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सूकर पालन कला

घूमते हुए सूकर और उन पर काबू पाना

सूकर का आकार एंव बनावट, उसकी स्वतंत्र प्रवृत्ति, पैने दांत, नाखून, बीएल आदि के कारण सूअर पर काबू पाना कठिन है।

गांवों में सूकरों का नियंत्रित करने हेतु कोने की ओर हांक कर, झटके से पिछले पैरों को एक हाथ से पकड़ कर उठाएँ फिर एचलिस नाम की नस को दबाएँ, उसके बाद टांगों के सहारे से सूकर को इतना उठाएँ कि अगले पैरों की पकड़ जमीन से छूट जाएँ, तब वह अपने आप को असाहय महसूस करता है। पिछली टांगों को मरोड़ कर बांध दें। उसी समय दूसरा व्यक्ति आगे और पीछे की टांगों के बीच में एक 6 ईंच चौड़ा पाइप फंसाये। यदि आवश्यक हो तो उसके पैरों और गर्दन के बीच एक बांस फंसाया जा सकता है।

सूकरों को एक-एक अपेक्षा समूह में घुमाने, ले जाना उचित है। सूकर पर छड़ी का उपयोग, उपयोगी सिद्ध  नहीं होता, क्योंकि पीठ पर मोटी त्वचा और चर्बी की मोटी परत होती है, अतः ताकि सूकर ऊतेजित न हो उत्तेजित और क्रोधित सूकर को पकड़ना असंभव न भी तो बहुत कठिन अवश्य हो जाता है।

प्रसव प्रक्रिया

छत्तीसगढ़ के गावों में कई परिवार सूकर पिल्लों की बिक्री से अपनी आजीविका चलाते है। सूकर पिल्लों से होने वाली आय एक मादा द्वारा जल्दी-जल्दी प्रसव होने, एक प्रसव में पिल्लों की संख्या, उनकी जिन्दा रहने की दर और विक्रय के समय तीव्र वृद्धि पर निर्भर करती है।

सुविधाएं

प्रसव के समय की सुविधाएं साधारण एंव कम खर्चीला होनी चाहिए। जैसा कि हम जानते हैं कि नवजात पिल्ले बहुत सी बीमारियों के प्रतिग्राही होते हैं। अतः प्रसव का स्थान उपयोग के पूर्व अच्छी तरह साफ किया जाना चाहिए। वहाँ इस तरह की रचना होनी चाहिए कि भारी भरकम शरीर की मादा सूकर पिल्लों के ऊपर न लेट पाए। चार खूटों को चारों कोनों मे इस प्रकार गाड़ने से कि मादा सूकर के लेटने के बाद पिल्लों का कोने बैठने के लिए जगह बची रहे, इस दुविधा को कम किया जा सकता है।

प्रसव गृह को फिनाइल आदि की सहायता से किटाणु रहित कर दिया जाना चाहिए। यदि सर्दियों के दिन हैं और फर्श ठंडा हो तो, भूसा कुट्टी आदि को नीचे बिछा दिया जाना जाना चाहिए। ताकि ठंडक से मादा सूकर और पिल्लों की बचत हो सकें।

विदेशी नस्ल की मादा का प्रसव पूर्व प्रबंधन

संभावित प्रसव तिथि के दो हफ्ते पूर्व पेट के कृमियों की दवा डॉक्टर की सलाह से पिला देना उचित होता है।

मादा सूकर की त्वचा और बालों के बीच पेट के कीड़ों के अंडे, जूएँ, लीखें, कीटाणु, धूल आदि चिपके रहते हैं। इनसे मुक्त करने के लिए लगभग चार से पाँच दिन पूर्व हल्के गर्म पानी में साबुन व डिटोल आदि से नहलाना चाहिए। उसके बाद ही स्वच्छ प्रसव स्थान पर मादा को रखना चाहिए। 2-3 दिन पूर्व से आहार की मात्रा को घटा देना चाहिए। आहार तैलीय, हल्का व चिकना हो और उसमें कोढ़ा की मात्रा अवश्य होनी चाहिए।

प्रसव के पूर्व संकेत

  1. लगभग 24 घंटे पूर्व मादा अशांत व बेचैन हो जाती है।
  2. लगभग 8-16 घंटे पूर्व थानों से दूध झलकता दिखाई पड़ता है।
  3. लगभग 5 घंटे पूर्व उपलब्ध साधनों से मादा सूकर एक घोसलें जैसी आकृति बनाना प्रारम्भ हो करती है।
  4. लगभग 3 घंटे पूर्व पेट के संकुचन के कारण हलचल ऊपर से महूसस की जा सकती है।
  5. लगभग 2 घंटे पूर्व रक्त मिश्रित तरल पदार्थ योनि से टपकना प्रारम्भ हो जाता है।

प्रसव के समय एंव प्रसवोत्तर प्रबंधन

मादा सूकर के प्रसव के स्मी ध्यानपूर्वक देखते रहने की आवश्यकता होती है ताकि  मादा या पिल्लों की सहायता की, आवश्यकता होने पर हम उन्हें सहयोग दे सकें।

मादा सूकर के द्वारा पिल्लों को किसी भी तरह का नुकसान होने से बचाना चाहिए। कुछ नई उम्र की मादाएँ अपने ही पिल्लों के प्रति प्रसव के दौरान दुष्टापूर्ण  व्यवहार करती है। प्रसव के दौरान क्रमशः पिल्लों को वहाँ से हटाते जाना चाहिए। पूरी प्रसव प्रक्रिया पूर्ण होने के कुछ देर बाद मादा शांत हो जावे, फिर वह आसानी से पिल्लों को स्वीकार कर लेती है।

बाहर निकलते समय कठिनाई आने पर पिल्लों को सहारा देकर निकाल लेना चाहिए।

मादा को पिल्लों  के ऊपर लेटने से बचाना चाहिए।

कमजोर पिल्लों को बाहर से दूध आदि पिलाना उचित होगा।

जहां प्रसव स्थल की स्वस्च्छ्ता  के कायम रहने पर संदेह हो एंव संक्रामण की संभावना हो तो पिल्लों को नाल काटने के बाद नाभि पर 15% टिंचर आयोडिन का घोल रुई की सहायता से लगा देना चाहिए।

प्रायः अधिक उम्र की मादा सूकर बिना किसी समस्या के प्रसव पूर्ण करती है। प्रसव के दौरान मादा सुकर को कम से कम व्यवधान देना चाहिए। बहुत अधिक आवश्यक यदि न  हो तो प्राकृतिक प्रसव होने देना चाहिए।

प्रसव के बाद मादा को भी शांत रहने देना चाहिए। आहार की मात्रा एंव सांद्रता भी धीरे- धीरे बढ़ाई जाना चाहिए। जब वह पूर्ण आहार पर आ जाए तो पिल्लों को दूध पिलाने के लिए भी अतिरिक्त सांद्र आहार देना चाहिए।

पिल्ला पोषण कला

जैसे ही पिल्लों का जन्म हो, उन्हें मादा सूकर की पहुँच के बाहर हल्के गर्माहट वाले घोंसले में रखना उचित होता है। माँ के दूध के अतिरिक्त उन्हें आयरन सप्लेमिनेट की भी आवश्यकता होती है। नाल आदि को काटने, और पिल्लों को साफ करने से उत्पन्न होने वाली आवाज से मादा सूकर क्रोधित हो सकती है। अतः इस प्रकार की प्रक्रिया मादा सुकर से दूर रखकर पूरी होनी चाहिए। तथा सुकर को वहाँ अकेला ही रखा जाना चाहिए। सूकर पिल्ले बहुत ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के होते हैं। वे सात दिनों के बाद ही आहार (दूध के अलावा) को सूंघना एंव मुंह में डालना प्रांम्भ कर देते हैं और दो या तीन सप्ताह में तो वह आहार की पर्याप्त मात्रा में उपयोग करना प्रारम्भ कर देते हैं। उन  परिस्थितियों में जबकि एक मादा द्वारा जन्म दिये बच्चों  की संख्या बहुत अधिक हो, मादा कमजोर हो, बीमार हो, तब तीसरे हफ्ते के बाद से पिल्लों को क्रीपर राशन (पिल्लों का आहार) दिया जाना अति आवश्यक हो जाता है।

यह देखा जा है कि क्रीपर राशन खिलाए जाने वाले पिल्लों की वृद्धि 20% तेजी से होती है। प्रोटीन युक्त आहार से भी पिल्लों के भार में वृद्धि तेजी से होती है।

सूकर पिल्लों को दाना ऐसी जगह रखकर खिलाना चाहिए कि वहाँ बड़े सूकर आकर उन्हें व्यवधान न दे सकें। उस स्थान पर सर्दियों के मौसम में ऊष्मा का प्रबंध होना चाहिए, जिससे पिल्लों के द्वारा आहार की अधिक मात्रा उपयोग में लाई जाती है।

पाँच से आठ हफ्ते के बीच की किसी भी उम्र मे पिल्लों को माँ का दूध छुड़ाया जा सकता है। गाँव की परिस्थितियों में दूध छुड़ाया जाना संभव कम होता है। 8 हफ्ते के बाद मादा सूकर दुग्धोपदन स्वतः ही बहुत कम हो जाता है। तब तक पिल्ले भी आहार उपयोग कंरने लगते हैं।  दूध छुड़ाने के एक हफ्ते पिल्लों को पेट के कृमि की दवा देनी चाहिए।

सूकर पिल्लों का रखरखाव एंव लौह तत्व की आपूर्ति

सूकर पिल्लों की वृद्धि बहुत तेज होती है। 20 दिन की उम्र में जन्म के समय का दो से तीन गुणा वजन हो जाता है इस वृद्धि के कारण उनके रक्त का आयन भी उसी अनुपात में बढ़ता है, इस कारण होमिग्लोबिन नाम पदार्थ जिसका मुख्य घटक लौह तत्व होता है, बढ़ता है जो बाहर से लौह तत्व की आपूर्ति की मांग करता है। परीक्षणों से यह पता लगा है 2-3 हफ्ते की आयु तक पिल्लों को प्रतिदिन लगभग 7 मिलीग्राम लौह तत्व आवश्यकता होती है। जन्म के समय पिल्ले के शरीर में लगभग 4.5 मिलीग्राम लौह तत्व होता है। और माँ के दूध से 1.0 मिलीग्राम प्रतिदिन मिलता है,अतः बाहर से लौह तत्व की आपूर्ति की आवश्यकता होती है। जिसके अभाव में 8दिन  के अंदर ही इसकी कमी के लक्षण दिखने लगते हैं। कमजोरी, बालों की रूखापन, गर्दन, पैर, कंधों की त्वचा का झुर्रियां,म्यूकस झिल्ली में पीलापन, सुस्ती, दस्त लगना, बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता की कमी और एकाएक मृत्यु इस बीमारी के लक्षण हैं।

यह एक तथ्य साबित हो चुका है कि पिल्लों को लौह तत्व की बाहर नियमित खुराक आवश्यक है, जो कई तरह से पूर्ति की जा सकती है:

  1. वर्षा ऋतु मे यदि घास के मैदान में पिल्ले विचरण करते हैं, तो जमीन में घुसी जड़ों के साथ उन्हें लौह तत्व की पूर्ति अपने आप होती रहती है।
  2. आयरन पेस्ट को आहार द्वारा भी  तीसरे और 10वें दिन दिया जा सकता है।
  3. फेरस सल्फेट (हरा थोथा) का घोल पिल्लों की माँ के थन पर प्रतिदिन लगा देने से भी काम चल सकता है, जिसे 10 लीटर गर्म पानी में 500 मिलीग्राम फेरस सल्फेट तैयार किया जा सकता है।।
  4. 100 मिलीग्राम आयरन इंफेरान इंजेक्शन के साथ में एक ही पूर्ण खुराक दी जा सकती है। यह थोड़ा मंहगा किन्तु सर्वोत्तम तरीका है। हालांकि यह महत्वपूर्ण नहीं है कि लौह तत्व किस प्रकार दिया गया है। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि समय पर प्रत्येक पिल्ले को आयरन पर्याप्त मात्रा में मिल जाना चाहिए।

स्त्रोत: छत्तीसगढ़ सरकार की आधिकारिक वेबसाइट



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