम है। कुछ कटाई उपरांत कार्यकलाप एवं उनसे कृषि कर्मी को संभाव्य शारीरिक मंडुवा की पारंपरिक मड़ाई जोखिम कई प्रकार से हो सकते हैं। पारंपरिक गहाई एक बेहद थकान वाली क्रिया है जिसे मुख्यतः महिलाएं ही करती हैं। पहाड़ों में देखें तो धान की मड़ाई पैरों द्वारा रौंदकर की जाती है। इससे धान के नुकीले हिस्से से पैरों में घाव हो जाते हैं। मक्का से दाने निकालने का कार्य भी प्रायः महिलाओं द्वारा ही किया जाता है। यद्यपि इसमें ऊर्जा कम लगती है, परंतु यह एक बहुत ही नीरस, थकाऊ, अधिक समय लेने एवं पुनरावृत्ति वाला कार्य है। मक्का की गहाई के परंपरागत तरीके में पहले अंगूठे से या नुकीली चीज द्वारा एक पंक्ति बनायी जाती है। इसके बाद अंगुलियों की पोरों से दाने निकाले जाते हैं। कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के एक शोध के अनुसार एक महिला एक कि.ग्रा. मक्के के दाने निकालने के लिए औसतन 522 बार अपनी अंगुली के पोरों, 114 बार अपने नाखुनों एवं 55 बार अपनी हथेली का प्रयोग करती है। इस क्रिया में अंगुलियों व अंगूठे पर काफी दबाव पड़ता है। इस प्रकिया को बार-बार अधिक घंटों तक करने से हथेली, कलाई एवं अंगुलियों पर दुष्प्रभाव होते हैं। कई किसानों की अंगुलियों में लालिमा, सूजन, सुन्नपन की शिकायत भी देखी गयी है। नुकीले उपकरण एवं घर्षण से अंगुली एवं अंगूठा जख्मी भी हो जाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में कहीं-कहीं पर मूंगफली की खेती भी की जाती है। साबुत मूंगफली अंगुलियों द्वारा एक-एक कर फर्श पर फोड़कर दाने निकालने का प्रचलन है। इससे अंगुलियों में छाले होना, थकान होना, कंधों, कोहनी साबुत मूंगफली अंगुलियों द्वारा एक-एक कर फर्श पर फोड़कर दाने निकालने का प्रचलन है। इससे अंगुलियों में छाले होना, थकान होना, कंधों, कोहनी व कलाई में दर्द की समस्या आम है। घंटों तक हाथों से मूंगफली छीलने से अंगुलियां के पोरों पर जख्म हो जाते हैं। सफाई तथा श्रेणीकरण कटाई उपरांत की जाने वाली एक महत्वपूर्ण गतिविधि है। अनाज व दालों की सफाई-बिनाई का कार्य भी मुख्यतः महिलाओं के ही जिम्मे होता है। इस मुश्किल कार्य को पूरा करने में महिलाएं कई दिन व घंटे बिता देती हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में कदन्न फसलों में मुख्यतः मंडुवा एवं मादिरा उगाये जाते हैं। ये असिंचित अवस्था में भी भरपूर उत्पादन देते हैं। अपने बहुमूल्य पोषण एवं मूल्य संवर्धन गुणों के बावजूद कदन्न फसलों की काफी हद तक उपेक्षा की जा रही है। इसके पीछे कारण है इनकी कटाई उपरांत क्रियाएं एवं उनमें प्रयुक्त होने वाला मानव श्रम व ऊर्जा। कदन्न फसलों में कटाई के बाद संचालन के लिए श्रम की आवश्यकता अन्य फसलों से अधिक होती है। इन फसलों के दाने छिलके की बालियों में बहुत अधिक दबे होने के कारण गहाई में अधिक समय एवं श्रम लगता है। पारंपरिक विधि में इनकी गहाई डंडे से बालियों को पीटकर की जाती है। इसमें समय व श्रम अधिक लगता है व हथेलियों का सुन्न होना, लालिमा, सूजन देखे गए हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाएं ही गहाई के कार्य को अधिकतर करती हैं। अधिकतर किसान इनकी खेती से विमुख हो जाते हैं। इसलिए समय व श्रम की बचत के उद्देश्य से भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा इन क्षेत्रों में प्रचलित कदन्न फसलों की गहाई व छिलका निकालने के लिए बालियों को पीटकर की जाती है। इसमें समय व श्रम अधिक लगता है व हथेलियों का सुन्न होना, लालिमा, सूजन देखे गए हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाएं ही गहाई के कार्य को अधिकतर करती हैं। इस कारण भी अधिकतर किसान इनकी खेती से विमुख हो जाते हैं। इसलिए समय व श्रम की बचत के उद्देश्य से भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा इन क्षेत्रों में प्रचलित कदन्न पफसलों की गहाई व छिलका निकालने के लिए विवेक मिलेट थ्रेशर-कम-पर्लर विकसित किया गया है। इसी प्रकार गेहूं की गहाई भी पारंपरिक विधि से ड्रम पर मंजरियों को पीटकर या लकड़ी के लट्ठों द्वारा पीटकर की जाती है। इस प्रक्रिया के दौरान किसान के हाथ निरंतर गति से ऊपर-नीचे होते हैं। गेहूं की बालियों के हथेली में चुभने की आशंका भी रहती है। निरंतर दोहराव के कारण बाजुओं एवं हथेली में दर्द तथा ड्रम पर बार-बार मंजरियों को पीटे जाने के कारण भी किसानों को मांसपेशीय विकार होने का अंदेशा रहता है। विवेक मिलेट थ्रेशर-कम-पर्लर मशक्कत में कमी का विकल्प मंडुवा एवं मादिरा की गहाई में प्रयुक्त कठिन मानव श्रम को देखते हुए विद्युत यांत्रिक थ्रेशिंग विधि के विकास की आवश्यकता महसूस की गई। इससे पर्वतीय किसानो की थकान व श्रम दोनों को कम किया जा सकता है। इसलिए विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा विद्युत मोटरचालित थ्रेशर विकसित किया गया। जिन क्षेत्रों में विद्युत की सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां के लिए संस्थान द्वारा इंजनचालित थ्रेशर विकसित किया गया है। एक शोध में मंडुवा की पारंपरिक गहाई तथा भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा विकसित विवेक मिलेट थ्रेशर-कम-पर्लर से गहाई की तुलना मानवीय ऊर्जा व्यय एवं शारीरिक तनाव मापने के उद्देश्य से की गयी (जोशी व अन्य, 2015)। थ्रेशर के उपयोग से पारंपरिक विधि की तुलना में समय व श्रम की लागत काफी कम पायी गयी। पारंपरिक विधि में हृदय गति 127.8 धड़कन प्रति मिनट थी, जबकि विवेक मिलेट थ्रेशर-कम-पर्लर मंडुवा थ्रेशर से केवल 97.5 धड़कन प्रति मिनट आंकी गई। पारंपरिक विधि में ऊर्जा खपत 11.60 कि. जूल प्रति मिनट थी, जो कि थ्रेशर के उपयोग से घटकर लगभग आधी (6.78 कि. जूल प्रति मिनट) रह गयी। इसी प्रकार मादिरा की छिलका उतारने की पारंपरिक विधि एक बेहद थकान वाली विधि है। इसमें एक घंटे के कठिन कार्य के बाद 2 से 2.5 कि.ग्रा. तक मादिरा प्राप्त होता है। संस्थान द्वारा विवेक मिलेट थ्रेशर-कम-पर्लर की तुलना पारंपरिक विधि से कठिन श्रम लागत मापने के लिए की गयी। इससे मादिरा की छिलका उतारने की पारंपरिक विधि में ऊर्जा खपत 13.63 कि. जूल प्रति मिनट थी, जो कि थ्रेशर के उपयोग से लगभग आधी (6.78 कि. जूल प्रति मिनट) रह गयी। थ्रेशर के उपयोग से छिलका उतारते हुए हृदय में कम तनाव एवं मांशपेशियों पर कम दबाव पड़ता है। अतः किसानों/किसान महिलाओं द्वारा इसे आसानी से प्रयोग किया जा सकता है। इसके अलावा वातावरणीय जोखिम की भी आशंका रहती है। कटाई उपरांत गतिविधियां प्रायः कड़ी धूप में की जाती हैं। धूल एवं भूसे के कण उड़ने के कारण श्रमिकों की श्वसन प्रणाली भी इससे प्रभावित होती है। श्रमिक आंखों में चुभन, सांस लेने में तकलीफ, शरीर में लालिमा, एवं खुजली इत्यादि विकारों की शिकायत भी करते हैं। एक अध्ययन के अनुसार कटाई उपरांत प्रक्रियाओं में मड़ाई एवं ओसाई की क्रियाओं में क्रमशः 50 प्रतिशत एवं 33 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी स्वास्थ्य संबंधी जोखिम महसूस करने की बात स्वीकारती हैं। स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), लेखक: कुशाग्रा जोशी(वैज्ञानिक),शेर सिंह(वरिष्ठ वैज्ञानिक),श्यामनाथ, निशावर्मा(प्रधान वैज्ञानिक,) और निर्मल चंद्रा(वैज्ञानिक), भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान, संस्थान, अल्मोड़ा (उत्तराखंड) , भाकृअनुप-भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम (उत्तरप्रदेश)।