वर्तमान स्थिति जैविक खेती का सिद्धांत तो पुराना है परन्तु अभी इसे व्यवस्थित ढंग से लागू नहीं किया जा सका है। कई विकसित देशों में जैविक खेती राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मापदंडों के आधार पर की जाती है जिसमें मिट्टी, उत्पादन विधि तथा उत्पाद प्रमाणीकरण प्रक्रियाएं शामिल हैं। देश में लगभग 41000 हेक्टेयर क्षेत्रफल जैविक प्रबंधन के अन्तर्गत है जो कि खेती के अन्तर्गत कुल क्षेत्रफल का 0.03 प्रतिशत ही है। पूर्वोत्तर के कई राज्य, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड में विस्तृत रूप से जैविक उत्पादन हो रहा है तथा इन राज्यों में रासायनों की खपत काफी कम है। भारतीय जैविक खेती दिग्दर्शिका शुद्ध जैविक विधि, समेकित हरित क्रांति कृषि तथा समेकित कृषि प्रणाली पर अधारित है। समेकित प्रणाली शुद्ध जैविक खेती में रासायनिक उर्वरक तथा पैौध संरक्षण दवाओं का प्रयोग पूर्णरूप से वर्जित होता है, समन्वित हरित क्रांति कृषि प्रणाली में समेकित पोषक तत्व, कीट एवं व्याधि प्रबंधन तकनीकी को अपनाया जाता है जबकि समेकित कृषि प्रणाली एक निम्न लागत की कृषि प्रणाली है जिसमें पोषक तत्वों से परिपूर्ण जैविक श्रोतों को पुनर्चक्रीकरण किया जाता है। इस पद्धति में फसलोत्पादन तथा पशुपालन को साथ-साथ तथा एक दूसरे के पूरक के रूप में किया जाता है। इन तीनों पद्धतियों में से भारतीय किसानों द्वारा मुख्य रूप से जैविक पद्धति तथा हरितक्रांति पद्धति को अपनाया जा रहा है। जैविक खेती के लिए किसान निम्नलिखित तकनीकी को प्रयोग में ला सकते हैं। मृदा संरक्षण के लिए पलवार प्रयोग मिट्टी में पोषक तत्व संतुलन हेतु दलहनी फसलों की एकल, मिश्रित तथा अन्तर्शस्ययन । मृदा में कृषि अवशेष, वर्मी कम्पोस्ट, कम्पोस्ट, जीवाणुखाद तथा बायोडायनामिक कम्पोस्ट का प्रयोग। पौध सुरक्षा हेतु खरपतवार की सफाई तथा जैविक कीटनाशियों का प्रयोग। फसल चक्र, हरितखाद, भू-परिष्करण तथा खाद प्रबंधन द्वारा फसलों में खरपतवार प्रबंधन । उपरोक्त तकनीकी द्वारा जैविक किसान अपने फसलों में पोषकतत्च तथा कीट एवं व्याधि प्रबंधन करते हैं । पोषक तत्व प्रबंधन हेतु देश के विभिन्न भागों में समाहित देशी तकनीक देश के विभिन्न भागों में मृदा में पोषक तत्व प्रबंधन हेतु किसानों द्वारा अपनायी जा रही तकनीकियों का अवलोकन करें तो पता चलता है कि देश के अधिकतर हिस्से में किसान स्थानीय रूप से उपलब्ध पोषक तत्वों के जैविक श्रोतों का ही प्रयोग करते हैं। ऐसे स्थानीय खाद, जीवांश अथवा जैविक अवशिष्ट का प्रयोग किसानों के एक लम्बे प्रयोग का परिणाम है। ये कृषि क्रियाएं क्षेत्र विशेष के किसानों के सामाजिक परंपराओं तथा मान्यताओं को भी अहमियत देते हैं। ऐसी कृषि क्रियाओं का यद्यपि स्पष्ट रूप से सही मात्रा का फसल के अनुसार आंकलन संभव नहीं है। किन्तु एक सामान्य अध्ययन निम्नलिखित विवरण प्रस्तुत करता है । कृ. स. मृदा में पोषक तत्व प्रबंधन हेतु अपनायी जाने वाली तकनीक का प्रयोग सामान्य तौर पर अपनाने वाले राज्य 1. परती (एकल फसल प्रणाली अथवा एक फसल का अन्तराल करना कुछ क्षेत्रों में पलिहर रखना भी कहते हैं) उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, झारखंड 2. गर्मी की जुताई बिहार, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान 3. पलवार मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, प. बंगाल 4. मृदा में फसल अवशिष्ट मिलाना आन्ध्र प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, आसाम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, प. बंगाल 5. हुरी खाद पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश 6. चारा अथवा नगदी फसल हेतु दलहनी पंजाब, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार, प. बंगाल फसलों की खेती 7. उतेरा फसल महाराष्ट्र, प. बंगाल 8. फसल-चक्र मिश्रित खेती अथवा अन्तर्शस्ययन राजस्थान, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, कर्नाटक, झारखंड 9. गृह अवशिष्टों का पुनर्चक्रीकरण कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान, प. बंगाल, पूर्वोत्तर के राज्य 10. पशुओं को खेत में बांधन आंध्रप्रेदश, गुजरात, पंजाब, कर्नाटक, उड़ीसा तथा प. बंगाल 11 कृषि अवशिष्ट कम्पोस्ट, मुगी खाद इत्यादि बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, 12. कम्पोंस्ट तथा अवशिष्ट उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, प. बंगाल, हरियाणा, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा 13. बर्मीकम्पोस्ट महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, हिमांचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश 14. बायोगैस यंत्र के अवशिष्ट हरियाणा, आंध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, प. बंगाल 15. खली कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, तथा महाराष्ट्र 16. जल कुम्भी कम्पोस्ट आसाम, उड़ीसा तथा प. बंगाल 17. टंकी की मिट्टी बालू आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा कर्नाटक, प. बंगाल 18. तालाब की मिट्टी पंजाब तथा राजस्थान 19. प्रेक्षमंड का प्रयोग (चीनी मिल के खाद) कर्नाटक एवं तमिलनाडू 20. धान की भूसी असम, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, पूर्वोत्तर के राज्य, प. बंगाल, हिमाचल प्रदेश 21. कृषि-वानिकी अवशिष्ट राजस्थान, मध्यप्रदेश 22. तरल खाद (गोबर का घोल, गोमूत्र) महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उड़ीसा 23. जीवाणु खाद उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पूर्वोत्तर के राज्य 24. मत्स्य का अवशिष्ट उड़ीसा, प. बंगाल, महाराष्ट्र 25. ताजा गोबर तथा गोमूत्र का छिड़काव उड़ीसा, प. बंगाल, महाराष्ट्र 26. बकरी तथा भेड़ कम्पोस्ट महाराष्ट्र, पूर्वोत्तर के राज्य 27. मूरम गुजरात 28. केल के तने तथा पते का प्रयोग, वृओं के नीचे मृत जानवरों के दफ़नाना, धान के खेत में रैबिंग गम की पतियों को खेत में जलाना। खरीफ़ में मेड़ी पर दलहन की खेती तथा खेत में छोटे गड्ढ़ी को खोदना महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार 29. बलुई मिट्टी जलोढ़ मिट्टी मिताना आंध्र प्रदेश 30. पशुओं के घर के अवशिष्ट क प्रयोग, जंगल की मिट्टी का प्रयोग तथा कटीले पैौधों की चहारदीवारी, नदियों की मिट्टी का प्रयोग हिमाचल प्रदेश, प. बंगाल, उत्तर प्रदेश 31. कार्बो तथा गर्चे के जल निकासी नलियों के अवशेष (तीवेज स्तग) मध्यप्रदेश तथा पश्चिम बंगाल 32. बायोडायनामिक प्लाद मध्य प्रदेश 33. अपतानी पद्धति (जीवशे क पुनर्कीकरण) तथा एल्बस नेपालॅसिस की खेती पूर्वोत्तर राज्य 34. जूट की पतियों का प्रयोग उड़ीसा, प. बंगाल एवं आसाम 35. जतुओं के सड़े अवशेष प. बंगाल 36. ज़ीरो दिलेज कर्नाटक 37. झूमखेती या टोंगया खेती पूर्वोत्तर राज्य 38. चाय के बगानों का अवशेष आसाम, प. बंगाल उपरोक्त देशी तकनीक के अतिरिक्त मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन की अनेकों अन्य देशी पद्धतियां भी हैं जिनके अध्ययन की आवश्यकता है। उपरोक्त पद्धतियों में पलवार प्रयोग, फसलचक्र, फसल अवशेष, हृरीखाद, कम्पोस्ट का प्रयोग, वर्मी कम्पोस्ट, कृषि वानिकी अवशेष, जीवांशों का पुनर्चक्रीकरण, जीवाणुखाद तथा पशुओं के खाद का प्रयोग मुख्य है। स्त्रोत : सीफेट न्यूजलेटर, लुधियाना, अखिलेश चन्द्र मिश्र, अजित कुमार झा एवं विनोद कुमार पाण्डेय कृषि विज्ञान केन्द्र, चतरा सीफेट, लुधियाना