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पशुओं तथा उनकी उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

पशुओं तथा उनकी उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

परिचय

जलवायु परिवर्तन हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण विचार हो रहा है। जलवायु परिवर्तन से हमारा अभिप्राय है कि लाखों वर्षों के अनुसार पृथ्वी को वैश्विक जलवायु या क्षेत्रीय जलवायु में सामान्य बदलाव का आना।

सभी जीव जन्तु इस जलवायु परिवर्तन से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते जा रहे हैं। पशुओं में गर्मी के तनाव नमक मुख्य समस्या पाई जाती है। गर्मी का तनाव एक ऐसा समय होता है। जब पशु वातावरण की भीषण गर्मी में अपने शरीर के तापमान को सामान्य करने में असमर्थ होता है।

गर्मी के तनाव के मुख्य कारण

  • अत्यधिक तापमान, अत्यधिक नर्मी, अत्यधिक सूर्य की रोशनी

जलवायु परिवर्तन से पशुओं पर निम्नलिखित मनोवैज्ञानिक प्रभाव होते है

  • अत्यधिक पसीना आना, तेजी से साँस लेना।
  • चयापचय का दर कम होना।
  • त्वचा की सतह पर रक्त के तेज प्रवाह से वाहिका विस्फर होना
  • इलेक्ट्रोलाईट अंसतुलन होना, पानी की मांग में वृद्धि आना आदि।

गर्मी के तनाव से पशुओं में निम्नलिखित परिवर्तन आते हैं

  • शरीर के तापमान में वृद्धि होना

शरीर का तापमान 102.5 डिग्री हो जाता है जबकि सामान्य तापमान 1010.5 डिग्री होता है।

  • श्वसन दर में बढ़ोतरी -70-80 मिनट से भी अधिक
  • जरूरत से ज्यादा ताकत की आवश्यकता

डेयरी गायों को गर्मी कम करने के लिए 20-30 अधिक ज्यादा ताकत की आवश्यकता होती है। श्वसन दर में बढ़ोतरी होना इसका एक उदाहरण है। इसके कारण फ्री दूध उत्पादन में जरूरत उर्जा का दर कम हो जाता है।

फीड़ पोषक तत्व का उपयोग

गर्मी के तनाव से सोडियम और पोटेशियम के बड़ा नुकसान आमतौर पर होता है श्वसन दर की वृद्धि के साथ जुड़े नुकसान की वजह से है। इसके कारण पशुओं में एसिड  आधार संतुलन बिगड़ जाता है और चयापचय क्षारमता को परिणाम में ला सकता है। इसके कारण पोषक तत्व उपयोग की दक्षता कम हो सकती है।

शुष्क पदार्थ का सेवन

गर्मी के तनाव से पशुओं में शुष्क पदार्थ का सेवन 10-20% कम हो जाता है।

दूध उत्पादन

गर्मी के तनाव के कारण दूध उत्पादन में 10-25 कमी आ जाती है।

प्रजनन

गर्मी के तनाव से गायों में प्रजनन प्रदर्शन में भी कमी आ जाती है। सूचना के अनुसार प्रजनन प्रदर्शन में अधिक बदलाव पाए गये हैं। प्रजनन का प्रभाव गर्मी के तनाव के काफी समय पश्चात भी पशुओं में बना रहता है।

जैसे कि:

  • मद अवधि घटने की लंबाई और तीव्रता, गर्भाधान दर में कमी
  • डिम्बग्रंथि के रोम के विकास और आकार के वृद्धि में कमी।
  • जल्दी भ्रूण होने वाली मौतों का बढ़ता खतरा

अनुकूलन रणनीतियां

डेयरी पशुओं पर जलवायु प्रवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए किसानों को कुछ अनुकूलन रणनीतियों को अपनाना चाहिए।

जैसा कि-

  • स्थानीय जलवायु तनाव और चारा स्रोत  के लिए अनुकूलित स्थानीय नस्लों की पहचान करना।
  • स्थानीय नस्लों में सुधार के लिए पास प्रजनन विधि अपनाएं।
  • गर्मी और तोग सहिष्णु नस्लों को अपनाएं।

- गर्मियों में छाया की व्यवस्था

- दो से तीन बार गर्मियों में पशुओं को स्नान करवाएं।

- एक ही स्थान पर अधिक पशुओं को न रखे।

- आवास और सुविधा का समायोजन

- पशुओं के लिए स्वच्छ और नियमित रूप से पीने के पानी की व्यवस्था करें।

- जल  संसाधनों को बेहतर प्रबन्धन

- चराई सुबह जल्दी और देर शाम में होनी चाहिए।

- सर्दियों में गुड़, सरसों का तेल अदरक खिलाएं।

- जलवायु तनाव में सोडियम और पोटेशियम पूरकता 30ग्राम प्रति सप्ताह में दे।

लेखन : शिल्पा राणा एवं परमेश्वर नायक

 

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

 



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