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समर्थन मूल्य का विपणन

भूमिका

यह विभिन्न कृषि उपजों की समर्थन मूल्य प्रणाली के कामकाज के तंत्र पर आधारित है। यह महसूस किया गया है कि विस्तार कार्यकर्ताओं को समर्थन मूल्य प्रणाली से परिचित होना चाहिए, क्योंकि पूरे भारत में जल्दी खराब न होने वाली वस्तुओं के विपणन में और कुछ राज्यों में जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं के विपणन में एक प्रमुख भूमिका (हस्तक्षेप योजना के माध्यम से) निभाती है।

सरकार द्वारा विभिन्न कृषि उपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का आश्वासन पूरे भारत में जल्दी खराब न होने वाली वस्तुओं और कुछ राज्यों में जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं के विपणन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह इस आधार पर न्यायोचित है कि उत्पादकों/किसानों के लिए एक लाभकारी और स्थिर मूल्य पर्यावरण का आश्वासन कृषि उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। कई बार कृषि उपजों के लिए बाजार मूल्य अस्थिर और परिवर्तनशील होता है जिससे उत्पादकों को अनुचित घाटा उठाना पड़ता है और यह आधुनिक प्रौद्योगिकी और आवश्यक सूचनाओं को अपनाने में उन्हें हतोत्साहित कर सकता है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति के औचित्य

न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण के पीछे कई तर्क हैं, जिनमें -

  • राष्ट्रीय आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए मोटे तौर पर एक उत्पादन तरीके के विकास के लिए उत्पादकों किसानों को उन्नत प्रौद्योगिकी अपनाने के लिए और प्रोत्साहित करने की जरूरत है,
  • भूमि, जल और अन्य उत्पादन संसाधनों का तर्कसंगत उपयोग सुनिश्चित करने की आवश्यकता है,
  • बाकी की अर्थव्यवस्था,विशेष रूप से जीवन यापन की लागत, मजदूरी के स्तर और मूल्य नीति पर पड़ने वाला संभावित प्रभाव, और
  • कृषि क्षेत्र और गैर कृषि क्षेत्र के बीच व्यापार की शर्तें आदि शामिल हैं। कृषि लागत और मूल्य (सीएसीपी) आयोग ने मूल्य नीति पर सिफारिशें तैयार करते समय कई महत्वपूर्ण कारकों पर विचार किया है, जिनमें अन्य बातों के साथ उत्पादन की लागत, आदान मूल्य में परिवर्तन, बाजार में कीमतों की प्रवृत्तियों, मांग और आपूर्ति की स्थिति आदि शामिल हैं।

खेती/उत्पादन की राज्यवार और फसल वार लागत का अनुमान लगाने के लिए एक योजना

स्कीम के अंतर्गत मुख्य  फसलों के लिए खेती की लागत के आंकड़ों को एकत्रित किया गया है और एमएसपी से उनकी सिफारिशों के संबंध में उपयोग के लिए ये आंकड़े सीएसीपी के लिए उपलब्ध कराये गए हैं। खेती की लागतध्उत्पादन का हिसाब करते साय भुगतान की जाने वाली सभी लागतों जैसे कि किराए पर लिगा गया मानव श्रम, बैल श्रम और मशीन श्रम (काम पर रखे गए और स्वामित्व वाले दोनों), पट्टे पर ली गई जमीन का किराये के साथ ही बीज, उर्वरक, खाद, पंप सेट आदि के संचालन के लिए डीजल या बिजली की लागत सहित सिंचाई के उपायों जैसे आदानों के नकदी या सामग्री के रूप में किया जाने वाले खर्चों को शामिल किया जाता है। इसके अलावा, उत्पादन की लागत में पारिवारिक श्रम की मजदूरी के अध्यारोपित मूल्य और स्वामित्व वाली भूमि के किराए को भी शामिल किया गया है। लागत में कृषि मशीनरी के मूल्य ह्रास, इमारत, परिवहन और बीमा शुल्क को भी शामिल किया गया है। इस प्रकार उत्पादन की लागत में केवल नकद और सामग्री के वास्तविक व्यय को ही नहीं बल्कि जमीन सहित स्वामित्व वाली संपत्ति और पारिवारिक श्रम के अध्यारोपित मूल्य को भी शामिल किया गया।

कृषि जिंसों के लिए सरकार की मूल्य नीति में किसानों को अधिक निवेश और उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए उनकी उपज के लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने और मध्यस्थता की लागत कम कर, उचित मूल्य पर उपलब्ध आपूर्ति करने के द्वारा उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने का प्रावधान किया जाना चाहिए। मूल्य नीति के लिए अर्थव्यवस्था की समग्र जरूरतों के परिप्रेक्ष्य में एक संतुलित और एकीकृत कीमत संरचना विकसित करने की भी जरूरत है।

इस दिशा में सरकार, कृषि लागत एवं मूल्य (सीएसीपी) आयोग की सिफारिशों पर ध्यान देने के बाद प्रत्येक वर्ष फसलों के दोनों मौसमों में 25 प्रमुख कृषि जिंसों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) ने घोषणा करती है। सीएसीपी ने 25 फसलों के लिए उचित एंड लाभकारी मूल्य (एफआरपी) और गन्ने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश करती है। गन्ने के अलावा, जिसके लिए खाद्य और सार्वजनिक वितरण द्वारा उचित एंड लाभकारी मूल्य घोषित किया जाता है, न्यूनतम समर्थन मूल्य के अंतर्गत आवृत बाईस फसलों में धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, अरहर, मूंग, उड़द, छिलके सहित मूंगफली, सोयाबीन,सूरजमुखी, तिल, नाइजर बीज, कपास, गेहूं, जौ, चना, मसूर (दाल), रेपसीड/ध्सरसों, कुसुम, जूट और खोपरा शामित हैं। इसके अलावा, क्रमशः रेपसीड/सरसों और खोपरे के एमएसपी के आधार पर विभाग द्वारा तोरिया और खोल रहित नारियल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया गया है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा के अलावा, सरकार भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई), भारतीय कपास निगम (सीसीआई), भारतीय जूट निगम (जेसीआई), केंद्रीय भंडारण निगम (सीडब्ल्यूसी), राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ  इंडिया  लिमिटेड  (नेफेड),  राष्ट्रीय  उपभोक्ता  सहकारी संघ  इंडिया  लिमिटेड(एनसीसीएफ), और आगरा के छोटे किसानों के कंसोर्टियम (एसएफएसी) जैसी विभिन्न सार्वजनिक और सहकारी एजेंसियों के माध्यम से इन कृषि जिंसों की खरीद प्रक्रिया का आयोजन करती है। इसके अतिरिक्त, राज्य सरकारें भी पीएसएस संचालन करने के लिए राज्य एजेंसियों की नियुक्ति करती हैं।

इस के लिए फसल के मौसम में अनेक खरीद केन्द्र स्थापित किए जाते हैं। कीमतों के अलग-अलग गुणवत्ता मानकों पर आधारित उत्पादन के ग्रेड से जुड़े होने के कारण जैसे- धान के लिए नमी की मात्रा, फसल के मौसम में इन खरीद केंद्रों को अपेक्षित गुणवत्ता के आकलन के उपकरणों से लैस किया जाता है। खरीद केंद्रों में तुलाई, भंडारण, परिवहन आदि की बुनियादी सुविधाओं के होने की अपेक्षा की जाती है।

बाजार हस्तक्षेप और समर्थन मूल्य योजनाएं

कृषि एवं सहकारिता विभाग बागवानी वस्तुओं की खरीद के लिए, जो जल्दी खराब हो जाने वाली प्रकृति की होती हैं और समर्थन मूल्य योजना  के अंतर्गत आवृत नहीं हैं, बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) लागू करता है। हस्तक्षेप का उद्देश्य अत्यधिक फलन अवधि के दौरान एक अच्छी फसल होने की स्थिति में, इनकी कीमतों के आर्थिक स्तर और उत्पादन की लागत से नीचे गिरने पर, इन वस्तुओं के उत्पादकों को संकट बिक्री से रक्षा करना है। सामान्य रूप से बाजार की कीमतों में पिछले वर्ष की तुलना में कमी आने पर, बाजार हस्तक्षेप कार्यक्रम (एमएपी) कार्यान्वित किया जाता है। इसके कार्यान्वयन पर किए गए किसी भी व्यय में, यदि कोई  हो, जो राज्य और संघ  राज्य क्षेत्र हानि का 50 प्रतिशत वहन करने के लिए तैयार होता है (उत्तर-पूर्वी राज्यों के मामले में 25 प्रतिशत), वहां की सरकार के अनुरोध पर बाजार हस्तक्षेप योजना(एमआईएस), लागू की जाती है। नुकसान की कुल राशि, जो कुल खरीद मूल्य के 25 प्रतिशत की हद तक सीमित है, जिसमें जिंस की खरीद की लागत और उपरी व्यय भी शामिल हैं, को केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच 50रू50 के आधार पर साझा किया जाता है। इस योजना के अंतर्गत, एमआईएस के दिशा-निर्देशों के अनुसार, एक निश्चित बाजार हस्तक्षेप की कीमत पर एक पूर्व निर्धारित मात्रा (एमआईपी)केन्द्रीय एजेंसी नेफेड द्वारा खरीदी जाती है और एजेंसियों को राज्य सरकार द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए या कीमतों के एमआईपी से ऊपर तक स्थिर होने तक, जो भी पहले हो, नामित किया जाता है। संचालन का क्षेत्र संबंधित राज्य तक ही सीमित है। आलू (उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 10 लाख मीट्रिक टन की कुल मात्रा के साथ), ताड़ का तेल (47500 मीट्रिक टन के साथ आंध्र प्रदेश), सेव (6100 मीट्रिक टन के साथ हिमाचल प्रदेश) और सुपारी (1200 मीट्रिक टन के साथ कर्नाटक) को शामिल कर पांच राज्यों में एमआईएस लागू किया गया है।

मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस)

कृषि एवं सहकारिता विभाग सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर केंद्रीय नोडल एजेंसी है जो नेफेड के माध्यम से तिलहन, दलहन और कपास की खरीद के लिए पीएसएस लागू करता है। जब भी कीमतें एमएसपी से नीचे गिर जाती हैं, नेफेड पीएसएस के अंतर्गत तिलहन, दलहन और कपास की खरीद करती है। कीमतों के एमएसपी पर या उससे ऊपर स्थिर होने तक पीएसएस के अंतर्गत खरीद जारी रखी जाती है। किसी भी उपक्रम न्यूनतम समर्थन मूल्य के संचालन में नेफेड द्वारा किए गए कार्य में कोई घाटा होने पर, केंद्र सरकार द्वारा उसकी प्रतिपूर्ति की जाती है। एमएसपी संचालन के उपक्रम में अर्जित लाभ, यदि कोई हो, तो वह केंद्र सरकार को दे दिया जाता है किए हैं।

विस्तार गतिविधियाँ

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए गुणवत्ता विशेषताओं के बारे में जागरूकता पैदा करना।
  • विभिन्न उत्पादन अंचलों में कार्यरत खरीद केंद्रों में उपलब्ध सुविधाओं के बारे में व्यापक प्रचार-प्रसार।
  • एंएसपी प्रणाली के अंतर्गत किसानों के अधिकार के बारे में जागरूकता पैदा करना।

स्रोत: राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान (मैनेज), कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय,भारत सरकार का संगठन



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