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दुधारू पशुओं में बांझपन

परिचय

हमारा देश भारत एक कृषि प्रधान देश है। कृषि के साथ – 2 पशुपालन भी आय की दृष्टि से अच्छा व्यवसाय है। ये दोनों व्यवसाय एक दूसरे पर पूर्णतया निर्भर हैं। कृषि के बगैर पशुपालन सम्भव नहीं है और पशुपालन के बिना कृषि। सच कहें तो ये दोनों एक दूसरे की रीढ़ हैं। वैसे तो हमारा देश भारत पिछले 8-10 वर्षो से दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में प्रथम स्थान पर है लेकिन यदि प्रति पशु दुग्ध उत्पादन देखा जाए तो विदेशों की तुलना में काफी कम हैं वैसे तो पशु संख्या के आधार पर हमारे देश में सबसे अधिक पशु पाले जाते है। प्रति पशु दुग्ध उत्पादन कम होने के कुछ मुख्य कारण है एक तो हमारे देश में अशुद्ध नस्ल के पशु अधिक संख्या में हैं दूसरा मुख्य कारण है दुधारू पशुओं में बांझपन। पशु के बाँझ हो जाने के कारण अच्छी नस्ल के पशु भी कल्लखानों में काट दिए जाते है जिससे न केवल किसानों को भारी आर्थिक क्षति होती है बल्कि शेष्ठ जनन द्रव्य भी नष्ट हो जाता है जिससे दिन प्रतिदिन अच्छे पशुओं की संख्या लगातार घट रही है।

बांझपन के लक्षण

बांझपन का नाम सुनकर ही पशुपालकों के दिमाग में एक भय सा उत्पन्न हो जाता है। बांझपन से आशय है कि हमारे दुधारू पशु को एक वर्ष में एक बच्चा देना चाहिए या यों कहें कि पशु को एक साल के अंदर ब्याह जाना चाहिए और ये तभी संम्भव है जब पशु ब्याने के 45-75 दिन के बीच गर्भित हो जाए और गर्भ रुक जाए यदि इस समय या अवधि में पशु गर्मी में नहीं आता है तो हमे मान लेना चाहिए कि हमारा दुधारू पशु (गाय व भैंस) बांझपन की तरफ बढ़ रहा हैं। कभी-कभी तो पशु गर्मी में तो हर 21 दिन बाद आता है लेकिन गर्भ नहीं ठहरता है। ये भी बांझपन का एक लक्षण है। दुधारू पशुओं में बांझपन के अनेक कारण हैं इनमें:

  • पहला मुख्य कारण है कि दुधारू पशुओं को आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति न हो पाना क्योंकि दुधारू पशु के दूध में सभी आवश्यक पोषक तत्व (वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, केल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन आदि) मौजूद रहते है। यदि पशु के शरीर में इन पोषक तत्वों की कमी हो जाती है तो पशुओं में अस्थाई बांझपन जा जाता है।
  • दूसरा मुख्य कारण है कि पशुओं के पेट में कीड़े हो जाते हैं कीड़े होने के कारण भी पशुओं में बांझपन आ जाता है। क्योंकि जो पोषक तत्व हम अपने पशुओं को खिलाते हैं वे पोषक तत्व कीड़े चूस लेते हैं और पशुओं को उनकी आपूर्ति नहीं हो पाती हैं।
  • तीसरा मुख्य कारण हैं कि दुधारू पशुओं के लिए हरे चारे की उचित व्यवस्था न होना। हरे चारे की कमी के कारण भी पशुओं में बांझपन आ जाता है क्योंकि हरे चारे में सभी आवश्यक पोषक तत्व मौजूद रहते हैं जिससे पशुओं को सभी पोषक तत्व मिल जाते हैं। और हरे चारे आसानी से पच भी जाते है। सूखे चारे को पचाने में भी पशु की ऊर्जा अधिक खर्च होती है और इनसे पोषक तत्व भी बहुत कम मात्रा में मिल पाते है और कुछ सूखे चारे जैसे धान की पुआल दुधारू पशुओं को खिलाने से लाभ की अपेक्षा हानि अधिक होती है। इससे दुग्ध उत्पादन में कमी व कभी-कभी पशु की पूंछ सूख जाती है। जिससे पशु पालक को आर्थिक हानि उठानी पड़ती है।
  • चौथा मुख्य कारण है कि पशु के ओवरी में सिस्ट बन जाते हैं। सिस्ट बनने के कारण पशु गर्मी में तो नियत समय पर आता है लेकिन गर्भ नहीं ठहरता है। इस कारण दुधारू पशु बांझपन का शिकार हो जाता है।
  • पांचवा मुख्य कारण है कि पशुओं का उचित व्यायाम न हो पाना। प्राय: देखने में आया है कि कभी-कभी पशु में कोई भी कमी स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती है लेकिन फिर भी पशु को गर्भ नहीं ठहरता हैं।

बांझपन से निदान

दुधारू पशुओं में बांझपन के निदान के लिए यदि हम कुछ विशेष सावधानी बरते तो इस समस्या का निदान हो सकता है। इस समस्या के निराकरण के लिए सबसे पहले हमें दुधारू पशुओं के खानपान व रहन-सहन पर ध्यान देना होगा इसके लिए हमे अपने दुधारू पशु को संतुलित आहार खिलाने की आवश्यकता है और संतुलित आहार पशु के दुग्ध उत्पादन के आधार पर खिलाना चाहिए। दुधारू भैंस को दो लीटर दूध पर 1 किग्रा. राशन व गाय को 2.5 लीटर दूध पर 1 किग्रा. राशन खिलाना चाहिए। इसके अलावा 1-1.5 किग्रा. राशन जीवन निर्वाह के लिए देना चाहिए। संतुलित आहार देने का उचित तरीका अपनाना चाहिए पशु को दाना खिलाने के लिए सुबह का दाना शाम को और शाम का दाना सुबह को भिगो देना चाहिए। पशु पालकों को ध्यान रखना चाहिए कि अधिकतर पशुपालक गाभिन पशु को दाना या अच्छा चारा तब तक ही देते हैं। जब तक पशु दूध देती हैं दूध से हटने के बाद पशु को सूखे चारे या तुड़ी पर छोड़ देते है। जब की इस समय पशु को और अधिक अच्छे चारे व दाने की जरूरत हैं क्योंकि यह वह समय है जिसमें पशु को अगले ब्यांत के लिए भी तैयार होना है और पेट में पल रहे बच्चे का भी भरण-पोषण करना है। पशुओं के पेट में कीड़े होने के मुख्य लक्षण पशुओं की चमड़ी खुरदरी, गोबर में बदबू व पशु का दुग्ध उत्पादन पशु की क्षमता के अनुरूप नहीं हो पाता है। पेट में कीड़ों के लिए दुधारू पशु को 60-90 मिलीलीटर एल्बोमार पिला देनी चाहिए और 15-21 दिन के अंतराल पर दोबारा दवा पिला देनी चाहिए ऐसा करने से पशु के पेट के सभी कीड़े नष्ट हो जाते है। दुधारू पशु को हरे चारे की आपूर्ति के लिए हरे चारे को इस क्रम में उगाना चाहिए की वर्ष भर इसकी पूर्ति अच्छे तरीके से होती रहे इसके लिए हमें सस्यक्रम अपनाने की आवश्यकता पड़ेगी। मई-जून माह में मक्का, ज्वार, बाजरा आदि सितम्बर-अक्टूबर में बरसीम सरसों, जई, फरबरी-मार्च माह में मक्का के साथ लोबिया बोया जा सकता हैं। यदि इस तरीके से हम फसलों को बोएँगे तो एक चारा समाप्त होने से पहले दूसरा चारा तैयार हो जाएंगा। इसके लिए हमें दो चीजों की आवश्यकता पड़ेगी एक तो जमीन पर्याप्त हो और दूसरा पानी का साधन अच्छा हों यदि इनमें किसी भी चीज की कमी है तो हम समय क्रम को नहीं अपना सकते है। पशु पालकों को ध्यान रखना चाहिए की ज्वार का हरा चारा बुवाई के बाद जल्दी नहीं खिलाना चाहिए कम अवधि वाले पौधों में ग्लूकोससाइड होता जिसे धूरिन भी कहते है वह पशु के पेट में जाकर प्रूसिक या हाइड्रोसायनिक अम्ल के रूप में बदल जाता है। ज्वार की बुवाई के 30 दिन की उम्र वाले पौधों तथा जमीन की सतह के पास नई शाखाओं में यह अम्ल बहुत अधिक मात्रा में होता है। पेंडी वाली फसल भी छोटी अवस्था में पशुओं के लिए जहरीली होती है। फसल को फुल लगने के समय काटा जाना चाहिए। ग्लूकोसाइड पत्तियों में तनों का अपेक्षा अधिक मात्रा में होता है। यदि ज्वार की बुवाई के समय नत्रजन वाली उर्वरको की अधिक मात्रा खेत में दाल दी जाए तो कम उम्र वाले पौधों में नाइट्रेट अधिक मात्रा में जमा हो जाता हैं तथा धूरिन की मात्रा भी बढ़ जाती है। सूडान घास में ग्लूकोसाइड ज्वार की अपेक्षा बहुत कम होता है। 30 दिन के ज्वार के पौधें में ग्लूकोसाइड इतनी अधिक मात्रा में जमा रहती है कि यदि गाय को 4-5 किग्रा. हरा चारा खिला दिया जाए तो उसकी मृत्यु तक हो सकती है। ऐसी फसल में जिसमें पानी की कमी रही हो धूरिन की मात्रा बढ़ जाती है। इसलिए पशुपालकों को सलाह दी जाती है कि वे फसल की अवस्था (40-45 दिन बुवाई के बाद) को ध्यान में रखकर ही पशुओं को खिलाएं यदि बरसात न हुई तो फसल में कम से कम दो पानी लगाने के बाद ही पशुओं को खिलाएं क्योंकि पानी लगाने से हाइड्रोसाइनिक अम्ल जड़ों के माध्यम से घुलकर जमीन में चला जाता है।

कभी-कभी पशुओं की ओवरी में सिस्ट बन जाते हैं सिस्ट बनने का मुख्य कारण है कि पशुओं के ब्याने के बाद पशु की अच्छे से सफाई न हो पाना। ब्याने के 10-15 दिन बाद पशु छटाव (मैला) डालता है। यदि इस समय ओवरी की सफाई अच्छे से नहीं हो पाती है तो पशु की ओवरी में मैला रुकने से सिस्ट बन जाते हैं सिस्ट बनने का मुख्य कारण ये भी है कि जब पशु ब्याहता है तो कभी-कभी बच्चा फस जाता है या पशुओं में जेर रुक जाती हैं। इस स्थिति में पशुपालक किसी भी अनभिज्ञ व्यक्ति को बुलाकर जबरदस्ती बच्चे को बाहर खींच लेता है या जेर को भी जबरदस्ती निकालने की कोशिश करता है तो इसमें जेर का कुछ टुकड़ा टूटकर अंदर ही रह जाता है जेर अंदर रहने के कारण इसमें अंदर ही अंदर सड़न हो जाती है। यदि अधिक मात्रा में जेर रह जाती है तो सेप्टिक बन जाता है और कम मात्रा में रहने पर सिस्ट बनने की सम्भावना बढ़ जाती है। इसलिए पशु जितने आराम से ब्याता हैं पशु और पशुपालक के लिए इतना ही लाभकारी है। यदि पशु जेर डालने में देर करता है तो पशु को जेरसाफ, एक्सापार या यूट्रोटोन आदि दवाई पिलाई जा सकती है। इससे पशु जेर जल्दी ही डाल देगा और उसके गर्भाशय की सफाई अच्छी तरीके से हो जाएगी। प्राय: ऐसा देखा गया है कि जिन पशुओं का ब्यायाम नहीं होता हैं। उन पशुओं में भी बांझपन के लक्ष्ण आ जाते हैं। इसलिए दुधारू पशुओं के लिए व्यायाम बहुत जरूरी है। प्राय: ऐसा देखने में आया है कि जो बाँझ पशुओं को पशुपालक छुट्टा छोड़ देता है कुछ समय पश्चात वे अपने आप ही ग्याभिन हो जाते है और उनका गर्भ भी ठहर जाता है। व्यायाम के साथ-साथ स्वच्छ व ताजा पानी भी बहुत आवश्यक है। भैसों में गर्मी के महीनों में गर्भ नहीं ठहरता है प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया जा चुका है कि यदि भैसों को 3-4 घंटे ठंडे पानी में नहलाया या लेटाया जाए तो इससे भैंसों में सीजनल बांझपन को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। दुधारू पशुओं में बांझपन का एक मुख्य कारण और है जिन पशुओं के बच्चे मर जाते है। उन पशुओं को आक्सीटोसिन इंजेक्सन लगाकर उनका दूध जबरदस्ती निकाला जाता है। इससे पशु दूध हो दे देता है लेकिन उनमें बांझपन व कभी-कभी पशु का अबोर्शन (बच्चा गिरा देना) भी हो जाता है। इन सबके साथ-साथ दुधारू पशुओं के लिए मिनरल मिक्चर भी बहुत जरूरी है। मिनरल मिक्चर से पशुओं में सूक्ष्म पोषक तत्वों की आपूर्ति हो जाती है। मिनरल मिक्चर दुधारू पशुओं को 35-40 ग्राम प्रति दिन खिलाना चाहिए।

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार



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