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घी में वनस्पती तेलों की मिलावट जांच करने के तरीके

परिचय

घी सबसे महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिवर्धक स्वदेशी दूध उत्पाद है। वैदिक काल से ही घी का भारतीय आहार में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है इसका विवरण वेदों में मिलता है। घी का उपयोग भारत के अलावा अन्य दक्षिण एशिया के देशों में भी होता है। भारत एक धार्मिक देश है जिसके सभी धार्मिक कार्यों में घी की आवश्यकता होती है। घी अन्य वसा से अधिक बेहतर होता है। क्योंकि यह वसा में घुलनशील विटामिन और आवश्यक फैटी एसिड जैसे पोषक तत्वों से समृद्ध माना जाता है। अधिकतर भारतीय शाकाहारी हैं अतः उनके भोजन में घी का मुख्य स्थान है। यही कारण है कि भारत में उत्पन्न होने वाले कुल दूध का लगभग 43% भाग घी बनाने में प्रयोग होता है। यही कारण है कि भारत में गर्मी के महीनों में दूध और घी की आपूर्ती में कमी एक बहुत ही जटिलस्थिति पैदा करती है। ऐसी स्थिति का अनुचित लाभ लेने के लिए धोखाधड़ी से व्यापारी घी में अन्य सस्ता वसा/तेलों जैसे परिष्कृत वनस्पति तेल/घी, पशु शरीर वसा और तरल पैराफिन जैसे अखाद्य खनिज तेलों के साथ मिलावट करते हैं। आज के वैश्विक प्रतिस्पर्धा में दूध और दूध के उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखना एक विकल्प नहीं अपितु एक दायित्व है। तथापि दूध में वसा की शुद्धता ज्ञात करना एक बहुत ही जटिल कार्य है। हालांकि, घी में वनस्पति तेलों की मिलावट की पता लगाने के हालांकि, घी में वनस्पति तेलों की मिलावट की पता लगाने के लिए कई तकनीकों को विकसित किया गया है। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

बौडिवीन टेस्ट

यह परिक्षण घी में वनस्पति घी की मिलावट ज्ञात करने के लिए किया जाता है। शुद्ध घी में वनस्पति घी की मिलावट रोकने के लिए सरकार ने वनस्पति घी के उत्पादकों में 5 प्रतिशत तिल का तेल मिलाना अनिवार्य किया हुआ हैं ताकि वनस्पति घी का देशी घी में मिलावट का पता लगाया जा सके। हाईड्रोक्लोरिक  अम्ल की उपस्थिति में सेसामोलिन (तिल के तेल में मौजूदा) के हाईड्रोक्लोरिक के द्वारा गठित सौसेम और फरफूरल के बीच की प्रतिक्रिया के कारण एक स्थायी क्रिमसन रंग के उत्पन्न होने पर आधारित है।

विधि (IS:3508, 1966)

एक परखनली में 5 ग्राम संदिग्ध पिघला हुआ घी ले। इसमें 5 मिलीलिटर हाईड्रोक्लोरिक अम्ल मिलाए। तब फरफूलर रिएजेंट 0.4 मिलीलिटर डालें और परखनली को 2 मिनट तक अच्छी तरह हिलाएँ । घोल दो परतो में बंट जाएगा । घोल के नीचे वाली परत का रंग गुलाबी या लाल होना वनस्पति की उपस्थिति इंगित करता है। पुष्टिकरण के लिए, 5 मिलीलीटर पानी डालें और फिर से हिलाये। यदि रंग अम्ल परत में बना रहता है तो वनस्पति मौजूदा है। अगर रंग गायब हो जाता हैं, तो यह अनुपस्थित है।

बिडिटैरो रेफ्रक्टोमीटर(बी.आर) परिक्षण

बी.आर. परिक्षण या अपवर्तक सूचकांक की डिग्री के एक तरल या एक पारदर्शी ठोस के माध्यम से गुजर रही प्रकाश तरंगों के झुकने से संबंधित है जो कि विशेषता है। शद्ध घी के मामले में यह गुण आसानी से 40 डिग्री सेल्सियस पर एक एब्बे रेफ्रक्टोमीटर माध्यम से निर्धारित किया जा सकता है। शुद्ध घी का बी.आर. मान या अपवर्तक सूचकांक अन्य वसा और तेलों की

तुलना में कम है। इसका मुख्य कारण घी में Glyeerides और लघु श्रृंखला फैटी एसिड की अधिक संख्या है।

विधि (IS:3508, 1966)

बिडटैरो रेफ्रक्रोमीटर का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस बनाये रखे। संदिग्ध पिघालाए हुए घी की एक बूंद प्रिज्म के बीच में रखें। बी.आर. का मान तापमान बढ़ने के साथ घट जाती है। गाय एवं भैस का बी.आर. का मान 40 डिग्री सेल्सियस पर क्रमशः 40-43 एवं 40-45 होता है। मानक मूल्य के साथ सुसंगत होना चाहिए। इसमें विचलन, विशेष रूप से वनस्पति तेल और वसा के साथ घी की मिलावट इंगित करता है।

थिनलेयर क्रोमैटोग्राफी (टी. एल. सी)

कॉलेस्टेरॉल घी और शरीर के वसा का मुख्य स्टेरॉल है  जबकि फाइटोस्टेरॉल वनस्पति वसा में पाया जाता है। फाइटोस्टेरॉल - बीटा साइटोस्टेरॉल, स्टिगमास्टरॉल, कम्पस्टरॉल एवं ब्रस्सिकास्टेरॉल का समूह है। इसलिए शुद्ध घी में फाइटोस्टेरॉल की उपस्थिति आदि, वनस्पति तेल से मिलावट को दर्शाता है। इसे टी.एल.सी. के द्वारा जाँचा जा सकता है।  घी में सोयाबीन, सूर्यमुखी, मूंगफली इत्यादि तेल की मिलावट को रिवर्स फेज - टी.एल.सी के द्वारा 1 प्रतिशत की भिन्नता एवं कपास के बीज के तेल की घी में मिलावट साइक्लाप्रेप्नोइक फैटी एसिड कपास के बीज के तेल में होता है जो MBRT परिक्षण में मेथाइलिन ब्लू डाई को तुरंत रंगहीन, और हालफेन रिएजेंट के साथ क्रिमसनरंग उत्पन्न करता है।

(अ)  मेथाइलिनब्लूरिडक्शन टेस्ट (MBRT)

यह परिक्षण साइक्लोप्रोपेन रिंग फैटी एसिड जैसे कि मावेलिक (C 18:1)और स्टेरकुलिक एसिड (C19:1) पर आधारित है, जो कि कपास के बीज के तेल में मौजूद होते हैं। पिघले हुए संदिग्ध घी के 5 ग्रा नमूने को एक परखनली में ले। इसमें 0.1मिलीलीटर 0.1% मेथाइलिन ब्लू डाई रिएजेंट (मेथनॉलः क्लोरोफार्म,1:1) मिलायें। परखनली को हिलायें एवं यह ध्यान रखें की घी जमना नहीं चाहिए। डाई का रंगहीन होना घी मैं कपास कै बीज के तेल का मिलावट या कपास क्षेत्र से घी को इंगित करता है।

(ब) हालफेन परीक्षण

पिघले हुए संदिग्ध घी के 5 मिलीलीटर नमूने को एक परखनली में लें। उसमें 5 मिलीलीटर हालफेन रिएजेंट (कार्बन डाइसल्फाइड में 1: सल्फर सोल्यूशन + बराबर मात्रा आइसो एमाइल) डालें। अब इन्हें अच्छी तरह मिलायें। परखनली को उबलते हुए संतृप्त सोडियम क्लोराइड के सोल्यूशन में 1 घंटा के लिए रख दें। क्रिमसन रंग की उपस्थिति घी में कपास के बीज के तेल का मिलावट या कपास क्षेत्र से घी को इंगित करता है।

फाइटोस्टेराइल एसीटेट परिक्षण (IS:3508, 1966)

इस परिक्षण को घी में वनस्पति वसा का पता लगाने के लिए विशेष रूप से किया जाता है। श्री में कोलेस्ट्रॉल होता है। जबकि सभी वनस्पति तेलों में फाइटोस्टेरॉल होते हैं इस तथ्य पर यह परिक्षण आधारित है।

फाइटोस्टेरॉल एसीटेट के गलनांक को ज्ञात करने के लिए घी के नमूने को पहले सपोनिफाइ करें। उसके बाद उसमें अल्कोहलिक डिजिटोनिनघोल डाल कर प्रेसिपिटेट करें। स्टेरॉल डिजिटोनिन प्रेसिपिटेट को एसिटिक एनहाइडीड के साथ एसिटाईलेट करें व सुखा लें। यदि स्टेराइल एसीटेट का गलनांक 115 डिग्री सेलसियस हो तो घी को शुद्ध माना जाता है, पर यदि  स्टेराइल एसीटेट का गलनांक 117 डिग्री सेलसियस से अधिक हो तो घी में वनस्पति तेल की मिलावट मानी जाएगी।

मोडिफाइड बीबर परीक्षण

इस परीक्षण के द्वारा शुद्ध घी में वनस्पति तेल कीमिलावट को 5-7 प्रतिशत की दर तक ज्ञात कर सकते हैं।

विधि

एक परखनली में 1 मिलीलीटर संदिग्ध घी के नमूने को ले। उसमें 1.5 मिलीलीटर हैक्सैन मिलायें। फिर अम्ल रिएजेंट मिलाये और अच्छी तरह परखनली को हिलायें उसमें 1.5 मिलीलीटर हैक्सैन मिलाये। रंग विकसित होने के लिए कुछ देर तक परखनली को छोड़ दें। घोल में दो परत बन जाएँगी। शुद्ध घी का ऊपरी परत रंगहीन होता है जबकि वनस्पति तेल से मिलावट वाले नमूने की ऊपरी परत में सुनहरा पीला रंग विकसित होता है।

निष्कर्ष

साहित्य की समीक्षा के आधार पर, निष्कर्ष निकाला जा  सकता कि बौडोवीन टेस्ट, बी.आर., थिन लेयर क्रोमैटोग्राफी, मैथाइलिन ब्लू रिडक्शन टेस्ट, हालफेन परिक्षण, फाइटोस्टेराइल एसीटेट परिक्षण, मॉडिफाइड बीबर परिक्षण आदि घी में विदेशी का वसा का उपस्थिति का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। रिवर्स फेज-टी.एल.सी के द्वारा मिलावट को न्यूनतम दर तक पता लगाया जा सकता है जबकि मॉडोफाइड बीबर परिक्षण कम समय लेता है। भविष्य में मिलावट को रोकने केलिए और अच्छे एवं कारगर तरीके जो कम समय ले और कम से कम मिलावट दर को जाँच सके विकसित किये जा सकते हैं।

लेखन: अनुपमा रानी एवं विवेक शर्मा

स्त्रोत: पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय



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