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दुधारू पशुओं में गर्भाशयशोध

परिचय

गर्भाश्यशोध पशु के ब्याने के तीन हफ्ते के अन्दर ही गर्भाश्य के इन्डोमेट्रियम और पेशीय परत के सूजने की स्थिति को कहते हैं। गर्भाशोधकी उग्रत के आधार पर इसे विभिन्न वर्गों में बांटा गया है। विषाक्त जच्चा गर्भाश्यशोध या उग्र गर्भाश्यशोध या पशु के ब्याने के 10 दिन के अन्दर होता है और इसके लक्षण होते है बुखार, अवसाद, भूख न लगना और दुग्ध उत्पादन में गिरावट।

क्लीनिकल /नैदानिक गर्भाश्यशोध कम तीव्र / उग्र होता है और कोई विशेष लक्षण भी न होते हैं। ये पशु के ब्याने के 11 से 21 दिन के अन्दर होता है इसके बाद यदि गाय 21दिन के बाद भी संक्रमण नहीं निकाल पाती तो उसे क्लीनिकल गर्भाश्यशोध हो जाता है। गर्भाश्यशोध एवं अन्तः गर्भाश्यशोध क्रमशः 40 प्रतिशत एवं 20 प्रतिशत अधिक उत्पादन करने वाली गायों में होता है। भारत में 30 प्रतिशत गर्भाश्यशोध गया है। गर्भाश्यशोध उत्पादन और प्रजनन क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करता है और इससे बहुत नुकसान होता है। गर्भाश्याशोध से न केवल सर्विस पीरियड, सूखा बाल एवं ब्याने के अन्तराल में वृद्धि होती है बल्कि दुग्धकाल में भी गिरावट होती है। यह पाया गया है गर्भाश्यशौध के इलाज में लगभग 20 रूपये प्रतिगाय खर्च होता है। जबकि दुग्धकाल खर्च 5760 रूपये प्रति गाय होता है।

गर्भाश्यशोध के कारण

गर्भाश्यशोध के कई जोखिम कारक है जैसे जुड़वा बच्चे होना, डिस्टोकिया मृत प्रसव, गर्भपात, जैर गिरना,फूल दिखना, प्रजाति ज्वर और किटोसिस है। मौसम के अलावा, ब्यांत भी गर्भाश्यशोध को काफी प्रभावित करती है गर्भाश्यशोध सर्दियों और पहले ब्यांत के समय जो शरीरिक स्थिति होती है उसका गर्भाश्यशोध होने में असर पड़ता हैं। गार्यों का बहुत भारी होना गर्भाश्यशोध को बढ़ा देती है। यदि सभी जोखिम कारकों की तुलना की जाये तो जैर न गिरना 50-90 प्रतिशत तक गर्भाशशोधका कारण है। ।

कारणात्मक जीव

गर्भाश्यशोध के बहुत से कारणात्मक जीव है जैसे जीवाणु, विषाणु, फंफूद, प्रोटोजोआ इत्यादि। ब्यांत के वक्त या ब्यांत के बाद गर्भाश्य मुख्यः जीवाणु और फंफूद से संक्रमित हो जाता है। इस समय गायों की प्रतिरक्षा शक्ति कमजोर होती है यदि योनिमुख या योनि की चोट संक्रमण की मुख्य वजह है तो ब्यांत के समय बाहरी सहायता करते वक्त गर्भाश्य के बाहरी जीव प्रवेश कर जाते है। शरीर में होने वाली कई बिमारियों (सिस्टोमिक डिजिजेज) से भी गर्भाश्य में संक्रमण से हो सकता है जैसे इंफोक्सियस बीवाइन राईनोटाकियाइटिस, बोवाइन वायरल डायरिया एवं लेप्टोस्पाइरोसि।

यौन रोग जैसे कैम्पाइलो बैक्टीरियोसिस (वीब्रियोसिस) और ट्राईकोमोनियासिस से संक्रकित सांड द्वारा प्राकृतिक प्रजनन के दौरान भी संक्रमण मादा के प्रजनन में प्रवेशकर सकता है।

निदान

क्षेत्रीय स्तर पर गुदा परीक्षण और गर्भाश्य स्राव का परीक्षण सबसे अधिक गर्भाश्यशोध के निदान के लिये उपयोगमें लाया जाता है। सामान्य स्थिति में योनि स्राव का रंग भूरे लाल से सफेद होता है और इसमें कोई गन्ध नहीं होती है। लेकिन गर्भाश्यशोध में योनि स्राव बदबुदार पीपदर, जलीय एवं भूरे लाला रंग का होता है। प्रभावित गाय को दुग्ध दोहक गन्ध दोहन या सफाई के दौरान बड़ी आसानी से पहचाना जा सकता है। ।क्योंकि प्राव बहुत ही बदबूदार होता है। अन्य नैदानिक संकेत है। बुखार,अवसाद, भूख न लगना, भोजन में अरूचि और दुग्ध उत्पादन में गिरावट है। गुदा परीक्षण के दौरान गर्भाश्य द्रव से भरा प्रतीत होता है और कई बार गर्भाश्य तनावयुक्त या नहीं भी हो सकता। पीपदार गर्भाश्यशोध द्रव को गर्भाश्यशोध में दबाव डाल कर बाहर निकाला जा सकता है। बड़ी गार्यों में झूलता हुआ गर्भाशय पेट के उदर भाग तक पहुंच जाता है जिसे टटोलना मुश्किल हो जाता है।

उपचार

गर्भाश्यशोध का इलाज मुख्यतः एंटीबायोटिक दवाओं और हार्मोन्स या दोनो का संयोजन से किया है। एंटोबोयटिक या तो प्रणाली बद्ध तरीके से देते हैं या फिर सीधै गर्भाश्य में स्थानीय देते हैं। बिगड़ी हुई स्थिति में इनके साथ सहायक उपचार भी करते हैं। जैसे एंटीइनफलोमैटरी दवाएं एवं शिराओं में चढ़ाया जाने वाला तरल पदार्थ। एंटीबायोटिक उपचार तभी सफल होगा तब तक गर्भाश्य से भरा हुआ तरल पदार्थ पूरी तरह से निकाल नहीं दिया जाता। आदर्श उपचार ऐसा होना चाहिए जिससे सभी हानिवर्ध जीवाणु निकल जाएँ और गर्भाश्यशोध कोई क्षति न पहुंचे।

गर्भाश्यसंकूचन(यूटेराइन कांटैक्टर)

ये दवाईयों के मुख्यत: गाये के संक्रमित गर्भाश्य से भरे पदार्थ को बाहर निकालने में सहायता करती है। गर्भाश्य से भरे पदार्थ को बाहर निकालने में विभिन्न दवाओं का उपयोग किया जाता है जो कि निम्नलिखित हैं।

आक्सीटोसिन

ये व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है कि ऑक्सीटोसिन ब्याने के 24-48 घंटे बाद गर्भाश्य संकुचन करता ज्यादा होता है उनमें ब्याने के तुरन्त बाद ही ऑक्सीटोसिन दे दिया जा सकता है।

कैल्शियम

कैल्शियम देने का मुख्य उद्देश्य गर्भाश्य की चिकनी पेशियों का संकुचन बढ़ना होता है, ब्याने के 1,2 दिन बाद गायों में कैल्शियम मैं कमी हो जाती है क्योकि कैल्शियम कौलैस्ट्रम के जरिए बाहर निकलता है। जिसकी वजह से गर्भाश्य में नाल अन्दर ही रह जी है, गर्भाश्य पुनः स्थिति में देर से आता है और गर्भाश्यशोध का कारण बनता है। गर्भाश्य से ग्रसित गाय जो इस बीमारी के काई डाल कर बाहर निकाला जा सकता है। बड़ी गार्यों में झूलता हुआ नहीं दिखा रही है। उसे 60 से 100 ग्राम कैल्शियम 2-4 दिन तक खिलाना चाहिए।

ग्लूकोज

शुष्क पदार्थ के सेवन की कमी से दुग्ध उत्पादन करने | वाली गायों से ब्यांत के दौरान नकरात्मक ऊर्जा संतुलन होता हैं। गर्भाश्य संक्रमण नियंत्रण में बाधा आती है। गर्भाश्यशोध ग्रसित बाय को संक्रमण से बचाने के लिए प्रोपाइलीन लाइकोल या प्रोवियोनोट दिया जाता है। कैल्शियम प्रोपियानेट 1 पौंड या 455 ग्राम पानी में मिलाकर देना एक प्रभावी उपचार है।

एंटीबायोटिक चिकित्सा

एंटीबायोटिक जो गर्भाश्य के उपचार में प्रयोग में लाई जाती है जो निम्न है।

पैनिसलीन

ब्यांत के बाद होने वाले गर्भाश्यशोध में सबसे ज्यादा उपयोग में आने वाली दवा है। क्योकि ये गर्भाश्य की सभी परतों को पार कर जाती है और इसकी लागत भी कम है।

प्राकेनपेनिसलीनजी

21000 IU/कि.ग्राम की दर से 3-5 दिन तक मांस पेशी से देना चाहिए। 4 दिन तक दुग्ध प्रयोग में नहीं लाना चाहिए और इसका मांस 10 दिन तक उपयोग में नहीं लाना चाहिए।

एम्पीसिलीन

10-11 मि.ग्राम किलोग्राम की दर से 3-5 दिन तक दे सकते हैं और इस दवा के प्रयोग के बाद दुग्ध 2 दिन तक और मांस 1 दिन तक प्रयोग में नहीं लाना चाहिए।

अक्सीटेट्राईक्लिन

ब्यांत के बाद होने वाले गर्भाश्यशोध के उपचार में आक्सीटट्राईसाइक्निल 10 मि.ग्रा./कि.ग्रा. शारीरिक भारत की दर से मांस में या शिरा में देते हैं। लेकिन ये दवा कम मात्रा में गर्भाश्य में पहुंच पाती है। इसीलिये इसे कम ही प्रयोग में लाया जाता है। गर्भाश्यशोध का प्रजनन एवं दुग्ध उत्पादन में होने वाले नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिये कभी क्लोरटेट्रासाइक्लिन 5 ग्राम हफते में दो बार दो हफ्ते तक देते हैं।

सेफ्टीफर

सेफ्टीफर सिर्फलोस्पोटन की तीसरी पीढ़ी की दवा है। इसका दुग्ध में कोई प्रभाव नहीं होता हैं एवं मांस में तीन दिनों तक रहती है।

सेफ्टीफर सोडियम

1मि.ग्रा./कि.ग्रा. की दर से या सेफ्टीफर हाईड्रोक्लोराईड2-2 मि.ग्राम/किलोग्राम की दर से मोस में तीन चार दिनों तक देते हैं। सैफ्टीफर क्रिस्टलाइन अम्लयुक्त भी 6-6 मि.ग्राम/ कि.ग्राम की दर से खाल के नीचे एक बार देते हैं।

बचाव

गर्भाश्यशोध के बहुत सैकारण हैं। जोखिम कारको उचित पहचान करके प्रबन्धन कार्यान्वयन में उचित परिवर्तन से बीमारी को कम कर सकते हैं। ऐसी बीमारियों के रोकथाम के लिए उचित टीकारण, कार्यक्रम समावेश करना चाहिए जिनका गर्भाश्यशोध में असर पड़ता हो। इस बीमारी से बचाव के लिये अच्छी आवासीय व्यवस्था तथा पोषण चाहिए जिनका गर्भाश्यशोध में असर पड़ता हो। इस बिमारी से बचाव के लिये पर्याप्त आवासीय व्यवस्था, पोषण संतुलन (ऊर्जा, प्रेटीन, खनिज, विटामिन्स) स्वादिष्ट भोजन, साफ सफाई एवं भीड़ भाड़ से बचाव इत्यादि जरूरी है।

स्त्रोत: पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय



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