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हरे चारा एवं जौ की फसल

परिचय

जौ एक तेजी से बढ़ते वाला, अत्यधिक प्रारंभिक ओज वाला, पयार्वरण हितैषी, उच्च उर्जायुक्त, औषधीय गुणों से संपन्न, पौष्टिक हरा चारा देने वाला, अधिक बायोमास दुधारू की अवस्था में देने वाल एवं अत्यधिक अनुकुलूं क्षमता वाली फसल है। हरित क्रांति से पहले यह एक मुख्य खाद्यान फसल के रूप में अपने देश में उगाया जाता था। यह भारत की एक महत्वपूर्ण रबी फसल फसल है। जो विश्व के चार प्रमुख फसलों में से एक है। भारत में मुख्य रूप से जौ पशुओं के लिए हरा चारा एवं दाना के रूप में प्रयुक्त होता है। आज भी किसान जौ की खेती अन्न, चारा एवं पशु अहार के ली करते हैं। इन्हीं उद्देश्यों (दाना व चारा) की पूर्ति के लिए हमारे देश में ठोस शोध प्रयास से दिवउद्देशीय जौ की प्रजातियाँ का विकास किया गया जिनसे हरा चारा के साथ-साथ दाना भी मिल जाता है। हाल के वर्षों में देखने में यह आया है कि राजस्थान के अधिक शुष्क उत्तरी मैदानी भाग, दक्षिणी हरियाणा, पश्चिमी-उत्तर प्रदेश एवं दक्षिण-पशिचमी पंजाब आदि जगहों पर भीषण सूखे की स्थिति में न(जाड़ा के मौसम में न) हरे चारा की कमी हो जाती है। इन क्षेत्रों में अन्य चारा जैसे बरसीम, जई तथा गन्ने का पत्ता आदि भी उपलब्ध नहीं हो पाता क्योंकि सिंचाई के लिए पानी की कमी रहती है, ऐसे में पशुओं के ली चारा तथा आनाज उत्पादन के लिए द्विउद्देशीय जौ की फसल अत्यंत उपयोगी एवं लाभकारी विकल्प है।

मिट्टी

जौ की खेती अनेकों प्रकार भी भूमियों जैसे )लवणीय, क्षारीय, हल्की मिट्टी, बलुई से लेकर दोमट मिटटी आदि में भी की जा सकती अहि।

खेत की तैयारी व बुआई की विधि

खेत की तैयारी के लिए  हैरो एवं कल्टीवेटर से खेत की अच्छी तरह जुताई का पाटा लगाना चाहिए। खेत को 2-3 वर्षों में लेजर लैंड लेवलर से समतल करना अति आवश्यक है। इससे जहाँ एक तरफ  पानी की 30-50% तक बचट होती है वहीँ पैदावार भी अच्छी मिलती है। खेतों में मेंढ बनाना आवश्यक है ताकि सिंचाई सही प्रकार से की जा सके तथा असिंचित क्षेत्रों में वर्ष का जल का उपयोग समुचित हो सके। सिंचित क्षेत्रों में पलेवा करने के बाद खेती-की तैयारी करनी चाहिए ताकि जमाव अच्छा हो। सीड ड्रील से पंक्तिबद्ध बिजी को प्राथमिकता दिया जाना चाहिए। पंक्तिबद्ध बीजाई से प्रति वर्गमीटर पौधों की संख्या अच्छी रहती है जिससे चारा व दाना दोनों का उत्पादन अच्छा होता है।

प्रजाति का चयन

अच्छी उपज लेने के ले किसानों को अनुमोदित प्रजातियों की बुआई के समय और उत्पादन-स्थिति के अनुसार करनी चाहिए। अग्रलिखित तालिका में विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों में उगाई जाने वाली किस्मों का विवरण दिया गया है

दिवउद्देशीय जौ की नवीनतम प्रजाति

उत्पादन क्षेत्र

बुआई की दशा

प्रजाति

उत्तर पश्चिमी मैदानी क्षेत्र

समय से बुआई

आर.डी. 2035

 

समय से बुआई

आर.डी. 2552

 

समय से बुआई, निमेटोड रोधी

आर.डी. 2715

उत्तर पूर्वी  मैदानी क्षेत्र

समय से बुआई, लवणीय व्  क्षारीय भूमि हेतु

आर.डी. 2552

मध्य क्षेत्र

समय से बुआई

आर.डी. 2715

उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र

समय से, ठण्ड एवं रतुआ रोग अवरोधी

एम्.बी.एल. 276

 

वर्षा आधारित/असिंचित,. समय से बुआई

बी.एच.एस. 380

 

वर्षा आधारित/असिंचित

बी.एच.एस. 169


बीज एवं उपचार

हमेशा अच्छी गुणवत्ता वाले बीज का प्रयोग करना चाहिए। अच्छी गुणवत्ता वाली बीज कृषि विश्वविद्यालय, अनुसन्धान, राज्य बीज निगम एवं भारतीय बीज निगम से प्राप्त किया जा सकता है। बीज जनित बिमारियों से बचने के लिए बीजोपचार आवश्यक है। खुली कंगीयारी से बचाव के लिए 2 ग्राम बाविस्टिन या विटावैक्स प्रति किलोग्राम की दर से बीज उपचारित करें। बढ़ कंगीयारी के नियंत्रण के लिए थिरम तथा बाविस्टिन/विटावैक्स को 1:1 के अनुपात में मिलाकर 2.5 ग्राम यह 1.5 ग्राम रेक्शील प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। दीमक से बचाव के लिए 150 मिली लीटर क्लोरपायरीफास (20 ई.ससी) को 5 लीटर पानी में डाल कर घोल बना लें और इससे 100 किलोग्राम बीज का उपचार किया जा सकता है।

सिंचाई

सिंचित अवस्था में जौ की खेती के लिए लिए 2-3 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है यदि पानी कम उपलब्ध हो तो पहली सिंचाई बुआई के 3-35 दिन बे तथा दूसरी सिंचाई हरे चारे की कटाई के तुरंत बाद के तुरंत बाद (50-55 दिन बाद) दें। तीसरी सिंचाई दाना बनाते समय ((90-95 दिन) देनी चाहिए।

कटाई

हरे चारे के लिए मैदानी भाग में बुआई से 50 से 55 दिन बाद एवं पर्वतीय क्षेत्र में लगभग 70 दिन की अवस्था में करें। दोनों के लिए फसल पकने पर कटाई करें। चूँकि जौ की फसल अधिक पकने के बाद झड़ने लगती है अतः कटाई शीघ्र करें। साथ ही सही शीघ्र कटाई के लिए कम्बाइन का प्रयोग करें।

उपज

अच्छे प्रबन्धन द्वारा जौ की द्विउद्देशीय फसल से 200-250 क्विंटल/हैक्टेयर हर चारा एवं 25-35 किवंटल/हैक्टेयर दाना/आसानी से लिया जा सकता है।

लेखन : जे.के. पाण्डेय, अनुज कुमार एवं रणधीर सिंह

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

 



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